सुदृष्टि तरंगिणी : शंका 38, 39
शंका 38: हे गुरो ! स्वयं मान चाहते हुए भी इस जीव को मान नहीं मिल पाता; यह किस पाप का फल है ?
समाधानः हे भव्यात्मा ! जिस जीव ने अन्य जीवों का मान नहीं रखा है; अपने तन, धन, यौवन, राज, आज्ञा, बल इत्यादि के गर्व से अन्य जीवों का अनादर किया है; जो स्वयं को भला मनुष्य जानकर अन्य जीवों से शीश झुकवाता है; उन्हें शीश झुकाते देखकर, अपने मानभाव से उन्हें तुच्छ जानकर, बाद में उन्हें नमस्कार नहीं करता है; गुरुजनों की आज्ञा से प्रतिकूल हो स्वच्छंद प्रवर्तन करता है, बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन करता है; दीन जीवों को भय दिखाकर बलात् अपने पैरों से झुकाकर, उनका मान खण्डित करता है; कहीं किसी का मान खण्डित हुआ सुनकर, स्वयं सुख पाता है- इत्यादि क्रूर भावों से अपमानित होता है; मान चाहने पर भी मान नहीं मिलता है।
शंका 39: हे दयासागर ! अपना मान कराना नहीं चाहने पर भी, बिना चाहे ही अन्य जीव आ-आकर मस्तक झुकाते हैं, आज्ञा मानते हैं, सेवा करते हैं- ऐसी महिमा किस पुण्य से होती है ?
समाधानः हे भव्य ! सुनो !! जिस जीव ने पूर्वभव में महाभक्तिपूर्वक शुभ भावों से देव, धर्म, गुरु की सेवा-पूजा विनयसहित मस्तक झुकाकर की है; उसके फल में जिनकी सेवा देव करते हैं ऐसा इंद्र होता है, मनुष्यों का इंद्र चक्रवर्ती होता है, अर्धचक्री होता है, अनेक राजाओं द्वारा वंदनीय महामण्डलेश्वर राजा होता है-इत्यादि पद का धारी पृथ्वीपति होता है; उन्हें बड़े-बड़े महंत राजा स्वयं ही भक्तिपूर्वक शीश झुकाते हैं। जिस जीव ने पूर्वभव में माता-पिता आदि गुरुजनों की सेवा करने के लिए बारम्बार शीश झुकाकर विनयपूर्वक शुश्रुषा की है; उस पुण्य से समस्त कुटुम्ब आज्ञाकारी होता है, वह सभी में आदर पाता है। जिसने पूर्वभव में अन्य जनों का, अपने से उम्र में बड़े-पुरुषों का विनयपूर्वक मान रखकर साता पहुँचाई है, आदर किया है; वह जीव बड़ी-बड़ी उम्र धारक पुरुषों द्वारा वंदनीय, सराहनीय होता है। अपने से बड़ी-बड़ी उम्रवाले जीव आ-आकर शीश झुकाते हैं, मान रखते हैं। विवेकी, संसार-रचना को जाननेवाले, धर्मशास्त्र का रहस्य समझनेवाले, यथायोग्य विधिवेत्ता जिस जीव ने बल, कुल, धन, बुद्धि, वय इत्यादि में छोटों की यथायोग्य विनयकर, सत्कार कर, उन्हें साता पहुँचाई है, उन सभी का मान रखा है; वह जीव जगत में प्रशंसा प्राप्त कर, सभी को पूज्य होता है। स्वयमेव जगत के जीव आ-आकर उसे शीश झुकाते हैं, उसका मान रखते हैं-इत्यादि रूप में पदधारी होता है।
जिसने किसी जीव का ‘मान’ खण्डित नहीं किया है, आदरपूर्वक अन्य जीवों को अनेकप्रकार से सुखी किया है- इत्यादि शुभभावों के फल में ऐसा पद प्राप्त होता है कि जिससे स्वयं मान की चाह नहीं होने पर भी, अन्य जीव स्वेच्छा से, इसके प्रति स्नेह पूर्वक आ-आकर शीश झुकाते हैं, आदर करते हैं।- ऐसा जानना।