सुगन्धद्रव्य शर्मा कथा
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ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला : अपभ्रंश ग्रन्थांक-६
सुगन्धदशमी कथा
[ अपभ्रंश, संस्कृत, गुजराती, मराठी और हिन्दी ]
सम्पादक
डॉ० हीरालाल जैन, एम० ए०, डी० लिट्०
प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष
संस्कृत, पाली व प्राकृत, इन्स्टीट्यूट ऑफ लैंग्वेजेंज एण्ड रिसर्च
जबलपुर विश्वविद्यालय (म० प्र०)
भूतपूर्व डायरेक्टर : प्राकृत, जैनधर्म और अहिंसा शोध-संस्थान
वैशाली (बिहार)
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
वीर नि० सं० २५११
वि० सं० २०२१, सन् १९६५
प्रथम संस्करण
ग्यारह रुपये
विषयानुक्रमण
मार्गदर्शक - आचार्य श्री तुलसीसागर जी महाराज
General Editorial by Dr. A. N. Upadhye.
प्रस्तावना
१. आदर्श प्रतियों का परिचय
२. कवि परिचय और रचना काल
३. कथा का मौलिक आधार और विकास
४. कथाका उत्तर भाग
५. क्रूच और जर्मन कथाओंसे तुलना
६. कथाका उत्तरकालिन प्रभाव
७. सुगन्धदशमी कथा : संस्कृत
८. सुगन्धदशमी कथा : गुजराती
९. सुगन्धदशमी कथा : मराठी
१०. सुगन्धदशमी कथा : हिन्दी
११. अपभ्रंश व संस्कृत, गुजराती, मराठी और हिन्दी कथानकोंकी संगति
१२. अपभ्रंश कथाका विषयानुक्रम।
मूल पाठ
१. अपभ्रंश—हिन्दी अनुवाद सहित
२. संस्कृत—हिन्दी अनुवाद सहित
३. गुजराती
४. मराठी
५. हिन्दी
परिशिष्ट
१. मत्स्यगन्धा कथा—महाभारत से
२. नागश्री सुकुमालिका कथा—गाथासप्तशती से संकलित
३. आवकसुत्ता कथानक—आवश्यकप्रज्ञप्ति टीकासे
४. लक्ष्मीमतो कथानक—हरिवंशपुराण से
७
१-२३
१
२
५
११
१२
१५
१८
१६
२१
२२
२३
२५
१-५६
१
२५
४८
६५
७९
९१
९४
९६
१००
प्रस्तावना
जो यो सुगन्धदशमी कथाओं में अपने वचनसे सुनता आया हूँ, क्योंकि इसका पाठ पर्यूषण पर्वमें भाद्रपद शुक्ल १०वींको नियमित रूपसे जैन मन्दिरोंमें किया जाता रहा है। तथापि इसकी ओर साहित्यिक दृष्टिसे मेरी विशेष रुचि तब जाग्रत हुई जब सन् १९२४ में मेरे प्रिय मित्र स्वर्गीय कामताप्रसादजीने जबलपुर-नगरके शास्त्र भण्डारका एक हस्तलिखित ग्रन्थ भेजा, जिसमें अनेक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश कथाओंके बीच सुगन्धदशमी कथा (अपभ्रंश) भी संगृहीत थी। मैंने उक्त ग्रन्थका कुछ परिचय तभी अहमदाबाद यूनिवर्सिटी जर्नल, खण्ड २, में प्रकाशित अपने ‘अपभ्रंश लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया था। तभी मैंने इस कथाकी प्रतिलिपि करके अपने पास भी रख ली थी। किन्तु अन्य संयोजन कार्यमें व्यस्त हो जानेसे मेरी दृष्टि इस रचनापर से उठ गयी। सन् १९४५ में उस समय संयुक्त एम० ए० के विद्यार्थी और अब डॉ० विद्याधर जोहरापुरकर, प्राध्यापक मध्यप्रवेश शिक्षा विभाग, ने मुझे इस कथाकी जिज्ञासाप्रद मराठी रूपान्तरको वह प्रति दिखलायी, जो रंगीन चित्रोके युक्त और नागपुर सेतराम भण्डारकी है। इसके साथ ही उन्होंने पुरानी गुजरातीकी रचनाको भी प्रतिलिपि मुझे दी और इन दोनों रचनाओंका परिचय भी लिखकर दिया। इसको देखकर मुझे अपभ्रंश रूपका ध्यान आया और साथ ही अपने बचपनमें पढ़ी अंगरेजीकी सिंड्रेला शीर्षक कथाका भी स्मरण हुआ। उसी शोध में वैशाली प्राकृत जैन रिसर्च इंस्टीट्यूटको स्थापना हेतु बिहार राज्यमें चला गया। सन् १९५५ में जो बोरिंग्फल्ड कानूनका अधिवेशन अहमदाबाद विश्वविद्यालय, बिहारमेंहुये हमा, उसमें मैंने इस कथाका व उक्त विभिन्न पत्रिका परिचय अपने ‘परिवर्धित आव टेल्स बिडवीन अपभ्रंश एण्ड वेस्टर्न लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया, जिससे विद्वानोंको इस ओर विशेष रुचि जागृत हुई, और वे इसके प्रकाशनके लिए उत्सुकता प्रकट करने लगे। तब मैंने इस ओर विशेष ध्यान दिया, एवं संस्कृत और हिन्दीकी कथाओंको भी खोजकर प्रस्तुत संस्करण तैयार किया। भारतीय ज्ञानपीठकी मूर्तिदेवी ग्रन्थमालाके इसे प्रकाशनका प्रस्ताव भी शीघ्र स्वीकृत हो गया, तथा मूल रचनाओं व अनुवादके मुद्रणमें बहुत समय भी नहीं लगा। किन्तु मेरी इच्छा थी कि मराठी प्रतिके समस्त चित्रोंको छापा भी इसके साथ प्रकाशित की जाये। इस कार्यमें बड़ा विलम्ब लगा और अनेक विघ्न-बाधाएँ व चढ़ाव-उतार आये। उन सबको पार कर जिस रूपमें अब यह ग्रन्थ पाठकोंके हाथ पहुँच रहा है, आशा है उससे सभीको सन्तोष होगा।
उक्त शास्त्र भण्डारों, विद्वानों एवं भारतीय ज्ञानपीठके अधिकारियोंके ही सहयोगसे यह कृति इस रूपमें प्रकट हो सकी है, अतएव मैं उनका हृदयसे अनुगृहीत हूँ। सिर्फ प्रेस, जबलपुरके मालिक श्री अमृत-लालजीने चित्रोंके ब्लाक बनवाने और उनका मुद्रण करनेमें विशेष रुचि दिखलायी अतः मैं उनका बड़ा उप-कार मानता हूँ। विद्वर डॉ० वासुदेवशरण अग्रवालने मैंने प्रार्थना की कि वे इन चित्रोंका परिचय लिखवा देनेकी कृपा करें। उनके स्वास्थ्यको देखते हुए मुझे भय था कि वे कदाचित् इस भारको स्वीकार न कर सकें, किन्तु मुझे बड़ा हर्ष और सन्तोष है कि उन्होंने इसे तत्काल स्वीकार कर कर लिया और शीघ्र ही डॉ० गोकुल-चन्द्र जैनको चित्र-परिचय लिखवा दिया। इस कृपाके लिए मैं उनका बड़ा आभारी हूँ।
इस प्रकार इस प्रकाशनमें जो कुछ अच्छाई और भलाई है, वह उक्त सहयोगका फल है, तथा उसमें जो दोष व त्रुटियाँ रह गयी हों वे मेरे अज्ञान व असावधानीका परिणाम है, जिसके लिए पाठकोंसे मेरी क्षमा-याचना है।
—हीरालाल जैन
प्रस्तावना
१. प्राकृतों की परिभाषा परिचय (अपभ्रंश)
(१) यह प्रति जसवन्तनगर के जैन मन्दिरकी है, जो मुझे स्वर्गीय बाबू कामताप्रसादजीके द्वारा प्राप्त हुई थी। यह एक रूपातंर है जिसमें कुल ३० रचनाओंका संग्रह है। इनमें सुगुणप्रदत्तकी आदि दस कथाएँ अपभ्रंशकी और शेष संस्कृत व प्राकृतकी हैं। इसी प्रतिसे मैंने सबसे पूर्व सन् १९२३ में प्रथम बार अपभ्रंश सुगुणप्रदत्तकी कथाओंकी प्रतिलिपि की थी और इस आदतन प्रतिका परिचय अपने अपभ्रंश लिटरेचर शीर्षक लेखमें दिया था। (दे० - भारतीय विद्या, भाग १, १९२५)
(२) यह प्रति भी एक कथाकोषके अन्तर्गत उसके प्रथम ३३ पन्नेमें पायी गयी। इस कथाकोषकी कुल पत्र-संख्या १९४ है। प्रथम पत्र अप्राप्त है। अन्तिम पत्रपर निर्देश है-
वर-वअ-कहाकोसु सुगुणपय निव्वइउ विउलसण्णा।
सोहिउ हरिसिणाहि सुणोणा पुणु सुहयणिग्गयवाहिणा॥
- इससे इस संकलनका नाम ‘अग्रकथा कोष’ जाना जाता है और यह भी ज्ञात हो जाता है कि उसके संग्रहकार विबुधराय से और उनकी रचनाका संशोधन हर्षकीर्ति मुनिने किया था। अन्तमें संवत् १६७६ का भी निर्देश है जो सम्भवतः प्रस्तुत प्रतिका लेखनकाल है। इस ग्रन्थके पत्रोंका आकार १२x७ इंच है, प्रति पृष्ठ ९ पंक्तियों हैं, चारों ओर लगभग एक इंचका हाशिया है, और भोजपत्र भी स्याहीका स्तर स्थान-स्थानपर छूटा हुआ है। यह प्रति सरसम्पन्नके संग्रहमें है।
(३) यह भी ९॥x४ इंच आकारका एक कथाकोष है, जिसकी पत्र-संख्या १५२ है। किन्तु प्रथम एक तथा अन्तके अज्ञात संख्याक पत्र एवं बीच-बीचके अनेक पत्र अप्राप्त है, जिससे वर्तमान पत्रोंकी कुल संख्या केवल ७३ रह गयी है। सुगुणप्रदत्तकी कथाएँ प्रारम्भ पत्र २६ पर हुआ, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है। २७वें पत्रपर मुद्रित प्रति के १, १ के ‘मगधइ’ शब्दसे पाठ प्रारम्भ होकर पत्र २७ के अन्तमें ‘अं जाववि मायइ’ (अं यावपि मावई १, ४, १७) तक अविच्छिन्न गया है और फिर १०-१४ पत्र अप्राप्त होनेसे ३१वें पत्रपर ‘ण णय बंधु’ (१, १०, २) से पुनः प्रारम्भ होता है, और पत्र ३८ पर ‘इम विवंति पुणु’ (२, २, १) तक जाता है। आगे ३९-४४ पत्र अप्राप्त है। ४५वें पत्रपर ‘इमं सुयपणिधा’ (२, ७, १०) से ‘कम्मु वहेइ’ (२, ८, १३) तक जाकर पुनः विच्छिन्न हो जाता है। रचनाकी समाप्ति अगले पत्र ५६ पर हुई होगी, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है। प्राचीन प्रतियोंको यह दुर्दशा देखकर बड़ा दुःख होता है।
(४) यह सुगुणप्रदत्तकी कथाकी एक स्वतन्त्र प्रति है, जो पत्र १ पर ‘॥ द १ ॥ श्री शिव्य गणाः ॥ सुगुणदत्तसी कथा ॥ ॥ शिवं मनसि भवेत्पुणु ॥’ इत्यादि रूपसे प्रारम्भ होकर पत्र ११ पर ‘पडि सिद्धासु महु विसय १ ॥ ७ ॥ ६ ॥ इति सुगुणदत्तसी कथा समाप्त ॥’ इन प्रकार समाप्त होती है। पत्रोंका आकार १३x७ इंच है, प्रतिपन्न १२ पंक्तियाँ हैं। यह प्रति कालकी अपेक्षा पूर्वोक्त तीनों कथाकोषोंसे पश्चात्कालीन है।
इन प्रतियोंके पाठान्तर अधिक नहीं किये गये, क्योंकि उनसे उनके पाठान्तर पाये ही नहीं जाते। पाठभेद प्रायः चरण, शब्द, अक्षर व मात्राओंके छूट जाने, मात्राओंमें ‘ए’ और ‘ऐ’ तथा ‘ओ’ और ‘औ’ के अल्पत्व तथा ग और न के प्रयोगकी अनियमितता सम्बन्धी मात्र दिखाई दिये।
२
सुगुणदत्तचरितम्
कथा-रचना-अपभ्रंश सुगुणदत्तस्वामी कथामें कुल दो संधियाँ हैं। प्रथम संधिमें कड़वकोंकी संख्या १२ है, और दूसरे संधिमें ११। प्रत्येक कड़वकमें पंक्तियोंकी संख्या औसतन १७ है। सबसे कम पंक्तियाँ १२, १ में हैं, जिनकी संख्या ११ है, और सबसे अधिक ११ पंक्तियों २, १ में है। समस्त कड़वकोंकी कड़वकोंकी कुल पंक्ति-संख्या २१४ है।
कड़वकोंकी रचना प्रायः पद्धड़िया और अक्किलक छंदोंमें हुई है, जिनमें प्रत्येक चरणमें १६ मात्राएँ होती हैं, किन्तु एकके अन्तमें जगण (लघु, गुरु, लघु) आता है, और दूसरेके अन्तमें दो लघु मात्राएँ। इन दोनों छन्दोंका इस रचनामें प्रायः मिश्रण पाया जाता है। जैसे, प्रथम कड़वककी १-४ पंक्तियोंमें अक्किलक और शेषमें पद्धड़ियाका प्रयोग हुआ है। किन्तु दूसरा कड़वक पूरा अक्किलक है, व तीसरा-चौथा पद्धड़ियाके। जहाँ मात्राएँ तो १६ ही हों, किन्तु इन दोनों छंदोंके चरणगत मात्राओंका नियम नहीं पाया जाता, वहाँ छंद पादाकुलक कहलाता है। जैसे २, ७ को प्रथम दो पंक्तियाँ जहाँ चरणान्तमें गुरु मात्रा दिखाई देती है। कड़वक १, ९ में दीपक छन्दका प्रयोग है, जहाँ दस मात्राएँ हैं व अन्तमें लघु। प्रत्येक कड़वकके अन्तमें जो पद्य कहा जाता है, वह सामान्य अपभ्रंश कथाओंकी रीतिसे संधि-भरमें एक-सा ही रहना चाहिए, किन्तु यहाँ इस नियमका पालन नहीं पाया जाता।
कवि परिचय और रचना-काल
अपभ्रंश सुगुणदत्तकी कथामें उसके कर्ताने कुछ आत्मनिवेदन रचनाके अन्तमें (२, ९-१०-११) में किया है। इसके अनुसार वे अपने कुलकी आशाओंको उद्दीप्त करनेवाले-उदयचन्द्र नामधारी थे, और उनकी भगिनीका नाम हेमादेय या देवश्री था। उन्होंने इस कथाकी गाकर सुनाया था, जिस प्रकार कि उन्होंने जयवर और जायकुमारके चरित्रोंको भी मनोहर भाषामें सुनाया था। सम्भव है उन्होंने स्वयं इन चरित्रोंकी भी रचना की हो। इनके अतिरिक्त इस रचनामें हमें कवि के विषयमें और कोई वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता।
किन्तु उदयचन्द्रका नाम हमें इस प्रकारकी अन्य भी कुछ रचनाओंमें उपलब्ध होता है। उदाहरणार्थ-
१-विनयचन्द्र मुनि कृत ‘पिज्जर संबन्धी कहा’ के आदिमें उदयचन्द्र गुरु और बाल (बालचन्द्र मुनि) का स्मरण किया गया है-
वणासिंधि पब महागुरु सारद परिचि भणि।
उदयचंद गुरु सुयरिचि वंदिय बालमुणि ॥
विणयचंदु फउ अरहउ जिणवरचंसिहिं।
णिग्गयहु धम्मकहाउ कहिउ जिणगामहिं ॥
दंडी सम्प्रदायके अन्तमें यह भी कथन किया गया है कि इस रामके रचयिता माथुर संघके मुनि विनयचन्द्र थे, और उन्होंने इनकी रचना विमलसूरिकी तद्धटनीमें की थी।
सिहुवगगिरि लक्खणहो इहु रासउ रहउ।
माथुरसंघइ सुणिवर-विणयचंदि कहिउ ॥
विनयचन्द्र मुनि कृत एक ‘नरग उदाहर कहा’ भी है, जिसके आदिमें भी उन्होंने उदयचन्द्र गुरु और बालचन्द्र मुनिका स्मरण तथा नमन किया है। यथा-
उदयचंदु गुणगाहण सहयउ।
सो महुं आयरे भणि अणुसरिउ ॥
बालचंदु मुणि णिविहि णिरवउ।
णरगउदारही कहमि कहंतउ ॥
३
१ तथा स्थल प्रकट किया है। यथा-
अमिअसरिसउ जवजलणु।
णयरु महाणणु सग्गु ॥
जहिं जिणभवणि वरलक्खण।
विहडइ रासु सवग्गु ॥
२-जिनदत्त-सूरिकी एक दोहरी रचना ‘सुणहो’ भी है, जिसमें उन्होंने माथुरसंघके मुनि उदय (उदय-चन्द्र) तथा बालचन्द्रको नमस्कार किया है, तथा विबुधगिरि नगरके अग्रेश्वर रत्न हुए राजाविहारको अपनी रचनाका स्थान बतलाया है। यथा-
माथुरसंघइ उदयणासीरु।
पत्तविहि बालचंदु गुरु सग्गरु ॥
चंदु विणयसयंकु मुणि।
विबुधगिरिपुरु जमि विस्सामउ।
सत्तलहुं णंपयहि आयउ ॥
तहिं सिहवरि मुणिवर अग्रयंदहो राजविहारहो।
वेसि विहडय पुणविय सोहइ मुणिवर जे सुव पारहिं ॥
पूर्वोक्त समस्त उल्लेखोंपर विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि-
१. अपभ्रंश सुगुणदत्तस्वामी कथाके कर्ता में ही उदयचन्द्र है जिनका विनयचन्द्र मुनिने अपनी अनेक रचनाओंमें गुरु कहकर स्मरण किया है।
२. सुगुणदत्तस्वामी कथाके कर्ताने स्वयं कविपर उदयचन्द्र गुरुदेव से और उन्होंने अपनी पत्नी हेमादेवीका भी उल्लेख किया है। यही कारण है कि विनयचन्द्र मुनिने अपनी दो रचनाओंमें उनका गुरु रूपसे स्मरण तो किया है, क्योंकि वे उनके विद्यागुरु थे; किन्तु उन्हें नमस्कार नहीं किया, क्योंकि मुनिका गुरु रूपसे नमस्कार करना अनुचित है। विनयचन्द्रके दीक्षागुरु मुनि बालचन्द्र थे, और उन्हें उन्होंने सर्वत्र नमस्कार किया है।
३. कविपर उदयचन्द्र बादमें दीक्षा लेकर मुनि हो गये। इसी घटनाके पश्चात् विनयचन्द्रने अपनी ‘सुणहो’ नामक रचनामें उन्हें मुनीश्वर भी कहा है, और अपने दीक्षागुरु बालचन्द्र मुनिको साथ उन्हें भी प्रणाम किया है। तथापि यह ध्यान देने योग्य बात है कि उन्होंने विद्यागुरुके नाते उदयचन्द्रस्वामीके सर्वत्र आदिमें उल्लेख किया है, और दीक्षागुरु बालचन्द्रका पश्चात्।
४. ये तीनों मुनि उदयचन्द्र, बालचन्द्र, और विनयचन्द्र माथुर संघके थे। इस संघका साहित्यिक उल्लेख सर्वप्रथम अभिमतिकके ग्रंथोमें मिलता है, जिन्होंने अपना सुपालित-रत्न-संग्रह नामक ग्रंथ मुंजनगरके राज्यकालमें संवत् १०९० में रचा था। इस संघके दूसरे बड़े साहित्यकार अमरकीर्ति थे, जिन्होंने संवत् ११३७ में अपभ्रंश भाषाका ‘छक्खंडमोक्ख’ (षट्कर्ममोक्ष) रचकर पूरा किया। तीसरे महान् रचनाकार यशःकीर्ति और उनके शिष्य पण्डित रत्न हुए, जिन्होंने संवत् १२८६ के आसपास अनेक अपभ्रंश ग्रन्थोंकी रचना की। (माथुर संघके विषय परिचयके लिए देखिए डॉ० ओ० हरगुप्तर कृत ‘भट्टारक सम्प्रदाय’ शोधपत्र, १९५८) देवेल-कुल दंशनार-भाग ४०. आदि के अनुसार इस संघकी स्थापना मथुरामें रामसेन गुरु-द्वारा की गयी थी, जिसमें मुनियोंको पीछे रचनाका निषेध किया गया था।
५. उदयचन्द्र कविने अपनी सुगुणदत्तस्वामी कथाके रचना-स्थानका कोई उल्लेख नहीं किया। किन्तु उनके शिष्य विनयचन्द्रने अपनी ‘नरगउदारही कथा’ का रचना-स्थल यमुना नदीके तटपर बसा महावन नगर बतलाया है, और अपनी अन्य दो रचनाओंमें अर्थात् ‘पिज्जर-संबन्धी कथा’ और ‘सुणहो’ को विबुधगिरिपर
बोधिसत्व का महायान
(विशुद्धिमार्ग) में रचित कहा है। बोधिसत्व दो स्थानों पहचान लिये गये हैं। महायान तो मथुराके निकट यमुना नदीके उस पार बढ़ा हुआ है और वह उत्तरपश्चिमके मकाममें अब भी देखा जा सकता है। काश्मीरमें इस नगरको स्वर्ग कहा है, जिससे उसकी उन दिनोंकी महत्ता प्रकट होती है। विशुद्धिमार्ग आज-कलका तिब्बतका (खम्स् या यम्स्) है, जो बुद्धपर या महायानके दक्षिण-पश्चिमकी ओर लगभग आठ मील दूर राजगृहके पुराने काली राज्य व भरतपूर राज्यमें पड़ता है। इन प्रकार इन ग्रन्थकारोंका निवास व विहारका प्रदेश मथुरा जिला और भरतपूर राज्यका भूमिभाग कहा जा सकता है।
५. उक्त समस्त रचनाओंमें उनके रचनाकालका निर्देश नहीं पाया जाता। सौभाग्यसे विनयपिटक सूत्रमें अपनी ‘बुद्धघोष’ नामक रचनामें एक ऐसा संकेत दिया है, जिससे इनके रचनाकालका अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि ‘बुद्धघोष’ की रचना उन्होंने विशुद्धिमार्गमें अन्यतरके राजविहारमें रहते हुए की थी। अगर हम इस ही चूके हैं कि यह विशुद्धिमार्ग आजकालका तिब्बत है। इसके पूर्व इतिहासका पता लगाकर हमारी बुद्धि यह है कि भगवान् बुद्धघोषी राजविहार जातों है। भाटोंके जातों व उसीके देशांतरके पता चलता है कि भरतपूर राज्य व मथुरा जिलेके भूमि-प्रदेशपर एक समय यदुवंशो राजाओंका राज्य था, जिसकी राजधानी श्रीपथ (आधुनिक बयाना, राजस्थान) थी। यहाँ ग्वालवंशी यदुके पूर्वजमें जैतपाल नामक राजा हुए। उनके उत्तराधिकारी विजयपाल थे, जिनका उल्लेख विजय नामक बयानाके सन् १०४३ के उत्कीर्ण लेखमें भी पाया गया है। इनके उत्तराधिकारी हुए त्रिभुवनपाल (विशुनपाल) जिन्होंने बयानामें २४ मील दूर त्रिभुवनगढ़ (तिहुनगढ़) का किला बनवाया। इस वंशके जैतपाल नामक राजाकी एक उत्कीर्ण प्रशस्ति बयानामें मिली है, जिसके अनुसार सन् ११५० ई० में उनका राज्य भरतवन था। इनके उत्तराधिकारी हरिराजका भी सन् ११६० का एक उत्कीर्ण लेख बयानामें मिला है। भरतपूर राज्यके जयपुर नामक स्थानमें भी एक मूर्ति मिली है, जिसके सन् १११२ में उत्कीर्ण लेखमें सहस्रपाल नरेशका उल्लेख है। इनके उत्तराधिकारी कुमारपाल (कुँवरपाल) थे, जिनका उल्लेख मुसलमानो तारीख नामक ग्रन्थोंमें भी मिलता है, और वहाँ कहा गया है कि इनके समय तिहुनगढ़ या भयनगरमें सन् १११६ ई० में मुअज्जुद्दीन मुहम्मद गोरीने आक्रमण कर वहाँके राय कुँवरपालको परास्त किया और वह दुर्ग बहाउद्दीन तुगरिलको सौंप दिया। कुँवरपालके उत्तराधिकारी वनगोपाल, पृथ्वीपाल व त्रिलोकपालके नाम पाये जाते हैं। किन्तु संभवतः इतिहासवेत्ताने कालके प्रति बुद्धसेन प्रदेश व मथुराके मादुदेव और कुल्पाक नामसे मुनिन्द्र इन्दुदेवको राजपरम्परा बारहवीं शती तक आकर मुसलमानो आक्रमणकारियोंके हाथों समाप्त हो गयी।
यहाँ प्रस्तुतोपयोगी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सुगन्धदशमी कथाके वक्ता उदयभद्रके शिष्य विनयभद्रने जिस विशुद्धिमार्ग (तिहुनगढ़) में अपनी उक्त दो रचनाएँ पूरी कीं, उसका निर्माण इस यदुवंशके राजा त्रिभुवनपाल (विशुनपाल) ने अपने नाममें सन् १०४३ के कुछ काल पश्चात् कराया था। तथा अनन्तरके जिन राजविहारमें रहकर उन्होंने ‘बुद्धघोष’ की रचना की थी, वह निस्संदेह उन्हीं जैतपाल नरेश-द्वारा बनवाया गया होगा, जिनका सन् ११५० का उत्कीर्ण लेख बयानामें मिला है। सन् १११६ में विशुनगिरिपर उक्त यदुवंशी राजाओंके हाथोंसे निकलकर मुसलमानोंके हाथोंमें चला गया। अतएव विशुनगिरिके लिये गये उक्त दोनों ग्रन्थोंका रचना-काल लगभग सन् १११० और १११६ के बीच अनुमान किया जा सकता है। और चूंकि ‘बुद्धघोष’ को रचनाके समय उदयभद्र मुनि हो चुके थे, किन्तु सुगन्धदशमीको रचनाके समय वे गृहस्थ थे, अतः सुगन्धदशमीका रचनाकाल लगभग १११० ई० माना जा सकता है।
३. कथाका मौलिक आधार और विकास
यह बात सुगम और सर्व-सम्मत है कि जीवमात्र अपने सुख-लाभका और दुःखके निवारणका प्रयत्न करता है। कहा है-
प्रस्तावना
१
“जे विज्जुएन में जीव अनन्त। सुध चालि दुख ते भयवन्त ॥” (दोत्तराम् : छहढाला)
सुखिलाषाकी इसी चेतनासे प्रेरित होकर मनुष्यने एक ओर कर्मशीलताका विकास किया, जिसके द्वारा उसने घर-बार निर्माण, अन्न-पान-संबंध, वस्त्रभूषण, औषधि-उपचार आदि सम्बन्धों नाना प्रणालियों का आविष्कार किया। दूसरी ओर उसने यह भी देखा कि उसके कर्म-क्षेत्रके परे कुछ ऐसी भी प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जैसे अग्नि, वर्षा, वायु, सूर्य आदि को कभी अनुकूल होकर उसके सुखमें वृद्धि करती हैं, और कभी प्रतिकूल होकर उसकी उपर्युक्त सुख-सामग्रीको नष्ट-भ्रष्ट कर डालती हैं। उसने इन अनुभवनजन्य मनुष्य-स्वभावके आधारपर उन दिव्य शक्तियोंके रोष-तोषका परिणाम समझा। यह समझदारी प्राप्त होते ही उसने उन शक्तियोंको अपनी अभीष्ट-सिद्धि-प्राप्त करने और अपने हितके अनुकूल बनानेका प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया। यह स्थिति हम भारतीय प्राचीनतम साहित्य ब्राह्मणोंके ग्रन्थोंमें प्रतिविम्बित पाते हैं जहाँ भगवान् स्पष्ट ही कहता है कि "मैं अग्निका आह्वान करता हूँ, अपने कल्याणके लिए; शांति अमृत-मरुत्को विराम होती है, इसलिए मैं उसका भी स्वागत करता हूँ; और कविताओंको बुलाता हूँ कि वह मेरा परित्राण करे। (ऋग्वेद, १, १, १) इससे प्रकार दूसरे इंद्रों, पोषों, धन तथा योजनोको रक्षा करने को (१, ४ आदि), वरुणसे पापोंसे बचाने व पूर्णोद्ध प्राप्त करने तथा अपना क्रोध दूर करनेको (१, २४); मरुतोंसे बल-वृद्धि, शत्रु-दमन तथा सबके मार्गमें बचावकी (१, ३७-३९); तथा ब्रह्मागणोंसे बल, अन्न, बलवान् शत्रुके विनाश आदि (१, ४०) की प्रार्थनाएँ की गयी हैं, और इन्हीं गुणोंके कारण उन्हें स्तुत्य, पूज्य तथा आह्वान करने योग्य माना गया है।
क्रमशः रोष-तोषके कारण भक्तिका अनिष्ट व इष्ट संपादन करनेका सामर्थ्य उन देवताओंके विविध प्रतिनिधि ऋषियोंमें भी आया। यह ऋषि हमें विशेष करके महाभारत व रामायण तथा अन्य पौराणिक साहित्यमें दृष्टिगोचर होती है। इतना ही नहीं, किन्तु ऋषियोंमें यह शक्ति भी मानी गयी है कि वे इष्ट होकर शत्रु-द्वारा मनुष्यको जयोचित्त को पहुँच करते हैं, और प्रसन्न होकर शापके निवारण व मनुष्यके उत्थानका भी उपाय बता सकते हैं। कपिल मुनिने रुष्ट होकर सगरके साठ सहस्र पुत्रोंको भस्म कर दिया और फिर प्रसन्न होकर गंगावतरण उनके उद्धारका भी उपाय बतला दिया (रामायण १, ४० आदि)। शुक्राचार्यने शापसे सगरके प्रपौत्र युवाश्वको ही पुत्र हो गये, किन्तु उनके अनुरोधसे उन्होंने अपने बड़े पुत्रका मोक्ष प्राप्त कर दिया (महाभारत १, ७८)। ऋषियोंका यह सामर्थ्य इतना भी बढ़ा कि वे स्वयं देवताओंको भी शाप देकर मनुष्योचित्त योनिमें गिराते लगे। इंद्रको प्राप्त होकर भी अगस्त्य ऋषिने शापसे स्वर्ग बनकर अमरावतीसे गिर पड़ा (महाभारत), व गौतम ऋषिके शापसे इंद्रदेव भी विकल (नपुंसक) हो गये (रामायण १, ४८, १८-१९)।
ऋषियोंके सामर्थ्यकी इस श्रृंखलामें महाभारतका निम्न आख्यान (परिशिष्ट १) ध्यान देने योग्य है-
अहिल्या नामकी एक प्रसिद्ध अप्सरा थी। कारणवश वह एक ब्राह्मणके कोपके भाजन बन गयी और ब्रह्म-शाप-द्वारा मनुष्य योनिमें मण्डूकी योनिमें उत्पन्न हुई। (महाभारत १, ५९, ४५) प्रसंगवश उसके उत्तरमें ब्रह्म-प्रसाद बनुवाके बीच प्रविष्ट हो गया। गर्भके दसवें मासमें वह मछली योनि-द्वारा पकड़ी गयी और उसके उदरसे एक स्त्री और एक पुरुष निकले। मछली तो सामिष ही होकर पुनः अप्सरा हो गयी, और उसकी मानवी-सन्तान-रूप स्त्री सुगन्धदशमी राजा वसुकी धर्मपत्नी नियत हुआ। अपने पुत्रोंको तो मत्स्य नामसे राजा बना दिया, और कन्याको एक दासको पादप-पीड़कके लिए दे दिया। वही होनेपर वह कन्या अपने दस पिताओंको संज्ञा-सहायता करने लगी। और उनकी अनुयायिनीके नाथ चलाकर पतिको नहीं मार कर पाने लगी।
एक बार इस दास-कन्याको नाथ-द्वारा पराशर ऋषिको नदी पार करनेका प्रसंग आया। कन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु उसके शरीरसे मत्स्यकी दुर्गन्ध निकलती थी, जिसके कारण वह रहस्यमया
सुगन्धदशमी कथा
भी कहलायी थी। नाव जब बीचमें पहुँची, तब ऋषि पराशर अपनी कामवासनाको न रोक सके, और उन्होंने मत्स्यगन्धासे प्रेमका प्रस्ताव किया। आसक्तिके समीपवर्ती ऋषियोंकी दृष्टिसे बचनेके लिए उन्होंने अपने तपबलसे कुहरेकी सृष्टि की और मत्स्यको यह भी वरदान दिया कि उनसे प्रेम करनेपर भी उनका कौमार्य नष्ट नहीं होगा। ऋषिकी इच्छा-पूर्ति करनेपर कन्याने वरदान माँगा कि उनके शरीरकी दुर्गन्ध दूर होकर उनके नाममें उत्तम सुगन्ध आ जाय। ऋषिके प्रसादसे ऐसा ही हुआ और वह मत्स्यगन्धा से सुगन्धगन्धा नामसे प्रसिद्ध हुई। उसके शरीरकी सुगन्ध एक योजन तक फैलने लगी, जिससे उसका नाम योजनगन्धा भी विख्यात हुआ। वैसे इस कन्याका नाम सत्यवती था, जो आगे चलकर कौरव-नरेश पाण्डवोंकी माता हुई। उसके ही पुत्रका व्यासदेव था, इसी हेतु ज्ञानके अन्वेषणके अपना विवाह न करनेकी भीष्म प्रतिज्ञा धारण की थी। तथा इसीके शिष्यो पाण्डवों तथा यदुके शिष्यो धर्मराज युधिष्ठिरके जन्म दिया, जिसको संताने पुरु और पाण्डु हुए। (महाभारत १, ५७, ५४ आदि)।
महाभारतके इस कथानकमें पाठकोंको प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाके सूत्रपरोक्षका दर्शन हुए बिना न रहेगा। ऋषिका अनिष्ट, उसके कारण कन्याके शरीरमें दुर्गन्ध व ऋषिके प्रसादसे दुर्गन्धके स्थानपर सुगन्धकी उत्पत्ति, एवं राजपद प्राप्ति, इन सभी बातोंमें उक्त कथानकका मेल बैठता है।
किन्तु कुछ अन्य बातोंमें बौद्ध-परम्पराके उक्त आख्यान एवं जैन-परम्पराकी सुगन्धदशमी कथा विवरणमें बहुत भेद है। बौद्ध-परम्पराके ऋषि तपोल-समुद्र हो होते हैं, किन्तु वे न तो मांसभक्ष्यके परिणामी होते हैं, न ब्रह्मचर्यके परिपालक, और न रागनिग्रह रहित। (निरुक्त १, ११) के अनुसार उनकी वृत्ति तोल होती है, तथा वे वैरागीके कर्मोंका वर्णन करते हैं। (ऋग्वेदविनानी) और भरतके अनुसार उनकी विद्वत्ता व विवशता प्रसिद्ध है (विद्यार्थिमध्यस्थः ऋषयः प्रसिद्धाः)। तथापि वे गृहस्थ हैं (यद्यपि गृहस्थ-भिन्नः) व आश्रम बनाकर रहते हैं, बौद्धों व धनका दान देते हैं, और बौद्धोंका पालन भी करते हैं। शुद्ध होकर वे शाप भी देते हैं, और प्रसन्न होकर वरदान भी। किन्तु जैन-परम्पराके मुनियोंकी प्रवृत्ति अहिंसकः ही उनसे भिन्न रहती है। स्वयं अनुष्ठके अनुसार वे बातलवान् (सामर्थ्यः मनन विवरणः) होते हैं, उनके शरीरको निर्मल बनानेकी रुचि नहीं होती। वे लौकिक व्यवहारसे परे उन्मत्त (परमज्ञ) व मौन वृत्तिसे रहते हैं। वे अश्वासी होते हैं। लोग उनके शरीरको तो देख पाते हैं, किन्तु उनको आध्यात्मिक चेतनाको नहीं (श्री १०, ११४)। तैत्तिरीय आरण्यक (१, ११, ३; १, २६, ७) के अनुसार वे बातलवान् मुनि, समा-हित्ताः अर्थात् चित्तको एकाग्र करनेमें अपराधी तथा उग्रधर्मिणः अर्थात् ब्रह्मचारी होते हैं। महाभारत (अनुशासन पर्व ११५, ५९) के अनुसार मुनि वे ही कहे गये हैं जो मनु, मांस और मद्यका सर्वथा त्याग करते हैं; तथा गीता (१, २६) के अनुसार मुनि स्थितप्रज्ञ होते हैं, जिन्हें दुःखमें उद्वेग नहीं, सुखको बाधा नहीं, तथा भय और क्रोधरहित होते हुए वीतराग होते हैं। बातलवान् मुनियोंको परमेश्वर हुए भगवान् ऋषभदेव (जैनोंके आदि तीर्थंकर) (भागवत पुराण ५, १, २६ आदि) शरीर मात्र परिग्रह धारो थे, उन्मत्तवत् नग्न (गमन-परिधान) अद्भुत, मलिन जटाशोभित रहते थे। पुराणमें यह भी कह दिया गया है कि ऋषभदेवका यह अवतार कल्पका तीसरा देने हेतु हुआ था।
इन्हीं मुनियोंकी साधनाके बौद्धिक विस्तारसे वर्णन महाभारतके शांतिपर्व, अध्याय ९ में किया गया है, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न करते हैं कि “मैं तो अब मुनि होकर गृहस्थसे उनके धर्मशास्त्र करता हुआ शिक्षाविशेष अपने शरीरका लपण करवाता हूँ। चूंकि-पुत्रपौत्र गुणवान् या बुद्धके नीचे निवास करता हूँ, तथा समस्त प्रिय और अप्रियका त्याग होकर, शोक और हर्षसे रहित निन्दा और स्तुतिमें समभाव, कोई आशा व ममता न रहता हुआ निर्द्वन्द्व और निष्परिग्रह” रहना चाहता हूँ। आत्मामें ही मेरा रमण हो, मेरा आत्मा प्रसन्न रहे, आकृति मेरी नष्ट हो जाय, अब और बहिर्-वेदी हो। मैं किसी दूसरेसे कोई सलाह-सम्पत्ति नहीं करना चाहता। अपने-अपने गुणधर्ममें स्थित धर्मोंके प्रज्ञाके जैतपाल प्राणों- के प्रति मेरा समता-भाव रहे। न मैं किसीको हेय उठाऊँ, न कभी किसीपर मुकुटो तानूँ। समस्त इन्द्रियों-
यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:
प्रस्तावना
को संयमित रखना हुआ में सदैव प्रयत्न-प्रभु रहा। न न मैं किसीके मारे मरूँ, न किसीके साथ चलूँ, न किसी देशको अथवा किसी दिशामें जानेको कोई विशेष इच्छा रखूँ। कोई अपेक्षा न रखता हुआ, पीछेकी ओर न देखकर सावधानो रहना हुआ, बस स्थावर जीवोंको बचाता हुआ समभावसे सोधा गमन करना। भरसक स्थावर आगे बढ़ता है, गुणपाद चौमासका प्रथम पढ़ता है, तथा सुख-दुःख आदि इष्ट अनिष्ट विरोध छोड़ते नहीं। अतः मैं उनमेसे किसी न बढूँ। अजन या स्थावरजीव जो भी। भोजन मिल जाये उसमें संतोष करूँ। न मिले तो भी लुब्ध न होऊँ। जब रात्रिका चौथा प्रहर हो जाये, मुखल रख दिया जाये, बलमें आग भी न रहे, लोग भोजन कर चुकें, परोसा संस्कार बनो हो जाये व सामान्य भिक्षाके बाद जाये, तब मैं दिनमें केवल एक बार खा, तीन या पाँच घरोंसे भिक्षा माँगूँ। स्नेह-बन्धनको छोड़कर मैं इस गुणधोर विचरण करूँ। लाभ हो या हानि हो मैं समदर्शी रहूँ, और महात्त्वने विचलित न होऊँ। मेरा आचरण न तो हीनमें लिप्त आतुरता लिये हो, और न मरकी इच्छादिही। जीवनका मैं अभिनन्दन न करूँ, और न मरणसे डरूँ। कोई बहुलेसे मेरा साथ काटे और कोई शरीरपर वन्दनका लेप करे, तो भी न मैं एक का सत्कारण सोचूँ और न दूसरेका कलपण। क्रोधमें शारीरिक अपद्रव्यको निवारण करना समय है, उन सबमें मैं परित्याग करूँ, और भक्त मारने आदि सारी क्रियाओंमें सावधान रहूँ। इन्द्रियोंको क्रियाओंमें न मैं आसक्ति रखूँ, और न प्रवृत्ति। अपने सामायिकका संकल्प कभी न छोड़ूँ, और आत्माकी शक्ति करनेवाले कामको बनानेको बताता रहूँ। मैं सब प्रकारके संगसे मुक्त रहूँ व सब बन्धनोंसे परे रहूँ, किसीके बंधन में रहूँ। साधुके समान स्वरूप भूलि हो। इस प्रकार वीतराग भावसे आचरण करता हुआ मैं कायवत सब-गुणोंको प्राप्त करूँ। अभीतक तो मैंने अज्ञानमें कारण गुरुत्वके बलीभूत होकर महापाप किया। मुनियोंके आचारका जो विधान जैन-शास्त्रोंमें पाया जाता है उससे उक्त बातोंका भलीभाँति समर्थन होता है।
ऋषियों और मुनियोंकी साधनाओं, प्रवृत्तियों एवं गुणस्थानों उनके भेद उन परम्पराओं-सबको आध्यात्मिक स्वभावतः प्रतिष्ठित हुआ है। जहाँ एक ही या एक ही प्रकारकी लोक-कथाका उपयोग धार्मिक उपदेशके लिए किया गया है, वहाँ अपनी-अपनी परम्पराओंके अनुकूल उसमें हेर-फेर भी हुआ है। महाश्रमणके सत्यवादी शरीरमें कुपित भावका कारण या उनकी अनन्त मात्राका बहुव्याप और दुर्गुणोंमें मुक्ति एवं गुणत्वकी उत्पत्तिका कारण या ऋषिका भरसन। इस वरदानकी प्राप्ति किसी धार्मिक साधकके फलस्वरूप नहीं हुई, किन्तु ऋषिकी सामान्यता-वृत्ति-द्वारा उनका प्रभाव। किन्तु जैन-परम्परामें ये बातें नहीं बन सकतीं। यहाँ मुनि दुःख-सुखमें समान रहने समभावसे रहते हैं, और उनमें राग-द्वेषका भी अभाव होता है। अतः न तो वे बात देते हैं, और न भरते। जैन कर्म-सिद्धान्तके अनुसार माताके शापसे पुत्रका शरीर दूषित हो, यह बात भी नहीं बनती। फल प्रत्येक जीवको स्वकृत कर्मके अनुसार ही प्राप्त होता है। हाँ, मुनिजन अपने ज्ञान-द्वारा यह अवश्य विश्लेषण कर बतलायेंगे प्रयत्न करते हैं कि कौन-से पापोंके फल उत्पन्न हुआ और कौन-से पुण्यकर्म-द्वारा सुखका निवारण किया जा सकता है। इन सिद्धान्तोंके अनुसार शरीरमें अविनाशीकी उत्पत्तिका जो आख्यान प्राचीन जैन (आगम माध्यमका १६) में पाया जाता है वह इस प्रकार है-
वचना नगरीमें सोम, सोमदत्त व सोमभूति नामक गुप्त रहते थे। उन्होंने एक बार विचार किया कि जब हमारे सब प्रचुर धन है तो क्यों न उसका भोग और दानमें सदुपयोग किया जाये। अब जब उन्होंने परस्पर आमन्त्रण-द्वारा भोज और आमन्त्रण-निमन्त्रण किया। सब लोगोंको बारी बारी सब पक्षकी पत्नी सामान्यने खान-पानकी खूब तैयारी की। किन्तु जब उन्होंने परीक्षक लिए खूब घृत और मसालों सहित तैयार की गयी खीरके शाकके एक बिन्दुको बचा तो उसे अपयश कलश और निर्लज्जा पाया। तब उसने उसे अलग रखकर अन्य दाऊ तैयार किये व आमन्त्रणको खूब खिलाया-पिलाया। आमोद-प्रमोदके पश्चात् सब अपने-अपने घर गये। तब वही धर्मरुचि नामक मुनि आहारको भिक्षाके लिए उपस्थित हुए।
नागरोकेने विचार किया कि इस कड़वी वस्तुका शाक जिसमें उतना घृत और मसाला पड़ा है, अत्यन्त कौन-से की अपेक्षा इस मुनिको दे देना अच्छा। ऐसा विचार करते हुए उसने समस्त शाकको मुनिके भिक्षा-पात्रमें उड़ेल दिया। उसे लेकर धर्मरुचि मुनि अपने गुरु धर्मघोषके पास आये। उन्होंने उसकी गन्धका अनुभव कर एक बिन्दुका स्वाद लिया और उसे कटु व अखाद्य जानकर मुनिके उसे एकान्तमें उचित स्थानमें डाल देनेको कहा। धर्मरुचिने जाकर एक स्थानपर उसका कुछ भाग छोड़ा, और देखा कि जिस-जिस चींटीने जाकर उसे खाया, वही तुरन्त मर गयी। यह देख मुनिने विचार किया कि इसे कड़वी हो, सामनेसे अनपेक्षित जीवोंका घात होगा। अतः इसने यहाँ अच्छा है कि मैं ही इसे खा लूँ जिससे अन्य जीवोंके प्राण न जायें। ऐसा विचार कर उन्होंने उसका आहार कर लिया और वे शीघ्र ही मरकरके प्राप्त हुए।
इस प्रकार नागोंकी करतूतसे मुनिके मरणकी बात सर्वत्र फैल गयी। बहुजन समाजने उसकी निन्दा और भर्त्सना की, तथा उसे घरसे निकाल दिया। इस प्रकार निर्वासित और निन्दित होकर वह घर-घर भीख माँगकर अपना निर्वाह करती हुई श्वास, कास, शूल, फूट आदि सोलह महामारियोंसे ग्रस्त हो, मरकर नरक जाकर अपने तीन जन्मोंमें पुनः-पुनः मछली हुई, फिर अनेक इन्द्रियादि जीवोंमें सहस्रों बार उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् निर्धन योनिमें उत्पन्न होकर कष्टमयतम सागरवत साधुत्वकी सुमनाका नामक पुत्री हुई। वह रूपहीन एवं ओठ सूखनेसे समाप्त थी, तथापि उसके शरीरका स्पर्श असहनीय था, जिसके कारण उसका पति उनके पाससे भाग गया। ऐसेमें एक दरिद्रसे उसका पुनर्विवाह कर दिया, किन्तु वह भी उसका स्पर्श सहन न कर, निकल भागा। यह देख पिताने उसका सम्बोधन किया कि यह सब उसके पूर्वकृत कर्मोंका फल है। फिर उसने उसे अपने रसोईघरके काम-काजमें अपना चित्त कमानेका उपदेश दिया। कुछ काल पश्चात् वहाँ अग्निकायका एक संघ आया। उनके समीप सुमनाकेने प्रव्रज्या ले ली।
क्रमशः एक लम्बा नामक पीढ़ी थी। एक बार वही पीठिका पुरुष देवदत्ता गणिकासहित आमोद-प्रमोदके लिए पहुँचे। किसीने श्वेतदत्ताको अपनी गोदमें बिठाया, किसीने छन लगाया, किसीने पुनः-पुनः की, किसीने पैरोंमें मोहर लगाया और किसीने चमर होरा। सुमनाकेने वह सब देखा और वह उस स्त्रीके भाग्यको सराहने लगी। उसने नियम किया कि यदि मेरी इस प्रव्रज्याका कुछ फल हो तो अगले जन्ममें मुझे भी ऐसा ही प्रेम-सरकार प्राप्त हो। तभीसे वह अपने शरीरको सम्प्रयोज्य और विशेष ध्यान देने लगी। मरनेके पश्चात् वह देवान स्वर्गमें देवी हुई, और फिर दुष्टको राज्यकन्या दोरथी; जिसे पूर्व संस्कारवश अर्जुन आदि पाँच पाण्डवोंका पतिव्रत प्राप्त हुआ। (परिशिष्ट १)
इस कथाक्रममें न हो सुलझा शाप है, और न वरदान। किन्तु मुनि प्रति दुर्भाव और दुर्भावके पासे उसे स्वयं कुछ आदि रोग हुए, नाना भीष मोक्षोंमें भ्रमण करना पड़ा, एवं मनुष्य-जन्ममें उसे उसी कड़वी तुंबी-जैसा असह्य शरीर मिला। फिर प्रव्रज्याके तुम्हारे अगले जन्ममें उसे सुन्दर कड़वी प्राप्ति हुई और उसे मनोवांछित पति भी मिले। यह कथाक्रम अर्धांगमी आगमका है, जिसका उपलब्ध संकलन बोरियोंमें १२०० वर्ष पश्चात् बलमीसे किया गया था। अतः वह इसीको पाँचवीं शतीसे पूर्वकी रचना सिद्ध है।
हरिभद्र सूरि (लगभग ७५० ई०) विरचित सामरादित्य (नाटक पद्धति) के पृष्ठ १३ की टीकामें भी इस प्रकारका एक कथानक सम्बन्धके निर्विकारका नामक अतिचारके उदाहरण रूपसे आया है, जो इस प्रकार है-
एक सेठ था। उसकी पुत्रोके विवाहमें कुछ साधुजन आये। पिताने उन सबको परिचर्या करनेका आदेश दिया। किन्तु उनके शरीरको मलिन गन्धसे उसे घृणा हुई, और वह विचार करने लगी कि यदि ये साधु प्रमुख जलके स्नान कर लिया करे, तो क्या हानि है? उसने अपने इस दूषित विचारका कोई आलोचन-प्रतिक्रमण नहीं किया। अतः मरनेपर वह राजगृहकी एक गणिकाके यहाँ उत्पन्न हुई। जन्मसे ही उसके
बारीरीसे दुर्गन्ध निकली थी, जिससे वह अपने त्याग दी गयी। एक बार राजा श्रेणिक, भगवान् महावीरको देखनेको जाते समय उसी वनमें निकले। दुर्गन्ध पाकर उन्होंने उसकी खोज करायी, और स्वयं जाकर उसे देखा। फिर भगवान्ने उसके विषयमें पूछा-छाना को। उन्होंने उसके शरीरमें दुर्गन्ध उत्पन्न होनेका कारण जानकर उसके भावी होनेहार की बात पूछी। भगवान्ने कहा कि अब उसके पापका फल भोग चुकी। अब वह सुन्दरी हो अमृतमयी होगी, और अब उसे सुन्दरीके साथ स्मरण करके, पश्चात् दो धर्मोंमें तुम जान लेना। राजा भगवान्को वन्दना कर अपने भवनको गये। उस कन्याकी दुर्गन्ध दूर हो गयी, और एक अहेरीके ले जाकर उसका पालन-पोषण किया। युवती होनेपर वह अपनी माताके साथ कौमुदी-महोत्सव देखने गयी। राजा भी अपने पुत्र अभयकुमारके साथ बैठकर उस देख रहा था। कन्याके अकस्मात् देखनेसे उसको कामभावना जागृत हो गयी, अतः उसने अपनी माताके मुद्रिका उसे पहना दी, और अभय-कुमारसे कह दिया कि उनको काममुद्रा दिखाने पूरा को, अतः उसकी खोज की जाये। अभयकुमारने नगरमें सब बन्द कर करा दिया, और प्रत्येक मनुष्यको जाँच-पड़ताल करायी। वह बालिका मुद्रिकासहित पकड़ो गयी, और राजाके साथ लायी गयी। राजाने उससे अपना विवाह कर लिया। एक बार राजा अपनी अन्य रानियों सहित जलक्रीड़ाकी, और वह सुन्दरी उसकी नाकको देखती रह गयी। इस प्रकार राजा-द्वारा अपनेको परित्यक्त समझकर उसने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली।
इस प्रकारका तीसरा आख्यान जिनसेन-कृत हरिवंशपुराण (शक सं० ७०५-७०५ ई०) में पाया जाता है-भरतक्षेत्र, मगधवनके लक्ष्मी ग्राममें लक्ष्मीमती नामकी सुन्दर कन्या थी। एक बार वह दर्पणमें अपना रूप देख रही थी कि उसी समय भिक्षाके लिए समाधिभूत मुनिको आया देख उसे घृणा हो। छोटी, और वह मुनिकी निन्दा करने लगी। इस महापापके कारण सातवें दिन हो उसके शरीरमें कुष्ठ व्याधि उत्पन्न हो गयी। कन्याने अग्नि-प्रवेश-द्वारा मरण किया। तत्पश्चात् उसने क्रमशः खरी, सुकरी और कुकुरिका जन्म ग्रहण किया। फिर वह मनुष्यग्राम निवासी मत्स्योपजीवी पुत्री हुई। उसका शरीर दुर्गन्धमय होनेसे माताने तो उसका परित्याग कर दिया, किन्तु मातामहीने पाळ-पोषकर उसे भी हुआ है। मुनिका संयोग होनेपर उसे धर्मोपदेश मिला। वह अग्निकामके साथ रामहू गयी और सिद्धिकाकी वन्दना करके, गोकुणकामें समाधिस्थ हो, मरकर अच्युत स्वर्गमें महादेवी हुई। वहाँसे उतरकर वह राजा भीष्मकी कन्या हस्तिणी हुई। यही कथानक महासेन-कृत प्रद्युम्नचरित (सर्ग ८, १२०-१६०) तथा हरिवंश-कृत कथाकोष (१०८) में भी पाया जाता है।
इस कथानकमें मुनिके निरादरसे कुष्ठरोगकी उत्पत्ति, नीच योनियोंमें जन्म तथा शरीरमें दुर्गन्धका होना एवं धर्मप्रसन्नसे उस पापका निवारण होकर स्वर्ग एवं उच्चकुलमें जन्मका फल बतलाया है।
हरिवंशकृत वट्टकथाकोष (५९, १२१ ई०), तथा श्रीचन्द्रकृत प्रभावक कथाकोष (संधि १९-२०, लगभग १०६० ई०) में एक और कथा है अशोक रोहिणीकी, जिसके अनुसार हस्तिनापुरके समीप गोणीगिरि पर्वतकी शिलापर मुनिराज यशोवीर बतायण योग करते थे। उनके प्रभावसे वहाँ मृगचारी नामक व्याधकी कोई शिकार नहीं मिल पाता था। इससे रुष्ट होकर उसने जब मुनिराज मिलनको गये थे, तब उस शिलाकी अग्नि जलाकर मुख गत कर दिया। मुनिराजने जाकर उसी शिलापर जाकर भावसे समाधिमरण किया। इस पापके फलसे उस व्याधको कुष्ठ रोग हो गया, और वह बसंत बेसासे सातवें दिन मरकर नरक गया। वहाँसे निकलकर नाना नीच योनियोंमें भ्रमण करता हुआ वह जीव पुनः मनुष्य योनिमें आया, और गोपालके रूपमें उसी गोणीगिरिके दामनमें जाकर जन्म हुआ।
हस्तिनापुरमें सेठ धर्मविभवके पुत्रिका नामक एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसकी उग्र दुर्गन्धके कारण कोई उससे विवाह नहीं करता था। संयोगवश उसी नगरके सेठ धनुर्मित्रका पुत्र श्रीयोग बड़ा दुराचारी था। एक बार वह चोरोंके अपराधमें पकड़ा गया। धनमित्रने उसे इस शर्तपर राजासे प्रार्थना कर छुड़वा
परिभाषा
जो कि वह उसकी दस पूर्वभवा में विशेषता विचार करें। किन्तु विवाहित परवात्तु ही वह उसकी पूर्वभवों न सह सकनेके कारण भाग गया। पूर्वभवोंके दिन पुनः दुःखसे बीतने लगे।
एक बार सुदत्ता आजीविका पनचोरके घर आदमखोरों आयी। पूर्वभवाने भक्तिसे आहार-दान दिया। नवममें पूर्वभवमें आया। पूर्वभवा भी पूर्वभवोंको वस्त्रों को गयी। पूर्वभव उसने पूर्वभवका कारण बताया कि पूर्वभवमें वह फिरिनगरके भेद गंधसत्त्वको विलुप्तकी नामक मार्ग थी। एक बार सेठ-सेठानी दोनों राजाके ग्राम बन-महावीरको जा रहे थे कि समाधिगत नामक मुनि अंतर निर्मित बातें दिखाई दिये। सेठने अपनी पत्नीको उन्हें आहार करनेके लिए वापस भेजा। सेठानीने कहा हो। मुनिराजको कष्टों सुखीका आहार कराया। उसकी वेलासे मुनिका स्वर्गवास हो गया। राजाको जब वह समाचार मिला तो उन्होंने उसे निरंतरपूर्वक नगरसे निकाल दिया। उसे कुछ उपाधि हो गयी, और वह सात दिनके भीतर मर गयी। वह नरकमें तथा कुत्ती, शूकरी, मृगावती, हाथी आदि नीच योनियोंमें जन्म लेकर अन्ततः तू अब पूर्वभवमें जन्ममें उत्पन्न हुई है।
अपने पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर मुनिराजको बड़ी आत्माहानि हुई, और उसने मुनिराजसे पूछा कि उस पापसे उसे किस प्रकार मुक्ति मिले। मुनिराजने उसे रोहिणी-व्रतका उपदेश दिया, जिसके अनुष्ठानसे वह जगदेवकी चन्दनगरके भवा नामक राजाकी रोहिणी नामक राजकन्या हुई। अब वह यह जानती थी नहीं थी कि दुःख और शोक कैसा होता है।
राजकन्या रोहिणीके पति अशोकका भी पूर्वभव मुनिराजने सुनाया। कनकपुरमें सोमभूति मुनि सोमशर्मा और सोमदत्त थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् सोमदत्त राजपुरोहित हुआ, जिसके कारण उसका ज्येष्ठ भ्राता सोमशर्मा उससे द्वेष करने लगा। उसके दुराचारको बातें सोमदत्तको वैराग्य हो गया, और वह मुनि हो गया। जब सोमशर्मा राजपुरोहित हुआ। एक बार जब राजा सोमशर्मा विन्ध्य-यात्रापर जा रहे थे तब उन्हें सम्मुख सोमदत्त मुनिने दर्शन हुए। इसे सोमशर्माने अवकुठन बताकर, मुनिका मख डालनेकी सलाह दी। किन्तु राजाने अन्य ज्योतिषियोंसे यह जानकारी प्राप्त की कि मुनिका दर्शन अपशकुन नहीं किन्तु बड़ा शुभ शकुन माना गया है, जिससे कार्यमें अवश्य सफलता प्राप्त होती है। हुआ भी ऐसा ही। तथापि सोमशर्माने द्वेषवश गुप्त रूपसे मुनिका घात कर दिया। यह जानकर राजाने उसे दण्डित किया। सातवें दिन उसे कुछ उपाधि हो गयी। दुःखसे मरकर उसने अनेक बार नरकमें तथा मत्स्य, सिंह, सर्प, भ्यान आदि क्रूर पशुयोनि जन्म लेकर अन्ततः सिंहपुरके राजा सिंहकेतुका पूर्वभवी दारुक पुत्र हुआ। एक बार मुनिराजसे पूर्वभवमें पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर उसे धार्मिक बोध उत्पन्न हो गयी, और रोहिणी व्रतके प्रभावसे वह उस मुनि-दिव्याके पापसे मुक्त होकर अशोक कुमार उत्पन्न हुआ। पुण्यव्रत कथाकोष (३६-३७) में भी यह कथानक आया है, और वह भी इसी कथाकोषपर आधारित प्रतीत होता है।
कथावाचकने अन्तर्गात रोहिणी बहिनके उपर्युक्त दोनों उपाख्यानोंमें मुनि-घातके पापसे क्रुद्ध रोमकी उत्पत्ति, नरक-गति, नीच योनियोंमें परिभ्रमण, और अन्ततः धार्मिक आचरण-द्वारा उस पापका परिमार्जन, मुक्ति और मोक्षकी प्राप्तिके उदाहरण उपस्थित किये गये हैं। उपर्युक्त समस्त कथानकके मिलानसे इस बातमें सन्देह नहीं रहता कि प्रस्तुत गुणभद्रमयकी कथाका सबसे निकटवर्ती आधार रोहिणीका पूर्वभव-वृत्तान्त ही है।
प्रस्तुत सभी कथानकमें मुनिहत्या या निरादरके पापसे कुष्ठव्याधि व दुर्गतिस शरीरकी उत्पत्तिके अतिरिक्त दूसरा प्रबल तत्त्व है, नीच योनियोंकी दीर्घ परम्परा। महाभारतके मत्स्याख्यान-सम्बन्धी आख्यानमें यह परम्परा दूसरे जन्मसे जाने नहीं बढ़ी। किन्तु विष्णुपुराण (३,१८) में एक ऐसा आख्यान भी आया है, जिसमें नीच योनियोंको एक लम्बी श्रृंखला, दिखलायी गयी है। एक समय राजा सत्यव्रत और उनकी रानी दीक्षा मंगलमें स्नान करके निकले थे व कि उन्हें अपने सम्मुख एक पाषाणके दर्शन हुए, जो राजाके
प्रस्तावना
चतुर्थी आचारिका मित्र था। जनः राजाने उससे गौरवपूर्ण निबन्ध व्यवहार किया। इस पापके फलसे वह मरकर क्रमशः मृगाल, वृक, गृध्र, श्याल व मयूर हुआ। प्रत्येक जन्ममें उसको पतिव्रता पत्नीने उसके पूर्व-जन्माका स्मरण कराया, जिससे पापकोके साथ सद्भावका घोर पाप क्रमशः हीन होते-होते वह मयूरके जन्ममें राजा जनकके अश्वमेध यज्ञमें जा पहुँचा। उन्होंने यज्ञानुष्ठानसम्बन्धी अनुभवसमाके समय उसे भी स्नान कराया, जिसके पुण्यसे वह अगले जन्ममें स्वयं राजा जनकका पुत्र हुआ।
वैदिक परम्पराके पुराणोंमें विष्णुपुराण अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन माना जाता है; अतः महाभारतके समान इस पुराणके वृत्तान्तका प्रभाव भी पूर्वोक्त जैन-आख्यानोंपर पड़ा हो तो आश्चर्य नहीं।
कथाका उत्तर भाग
प्रस्तुत सुधर्मस्वामीकी कथाका दूसरा भाग, जो दूसरी समिष्टिमें वर्णित है, अपनी मौलिकता और रोष-कथाकी दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। सुधर्मस्वामीके पूर्वके पूर्वजन्ममें अपने अगले जन्ममें रत्नपुरके सेठ जिनदत्तकी रूपवती पुत्री निलकण्ठी हुई। किन्तु उसका पूर्वकृत कुछ पापकर्मी भी मोचनेको शेष रहा था। जनः जन्मके कुछ ही दिन उपरान्त उसको कुष्ठका रोग हो गया। पिताने बहुत इलाज किया, और उससे भी एक कन्या उत्पन्न हुई तेजमती। सोतकी भी अपनी पुत्रीको बहुत प्यार करती, और निलकण्ठीसे उतना ही द्वेष। इस कारण इन कन्याका जीवन बड़े दुःखसे व्यतीत होने लगा। दुराचारका भाई और पिता भी कन्याओंके विवाहको चिन्ता हुई। किन्तु सभी समय उन्हें वहाँके नरेश कनकप्रभका आदेश मिला कि वे रत्नोंको खरीदकर लिए देवान्तर जाएँ। जाते समय सेठ पत्नीसे कह गया कि सुयोग्य वर देखकर दोनों कन्याओंका विवाह कर देना। जो वर आले वे निलकण्ठीके ऊपर मृग होकर, उसीकी याचना करें। किन्तु सेठानी उनकी बुराई कर अपनी पुत्रीको ही भली करती, और उसीकी प्रशंसा करती। जो भी वरके हटने विवाह निलकण्ठीका ही पन्नग करा पड़ा। विवाहके दिन सेठानी निलकण्ठीको यह कहकर श्मशान में भेजा कि उनमें कि कुल-अमानके अनुसार उसका वर वहाँ आकर उससे विवाह करेगा। किन्तु पर आकर उसने यह हल्ला मचा दिया कि निलकण्ठी कहीं भाग गयी। उनकी बेका तक उनका पता न चल सकनेके कारण मरका विवाह तेजमतीके साथ कराना पड़ा। इस प्रकार कनकराज-द्वारा सेठानीने अपनी इच्छा पूरी की।
डॉ० हीरालाल जैन, एम० ए०, डी० लिट्०
प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष
संस्कृत, पाली व प्राकृत, इन्स्टीट्यूट ऑव लेंग्वेजेज एण्ड रिसर्च जबलपुर विश्वविद्यालय ( म० प्र० )
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
वीर नि० सं० २४९२
वि० सं० २०२१, सन् १९६६
प्रथम संस्करण
ग्यारह रुपये
विषयानुक्रमणिका
मार्गदर्शक — आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज General Editorial by Dr. A. N. Upadhye. प्रस्तावना
१. आदर्श प्रतियों का परिचय २. कवि परिचय और रचना काल
३. कथा का मौलिक आधार और विकास ४. कथाका उत्तर भाग
५. फ्रेंच और जर्मन कथाओंसे तुलना ६. कथाका उत्तरकालीन प्रभाव ७. सुगन्धदशमी कथा : संस्कृत ८. सुगन्धदशमी कथा : गुजराती ९. सुगन्धदशमी कथा : मराठी
१२. अपभ्रंश कथाका विषयानुक्रम । मूल पाठ
४. मराठी
५. हिन्दी
परिशिष्ट
१. मत्स्यगन्धा कथा—महाभारत से २. नागश्री सुकुमालिका कथा—णायाधम्मकहाओ से संकलित ३. श्रावकसुता कथानक—श्रावकप्रज्ञप्ति टीकासे ४. लक्ष्मीमती कथानक—हरिवंशपुराण से १-२३
१-७६
प्राक्कथन
यों तो सुगन्धदशमी कथाको मैं अपने बचपनसे सुनता आया हूँ, क्योंकि इसका पाठ पर्यूषण पर्वमे भाद्रपद शुक्ल १०वींको नियमित रूपसे जैन मन्दिरोंमें किया जाता रहा है। तथापि इसकी ओर साहित्यिक दृष्टिसे मेरी विशेष रुचि तब जागृत हुई जब सन् १९२४ में मेरे प्रिय मित्र स्वर्गीय कामताप्रसादजीने जसवन्त- नगरके शास्त्र भण्डारका एक हस्तलिखित ग्रन्थ भेजा, जिसमें अनेक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश कथाओंके बीच सुगन्वदशमी कथा (अपभ्रंश) भी संगृहीत थो। मैंने उक्त ग्रन्थका कुछ परिचय तभी अलाहाबाद यूनिवर्सिटी जनरल, खण्ड १, में प्रकाशित अपने ‘अपभ्रंश लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया था। तभी मैंने इस कथाकी प्रतिलिपि करके अपने पास भी रख लो थी। किन्तु अन्य संशोधन कार्योंमें व्यस्त हो जानेसे मेरी दृष्टि इस रचनापर-से उड़ गयी । सन् १९५४ में उस समय संस्कृत एम० ए० के विद्यार्थी और अब डॉ० विद्याधर जोहरापुरकर, प्राध्यापक मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग, ने मुझे इस कथाकी जिनसागरकृत मराठी रूपान्तरको वह प्रति लिटलागी जो रंगीन चित्रासे युक्त और नागपुर सेनगण भण्डारकी है। इसके साथ ही उन्होंने पुरानी गुजरातीकी रचनाको भी प्रतिलिपि मुझे दी और इन दोनों रचनाओंका परिचय भी लिखकर दिया । इसको देखकर मुझे अपभ्रंश रूपका ध्यान आया और साथ ही अपने बचपनमें पढ़ी अँगरेजीको सिड्रेला शीर्षक कथाका भो स्मरण हुआ । उसी बोच्च में वैशाली प्राकृत जैन रिसर्च इंस्टीट्यूटको स्थापना हेतु बिहार राज्यमें चला गया । सन् १९५५ में जो ओरियण्टल कान्फरेंसका अधिवेशन अन्नमलाई विश्वविद्यालय, चिदाम्बरम्मे हुआ, उसमें मैंने इस कथाका व उक्त चित्रित प्रतिका परिचय अपने ‘पैराललिजिम ऑव टेल्स बिट्वीन अपभ्रंश एण्ड वेस्टर्न लिटरेचर’ शीर्षक लेखमें दिया, जिससे विद्वानोंकी इस ओर विशेष रुचि जागृत हुई, और वे इसके प्रकाशनके लिए उत्सुकता प्रकट करने लगे। तब मैंने इस ओर विशेष ध्यान दिया, एवं संस्कृत और हिन्दीकी कथाओंको भी खोजकर प्रस्तुत संस्करण तैयार किया। भारतीय ज्ञानपीठकी मूतिदेवी ग्रन्थमालामे इसके प्रकाशनका प्रस्ताद भी शोघ्र स्वीकृत हो गया, तथा मूल रचनाओं व अनुवादोंके मुद्रणमें बहुत समय भी नहीं लगा। किन्तु मेरी इच्छा थी कि मराठी प्रतिके समस्त चित्रोंकी छाया भी इसके साथ प्रकाशित की जाये । इस कार्यमे बड़ा विलम्ब लगा और अनेक विघ्न बाधाएँ व चढ़ाव-उत्तार आये। उन सबको पार कर जिस रूपमें अब यह ग्रन्थ पाठकोंके हाथ पहुँच रहा है, आशा है उससे सभीको सन्तोष होगा ।
उक्त शास्त्र भण्डारों, विद्वानों एवं भारतीय ज्ञानपोठके अधिकारियोंके ही सहयोगसे यह कृति इस रूपमें प्रकट हो सकी है, अतएव मैं उनका हृदयसे अनुगृहीत हूँ। सिघई प्रेस, जबलपुरके मालिक श्री अमृत- लालजीने चित्रोंके ब्लाक बनवाने और उनका मुद्रण करानेमे विशेष रुचि दिखलायी अतः मैं उनका बड़ा उप- कार मानता हूँ। विद्वद्वर डॉ० वासुदेवशरण अग्रवालसे मैने प्रार्थना की कि वे इन चित्रोंका परिचय लिखवा देनेकी कृपा करें। उनके स्वास्थ्यको देखते हुए मुझे भय था कि वे कदाचित् इस भारको स्वीकार न कर सकें, किन्तु मुझे बड़ा हर्ष और सन्तोष है कि उन्होंने इसे तत्काल स्वीकार कर लिया और शीघ्र ही डॉ० गोकुल- चन्द्र जैनको चित्र-परिचय लिखवा दिया। इस कृपाके लिए मैं उनका बड़ा आभारी हूँ।
- होरालाल जैन
प्रस्तावना
१. आदर्श प्रतियोंका परिचय ( अपभ्रंश )
(२) यह प्रति भी एक कथाकोशके अन्तर्गत उसके प्रथम १३ पत्रोंमें पायी गयी । इस कथाकोशकी कुल पत्र-संख्या १९४ है । प्रथम पत्र अप्राप्य है । अन्तिम पत्रपर निर्देश है—
वर-वय-कहाकोसु सुपवित्तउ विरियड विबुहराइणा ।
सोहिउ हरिसकित्ति सुणिणा पुणु सुललियगिरपवाहिणा ॥
इससे इस संकलनका नाम ‘व्रतकथा कोश’ पाया जाता है और यह भी ज्ञात हो जाता है कि उसके संग्रहकार विबुधराय थे और उनकी रचनाका संशोधन हर्षकीति मुनिने किया था । अन्तमें संवत् १६७६ का भी निर्देश है जो सम्भवतः प्रस्तुत प्रतिका लेखनकाल है । इस ग्रन्थके पत्रोंका आकार ११ × ४।। इंच है, प्रति पृष्ठ ९ पंक्तियाँ हैं, चारों ओर लगभग एक इंचका हासिया है, और बोचमें भो स्वस्तिकाकार स्थान छूटा हुआ है । यह प्रति सम्पादकके संग्रहमें है ।
(३) यह भी ९॥ × ४ इंच आकारका एक कथाकोश है, जिसको पत्र-संख्या १५२ है । किन्तु
प्रथम एक तथा अन्तके अज्ञात संख्यक पत्र एवं बोच-बोचके अनेक पत्र अप्राप्य है, जिससे वर्तमान पत्रोंकी कुल संख्या केवल ६७ रह गयी है । सुगन्धदशमी कथाका प्रारम्भ पत्र २६ पर हुआ, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है । २७वें पत्रपर मुद्रित प्रतिके १, १, ३ के ‘मणहरु’ शब्दसे पाठ प्रारम्भ होकर पत्र २९ के अन्तमें ‘तं जायवि भायई’ (तं जाएवि भावई १, ४, १७) तक अविच्छिन्न गया है और फिर ३०-३४ पत्र अप्राप्त होनेसे ३५वें पत्रपर ‘ण एण बंधु’, (१, १०, २) से पुनः प्रारम्भ होता है, और पत्र ३८ पर ‘इम चितेवि पुणु’ (२, २, ६) तक जाता है । आगे ३९-४४ पत्र अप्राप्त है । ४५वें पत्रपर ‘हमि सुअंधणेण’ (२, ७, १०) से ‘कम्मु डहेतइ’ (२, ८, १३) तक जाकर पुनः विच्छिन्न हो जाता है । रचनाकी समाप्ति अगले पत्र ४६ पर हुई होगी, किन्तु वह पत्र अप्राप्त है । प्राचीन ग्रन्थोंको यह दुर्दशा देखकर बड़ा दुःख होता है ।
(४) यह सुगन्धदशमी कथाकी एक स्वतन्त्र प्रति है, जो पत्र १ पर ‘।। दा ।। ऊ शोषय णमाः ।। सुगन्धदसमी कथा ।। ॥ जिण चउवीस नवेष्पिणु ।।’ इत्यादि रूपसे प्रारम्भ होकर पत्र ११ पर ‘तहि णिवासु महू दिज्जउ ।। ९ ।। छ ।। इति सुगन्धदसमी कथा समाप्त ।।’ इस प्रकार समाप्त होती है । पत्रोंका आकार १३ × ७ इंच है, प्रतिपत्र १२ पंक्तियाँ है । यह प्रति कालकी अपेक्षा पूर्वोक्त तीनों कथाकोशोंसे पश्चात्कालीन है ।
इन प्रतियोंके पाठान्तर अंकित नहीं किये गये, क्योंकि उनमें सच्चे पाठान्तर पाये ही नहीं जाते । पाठभेद प्रायः चरण, शब्द, अक्षर व मात्राओंके छूट जाने, मात्राओंमें ‘ए’ और ‘रेफ’ तथा ‘ओ’ और ‘उ’ के व्यत्यय तथा ण और न के प्रयोगको अनियमितता सम्बन्धी मात्र दिखाई दिये ।
सुगंधदशमी कथा
कथा-रचना—अपभ्रंश सुगन्धदशमी कथामें कुल दो सन्धियाँ हैं। प्रथम सन्धिमें कडवकोंकी संख्या १२ है, और दूसरी सन्धिमें ९। प्रत्येक कडवकमें पंक्तियोंकी संख्या औसतन १७ है। सबसे कम पंक्तियाँ १, २ में हैं, जिनकी संख्या ११ है, और सबसे अधिक ३२ पंक्तियाँ २, २ में हैं। समस्त इक्कीसों कडवकोंकी कुल पंक्ति-संख्या ३६४ है।
कडवकोंकी रचना प्रायः पद्धडिया और अलिल्लह छन्दोंमें हुई है, जिनमें प्रत्येक चरणमें १६ मात्राएँ होती हैं, किन्तु एकके अन्तमें जगण (लघु, गुरु, लघु) आता है, और दूसरेके अन्तमें दो लघु मात्राएँ। इन दोनों छन्दोंका इस रचनामें प्रायः मिश्रण पाया जाता है। जैसे, प्रथम कडबककी ३-४ पंक्तियोंमें अलिल्लह और शेषमें पञ्झटिका या पद्धडियाका प्रयोग है। किन्तु दूसरा कडवक पूरा अलिल्लहमें है, व तीसरा-चौथा पञ्झटिकामें। जहाँ मात्राएँ तो १६ ही हों, किन्तु इन दोनों छन्दोंके चरणान्त मात्राओंका नियम नहीं पाया जाता, वहाँ छन्द पादाकुलक कहलाता है। जैसे २, ७ को प्रथम दो पंक्तियाँ जहाँ चरणात्तमें गुरु मात्रा दिखाई देतो है। कडवक १, ५ में दीपक छन्दका प्रयोग है, जहाँ दस मात्राएँ हैं व अन्तमें लघु। प्रत्येक कडवकके अन्तमें जो घत्ता कहा जाता है, यह सामान्य अपभ्रंश काव्यकी रीतिसे सन्धि-भरमें एक-सा ही रहना चाहिए, किन्तु यहाँ इस नियमका पालन नहीं पाया जाता।
कवि परिचय और रचना-काल
अपभ्रंश सुगन्धदशमी कथामें उसके कत्र्ताने कुछ आत्मनिवेदन रचनाके अन्तमें (२,९,७-११) में किया है। इसके अनुसार वे अपने कुलरूपी आकाशको उद्योतित करनेवाले-उदयचन्द्र नामधारी-पे, और उनकी भार्याका नाम देमतिय या देवमती था। उन्होंने इस कथाको गाकर सुनाया था, जिस प्रकार कि उन्होंने जसहर और णायकुमारके चरित्रोंको भी मनोहर भाषामें सुनाया था। सम्भव है उन्होंने स्वयं इन चरित्रोंकी भी रचना की हो। इसके अतिरिक्त इस रचनामें हमें कविके विषयमें और कोई वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता।
किन्तु उदयचन्द्रका नाम हमें इस प्रकारकी अन्य भी कुछ व्रतकथाओंमें उपलब्ध होता है। उदाहरणार्थ-
१-विनयचन्द्र मुनि कृत ‘णिज्झर पंचमी कहा’ के आदिमें उदयचन्द्र गुरु और बाल (बालचन्द्र मुनि) का स्मरण किया गया है-
पणविवि पंच महागुरु सारद धरिवि मणि।
उदयचंदु गुरु सुमरिवि बंदिय बालमुणि॥
विणयचंदु फलु अक्खइ णिज्झरपंचमिहिं।
णिसुणहु धम्मकहाणउ कहिउ जिणागमहिं॥
इसी ग्रन्थके अन्तमें यह भी व्यक्त किया गया है कि इस रासके रचयिता माथुर संघके मुनि विनयचन्द्र थे, और उन्होंने इसकी रचना त्रिभुवनगिरिकी तलहटीमें को थी।
तिहुयणगिरि तलहट्टी इहु रासउ रइड।
माधुरसंघहं सुणिवरु-विणयचंदिं कहिउ॥
विनयचन्द्र मुनि कृत एक ‘नरग उतारी कहा’ भी है, जिसके आदिमें भी उन्होंने उदयचन्द्र गुरु और बालचन्द्र मुनिका स्मरण तथा नमन किया है। यथा-
उदयचंदु गुणगणहरु गरुवउ।
सो मई भावें मणि अणुसरियउ॥
बालइंदु सुणि णविवि णिरंतरु।
णरगउतारी कहमि कहंतरु॥
प्रस्तावना
इस रासके अन्तमे उन्होंने यमुना नदीके तटपर बसे हुए महावन नामक नगरके जिन-मन्दिरको अपना रचना स्थल प्रकट किया है । यथा—
अमियसरीसउ जवणजलु ।
णयरु महावणु सग्गु ।।
तहिं जिणनवणि वसंतइण ।
विरइङ रासु समग्गु ।।
विनयचन्द्रमुनिकी एक तीसरी रचना ‘चूनडी’ भी है, जिसमें उन्होंने माथुरसंघके मुनि उदय ( उदय- चन्द्र ) तथा बालचन्द्रको नमस्कार किया है, तथा त्रिभुवनगिरि नगरके अजयनरेन्द्र कृत राजविहारको अपनी रचनाका स्थान बतलाया है । यथा—
माथुरसंघहं उदयमुणीसरु ।
पगविवि बालइंदु गुरु गणहरु ।।
जंपइ विणयमयंकु मुणि ।
तिहुयणगिरिपुरु जगि विक्सायउ ।
सग्गखंडु णं धरयलि आयउ ।।
तहिं णिवसंतें मुणिवरें अजयणरिंदहो राजविहारहिं ।
वेगें विरइय चूनडिय सोहहु सुणिवर जे सुय धारहिं ।।
पूर्वोक्त समस्त उल्लेखोंपर विचार कर यह प्रतीत होता है कि—
१. अपभ्रंश सुगन्धदशमी कथाके कर्त्ता वे ही उदयचन्द्र हैं जिनका विनयचन्द्र मुनिने अपनी अनेक रचनाओंमें गुरु कहकर स्मरण किया है ।
२. सुगन्धदशमी कथाकी रचनाके समय कविवर उदयचन्द्र गृहस्थ थे और उन्होंने अपनी पत्नी देवमतोका भी उल्लेख किया है । यही कारण है कि विनयचन्द्र मुनिने अपनी दो रचनाओंमें उनका गुरु रूपसे स्मरण तो किया है, क्योंकि वे उनके विद्यागुरु थे; किन्तु उन्हें नमस्कार नहीं किया, क्योंकि मुनिका गृहस्थको नमस्कार करना अनुचित है । विनयचन्द्रके दीक्षागुरु मुनि बालचन्द्र थे, और उन्हें उन्होंने सर्वत्र नमस्कार किया है ।
३. कविवर उदयचन्द्र बादमें दीक्षा लेकर मुनि हो गये । इसी घटनाके पश्चात् विनयचन्द्रने अपनी ‘चूनडी’ नामक रचनामें उन्हें मुनीश्वर भी कहा है, और अपने दीक्षागुरु बालचन्द्र मुनिके साथ उन्हें भी प्रणाम किया है । तथापि यह ध्यान देने योग्य बात है कि उन्होंने विद्यागुरुके नाते उदयचन्द्रजीका सर्वत्र आदिमें उल्लेख किया है, और दीक्षागुरु बालचन्द्रका पश्चात् ।
(त्रिभुवनगिरि) में रचित कहा है। सौभाग्यसे ये दोनों स्थान पहचान लिये गये हैं। महावन तो मथुराके निकट यमुना नदीके उस पार बसा हुआ है, और वह उत्तरप्रदेशके नकशोंमें अब भी देखा जा सकता है। कविने इस नगरको स्वर्ग कहा है, जिससे उसकी उन दिनोंकी महत्ता प्रकट होती है। तिहृयणगिरि आज- कलका तिहनगढ़ (थनगढ़ या यनगिर) है, जो मथुरा या महाबनसे दक्षिण-पश्चिमकी ओर लगभग साठ मील दूर राजस्थानके पुराने करौली राज्य व भरतपुर राज्यमें पड़ता है। इस प्रकार इन ग्रन्थकारोंका निवास व विहारका प्रदेश मथुरा जिला और भरतपुर राज्यका भूमिभाग कहा जा सकता है।
६. उक्त समस्त रचनाओंमें उनके रचनाकालका निर्देश नहीं पाया जाता। सौभाग्यसे विनयचन्द्र मुनिने अपनी ‘चूनडी’ नामक रचनामें एक ऐसा संकेत दिया है, जिससे इनके रचनाकालका अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि ‘चूनडी’ की रचना उन्होंने तिहृयणगिरिमें अजयनरेन्द्रके राजविहारमें रहते हुए की थी। ऊपर हम देख ही चुके हैं कि यह तिहृयणगिरि आजकलका तिहनगढ़ है। इसके पूर्व इतिहासका पता लगानेपर हमारी दृष्टि बहाँके मध्यकालीन यदुवंशी राजाओंपर जाती है। भाटोंके ज्ञातों व उत्कीर्ण लेखोंपर-से पता चलता है कि भरतपुर राज्य व मथुरा जिलाके भूमि-प्रदेशपर एक समय यदुवंशी राजाओंका राज्य था, जिसकी राजधानी श्रीपथ (आधुनिक बयाना, राजस्थान) थी। यहाँ ग्यारहवीं शतीके पूर्वार्धमें जैतपाल नामक राजा हुए। उनके उत्तराधिकारी विजयपाल थे, जिनका उल्लेख विजय नामसे बयानाके सन् १०४४ के उत्कीर्ण लेखमें भी पाया गया है। इनके उत्तराधिकारी हुए त्रिभुवनपाल (तिहनपाल) जिन्होंने बयानासे १४ मील दूर तिहनगढ़ (तिहनगढ़) का किला बनवाया। इस वंशके अजयपाल नामक राजाकी एक उत्कीर्ण प्रशस्ति महावनसे मिली है, जिसके अनुसार सन् ११५० ई० में उनका राज्य प्रवर्तमान था। इनके उत्तराधिकारी हरिपालका भी सन् ११७० का एक उत्कीर्ण लेख महावनसे मिला है। भरतपुर राज्यके अधपुर नामक स्थानसे भी एक मूर्ति मिली है, जिसके सन् ११९२ में उत्कीर्ण लेखमें सहनपाल नरेशका उल्लेख है। इनके उत्तराधिकारी कुमारपाल (कुँवरपाल) थे, जिनका उल्लेख मुसलमानो तवारीख ताजुल मन्नासिरमें भी मिलता है, और वहाँ कहा गया है कि इनके समय तिहनगढ़ या थनगढ़पर सन् ११९६ ई० में मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गोरीने आक्रमण कर वहाँके राय कुँवरपालको परास्त किया और वह दुर्ग बहाउद्दीन तुघरिलको सौंप दिया। कुँवरपालके उत्तराधिकारी अनंगपाल, पृथ्वीपाल व त्रिलोकपालके नाम पाये जाते हैं। किन्तु सम्भवतः इतिहासातीत कालसे प्रसिद्ध शूरसेन प्रदेश व मथुराके बासुदेव और कृष्णके नामोंसे सुप्रसिद्ध यदुवंशकी राज्यपरम्परा बारहवीं शती तक आकर मुसलमानो आक्रमणकारियोंके हाथों समाप्त हो गयी।
यहाँ प्रस्तुतोपयोगी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सुगन्धदशमी कथाके वर्ता उदयचन्द्रके शिष्य विनयचन्द्रने जिस त्रिभुवनगिरि (तिहनगढ़) में अपनी उक्त दो रचनाएँ पूरी की थीं, उसका निर्माण इस यदुवंशके राजा त्रिभुवनपाल (तिहनपाल) ने अपने नामसे सन् १०४४ के कुछ काल पश्चात् कराया था। तथा अजयनरेन्द्रके जिस राजबिहारमें रहकर उन्होंने ‘चूनडी’ की रचना की थी, वह निस्सन्देह उन्हीं अजयपाल नरेश-द्वारा बनवाया गया होगा, जिनका सन् ११५० का उत्कीर्ण लेख महावनसे मिला है। सन् ११९६ में त्रिभुवनगिरि उक्त यदुवंशी राजाओंके हाथसे निकलकर मुसलमानोंके हाथोंमें चला गया। अतएव त्रिभुवनगिरिके लिखे गये उक्त दोनों ग्रन्थोंका रचना-काल लगभग सन् ११५० और ११९६ के बीच अनुमान किया जा सकता है। और चूँकि ‘चूनडी’ की रचनाके समय उदयचन्द्र मुनि हो चुके थे, किन्तु सुगन्धदशमीको रचनाके समय वे गृहस्थ थे, अतः सुगन्वदशमीका रचनाकाल लगभग ११५० ई० माना जा सकता है।
३. कथाका मौलिक आधार और विकास
यह बात सुज्ञात और सर्व-सम्मत है कि जीवमात्र अपने सुख-साधनका और दुःखके निवारणका प्रयत्न करता है। कहा है-
प्रस्तावना
“जे त्रिभुवन में जीव अनन्त । सुख चाहें दुख तैं मयवन्त ॥” ( दौलतराम : छहढाला )
सुखलिप्साकी इसी चेतनासे प्रेरित होकर मनुष्यने एक ओर कर्मशीलताका विकास किया, जिसके द्वारा उसने घर-द्वार निर्माण, अन्न-पान-संचय, वस्त्राभूषण, औषधि-उपचार आदि सम्बन्धी नाना प्रणालियों- का आविष्कार किया । दूसरी ओर उसने यह भी देखा कि उसके कार्य-क्षेत्रके परे कुछ ऐसी भी प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जैसे अग्नि, वर्षा, वायु, सूर्य आदि जो कभी अनुकूल होकर उसके सुखमें वृद्धि करती हैं, 'और कभी प्रतिकूल होकर उसकी उपर्युक्त सुख-सामग्रीको नष्ट-भ्रष्ट कर डालती हैं । उसने इसे अनुभवगम्य मनुष्य-स्वभावके आधारपर उन दिव्य शक्तियोंके रोष-तोषका परिणाम समझा । यह समझदारी प्राप्त होते ही उसने उन शक्तियोंको अपनी अर्चा-स्तुति-द्वारा प्रसन्न करने और अपने हितोंके अनुकूल बनानेका प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया । यह स्थिति हम भारतीय प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेदकी ऋचाओंमें प्रतिबिम्बित पाते हैं जहाँ यजमान स्पष्ट ही कहता है कि "मैं अग्निका आह्वान करता हूँ, अपने कल्याणके लिए; रात्रि जगत्- भरको विश्राम देती है, इसलिए मैं उसका भी स्वागत करता हूँ; और सविताको बुलाता हूँ कि वह मेरा परित्राण करे । (ऋग्वेद, १, ३५, १) इसी प्रकार इन्द्रसे गायों, घोड़ों, धन तथा योद्धाओंकी रक्षा करने- को (१, ४ आदि), वरुणसे पाससे बचाने व पूर्णायु प्रदान करने तथा अपना क्रोध दूर करनेकी (१, २४); मरुत्से बल-वृद्धि, शत्रु-दमन तथा यमके मार्गसे बचानेकी (१, ३७-३९); तथा ब्रह्मणस्पतिसे बल, अश्व, बलवान् शत्रुके विनाश आदि (१, ४०) की प्रार्थनाएँ की गयीं है, और इन्हीं गुणोंके कारण उन्हें स्तुत्य, पूज्य तथा आह्वान करने योग्य माना गया है ।
क्रमशः रोष-तोषके कारण भक्तोंका अनिष्ट व इष्ट सम्पादन करनेका सामर्थ्य उन देवताओंके पार्थिव प्रतिनिधि ऋषियोंमें भी आया । यह क्रान्ति हमें विशेष रूपसे महाभारत व रामायण तथा अन्य पौराणिक साहित्यमें दृष्टिगोचर होती है । इतना ही नहीं, किन्तु ऋषियोंमें यह शक्ति भी मानी गयी है कि वे रुष्ट होकर शाप-द्वारा मनुष्यको अधोगति को पहुँचा सकते हैं, और प्रसन्न होकर शापके निवारण व मनुष्यके उत्थानका भी उपाय बतला सकते हैं । कपिल मुनिने रुष्ट होकर सम्राट् सगरके साठ सहस्र पुत्रोंको भस्म कर दिया और फिर प्रसन्न होकर गंगाजल-द्वारा उनके उद्धारका भी उपाय बतला दिया ( रामायण १, ४० आदि ) । शुक्राचार्यके शापसे सम्राट् ययाति युवावस्थामें ही वृद्ध हो गये, किन्तु उन्होंके अनुग्रहसे उन्होंने अपने बेटे पुरुका यौवन प्राप्त कर लिया ( महाभारत १, ७८ ) । ऋषियोंका यह सामर्थ्य इतना भी बढ़ा कि वे स्वयं देवताओंको भी शाप देकर मनुष्यादि योनियोंमें गिराने लगे । नहुष इन्द्रपदको प्राप्त होकर भी अगस्त्य ऋषिके शापसे सर्प बनकर अमरपुरीसे गिर पड़ा (महाभारत), व गौतम ऋषिके शापसे इन्द्रदेव भी विफल (नपुंसक) हो गये ( रामायण १, ४८, २८-२९ ) ।
ऋषियोंके सामर्थ्यकी इस श्रृंखलामे महाभारतका निम्न आख्यान (परिशिष्ट १) ध्यान देने योग्य है-- अद्रिका नामकी एक प्रसिद्ध अप्सरा थी । कारणवश वह एक ब्राह्मणके कोपका भाजन बन गयी और ब्रह्मशाप-द्वारा यमुना नदीमें मछलीकी योनिमें उत्पन्न हुई । (महाभारत १, ५७, ४६) प्रसंगवश उसके उदरमें चेदि-सम्राट् बसुका वीर्य प्रविष्ट हो गया । गर्भके दसवें मासमें वह मछलो धोवरों-द्वारा पकड़ी गयी और उसके उदरसे एक स्त्री और एक पुरुष निकले । मछली तो शापमुक्त होकर पुनः अप्सरा हो गयी, और उसकी मानवी-सन्तति-रूप उन स्त्री-पुरुषोंको राजा वसुको समर्पित किया गया । वसुने पुरुषको तो मत्स्य नामसे राजा बना दिया, और कन्याको एक दासको पालन-पोषणके लिए दे दिया । बड़ी होनेपर वह कन्या अपने दास पिताकी सेवा-सहायता करने लगी । और उनकी अनुपस्थितिमें नाव चलाकर पथिकोंको नदी पार भी करने लगी ।
एक बार इस दास-कन्याको नाव-द्वारा पराशर ऋषिको नदी पार करानेका प्रसंग आया । कन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु उसके शरीरसे मत्स्यकी दुर्गन्ध निकलती थी, जिसके कारण वह मत्स्यगन्धा ६.
सुगंधदशमो कथा
भी कहलाती थी। नाव जब नदीके बोचमें पहुँची, तब ऋषि पराशर अपनी कामवासनाको न रोक सके, और उन्होंने मत्स्यगन्धासे प्रेमका प्रस्ताव किया। आसपासके समीपवर्ती ऋषियोंकी दृष्टिसे बचनेके लिए उन्होंने अपने तपोबलसे कुहरेकी सृष्टि को और कन्याको यह भो बरदान दिया कि उनसे प्रेम करनेपर भी उसका कन्याभाव नष्ट नहीं होगा। ऋषिकी इच्छा-पूर्ति करनेपर कन्याने बरदान माँगा कि उसके शरीरकी दुर्गन्ध दूर होकर उसके गात्रोंमें उत्तम सुगन्ध आ जाये । ऋषिके प्रसादसे ऐसा ही हुआ और वह मत्स्यगन्धा तभीसे गन्धवती नामसे प्रसिद्ध हुई। उसके शरीरकी सुगन्ध एक योजन तक फैलने लगी, जिससे उसका नाम योजनगन्धा भी विरूपात हुआ। वैसे इस कन्याका नाम सत्यवती था, जो आगे चलकर कौरव-नरेश शान्तनुकी साम्राज्ञी हुई। उसके ही पुत्रका राज्याभिषेक हो, इसो हेतु शान्तनुके ज्येष्ठपुत्रने अपना विवाह न करनेकी भीष्म प्रतिज्ञा धारण की और भीष्म नामसे विख्याति पायो । तथा उसीने विचित्रवीर्य नामक राजपुत्रको जन्म दिया, जिसकी सन्तानसे धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए । ( महाभारत १, ५७, ५४ आदि) । महाभारत के इस कथानकमें पाठकोंको प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाके मूलतत्त्वोंका दर्शन हुए बिना न रहेगा । ऋषिका अनिष्ट, उसके कारण कन्याके शरीरमे दुर्गन्ध व ऋषिके प्रसादसे दुर्गन्धके स्थानपर सुगन्धकी उत्पत्ति, एवं राज्यपद प्राप्ति, इन सभी बातोंमें उक्त कथानकोंका मेल बैठता है। किन्तु कुछ अन्य बातोंमें वैदिक-परम्पराके उक्त आख्यान एवं जैन-परम्पराकी सुगन्धदशमी कथा विवरणमें बहुत भेद है। वैदिक-परम्पराके ऋषि तपोबल-समृद्ध तो होते हैं, किन्तु वे न तो गार्हस्थ्यके परित्यागी होते हैं, न ब्रह्मचर्यके परिपालक, और न रागद्वेषसे रहित। निरुक्त (२, ११) के अनुसार उनकी दृष्टि तीक्ष्ण होती है, तथा वे वेदोंके मन्त्रोंका दर्शन करते हैं। (ऋषिदर्शनात् ) और भरतके अनुसार उनकी विद्वत्ता व विदग्वत्ता प्रसिद्ध है (विद्याविदग्धमतयः ऋषयः प्रसिद्धाः । तथापि वे गृहस्थ है (ऋषयो गृहमे- धिनः) । वे आश्रम बनाकर रहते हैं, गौओं व घनका दान लेते हैं, और गौओंका पालन भी करते है। शुद्ध होकर वे शाप भी देते हैं, और प्रसन्न होकर वरदान भी। किन्तु जैन-परम्पराके मुनियोंकी प्रकृति आदितः ही उनसे भिन्न रही है। स्वयं ऋग्वेदके अनुसार वे बातरशना (सम्भवतः नग्न दिगम्बर) होते हैं, उन्हें शरीरको निर्मल बनानेकी रुचि नहीं होती। वे लौकिक व्यवहारोंसे परे उन्मत्त (परमहंस) व मौन वृत्तिसे रहते हैं। वे अध्यात्मो होते हैं। लोग उनके शरीरको तो देख पाते हैं, किन्तु उनको आध्यात्मिक चेतनाको नहीं (ऋ १०,१३६) । तैत्तिरीय आरण्यक (१,२१,३,१,२६,७) के अनुसार ये बातरशना मुनि, समा- हितासः अर्थात् चित्तको एकाग्र करनेमे अप्रमादी तथा उध्र्वमन्थिनः अर्थात् बह्मचारी होते है। महाभारत ( अनुशासन पर्व ११५, ७९) के अनुसार मुनि वे ही कहे गये हैं जो मधु, मांस और मद्यका सर्वथा त्याग करते हैं; तथा गोता (२,२६) के अनुसार मुनि स्थितप्रज्ञ होते हैं, जिन्हें दुःखमें उद्वेग नहीं, सुखकी बांछा नहीं, तथा मय और क्रोषरहित होते हुए वीतराग होते हैं। वातराना मुनियोंको परम्परामें हुए भगवान् ऋषभदेव (जैनियोंके आदि तीर्थकर ) ( भागवत पुराण ५,६,२८ आदि) शरीर मात्र परिग्रह धारी थे, उन्मत्तवत् नग्न ( गगन-परिधान) अवधूत, मलिन जटाओंसहित रहते थे। पुराणमें यह भी कह दिया गया है कि ऋषभदेवका यह अवतार कैवल्यकी शिक्षा देने हेतु हुआ था ।
इन्हीं मुनियोंकी साधनाओंका अधिक विस्तारसे वर्णन महाभारत के शान्तिपर्व, अध्याय ९ में किया गया है, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर इच्छा प्रकट करते हैं कि "मैं तो अब मुनि होकर मुण्डसिर बनमें एकान्तवास करता हुआ भिक्षावृत्तिसे अपने शरीरका क्षपण करना चाहता हूँ। धूलि-धूसरित शून्यागार या वृक्षके नीचे निवास करता हुआ, तथा समस्त प्रिय और अप्रियका त्यागी होकर, शोक और हर्षसे रहित निग्दा और स्तुतिमें समभाव, कोई आशा व ममता न रखता हुआ निर्द्वन्द्व और निष्परिग्रह रहना चाहता हूँ। आत्मा में ही मेरा रमण हो, मेरा आत्मा प्रसन्न रहे, आकृति मेरो भले ही जड़, अन्ध और बधिर-जैसी हो। मैं किसी दूसरेसे कोई सलाह-सम्मति नहीं करना चाहता। अपने-अपने गुणधमोंमें स्थित चारों प्रकारके जंगम प्राणियों- के प्रति मेरा समता-भाव रहे। न में किसोको हँसी उड़ाऊँ, न कभी किसीपर भृकुटी तान्। समस्त इन्द्रियों- प्रस्तावना
को संयमित रखता हुआ मैं सदैव प्रसन्न-मुख रहूँ। न मैं किसीसे मार्ग पूछूँ, न किसीके साथ चलूँ, न किसी देशको अथवा किसी दिशामें जानेको कोई विशेष इच्छा रखूँ। कोई अपेक्षा न रखता हुआ, पीछेकी ओर न देखकर सावधानी रखता हुआ, त्रस स्थावर जीवोंको बचाता हुआ संयम भावसे सीधा गमन करूँ। वस्तु- स्वभाव आगे चलता है, क्षुधादि पीड़ाओंका प्रभाव पड़ता ही है, तथा सुख-दुःख आदि द्वन्द्व अपना विरोध छोड़ते नहीं । अतः मैं उनकी चिन्ता न करूँ। अल्प या स्वादहीन जो भी भोजन मिल आये उसीमें सन्तोष करूँ । न मिले तो भी क्षुब्ध न होऊँ । जब रसोईघरका धुआँ शान्त हो जाये, मूसल रख दिया जाय, चूल्हेमें आग भी न रहे, लोग भोजन कर चुकें, पात्रोंका संचार बन्द हो जाये व सामान्य भिक्षुक चले जायें, तब मैं दिनमें केवल एक बार दो, तीन या पाँच घरोंसे भिक्षा माँगूँ। स्नेह-बन्धनको छोड़कर मैं इस पृथ्वीपर विचरण करूँ । लाभ हो या हानि हो मैं समदर्शी रहूँ, और महातपसे विचलित न होऊँ । मेरा आचरण न तो जीनेके लिए आतुरता लिये हो, और न मरणकी इच्छासहित । जीवनका मैं अभिनन्दन न करूँ, और न मरणसे द्वेष । कोई बसूलेसे मेरा हाथ काटे और कोई मेरे शरीरपर चन्दनका लेप करे, तो भी न मैं एक- का अकल्याण सोचूँ और न दूसरेका कल्याण । जीवनमें सांसारिक अभ्युदयकी क्रियाएँ करना शक्य है, उन सबका मैं परित्याग करूँ, और पलक मारने आदि शारीरिक क्रियाओंमें सावधान रहूँ। इन्द्रियोंकी क्रियाओंमें न मैं आसक्ति रखूँ, और न प्रवृत्ति । अपने आत्मकल्याणका संकल्प कभी न छोड़ूँ, और आत्माको मलिन करनेवाले कामोंसे अपनेको बचाता रहूँ। मैं सब प्रकारके संगोंसे मुक्त रहूँ व सब बन्धनोंसे परे रहूँ, किसीके वशमें न रहूँ । आयुके समान स्वतन्त्र वृत्ति होऊ । इस प्रकार वीतराग भावसे आचरण करता हुआ मैं शाश्वत सुख-सन्तोषको प्राप्त करूँ। अभीतक तो मैंने अज्ञानके कारण तृष्णाके वशीभूत होकर महापाप किया।" मुनियोंके आचारका जो विधान जैन-शास्त्रोंमें पाया जाता है उससे उक्त बातोंका भलीभाँति समर्थन होता है।
ऋषियों और मुनियोंकी साधनाओं, प्रवृत्तियों एवं गुणधर्मोंमें उक्त भेद उन परम्पराओं-सम्बन्धी आख्यानोंमें स्वभावतः प्रतिबिम्बित हुआ है। जहाँ एक ही या एक ही प्रकारकी लोक-कथाका उपयोग धार्मिक उपदेशके लिए किया गया है, वहाँ अपनी-अपनी परम्पराओंके अनुकूल उसमें हेर-फेर भी हुआ है। महाभारतमें सत्यवतीके शरीरमें दुर्गन्ध आनेका कारण था उसकी अप्सरा माताका ब्रह्मशाप और दुर्गन्धसे मुक्ति एवं सुगन्धकी उत्पत्तिका कारण था ऋषिका वरदान । इस वरदानकी प्राप्ति किसी धार्मिक साधनाके फलस्वरूप नहीं हुई, किन्तु ऋषिकी कामवासना-तृप्ति-द्वारा उनका प्रसाद । किन्तु जैन-परम्परामें ये बातें नहीं बन सकतीं। यहाँ मुनि दुःख-सुखमें समान रूपसे समताभाव रखते हैं, और उनमें राग-द्वेषका भी अभाव होता है। अतः न तो वे शाप देते हैं, और न वरदान । जैन कर्म-सिद्धान्तके अनुसार माताके शापसे पुत्रीका शरीर दुर्गन्धित हो, यह बात भी नहीं बनती। फल प्रत्येक जीवको स्वकृत कर्मके अनुसार ही प्राप्त होता है। हाँ, मुनिजन अपने ज्ञान-द्वारा यह अवश्य विश्लेषण कर बतलानेका प्रयत्न करते हैं कि कौन-से पापकर्मका फल दुःखमय हुआ और कौन-से पुण्यकर्म-द्वारा उसका निवारण किया जा सकता है। इन सिद्धान्तोंके अनुसार शरीरमें अप्रियताकी उत्पत्तिका जो आख्यान प्राचीन जैन (आगम णायाधम्मकहा १६) में पाया जाता है वह इस प्रकार है—
चम्पा नगरीमें सोम, सोमदत्त व सोमभूति नामक धनी गृहस्थ रहते थे। उन्होंने एक बार विचार किया कि जब हमारे पास प्रचुर धन है तो क्यों न उसका भोग और दानमें सदुपयोग किया जावे । अतएव उन्होंने परस्पर आमन्त्रणों-द्वारा भोज और आमोद-प्रमोदका निर्णय किया। जब सोमकी बारी आयी तब उसकी पत्नी नागश्रीने खान-पानकी खूब तैयारी की। किन्तु जब उसने परीक्षाके लिए खूब घृत और मसालों सहित तैयार की गयी लौकीके शाकके एक बिन्दुको चखा तो उसे अत्यन्त कड़वा और विषैला पाया । तब उसने उसे अलग रखकर अन्य शाक तैयार किये व अभ्यागतोंको खूब खिलाया-पिलाया । आमोद-प्रमोदके पश्चात् सब अपने-अपने घर गये। तब वहाँ धर्मरुचि नामके मुनि आहारकी भिक्षाके लिए उपस्थित हुए । सुगंधदशमी कथा
नागश्रीने विचार किया कि उस कड़वी अलाबुका शाक जिसमें उतना घृत और मसाला पड़ा है, अन्यत्र फेंकने- की अपेक्षा इस मुनिको दे देना अच्छा। ऐसा विचार करके उसने उस समस्त शाकको मुनिके भिक्षा-पात्रमें उड़ेल दिया। उसे लेकर धर्मरुचि मुनि अपने गुरु धर्मघोषके पास आये। उन्होंने उसकी गन्धका अनुभव कर एक बिन्दुका स्वाद लिया और उसे कटु व अखाद्य जानकर मुनिको उसे एकान्तमें उचित स्थानमें डाल देनेको कहा। धर्मरुचिने जाकर एक स्थानपर उसका कुछ भाग छोड़ा, और देखा कि जिस-जिस चींटीने आकर उसे खाया, वही तुरन्त मर गयी। यह देख मुनिने विचार किया कि इसे कहीं भो डालनेसे अगणित जीवोंका घात होगा। अतः इससे यही अच्छा है कि मैं ही इसे खा लूँ जिससे अन्य जीवोंके प्राण न जायें। ऐसा विचार कर उन्होंने उसका आहार कर लिया और वे शीघ्र ही मरणको प्राप्त हुए।
इस प्रकार नागश्रीकी करतूतसे मुनिके मरणकी बात सर्वत्र फैल गयी। बहुजन समाजने उसको निन्दा और भर्त्सना को, तथा उसे घरसे निकाल दिया। इस प्रकार निर्वासित और निन्दित होकर वह घर-घर भीख मांगकर अपना निर्वाह करती हुई श्वास, कास, शूल, कुष्ट आदि सोलह महारोगोंसे ग्रस्त हो, मरकर नरक जाकर अगले तीन जन्मोंमें पुनः-पुनः मछली हुई, फिर अनेक एकेन्द्रियादि जीवोंमें सहस्रों बार उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् तियंच योनिसे उबरकर वह चम्पानगरीमें सागरदत्त सार्थवाहकी सुमालिका नामक पुत्री हुई। वह यद्यपि रूप और यौवनसे सम्पन्न थी, तथापि उसके शरीरका स्पर्श असहनीय था, जिसके कारण उसका पति उसके पाससे भाग गया। पिताने एक दरिद्रसे उसका पुनर्विवाह कर दिया, किन्तु वह भी उसका स्पर्श सहन न कर, निकल भागा। यह देख पिताने उसका सम्बोधन किया कि यह सब उसके पूर्वकृत कर्मोंका फल है। फिर उसने उसे अपने रसोईघरके काम-काजमें अपना चित्त लगानेका उपदेश दिया। कुछ काल पश्चात् वहाँ आयिकाओंका एक संघ आया। उनके समीप सुमालिकाने प्रव्रज्या ले ली।
चम्पामे एक ललिता नामक गोष्ठी थी। एक बार वहीं पाँच गोष्ठिक पुरुष देवदत्ता गणिकासहित आमोद-प्रमोदके लिए पहुँचे। किसीने देवदत्ताको अपनी गोदमें बिठलाया, किसीने छत्र लगाया, किसीने पुष्प- सज्जा की, किसीने पैरोंमें माहुर लगाया और किसीने चमर ढोरा। सुमालिकाने यह सब देखा और वह उस स्त्रीके भाग्यको सराहने लगी। उसने निदान किया कि यदि मेरी इस प्रव्रज्याका कुछ फल हो तो अगले जन्ममें मुझे भी ऐसा ही प्रेम-सत्कार प्राप्त हो। तभीसे वह अपने शरीरको सजधजकी ओर विशेष ध्यान देने लगी। मरनेके पश्चात् वह ईशान स्वर्गमें देवी हुई, और फिर द्रुपदको राजकन्या द्रौपदी; जिसे पूर्व संस्कारवश अर्जुन आदि पाँच पाण्डवोंका पतित्व प्राप्त हुआ। (परिशिष्ट २)
इस कथानकमें न तो मुनिका शाप है, और न वरदान। किन्तु मुनिके प्रति दुर्भाव और दुर्व्यवहारके पापसे उसे स्वयं कुष्ठ आदि रोग हुए, नाना नीच योनियोंमें भ्रमण करना पड़ा, एवं मनुष्य-जन्ममें उसे उसी कड़वी तूंबी-जैसा असह्य शरीर मिला। फिर प्रव्रज्याके पुण्यसे अगले जन्ममें उसे सुन्दर रूपकी प्राप्ति हुई और उसके मनोवांछित पाँच पति भी मिले। यह कथानक अर्धमागधी आगमका है, जिसका उपलभ्य संकलन वीरनिर्वाणसे ९८० वर्ष पश्चात् बलभीमें किया गया था। अतः वह ईसवीकी पाँचवीं शतीसे पूर्वकी रचना सिद्ध है।
हरिभद्र सूरि (लगभग ७५० ई०) विरचित सावयपण्णत्ति (श्रावक प्रज्ञप्ति) के पद्य ९३ की टीकामें भी इस प्रकारका एक कथानक सम्यक्त्वके विचिकित्सा नामक अतिचारके उदाहरण रूपसे आया है, जो इस प्रकार है—
एक सेठ था। उसकी पुत्रीके विवाहमें कुछ साधुजन आये। पिताने उसे उनकी परिचर्या करनेका आदेश दिया। किन्तु उनके शरीरकी मलिन गन्धसे उसे घृणा हुई, और वह विचार करने लगी कि यदि ये साधु प्रासुक जलसे स्नान कर लिया करें, तो क्या हानि है? उसने अपने इस दूषित विचारका कोई आलो- चन-प्रतिक्रमण नहीं किया। अतः मरनेपर वह राजगृहकी एक गणिकाके यहाँ उत्पन्न हुई। जन्मसे ही उसके प्रस्तावना
शरीरसे दुर्गन्ध निकलती थी, जिससे वह वनमें त्याग दी गयी । एक बार राजा श्रेणिक, भगवान् महावीरको वन्दनाको जाते समय उसी वनसे निकले । दुर्गन्ध पाकर उन्होंने उसकी खोज करायी, और स्वयं जाकर उसे देखा । फिर भगवान्ने उसके विषयमें पूछ-ताछ की । उन्होंने उसके शरीरमें दुर्गन्ध उत्पन्न होनेका कारण जानकर उसके भावो होनहारकी बात पूछी । भगवान्ने कहा कि अब उसके पापका फल वह भोग चुकी । अब वह तुम्हारी हो अग्रमहिषी होगी, और आठ वर्ष तुम्हारे साथ रमण करके, पश्चात् जो करेगी सो तुम जान लेना । राजा भगवान्को वन्दना कर आने भवनको गये । उधर उस कन्याकी दुर्गन्ध दूर हो गयी, और एक अहीरने ले जाकर उसका पालन-पोषण किया । युवती होनेपर वह अपनी माताके साथ कौमुदी-महोत्सव देखने गयी । राजा भी अपने पुत्र अभयकुमारके साथ वेष बदलकर उत्सव देख रहा था । कन्याके अकस्मात् स्पर्शसे उसको कामवासना जागृत हो गयी, अतः उसने अपनी नामांकित मुद्रिका उसे पहना दी, और अभय- कुमारसे कह दिया कि उनकी नाममुद्रा किसीने चुरा ली, अतः उसकी खोज की जाये । अभयकुमारने नगरके सब द्वार बन्द करा दिये, और प्रत्येक मनुष्यको जाँच-पड़ताल करायी । वह बालिका मुद्रिकासहित पकड़ी गयी, और राजाके पास लायी गयी । राजाने उससे अपना विवाह कर लिया । एक बार राजा अपनी अन्य रानियों सहित जलक्रीड़ाको गया, और वह सुन्दरी उनकी नाबको देखती रह गयी । इस प्रकार राजा- द्वारा अपनेको परित्यक्त समझकर उसने प्रव्रज्या ग्रहण कर ली ।
इस प्रकारका तीसरा आख्यान जिनसेन-कृत हरिवंशपुराण (शक सं० ७०७-७८५ ई०) में पाया जाता है—भरतक्षेत्र, मगधविषयके लक्ष्मी ग्राममें लक्ष्मीमती नामकी सुन्दर कन्या थी । एक बार वह दर्पणमें अपना रूप देख रही थी कि उसी समय भिक्षाके लिए समाधिगुप्त मुनिको आया देख उसे घृणा हो छुट्टी, और वह मुनिकी निन्दा करने लगी । इस महापापके कारण सातवें दिन ही उसके शरीरमें कुष्ठ व्याधि उत्पन्न हो गयी । कन्याने अग्नि-प्रवेश-द्वारा मरण किया । तत्पश्चात् उसने क्रमशः खरी, शूकरी और कुक्कुरीका जन्म ग्रहण किया । फिर वह मण्डूकग्राम निवासी मत्स्यजीवीकी पुत्री हुई । उसका शरीर दुर्गन्धमय होनेसे माताने तो उसका परित्याग कर दिया, किन्तु मातामहीने पाल-पोषकर उसे बड़ा किया । मुनिका संयोग होनेपर उसे धर्मोपदेश मिला । वह आयिकाओंके साथ राजगृह गयी और सिद्धांशिलाकी वन्दना करके, नीलगुफामे समाधिस्थ हो, मरकर अच्युत स्वर्गमें महादेवी हुई । वहाँसे उतरकर वह राजा भीष्मकी कन्या रुक्मिणी हुई । यही कथानक महासेन-कृत प्रद्युम्नचरित (सर्ग ८, १४०-१६०) तथा हरिषेण-कृत कथाकोश (१०८) में भी पाया जाता है ।
हरिषेणकृत बृहत्कथाकोश (५७), (९३१ ई०), तथा श्रीचन्द्रकृत अपभ्रंश कथाकोश (संधि १९-२०, लगभग १०६० ई०) में एक और कथा है अशोक रोहिणीकी, जिसके अनुसार हस्तिनापुरके समीप नीलगिरि पर्वतकी शिलापर मुनिराज यशोधर आतापन योग करते थे । उनके प्रभावसे वहाँके मृगमारी नामक व्याधको कोई शिकार नहीं मिल पाता था । इससे क्रुद्ध होकर उसने जब मुनिराज भिक्षाको गये थे, तब उस शिलाको अग्नि जलाकर खूब तप्त कर दिया । मुनिराजने आकर उसी शिलापर शान्त भावसे समाधिमरण किया । इस पापके फलसे उस व्याधको कुष्ठ रोग हो गया, और वह असह्य वेदनासे सातवें दिन मरकर नरक गया । वहाँसे निकलकर नाना नीच योनियोंमें भ्रमण करता हुआ वह जोब पुनः मनुष्य योनिमें आया, और गोपालके रूपमें उसी नीलगिरिके दावानलमें जलकर भस्म हुआ ।
उसी हस्तिनापुरमें सेठ धनमित्रके पूतिगन्धा नामक एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसकी उग्र दुर्गन्धके कारण कोई उससे विवाह नहीं करता था । संयोगवश उसी नगरके सेठ वसुमित्रका पुत्र श्रीषेण बड़ा दुराचारी था । एक बार वह चोरीके अपराधमें पकड़ा गया । धनमित्रने उसे इस शर्तपर राजासे प्रार्थना कर छुड़वा सुगंधदशमी कथा
दिया कि वह उसकी उस दुर्गन्धा पुत्रीसे विवाह करे। किन्तु विवाहके पश्चात् ही वह उसको दुर्गन्धको न सह सकनेके कारण भाग गया। दुर्गन्धाके दिन पुनः दुःखसे बीतने लगे ।
एक बार सुव्रता आयिका धनमित्रके घर आहारको आयी । दुर्गन्धाने भक्तिसे आहार-दान दिया। नगरमें मुनिसंघ आया । दुर्गन्धा भी मुनियोंकी वन्दना को गयी। मुनिने उसकी दुर्गन्धका कारण बतलाया कि पूर्वभवमें वह गिरिनगरके सेठ गंगदत्तको सिन्धुमती नामक भार्या थी। एक बार सेठ-सेठानी दोनों राजाके साथ बन-विहारको जा रहे थे कि समाधिगुप्त नामक मुनि आहार निमित्त आते दिखाई दिये । सेठने अपनी पत्नीको उन्हें आहार करानेके लिए वापस भेजा। सेठानीने क्रुद्ध हो मुनिराजको कड़वो तुम्बीका आहार कराया। उसकी बेदनासे मुनिका स्वर्गवास हो गया। राजाको जब यह समाचार मिला तो उन्होंने उसे निरादरपूर्वक नगरसे निकाल दिया। उसे कुष्ठ व्याधि हो गयी, और वह सात दिनके भीतर मर गयी । वह नरकोंमें तथा कुत्ती, शूकरी, शृगाली, गधो आदि नोच योनियोंमें जन्म लेकर अन्ततः तू अब पूतिगन्धाके रूपमें उत्पन्न हुई है।
अपने पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर पूतिगन्धाको बड़ी आत्मग्लानि हुई, और उसने मुनिराजसे पूछा कि उस पापसे उसे किस प्रकार मुक्ति मिले। मुनिराजने उसे रोहिणो-व्रतका उपदेश दिया, जिसके अनुष्ठानसे वह अंगदेशको चम्पानगरीके मथवा नामक राजाकी रोहिणी नामक राजकन्या हुई। अब वह यह जानती भी नहीं थी कि दुःख और शोक कैसा होता है।
राजकन्या रोहिणीके पति अशोकका भी पूर्वभव मुनिराजने सुनाया। कनकपुरमें सोमभूतिके पुत्र सोमशर्मा और सोमदत्त थे। पिताको मृत्युके पश्चात् सोमदत्त राजपुरोहित हुआ, जिसके कारण उसका ज्येष्ठ भ्राता सोमशर्मा उससे द्वेष करने लगा। उसके दुराचारको वार्तास सोमदत्तको वैराग्य हो गया, और बह मुनि हो गया । अब सोमकर्मा राजपुरोहित हुआ । एक बार जब राजा सोमप्रभ विजय-यात्रापर जा रहे थे तब उन्हें सम्मुख सोमदत्त मुनिके दर्शन हुए। इसे सोमशनि अपशकुन बताकर, मुनिको मरवा डालनेकी सलाह दो । किन्तु राजाने अन्य ज्योतिषियोंसे यह जानकारी प्राप्त की कि मुनिका दर्शन अपशकुन नहीं किन्तु बड़ा शुभ शकुन माना गया है, जिससे कार्य में अवश्य सफलता प्राप्त होती है। हुआ भी ऐसा हो । तथापि सोमवार्माने द्वेषवश गुप्त रूपसे मुनिका घात कर दिया। यह जानकर राजाने उसे दण्डित किया । सातवें दिन उसे कुष्ठ व्याधि हो गयी । दुःखसे मरकर उसने अनेक बार नरकोंमें तथा मत्स्य, सिंह, सर्प, व्याघ्र आदि क्रूर पशुओंमें जन्म लेकर अन्ततः सिहपुरके राजा सिंहसेनका दुर्गन्धी शरीर युक्त पुत्र हुआ। एक बार मुनिराजसे अपने पूर्वभवका यह वृत्तान्त सुनकर उसे बामिक रुचि उत्पन्न हो गयी, और रोहिणी व्रतके प्रभावसे वह उस मुनि-हत्या के पापसे मुक्त होकर अशोक कुमार उत्पन्न हुआ । पुण्यासव कथाकोश (३६-३७) में भी यह कथानक आया है, और वह भी इसी कथाकोशपर आधारित प्रतीत होता है।
कथाकोशके अन्तर्गत रोहिणी चरित्रके उपर्युक्त तीनों उपाख्यानोंमें मुनि-घातके पापसे कुष्ठ रोगकी उत्पत्ति, नरक-गति, नोच योनियोंमें परिभ्रमण, और अन्ततः धार्मिक आचरण द्वारा उस पापका परिमार्जन, सुगति और सुखोंकी प्राप्तिके उदाहरण उपस्थित किये गये हैं। उपर्युक्त समस्त कथानकोंके मिलानसे इस बातमें सन्देह नहीं रहता कि प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाका सबसे निकटवर्ती आधार रोहिणीका पूर्वभव- वृत्तान्त ही है।
प्रस्तुत सभी कथानकोंमें मुनिनिन्दा या निरादरके पापसे कुष्ठव्याधि व दुर्गन्धित शरीरको उत्पत्तिके अतिरिक्त दूसरा प्रबल तत्त्व है, नोच योनियोंकी दीर्घ परम्परा । महाभारतके मत्स्यगन्धा-सम्बन्धी आख्यानमें बह परम्परा दूसरे जन्मसे आगे नहीं बढ़ी। किन्तु विष्णुपुराण (३,१८) में एक ऐसा आख्यान भी आया है, जिसमें नीच योनियोंको एक लम्बी श्रृंखला दिखलायी गयी है। एक समय राजा शतधनु और उनकी रानी शैव्या गंगामें स्नान करके निकले हो थे कि उन्हें अपने सम्मुख एक पापण्डीके दर्शन हुए, जो राजाके प्रस्तावना
धनुर्वेदी आचार्यका मित्र था। अतः राजाने उससे गौरवपूर्ण मित्रवत् व्यवहार किया। इस पापके फलसे वह मरकर क्रमशः शृगाल, वृक, गृध्र, व्याल व मयूर हुआ। प्रत्येक जन्ममें उसको पतिव्रता पत्नीने उसके पूर्व- जन्मोंका स्मरण कराया, जिससे पाषण्डोके साथ सद्व्यवहारका घोर पाप क्रमशः क्षीण होते-होते वह मयूरके जन्ममें राजा जनकके अश्वमेध यज्ञमें जा पहुँचा। उन्होंने यज्ञानुष्ठानसम्बन्धी अवभूयस्नानके समय उसे भी स्नान कराया, जिसके पुण्यसे वह अगले जन्ममें स्वयं राजा जनकका पुत्र हुआ ।
प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाका दूसरा भाग, जो दूसरी सन्धिमें वर्णित है, अपनी मौलिकता और रोच- कताकी दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। सुगन्बदशमी व्रतके पुण्यसे दुर्गन्धा अपने अगले जन्ममें रत्नपुरके सेठ जिनदत्तकी रूपवती पुत्री तिलकमती हुई। किन्तु उसका पूर्वकृत कुछ पापकर्म अभी भी भोगनेको शेष रहा था । अतः जन्मके कुछ ही दिन उसकी [[?]] [[?]] हो [[?]]। [[?]] [[?]] विवाह किया, और उससे भी एक कन्या उत्पन्न हुई तेजमती । सौतेली माँ अपनी पुत्रोको बहुत प्यार करती, और तिलकमतीसे उतना ही द्वेष । इस कारण इस कन्याका जीवन बड़े दुःखसे व्यतीत होने लगा। युवावस्था जायी और पिता- को कन्याओंके विवाहको बिन्ता हुई। किन्तु इसी समय उन्हें वहाँ के नरेश कनकप्रभका आदेश मिला कि वे रत्नोंको खरीदनेके लिए देशान्तर जायें। जाते समय सेठ पत्नीसे कह गया कि सुयोग्य वर देखकर दोनों कन्याओंका विवाह कर देना। जो वर आते वे तिलकमतीके रूपपर मुग्ध होकर, उसोको याचना करते । किन्तु सेठानी उसकी बुराई कर अपनी पुत्रीको ही आगे करतो, और उसीको प्रशंसा करती। तो भी बरके हठसे विवाह तिलकमतीका ही पक्का करना पड़ा। विवाहके दिन सेठानी तिलकमतीको यह कहकर श्मशान- में बैठा आयो कि उनकी कुल-प्रथाके अनुसार उसका वर वहीं आकर उससे विवाह करेगा। किन्तु घर आकर उसने यह हल्ला मचा दिया कि तिलकमती कहीं भाग गयो । लग्नको बेला तक उसका पता न चल सकनेके कारण बरका विवाह तेजमतीके साथ कराना पड़ा। इस प्रकार कपटजाल-द्वारा सेठानीने अपनी इच्छा पूरी की ।
उधर राजाने महलपर चढ़कर देखा कि एक सुन्दर कन्या घोर रात्रिमें श्मशान में अकेली बैठी है। वह तुरन्त उसके पास गया और पूछ-ताछ कर व सब बात जान-समझकर उम्रने स्वयं उससे अपना विवाह कर लिया । पूछनेपर राजाने अपना नाम पिण्डार (ग्वाल- महिषोपाल) बतलाया और यही नाम कन्याने अपनी सौतेली माँको भी बतला दिया। एक पृथक् गृहमें उसके रहनेको व्यवस्था कर दी गयो । राजा रात्रि- को उसके पास आता, और सूर्योदयसे पूर्व ही चला जाता। पतिने रत्नजटित वस्त्राभूषण भी उसे दिये, जिन्हें देख सेठानी घबरा गयो कि निश्चय हो उन्हें उसके पतिने राजाके यहाँसे चुराकर उसे दिये होंगे। इसो बीच सेठ भो विदेशसे लौट आये और सेठानीसे सब वृत्तान्त सुनकर राजाको खबर दो । राजाने चिन्ता व्यक्त को, और सेठको अपनी पुत्रीसे चोरका पता प्राप्त करनेका आग्रह किया। पुत्रीने कहा मैं तो उन्हें केवल चरणके स्पर्यासे पहचान सकती हैं। अन्य कोई परिचय नहीं है। इसपर राजाने एक भोजका आयोजन कराया, जिसमे सुगन्धाको आँखें बाँधकर अभ्यागतोंके पैर घुलानेका कार्य सौंपा गया। इस उपायसे राजा ही पकड़ा गया । तब राजाने उस कन्यासे विवाह करनेका अपना समस्त वृत्तान्त कह सुनाया, जिससे समस्त वातावरण आनन्दसे भर गया । इस प्रकार मुनिके प्रति दुर्भाचके कारण जो रानी दुखो दरिद्री दुर्गन्धा हुई थी, वही सुगन्धदशमी व्रतके पुण्यसे पूर्वोक्त पापको धोकर पुनः रानी बन गयी ।
५. फ्रेन्च और जर्मन कथाओंसे तुलना
इस कथाके प्रसंगमें मुझे सिन्ड्रेला नामक अँगरेजीको एक कहानीका स्मरण आ गया, जिसे मैंने सुगंधदशमी कथा
अपने स्कूलके दिनोंमें पढ़ा था। अब खोजनेपर वह कहानी मुझे “दि स्लीपिंग ब्यूटी एण्ड अदर फेयरी टेल्स फाम दि ओल्ड फ्रेंच, रिटोल्ड बाई ए० टी० विचलर-कोउच”, नामक कथा-संग्रहमें मिल गयी। इस ग्रन्थके आदिमें कहा गया है कि ग्रन्थकारने प्रस्तुत कथानक फ्रेंच भाषाके ‘केबिने डे फो’ नामक कथा-कोशके इकतालीस भागोंके प्रथम भागसे लिया है। उसके कर्ता चार्ल्स पेरोल्टका जीवन-काल सन् १६२८ से १७०३ तक माना गया है। संक्षेपतः यह कथानक इस प्रकार है -
एक धनिककी एक सुन्दर कन्या थी। उसके बचपनमें ही उसकी माताकी मृत्यु हो गयी। पिताने दूसरा विवाह किया। इस पत्नोके साथ उसकी पहलेकी दो पुत्रियाँ भी आयीं। सौतेली माँको अपनी सौतेली पुत्रीसे बड़ा द्वेष हुआ, क्योंकि उसके समक्ष उसकी वे दोनों पुत्रियाँ रूप और गुणोंमें बहुत फीकी पड़ती थी । माँ उस सौतेली लड़कीसे घरका सब काम-काज कराती, उसे फटे-पुराने कपड़े पहनाती तथा सूखा-रुखा खानेको देती । किन्तु वह अपनी दोनों पुत्रियोंको खूब सज-धजसे रखती, और उनकी भी चाकरी उस सौतेली लड़कीसे कराती । इस लड़कीको जब घरके सब काम-काजसे कुछ अवकाश मिलता, तब वह घरके एक कोनेमें जहाँ कोयला रखा जाता था, जाकर पड़ जाती थी। इसीसे उसका नाम ‘सिन्ड्रेला’ पड़ गया । ( सिंडर - कोयला ) ।
एक बार उस नगरके राजकुमारने नृत्योत्सवका आयोजन किया, जिसमें राज्यके समस्त धनी-मानी निमन्त्रित थे। धनिककी दोनों युवती कन्याओंको भी निमन्त्रण मिला, और वे खूब ठाठ-बाटसे नियत समयपर नृत्योत्सवमें पहुँची। किन्तु उस बेचारी सौतेली लड़कीको अपनी उन बहिनोंकी तैयारीका काम तो खूब करना पड़ा, परन्तु उत्सवमें जानेका उसका भाग्य कहाँ ? वह अपने उसी गन्दे कोनेमें बैठ सिसक- सिसककर रोने लगी ।
रोते-रोते अर्धचेतसो अवस्थामें जब उसने आँखें पोंछकर देखा तो अपने सम्मुख एक दिव्य मूर्तिको खड़ा पाया । उसने बड़े प्यारसे पूछा, “बेटी, रोती क्यों है ? तू क्या चाहती है ?” इस प्यारको बोलीसे सिन्ड्रेलाका गला और भी रुंध गया और वह कुछ भी बोल नहीं सकी। तब देवीने स्वयं पूछा, “क्या तू राज- कुमारके नृत्योत्सवमें जाना चाहती है?” सिन्ड्रेलाके हाँ कहनेपर देवीने अपनी जादुकी छड़ोसे छूकर एक कुम्हड़ेको सुन्दर गाड़ीका रूप दे दिया, चूहोंके घोड़े और प्यादे बना दिये, और कन्याके मैले-कुचले वस्त्रोंको सुन्दर बहुमूल्य वेश व रत्नमय आभूषणोंमें बदल दिया। सिन्ड्रेलाका रूप-सौन्दर्य अब किसी भी राजकन्यासे हीन नहीं रहा । दिव्य रूप व वेश-भूषा तथा राजोचित वैभवके साथ सिन्ड्रेला नृत्योत्सवमें गयी । उत्सवमें राजकुमार सिन्ड्रेलाकी ओर ही सबसे अधिक आकृष्ट हुआ। उसने उसीका सर्वाधिक आदर- सत्कार किया और उसीके साथ बहुलतासे नृत्य भी किया। अकस्मात् ज्योंही सिन्ड्रेलाने पौने बारह बजे रात्रिको घण्टी सुनी, त्योंही वह लौटनेके लिए अधीर हो उठी, क्योंकि देवीने उसे खूब सचेत कर दिया था कि उसका वह दिव्य वैभव अर्धरात्रिके पश्चात् नहीं ठहरेगा। वह राजकुमारसे तुरन्त छुट्टी लेकर तथा उसके आग्रह करने पर पुनः दूसरे दिन नृत्योत्सवमें आनेका वचन देकर, अपनी बहिनोंके लौटनेसे पूर्व ही घर आ गयी, तथा अपनी फटी-पुरानी वेश-भूषामें उनके आनेकी प्रतीक्षा करने लगी ।
दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार, किन्तु उससे भी अधिक सजधजके साथ वह नृत्योत्सवमें पहुँची । आज राजकुमारने अपना सारा समय उसीके साथ व्यतीत किया। वह भी इतनी तल्लीन हो गयी कि उसे अर्धरात्रि- से पूर्व घर लौटनेका ध्यान ही न रहा। अकस्मात् जब पूरे बारह बजेकी घण्टी बजनी प्रारम्भ हुई तब वह सचेत हुई और घबराकर तुरन्त वहाँसे भागी। उस जल्दीमें उसके पैरका एक काँचका जूता निकलकर वहीं रह गया, जिसे राजकुमारने बड़े चावसे उठाकर अपने पास रख लिया ।
अब घर लौटनेके लिए सिन्ड्रेलाके पास न वे गाड़ी-घोड़ा थे और न प्यादे । उसको पोशाक भी अपने स्वाभाविक मैले-कुचले कपड़ोंमें बदल गयी थी। रात अंधेरी, मार्ग बहुत पथरीला और ऊपरसे घनघोर प्रस्तावना
वृष्टि । अतः वह बड़े कष्टसे अपने घर पहुँच पायी । सौभाग्यसे उसकी बहिनोंकी गाड़ीका एक चाक निकल पड़ा था, जिससे वे भी बहुत विलम्बसे आयों और सिन्ड्रेला उनके कोपके प्रसादसे बच गयो । सिन्ड्रेलाके लोटनेपर उसकी वह देवी माता सम्मुख आ उपस्थित हुई, और बोली “बेटी तूने मेरी बातका ध्यान नहीं रखा, जिसके कारण तुझे इतना क्लेश भोगना पड़ा । अच्छा, यह जो तू अपनी छातीमें छिपाये हुए है, वह क्या है ?” सिन्ड्रेलाका वह दिव्य वेश तो बदल गया था, किन्तु न जाने क्यों उसने अपनी वह बची हुई काँचकी एक जूती अपनी अँगियामें छिपाकर रख ली थी, और वह अभी भी ज्योंकी त्यों बनी हुई थी । उसे देखकर देवीने कहा, “अच्छा यह एक तो है, पर इसकी जोड़ी कहाँ है ?” सिन्ड्रेला घबरायी । किन्तु देवीने कहा, “भला तुम असावधान तो हो, परन्तु जो मेरी देनको इतनी निशानी बचा ली है, वही तुम्हारे भाग्यको विधायक होगी ।” इतना कहकर देवी अदृश्य हो गयो ।
उधर दूसरे ही दिनसे राजकुमार व्याकुल होकर खोज करने लगा—यह काँचकी जूती किसके पैरकी है ? उसने घोषणा करा दी कि जिसके पैरमें वह जूती ठीक बैठ जावेगी, वही उसकी प्रिय रानी होगी । क्रमशः एकसे एक राजकुमारियों व अमीरों-जमींदारों व सेठ-साहूकारोंकी कन्याओंने अपने-अपने भाग्यकी परीक्षा की, किन्तु वह जूती किसीके भी पैरमें ठीकसे नहीं बैठी । सिन्ड्रेलाकी दोनों सौतेली बहिनोंकी भी बारी आयी, किन्तु उन्हें भी निराश होना पड़ा । सिन्ड्रेला देख रही थी । उसने कहा, “क्या मैं भी प्रयत्न करूँ ?” इसपर उसकी बहिनें हँस पड़ीं । किन्तु राजपुरुषने कहा, “मुझे इस जूतीको सभी युवतियोंके पैरमें पहनानेका आदेश है, इसलिए तुम भी इसे पहनकर देखो ।” सबके आश्चर्यका ठिकाना न रहा जब सिन्ड्रेला- का पैर खटसे उस जूतीमें भली प्रकार बैठ गया । यही नहीं, उसने अपनी अँगियामेंसे उसके जाड़ेकी जूती निकालकर अपने दूसरे पैरमें पहन ली । अब कोयलेके कोनेमें रहनेवाली सिन्ड्रेला राजमहलकी रानी बन गयी ।
यही कथानक जर्मनीमें कुछ हेर-फेरके साथ लोक-प्रचलित पाया जाता है । ऐसी लोक-कथाओंका एक संग्रह जेकब लुडविक कार्ल ग्रिम (१७८५-१८६३) कृत ‘दि किंडर उण्ड हाउसमार्खेन’ की तीन जिल्दोंमें प्रकाशित हुआ था, जिसका अनुवाद अंगरेजीमें ‘ग्रिम्स टेल्स’ में पाया जाता है । इस संग्रहमें अश्पुटैलकी कहानीका सार यह है—
एक धनिककी पत्नीने मरते समय अपनी एक मात्र पुत्रीको पास बुलाकर कहा—“बेटी, तुम सदा भली रहना, मैं स्वर्गसे भी तुम्हारी देख-रेख करूंगी ।” माताकी मृत्युके पश्चात् पुत्री प्रतिदिन उसके श्मशान पर जाकर रोया करती थी ।
उसके पिताने शीघ्र ही दूसरा विवाह कर लिया । इस नयी पत्नीकी पहलेसे दो पुत्रियाँ थीं, जो देखनेमें सुन्दर, किन्तु हृदयसे बहुत मैली थीं । वे अपनी सौतेली बहनसे घृणा करतीं, उससे घरका सब काम- काज करातीं, और रूखा-सूखा खानेको देती थीं । वह रसोईघरके राखके ढेरके पास सोया करती थी, जिससे उसका नाम अश्पुटैल पड़ गया ।
एक बार वह धनिक किसी मेलेमें जा रहा था । उसने अपनी पुत्रियोंसे पूछा कि वे मेलेसे क्या मँगाना चाहती हैं । एकने अच्छेसे अच्छे वस्त्र और दूसरीने हीरा-मोती लानेको कहा । अश्पुटैलसे पूछनेपर उसने कहा—“पिताजी, जब आप घर लौटने लगें, तब जो वृक्षकी डाल आपके टोपसे उलझ जाये, उसे ही मेरे लिए लेते आइए, बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए ।” धनिकने वैसा ही किया । घोड़ेपर सवार होकर लौटते समय एक झुरमुटके वनमें उसके टोपसे हैजल (Hazel) वृक्षकी डाल टकरायी । बस उसे ही तोड़ कर वह अपनी अश्पुटैलके लिए लेता आया । अश्पुटैलने उसे ले जाकर अपनी माँ के श्मशान पर लगा दिया, तथा रो रोकर उसे अपने आँसुओंसे सींच डाला ।
कुछ समय पश्चात् वहाँके राजाने एक तीन दिनका उत्सव मनाया, जिसमें राजकुमारका स्वयंवर भी होना था । अश्पुटैलकी दोनों बहिनोंको उस उत्सवमें जाना था, अतएव अश्पुटैलको उनके बालोंकी कंधी सुगंधदशमी कथा
करनी पड़ी, उनके जूतोंपर पालिश भी करनी पड़ी, तथा उनको पोशाककी साज-सम्हाल भी करनी पड़ी । अश्पुटैलने अपनी माँसे अपने जानेकी भी इच्छा प्रकट की। सौतेली माँने उसे टालनेके लिए कहा, “अच्छा मैं इन कुंडे भर मटरके दानोंको उस राखके ढेरमें मिला देती हूँ, यदि तुम उन्हें दो घण्टोंके भीतर चुनकर अलग कर लोगो, तो मैं तुम्हें भी स्वयंबर में जाने दूँगी।” अश्पुटैलने यह शर्त स्वीकार कर ली, और अपने साथी कबूतरों व अन्य पक्षियोंकी सहायतासे उस कामको एक घण्टेमें ही निपटा दिया। किन्तु माँने फिर कहा, “नहीं, नहीं, तुम्हारी पोशाक बहुत मलिन है, अतः मैं तुम्हें राजोत्सबमें न जाने दूंगी।” अश्पुटैलके पुनः आग्रह करनेपर उसने कहा, “अच्छा, में अब दो कुण्डे मटरके दानोंको राखके ढेरमें मिलाती हूँ, यदि तुम एक घण्टेमें इन्हें चुन लोगी, तो मैं तुम्हें भी जाने दूंगी।” अश्पुटैलने कबूतरोंकी सहायतासे यह कार्य भी पूरा कर लिया । किन्तु सौतेली माँका हृदय फिर भी न पसीजा । अन्तमें उसने यह कहकर उसे बिलकुल मना कर दिया कि तुम्हारा वहाँ जाना बिलकुल निरर्थक है। तुम्हारे पास न तो अच्छी पोशाक है, और न तुम्हें नाचना ही आता है। अतएव तुम्हारे वहाँ जानेसे हम सबको लज्जित होना पड़ेगा ।
सब राजोत्सवमें चले गये, और बेचारी अश्पुटैल अपनी माताकी श्मशान भूमि पर जाकर उस हैजल- के वृक्षके नीचे फूट-फूटकर रोने लगी। और गाने लगी -
हिलो हिलो तुम हैजल वृक्ष । चाँदी सोना बरपे स्वच्छ ॥
इस पर उसके मित्र पक्षीने वृक्षसे उड़कर उसे चाँदी-सोनेको पोशाक और रेशमको जूतियाँ ला दीं। उन्हे पहिनकर अश्पुटैल भी स्वयंवर उत्सवमें जा पहुँची। उसकी बहिनोंने उसे देखा, किन्तु वे पहिचान न सकों । उन्होंने समझा वह कोई राजकुमारी होगी ।
उत्सवमें राजकुमारने अश्पुटेलको हो अपने साथ नृत्य करनेके लिए चुना, और अन्त तक उसका हाथ न छोड़ा। बहुत रात गये जब वह घर जाने लगी तब राजकुमारने स्वयं उसके साथ जाकर घर पहुँचा देनेकी इच्छा प्रकट की। किन्तु इस बातसे अश्नुर्टल बहुत घबरायी, और राजकुमारकी आँख बचाकर वहाँसे निकल भागी ।
दूसरे दिनके उत्सवमें भी अश्पुटैल उसी भाँति सुसज्जित होकर पहुँची। आज राजकुमारने निश्चय कर लिया कि वह उसका साथ कभी न छोड़ेगा। उत्सवसे बिदा होते समय वह उसके साथ हो गया। किन्तु घरके पास पहुँचने पर वह राजकुमारकी आँखें बचाकर बगीचेमें छिप गयी, और चुपके-चुपके अपने स्थान पर जा पहुँची । परन्तु राजकुमारने निश्चय कर लिया था, अतएव वह वहीं डटा रहा। अश्पुटैलके पिताके लौट आने पर राजकुमारने उससे कहा कि उसकी प्रिया उसी बगीचेमें कहीं छिप गयी है। दोनोंने मिलकर बहुत ढूँढ़ा, किन्तु उसका पता न चला ।
तीसरे दिन और भी अधिक सुसज्जित होकर अश्पुटेल उत्सवमें पहुँची। सबकी दृष्टि उसीके अनुपम सौन्दर्य और अपार वैभवकी ओर थी। राजकुमारने आज पलभरके लिए भी उसका साथ न छोड़ा। जाते समय पुनः उसका पोछा किया। तथापि अपने घरके समीप पहुँचकर अश्पुटैल अदृश्य हो गयो । किन्तु घबराहटमें उसके पैरकी एक जूती पैरसे निकलकर गिर पड़ी। इस सुवर्णजटित जूतीको राजकुमारने अपने पास रख लिया, और अपने पिताके पास जाकर कहा कि जिसके पैरमें यह जूती ठोक बैड़ जायेगी, उसीसे मैं अपना विवाह करूंगा। जिस घरमें उसकी सुन्दरो प्रिया अदृश्य हुई थी, वह घर तो उसे बिदित था हो । अतः वह जूतो उसी घरमें लायी गयी। पहले बड़ी
प्रस्तावना
लौटो लौटो राजकुमार । देखो जूती खूब निहार ॥
ढूँढ़ो अपनी पत्नी प्यारी। यह है रानी नहीं तुम्हारी ॥
यह सुनकर राजकुमार लौट पड़ा, और उसे उसके घर उतार दिया, अब माताने अपनी दूसरी पुत्रीके पैरमें उस जूतीको पहनानेका प्रयत्न किया, उसकी एड़ी इतनी बड़ी थी कि वह जूतीमें नहीं बैठ सकी । तथापि रानी बनानेके लोभसे माँने उसे जबर्दस्ती जूतीमें ठूंस दिया, जिससे एड़ी लहूलुहान हो गयी । राजकुमार उसे अपने घोड़ेपर बैठाकर ले चला। किन्तु उस हैजल वृक्षसे पुनः वही गानेकी ध्वनि सुनायी दी । अतएव राजकुमार फिर लौट पड़ा। लाचार होकर अबकी बार अश्पुटेलके पैरमें जूती पहनायी गयी । वह खटसे ठीक बैठ गयी । उसे लेकर जब राजकुमार हैजल वृक्षके समीपसे निकला तो उसे सुनायी पड़ा – अब घर जाओ राजकुमार । खूब करो रानीसे प्यार ॥
इतना गाकर वह कपोत पक्षी उड़कर उस सुन्दरीके कन्धे पर आ बैठा। वे सब जाकर राजमहलमें प्रविष्ट हुए ।
इन फ्रेंच और जर्मन दोनों कथाओंमें परस्पर बहुत-सी बातोंमें भेद होने पर भी उनमें निम्नलिखित तत्त्व समान रूपसे विद्यमान है –
एक धनी गृहस्थ, उसकी पत्नी और एक पुत्री । पत्नीके देहान्त हो जाने पर धनीका पुनविवाह व नयी पत्नीकी अपनी दो पुत्रियाँ। इस पत्नीका अपनी दो पुत्रियोंसे प्यार, और उस सौतेली लड़कीसे दुर्व्यवहार । राजमहलमें उत्सव । सौतेली लड़कीकी अवहेलना, किन्तु एक अदृश्य शक्ति (उसको मृत माताकी आत्मा) द्वारा उसकी सहायता । दर्शन-मात्रसे राजकुमारका उसकी ओर आकर्षण, और उसको खोजबीन । सौतेली माँका अपनी पुत्रियोंको रानी बनानेका निष्फल प्रयास । अन्ततः सौतेली लड़कीका भाग्योदय और राजमहलकी रानीके रूपमें प्रवेश ।
ये समस्त तत्त्व प्रस्तुत सुगन्धदशमी कथाके द्वितीय भागमें विद्यमान है, और जो भेदकी बातें हैं, वे भारतीय और यूरोपीय सभ्यता व संस्कृतिके बीच भेदसे सम्बन्ध रखती हैं। यूरोपीय कथाओंमें धनीकने अपनी पूर्व पत्नीकी मृत्यु होने पर एक ऐसी महिलासे विवाह किया, जिसकी पहलेसे ही दो पुत्रियाँ थीं। यह बात भारतीय स्वस्थ परम्पराके अनुकूल नहीं। अतएव यहाँ दूसरा विवाह हो जानेके पश्चात् एक पुत्री उत्पन्न होनेकी बात कही गयी है। उसी प्रकार राजोत्सवका आयोजन, उनमें उन कन्याओंका जाना व राजकुमारके साथ नृत्य करना, तथा जूतीके द्वारा राजकुमारको सच्ची प्रेयसीका पता लगाया जाना, यह सब भी यूरोपीय परम्पराके अनुकूल है, भारतीयताके अनुकूल नहीं। दूसरी बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि यूरोपीय दोनों कथाओंमें उस सौतेली कन्याके दुर्भाग्यको पलटनेके लिए बहुत कुछ देवो चमत्कारका आश्रय लिया गया है। किन्तु उक्त भारतीय कथानकमें कहीं भी किसी अप्राकृतिक तत्त्वकी योजना दिखाई नहीं देती । सर्वत्र ऐसी स्वाभाविकता है जो कभी भी कहीं घटित हो सकती है। यहाँ जूती-द्वारा पत्नीकी पहचान नहीं, किन्तु पत्नी-द्वारा पतिके चरण-स्पर्शसे उसको पहचान करायी गयी है। वह भारतीय संस्कृतिका अपना असाधारण लक्षण है, जो यूरोपीय रीति-रिवाजके अनुकूल नहीं ।
उक्त सांस्कृतिक तत्त्वोंको पृथक् करके देखने पर हमें यह प्रतीत हुए बिना नहीं रहता कि सम्भवतः यूरोप और भारतके बीच इस कथानकका आदान-प्रदान हुआ है। मैक्समूलर व हर्टेल आदि अनेक विद्वानोंने यह सिद्ध कर दिखाया है कि भारतीय कथाओंका अटूट प्रवाह अति प्राचीनकालसे पश्चिमको ओर प्रवाहित होता रहा है, जिसके फलस्वरूप वेदकालीन, जातकसम्बन्धो तथा पंचतन्त्र, हितोपदेश व कथासरित्सागर आदि भारतीय आख्यान साहित्यमें निबद्ध अनेक लोक-कथाएँ पाश्चात्य देशोंमें जाकर, वहाँके वातावरणके अनुकूल हेर-फेरसहित प्रचलित हुई पायी जाती है। उक्त यूरोपीय कथाके सबसे प्राचीन लेखक चार्ल्स परोल्टका जीवन काल सन् १६२८ से १७०३ तक माना गया है। उनसे पूर्व इस कथानकके यूरोपमें प्रचलित होनेका कोई प्रमाण हमारे सम्मुख नहीं है। इसको तुलनामें भारतकी सुगन्धदशमी कथाको परम्परा सुगंधदशमी कथा
अति प्राचीन है। इसका मराठी अनुवाद जिनसागर-द्वारा सन् १७२४ के लगभग, संस्कृत अनुवाद श्रुतसागर- द्वारा व गुजराती अनुवाद जिनदास-द्वारा सन् १४५० के लगभग, एवं अपभ्रंशकी मूल रचना सन् ११५० ई० के लगभग हुई पायी जाती है। अतः कोई आश्चर्य नहीं जो भारतीय अन्य कथाओंके सदृश इस कथाका भी देशान्तर-गमन हुआ हो, जिसका प्रसार-क्रम गवेषणीय है।
६. कथाका उत्तरकालीन प्रभाव
सुगन्धदशमी कथाका प्रभाव उससे उत्तरकालीन कथा-साहित्यपर पर्याप्त मात्रामें पड़ा दृष्टिगोचर होता है । उदाहरणार्थ—हरिभद्रकृत सम्मत्तसत्तत्ति (सम्यक्त्वसप्तति) नामक ७० गाथात्मक एक रचना है, जिसपर गुणशेखर सूरिके शिष्य संघतिलक सुरिने वि० सं० १४२२ (सन् १३६५) में एक सुविस्तृत टीका लिखी है। इस टीकामें उदाहरण रूपसे बीस कथाओंका समावेश पाया जाता है, जिसमें देव-गुरु वैयावृत्यके उदाहरणमें ‘आरामसोहा’ नामक प्राकृत गद्यात्मक कथा (सूरियपुर, वि० सं० १९९७) यहाँ ध्यान देने योग्य है –
चम्पा नगरीमें कुलधर नामक सेठ और उसकी कुलानन्दा पत्नी रहते थे। उनके कमलश्री आदि सात पुत्रियोंके पश्चात् आठवों कन्या उत्पन्न हुई। उस समय सेठकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेसे वे दुखी रहते थे। इसीसे इस कन्याका नाम निर्भगा पड़ गया। युवती हो जाने पर भी उसके विवाहका सेठ कोई प्रबन्ध नहीं कर पाता था जिससे वह चिन्तित रहने लगा। अकुस्मात् एक दिन कोई नवागन्तुक उनके द्वारपर कुछ पूछताछके लिए आ उपस्थित हुआ । सेठने उसे लोभ देकर अपनी पुत्रीसे विवाह करनेके लिए राजी कर लिया । वह चोल देशसे आया था, अतः वहीं जानेके लिए सेठने उसे अपनी पुत्रीसहित केवल मार्गके लिए कुछ सम्बल देकर बिदा किया । उज्जैनमें आकर उसने विचार किया कि उनके पास मार्गमें दोनोंके खाने- पीने योग्य सामग्री नहीं है। अतः वह अपनी वधूको वहीं सोती छोड़, वहाँसे चल दिया। लगने पर निर्भगा बिलाप करने लगी। उसी समय मणिभद्र सेठने वहाँ पहुँच कर उसे आश्वासन दिया और अपने घर ले आया । यहाँ वह घरका काम-काज तथा मन्दिरमें धर्म कार्य बड़ी श्रद्धापूर्वक करने लगी। मन्दिरका सूखा उद्यान भी उसने अपने परिश्रमसे हरा-भरा कर लिया। अन्ततः मरकर वह स्वर्गमें गयी । स्वर्गमें अपनी आयु पूर्ण कर निर्भगा भारतवर्षमें कुसट्ट देशवर्ती ‘बलासअ’ नामक ग्राममें अग्निशर्मा ब्राह्मणकी पत्नी अग्निशिखाके गर्भसे विद्युत्प्रभा नामक कन्या उत्पन्न हुई। आठ वर्षकी आयुमें उसकी माताका देहान्त हो गया, और उस छोटी सी बालिकाके ऊपर ही घरका सब काम-काज आ पड़ा। उसका बोझ हलका करनेके निमित्त पिताने दूसरा विवाह किया, जिससे एक और कन्याका जन्म हुआ । यह विमाता विद्यु- त्प्रभासे अच्छा व्यवहार नहीं करती थी। अतः उसका भार हलका नहीं हुआ, बल्कि दुगुना हो गया, जिससे कन्या अपने दुर्भाग्यको दोषी ठहराने लगी। एक दिन वह सदैवकी भाँति अपनी गौओंको चराने ले गयी थी । मध्याह्न हो गया, और वह ऐसे स्थानपर पहुँच गयी जहाँ वृक्षकी छाया भी उपलब्ध नहीं थी। वह थक कर धूपमें ही लेट गयी । उसी समय एक काला नाग वहाँ आ पहुँचा, जिसने मानवी भाषामें उसे जगाया, और अपना पीछा करने वाले गारुडिकसे रक्षाके लिए अपनी गोदमें आश्रय देनेकी प्रार्थना की। कन्याने वही किया । गारुडिकोंके चले जानेके पश्चात् उस नागने अपना दिव्य रूप प्रकट किया, और कन्यासे वरदान माँगनेको कहा। उसने केवल गौओंको चरानेकी सुविधाके लिए अपने ऊपर छाया प्राप्त करनेकी इच्छा प्रकट की । नागदेवने उसके ऊपर एक सुन्दर उद्यानका निर्माण किया जो उसके साथ-साथ उसकी इच्छानुसार गमन करे । इसके अतिरिक्त उसने यह भी वरदान दिया कि जब भी उसपर कोई विपत्ति पड़े, या साहाय्यके लिए उसका स्मरण करे, तभी वह आकर उसकी रक्षा व इच्छापूर्ति करेगा। इन वरदानोंसे उसके दिन सुखपूर्वक बीतने लगे ।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3077.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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