सुगन्धद्रव्य शर्मा कथा
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ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला : अपभ्रंश ग्रन्थांक-६
सुगन्धदशमी कथा
[ अपभ्रंश, संस्कृत, गुजराती, मराठी और हिन्दी ]
सम्पादक
डॉ० हीरालाल जैन, एम० ए०, डी० लिट्०
प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष
संस्कृत, पाली व प्राकृत, इन्स्टीट्यूट ऑफ लैंग्वेजेंज एण्ड रिसर्च
जबलपुर विश्वविद्यालय (म० प्र०)
भूतपूर्व डायरेक्टर : प्राकृत, जैनधर्म और अहिंसा शोध-संस्थान
वैशाली (बिहार)
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
वीर नि० सं० २५११
वि० सं० २०२१, सन् १९६५
प्रथम संस्करण
ग्यारह रुपये
विषयानुक्रमण
मार्गदर्शक - आचार्य श्री तुलसीसागर जी महाराज
General Editorial by Dr. A. N. Upadhye.
प्रस्तावना
१. आदर्श प्रतियों का परिचय
२. कवि परिचय और रचना काल
३. कथा का मौलिक आधार और विकास
४. कथाका उत्तर भाग
५. क्रूच और जर्मन कथाओंसे तुलना
६. कथाका उत्तरकालिन प्रभाव
७. सुगन्धदशमी कथा : संस्कृत
८. सुगन्धदशमी कथा : गुजराती
९. सुगन्धदशमी कथा : मराठी
१०. सुगन्धदशमी कथा : हिन्दी
११. अपभ्रंश व संस्कृत, गुजराती, मराठी और हिन्दी कथानकोंकी संगति
१२. अपभ्रंश कथाका विषयानुक्रम।
मूल पाठ
१. अपभ्रंश—हिन्दी अनुवाद सहित
२. संस्कृत—हिन्दी अनुवाद सहित
३. गुजराती
४. मराठी
५. हिन्दी
परिशिष्ट
१. मत्स्यगन्धा कथा—महाभारत से
२. नागश्री सुकुमालिका कथा—गाथासप्तशती से संकलित
३. आवकसुत्ता कथानक—आवश्यकप्रज्ञप्ति टीकासे
४. लक्ष्मीमतो कथानक—हरिवंशपुराण से
७
१-२३
१
२
५
११
१२
१५
१८
१६
२१
२२
२३
२५
१-५६
१
२५
४८
६५
७९
९१
९४
९६
१००
प्रस्तावना
जो यो सुगन्धदशमी कथाओं में अपने वचनसे सुनता आया हूँ, क्योंकि इसका पाठ पर्यूषण पर्वमें भाद्रपद शुक्ल १०वींको नियमित रूपसे जैन मन्दिरोंमें किया जाता रहा है। तथापि इसकी ओर साहित्यिक दृष्टिसे मेरी विशेष रुचि तब जाग्रत हुई जब सन् १९२४ में मेरे प्रिय मित्र स्वर्गीय कामताप्रसादजीने जबलपुर-नगरके शास्त्र भण्डारका एक हस्तलिखित ग्रन्थ भेजा, जिसमें अनेक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश कथाओंके बीच सुगन्धदशमी कथा (अपभ्रंश) भी संगृहीत थी। मैंने उक्त ग्रन्थका कुछ परिचय तभी अहमदाबाद यूनिवर्सिटी जर्नल, खण्ड २, में प्रकाशित अपने ‘अपभ्रंश लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया था। तभी मैंने इस कथाकी प्रतिलिपि करके अपने पास भी रख ली थी। किन्तु अन्य संयोजन कार्यमें व्यस्त हो जानेसे मेरी दृष्टि इस रचनापर से उठ गयी। सन् १९४५ में उस समय संयुक्त एम० ए० के विद्यार्थी और अब डॉ० विद्याधर जोहरापुरकर, प्राध्यापक मध्यप्रवेश शिक्षा विभाग, ने मुझे इस कथाकी जिज्ञासाप्रद मराठी रूपान्तरको वह प्रति दिखलायी, जो रंगीन चित्रोके युक्त और नागपुर सेतराम भण्डारकी है। इसके साथ ही उन्होंने पुरानी गुजरातीकी रचनाको भी प्रतिलिपि मुझे दी और इन दोनों रचनाओंका परिचय भी लिखकर दिया। इसको देखकर मुझे अपभ्रंश रूपका ध्यान आया और साथ ही अपने बचपनमें पढ़ी अंगरेजीकी सिंड्रेला शीर्षक कथाका भी स्मरण हुआ। उसी शोध में वैशाली प्राकृत जैन रिसर्च इंस्टीट्यूटको स्थापना हेतु बिहार राज्यमें चला गया। सन् १९५५ में जो बोरिंग्फल्ड कानूनका अधिवेशन अहमदाबाद विश्वविद्यालय, बिहारमेंहुये हमा, उसमें मैंने इस कथाका व उक्त विभिन्न पत्रिका परिचय अपने ‘परिवर्धित आव टेल्स बिडवीन अपभ्रंश एण्ड वेस्टर्न लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया, जिससे विद्वानोंको इस ओर विशेष रुचि जागृत हुई, और वे इसके प्रकाशनके लिए उत्सुकता प्रकट करने लगे। तब मैंने इस ओर विशेष ध्यान दिया, एवं संस्कृत और हिन्दीकी कथाओंको भी खोजकर प्रस्तुत संस्करण तैयार किया। भारतीय ज्ञानपीठकी मूर्तिदेवी ग्रन्थमालाके इसे प्रकाशनका प्रस्ताव भी शीघ्र स्वीकृत हो गया, तथा मूल रचनाओं व अनुवादके मुद्रणमें बहुत समय भी नहीं लगा। किन्तु मेरी इच्छा थी कि मराठी प्रतिके समस्त चित्रोंको छापा भी इसके साथ प्रकाशित की जाये। इस कार्यमें बड़ा विलम्ब लगा और अनेक विघ्न-बाधाएँ व चढ़ाव-उतार आये। उन सबको पार कर जिस रूपमें अब यह ग्रन्थ पाठकोंके हाथ पहुँच रहा है, आशा है उससे सभीको सन्तोष होगा।
उक्त शास्त्र भण्डारों, विद्वानों एवं भारतीय ज्ञानपीठके अधिकारियोंके ही सहयोगसे यह कृति इस रूपमें प्रकट हो सकी है, अतएव मैं उनका हृदयसे अनुगृहीत हूँ। सिर्फ प्रेस, जबलपुरके मालिक श्री अमृत-लालजीने चित्रोंके ब्लाक बनवाने और उनका मुद्रण करनेमें विशेष रुचि दिखलायी अतः मैं उनका बड़ा उप-कार मानता हूँ। विद्वर डॉ० वासुदेवशरण अग्रवालने मैंने प्रार्थना की कि वे इन चित्रोंका परिचय लिखवा देनेकी कृपा करें। उनके स्वास्थ्यको देखते हुए मुझे भय था कि वे कदाचित् इस भारको स्वीकार न कर सकें, किन्तु मुझे बड़ा हर्ष और सन्तोष है कि उन्होंने इसे तत्काल स्वीकार कर कर लिया और शीघ्र ही डॉ० गोकुल-चन्द्र जैनको चित्र-परिचय लिखवा दिया। इस कृपाके लिए मैं उनका बड़ा आभारी हूँ।
इस प्रकार इस प्रकाशनमें जो कुछ अच्छाई और भलाई है, वह उक्त सहयोगका फल है, तथा उसमें जो दोष व त्रुटियाँ रह गयी हों वे मेरे अज्ञान व असावधानीका परिणाम है, जिसके लिए पाठकोंसे मेरी क्षमा-याचना है।
—हीरालाल जैन
प्रस्तावना
१. प्राकृतों की परिभाषा परिचय (अपभ्रंश)
(१) यह प्रति जसवन्तनगर के जैन मन्दिरकी है, जो मुझे स्वर्गीय बाबू कामताप्रसादजीके द्वारा प्राप्त हुई थी। यह एक रूपातंर है जिसमें कुल ३० रचनाओंका संग्रह है। इनमें सुगुणप्रदत्तकी आदि दस कथाएँ अपभ्रंशकी और शेष संस्कृत व प्राकृतकी हैं। इसी प्रतिसे मैंने सबसे पूर्व सन् १९२३ में प्रथम बार अपभ्रंश सुगुणप्रदत्तकी कथाओंकी प्रतिलिपि की थी और इस आदतन प्रतिका परिचय अपने अपभ्रंश लिटरेचर शीर्षक लेखमें दिया था। (दे० - भारतीय विद्या, भाग १, १९२५)
(२) यह प्रति भी एक कथाकोषके अन्तर्गत उसके प्रथम ३३ पन्नेमें पायी गयी। इस कथाकोषकी कुल पत्र-संख्या १९४ है। प्रथम पत्र अप्राप्त है। अन्तिम पत्रपर निर्देश है-
वर-वअ-कहाकोसु सुगुणपय निव्वइउ विउलसण्णा।
सोहिउ हरिसिणाहि सुणोणा पुणु सुहयणिग्गयवाहिणा॥
- इससे इस संकलनका नाम ‘अग्रकथा कोष’ जाना जाता है और यह भी ज्ञात हो जाता है कि उसके संग्रहकार विबुधराय से और उनकी रचनाका संशोधन हर्षकीर्ति मुनिने किया था। अन्तमें संवत् १६७६ का भी निर्देश है जो सम्भवतः प्रस्तुत प्रतिका लेखनकाल है। इस ग्रन्थके पत्रोंका आकार १२x७ इंच है, प्रति पृष्ठ ९ पंक्तियों हैं, चारों ओर लगभग एक इंचका हाशिया है, और भोजपत्र भी स्याहीका स्तर स्थान-स्थानपर छूटा हुआ है। यह प्रति सरसम्पन्नके संग्रहमें है।
(३) यह भी ९॥x४ इंच आकारका एक कथाकोष है, जिसकी पत्र-संख्या १५२ है। किन्तु प्रथम एक तथा अन्तके अज्ञात संख्याक पत्र एवं बीच-बीचके अनेक पत्र अप्राप्त है, जिससे वर्तमान पत्रोंकी कुल संख्या केवल ७३ रह गयी है। सुगुणप्रदत्तकी कथाएँ प्रारम्भ पत्र २६ पर हुआ, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है। २७वें पत्रपर मुद्रित प्रति के १, १ के ‘मगधइ’ शब्दसे पाठ प्रारम्भ होकर पत्र २७ के अन्तमें ‘अं जाववि मायइ’ (अं यावपि मावई १, ४, १७) तक अविच्छिन्न गया है और फिर १०-१४ पत्र अप्राप्त होनेसे ३१वें पत्रपर ‘ण णय बंधु’ (१, १०, २) से पुनः प्रारम्भ होता है, और पत्र ३८ पर ‘इम विवंति पुणु’ (२, २, १) तक जाता है। आगे ३९-४४ पत्र अप्राप्त है। ४५वें पत्रपर ‘इमं सुयपणिधा’ (२, ७, १०) से ‘कम्मु वहेइ’ (२, ८, १३) तक जाकर पुनः विच्छिन्न हो जाता है। रचनाकी समाप्ति अगले पत्र ५६ पर हुई होगी, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है। प्राचीन प्रतियोंको यह दुर्दशा देखकर बड़ा दुःख होता है।
(४) यह सुगुणप्रदत्तकी कथाकी एक स्वतन्त्र प्रति है, जो पत्र १ पर ‘॥ द १ ॥ श्री शिव्य गणाः ॥ सुगुणदत्तसी कथा ॥ ॥ शिवं मनसि भवेत्पुणु ॥’ इत्यादि रूपसे प्रारम्भ होकर पत्र ११ पर ‘पडि सिद्धासु महु विसय १ ॥ ७ ॥ ६ ॥ इति सुगुणदत्तसी कथा समाप्त ॥’ इन प्रकार समाप्त होती है। पत्रोंका आकार १३x७ इंच है, प्रतिपन्न १२ पंक्तियाँ हैं। यह प्रति कालकी अपेक्षा पूर्वोक्त तीनों कथाकोषोंसे पश्चात्कालीन है।
इन प्रतियोंके पाठान्तर अधिक नहीं किये गये, क्योंकि उनसे उनके पाठान्तर पाये ही नहीं जाते। पाठभेद प्रायः चरण, शब्द, अक्षर व मात्राओंके छूट जाने, मात्राओंमें ‘ए’ और ‘ऐ’ तथा ‘ओ’ और ‘औ’ के अल्पत्व तथा ग और न के प्रयोगकी अनियमितता सम्बन्धी मात्र दिखाई दिये।
२
सुगुणदत्तचरितम्
कथा-रचना-अपभ्रंश सुगुणदत्तस्वामी कथामें कुल दो संधियाँ हैं। प्रथम संधिमें कड़वकोंकी संख्या १२ है, और दूसरे संधिमें ११। प्रत्येक कड़वकमें पंक्तियोंकी संख्या औसतन १७ है। सबसे कम पंक्तियाँ १२, १ में हैं, जिनकी संख्या ११ है, और सबसे अधिक ११ पंक्तियों २, १ में है। समस्त कड़वकोंकी कड़वकोंकी कुल पंक्ति-संख्या २१४ है।
कड़वकोंकी रचना प्रायः पद्धड़िया और अक्किलक छंदोंमें हुई है, जिनमें प्रत्येक चरणमें १६ मात्राएँ होती हैं, किन्तु एकके अन्तमें जगण (लघु, गुरु, लघु) आता है, और दूसरेके अन्तमें दो लघु मात्राएँ। इन दोनों छन्दोंका इस रचनामें प्रायः मिश्रण पाया जाता है। जैसे, प्रथम कड़वककी १-४ पंक्तियोंमें अक्किलक और शेषमें पद्धड़ियाका प्रयोग हुआ है। किन्तु दूसरा कड़वक पूरा अक्किलक है, व तीसरा-चौथा पद्धड़ियाके। जहाँ मात्राएँ तो १६ ही हों, किन्तु इन दोनों छंदोंके चरणगत मात्राओंका नियम नहीं पाया जाता, वहाँ छंद पादाकुलक कहलाता है। जैसे २, ७ को प्रथम दो पंक्तियाँ जहाँ चरणान्तमें गुरु मात्रा दिखाई देती है। कड़वक १, ९ में दीपक छन्दका प्रयोग है, जहाँ दस मात्राएँ हैं व अन्तमें लघु। प्रत्येक कड़वकके अन्तमें जो पद्य कहा जाता है, वह सामान्य अपभ्रंश कथाओंकी रीतिसे संधि-भरमें एक-सा ही रहना चाहिए, किन्तु यहाँ इस नियमका पालन नहीं पाया जाता।
कवि परिचय और रचना-काल
अपभ्रंश सुगुणदत्तकी कथामें उसके कर्ताने कुछ आत्मनिवेदन रचनाके अन्तमें (२, ९-१०-११) में किया है। इसके अनुसार वे अपने कुलकी आशाओंको उद्दीप्त करनेवाले-उदयचन्द्र नामधारी थे, और उनकी भगिनीका नाम हेमादेय या देवश्री था। उन्होंने इस कथाकी गाकर सुनाया था, जिस प्रकार कि उन्होंने जयवर और जायकुमारके चरित्रोंको भी मनोहर भाषामें सुनाया था। सम्भव है उन्होंने स्वयं इन चरित्रोंकी भी रचना की हो। इनके अतिरिक्त इस रचनामें हमें कवि के विषयमें और कोई वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता।
किन्तु उदयचन्द्रका नाम हमें इस प्रकारकी अन्य भी कुछ रचनाओंमें उपलब्ध होता है। उदाहरणार्थ-
१-विनयचन्द्र मुनि कृत ‘पिज्जर संबन्धी कहा’ के आदिमें उदयचन्द्र गुरु और बाल (बालचन्द्र मुनि) का स्मरण किया गया है-
वणासिंधि पब महागुरु सारद परिचि भणि।
उदयचंद गुरु सुयरिचि वंदिय बालमुणि ॥
विणयचंदु फउ अरहउ जिणवरचंसिहिं।
णिग्गयहु धम्मकहाउ कहिउ जिणगामहिं ॥
दंडी सम्प्रदायके अन्तमें यह भी कथन किया गया है कि इस रामके रचयिता माथुर संघके मुनि विनयचन्द्र थे, और उन्होंने इनकी रचना विमलसूरिकी तद्धटनीमें की थी।
सिहुवगगिरि लक्खणहो इहु रासउ रहउ।
माथुरसंघइ सुणिवर-विणयचंदि कहिउ ॥
विनयचन्द्र मुनि कृत एक ‘नरग उदाहर कहा’ भी है, जिसके आदिमें भी उन्होंने उदयचन्द्र गुरु और बालचन्द्र मुनिका स्मरण तथा नमन किया है। यथा-
उदयचंदु गुणगाहण सहयउ।
सो महुं आयरे भणि अणुसरिउ ॥
बालचंदु मुणि णिविहि णिरवउ।
णरगउदारही कहमि कहंतउ ॥
३
१ तथा स्थल प्रकट किया है। यथा-
अमिअसरिसउ जवजलणु।
णयरु महाणणु सग्गु ॥
जहिं जिणभवणि वरलक्खण।
विहडइ रासु सवग्गु ॥
२-जिनदत्त-सूरिकी एक दोहरी रचना ‘सुणहो’ भी है, जिसमें उन्होंने माथुरसंघके मुनि उदय (उदय-चन्द्र) तथा बालचन्द्रको नमस्कार किया है, तथा विबुधगिरि नगरके अग्रेश्वर रत्न हुए राजाविहारको अपनी रचनाका स्थान बतलाया है। यथा-
माथुरसंघइ उदयणासीरु।
पत्तविहि बालचंदु गुरु सग्गरु ॥
चंदु विणयसयंकु मुणि।
विबुधगिरिपुरु जमि विस्सामउ।
सत्तलहुं णंपयहि आयउ ॥
तहिं सिहवरि मुणिवर अग्रयंदहो राजविहारहो।
वेसि विहडय पुणविय सोहइ मुणिवर जे सुव पारहिं ॥
पूर्वोक्त समस्त उल्लेखोंपर विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि-
१. अपभ्रंश सुगुणदत्तस्वामी कथाके कर्ता में ही उदयचन्द्र है जिनका विनयचन्द्र मुनिने अपनी अनेक रचनाओंमें गुरु कहकर स्मरण किया है।
२. सुगुणदत्तस्वामी कथाके कर्ताने स्वयं कविपर उदयचन्द्र गुरुदेव से और उन्होंने अपनी पत्नी हेमादेवीका भी उल्लेख किया है। यही कारण है कि विनयचन्द्र मुनिने अपनी दो रचनाओंमें उनका गुरु रूपसे स्मरण तो किया है, क्योंकि वे उनके विद्यागुरु थे; किन्तु उन्हें नमस्कार नहीं किया, क्योंकि मुनिका गुरु रूपसे नमस्कार करना अनुचित है। विनयचन्द्रके दीक्षागुरु मुनि बालचन्द्र थे, और उन्हें उन्होंने सर्वत्र नमस्कार किया है।
३. कविपर उदयचन्द्र बादमें दीक्षा लेकर मुनि हो गये। इसी घटनाके पश्चात् विनयचन्द्रने अपनी ‘सुणहो’ नामक रचनामें उन्हें मुनीश्वर भी कहा है, और अपने दीक्षागुरु बालचन्द्र मुनिको साथ उन्हें भी प्रणाम किया है। तथापि यह ध्यान देने योग्य बात है कि उन्होंने विद्यागुरुके नाते उदयचन्द्रस्वामीके सर्वत्र आदिमें उल्लेख किया है, और दीक्षागुरु बालचन्द्रका पश्चात्।
४. ये तीनों मुनि उदयचन्द्र, बालचन्द्र, और विनयचन्द्र माथुर संघके थे। इस संघका साहित्यिक उल्लेख सर्वप्रथम अभिमतिकके ग्रंथोमें मिलता है, जिन्होंने अपना सुपालित-रत्न-संग्रह नामक ग्रंथ मुंजनगरके राज्यकालमें संवत् १०९० में रचा था। इस संघके दूसरे बड़े साहित्यकार अमरकीर्ति थे, जिन्होंने संवत् ११३७ में अपभ्रंश भाषाका ‘छक्खंडमोक्ख’ (षट्कर्ममोक्ष) रचकर पूरा किया। तीसरे महान् रचनाकार यशःकीर्ति और उनके शिष्य पण्डित रत्न हुए, जिन्होंने संवत् १२८६ के आसपास अनेक अपभ्रंश ग्रन्थोंकी रचना की। (माथुर संघके विषय परिचयके लिए देखिए डॉ० ओ० हरगुप्तर कृत ‘भट्टारक सम्प्रदाय’ शोधपत्र, १९५८) देवेल-कुल दंशनार-भाग ४०. आदि के अनुसार इस संघकी स्थापना मथुरामें रामसेन गुरु-द्वारा की गयी थी, जिसमें मुनियोंको पीछे रचनाका निषेध किया गया था।
५. उदयचन्द्र कविने अपनी सुगुणदत्तस्वामी कथाके रचना-स्थानका कोई उल्लेख नहीं किया। किन्तु उनके शिष्य विनयचन्द्रने अपनी ‘नरगउदारही कथा’ का रचना-स्थल यमुना नदीके तटपर बसा महावन नगर बतलाया है, और अपनी अन्य दो रचनाओंमें अर्थात् ‘पिज्जर-संबन्धी कथा’ और ‘सुणहो’ को विबुधगिरिपर
बोधिसत्व का महायान
(विशुद्धिमार्ग) में रचित कहा है। बोधिसत्व दो स्थानों पहचान लिये गये हैं। महायान तो मथुराके निकट यमुना नदीके उस पार बढ़ा हुआ है और वह उत्तरपश्चिमके मकाममें अब भी देखा जा सकता है। काश्मीरमें इस नगरको स्वर्ग कहा है, जिससे उसकी उन दिनोंकी महत्ता प्रकट होती है। विशुद्धिमार्ग आज-कलका तिब्बतका (खम्स् या यम्स्) है, जो बुद्धपर या महायानके दक्षिण-पश्चिमकी ओर लगभग आठ मील दूर राजगृहके पुराने काली राज्य व भरतपूर राज्यमें पड़ता है। इन प्रकार इन ग्रन्थकारोंका निवास व विहारका प्रदेश मथुरा जिला और भरतपूर राज्यका भूमिभाग कहा जा सकता है।
५. उक्त समस्त रचनाओंमें उनके रचनाकालका निर्देश नहीं पाया जाता। सौभाग्यसे विनयपिटक सूत्रमें अपनी ‘बुद्धघोष’ नामक रचनामें एक ऐसा संकेत दिया है, जिससे इनके रचनाकालका अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि ‘बुद्धघोष’ की रचना उन्होंने विशुद्धिमार्गमें अन्यतरके राजविहारमें रहते हुए की थी। अगर हम इस ही चूके हैं कि यह विशुद्धिमार्ग आजकालका तिब्बत है। इसके पूर्व इतिहासका पता लगाकर हमारी बुद्धि यह है कि भगवान् बुद्धघोषी राजविहार जातों है। भाटोंके जातों व उसीके देशांतरके पता चलता है कि भरतपूर राज्य व मथुरा जिलेके भूमि-प्रदेशपर एक समय यदुवंशो राजाओंका राज्य था, जिसकी राजधानी श्रीपथ (आधुनिक बयाना, राजस्थान) थी। यहाँ ग्वालवंशी यदुके पूर्वजमें जैतपाल नामक राजा हुए। उनके उत्तराधिकारी विजयपाल थे, जिनका उल्लेख विजय नामक बयानाके सन् १०४३ के उत्कीर्ण लेखमें भी पाया गया है। इनके उत्तराधिकारी हुए त्रिभुवनपाल (विशुनपाल) जिन्होंने बयानामें २४ मील दूर त्रिभुवनगढ़ (तिहुनगढ़) का किला बनवाया। इस वंशके जैतपाल नामक राजाकी एक उत्कीर्ण प्रशस्ति बयानामें मिली है, जिसके अनुसार सन् ११५० ई० में उनका राज्य भरतवन था। इनके उत्तराधिकारी हरिराजका भी सन् ११६० का एक उत्कीर्ण लेख बयानामें मिला है। भरतपूर राज्यके जयपुर नामक स्थानमें भी एक मूर्ति मिली है, जिसके सन् १११२ में उत्कीर्ण लेखमें सहस्रपाल नरेशका उल्लेख है। इनके उत्तराधिकारी कुमारपाल (कुँवरपाल) थे, जिनका उल्लेख मुसलमानो तारीख नामक ग्रन्थोंमें भी मिलता है, और वहाँ कहा गया है कि इनके समय तिहुनगढ़ या भयनगरमें सन् १११६ ई० में मुअज्जुद्दीन मुहम्मद गोरीने आक्रमण कर वहाँके राय कुँवरपालको परास्त किया और वह दुर्ग बहाउद्दीन तुगरिलको सौंप दिया। कुँवरपालके उत्तराधिकारी वनगोपाल, पृथ्वीपाल व त्रिलोकपालके नाम पाये जाते हैं। किन्तु संभवतः इतिहासवेत्ताने कालके प्रति बुद्धसेन प्रदेश व मथुराके मादुदेव और कुल्पाक नामसे मुनिन्द्र इन्दुदेवको राजपरम्परा बारहवीं शती तक आकर मुसलमानो आक्रमणकारियोंके हाथों समाप्त हो गयी।
यहाँ प्रस्तुतोपयोगी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सुगन्धदशमी कथाके वक्ता उदयभद्रके शिष्य विनयभद्रने जिस विशुद्धिमार्ग (तिहुनगढ़) में अपनी उक्त दो रचनाएँ पूरी कीं, उसका निर्माण इस यदुवंशके राजा त्रिभुवनपाल (विशुनपाल) ने अपने नाममें सन् १०४३ के कुछ काल पश्चात् कराया था। तथा अनन्तरके जिन राजविहारमें रहकर उन्होंने ‘बुद्धघोष’ की रचना की थी, वह निस्संदेह उन्हीं जैतपाल नरेश-द्वारा बनवाया गया होगा, जिनका सन् ११५० का उत्कीर्ण लेख बयानामें मिला है। सन् १११६ में विशुनगिरिपर उक्त यदुवंशी राजाओंके हाथोंसे निकलकर मुसलमानोंके हाथोंमें चला गया। अतएव विशुनगिरिके लिये गये उक्त दोनों ग्रन्थोंका रचना-काल लगभग सन् १११० और १११६ के बीच अनुमान किया जा सकता है। और चूंकि ‘बुद्धघोष’ को रचनाके समय उदयभद्र मुनि हो चुके थे, किन्तु सुगन्धदशमीको रचनाके समय वे गृहस्थ थे, अतः सुगन्धदशमीका रचनाकाल लगभग १११० ई० माना जा सकता है।
३. कथाका मौलिक आधार और विकास
यह बात सुगम और सर्व-सम्मत है कि जीवमात्र अपने सुख-लाभका और दुःखके निवारणका प्रयत्न करता है। कहा है-
प्रस्तावना
१
“जे विज्जुएन में जीव अनन्त। सुध चालि दुख ते भयवन्त ॥” (दोत्तराम् : छहढाला)
सुखिलाषाकी इसी चेतनासे प्रेरित होकर मनुष्यने एक ओर कर्मशीलताका विकास किया, जिसके द्वारा उसने घर-बार निर्माण, अन्न-पान-संबंध, वस्त्रभूषण, औषधि-उपचार आदि सम्बन्धों नाना प्रणालियों का आविष्कार किया। दूसरी ओर उसने यह भी देखा कि उसके कर्म-क्षेत्रके परे कुछ ऐसी भी प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जैसे अग्नि, वर्षा, वायु, सूर्य आदि को कभी अनुकूल होकर उसके सुखमें वृद्धि करती हैं, और कभी प्रतिकूल होकर उसकी उपर्युक्त सुख-सामग्रीको नष्ट-भ्रष्ट कर डालती हैं। उसने इन अनुभवनजन्य मनुष्य-स्वभावके आधारपर उन दिव्य शक्तियोंके रोष-तोषका परिणाम समझा। यह समझदारी प्राप्त होते ही उसने उन शक्तियोंको अपनी अभीष्ट-सिद्धि-प्राप्त करने और अपने हितके अनुकूल बनानेका प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया। यह स्थिति हम भारतीय प्राचीनतम साहित्य ब्राह्मणोंके ग्रन्थोंमें प्रतिविम्बित पाते हैं जहाँ भगवान् स्पष्ट ही कहता है कि "मैं अग्निका आह्वान करता हूँ, अपने कल्याणके लिए; शांति अमृत-मरुत्को विराम होती है, इसलिए मैं उसका भी स्वागत करता हूँ; और कविताओंको बुलाता हूँ कि वह मेरा परित्राण करे। (ऋग्वेद, १, १, १) इससे प्रकार दूसरे इंद्रों, पोषों, धन तथा योजनोको रक्षा करने को (१, ४ आदि), वरुणसे पापोंसे बचाने व पूर्णोद्ध प्राप्त करने तथा अपना क्रोध दूर करनेको (१, २४); मरुतोंसे बल-वृद्धि, शत्रु-दमन तथा सबके मार्गमें बचावकी (१, ३७-३९); तथा ब्रह्मागणोंसे बल, अन्न, बलवान् शत्रुके विनाश आदि (१, ४०) की प्रार्थनाएँ की गयी हैं, और इन्हीं गुणोंके कारण उन्हें स्तुत्य, पूज्य तथा आह्वान करने योग्य माना गया है।
क्रमशः रोष-तोषके कारण भक्तिका अनिष्ट व इष्ट संपादन करनेका सामर्थ्य उन देवताओंके विविध प्रतिनिधि ऋषियोंमें भी आया। यह ऋषि हमें विशेष करके महाभारत व रामायण तथा अन्य पौराणिक साहित्यमें दृष्टिगोचर होती है। इतना ही नहीं, किन्तु ऋषियोंमें यह शक्ति भी मानी गयी है कि वे इष्ट होकर शत्रु-द्वारा मनुष्यको जयोचित्त को पहुँच करते हैं, और प्रसन्न होकर शापके निवारण व मनुष्यके उत्थानका भी उपाय बता सकते हैं। कपिल मुनिने रुष्ट होकर सगरके साठ सहस्र पुत्रोंको भस्म कर दिया और फिर प्रसन्न होकर गंगावतरण उनके उद्धारका भी उपाय बतला दिया (रामायण १, ४० आदि)। शुक्राचार्यने शापसे सगरके प्रपौत्र युवाश्वको ही पुत्र हो गये, किन्तु उनके अनुरोधसे उन्होंने अपने बड़े पुत्रका मोक्ष प्राप्त कर दिया (महाभारत १, ७८)। ऋषियोंका यह सामर्थ्य इतना भी बढ़ा कि वे स्वयं देवताओंको भी शाप देकर मनुष्योचित्त योनिमें गिराते लगे। इंद्रको प्राप्त होकर भी अगस्त्य ऋषिने शापसे स्वर्ग बनकर अमरावतीसे गिर पड़ा (महाभारत), व गौतम ऋषिके शापसे इंद्रदेव भी विकल (नपुंसक) हो गये (रामायण १, ४८, १८-१९)।
ऋषियोंके सामर्थ्यकी इस श्रृंखलामें महाभारतका निम्न आख्यान (परिशिष्ट १) ध्यान देने योग्य है-
अहिल्या नामकी एक प्रसिद्ध अप्सरा थी। कारणवश वह एक ब्राह्मणके कोपके भाजन बन गयी और ब्रह्म-शाप-द्वारा मनुष्य योनिमें मण्डूकी योनिमें उत्पन्न हुई। (महाभारत १, ५९, ४५) प्रसंगवश उसके उत्तरमें ब्रह्म-प्रसाद बनुवाके बीच प्रविष्ट हो गया। गर्भके दसवें मासमें वह मछली योनि-द्वारा पकड़ी गयी और उसके उदरसे एक स्त्री और एक पुरुष निकले। मछली तो सामिष ही होकर पुनः अप्सरा हो गयी, और उसकी मानवी-सन्तान-रूप स्त्री सुगन्धदशमी राजा वसुकी धर्मपत्नी नियत हुआ। अपने पुत्रोंको तो मत्स्य नामसे राजा बना दिया, और कन्याको एक दासको पादप-पीड़कके लिए दे दिया। वही होनेपर वह कन्या अपने दस पिताओंको संज्ञा-सहायता करने लगी। और उनकी अनुयायिनीके नाथ चलाकर पतिको नहीं मार कर पाने लगी।
एक बार इस दास-कन्याको नाथ-द्वारा पराशर ऋषिको नदी पार करनेका प्रसंग आया। कन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु उसके शरीरसे मत्स्यकी दुर्गन्ध निकलती थी, जिसके कारण वह रहस्यमया
सुगन्धदशमी कथा
भी कहलायी थी। नाव जब बीचमें पहुँची, तब ऋषि पराशर अपनी कामवासनाको न रोक सके, और उन्होंने मत्स्यगन्धासे प्रेमका प्रस्ताव किया। आसक्तिके समीपवर्ती ऋषियोंकी दृष्टिसे बचनेके लिए उन्होंने अपने तपबलसे कुहरेकी सृष्टि की और मत्स्यको यह भी वरदान दिया कि उनसे प्रेम करनेपर भी उनका कौमार्य नष्ट नहीं होगा। ऋषिकी इच्छा-पूर्ति करनेपर कन्याने वरदान माँगा कि उनके शरीरकी दुर्गन्ध दूर होकर उनके नाममें उत्तम सुगन्ध आ जाय। ऋषिके प्रसादसे ऐसा ही हुआ और वह मत्स्यगन्धा से सुगन्धगन्धा नामसे प्रसिद्ध हुई। उसके शरीरकी सुगन्ध एक योजन तक फैलने लगी, जिससे उसका नाम योजनगन्धा भी विख्यात हुआ। वैसे इस कन्याका नाम सत्यवती था, जो आगे चलकर कौरव-नरेश पाण्डवोंकी माता हुई। उसके ही पुत्रका व्यासदेव था, इसी हेतु ज्ञानके अन्वेषणके अपना विवाह न करनेकी भीष्म प्रतिज्ञा धारण की थी। तथा इसीके शिष्यो पाण्डवों तथा यदुके शिष्यो धर्मराज युधिष्ठिरके जन्म दिया, जिसको संताने पुरु और पाण्डु हुए। (महाभारत १, ५७, ५४ आदि)।
महाभारतके इस कथानकमें पाठकोंको प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाके सूत्रपरोक्षका दर्शन हुए बिना न रहेगा। ऋषिका अनिष्ट, उसके कारण कन्याके शरीरमें दुर्गन्ध व ऋषिके प्रसादसे दुर्गन्धके स्थानपर सुगन्धकी उत्पत्ति, एवं राजपद प्राप्ति, इन सभी बातोंमें उक्त कथानकका मेल बैठता है।
किन्तु कुछ अन्य बातोंमें बौद्ध-परम्पराके उक्त आख्यान एवं जैन-परम्पराकी सुगन्धदशमी कथा विवरणमें बहुत भेद है। बौद्ध-परम्पराके ऋषि तपोल-समुद्र हो होते हैं, किन्तु वे न तो मांसभक्ष्यके परिणामी होते हैं, न ब्रह्मचर्यके परिपालक, और न रागनिग्रह रहित। (निरुक्त १, ११) के अनुसार उनकी वृत्ति तोल होती है, तथा वे वैरागीके कर्मोंका वर्णन करते हैं। (ऋग्वेदविनानी) और भरतके अनुसार उनकी विद्वत्ता व विवशता प्रसिद्ध है (विद्यार्थिमध्यस्थः ऋषयः प्रसिद्धाः)। तथापि वे गृहस्थ हैं (यद्यपि गृहस्थ-भिन्नः) व आश्रम बनाकर रहते हैं, बौद्धों व धनका दान देते हैं, और बौद्धोंका पालन भी करते हैं। शुद्ध होकर वे शाप भी देते हैं, और प्रसन्न होकर वरदान भी। किन्तु जैन-परम्पराके मुनियोंकी प्रवृत्ति अहिंसकः ही उनसे भिन्न रहती है। स्वयं अनुष्ठके अनुसार वे बातलवान् (सामर्थ्यः मनन विवरणः) होते हैं, उनके शरीरको निर्मल बनानेकी रुचि नहीं होती। वे लौकिक व्यवहारसे परे उन्मत्त (परमज्ञ) व मौन वृत्तिसे रहते हैं। वे अश्वासी होते हैं। लोग उनके शरीरको तो देख पाते हैं, किन्तु उनको आध्यात्मिक चेतनाको नहीं (श्री १०, ११४)। तैत्तिरीय आरण्यक (१, ११, ३; १, २६, ७) के अनुसार वे बातलवान् मुनि, समा-हित्ताः अर्थात् चित्तको एकाग्र करनेमें अपराधी तथा उग्रधर्मिणः अर्थात् ब्रह्मचारी होते हैं। महाभारत (अनुशासन पर्व ११५, ५९) के अनुसार मुनि वे ही कहे गये हैं जो मनु, मांस और मद्यका सर्वथा त्याग करते हैं; तथा गीता (१, २६) के अनुसार मुनि स्थितप्रज्ञ होते हैं, जिन्हें दुःखमें उद्वेग नहीं, सुखको बाधा नहीं, तथा भय और क्रोधरहित होते हुए वीतराग होते हैं। बातलवान् मुनियोंको परमेश्वर हुए भगवान् ऋषभदेव (जैनोंके आदि तीर्थंकर) (भागवत पुराण ५, १, २६ आदि) शरीर मात्र परिग्रह धारो थे, उन्मत्तवत् नग्न (गमन-परिधान) अद्भुत, मलिन जटाशोभित रहते थे। पुराणमें यह भी कह दिया गया है कि ऋषभदेवका यह अवतार कल्पका तीसरा देने हेतु हुआ था।
इन्हीं मुनियोंकी साधनाके बौद्धिक विस्तारसे वर्णन महाभारतके शांतिपर्व, अध्याय ९ में किया गया है, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न करते हैं कि “मैं तो अब मुनि होकर गृहस्थसे उनके धर्मशास्त्र करता हुआ शिक्षाविशेष अपने शरीरका लपण करवाता हूँ। चूंकि-पुत्रपौत्र गुणवान् या बुद्धके नीचे निवास करता हूँ, तथा समस्त प्रिय और अप्रियका त्याग होकर, शोक और हर्षसे रहित निन्दा और स्तुतिमें समभाव, कोई आशा व ममता न रहता हुआ निर्द्वन्द्व और निष्परिग्रह” रहना चाहता हूँ। आत्मामें ही मेरा रमण हो, मेरा आत्मा प्रसन्न रहे, आकृति मेरी नष्ट हो जाय, अब और बहिर्-वेदी हो। मैं किसी दूसरेसे कोई सलाह-सम्पत्ति नहीं करना चाहता। अपने-अपने गुणधर्ममें स्थित धर्मोंके प्रज्ञाके जैतपाल प्राणों- के प्रति मेरा समता-भाव रहे। न मैं किसीको हेय उठाऊँ, न कभी किसीपर मुकुटो तानूँ। समस्त इन्द्रियों-
यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:
प्रस्तावना
को संयमित रखना हुआ में सदैव प्रयत्न-प्रभु रहा। न न मैं किसीके मारे मरूँ, न किसीके साथ चलूँ, न किसी देशको अथवा किसी दिशामें जानेको कोई विशेष इच्छा रखूँ। कोई अपेक्षा न रखता हुआ, पीछेकी ओर न देखकर सावधानो रहना हुआ, बस स्थावर जीवोंको बचाता हुआ समभावसे सोधा गमन करना। भरसक स्थावर आगे बढ़ता है, गुणपाद चौमासका प्रथम पढ़ता है, तथा सुख-दुःख आदि इष्ट अनिष्ट विरोध छोड़ते नहीं। अतः मैं उनमेसे किसी न बढूँ। अजन या स्थावरजीव जो भी। भोजन मिल जाये उसमें संतोष करूँ। न मिले तो भी लुब्ध न होऊँ। जब रात्रिका चौथा प्रहर हो जाये, मुखल रख दिया जाये, बलमें आग भी न रहे, लोग भोजन कर चुकें, परोसा संस्कार बनो हो जाये व सामान्य भिक्षाके बाद जाये, तब मैं दिनमें केवल एक बार खा, तीन या पाँच घरोंसे भिक्षा माँगूँ। स्नेह-बन्धनको छोड़कर मैं इस गुणधोर विचरण करूँ। लाभ हो या हानि हो मैं समदर्शी रहूँ, और महात्त्वने विचलित न होऊँ। मेरा आचरण न तो हीनमें लिप्त आतुरता लिये हो, और न मरकी इच्छादिही। जीवनका मैं अभिनन्दन न करूँ, और न मरणसे डरूँ। कोई बहुलेसे मेरा साथ काटे और कोई शरीरपर वन्दनका लेप करे, तो भी न मैं एक का सत्कारण सोचूँ और न दूसरेका कलपण। क्रोधमें शारीरिक अपद्रव्यको निवारण करना समय है, उन सबमें मैं परित्याग करूँ, और भक्त मारने आदि सारी क्रियाओंमें सावधान रहूँ। इन्द्रियोंको क्रियाओंमें न मैं आसक्ति रखूँ, और न प्रवृत्ति। अपने सामायिकका संकल्प कभी न छोड़ूँ, और आत्माकी शक्ति करनेवाले कामको बनानेको बताता रहूँ। मैं सब प्रकारके संगसे मुक्त रहूँ व सब बन्धनोंसे परे रहूँ, किसीके बंधन में रहूँ। साधुके समान स्वरूप भूलि हो। इस प्रकार वीतराग भावसे आचरण करता हुआ मैं कायवत सब-गुणोंको प्राप्त करूँ। अभीतक तो मैंने अज्ञानमें कारण गुरुत्वके बलीभूत होकर महापाप किया। मुनियोंके आचारका जो विधान जैन-शास्त्रोंमें पाया जाता है उससे उक्त बातोंका भलीभाँति समर्थन होता है।
ऋषियों और मुनियोंकी साधनाओं, प्रवृत्तियों एवं गुणस्थानों उनके भेद उन परम्पराओं-सबको आध्यात्मिक स्वभावतः प्रतिष्ठित हुआ है। जहाँ एक ही या एक ही प्रकारकी लोक-कथाका उपयोग धार्मिक उपदेशके लिए किया गया है, वहाँ अपनी-अपनी परम्पराओंके अनुकूल उसमें हेर-फेर भी हुआ है। महाश्रमणके सत्यवादी शरीरमें कुपित भावका कारण या उनकी अनन्त मात्राका बहुव्याप और दुर्गुणोंमें मुक्ति एवं गुणत्वकी उत्पत्तिका कारण या ऋषिका भरसन। इस वरदानकी प्राप्ति किसी धार्मिक साधकके फलस्वरूप नहीं हुई, किन्तु ऋषिकी सामान्यता-वृत्ति-द्वारा उनका प्रभाव। किन्तु जैन-परम्परामें ये बातें नहीं बन सकतीं। यहाँ मुनि दुःख-सुखमें समान रहने समभावसे रहते हैं, और उनमें राग-द्वेषका भी अभाव होता है। अतः न तो वे बात देते हैं, और न भरते। जैन कर्म-सिद्धान्तके अनुसार माताके शापसे पुत्रका शरीर दूषित हो, यह बात भी नहीं बनती। फल प्रत्येक जीवको स्वकृत कर्मके अनुसार ही प्राप्त होता है। हाँ, मुनिजन अपने ज्ञान-द्वारा यह अवश्य विश्लेषण कर बतलायेंगे प्रयत्न करते हैं कि कौन-से पापोंके फल उत्पन्न हुआ और कौन-से पुण्यकर्म-द्वारा सुखका निवारण किया जा सकता है। इन सिद्धान्तोंके अनुसार शरीरमें अविनाशीकी उत्पत्तिका जो आख्यान प्राचीन जैन (आगम माध्यमका १६) में पाया जाता है वह इस प्रकार है-
वचना नगरीमें सोम, सोमदत्त व सोमभूति नामक गुप्त रहते थे। उन्होंने एक बार विचार किया कि जब हमारे सब प्रचुर धन है तो क्यों न उसका भोग और दानमें सदुपयोग किया जाये। अब जब उन्होंने परस्पर आमन्त्रण-द्वारा भोज और आमन्त्रण-निमन्त्रण किया। सब लोगोंको बारी बारी सब पक्षकी पत्नी सामान्यने खान-पानकी खूब तैयारी की। किन्तु जब उन्होंने परीक्षक लिए खूब घृत और मसालों सहित तैयार की गयी खीरके शाकके एक बिन्दुको बचा तो उसे अपयश कलश और निर्लज्जा पाया। तब उसने उसे अलग रखकर अन्य दाऊ तैयार किये व आमन्त्रणको खूब खिलाया-पिलाया। आमोद-प्रमोदके पश्चात् सब अपने-अपने घर गये। तब वही धर्मरुचि नामक मुनि आहारको भिक्षाके लिए उपस्थित हुए।
नागरोकेने विचार किया कि इस कड़वी वस्तुका शाक जिसमें उतना घृत और मसाला पड़ा है, अत्यन्त कौन-से की अपेक्षा इस मुनिको दे देना अच्छा। ऐसा विचार करते हुए उसने समस्त शाकको मुनिके भिक्षा-पात्रमें उड़ेल दिया। उसे लेकर धर्मरुचि मुनि अपने गुरु धर्मघोषके पास आये। उन्होंने उसकी गन्धका अनुभव कर एक बिन्दुका स्वाद लिया और उसे कटु व अखाद्य जानकर मुनिके उसे एकान्तमें उचित स्थानमें डाल देनेको कहा। धर्मरुचिने जाकर एक स्थानपर उसका कुछ भाग छोड़ा, और देखा कि जिस-जिस चींटीने जाकर उसे खाया, वही तुरन्त मर गयी। यह देख मुनिने विचार किया कि इसे कड़वी हो, सामनेसे अनपेक्षित जीवोंका घात होगा। अतः इसने यहाँ अच्छा है कि मैं ही इसे खा लूँ जिससे अन्य जीवोंके प्राण न जायें। ऐसा विचार कर उन्होंने उसका आहार कर लिया और वे शीघ्र ही मरकरके प्राप्त हुए।
इस प्रकार नागोंकी करतूतसे मुनिके मरणकी बात सर्वत्र फैल गयी। बहुजन समाजने उसकी निन्दा और भर्त्सना की, तथा उसे घरसे निकाल दिया। इस प्रकार निर्वासित और निन्दित होकर वह घर-घर भीख माँगकर अपना निर्वाह करती हुई श्वास, कास, शूल, फूट आदि सोलह महामारियोंसे ग्रस्त हो, मरकर नरक जाकर अपने तीन जन्मोंमें पुनः-पुनः मछली हुई, फिर अनेक इन्द्रियादि जीवोंमें सहस्रों बार उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् निर्धन योनिमें उत्पन्न होकर कष्टमयतम सागरवत साधुत्वकी सुमनाका नामक पुत्री हुई। वह रूपहीन एवं ओठ सूखनेसे समाप्त थी, तथापि उसके शरीरका स्पर्श असहनीय था, जिसके कारण उसका पति उनके पाससे भाग गया। ऐसेमें एक दरिद्रसे उसका पुनर्विवाह कर दिया, किन्तु वह भी उसका स्पर्श सहन न कर, निकल भागा। यह देख पिताने उसका सम्बोधन किया कि यह सब उसके पूर्वकृत कर्मोंका फल है। फिर उसने उसे अपने रसोईघरके काम-काजमें अपना चित्त कमानेका उपदेश दिया। कुछ काल पश्चात् वहाँ अग्निकायका एक संघ आया। उनके समीप सुमनाकेने प्रव्रज्या ले ली।
क्रमशः एक लम्बा नामक पीढ़ी थी। एक बार वही पीठिका पुरुष देवदत्ता गणिकासहित आमोद-प्रमोदके लिए पहुँचे। किसीने श्वेतदत्ताको अपनी गोदमें बिठाया, किसीने छन लगाया, किसीने पुनः-पुनः की, किसीने पैरोंमें मोहर लगाया और किसीने चमर होरा। सुमनाकेने वह सब देखा और वह उस स्त्रीके भाग्यको सराहने लगी। उसने नियम किया कि यदि मेरी इस प्रव्रज्याका कुछ फल हो तो अगले जन्ममें मुझे भी ऐसा ही प्रेम-सरकार प्राप्त हो। तभीसे वह अपने शरीरको सम्प्रयोज्य और विशेष ध्यान देने लगी। मरनेके पश्चात् वह देवान स्वर्गमें देवी हुई, और फिर दुष्टको राज्यकन्या दोरथी; जिसे पूर्व संस्कारवश अर्जुन आदि पाँच पाण्डवोंका पतिव्रत प्राप्त हुआ। (परिशिष्ट १)
इस कथाक्रममें न हो सुलझा शाप है, और न वरदान। किन्तु मुनि प्रति दुर्भाव और दुर्भावके पासे उसे स्वयं कुछ आदि रोग हुए, नाना भीष मोक्षोंमें भ्रमण करना पड़ा, एवं मनुष्य-जन्ममें उसे उसी कड़वी तुंबी-जैसा असह्य शरीर मिला। फिर प्रव्रज्याके तुम्हारे अगले जन्ममें उसे सुन्दर कड़वी प्राप्ति हुई और उसे मनोवांछित पति भी मिले। यह कथाक्रम अर्धांगमी आगमका है, जिसका उपलब्ध संकलन बोरियोंमें १२०० वर्ष पश्चात् बलमीसे किया गया था। अतः वह इसीको पाँचवीं शतीसे पूर्वकी रचना सिद्ध है।
हरिभद्र सूरि (लगभग ७५० ई०) विरचित सामरादित्य (नाटक पद्धति) के पृष्ठ १३ की टीकामें भी इस प्रकारका एक कथानक सम्बन्धके निर्विकारका नामक अतिचारके उदाहरण रूपसे आया है, जो इस प्रकार है-
एक सेठ था। उसकी पुत्रोके विवाहमें कुछ साधुजन आये। पिताने उन सबको परिचर्या करनेका आदेश दिया। किन्तु उनके शरीरको मलिन गन्धसे उसे घृणा हुई, और वह विचार करने लगी कि यदि ये साधु प्रमुख जलके स्नान कर लिया करे, तो क्या हानि है? उसने अपने इस दूषित विचारका कोई आलोचन-प्रतिक्रमण नहीं किया। अतः मरनेपर वह राजगृहकी एक गणिकाके यहाँ उत्पन्न हुई। जन्मसे ही उसके
बारीरीसे दुर्गन्ध निकली थी, जिससे वह अपने त्याग दी गयी। एक बार राजा श्रेणिक, भगवान् महावीरको देखनेको जाते समय उसी वनमें निकले। दुर्गन्ध पाकर उन्होंने उसकी खोज करायी, और स्वयं जाकर उसे देखा। फिर भगवान्ने उसके विषयमें पूछा-छाना को। उन्होंने उसके शरीरमें दुर्गन्ध उत्पन्न होनेका कारण जानकर उसके भावी होनेहार की बात पूछी। भगवान्ने कहा कि अब उसके पापका फल भोग चुकी। अब वह सुन्दरी हो अमृतमयी होगी, और अब उसे सुन्दरीके साथ स्मरण करके, पश्चात् दो धर्मोंमें तुम जान लेना। राजा भगवान्को वन्दना कर अपने भवनको गये। उस कन्याकी दुर्गन्ध दूर हो गयी, और एक अहेरीके ले जाकर उसका पालन-पोषण किया। युवती होनेपर वह अपनी माताके साथ कौमुदी-महोत्सव देखने गयी। राजा भी अपने पुत्र अभयकुमारके साथ बैठकर उस देख रहा था। कन्याके अकस्मात् देखनेसे उसको कामभावना जागृत हो गयी, अतः उसने अपनी माताके मुद्रिका उसे पहना दी, और अभय-कुमारसे कह दिया कि उनको काममुद्रा दिखाने पूरा को, अतः उसकी खोज की जाये। अभयकुमारने नगरमें सब बन्द कर करा दिया, और प्रत्येक मनुष्यको जाँच-पड़ताल करायी। वह बालिका मुद्रिकासहित पकड़ो गयी, और राजाके साथ लायी गयी। राजाने उससे अपना विवाह कर लिया। एक बार राजा अपनी अन्य रानियों सहित जलक्रीड़ाकी, और वह सुन्दरी उसकी नाकको देखती रह गयी। इस प्रकार राजा-द्वारा अपनेको परित्यक्त समझकर उसने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
इस प्रकारका तीसरा आख्यान जिनसेन-कृत हरिवंशपुराण (शक सं० ७०५-७०५ ई०) में पाया जाता है-भरतक्षेत्र, मगधवनके लक्ष्मी ग्राममें लक्ष्मीमती नामकी सुन्दर कन्या थी। एक बार वह दर्पणमें अपना रूप देख रही थी कि उसी समय भिक्षाके लिए समाधिभूत मुनिको आया देख उसे घृणा हो। छोटी, और वह मुनिकी निन्दा करने लगी। इस महापापके कारण सातवें दिन हो उसके शरीरमें कुष्ठ व्याधि उत्पन्न हो गयी। कन्याने अग्नि-प्रवेश-द्वारा मरण किया। तत्पश्चात् उसने क्रमशः खरी, सुकरी और कुकुरिका जन्म ग्रहण किया। फिर वह मनुष्यग्राम निवासी मत्स्योपजीवी पुत्री हुई। उसका शरीर दुर्गन्धमय होनेसे माताने तो उसका परित्याग कर दिया, किन्तु मातामहीने पाळ-पोषकर उसे भी हुआ है। मुनिका संयोग होनेपर उसे धर्मोपदेश मिला। वह अग्निकामके साथ रामहू गयी और सिद्धिकाकी वन्दना करके, गोकुणकामें समाधिस्थ हो, मरकर अच्युत स्वर्गमें महादेवी हुई। वहाँसे उतरकर वह राजा भीष्मकी कन्या हस्तिणी हुई। यही कथानक महासेन-कृत प्रद्युम्नचरित (सर्ग ८, १२०-१६०) तथा हरिवंश-कृत कथाकोष (१०८) में भी पाया जाता है।
इस कथानकमें मुनिके निरादरसे कुष्ठरोगकी उत्पत्ति, नीच योनियोंमें जन्म तथा शरीरमें दुर्गन्धका होना एवं धर्मप्रसन्नसे उस पापका निवारण होकर स्वर्ग एवं उच्चकुलमें जन्मका फल बतलाया है।
हरिवंशकृत वट्टकथाकोष (५९, १२१ ई०), तथा श्रीचन्द्रकृत प्रभावक कथाकोष (संधि १९-२०, लगभग १०६० ई०) में एक और कथा है अशोक रोहिणीकी, जिसके अनुसार हस्तिनापुरके समीप गोणीगिरि पर्वतकी शिलापर मुनिराज यशोवीर बतायण योग करते थे। उनके प्रभावसे वहाँ मृगचारी नामक व्याधकी कोई शिकार नहीं मिल पाता था। इससे रुष्ट होकर उसने जब मुनिराज मिलनको गये थे, तब उस शिलाकी अग्नि जलाकर मुख गत कर दिया। मुनिराजने जाकर उसी शिलापर जाकर भावसे समाधिमरण किया। इस पापके फलसे उस व्याधको कुष्ठ रोग हो गया, और वह बसंत बेसासे सातवें दिन मरकर नरक गया। वहाँसे निकलकर नाना नीच योनियोंमें भ्रमण करता हुआ वह जीव पुनः मनुष्य योनिमें आया, और गोपालके रूपमें उसी गोणीगिरिके दामनमें जाकर जन्म हुआ।
हस्तिनापुरमें सेठ धर्मविभवके पुत्रिका नामक एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसकी उग्र दुर्गन्धके कारण कोई उससे विवाह नहीं करता था। संयोगवश उसी नगरके सेठ धनुर्मित्रका पुत्र श्रीयोग बड़ा दुराचारी था। एक बार वह चोरोंके अपराधमें पकड़ा गया। धनमित्रने उसे इस शर्तपर राजासे प्रार्थना कर छुड़वा
परिभाषा
जो कि वह उसकी दस पूर्वभवा में विशेषता विचार करें। किन्तु विवाहित परवात्तु ही वह उसकी पूर्वभवों न सह सकनेके कारण भाग गया। पूर्वभवोंके दिन पुनः दुःखसे बीतने लगे।
एक बार सुदत्ता आजीविका पनचोरके घर आदमखोरों आयी। पूर्वभवाने भक्तिसे आहार-दान दिया। नवममें पूर्वभवमें आया। पूर्वभवा भी पूर्वभवोंको वस्त्रों को गयी। पूर्वभव उसने पूर्वभवका कारण बताया कि पूर्वभवमें वह फिरिनगरके भेद गंधसत्त्वको विलुप्तकी नामक मार्ग थी। एक बार सेठ-सेठानी दोनों राजाके ग्राम बन-महावीरको जा रहे थे कि समाधिगत नामक मुनि अंतर निर्मित बातें दिखाई दिये। सेठने अपनी पत्नीको उन्हें आहार करनेके लिए वापस भेजा। सेठानीने कहा हो। मुनिराजको कष्टों सुखीका आहार कराया। उसकी वेलासे मुनिका स्वर्गवास हो गया। राजाको जब वह समाचार मिला तो उन्होंने उसे निरंतरपूर्वक नगरसे निकाल दिया। उसे कुछ उपाधि हो गयी, और वह सात दिनके भीतर मर गयी। वह नरकमें तथा कुत्ती, शूकरी, मृगावती, हाथी आदि नीच योनियोंमें जन्म लेकर अन्ततः तू अब पूर्वभवमें जन्ममें उत्पन्न हुई है।
अपने पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर मुनिराजको बड़ी आत्माहानि हुई, और उसने मुनिराजसे पूछा कि उस पापसे उसे किस प्रकार मुक्ति मिले। मुनिराजने उसे रोहिणी-व्रतका उपदेश दिया, जिसके अनुष्ठानसे वह जगदेवकी चन्दनगरके भवा नामक राजाकी रोहिणी नामक राजकन्या हुई। अब वह यह जानती थी नहीं थी कि दुःख और शोक कैसा होता है।
राजकन्या रोहिणीके पति अशोकका भी पूर्वभव मुनिराजने सुनाया। कनकपुरमें सोमभूति मुनि सोमशर्मा और सोमदत्त थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् सोमदत्त राजपुरोहित हुआ, जिसके कारण उसका ज्येष्ठ भ्राता सोमशर्मा उससे द्वेष करने लगा। उसके दुराचारको बातें सोमदत्तको वैराग्य हो गया, और वह मुनि हो गया। जब सोमशर्मा राजपुरोहित हुआ। एक बार जब राजा सोमशर्मा विन्ध्य-यात्रापर जा रहे थे तब उन्हें सम्मुख सोमदत्त मुनिने दर्शन हुए। इसे सोमशर्माने अवकुठन बताकर, मुनिका मख डालनेकी सलाह दी। किन्तु राजाने अन्य ज्योतिषियोंसे यह जानकारी प्राप्त की कि मुनिका दर्शन अपशकुन नहीं किन्तु बड़ा शुभ शकुन माना गया है, जिससे कार्यमें अवश्य सफलता प्राप्त होती है। हुआ भी ऐसा ही। तथापि सोमशर्माने द्वेषवश गुप्त रूपसे मुनिका घात कर दिया। यह जानकर राजाने उसे दण्डित किया। सातवें दिन उसे कुछ उपाधि हो गयी। दुःखसे मरकर उसने अनेक बार नरकमें तथा मत्स्य, सिंह, सर्प, भ्यान आदि क्रूर पशुयोनि जन्म लेकर अन्ततः सिंहपुरके राजा सिंहकेतुका पूर्वभवी दारुक पुत्र हुआ। एक बार मुनिराजसे पूर्वभवमें पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर उसे धार्मिक बोध उत्पन्न हो गयी, और रोहिणी व्रतके प्रभावसे वह उस मुनि-दिव्याके पापसे मुक्त होकर अशोक कुमार उत्पन्न हुआ। पुण्यव्रत कथाकोष (३६-३७) में भी यह कथानक आया है, और वह भी इसी कथाकोषपर आधारित प्रतीत होता है।
कथावाचकने अन्तर्गात रोहिणी बहिनके उपर्युक्त दोनों उपाख्यानोंमें मुनि-घातके पापसे क्रुद्ध रोमकी उत्पत्ति, नरक-गति, नीच योनियोंमें परिभ्रमण, और अन्ततः धार्मिक आचरण-द्वारा उस पापका परिमार्जन, मुक्ति और मोक्षकी प्राप्तिके उदाहरण उपस्थित किये गये हैं। उपर्युक्त समस्त कथानकके मिलानसे इस बातमें सन्देह नहीं रहता कि प्रस्तुत गुणभद्रमयकी कथाका सबसे निकटवर्ती आधार रोहिणीका पूर्वभव-वृत्तान्त ही है।
प्रस्तुत सभी कथानकमें मुनिहत्या या निरादरके पापसे कुष्ठव्याधि व दुर्गतिस शरीरकी उत्पत्तिके अतिरिक्त दूसरा प्रबल तत्त्व है, नीच योनियोंकी दीर्घ परम्परा। महाभारतके मत्स्याख्यान-सम्बन्धी आख्यानमें यह परम्परा दूसरे जन्मसे जाने नहीं बढ़ी। किन्तु विष्णुपुराण (३,१८) में एक ऐसा आख्यान भी आया है, जिसमें नीच योनियोंको एक लम्बी श्रृंखला, दिखलायी गयी है। एक समय राजा सत्यव्रत और उनकी रानी दीक्षा मंगलमें स्नान करके निकले थे व कि उन्हें अपने सम्मुख एक पाषाणके दर्शन हुए, जो राजाके
प्रस्तावना
चतुर्थी आचारिका मित्र था। जनः राजाने उससे गौरवपूर्ण निबन्ध व्यवहार किया। इस पापके फलसे वह मरकर क्रमशः मृगाल, वृक, गृध्र, श्याल व मयूर हुआ। प्रत्येक जन्ममें उसको पतिव्रता पत्नीने उसके पूर्व-जन्माका स्मरण कराया, जिससे पापकोके साथ सद्भावका घोर पाप क्रमशः हीन होते-होते वह मयूरके जन्ममें राजा जनकके अश्वमेध यज्ञमें जा पहुँचा। उन्होंने यज्ञानुष्ठानसम्बन्धी अनुभवसमाके समय उसे भी स्नान कराया, जिसके पुण्यसे वह अगले जन्ममें स्वयं राजा जनकका पुत्र हुआ।
वैदिक परम्पराके पुराणोंमें विष्णुपुराण अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन माना जाता है; अतः महाभारतके समान इस पुराणके वृत्तान्तका प्रभाव भी पूर्वोक्त जैन-आख्यानोंपर पड़ा हो तो आश्चर्य नहीं।
कथाका उत्तर भाग
प्रस्तुत सुधर्मस्वामीकी कथाका दूसरा भाग, जो दूसरी समिष्टिमें वर्णित है, अपनी मौलिकता और रोष-कथाकी दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। सुधर्मस्वामीके पूर्वके पूर्वजन्ममें अपने अगले जन्ममें रत्नपुरके सेठ जिनदत्तकी रूपवती पुत्री निलकण्ठी हुई। किन्तु उसका पूर्वकृत कुछ पापकर्मी भी मोचनेको शेष रहा था। जनः जन्मके कुछ ही दिन उपरान्त उसको कुष्ठका रोग हो गया। पिताने बहुत इलाज किया, और उससे भी एक कन्या उत्पन्न हुई तेजमती। सोतकी भी अपनी पुत्रीको बहुत प्यार करती, और निलकण्ठीसे उतना ही द्वेष। इस कारण इन कन्याका जीवन बड़े दुःखसे व्यतीत होने लगा। दुराचारका भाई और पिता भी कन्याओंके विवाहको चिन्ता हुई। किन्तु सभी समय उन्हें वहाँके नरेश कनकप्रभका आदेश मिला कि वे रत्नोंको खरीदकर लिए देवान्तर जाएँ। जाते समय सेठ पत्नीसे कह गया कि सुयोग्य वर देखकर दोनों कन्याओंका विवाह कर देना। जो वर आले वे निलकण्ठीके ऊपर मृग होकर, उसीकी याचना करें। किन्तु सेठानी उनकी बुराई कर अपनी पुत्रीको ही भली करती, और उसीकी प्रशंसा करती। जो भी वरके हटने विवाह निलकण्ठीका ही पन्नग करा पड़ा। विवाहके दिन सेठानी निलकण्ठीको यह कहकर श्मशान में भेजा कि उनमें कि कुल-अमानके अनुसार उसका वर वहाँ आकर उससे विवाह करेगा। किन्तु पर आकर उसने यह हल्ला मचा दिया कि निलकण्ठी कहीं भाग गयी। उनकी बेका तक उनका पता न चल सकनेके कारण मरका विवाह तेजमतीके साथ कराना पड़ा। इस प्रकार कनकराज-द्वारा सेठानीने अपनी इच्छा पूरी की।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3077.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है