सुदृष्टि तरंगिणी — पं. टेकचंद जी (दैनिक स्वाध्याय) | Sudrishti Tarangini — Pt. Tekchand Ji (Dainik Swadhyay)

शंका 14: हे गुरुदेवजी ! जगत में जीव कीर्तिमान किस पुण्य से होता है ?
समाधानः जिन जीवों ने अपने पूर्वभव में अपने मुख से तीर्थंकर, चक्रवर्ती, कामदेवादि महापुरुषों के गुण की कीर्ति की है; अन्य की कीर्ति सुनकर स्वयं सुखी हुआ है; अन्य के दोष देखकर स्वयं ने उन्हें दबाया है; अपने मुख से देव, गुरु, धर्म की महिमा की है; विनयपूर्वक माता, पिता आदि गुरुजनों की सेवा की है-इत्यादि पुण्यभावों से कीर्तिमान होता है।

शंका 15: हे त्रयज्ञानी ! इस जीव को समस्त कुटुम्ब दुःखदायक किस पाप से होता है ?
समाधानः हे शिष्य ! जिसने अन्य कुटुम्बों में परस्पर साता देखकर स्वयं दुःख माना है; अन्य कुटुम्बों में कलह देखकर सुख पाया है, अन्य घरों में पारस्परिक भ्रातृ स्नेह देखकर, स्वयं ने दगाबाजी से झूठे वचन बनाकर यहाँ की वहाँ, वहाँ की यहाँ कहकर पारस्परिक द्वेष कराके हर्ष माना है – इत्यादि पाप चेष्टा से समस्त कुटुम्बी जन दुःखदायक होते हैं।

शंका 16: हे जगत पूज्य ! समस्त कुटुम्ब सुखदायक किस पुण्य से होता है ?

समाधानः हे वत्स ! हे आर्य !! जिसने अन्य कुटुम्बों में पारस्परिक द्वेष देखकर अपनी बुद्धि के बल से, उनका पारस्परिक स्नेह कराके, उन्हें सुखी किया है; अन्य कुटुम्बों में पारस्परिक स्नेह देखकर, सभी को सातामय देखकर, स्वयं ने हित पाया है, स्वयं सुखी हुआ है; अन्य कुटुम्बों को सुखी करने के लिए बहुत धन दिया है; शारीरिक कष्ट तथा बुद्धि के प्रकाश से अन्य कुटुम्बों में साता की है-इत्यादि शुभभावों से समस्त कुटुम्ब सुखदायक प्राप्त होता है।


शंका 17: हे संघनाथ ! शरीर में रोगों का समूह किस पाप से होता है ?

समाधानः गुरु कहते हैं कि जिसने पूर्वभव में किसी को औषधि दान देते समय निषेध किया है, अन्य के शरीर में रोग देखकर जो सुखी हुआ है, अन्य के शरीर को रोगरहित देखकर स्वयं दुःख पाया है, अन्य जीवों के लिए रोग की वांछा की है; अन्य के शरीर में रोग देख बहुत ग्लानि की है; रोगी जीवों को देखकर उन पर दयाभाव नहीं किया है; अन्य जीवों के शरीर में रोग बढ़ने के लिए, छल से उन्हें अनेक वस्तुयें खिला दी हैं; कभी औषधि दान नहीं दिया है; अन्य के शरीर में रोग देखकर, उनकी हँसी कर उन्हें चिढ़ाया है; उनकी निंदा की है-इत्यादि पापभावों से शरीर में रोग होते हैं।

शंका 18: हे प्रभो ! यह जीव निरोग शरीर किस पुण्य से प्राप्त करता है ?
समाधानः हे वत्स ! जिस जीव ने पूर्वभव में सुपात्रों के शरीर में रोग की बाधा देखकर, उन्हें भोजन के समय प्रासुक औषधि देकर, साता उत्पन्न की है; दीन-दुखियों के शरीर में रोग देखकर, करुणाभावपूर्वक रोग नष्ट करने के लिए उन्हें औषधि दान दिया है; अन्य के शरीर में रोग देखकर, उन पर अनुकम्पा की है; अन्य का शरीर निरोग देखकर सुखी हुआ है; अन्य के शरीर में रोग देखकर ग्लानि नहीं की है; अपितु उनके प्रति दयापूर्वक साता की है, इत्यादि शुभभावों से रोगरहित शरीर होता है।

शंका 19: हे गुरुनाथ ! जीवों में क्रूर परिणामी, दुर्जन स्वभाव किस पाप कर्म के उदय से होता है ?
समाधानः हे भव्यात्मा ! दुराचारी नरकों के निवास में बहुत कालपर्यंत दुःख भोगते हुए नरक से निकला हुआ प्राणी पूर्व पाप के कारण महाक्रोधी, दुराचारी, क्रूर परिणामी होता है। पूर्व भव में मनुष्यायु का बंध होने के बाद कुसंग का निमित्त पाकर महाक्रूर, हिंसामय प्रवर्तन करनेवाला जीव, पूर्व की वासना के कारण दुराचारी, क्रोधी होता है; परभव बुरा होने पर भी कर्म चेष्टा से क्रूर परिणामी होता है।

शंका 20: हे गुरो ! यह जीव सज्जन भाव सहित किस पुण्य से होता है ?

समाधानः हे वत्स ! देवगति आदि शुभगति से आया हुआ जीव, पूर्वभव की भली चेष्टा के कारण, उसकी वासना से दयाभाव के फल में महापुरुषों की संगति पाकर, वहाँ भला उपदेश सुनकर सज्जन स्वभावी होता है; अन्य जीवों की सज्जनता देखकर हर्षित होता है; बड़े गुरुजनों की सेवा, शुश्रूषा, वैयावृत्ति करता है— इत्यादि पुण्यभावों से सज्जन स्वभावी होता है।

शंका 21: हे गुरो ! यह जीव समताभावी किस पुण्य से होता है ?

समाधानः हे धर्मार्थी ! सुनो !! जो भव्य जीव पूर्वभव में मुनि-श्रावकों की शांत मुद्रा देखकर हर्षित होता है; जिनेन्द्रदेव की पद्मासन या कायोत्सर्ग शांत मुद्रा देखकर जिसने अनुमोदना की है; अन्य जीवों के क्रूर वचन सुनकर, समता धारण कर, उन पर क्रोधभाव नहीं किया है; अन्य की क्रूरता देखकर स्वयं उन पर दया करता है; संसार की विडम्बना देखकर संसार से उदास रहता है; धन-शरीर आदि सम्पदा सामग्री को चंचल देखकर, राग-द्वेषादि भावों को दुःखदाता जानकर, क्रोध-मानादि का त्यागकर मंद कषायरूप रहता है, इत्यादि शुभभावों से समताभाव प्रगट होता है।

शंका 22: हे जगतगुरु ! यह जीव धर्मात्मा (व्यवहार धर्मात्मा) किस पुण्य से होता है ?
समाधानः हे भव्यात्मा ! हे भद्र परिणामी !! जिन जीवों ने पूर्वभव में महा समता भाव धारण किए
हैं; धर्मात्मा जीवों को धर्मसेवन करते हुए देखकर अनुमोदना करके पुण्य उपार्जित किया है, अनेक
जीवों पर दयाभाव किए हैं, धार्मिक उत्सव देखकर हर्ष पाया है; धर्म के अनेक भेद हैं, उनमें से जिस
जाति के धर्म का अंग देखकर, स्वयं ने अनुमोदना की है, उस जाति के धर्म-अंग का लाभ परभव में
जीव को होता है। वह इसप्रकार –
जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य धर्मात्मा जीवों को तप करते हुए देखकर हर्ष किया है, तपस्वी
पुरुषों की सेवा-शुश्रुषा की है; तप को उत्कृष्ट सुखदाता जानकर, उसे करने की अभिलाषा की है-
इत्यादि प्रकार से तप अंग की अनुमोदना के फलस्वरूप भवान्तर में तपधर्म का लाभ प्राप्त होता है।
जिसने अन्य को भगवान की पूजा-स्तुति करते देखकर उसकी अनुमोदना की है, भगवान के
भक्तजनों को देखकर, उनके प्रति प्रीतिभावपूर्वक उनकी सेवा-शुश्रुषा की है, स्वयं को भी भगवान
की पूजा करने की अभिलाषा अत्यधिक रही है- इत्यादि रूप में पूजा की अनुमोदना, चाह रूप
भावों के फलस्वरूप भवान्तर में प्रभु की पूजा के भाव होते हैं। पूजारूप धर्म का अंग प्राप्त होता है।
जिन जीवों ने पूर्वभव में अन्य जीवों को नियम, प्रतिज्ञा लेते देखकर; घृत, दुग्धादि रसों का
त्याग करते देखकर; ताम्बूल, वस्त्रादि परिग्रह का परिमाण करते देखकर तथा दयाभाव सहित
प्रवृत्ति करते देखकर उनकी प्रशंसा की है; अन्य संयमियों को देखकर संयम की अभिलाषा की है
इत्यादि संयम की अनुमोदना के फल से भवान्तर में संयमरूप सम्पदा प्राप्त होती है।
जिन्होंने पूर्वभव में अन्य जीवों को सिद्धक्षेत्र की यात्रा के लिए गमन करते हुए देखकर तथा
सिद्धक्षेत्र की वंदना के लिए संघ जाते हुए देखकर उनकी अनुमोदना की है; सिद्ध क्षेत्र-यात्रा की
अभिलाषा रखी है; सिद्धक्षेत्र-यात्रा करनेवालों की सहायता कर, साता उत्पन्न कर, उन्हें सुखी
किया है, इत्यादि पुण्यभावों से उन्हें भवान्तर में सिद्धक्षेत्र की यात्रा का बहुत लाभ होता है।
जिसने पूर्वभव में आचार्यों को उपदेश देता देखकर, उन धर्मात्मा पुरुषों का उपदेश सुनकर,
उनके ज्ञान की, शान्ति भावना की प्रशंसा की है; धर्म के उपदेशदाता की भक्ति करके आनन्द माना
है- इत्यादि भावों से धर्मोपदेश देने योग्य उत्तम ज्ञान प्राप्तकर अपना तथा अन्य जीवों का कल्याण
करता है।
इसप्रकार धर्म-अंगों के अनेक भेद हैं। धर्म के जिस-जिस अंग की स्वयं ने सहायता की है,
अनुमोदना की है; उसी धर्म के अंग का लाभ होता है, धर्म का फल उत्पन्न होता है।

शंका 23: हे नाथ ! यह जीव किस पुण्य से बलवान होता है ?
समाधानः हे भव्य ! जिन जीवों ने पूर्वभव में दीन जीवों की दयाकर रक्षा की है। असमर्थ जीवों
को देखकर, उनके प्रति दयाभावपूर्वक, उनके दुःख नष्टकर, सुखी करने के लिए, अनेक उपाय
करके रक्षा की है। निर्बल जीवों को दयाभावपूर्वक अच्छा भोजन-पान देकर सुखी किया है। नंगों को
वस्त्र और रोगियों को औषधि देकर उन्हें पुष्ट किया है। अनेकप्रकार से साता उत्पन्न कर अन्य जीवों
की भी रक्षा की है- इत्यादि शुभभावों से जीव भवान्तर में बलवान होता है।

शंका 24: हे नाथ ! हे यतिपति !! यह जीव किस पाप से निर्बल होता है ?

समाधानः हे वत्स ! जिन जीवों ने अन्य जीवों का भोजन-पान बंद कर उन्हें निर्बल किया है; बलरहित दीन जीवों को देखकर, उनकी हँसी करके, उन्हें लज्जित किया है; बलरहित जीवों को मारा है, बाँधा है, लटकाया है; स्वयं को बलवान समझकर अपने बलमद के सामने अन्य को बलरहित समझकर, अनेकप्रकार से भयभीत कर दुखी किया है; अपने बलमद के वशीभूत हो सिंह- हस्ती के समान मदोन्मत्त हो प्रवृत्ति की है; अन्य जीवों का बल देखकर स्वयं ने द्वेषभाव किया है- इत्यादि पापभावों से बलरहित होता है।


शंका 25: हे नाथ ! यह जीव किस पाप से भयवान, कायर चित्त का धारक होता है ?

समाधानः हे भव्यात्मा ! सुनो !! जिस जीव ने अन्य जीवों को अनेकप्रकार से भयभीत किया है, प्राणनाश का भय दिखाकर कम्पित किया है, धन-नाश का भय दिखाया है, घर-लूटने का भय दिखाया है, उसकी इज्जत नष्ट करने का भय दिखाया है। घर के व्यक्तियों को पकड़ने का भय दिखाया है। राजा का, पंच का भय दिखाकर भयभीत किया है; चोर; सिंह, हस्ती इत्यादि पशुओं का भय दिखाकर दुखी किया है। युद्ध से भागते, भयभीत दीन जीव की हँसी की है; अन्य को भयवान, कायर देखकर स्वयं हर्षायमान हुआ है— इत्यादि दयारहित भावों से कायर, भयवान होता है।

शंका 26: हे गुरो ! यह जीव शूरवीर, निर्भय किस पुण्य से होता है ?

समाधानः हे वत्स ! जिस जीव ने पूर्वभव में दीन जीवों को अभयदान दिया है, करुणापूर्वक अन्य जीवों की रक्षा की है, किसी जीव ने किसी दीन-दुःखी को भय दिखाकर यदि दुखी किया है तो उसे देखकर स्वयं दयाभावपूर्वक अपने बाहुबल से उस दीन को दुष्ट से बचाकर, सुखी करके, भयरहित किया है; त्रस-स्थावर जीवों के प्रति दयाभाव रखे हैं; अनेक जीवों को राज्य, पंच, दुष्ट, सिंहादि जीवों के उपद्रव से बचाकर निर्भय किया है; भयवान जीवों के प्रति दयाभावपूर्वक स्थिर भाव किए हैं, भयरहित सुखी जीवों को देखकर स्वयं सुखी हुआ है– इत्यादि शुभभावों के फल में निःशंक चित्त का धारक, शूरवीर होता है।


शंका 27: हे गुरुजी ! यह जीव चित्त की उदारतापूर्वक दाता किस पुण्य से होता है ?

समाधानः गुरु कहते हैं कि हे भव्यात्मा ! जिस जीव ने अन्य जीवों को सुपात्र दान देते देख अनुमोदना की है; दीन, दुःखी, भूखे जीवों को देखकर उनके प्रति दया की है; दान देने की अत्यधिक अभिलाषा की है, धर्म के लिए धन देते समय सुखी हुआ है– इत्यादि शुभभावों से उदारतापूर्वक दाता होता है।

शंका 28: हे यतिपति ! यह जीव कंजूष किस कर्म के उदय में होता ? उसे कहिए।

समाधानः जिस जीव ने पूर्वभव में किसी जीव को दान देते हुए निषेध किया है, अन्य को धन– खर्च करते हुए देखकर स्वयं दुखी हुआ है, पूर्वभव में विविध कष्ट सहन कर धन जोड़कर भी उसे न तो स्वयं ने खाया है और न ही अन्य को खिलाया है तथा धन और भी संग्रह करने की अभिलाषा रही है, अत्यंत तीव्र तृष्णा के भावों से मरण किया है, दूसरों के दान की निंदा की है–इत्यादि पापभावों से कृपणता सहित लोभी होता है।

शंका 29: यह जीव किस कर्म से पण्डित होता है ?

समाधानः जिस जीव ने पूर्वभव में विद्या का दान दिया है; अन्य को पण्डित, विद्यावान जीव देखकर उनकी सेवा-शुश्रुषा की है। अज्ञानी जीवों की संगति के प्रति जिन्हें अरुचि रही है। धर्मशास्त्रों के वेत्ता जीवों की स्तुति की है। धर्मशास्त्रों को स्वयं लिखकर, घर-धन खर्च करके भी लिखाकर धर्मात्मा जीवों को पठन-पाठन के लिए दिए हैं; उन शास्त्रों के पृष्ठ, कवर, बंधन आदि उपकरण उत्तम कराए हैं। शास्त्राभ्यास करने की बहुत अभिलाषा की है, अन्य विद्याभिलाषी भव्य जीवों को धर्म शास्त्र का ज्ञान कराया है– इत्यादि पुण्य भावों से पण्डित होता है।

सुदृष्टि तरंगिणी — शंका 30, 31

शंका 30: हे नाथ ! हे तपोधन !! यह जीव मूर्ख किस पाप से होता है ?
समाधानः गुरु कहते हैं कि जिस जीव ने पण्डितों की हँसी की है, धर्मशास्त्रों को सुनने के प्रति अरुचिभाव किया है, धर्मशास्त्र चुराए हैं; उनके बंधन, पृष्ठ, कवर चुराए हैं, धर्मार्थी पण्डितों के प्रति द्वेषभाव किया है– इत्यादि पापों से मूर्ख होता है।

शंका 31: हे गुरो ! यह जीव किस पाप से पराधीन होता है ?
समाधानः हे भव्य ! जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य जीवों को बंदी में रखा है, अन्य जीवों को अल्प धन देकर अपने वशीभूत किया है, निर्धन जीवों को कर्ज आदि देने से रोका है; उन्हें तुच्छ– अल्प अन्न-जल देकर अपने वश में रखता है; बलात्कार, जोर-जबरदस्ती से अन्य जीवों को अपने अधीन रखता है; पराधीन जीवों की हँसी की है; पशुओं को रखकर उन्हें तृण-जल देने में प्रमादी रहा है– इत्यादि पापभावों से पराधीन होता है।

शंका 32: हे प्रभो ! यह जीव किस पुण्य से स्वाधीन होता है ?

समाधानः जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य को भोजन-पान देकर कुटुम्ब सहित उनकी स्थिरता की है, दीन जीवों को भोजन-पान देकर सातोत्पादक वचन कहकर, उन्हें निराकुल किया है; पराधीन जीवों को देखकर जिसे उनके प्रति अनुकम्पा उत्पन्न हुई है; अन्य जीवों को स्वाधीन, सुखी देखकर स्वयं साता पायी है- इत्यादि पुण्य से स्वाधीन होता है।

शंका 33: हे गुरो ! यह जीव किस पाप से कुरूप होता है ?

समाधानः हे भव्यात्मा ! जिस जीव को पूर्वभव में अन्य के रूप की महिमा अच्छी नहीं लगी है, किसी पाप के उदय से रूपरहित हुए जीवों के शरीर के प्रति ग्लानि करनेवाला जीव कुरूप होता है। जिसने कुरूप मनुष्य को देखकर उसकी हँसी की है, अन्य का अच्छा रूप देखकर उसे दोष लगाया है; अन्य के अच्छे रूप को विभूति (राख/भस्म) धूल, कर्दम आदि लगाकर विपरीत किया है- इत्यादि कुभावों से कुरूप होता है।

सुदृष्टि तरंगिणी: शंका 34, 35

शंका 34: हे ज्ञानमूर्ति ! यह जीव रूपवान किस पुण्य से होता है ?

समाधानः हे वत्स ! जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य जीवों का रूप देखकर, निर्विकार चित्त से देखने का सुख माना है; अन्य जीवों का कुरूपता के कारण अनादर हुआ देखकर, उनके प्रति दयाकर, रूपवान होना चाहा है, धर्म का सेवन कर रूपवान होना चाहा है-इत्यादि शुभभावों से रूपवान होता है।

शंका 35: हे धर्ममूर्ति ! इस जीव को पुण्य के उदय से अनेक भोग्य वस्तुयें मिल जाने पर भी उन्हें नहीं भोग सकना, किस पाप का फल है ?

समाधानः जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य जीव को अन्न, जल, मेवा, पान, मिठाई इत्यादि खाने में अंतराय किया है; उन्हें द्वेषभाव से भली वस्तु खाने नहीं दी है। अन्य को सूखी-रूखी, कोरी, रसरहित खाता देखकर स्वयं प्रसन्न हुआ है। अन्य को सुखपूर्वक भोजन-पान करते देखकर अच्छा नहीं लगा है। अन्य को भूखा-प्यासा देखकर, उनकी हँसी की है; दुर्वचन कहकर दुःखी किया है; स्वयं रसना इन्द्रिय का लोलुपी होकर, विविध भोग्य वस्तुयें भोगी हैं; अपना विषय पुष्ट करने के लिए अनेकप्रकार से छल, बल, दगाबाजी करके रसनादि के विषय भोग कर सुख माना है; श्वान, मार्जारादि पशुओं को अन्य (जीवों का) भोजन ले जाता देखकर स्वयं सुखी हुआ है - इत्यादि पापों से विद्यमान वस्तु भी भोग नहीं पाता है। यदि कदाचित् लोभ के वशीभूत हो दुग्धादि अच्छी वस्तुयें खाये भी तो शरीर में रोग बढ़ने से दुःखी होता है; अंतराय कर्म के उदय से अच्छी वस्तु पचती नहीं है।

सुदृष्टि तरंगिणी : शंका 36, 37

शंका 36: हे सुखमूर्ति ! घर में सुंदर स्त्री, वस्त्र, आभूषण, हस्ती, घोड़े, रत्न आदि उपभोग योग्य भली वस्तुयें विद्यमान होने पर भी भोग नहीं सकता; यह किस पाप का फल है ?

समाधानः जिस जीव को पूर्वभव में अन्य के हाथी, घोड़े, स्त्री, वाहनादि उपभोग योग्य पदार्थ सुंदर देखकर अच्छा नहीं लगा है; उनके भले पदार्थ देखकर जिसने छल-बल द्वारा उन्हें लूट लिया है; भय दिखाकर बलात् छीनकर उन्हें स्वयं भोगा है; उपभोग योग्य दूसरों के भले पदार्थ देखकर जिसे प्रसन्नता नहीं हुई है; दूसरों के घर में रत्न, हस्ती आदि अच्छी वस्तुयें देखकर जो उन्हें भय दिखाता है कि ये अच्छी वस्तुयें राजा से छिनवा दूँगा; अथवा कहता है कि ये वस्तुयें राजा देखेगा तो छीन लेगा-इत्यादि पाप से, प्राप्त हुई अच्छी वस्तु भी नहीं भोग सकता है।

शंका 37: हे गुरो ! यह जीव किस पाप से तीव्र क्रोध का धारक होता है ?

समाधानः हे वत्स ! पूर्वभव में जिस जीव ने क्रोधी जीवों को क्रोध करते देखकर भला जाना है; पूर्वभव में अन्य जीवों के साथ युद्ध करने का जिसका अत्यधिक स्वभाव रहा है, अन्य को युद्ध करते देखकर सुख माना है; पूर्वभव में स्वयं सिंह, सूकर, श्वान, सर्प, भीलादि की पर्याय धारण कर अन्य जीवों को विविध पीड़ायें दी हैं; समता भाव के धारक धर्मात्माओं को देखकर उनके समभाव की निंदा की है; शांत परिणामी जीवों की हँसी की है- इत्यादि पापों से महाक्रोधी होता है।

सुदृष्टि तरंगिणी : शंका 38, 39

शंका 38: हे गुरो ! स्वयं मान चाहते हुए भी इस जीव को मान नहीं मिल पाता; यह किस पाप का फल है ?

समाधानः हे भव्यात्मा ! जिस जीव ने अन्य जीवों का मान नहीं रखा है; अपने तन, धन, यौवन, राज, आज्ञा, बल इत्यादि के गर्व से अन्य जीवों का अनादर किया है; जो स्वयं को भला मनुष्य जानकर अन्य जीवों से शीश झुकवाता है; उन्हें शीश झुकाते देखकर, अपने मानभाव से उन्हें तुच्छ जानकर, बाद में उन्हें नमस्कार नहीं करता है; गुरुजनों की आज्ञा से प्रतिकूल हो स्वच्छंद प्रवर्तन करता है, बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन करता है; दीन जीवों को भय दिखाकर बलात् अपने पैरों से झुकाकर, उनका मान खण्डित करता है; कहीं किसी का मान खण्डित हुआ सुनकर, स्वयं सुख पाता है- इत्यादि क्रूर भावों से अपमानित होता है; मान चाहने पर भी मान नहीं मिलता है।

शंका 39: हे दयासागर ! अपना मान कराना नहीं चाहने पर भी, बिना चाहे ही अन्य जीव आ-आकर मस्तक झुकाते हैं, आज्ञा मानते हैं, सेवा करते हैं- ऐसी महिमा किस पुण्य से होती है ?

समाधानः हे भव्य ! सुनो !! जिस जीव ने पूर्वभव में महाभक्तिपूर्वक शुभ भावों से देव, धर्म, गुरु की सेवा-पूजा विनयसहित मस्तक झुकाकर की है; उसके फल में जिनकी सेवा देव करते हैं ऐसा इंद्र होता है, मनुष्यों का इंद्र चक्रवर्ती होता है, अर्धचक्री होता है, अनेक राजाओं द्वारा वंदनीय महामण्डलेश्वर राजा होता है-इत्यादि पद का धारी पृथ्वीपति होता है; उन्हें बड़े-बड़े महंत राजा स्वयं ही भक्तिपूर्वक शीश झुकाते हैं। जिस जीव ने पूर्वभव में माता-पिता आदि गुरुजनों की सेवा करने के लिए बारम्बार शीश झुकाकर विनयपूर्वक शुश्रुषा की है; उस पुण्य से समस्त कुटुम्ब आज्ञाकारी होता है, वह सभी में आदर पाता है। जिसने पूर्वभव में अन्य जनों का, अपने से उम्र में बड़े-पुरुषों का विनयपूर्वक मान रखकर साता पहुँचाई है, आदर किया है; वह जीव बड़ी-बड़ी उम्र धारक पुरुषों द्वारा वंदनीय, सराहनीय होता है। अपने से बड़ी-बड़ी उम्रवाले जीव आ-आकर शीश झुकाते हैं, मान रखते हैं। विवेकी, संसार-रचना को जाननेवाले, धर्मशास्त्र का रहस्य समझनेवाले, यथायोग्य विधिवेत्ता जिस जीव ने बल, कुल, धन, बुद्धि, वय इत्यादि में छोटों की यथायोग्य विनयकर, सत्कार कर, उन्हें साता पहुँचाई है, उन सभी का मान रखा है; वह जीव जगत में प्रशंसा प्राप्त कर, सभी को पूज्य होता है। स्वयमेव जगत के जीव आ-आकर उसे शीश झुकाते हैं, उसका मान रखते हैं-इत्यादि रूप में पदधारी होता है।

जिसने किसी जीव का ‘मान’ खण्डित नहीं किया है, आदरपूर्वक अन्य जीवों को अनेकप्रकार से सुखी किया है- इत्यादि शुभभावों के फल में ऐसा पद प्राप्त होता है कि जिससे स्वयं मान की चाह नहीं होने पर भी, अन्य जीव स्वेच्छा से, इसके प्रति स्नेह पूर्वक आ-आकर शीश झुकाते हैं, आदर करते हैं।- ऐसा जानना।

सुदृष्टि तरंगिणी : शंका 40, 41

शंका 40: हे गुरुनाथजी ! यह जीव दगाबाज मायावी किस पाप से होता है ?

समाधानः हे वत्स ! दगाबाज के अनेक भेद हैं। उसमें से जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य के भले तप को देख, उसमें दोष लगाकर, उसकी निंदा की है; वह भवान्तर में जब कभी मनुष्य होकर तप धारण करता है तो उस पाप के फल से उस तप को मान के लिए करता है। अंतरंग में धर्म की इच्छा के बिना ही, लोगों में पूज्यता पाने के लिए, दगाबाजी भावपूर्वक तपस्वी होता है। उसके तप में छल होता है। वह प्रच्छन्नरूप में भोजन लेकर दूसरों को अनशन तप बताता है, इत्यादि रूप में तप पालता हुआ, छल सहित तपस्वी होता है। जिस जीव ने अन्य के अच्छे दान में दोष लगाया है, छलपूर्वक निंदा की है, वह जीव जब कभी भवान्तर में मनुष्य होकर दान देता है तो इस पाप के कारण कपटपूर्वक दान देनेवाला होता है। स्वयं दान देकर लोगों को तो अधिक द्रव्य बताता है और स्वयं थोड़ा ही धन दान में देता है। ‘इसका दान कपटपूर्ण है’-ऐसा लोगों को ज्ञात होने पर इसकी निंदा होती है। वस्त्र देते समय जीर्ण वस्त्र देकर ‘बहुमूल्य नवीन वस्त्र दिए’-ऐसा कहता है, इत्यादि रूप में पापभावों से दान में कपट करनेवाला होता है। जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य के भले धर्म, पूजा, सामायिक, ध्यान, अध्ययन आदि अनेक धार्मिक अंगों को देखकर, शुद्ध धर्म के अंगों में दोष लगाया है; उसे भवान्तर में कभी मनुष्यरूप में उत्पन्न होने पर धर्म का सेवन करते हुए भी, उस पाप के फल में वह भावरहित होता है; प्रभु की पूजा भी भावरहित ही करता है, अल्प धन लगाकर भी लोगों से कहता है कि हमने अधिक धन लगाया है; घर में धन होते हुए भी, धर्म कार्य में धन का काम पड़ने पर, अपनी दगाबाजी, चतुराई से अपना निर्धनपना बताकर, घर का दुःख बताता है, धर्म में धन खर्च नहीं करता है; उस पाप के फल से धन रहित हो धर्म में छल-कपट करता है। जिसने पूर्वभव में अन्य के ध्यान में दोष लगाया है, उसकी हँसी की है; वह उसके पाप से भवान्तर में दोषसहित ध्यान का धारक होता है, बगुला के समान कुध्यानी होता है, धार्मिक अंग का सेवन भी कपटपूर्वक करता है, पूर्वभव में दगा सहित धर्म का सेवन करनेवालों के पाखण्ड को देखकर उनकी प्रशंसा की है- इत्यादि पापभावों से जीव कपटपूर्वक धर्म करनेवाला होता है। जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य जीवों को कुटुम्ब के साथ छल-कपट करते देख सुख पाया है; वह जीव भवान्तर में कुटुम्ब के साथ कपट करनेवाला होता है। जिस जीव ने पूर्वभव में अन्य को कपटपूर्वक आजीविका पूर्ण करते देखकर, उसके कपट की प्रशंसा की है, सुख पाया है; वह जीव भवान्तर में कपटपूर्वक अपनी आजीविका पूर्ण करनेवाला होता है। मायाचारी के और भी अनेक भेद हैं। पूर्वभव में जैसी मायाचारी अच्छी लगी है; उसी मायाचारी रूप में उत्पन्न होता है, इत्यादि रूप में भले धार्मिक कार्यों को भी जैसी मायाचारी पूर्वक जाना है; उसी जाति के धार्मिक, मायाचारी रूप में उत्पन्न होता है। जैसे कर्म, कार्यों में दोष लगाया है, वैसी जाति के कर्म, कार्यों में मायाचारी उत्पन्न होता है।

शंका 41: हे गुरो ! यह जीव चोर किस पाप से होता है ?

समाधानः जिसने पूर्वभव में चोरों को भला जाना है, चोरों के साथ व्यापार कर उनका बड़ा लाभ खाया है, चोरों के साथ संबंध रखा है; चोरों का सहयोग करके अन्य का धन लुटवाया है, अपने मन में अन्य का धन चुराने की अभिलाषा रखी है, इत्यादि पापभावों से जीव चोर होता है।

सुदृष्टि तरंगिणी: शंका 42, 43

शंका 42: हे गुरो ! यह जीव हिंसा करनेवाला किस कर्म से होता है ?
समाधानः जिसने पूर्वभव में हिंसा को अच्छा जाना है, हिंसक जीवों को हिंसा करते हुए देखकर उनकी अनुमोदना की है, पूर्वभव में हिंसा करने की अनेक कलायें, चतुराई सीखी हैं, पूर्वभव में हिंसा के अनेक उपकरण स्वयं बनाये हैं। तीर, तुपक, जाली, फंदा, चेप, गुलेल, सेल्ह, बर्छा आदि अनेक शस्त्र रखकर स्वयं सुखी हुआ है। शस्त्रों को उज्जवल करने की, तीक्ष्ण करने की चतुराई पूर्वभव में की है; पूर्वभव में शस्त्र बेचे हैं, बनाये हैं-इत्यादि पापों से परभव में शस्त्र से मरता है तथा स्वयं हिंसक होता है।

शंका 43: हे जगत गुरो ! यह जीव किस पाप से क्रियारहित, अनाचारणी होता है ? भोजन-पान की सुध बिना सदैव विकल्प जाल में उलझे रहना, किस पाप का फल है ?
समाधानः पूर्वभव में जिसने शुभाचरणी जीवों की निंदा की है, भला आचरण देखकर जिसे अच्छा नहीं लगा है, आचरण करने में प्रमादी रहा है, पूर्वभव में अन्य की उच्छिष्ट (झूठन) खाकर सुख माना है। पहले पूर्वभव में, श्वानादि रूप पशु पर्याय में अशुभ भक्षण किया है। सिंह की पर्याय में तथा अन्य पशुओं की पर्याय में खाद्य-अखाद्य का विवेक नहीं करते हुए, विचार रहित प्रवर्तन किया है। अन्य को अभक्ष्य वस्तुयें खाते देखकर स्वयं सुखी हुआ है; अनाचरणी जीवों के बीच में विशेष रहा है, अनाचरणी जीवों की प्रशंसा की है, अन्य का अनाचरण देखकर, स्वयं को अनाचरण करने की अभिलाषा रही है इत्यादि पापों से यदि पशु होता है तो श्वान, वायस, गर्दभ आदि अशुभ भक्षकरूप पर्याय धारण करता है; और यदि मनुष्य होता है तो भीलादि नीच कुल में होता है। यदि कदाचित् उच्चकुल में जन्म लेता है तो शूद्रसमान अनाचरणी होता है।