स्वाधीन-मार्ग (स्वाधीनता का मार्ग तो) | Swadhin Marg (Swadhinta ka marg to)

स्वाधीनता का मार्ग तो निर्ग्रन्थ मार्ग है।
आराधना का मार्ग ही स्वाधीन मार्ग है ।।टेक।।

स्वाधीनता पर से नहीं स्व से सदा आती।
निज में ही तृप्त परिणति स्वाधीन हो जाती ।।
संतुष्ट है निज में अहो स्वाधीन है वह ही।
इच्छाओं के वशवर्ती भोगाधीन है वह ही ।।
जो भोगों का है दास वह सब जग का दास है।
जो भोगों से उदास प्रभुता उसके पास है।
भोगों से सुख की कल्पना संसारमार्ग है। स्वाधीनता…॥१।।

प्रभु वीतरागी का अहो स्वाधीन नाम है।
रागादि ही जिसके नहीं पर से क्या काम है ?
मुनिराज हैं स्वाधीन बाह्य साधन के बिना।
एकाकी जंगल में विचरते आकुलता बिना ।।
देखो सुरक्षा का नहीं कुछ भी वहाँ साधन ।
फिर भी निर्भय रह कर करें शुद्धातम आराधन ।।
अस्त्रों-शस्त्रों का संग्रह तो भय का ही मार्ग है। स्वाधीनता…॥२॥

धन के बिना निर्धन अरे अधीन सा दीखे।
तृष्णा के वशवर्ती धनवान भी दुःखी दीखे ।
भोगों को पाने के लिए मूरख रहे रोता।
पर भोगों को पाकर भी कौन तृप्त है होता ?
ज्यों-ज्यों भोगे त्यों-त्यों तृष्णा ही बढ़ती है भाई।
अग्नि की ईंधन से तृप्ति किसने है कर पाई ?
निवृत्ति का ही मार्ग भवि स्वाधीन मार्ग है। स्वाधीनता…।।३।।

गोरखधन्धे की इक कड़ी को हाथ लगावे।
फिर सुलझाना मुश्किल उलझता चक्र ही जावे ।।
त्यों ही समस्यायें अनन्त जीवन है थोड़ा।
सुलझाने की आकुलता में जीवन होवे पूरा ।।
संक्लेश से मर कर अरे दुर्गति ही पाता है।
सारा विकल्प उसका देखो व्यर्थ जाता है।
मुक्ति का मार्ग तो अरे अन्तर का मार्ग है। स्वाधीनता…।।४।।

जैसे वाँसों के वृक्षों से छाया नहीं मिलती।
स्त्री-पुत्रादिक से सुख की त्यों कल्पना झूठी।।
कितने खोजे देखो भौतिक विज्ञान ने साधन ?
पर हो सके उनसे कभी क्या शान्ति का वेदन ?
बाहर की दुनिया में नहीं भवि होड़ लगाओ।
समझो चेतो आराधना के मार्ग में आओ ।।
जिनमार्ग ही कल्याण का सत्यार्थ मार्ग है। स्वाधीनता…॥५॥

आत्मन् ! निराशा अन्त में बाहर से मिलेगी।
पछताने पर भी यह घड़ी नहीं हाथ लगेगी ।।
पुण्योदय भी क्षणभंगुर है मत लखकर ललचाओ ।
पापोदय की प्रतिकूलताओं से न घबराओ ।।
दुनिया की बातों में आकर नहीं चित्त भ्रमाना।
नित तत्त्वों के अभ्यास में ही मन को लगाना । ।
नहीं विवाद का अहो निर्णय का मार्ग है। स्वाधीनता…॥६।।

है धैर्य ही अवलम्बन और धर्म सहायक।
संयोग तो कोई नहीं विश्वास के लायक ।।
खुद ही विचारो सत्-असत् का ज्ञान तुम करो।
है सर्व समाधान कर्ता ज्ञान ही अहो ।।
भवरोग की औषधि अरे विवेक मात्र है।
रे आत्मज्ञानी ही सहज मुक्ति का पात्र है।।
जितेन्द्रियता का मार्ग ही मुक्ति का मार्ग है। स्वाधीनता…।।७।।

पहले गये शिव जो उन्हें आदर्श बनाना।
निश्चिंतता के नाम पर परिग्रह न जुटाना ।।
ध्रुवफण्ड नहिं ध्रुवदृष्टि ही आदेय तुम जानो।
निर्वांछकता सम्यक्त्वी साधक का सुगुण मानो ।।
जीवराज का श्रद्धान-ज्ञान-आचरण करना।
इस मार्ग से ही एक दिन भवसिन्धु हो तरना।
रत्नत्रय मार्ग ही अहो परमार्थ मार्ग है। स्वाधीनता…॥८॥

करके विराधन संयम का अति दुःख सहोगे।
संयम का साधन करके ही आनन्द लहोगे ।।
आनन्द का अवसर मिला है चूक मत जाना।
रे स्वप्न में भी भोगों का कुछ भाव नहीं लाना ।।
औदयिक भाव आ जायें तो प्रायश्चित करना।
डरना नहीं पुरुषार्थ से आगे सदा बढ़ना ।।
नि:शंकता से शोभित ध्रुव कल्याणमार्ग है। स्वाधीनता…॥९॥

कोई सहारा है नहीं यों सोच मत लाना।
चत्तारि शरणं पाठ पढ़ निज की शरण आना ।।
निजभावना भाते हुए वैराग्य बढ़ाओ ।
सर्वत्र सुन्दर एक की ही भावना भाओ ।।
देखो अहो एकत्व ही है सत्य शिव सुन्दर ।
प्रभु पंच भी देखो अहो इक आत्म के अन्दर ।।
आत्मानुभव का मार्ग ही शिवपद का मार्ग है। स्वाधीनता…॥१०॥

Artist - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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