(३) चन्दनबाला (वसुमती)
बिहार प्रान्त में जो स्थान आजकल चम्पारन के नाम से प्रसिद्ध है, प्राचीन समय में वहाँ चम्पापुरी नाम की विशाल नगरी थी।
वह अङ्गदेश की राजधानी थी। नगरी व्यापार का केन्द्र, धन धान्य आदि से समृद्ध तथा सब प्रकार से रमणीय थी।
वहाँ दधिवाहन नाम का राजा राज्य करता रहता था। वह न्याय, नीति तथा प्रजा पालन आदि गुणों का भण्डार था। प्रजा पर पुत्र के समान प्रेम रखता था और प्रजा भी उसे पिता मानती थी। ऐसे राजा को प्राप्त करके प्रजा अपने को धन्य समझती थी।
दधिवाहन राजा की धारिणी नाम की रानी थी। पतिसेवा, धर्म पर श्रद्धा, उदारता, हृदय की कोमलता आदि जितने गुण राजरानी में होने चाहिएं वे सब धारिणी में विद्यमान थे। राजा तथा रानी दोनों धर्मपरायण थे। दोनों में परस्पर अगाध प्रेम था।
दोनों विलासिता से दूर थे। राज्य को भोग्य वस्तु न समझ कर वे उसे कर्तव्य-भार मानते थे। परस्पर सहयोग से प्रजा का पालन करते हुए दोनों अपने जीवन को सुखपूर्वक बिता रहे थे।
कुछ दिनों बाद धारिणी ने एक महान् सुन्दरी कन्या को जन्म दिया। उज्ज्वल रूप तथा शुभ लक्षणों वाली उस पुत्री के जन्म से माता पिता को बड़ी प्रसन्नता हुई। बड़े समारोह के साथ उसका जन्मोत्सव मनाया। माता पिता ने कन्या का नाम वसुमती रक्खा। उसे देख कर धारिणी सोचा करती थी कि वसुमती को ऐसी शिक्षा दी जाय जिससे यह अपने कल्याण के साथ मानव समाज का भी हित कर सके। बचपन से ही उसे नम्रता, सरलता आदि गुणों की शिक्षा मिलने लगी। उसमें धर्म तथा न्याय के दृढ़ संस्कार जमाए जाने लगे। जैसे जैसे बड़ी हुई उसे दूसरी बातें भी सिखाई जाने लगीं। संगीत, पढ़ना, लिखना, सीना, पिरोना, भोजन बनाना, घर संवारना आदि स्त्री की सभी कलाओं में वह प्रवीण हो गई। उसकी बोली, उसका स्वभाव और उसका रहन सहन सभी को प्रिय लगता था। उसे देख कर सभी प्रसन्न हो उठते थे। सखियाँ उसे देवी मानती थीं। धारिणी उसे देख कर फूली न समाती थी।
धीरे धीरे वसुमती ने किशोरावस्था में प्रवेश किया। उसके शरीर पर यौवन के चिह्न प्रकट होने लगे। गुण और सौन्दर्य एक दूसरे की होड़ करने लगे। सखियाँ वसुमती के विवाह की बातें करने लगीं किन्तु उसके हृदय में अब भी वही कुमार-सुलभ सरलता तथा पवित्रता थी। वासना उसे छूई तक न थी। उसके मुख पर वही बचपन का भोलापन था। चेहरे पर निर्दोष हँसी थी। अपने गुणों से दूसरों को मोहित कर लेने पर भी उसका मन अभिमान से सर्वथा शून्य था, जैसे अपने उन गुणों से वह स्वयं अपरिचित थी।
राजा दधिवाहन को वसुमती के लिए योग्य वर खोजने की चिन्ता हुई किन्तु धारिणी वसुमती से जगत्कल्याण की आशा रखती थी। विवाह बन्धन में पड़ जाने पर यह आशा पूरी होनी कठिन थी। इस लिए वह चाहती थी कि वसुमती आजन्म पूर्ण ब्रह्मचारिणी रह कर महिला समाज के सामने एक महान् आदर्श उपस्थित करे। इसी लिए वसुमती को शिक्षा भी इसी प्रकार की दी गई थी।
उसके हृदय में भी यह भावना जम गई थी कि मैं गार्हस्थ्य के झंझटों में न पड़ कर संसार के सामने ब्रह्मचर्य, त्याग और सेवा का महान् आदर्श रक्खूँ। धारिणी वसुमती के इन विचारों से परिचित थी इस लिए राजा द्वारा विवाह की बात छेड़ी जाने पर धारिणी ने कहा- वसुमती विवाह न करेगी।
एक दिन राजा और रानी अपने महल में बैठे वसुमती के विवाह की बात सोच रहे थे। उसी समय अपने शयनागार में बैठी हुई वसुमती के मस्तिष्क में और ही तरंगें उठ रही थीं। वह विचार रही थी- लोग स्त्रियों को अबला क्यों कहते हैं? क्या उनमें वही अनन्त आत्मशक्ति नहीं है जो पुरुषों में हैं? स्त्रियों ने भी अपने अज्ञान से अपने को अबला समझ लिया है। वे अपने को पराधीन मानती हैं। स्त्रियों की इस अज्ञानता को मैं दूर करूँगी।
उन्हें बताऊँगी कि स्त्रियों में भी वही अनन्त शक्ति है जो पुरुषों में है। वे भी आत्मबल द्वारा मोक्ष की आराधना कर सकती हैं। फिर वे अबला क्यों हैं। प्रभो! मुझे वह शक्ति दो जिससे मैं अपनी बहिनों का उद्धार कर सकूँ।
इस प्रकार विचार करते हुए वसुमती को नींद आ गई। रात के चौथे पहर में उसने एक स्वप्न देखा- चम्पापुरी घोर कष्ट में पड़ी हुई है और मेरे द्वारा उसका उद्धार हुआ है। स्वप्न देखते ही वह जग गई और उसके फल पर विचार करने लगी। बहुत सोचने पर भी उसकी समझ में कोई बात न आई। इसी विचार में वह शय्या से उठ कर पास वाली अशोकवाटिका में चली गई और एक वृक्ष के नीचे बैठ कर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगी।
प्रातःकाल होते ही वसुमती की सखियाँ उसे जगाने के लिए महल में आईं किन्तु वसुमती वहाँ न मिली। ढूंढती ढूंढती वे अशोकवाटिका में चली आईं। वहाँ उसे चिन्तित अवस्था में बैठी हुई देख कर आपस में कहने लगीं- वसुमती को अब अकेली रहना अच्छा नहीं लगता। वह किसी योग्य साथी की चिन्ता कर रही है। वे सब मिल कर वसुमती से विवाह सम्बन्धी तरह तरह के मजाक करने लगीं।
वसुमती को उनकी अज्ञानता पर दया आ गई। वह सोचने लगी- स्त्री समाज का हृदय कितना विकृत हो गया है। उसे इतना भी ज्ञान नहीं है कि विवाह के सिवाय भी चिन्ता का कोई कारण हो सकता है। उसने सखियों को फटकारते हुए कहा- जन्म से एक साथ रहने पर भी तुम मुझे न समफ सकीं। मुझे भी अपने समान तुच्छ-विचारों वाली समफ लिया है। विवाह न करने का तो मैं निश्चय कर चुकी हूँ फिर उससे सम्बन्ध रखने वाली कोई चिन्ता मेरे मन में आ ही कैसे सकती है?
मेरे विचार में प्रत्येक स्त्री पुरुष पर तीन व्यक्तियों के ऋण हैं- माता, पिता और धर्माचार्य। सासू, श्वसुर, पति आदि का ऋण भी स्त्री पर होता है किन्तु उसे करना या न करना अपने हाथ की बात है। पहले तीन ऋण तो प्रत्येक प्राणी पर होते हैं। उन्हें चुकाना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। मेरी माता ने मुझे शिक्षा दी है कि धर्म और समाज की सेवा द्वारा इन ऋणों को अवश्य चुकाना। मनुष्य जन्म बार बार नहीं मिलता। विषयभोग में उसे गँवा देना मूर्खता है। मानव जीवन का उद्देश्य परमार्थ साधन ही है। जो कन्या पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकती उसी के लिए विवाह का विधान है। जो ब्रह्मचर्य का पालन करने में समर्थ है उसे विवाह की कोई आवश्यकता नहीं है।
माता पिता और धर्म की सेवा करके मैं ऊपर लिखे तीनों ऋणों से मुक्त होना चाहती हूँ।
वसुमती की ये बातें सखियों को विचित्र सी मालूम पड़ीं।
उन्होंने सोचा ये कोरी उपदेश की बातें हैं। दिल की बातें कुछ और हैं। उनके फिर पूछने पर वसुमती ने स्वप्न का सारा हाल सुना दिया। सखियाँ स्वप्न का वृत्तान्त महारानी को सुनाने चली गईं। बसुमती फिर विचार में पड़ गई। मन में कहने लगी- इस स्वप्न ने मेरे द्वारा एक महान् कार्य के होने की सूचना दी है। मुझे अभी से उसके लिए तैयार रहना चाहिए। उसके लिए शक्ति का संचय करना चाहिए।
सखियों ने स्वप्न का हाल धारिणी को सुनाया। उसने कहा- अगर मेरी पुत्री ऐसे महान् कार्य को सम्पन्न कर सके तो मेरे लिए
इससे बढ़ कर क्या सौभाग्य की बात होगी। वसुमती के इस स्वप्न के कारण उसके विवाह की बात अनिश्चित काल के लिए टाल दी गई। वसुमती जैसा चाहती थी वही हो गया।
चम्पापुरी के राज्य की सीमा पर कौशाम्बी नाम का दूसरा राज्य था। कौशाम्बी भी धन धान्य से समृद्ध तथा व्यापार के लिए प्रसिद्ध नगरी थी। वहाँ शतानीक नाम का राजा राज्य करता था। दधिवाहन की रानी पद्मावती और शतानीक की रानी मृगाबत्ती दोनों सगी बहनें थीं। इस लिए वे दोनों राजा आपस में साढू थे।
सम्बन्धी होने पर भी दोनों राजाओं के स्वभाव में महान् अन्तर था। दधिवाहन सन्तोषी, शान्तिप्रिय और धार्मिक था, उसमें राज्यलिप्सा न थी। दूसरे को कष्ट में डाल कर ऐश्वर्य बढ़ाना उसकी दृष्टि में घोर पाप था। ऐश्वर्य पाकर धनसत्ता द्वारा दूसरों पर आतङ्क जमाना उसे पसन्द न था। सभी को सुख पहुँचा कर वह प्राणिमात्र से मित्रता चाहता था, उन पर आधिपत्य नहीं।
शतानीक के विचार इसके सर्वथा विपरीत थे। वह दिन रात राज्य को बढाने की चिन्ता में लगा रहता था। न्याय और धर्म का गला घोट कर भी वह राज्य और वैभव बढ़ाना चाहता था। जनता पर आतङ्क जमा कर शासन करना अपना धर्म समझता था। अपनी राज्यलिप्सा को पूर्ण करने के लिए निर्दोष प्राणियों को कुचलना, उनके खून से होली खेलना खेल समझता था।
शतानीक की दृष्टि में समृद्ध चम्पापुरी सदा खटका करती थी। न्याय पूर्वक राज्य करने से फैलने वाली दधिवाहन की कीर्ति भी उसके लिए असह्य हो उठी थी। ईर्ष्यालु जब गुणों द्वारा अपने प्रतिस्पर्द्धी को नहीं जीत सकता तो वह उसे दूसरे उपायों से नुक- सान पहुँचाने की चेष्टा करता है किन्तु उससे उसकी अपकीर्ति ही बढ़ती है, वह अपने स्वार्थ को सिद्ध नहीं कर सकता।
दधिवाहन या चम्पापुरी पर किसी प्रकार का दोष मढ़ कर उस पर चढ़ाई कर देने की चालें शतानीक अपने मन्त्रिमण्डल के साथ सोचा करता था। अपनी बुरी कामना को पूर्ण करने के लिए दूसरे पर किसी प्रकार का अपवाद लगा देना, उसे अपराधी बता कर इच्छित वस्तु पर अधिकार जमा लेना, उसे नीचा दिखाने के लिए कोई झूठा दोष मढ़ देना तथा मनमानी करते हुए भी स्वयं निर्दोष बने रहना शतानीक की दृष्टि में राजनीति थी।
चम्पापुरी का राज्य हड़पने के लिए शतानीक कोई बहाना ढूँढ रहा था, किन्तु दधिवाहन के हृदय में युद्ध करने या किसी का राज्य छीनने की बिल्कुल इच्छा न थी। आस पास के सभी राजाओं से उसकी मित्रतापूर्ण सन्धि थी। इस लिए न उसे किसी शत्रु का डर था और न उससे किसी दूसरे को भय था। इसी कारण से उसने राज्य के आन्तरिक प्रबन्ध के लिए थोड़ी सी सेना रख छोड़ी थी। युद्ध या किसी के आक्रमण को रोकने के लिए सैनिक शक्ति को बढ़ाना उसकी दृष्टि में व्यर्थ था, इसी से शतानीक का उत्साह बहुत बढ़ गया था। दधिवाहन की मुट्ठी भर सेना को हरा 'कर चम्पापुरी पर अधिकार जमा लेने में उसे किसी प्रकार की कठिनाई न जान पड़ती थी।
शतानीक ने किसी मामूली सी बात को लेकर चम्पापुरी पर चढ़ाई कर दी। दधिवाहन को इस बात का स्वप्न में भी खयाल न था कि कोई राजा उस पर भी चढ़ाई कर सकता है। युद्ध की घोषणा करती हुई शतानीक की सेना चम्पा के राज्य में घुस गई और प्रजा को सताने लगी। सीमा की रक्षा करने वाले दधिवाहन के थोड़े से सिपाही उसका सामना न कर सके। वे दौड़े हुए दधिवाहन के पास आए और चढ़ाई का समाचार सुनाया। शतानीक की सेना द्वारा सताई गई प्रजा ने भी राजा दधिवाहन के पास पुकार की।
दधिवाहन इस अप्रत्याशित समाचार को सुन कर विचार में पड़ गया। उसने अपने मन्त्रियों की सभा बुलाई और कहा-मित्रतापूर्ण सन्धि होने पर भी शतानीकने चम्पा पर चढ़ाई कर दी है।
हमारे खयाल में अभी कोई भी ऐसा कारण उपस्थित नहीं हुआ जिससे शतानीक के आक्रमण को उचित कहा जा सके। अब यह विचार करना है कि शतानीक ने चढ़ाई क्यों कीं और इस समय हमें क्या करना चाहिए ?
प्रधान मन्त्री - इस समय ऐसा कोई भी कारण उपस्थित नहीं हुआ जिससे शतानीक को चढ़ाई करनी पड़े। शतानीक चम्पापुरी को हड़पने की दुर्भावना से प्रेरित होकर आया है। उसे किसी
दूसरे कारण की आवश्यकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति साधारण सी वात को युद्ध का कारण बना सकता है। चम्पापुरी पर चढ़ाई करने के लिए शतानीक ऐसी चालें बहुत दिनों से चल रहा था।
इसके लिए मैंने आप से पहले भी निवेदन किया था। हम लोगों ने सदा शान्ति के लिए प्रयत्न किया किन्तु वह हमारी इस इच्छा को कायरता समझता रहा। अब एक ही उपाय है कि शत्रु का सामना करके उसे बता दिया जाय कि चम्पा पर चढ़ाई कोई हँसी खेल नहीं है। जब तक शत्रु को पराजित न किया जाएगा वह मानने का नहीं।
शान्ति की बातों से उसका उत्साह दुगुना बढ़ता है। दूसरे मन्त्रियों ने भी युद्ध करने की ही सलाह दी।
मन्त्रियों की बात सुन कर राजा कहने लगा- वर्तमान राजनीति के अनुसार तो हमें युद्ध ही करना चाहिए, किन्तु इसके
भयङ्कर परिणाम पर भी विचार करना आवश्यक है। शतानीक ने राज्य के लोभ में पड़ कर आक्रमण किया है। लोभी न्याय और अन्याय को भूल जाता है। अगर हम उसका सामना करें तो व्यर्थ ही लाखों मनुष्य मारे जाएँगे। अगर चम्पा का राज्य छोड़ देने पर यह नरहत्या बच जाय तो क्यों इस भयङ्कर पाप को किया जाय ?
मन्त्री- महाराज ! शत्रु द्वारा आक्रमण हो जाने पर धर्म की बातें करना कायरता है। ऐसे मौके पर क्षत्रिय का यह कर्तव्य है कि शत्रु का सामना करे।
राजा - क्षत्रिय का धर्मयुद्ध करना नहीं है। उसका धर्म न्यायपूर्वक प्रजा की रक्षा करना है। अन्याय और अधर्म को हटाने के लिए जो अपने प्राणों को भी त्याग सकता है वही असली क्षत्रिय है।
क्षात्रत्व हिंसा में नहीं है किन्तु अहिंसा में है। यदि शतानीक को न्याय और नीति के लिए समझाया जाय तो सम्भव है, वह मान जाय। इसके लिए हमें प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए मैं स्वयं शतानीक के पास जाऊँगा।
मन्त्रियों के विरोध करने पर भी दधिवाहन ने शतानीक के पास अकेले जाने का निश्चय कर लिया।
शतानीक में चम्पा का राज्य लेने की भावना दृढ़ हो चुकी थी - और दधिवाहन में यथासम्भव हिंसा न होने देने की।
राजकर्मचारी तथा प्रजाजन द्वारा की गई प्रार्थना पर बिना ध्यान दिए दधिवाहन राजा घोड़े पर सवार होकर शतानीक के पास जा पहुँचे। उन्हें अकेला आया देख कर शतानीक बहुत प्रसन्न हुआ। उसका अभिमान और बढ़ गया। सोचने लगा- दधिवाहन डर कर मेरी शरण में चला आया है।
शतानीक के पास पहुँचकर दधिवाहन ने कहा- महाराज ! हम दोनों में मित्रतापूर्ण सन्धि है। आप मेरे सम्बन्धी भी हैं। आज तक हमदोनों का पारस्परिक व्यवहार प्रेमपूर्ण रहा है। मेरे खयाल में हमारी तरफसे ऐसी कोई बात नहीं हुई जिससे आपको किसी प्रकार की हानि हुई हो फिर भी आपने अचानक चम्पापुरी पर आक्रमण कर दिया। मेरा खयाल है, आप भी प्रजा में शान्ति रखना पसन्द करते हैं। नरहत्या आपको भी पसन्द नहीं है। आप इस बात को समझते हैं कि क्षत्रिय का धर्म किसी को कष्ट देना नहीं किन्तु कष्ट देने वाले चोर और डाकुओं से प्रजा की रक्षा करना है। यदि राजा स्वयं कष्ट देने लगे तो उसे राजा नहीं लुटेरा कहा जाएगा।
क्या आप कोई ऐसा कारण बता सकते हैं जिससे आप के इस आक्रमण को न्यायपूर्ण कहा जा सके ?
शतानीक- जब शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो उस समय न्याय-अन्याय की बात करना कायरता है। अपनी कायरता को धर्म की आड़ में छिपाना वीर पुरुषों का काम नहीं है। इस समय न्याय और धर्म का बहाना निरा ढोंग है। युद्ध करना, नए नए देश जीतना, अपना राज्य बढ़ाना, क्षत्रियों के लिए यही न्याय है।
दधिवाहन- युद्ध से होने वाले भयङ्कर परिणाम पर आप विचार कीजिए। लाखों निर्दोष मनुष्य आपस में कट कर समाप्त हो जाते हैं। हजारों बहनें विधवा हो जाती हैं। देश नवयुवकों से खाली हो जाता है। चारों ओर बालक, वृद्ध और अबलाओं की करुण पुकार रह जाती है। एक व्यक्ति की लिप्सा का परिणाम यह महान् संहार कभी न्याय नहीं कहा जा सकता। हिंसा राक्षसी वृत्ति है। उसे धर्म नहीं कहा जा सकता। आपका जरासा सन्तोष इस भीषण हत्याकाण्ड को बचा सकता है।
शतानीक- मुझे सन्तोष की आवश्यकता नहीं है। राजनीति राजा को सन्तोषी होने का निषेध करती है। पृथ्वी पर वे ही शासन करते हैं जो वीर हैं, शक्तिशाली हैं। क्षत्रियों के लिए तलवार ही न्याय है और अपनी राज्यलिप्सा रूपी अग्नि को सदा प्रज्वलित रखना ही उनका धर्म है।
दधिवाहन को निश्चय हो गया कि शतानीक लोभ में पड़ कर अपनी बुद्धि को खो बैठा है। इस प्रकार की बातें करके वह मुझे युद्ध के लिए उत्तेजित करना चाहता है लेकिन इसके कहने पर क्रोध में आकर विवेक खो बैठना बुद्धिमत्ता नहीं है। गम्भीरतापूर्वक विचार करके मुझे किसी प्रकार युद्ध को रोकना चाहिए।
दधिवाहन को विचार में पड़ा देख कर शतानीक ने कहा- आप सोच क्या कर रहे हैं? यदि शक्ति हो तो हमारा सामना कीजिए। यदि युद्ध से डर लगता है तो आत्मसमर्पण करके हमारी अधीनता स्वीकार कर लीजिए। यदि दोनों बातें पसन्द नहीं हैं तो यहाँ क्यों आए? सीधा जंगल में भाग जाना चाहिए था। इस प्रकार न्याय की दुहाई देकर अपनी कायरता को छिपाने से क्या लाभ?
दधिवाहन ने निश्चय कर लिया कि जब तक शतानीक का लोभ शान्त न किया जाय, युद्ध नहीं टल सकता। इसके लिए यही उचित है कि मैं राज्य छोड़ कर वन में चला जाऊँ। यदि इसकी अधीनता स्वीकार की गई तो इसका परिणाम और भी भयङ्कर होगा। इसके आदेशानुसार मुझे प्रजा पर अन्याय करना पड़ेगा और हर तरह से इसकी इच्छाओं को पूरा करना-पड़ेगा।
जिस प्रजा की रक्षा के लिए मैं इतना उत्सुक हूँ फिर उसी पर अत्याचार करना पड़ेगा।
वन जाने का निश्चय करके घोड़े पर सवार होते हुए दधिवाहन ने कहा- यदि आपकी इच्छा चम्पा पर राज्य करने की है तो आप सहर्ष कीजिए। अब तक चम्पापुरी की प्रजा का पालन मैंने किया अब आप कीजिए। मैं सोचा करता था- वृद्ध हुआ हूँ, कोई पुत्र नहीं है, राज्य का भार किसे सौंपूँगा। आपने मुझे चिन्तामुक्त कर दिया। यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है। यह कह कर दधिवाहन घोड़े पर बैठ कर वन को चला गया।
अपने राज्य की सीमा पर पहुँच कर उसने अपने मन्त्रियों के पास खबर भेज दी- शतानीक की सेना बहुत बड़ी है। उससे लड़ कर अपनी सेना तथा प्रजा का व्यर्थ संहार मत कराना। अब तक चम्पा की रक्षा मैंने की थी। अब शतानीक अपने ऊपर रक्षा का भार, लेना चाहता है इस लिए मेरी जगह उसी को राजा मानना।
प्रधान मन्त्री को राजा की बात अच्छी न लगी। उसने सब मन्त्रियों की एक सभा करके निश्चय किया कि चम्पा नगरी का राज्य इस प्रकार सरलता पूर्वक शतानीक के हाथ में सौंपना ठीक नहीं है। युद्ध न करने पर सेना का क्या उपयोग होगा ? उसने युद्ध की घोषणा कर दी।
दधिवाहन के चले जाने पर शतानीक के हर्ष का पारावार न रहा। विना युद्ध के प्राप्त हुई विजय पर वह फूल उठा। उसने चम्पानगरी में तीन दिन तक लूट मचाने के लिए सेना को छुट्टी दे-दी। शतानीक की सेना लूट की खुशी में चली आ रही थी।
चम्पा नगरी के पास पहुँचने पर उसे मालूम पड़ा कि दधिवाहन की सेना सामना करने के लिए तैयार खड़ी है। शतानीक ने भी अपनी सेना को युद्ध की आज्ञा दे दी। दोनों सेनाओं में घमासान संग्राम छिड़ गया। दधिवाहन की सेना बड़ी वीरता से लड़ी किन्तु शतानीक की सेना के सामने मुट्ठी भर बिना नायक की फौज कितनी देर ठहर सकती थी। शतानीक की सेना से परास्त हो कर उसे रणभूमि छोड़ कर भागना पड़ा।
चम्पानगरी के दरवाजे तोड़ दिए गए। शतानीक की सेना लूट मचाने लगी। सारे नगर में हाहाकार मच गया। सैनिकों का विरोध करना साक्षात् मृत्यु थी। पाशविकता का नग्न ताण्डव होने लगा किन्तु उसे देख कर शतानीक प्रसन्न हो रहा था। राक्षसी वृत्ति अपना भीषण रूप धारण करके उसके हृदय में पैठ चुकी थी।
चम्पापुरी में एक ओर तो यह नृशंस काण्ड हो रहा था दूसरी ओर महल में बैठी हुई महारानी धारिणी वसुमती को उपदेश दे रही थी। दधिवाहन का राज्य छोड़ कर चले जाना, अपनी सेना का हार जाना, शतानीक के सैनिकों का नगरी में प्रवेश तथा लूट मार आदि सभी घटनाएँ धारिणी को मालूम हो चुकी थीं किन्तु उसने धैर्य नहीं छोड़ा। सेवकों ने आकर खबर दी कि राजमहल भी सिपाहियों द्वारा लूटा जाने वाला है, किन्तु धारिणी ने फिर भी धैर्य नहीं छोड़ा। वह वसुमती को कहने लगी-बेटी! तेरे स्वप्न का एक भाग तो सत्य हो रहा है। चम्पापुरी दुःखसागर में डूबी हुई है। तेरे पिता वन में चले गए हैं। यह समय हमारी परीक्षा का है। इस समय घबराना ठीक नहीं है। धर्म यह सिखाता है कि भयङ्कर विपत्ति को भी अपने कर्मों का फल समझ कर धैर्य रखना चाहिए। ऐसे समय में धैर्य त्याग देने वाला कभी जीवन में सफल नहीं हो सकता। अब स्वप्न का दूसरा भाग सत्य करने का उत्तर- दायित्व तुम पर आ पड़ा है। तेरे पिता किसी ऊँची भावना को लेकर ही वन में गए होंगे। अपने धर्म की रक्षा करना हमारा सब से पहला कर्तव्य है। नष्ट हुई चम्पापुरी फिर बस सकती है, गया हुआ जीवन फिर मिल सकता है किन्तु गया हुआ धर्म फिर मिलना कठिन है। धर्म में दृढ़ रहने पर ही तुम अपने स्वप्न के बचे 'हुए भाग को सत्य कर सकोगी।
धारिणी वसुमती को यह उपदेश दे रही थी कि इतने में शतानीक की सेना का एक रथी (रथ से लड़ने वाला योद्धा) वहाँ आ पहुँचा।
वह राजमहल को लूटने के लिए वहाँ आया था। चारों ओर विविध प्रकार के रत्नों को देख कर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। पहरेदार तथा नौकर चाकर डर के मारे पहले ही भाग चुके थे, इसलिए रानी के खास महल तक पहुँचने में उसे कोई कठिनाई न हुई।
धारिणी को देख कर रथी चकित रह गया। उसके सौन्दर्य को देख कर वह रत्नों को भूल गया। उसे मालूम पड़ने लगा, जैसे इस जीवित स्त्रीरत्न के सामने निर्जीव रत्न कङ्कर पत्थर ही हैं। उसे बल पूर्वक प्राप्त करने का निश्चय करके रथी तलवार निकाल कर धारिणी के पास जाकर कहने लगा- उठो और मेरे साथ चलो। अब यहाँ तुम्हारा कुछ नहीं है। चम्पापुरी पर शतानीक का राज्य है और यहाँ की सारी सम्पत्ति सैनिकों की है। मेरे साथ चलो, नहीं तो यह तलवार तुम्हारा भी खून पीने में न हिचकेगी।
धारिणी ने सोचा-यह सैनिक विचारहीन हो रहा है। इस समय इसे समझाना व्यर्थ है। सम्भव है, युद्ध का नशा उतरने पर समझाने से यह मान जाय। तब तक वसुमती को भी मैं अपनी बात पूरी कह सकूँगी। यह सोच कर बिना किसी भय या दीनता के अपनी पुत्री को लेकर वह रथी के साथ हो गई और रथी के कहे अनुसार निःसङ्कोच रथ में जा कर बैठ गई।
रथीं अपने मन में भावी सुखों की कल्पना करता हुआ रथ के चारों ओर परदा डाल कर उसे हाँकने लगा। नगरी की ओर जाना उचित न समझ उसने सीधे वन की ओर प्रस्थान किया।
रथी अपनी हवाई उमङ्गों तथा भविष्य की सुखद कल्पनाओं में डूबा हुआ रथ को हाँके चला जा रहा था और अन्दर बैठी हुई धारिणी वसुमती को उपदेश दे रही थी- बेटी ! यह समय घबराने का नहीं है। तुम्हारे पिता तो हमें छोड़ कर चले ही गए। यह भी पता नहीं है कि मुझे भी तेरा साथ कब छोड़ देना पड़े, इसलिए तुम्हें वीरता पूर्वक प्रत्येक विपत्ति का सामना करने के लिए अपने ही पैरों पर खड़ी होना चाहिए। वीर अपनी रक्षा स्वयं करता है किसी दूसरे की सहायता नहीं चाहता। अपने स्वप्न के दूसरे भाग को भी तुम्हें अकेली ही पूरा करना पड़ेगा। चम्पापुरी में लाखों मनुष्यों का रक्त बहा है। निर्दोष प्रजा को लूटा गया है। चम्पापुरी पर लगे हुए इस कलङ्क को मिटाना ही उसका उद्धार है। उसका यह कलङ्क फिर युद्ध करने से न मिटेगा। युद्ध से तो वह दुगुना हो जायगा । इसलिए तुम्हें अहिंसात्मक संग्राम की तैयारी करनी चाहिए। इस संग्राम में विजय ही विजय है, कोई पराजित नहीं होता। इसमें दोनों शत्रु मिल कर एक हो जाते हैं, फिर पराजय का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता।
हिंसात्मक युद्ध की अपेक्षा अहिंसात्मक युद्ध में अधिक वीरता चाहिए । इसके लिए लड़ने वाले में नीचे लिखी बातें बहुत अधिक मात्रा में चाहिएं। इस युद्ध में सब से पहले अपार धैर्य की आवश्यकता है। भयङ्कर से भयङ्कर कष्ट आने पर भी धैर्य छोड़ देने वाला
अहिंसात्मक युद्ध नहीं कर सकता। सहिष्णुता के साथ भावना का पवित्र रहना, किसी से बैर न रखना, भय रहित होना तथा सतत परिश्रम करते जाना भी नितान्त आवश्यक है। अहिंसात्मक युद्ध इसमें दूसरे का रक्त नहीं बहाया जाता किन्तु अपने रक्त को पानी समझ कर उसके द्वारा द्वेष रूपी कलङ्क धोया जाता है। इसलिए धर्म और न्याय की रक्षा के लिए तथा चम्पापुरी का कलङ्क मिटाने के लिए आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण दे देने के लिए भी तुम्हें तैयार रहना चाहिए।
रथ को लेकर वह योद्धा घोर वन में पहुँच गया। जहाँ मनुष्यों का आना जाना नहीं था ऐसे दुर्गम तथा एकान्त प्रदेश में पहुँच कर रथ को रोक दिया। रथ के परदे उठाए और धारिणी को नीचे उतरने के लिए कहा। धारिणी और वसुमती दोनों उतर कर एक वृक्ष की छाया में बैठ गई।
रथी ने अपनी बुरी अभिलाषा धारिणी के सामने रक्खी। उसे विविध प्रलोभन दिए, जन्म भर उसका दास बने रहने की प्रतिज्ञा की, किन्तु सती शिरोमणि धारिणी अपने सतीत्व से डिगने वाली न थी।
उसने रथी से कहा- भाई! अपने वेश और आकृति से तुम वीर मालूम पड़ते हो किन्तु तुम्हारे मुँह से निकलने वाली बातें इसके विपरीत हैं। विवाह के समय तुमने अपनी स्त्री से प्रतिज्ञा की थी कि उसके सिवाय संसार की सभी स्त्रियों को माँ या बहिन समझोगे।
उस प्रतिज्ञा को तोड़ कर आज वैसी ही प्रतिज्ञा तुम मेरे सामने कर रहे हो। जब तुम एक बार प्रतिज्ञा तोड़ चुके हो तो तुम्हारी दूसरी प्रतिज्ञाओं पर कौन विश्वास कर सकता है? क्या वीर पुरुष को इस मकार प्रतिज्ञा तोड़ना शोभा देता है?
विवाह में की गई प्रतिज्ञा के अनुसार मैं तुम्हारी बहिन हूँ। बहिन के साथ ऐसी बातें करते हुए क्या तुम अच्छे लगते हो?
मैंने अपने विवाह के समय राजा दधिवाहन के सिवाय सभी पुरुषों को पिता या भाई मानने की प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञा के अनुसार तुम मेरे भाई हो। तुम अपनी प्रतिज्ञा तोड़ डालो तो भी मैं तो तुम्हें अपना भाई ही समझूंगी। मैं क्षत्राणी हूँ, अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकती।
यह कह कर धारिणी ने रथी के सब प्रलोभन ठुकरा दिए। रथी का मस्तक एक बार तो लज्जा से झुक गया किन्तु उसे काम ने अन्धा बना रक्खा था। धर्म अधर्म, पाप पुण्य या न्याय अन्याय की बातों का उस पर कोई असर न पड़ा।
रथी ने दधिवाहन को कायर, डरपोक और भगेडू बता कर रानी पर अपनी वीरता का सिक्का जमाने की चेष्टा की किन्तु वह भी बेकार गई। इन सब उपायों के व्यर्थ हो जाने पर उसने बलप्रयोग करने का निश्चय किया। धारिणी रथी के भावों को समझ गई।
रथी बलपूर्वक अपनी वासना पूर्ण करने के लिए उठा ही था कि धारिणी ने अपनी जीभ पकड़ कर बाहर खींच ली। उसके मुँह से खून की धारा बहने लगी। प्राणपखेरू उड़ गए। निर्जीव शरीर पृथ्वी पर गिर पड़ा। अपने बलिदान द्वारा धारिणी ने वसुमती तथा समस्त महिलाजगत् के सामने तो महान् आदर्श रक्खा ही, साथ में सारथी के जीवन को भी एकदम पलट दिया। कामान्ध होने के कारण जिस पर उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा उसे आत्मोत्सर्ग द्वारा सत्य का मार्ग सुझा दिया। क्रूरता और कामलिप्सा
को छोड़ कर वह दयालु और सदाचारी बन गया। महान् आत्माएं जिस कार्य को अपने जीवित काल में पूरा नहीं कर सकतीं उसे आत्मबलिदान द्वारा पूरा करती हैं।
धारिणी के प्राणत्याग को देख कर रथी भौंचका सा रह गया।
वह कर्त्तव्यमूढ़ हो गया। उसे यह आशा न थी कि धारिणी इस तरह प्राण त्याग देगी। वह अपने को एक महासती का हत्यारा समझने लगा। पश्चात्ताप के कारण उसका हृदय भर आया। अपने को महापापी समझ कर शोक करता हुआ वह वहीं बैठ गया।
वसुमती इस हृदयद्रावक दृश्य को धीरतापूर्वक देख रही थी। मन में सोच रही थी कि माता ने मुझे जो शिक्षाएं दी थीं, उन्हें कार्य रूप में परिणत करके साक्षात् उदाहरण रख दिया है। ऐसी माता को धन्य है। ऐसी मां को प्राप्त करके मैं अपने को भी धन्य मानती हूँ। मां ने मुझे रास्ता बता दिया, अब मेरे लिए कोई कठिनाई नहीं है-। सम्भव है, यह योद्धा मां की तरह मुझे भी अपनी वासनापूर्ति का विषय बनाना चाहे। यह भी शक्य है कि मां के उदाहरण को देख कर यह मेरे लिए कोई और षड्यन्त्र रचे। इस लिए पहले से ही अपनी माता के मार्ग को अपना लूँ। इसे कुछ करने का अवसर ही क्यों दूँ।
- मंन में यह विचार कर वसुमती भी प्राणत्याग करने को उद्यत हुई। रथी उसके इरादे से डर गया। दौड़ा हुआ वसुमती के पास आया और कहने लगा- बेटी ! मुझे क्षमा करो। मैंने जो पाप किया है वह भी इतना भयङ्कर है कि जन्म जन्मान्तरों में भी छुटकारा होना मुश्किल है। अपने प्राण देकर मेरे उस पाप को अधिक मत बढ़ाओ। तेरी माता महासती थी, उसके बलिदान ने मेरी आँखें खोल दी हैं। मुझ पर विश्वास करो। मैं आज से तुझे अपनी पुत्री मानूँगा। मुझे क्षमा करो। यह कह कर रथी वसुमती के पैरों पर गिर पड़ा और अपने पाप के लिए बार बार पश्चात्ताप करने लगा।
वसुमती को निश्चय-हो गया कि रथी के विचार अब पहले सरीखे नहीं रहे। उसने रथी को सान्त्वना दी। इसके बाद दोनों ने मिल कर धारिणी का दाहसंस्कार किया।
वसुमती को ले कर रथी अपने घर आया। रथी की स्त्री को माता समझ कर वसुमती ने उसे प्रणाम किया किन्तु रथी की स्त्री वसुमती को देखते ही विचार में पड़ गई। वह सोचने लगी- मेरे पति इस सुन्दर कन्या को यहाँ क्यों लाए हैं? मालूम पड़ता है वे इसके रूप पर मोहित हो गए हैं। उसे अपने पति पर सन्देह हो गया। किन्तु किसी प्रमाण के बिना कुछ कहने का साहस न कर सकी।
वसुमती के आते ही रथी के घर का रंग ढंग बिल्कुल बदल गया। सब चीजें साफ सुथरी और व्यवस्थित रहने लगीं। नौकर चाकर तथा परिवार के सभी लोग प्रसन्न रहने लगे। वसुमती के गुणों से आकृष्ट हो कर सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। रथी उसके गुणों को बखानते न थकता था। उसकी स्त्री को अब कुछ भी काम न करना पड़ता था फिर भी उसकी आँखों में वसुमती सदा खटका करती थी। वह सोच रही थी, मेरे पति दिन प्रतिदिन वसुमती की ओर झुक रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि वह मेरा स्थान बीन ले। इस लिए जितना शीघ्र हो सके, इसे घर से निकाल देना चाहिए। मन में यह निश्चय करके वह मौका ढूँढने लगी।
वसुमती घर के काम में इतनी व्यस्त रहती थी कि अपने खान पान का भी ध्यान न था। किसी काम में किसी प्रकार की गल्ती न होने देती थी। इतने पर भी रथी की स्त्री उसके प्रत्येक काम में गल्ती निकालने की चेष्टा करती। उसके किए हुए काम को स्वयं बिगाड़ कर उसी पर दोष मढ़ देती। इतने पर भी वसुमती क्षुब्ध न होती। वह उत्तर देती-माताजी ! भूल से ऐसा हो गया। भविष्य में सावधान रहूँगी। रथी की स्त्री को विश्वास था कि इस प्रकार प्रत्येक कार्य में गल्ती निकालने पर वसुमती या तो स्वयं तंग हो कर चली जाएगी या किसी दिन मेरा विरोध करेगी और मैं स्वयं झगड़ा खड़ा करके इसे घर से निकलवा दूँगी किन्तु उसका यह उपाय व्यर्थ गया। वसुमती ने क्रोध पर विजय प्राप्त कर रक्खी थी, इस लिए सारथी की स्त्री के कड़वे वचन और झूठे आरोप उसे विचलित न कर सके।
वसुमती की कार्यव्यस्तता देख कर एक दिन सारथी ने उसे कहा- बेटी ! तुम राज महल में पली हो। तुम्हारा शरीर इस योग्य नहीं है कि घर के कामों में इस तरह पिसा करो। तुम्हें अपने स्वास्थ्य और खान पान का भी ध्यान रखना चाहिए।
रथी की इस बात को उसकी स्त्री ने सुन लिया। उसे विश्वांस हो गया कि वास्तव में मेरे पति इस पर आसक्त हो गए हैं। क्रोध से आँखें लाल करके वह वसुमती के पास आई और कहने लगी- क्यों ? मुझे ठगने चली है। ऊपर से तो मुझे मां कहती है और
दिल में सौत बनने की इच्छा है। अच्छा हुआ मैं समय पर चेत गई। अब तुझे घर से निकलवा कर ही अन्न जल ग्रहण करूँगी।
वसुमती के विरुद्ध वह जोर जोर से बकने लगी। घर के लोग उसके इस रूप को देख कर चकित रह गए। रथी को मालूम पड़ा तो वह भी दौड़ा हुआ आया और अपनी स्त्री को समझाने लगा।
उसके समझाने पर वह अधिक बिगड़ गई और कहने लगी- अब तो सारा दोष मेरा ही है, क्योंकि मैं अच्छी नहीं लगती। मैं अच्छी लगती तो इसे क्यों लाते ? अब मैं निश्चय कर चुकी हूँ कि या तो इसे घर से निकाल दो नहीं तो खाना पीना छोड़ कर अपने प्राण दे दूँगी। केवल निकाल देने से ही मुझे सन्तोष न होगा। लड़ाई से लौटे हुए सभी योद्धा चम्पापुरी को लूट कर बहुत धन लाए हैं। आप कुछ भी नहीं लाए। इसलिए इसे बाजार में बेच कर मुझे बीस लाख मोहरें लाकर दो। तभी अन्न जल ग्रहण करूँगी। रथी ने अपनी स्त्री को बहुत समझाया किन्तु वह न मानी।
यद्यपि धारिणी और वसुमती के आदर्श से रथी का स्वभाव बहुत कोमल हो गया था फिर भी उसे क्रोध आ गया। उसने अपनी स्त्री को कहा- ऐसी सदाचारिणी और सेवापरायण पुत्री को मैं अपने घर से नहीं निकाल सकता। तुम्हीं मेरे घर से निकल जाओ। दोनों में तकरार बढ़ने लगी।
वसुमती ने सोचा- मेरे कारण ही यह विरोध खड़ा हुआ है। इस लिए मुझे ही इसे निपटाना चाहिए। यह सोच कर वह रथी की स्त्री से कहने लगी- माताजी ! आपको घबराने की आवश्यकता नहीं है। आप की इच्छा शीघ्र पूरी हो जायगी।
इसके बाद उसने रथी से कहा- पिताजी ! इसमें नाराज होने की कोई बात नहीं है, अगर माताजी बीस लाख मोहरें लेकर मुझे छुटकारा दे रही हैं तो यह मेरे लिए हर्ष की बात है। इनका तो मुझ पर महान् उपकार है। इनका सन्देह दूर करना भी हम दोनों के लिए जरूरी है इस लिए आप मेरे साथ बाजार में चलिए और मुझे बेच कर माताजी का सन्देह दूर कीजिए। अगर आपको मेरे सतीत्व पर विश्वास है तो कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रथी वसुमती को छोड़ना नहीं चाहता था किन्तु वसुमती ने अपने व्यवहार और उपदेश द्वारा उसे इतना प्रभावित कर रक्खा था कि वह उसे अपनी आराध्य देवी मानता था। बिना कुछ कहे उसकी बात को मान लेता था। वह बोला- बेटी! मेरा दिल तो नहीं मानता कि तुम सरीखी मङ्गलमयी साध्वी सती कन्या को अलग करूँ किन्तु तुम्हारे सामने कुछ भी कहने का साहस नहीं होता, इस लिए इच्छा न होने पर भी मान लेता हूँ। मुझे दृढ विश्वास है, तुम जो कुछ कहोगी उससे सभी का कल्याण होगा।
रथी और वसुमती बाजार के लिए तैयार हो गए। वसुमती ने रथी की स्त्री को प्रणाम किया और कहा मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ है इसके लिए मुझे क्षमा कीजिए। उसने परिवार के सभी लोगों से नम्रता पूर्वक विदा ली, दासी के कपड़े पहने और रथी के साथ बाजार का रास्ता लिया।
बाजार के चौराहे में खड़ी होकर वसुमती स्वयं चिल्लाने लगी- भाइयो ! मैं दासी हूँ, बिकने के लिए आई हूँ। दूसरी ओर रथी एक कोने पर खड़ा आँसू बहा रहा था। वसुमती से अलग होने के लिए अपने भाग्य को कोस रहा था।
वसुमती के चेहरे को देख कर सभी लोग कहते- यह किसी बड़े घर की लड़की मालूम पड़ती है। कौतूहल वश उसके पास जाकर पूछते- देवि ! तुम कौन हो ? यहाँ क्यों खड़ी हो !
वसुमती उत्तर देती- मैं दासी हूँ। यहाँ बिकने के लिए आई हूँ। मेरी कीमत बीस लाख मोहरें हैं। मेरे पिता को कीमत देकर जो चाहे मुझे खरीद सकता है। मैं घर का सारा काम करूँगी। घर को सुधार दूँगी। किसी प्रकार की त्रुटि न रहने दूँगी। उसने अपनी वास्तविकता को बताना ठीक न समझा।
यद्यपि वसुमती की सौम्य आकृति को देख कर सभी उसे अपने घर ले जाना चाहते थे किन्तु एक दासी के लिए इतनी बड़ी रकम देना किसी ने ठीक न समझा।
उसी समय एक वेश्या पालकी में बैठी हुई वहाँ आई। वह नगर की प्रसिद्ध वेश्या थी। नृत्य, गान और दूसरी कलाओं में उसके समान कोई न था। नगर में वह ‘नगरनायिका’ के रूप में प्रसिद्ध थी। अपने पाप के पेशे से अपार धन बटोर चुकी थी।
वसुमती को देख कर उसे अपार हर्ष हुआ। साथ में आश्चर्य भी हुआ कि ऐसी सुन्दरी बाजार में बिक रही है। वेश्या ने सोचा- ऐसी सुन्दरी को पाकर मेरा धन्धा चमक उठेगा। थोड़े ही दिनों में सारी रकम वसूल हो जायगी। इसलिए मुँह मांगे दाम देने को तैयार हो गई।
उसने वसुमती से कहा- तुम मेरे साथ चलो। साथ में अपने पिता को भी ले लो। मैं उन्हें बीस लाख मोहरें दे दूँगी।
वेश्या खूब सजी हुई थी। रेशमी वस्त्र पहिन रक्खे थे। आभूभूषणों से लदी थी। उसकी बोली और चाल ढाल में बनावट थी। वसुमती उसकी भावभंगी से समझ गई कि यह कोई भद्र औरत नहीं है। उसने वेश्या से पूछा- माताजी ! आप मुझे किस कार्य के लिए खरीदना चाहती हैं? आपके घर का आचार क्या है?
वेश्या ने उत्तर दिया- तू तो भोली है। नित्य नए शृङ्गार करना, नए नए वस्त्र तथा आभूषणों से अपने शरीर को सुसज्जित करना तथा नित्य नए सुख भोगना हमारे यहाँ का आचार है। मेरे घर पर तुझे दासीपना न करना होगा किन्तु बड़े बड़े पुरुषों को अपना दास बनाए रखना होगा। मैं अपनी नृत्य और गान कला तुझे सिखा दूँगी। फिर ऐसा कौन है जो तेरे आगे न झुक जाय ।
वेश्या की बात समाप्त होते ही वसुमती ने कहा- माताजी ! आप मुझे जिस उद्देश्य से खरीदना चाहती हैं और जो कार्य लेना चाहती हैं वह मुझ से न होगा। मेरा और आपका आचार एक दूसरे से विरुद्ध है। आप पुरुषों को विभ्रम और मोह में डाल कर पतन की ओर ले जाना चाहती हैं और मैं उन्हें इस मोह से निकाल कर ऊँचा उठाना चाहती हूँ। जिस जाल में आप उन्हें फँसाना चाहती हैं, मैं उससे छुड़ाना चाहती हूँ। इसलिए मुझे खरीदने से आपको कोई लाभ न होगा। मैं आपके साथ नहीं चलूँगी।
वेश्या ने वसुमती को सब तरह के प्रलोभन दिए। उसे एक दासी की हालत से उठा कर सांसारिक सुखों की चरम सीमा पर पहुँचाने का वचन दिया किन्तु वसुमती अपने सतीत्व के सामने स्वर्गीय भोगों को भी तुच्छ समझती थी। संसार के सारे सुख इकट्ठे होकर भी उसे धर्म से विचलित न कर सकते थे। उसने वेश्या के सभी प्रलोभनों को ठुकरा दिया।
वेश्या ने सोचा- यह लड़की इस प्रकार न मानेगी। इस भीड़ में खड़े हुए बड़े बड़े आदमी मेरी हाँ में हाँ मिलाने वाले हैं। जिसे मैं न्याय कह दूँ वही उनके लिए न्याय है। सभी मेरे इशारे पर नाचते हैं। किसी में मेरा विरोध करने का साहस नहीं है, इस लिए इसे जबर्दस्ती पकड़ कर ले चलना चाहिए। वहाँ पहुँचने के बाद अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह सोच कर वेष्या ने उससे कहा- तुम यहाँ विकने के लिए आई हो। बीस लाख मोहरें तुमने अपनी कीमत स्वयं बताई है। जो इतनी मोहरें दे दे उसका तुम पर अधिकार हो जाता है। फिर।
वह तुम्हें कहीं ले चले और कुछ काम ले, तुम्हें विरोध करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। बिकी हुई वस्तु पर खरीदने वाले का पूर्ण अधिकार होता है। मैंने तुम्हें खरीद लिया है। तुम्हारे आराम और सन्मान के लिए अब तक मैं तेरी खुशामद करती रही। यदि तुम ऐसे न चलोगी तो मैं जबर्दस्ती ले चलूँगी। यह कह कर वेष्या ने भीड़ पर कटाक्ष भरी नजर फेंकी। उसके समर्थक कुछ लोग हाँ में हाँ मिला कर कहने लगे- आप बिल्कुल ठीक कहती हैं। आपका पूरा अधिकार है। आप इससे अपनी इच्छानुसार कोई भी काम ले सकती हैं।
लोगों की बात सुन कर वसुमती मन ही मन सोचने लगी- ये भोले प्राणि किस प्रकार कामान्ध होकर पाप का समर्थन कर
रहे हैं। प्रभो! इन्हें सद्बुद्धि प्राप्त हो। उसने प्रकट में कहा-यह भीड़ ही नहीं अगर सारा संसार प्रतिकूल हो जाय तो भी मुझको धर्म से विचलित नहीं कर सकता ।
वसुमती की दृढ़ता को देख कर भीड़ में से कुछ लोग उसके भी समर्थक बन गए और कहने लगे-कोई किसी पर जबर्दस्ती नहीं कर सकता। वेष्या के साथ जाना या न जाना इसकी इच्छा पर निर्भर है।
वेष्या के समर्थक अधिक थे इस लिए उसका साहस बढ़ गया।
उसने अपने नौकरों को आज्ञा दे दी और स्वयं वसुमती को पकड़ने के लिए आगे बढ़ी। वसुमती कुछ पीछे हट गई। रथी अब तक अलग खड़ा हुआ केवल बातें सुन रहा था। वसुमती की दुर्दशा देख कर उसे अपनी स्त्री पर क्रोध आ रहा था।
उसे पकड़ने के लिए वेश्या को आगे बढ़ती देख कर उससे न रहा गया। म्यान से तलवार निकाल कर कड़कते हुए बोला- सावधान ! इसकी इच्छा के बिना अगर मेरी बेटी को हाथ लगाया तो तुम्हारी खैर नहीं है। यह कहकर वह वसुमती के पास खड़ा हो गया।
हाथ में नंगी तलवार लिए हुए कुपित रथी के भीषण रूप को देख कर वेश्या डर गई। भय से पीछे हट कर वह चिल्लाने लगी- देखो ! ये मुझे तलवार से मारते हैं। जब लड़की बिक चुकी है
तो अब इन्हें बोलने का क्या अधिकार है? इन्हें केवल कीमत लेने से मतलब है और मैं पूरी कीमत देने के लिए तैयार हूँ, फिर इन्हें बीच में पड़ने का क्या अधिकार है। वेश्या के समर्थक भी उसके साथ चिल्लाने लगे। रथी को आगे बढ़ते देख कर कुछ लोग उसकी ओर भी बोलने लगे। दोनों दल तन गए। झगड़ा बढ़ने लगा।
वसुमती ने सोचा-दोनों पक्ष अज्ञानता के कारण एक दूसरे के रक्त पिपासु बने हुए हैं। क्रोधवश एक दूसरे को मारने के लिए उद्यत हैं। एक दल तो अपने स्वार्थ, वासना और लोभ में पड़ कर अन्धा हो रहा है, इस समय उसे किसी प्रकार नहीं समझाया जा सकता, किन्तु दूसरा पक्ष न्याय की रक्षा के लिए हिंसा का आश्रय ले रहा है। धर्म की रक्षा के लिए अधर्म की शरण ले रहा है। क्या धर्म अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता ? क्या पाप की अपेक्षा वह निर्बल है ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। धर्म अपनी रक्षा स्वयं कर सकता है। उसे अधर्म का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है। धर्म की तो सदा विजय होती है फिर वह पाप
की शरण क्यों ले। हिंसा पाप है। न्याय की रक्षा के लिए उसकी आवश्यकता नहीं है। यह सोच कर उसने रथी से कहा- पिताजी! शान्त रहिए। क्रोध और हिंसा को हृदय में कभी स्थान
न देना चाहिए। क्या आप माताजी की शिक्षा को भूल गए? मेरी रक्षा के लिए तलवार की आवश्यकता नहीं है। धर्म अपनी रक्षा स्वयं करता है। आप तलवार को म्यान में कर लीजिए।
रथी अधीर हो उठा। उसे विश्वास न था कि ऐसे समय में भी अहिंसा काम कर सकती है। उसने कहा- बेटी! तेरा विरोध करने का साहस मुझमें नहीं है, इस लिए बिना.सोचे समझे मान लेता हूँ, किन्तु क्या यह उचित कहा जा सकता है कि मेरी बेटी पर मेरी आँखों के सामने अत्याचार हो और मैं निर्जीव स्तम्भ की तरह खड़ा रहूँ। रक्षा के लिए प्रयत्न न करूँ। इस समय आतताई को दण्ड देने के सिवाय मेरा और क्या कर्त्तव्य हो सकता है?
पिताजी! आध्यात्मिक बल में शारीरिक बल से अनन्तगुणी शक्ति है मुझे इस बात पर दृढ़ विश्वास है, इस लिए पाशविक बल मेरा कुछ नहीं कर सकता। आप किसी बात की चिन्ता मत कीजिए। मैं पहले कह चुकी हूँ, धर्म अपनी रक्षा स्वयं करता है।
रथी को तलवार म्यान में रखते हुए देख कर वेश्या का साहस और बढ़ गया। वह सोचने लगी कि वसुमती केवल ऊपर से विरोध करती है, वास्तव में मेरे साथ जाना चाहती है। उसने फिर खींचातानी शुरू की।
वसुमती को शारीरिक बल पर विश्वास न था, इस लिए हथियार द्वारा या दूसरे किसी उपाय से विरोध करना उसने उचित न समझा। आत्मशक्ति पर विश्वास करके वह वहीं बैठ गई और कहने लगी-जब मैं नहीं जाना चाहती तो मुझे कौन ले जा सकता है?
वेश्या ने सोचा अब इसे उठा कर पालकी में डाल देना चाहिए।
वसुमती को उठाने के लिए वह आगे बढ़ी। इतने में बहुत से बन्दर वेश्या पर टूट पड़े। उसके शरीर को नोच डाला। वेश्या सहायता के लिए चिल्लाई किन्तु उसके नौकर तथा समर्थक बन्दरों से डरकर पहले ही भाग चुके थे। कोई उसकी सहायता के लिए न आया।
बन्दरों ने वेश्या को लोहूलुहान कर दिया। उसके करुण चीत्कार को सुन कर वसुमती से न रहा गया। उसने बन्दरों को डाट कर कहा- हटो ! माता को छोड़ दो। इसे क्यों कष्ट दे रहे हो ? वसुमती के डाटते ही सभी बन्दर भाग गए।
वेश्या के पास आकर वसुमती ने उसे उठाया और सान्त्वना देते हुए उसके शरीर पर हाथ फेरा। वेश्या के सारे शरीर में भयङ्कर वेदना हो रही थी किन्तु वसुमती का हाथ लगते ही शान्त हो गई।
कृतज्ञता के भार से दबी हुई वेश्या आँखें नीची किए सोच रही थी कि अपकारी का भी उपकार करने वाली यह कोई देवी है। इसके हाथ का स्पर्श होते ही मेरी सारी पीड़ा भाग गई। वास्तव में यह कोई महासती है।
बन्दरों के चले जाने पर वेश्या के परिजन और समर्थक फिर वहाँ इकट्ठे हो गए और विविध प्रकार से सहानुभूति दिखाने लगे। वेश्या के हृदय में वसुमती द्वारा किया हुआ उपकार घर कर चुका था इस लिए सूखी सहानुभूति उसे अच्छी न लगी।
अपने व्यवहार पर लज्जित होते हुए वेश्या ने वसुमती से कहा- देवि ! सांसारिक वासनाओं में पली हुई होने के कारण मैं आपके वास्तविक स्वरूप को न जान सकी। मैंने आपकी शिक्षा को मजाक समझा, सदाचार को ढोंग समझा। धर्म, न्याय और सतीत्व का मेरे हृदय में कोई स्थान न था। इसी कारण अज्ञानतावश मैंने आप के साथ दुर्व्यवहार किया। अहिंसा और सतीत्व का साक्षात् आदर्श रख कर आपने मेरी आँखें खोल दीं। मैं आपके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकती। आपके साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए मुझे पश्चात्ताप हो रहा है। आपकी आत्मा महान् है। आशा है, अज्ञानतावशं किए गए उस अपराध के लिए आप मुझे क्षमा कर देंगी।
अब मैंने अपने पाप के पेशे को छोड़ देने का निश्चय कर लिया है।
आपने मेरे जीवन की धारा को बदल दिया। यह मेरे गौरव की बात होती यदि आपके चरणों से मेरा घर पवित्र होता। किन्तु उस गन्दे, नारकीय वातावरण में आप सरीखी पवित्र आत्मा को ले जाना मैं उचित नहीं समझती। यह कह कर अपने अपराध के लिए बार बार क्षमा मांगती हुई वेश्या अपने घर चली गई। वसुमती तथा वेश्या की बात बिजली के समान सारे शहर में फैल गई।
नगरी में धनावह नाम का एक धर्मात्मा सेठ रहता था। उसके कोई सन्तान न थी। वसुमती की प्रशंसा सुन कर उसकी इच्छा हुई कि ऐसी धर्मात्मा सती मेरे घर रहे तो कितना अच्छा हो।
उसके रहने से मेरे घर का वातावरण पवित्र हो जायगा और मैं निर्विघ्न धर्माचरण कर सकूँगा।
उत्तरोत्तर घटनाओं को देख कर रथी का वसुमती की ओर अधिकाधिक झुकाव हो रहा था। ऐसी महासती को बेचना उसे बहुत बुरा लग रहा था। वह बार बार वसुमती से वापिस लौटने की प्रार्थना करने लगा और वसुमती उसे सान्त्वना देने लगी।
इतने में धनावह सेठ वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने रथी को मोहरें देना स्वीकार कर लिया और वसुमती को अपने घर ले जाने के लिए कहा। वसुमती ने पूछा—पिताजी! आपके घर का क्या आचार है? सेठ ने उत्तर दिया—पुत्री ! यथाशक्ति धर्म की आराधना करना ही मेरे घर का आचार है। मैं बारह व्रतधारी श्रावक हूँ। घर पर आए हुए अतिथि को विमुख न जाने देना मेरा नियम है। धार्मिक कार्यों में मेरी सहायता करना तुम्हारा कार्य होगा। मैं तुम्हें विश्वास श्री बेठिया जैन ग्रन्थमाला दिलाता हूँ कि मेरे यहाँ तुम्हारे सत्य और शील के पालन में किसी प्रकार की बाधा न होगी।
वसुमती धनावह सेठ के साथ जाने को तैयार हो गई और रथी से कहने लगी-- पिताजी ! आप मेरे साथ चलिए और बीस लाख मोहरें लाकर माताजी को दे दीजिए।
रथी के हृदय में अपार दुःख हो रहा था। उसके पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे । धीरे धीरे सभी धनावह सेठ के घर आए। धनावह ने तिजोरी से बीस लाख मोहरें निकाल कर रथी के सामने रख दीं और कहा- आप इन्हें ले लीजिए ।
रथी ने कहा- सेठ साहेब ! अपनी इस पुत्री को अलग करने की मेरी इच्छा नहीं है किन्तु मेरे घर के कलुषित वातावरण में यह नहीं रहना चाहती। अगर इसकी इच्छा है तो आपके घर रहे किन्तु इसे बेचकर मैं पाप का भागी नहीं बनना चाहता। धनावह सेठ मोहरें देना चाहता था किन्तु रथी उन्हें लेना नहीं चाहता था ।
यह देखकर वसुमती रथी से कहने लगी- सेठजी और आप दोनों मेरे पिता हैं। मैं दोनों की कन्या हूँ। इस नाते आप दोनों भाई भाई हैं। भाइयों में खरीदने और बेचने का प्रश्न ही नहीं होता। बीस लाख मोहरें आप अपने भाई की तरफ से माताजी को भेंट दे दीजिए। यह कह कर उसने धनावह सेठ के नौकरों द्वारा मोहरें रथी के घर पहुँचवा दीं। रथी और धनावह सेठ का सम्बन्ध सदा के लिए दृढ़ हो गया।
धनावह सेठ की पत्नी का नाम मूला था। उसका स्वभाव सेठ के सर्वथा विपरीत था। सेठ जितना नम्र, सरल, धार्मिक और दयालु था, मूला उतनी ही कठोर, कपटी और निर्दय थी। सेठ दया, दान आदि धार्मिक कार्यों को पसन्द करता था किन्तु मूला को इन सब बातों से घृणा थी।
वसुमती को अपने साथ लेकर सेठ ने मूला से कहा- हमारे सौभाग्य से यह गुणवती कन्या प्राप्त हुई है। इसे अपनी पुत्री समझना। इसके रहने से हमारे घर में धर्म, प्रेम और सुख की वृद्धि होगी।
मूला ऊपर से तो सेठ की बातें सुन रही थी किन्तु हृदय में दूसरी ही बातें सोच रही थी। सेठजी इस सुन्दरी को क्यों लाए हैं? साथ में इसकी प्रशंसा भी क्यों कर रहे हैं? ऊपर से तो पुत्री कह रहे हैं किन्तु हृदय में कुछ और बात है। भला इसके सौन्दर्य को देख कर किसका चित्त विचलित न होगा।
हृदय के भावों को मन ही में दबा कर मूला ने सेठ की बात ऊपर से स्वीकार कर ली। वसुमती सेठ के घर रहने लगी। उसके कार्य, व्यवहार तथा चारित्र से घर के सभी लोग प्रसन्न रहने लगे।
सभी उसकी प्रशंसा करने लगे। सेठजी स्वयं भी उसके कार्यों को सराहा करते थे किन्तु मूला पर इन सब का उल्टा असर पड़ रहा था।
एक दिन सेठ ने वसुमती से पूछा- बेटी ! तेरा नाम क्या है ? पिताजी ! मैं आपकी पुत्री हूँ। पुत्री का नाम वही होता है जो माता पिता रक्खें। वसुमती ने उत्तर दिया।
बेटी ! मैंने तेरी सारी बातें सुन ली हैं। जैसे चन्दन काटने वाले को भी सुगन्ध और शान्ति देता है इसी प्रकार तुम अपकारी पर भी उपकार करने वाली हो, इसलिए मैं तुम्हारा नाम चन्दनवाला रखता हूँ। सेठ ने पुराने नाम की छानबीन करना उचित न समझा। सभी लोग वसुमती को चन्दनबाला कहने लगे। एक दिन चन्दनवाला स्नान के बाद अपने बाल सुखा रही थी।
इतने में सेठजी बाहर से आए और अपने पैर धोने के लिए पानी मांगा । चन्दनबाला गरम पानी, बैठने के लिए चौकी तथा पैर धोने का बर्तन ले आई और बोली- पिताजी ! आप यहाँ विराजें। मैं आपके पैर धो देती हूँ।
सेठजी नहीं चांहते थे कि एक सती स्त्री से जिसे अपनी पुत्री मान लिया है, पैर धुलवाए जाँय। उन्होंने चन्दनबाला से बहुत कहा कि पैर धोने का कार्य उसके योग्य नहीं है किन्तु चन्दनबाला सेवा के कार्य कोछोटा न मानती थी। वह इसे उच्च और आदर्श कर्तव्य समझती थी। पिता के पैर धोना वह अपना परम सौभाग्य मानती थी। उसने सेठजी को मना लिया और पैर धोने बैठ गई।
पैर धोते समय चन्दनबाला यह सोच कर बहुत प्रसन्न हो रही थी कि उसे पितृसेवा का अपूर्व अवसर मिला। सेठजी चन्दनबाला को अपनी निजी सन्तान समझ कर वात्सल्य प्रेम से गद्गद हो रहे थे।
उनके मुख पर अपत्यस्नेह स्पष्ट झलक रहा था। चन्दनबाला और सेठ दोनों के हृदयों में पवित्र प्रेम का संचार हो रहा था।
पैर धोते समय सिर के हिलने से चन्दनवाला के बाल उसके मुंह पर आ रहे थे जिससे उसकी दृष्टि अवरुद्ध हो जाती थी। सेठजी ने उन बालों को उठा कर पीछे की ओर कर दिया।
मूला इस दृश्य को देख रही थी। हृदय मलीन होने के कारण प्रत्येक बात उसे उल्टी मालूम पड़ रही थी। सेठ को चन्दनवाला के केश ऊपर करते देख कर वह जल भुन कर रह गई। उसे विश्वास हो गया कि सेठ का चन्दनबाला के साथ अनुचित सम्बन्ध है। उसे घर से निकाल देने के लिए वह उपाय सोचने लगी।
मूला का व्यवहार चन्दनबाला के प्रति बहुत कठोर हो गया।
उसके प्रत्येक कार्य में दोष निकाले जाने लगे। बात बात पर डाट पड़ने लगी, किन्तु चन्दनवाला इस प्रकार विचलित होने वाली नथी। वह मूला की प्रत्येक बात का उत्तर शान्ति और नम्रता के साथ देती। अपना दोष न होने पर भी उसे मान लेती और क्षमा याचना कर लेती। मूला झगड़ा करके वसुमती को निकालने में सफल न हुई। वह कोई दूसरा उपाय सोचने लगी।
एक बार सेठजी तीन चार दिन के लिए किसी बाहर गाँव को चले गए । चन्दनबाला को निकाल देने के लिए मूला ने इस अवसर को ठीक समझा । उसने सभी नौकरों को घर से बाहर ऐसे कार्यों पर भेज दिया जिससे वे तीन चार दिन तक न लौट सकें। घर का दरवाजा बन्द करके वह चन्दनबाला के पास आई और कहने लगी- तेरी सूरत तो भोली है किन्तु दिल में पाप भरा हुआ है । जिसे पिता कहती है उसी को पति बनाना चाहती है ! जिसे मां कहती है उसकी सौत बनने चली है ! पुरुष भी कितने धूर्त होते हैं, जिसे पुत्री कहते हैं उसी के लिए हृदय में बुरे विचार रखते हैं । अब मैंने सब कुछ देख लिया है । अपनी आँखों के सामने मैं यह कांड कभी न होने दूँगी । उस दिन सेठजी तुम्हारे मुँह पर हाथ क्यों फेर रहे थे ?
चन्दनबाला ने नम्रता पूर्वक उत्तर दिया- माताजी । मैं आप की पुत्री हूँ । पुत्री पर इस प्रकार सन्देह करना ठीक नहीं है । मैं सच्चे हृदय से आपको माता और सेठजी को पिता मानती हूँ । सेठजी भी मुझे शुद्ध हृदय से अपनी पुत्री समझते हैं । इसके लिए जैसे चाहें आप मेरी परीक्षा ले सकती हैं ।
अच्छा, मैं देखती हूँ तू किस प्रकार परीक्षा देती है । मेरे पति ने तेरे इन केशों को छूआ है इस लिए पहले पहल मैं इन्हें ही दण्ड देना चाहती हूँ । यह कह कर मूला कैंची ले आई और चन्दनबाला के सुन्दर केशों को काट डाला ।
अपने सुन्दर और लम्बे केशों के कट जाने पर भी चन्दनबाला पहले के समान ही प्रसन्न थी । उसके मुख पर विषाद की रेखा तक न थी । वह सोच रही थी- यह मेरे लिए हर्ष की बात है यदि केशों के कट जाने मात्र से माताजी का सन्देह दूर हो जाय ।
मूला उसके प्रसन्न मुख को देख कर और कुपित हो गई । उस ने और भी कठोर दण्ड देने का निश्चय किया । चन्दनबाला के सारे कपड़े उतार लिए और पुराने मैले कपड़े की एक काछ लगा दी। हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी डाल दी। इसके बाद एक पुराने भौंरे (तहखाने, तलघर) में उसे बन्द करके ताला लगा दिया।
मूला को विश्वास हो गया कि चन्दनबाला वहीं पड़ी पड़ी मर जाएगी। उसे यह जान कर प्रसन्नता हुई कि सौत बन कर उसके सुख सुहाग में बाधा डालने वाली अब नहीं रही।
इतने में उसके हृदय में भय का संचार हुआ। सोचने लगी— अगर कोई यहाँ आ गया और चन्दनवाला के विषय में पूछने लगा तो क्या उत्तर दिया जाएगा ? मकान के ताला बन्द करके वह अपने पीहर चली गई। सोचा—तीन चार दिन तो यह बात ढकी ही रहेगी, बाद में कह दूँगी कि वह किसी के साथ भाग गई।
भौंरे में पड़े पड़े चन्दनबाला को तीन दिन हो गए। उस समय उसके लिए भगवान् के नाम का ही एक मात्र सहारा था। वह नवकार मन्त्र का जाप करने लगी। उसी में इतनी लीन थी कि भूख प्यास आदि सभी कष्टों को भूल गई। नवकार मन्त्र के स्मरण में उसे अपूर्व आनन्द प्राप्त हो रहा था। मूला सेठानी को वह धन्यवाद दे रही थी जिसकी कृपा से ईश्वरभजन का ऐसा सुयोग मिला।
चौथे दिन दोपहर के समय धनावह सेठ बाहर से लौटे। देखा, घर का ताला बन्द है। सेठानी या नौकर चाकर किसी का पता नहीं है। सेठजी आश्चर्य में पड़ गए। उनके घर का द्वार कभी बन्द न होता था। अतिथियों के लिए सदा खुला रहता था।
सेठ ने सोचा—मूला अपने पीहर चली गई होगी। नौकर चाकर भी इधर उधर चले गए होंगे, किन्तु चन्दनबाला तो कहीं नहीं जा सकती। पड़ोसियों से पूछने पर मालूम पड़ा कि तीन दिन से उसका कोई पता नहीं है। इतने में एक नौकर बाहर से आया। पूछने पर उसने कहा- सेठानी ने हम सब को बाहर भेज दिया था। केवल चन्दनबाला और सेठानी ही यहाँ रही थीं। इसके बाद क्या हुआ, यह मुझे मालूम नहीं है। सेठ मूला के स्वभाव की मलीनता और उसकी चन्दनबाला के प्रति दुर्भावना से परिचित थे। अनिष्ट की सम्भावना से उनका हृदय कांप उठा।
धनावह सेठ ने मूला के पास नौकर भेजा। सेठ का आगमन सुन कर एक बार तो मूला का हृदय धक सा रह गया किन्तु जल्दी से सम्भल कर उसने नौकर से कहा मुझे अभी दो चार दिन यहाँ काम है। तुम घर की चाबी ले जाओ और सेठजी को दे दो। मूला ने सोचा- दो चार दिन में चन्दनबाला मर जायगी फिर उसका कोई भी पता न लगा सकेगा। पूछने पर कह दूँगी, घर से चोरी करके वह किसी पुरुष के साथ भाग गई।
नौकर चाबी ले कर चला आया। सेठ ने घर खोला। चन्दनबाला जब कहीं दिखाई न दी तो उसका नाम ले कर जोर जोर से पुकारना शुरू किया।
चन्दनबाला ने सेठ की आवाज पहिचान कर क्षीण स्वर से उत्तर दिया- पिताजी ! मैं यहाँ हूँ। आवाज के अनुसन्धान पर सेठ धीरे धीरे भौंरे के पास पहुँच गया। किवाड़ खोल कर अंधेरे में टटोलता हुआ वह चन्दनबाला के पास आ पहुँचा। यह जान कर वह बड़ा दुखी हुआ कि चन्दनबाला के हथकड़ी और बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं। धीरे धीरे उसे उठाया और भौंरे से बाहर निकाला ।