सीखें हम : गाहो गाहो
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सीखें हम : गाते गाते
डॉ. शुद्धात्मप्रभा टडैया
प्रथम दो संस्करण (15 अगस्त, 2010 से अद्यतन)
तृतीय संस्करण (15 सितम्बर, 2016)
अनन्तानुर्वती
प्रकाशकीय
आज की नई पीढ़ी में प्रकाशन आदि धार्मिक क्रियाकलापों के प्रति अरुचि होती जा रही है, जिसका मूलकारण पारिभाषिक जैन शब्दावली से अपरिचय ही है। नई पीढ़ी में रुचि जागृत करने हेतु विदुषी लेखिका डॉ. शुद्धात्मप्रभा टडैया द्वारा लिखित जैन सीखें हम गाते-गाते यह पुस्तक श्रृंखला जैनदर्शन के मूलभूत सिद्धान्तों और तथ्यों की सामान्य जानकारी कराने वाली है।
विश्वभर स्कूल में हम इतने विषय पढ़ते हैं, उनमें से हमें कुछ याद नहीं रहता, मात्र संस्कार रह जाते हैं, जिससे दुनिया में हमें अजनबीयत का अहसास नहीं होता; बड़े होकर हम कुछ भी, कैसे भी बनें सो हिम्मत रखते हैं, अधिकार इन पुस्तकों को पढ़ने से हमारे मन में जैनदर्शन की विषयवस्तु के संस्कार रह जाएँ, जो कि जिनागम के मूल सिद्धान्तों को समझाए सत्य, प्रवचन सुनते समय हमें अपरिचय का अहसास नहीं कराएँगे। इन्हें पढ़कर हम जिनागम के आद्य समुद्र में तैरने की सामर्थ्य रख सकते हैं। बचपन में बीज रूप में पड़े हुए अच्छे-बुरे संस्कार ही भावी जीवन के निर्माता होते हैं। बालकों में अच्छे संस्कारों का विकास हो - ऐसी हमारी भावना है।
जैन पुस्तकों की श्रृंखला को आकर्षक कलेवर में प्रस्तुत करने का श्रमसाध्य कार्य आचार्य टडैया, मुम्बई ने किया है तथा प्रकाशन व्यवस्था का सम्पूर्ण दायित्व अखिल बंसल ने बखूबी निभाया है, अतः हम उनके आभारी हैं।
- ब्र. यशपाल जैन, एम. ए.
प्रकाश मंत्री
लेखिका :
© विदुषी डॉ. शुद्धात्मप्रभा टडैया
बी.ए. ऑनर्स (स्वर्ण पदक प्राप्त)
एम.ए., पी.एच.डी. (मुम्बई)
मो. : 09321295265
Email - [email protected]
मूल्य : 6/-
प्रकाशक :
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
ए-4, बाहुनगर, जयपुर राज.
मूलक- सम सम प्रेस,
सिलवनगर, जयपुर - 302015
डिजाईनिंग एवं कम्प्यूटर ग्राफिक्स निशान
आचार्य टडैया, मुम्बई
लेखिका :
विदुषी डॉ श्रीमती शुद्धात्मप्रभा टडैया
बी. ए. ऑनर्स (स्वर्ण पदक प्राप्त)
एम. ए., पी. एच. डी.
मोबाईल : 09321295265
मुम्बई, (महाराष्ट्र)
संपादन :
ब्रह्मचारी सुप्रभतप्रकाश जैन, खनियांधाना
प्रकाशक :
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
ए - ४, बाहुनगर, जयपुर - १५ (राजस्थान)
1 प्रार्थना
जय जय परमात्मा - अरहंत सिद्धात्मा,
सभी हैं आत्मा, सभी शुद्धात्मा।
आश्रय से निज के, बनते परमात्मा,
अरहंत परमात्मा, जय-जय सिद्धात्मा।
2 प्रार्थना
हे भगवान् !
आपसे बात करना चाहता हूँ मैं,
आपकी शिकायत करना चाहता हूँ मैं।
आप तो मौन खड़े रहते हैं,
और हम बोलते ही जाते हैं।
आप तो ध्यानमग्न रहते हैं,
हम सुनाने को आतुर रहते हैं।
कभी भक्ति के नाम पर सुनाते हैं,
तो कभी पूजा के नाम पर सुनाते हैं।
आपकी बात सुनने को नहीं टाइम हमारे पास,
प्रवचन सुनने में नहीं होता हमारा टाइम पास।
शास्त्र पढ़ने में हमारा मन नहीं लगता है,
आत्मध्यान ‘बटेर पकड़ने’ सा लगता है।
चंचल चित्त को कैसे बस में करूँ मैं?
आत्मध्यान अब कैसे करूँ मैं?
१ बटेर एक अति चंचल पक्षी है, जो मुश्किल से पकड़ में आता है।
3 ॐ
तीन अक्षर से बना हूँ मैं,
पञ्च परमेष्ठि वाचक मैं।
जय जय से पहले सब, मुझको बोलते।
बतलाओ ज्ञानी जन मुझे क्या बोलते ॥ - ॐ
4 शरण
जिंदा रहना अच्छा लगता।
नहीं चाहता जनम मरण ॥
इक डाकर का देख मरण।
जब मैं आया आपकी शरण ॥
तब पहचानी सत्य शरण।
आप विराजो निज की शरण ॥
मंगल उत्तम सुखद शरण।
अपनी शरण ही एक शरण ॥
अब पहचानी सुखद शरण।
कभी न लूँगा अन्य शरण ॥
5 सन्डे हो या मन्डे
सन्डे हो या मन्डे, कभी न खाना अण्डे।
जो खाते हैं अण्डे, वो नरक में खाते खण्डे ॥
अण्डे में मुर्गी के बच्चे हैं, खाते गंदे बच्चे हैं।
खाते नहीं खिलाते नहीं, देख के हँसते नहीं ॥
अण्डों से बनता शैम्पू, कभी नहीं लगाऊँके।
अब तो तजता अण्डे, कभी पड़ें न डण्डे ॥
6 अज्ञान से
गुरुजी - पूँछ पूँछ कर खाना भया केक जी ।।
केक में डाले जाते हैं अण्डे जी ।।
मस्त - पूँछ पूँछ कर क्यों खाऊँ मैं केक जी।
पाप पड़ेगा उसको जिसने डाला अण्डे जी ।।
गुरुजी - ऐसा संभव होता नहीं तिहुँ काल में।
अज्ञानी भी दुःख पाते संसार में ।।
मस्त - जिसको होता ज्ञान उसको लगता पाप जी।
मुझे नहीं है ज्ञान, लगे न पाप जी ।।
गुरुजी - (अच्छा तो) अज्ञानी विष खाकर भी जी सकता?
मस्त - नहीं नहीं, नहीं नहीं।
गुरुजी - कूदे पर्वत से क्या कोई बच सकता?
मस्त - नहीं नहीं, नहीं नहीं।
गुरुजी - अज्ञानी क्या अग्नि में जाकर नहीं जलता?
मस्त - जल जाता, जल जाता।
गुरुजी - तो अज्ञानी क्या पाप करे और बच जाता?
मस्त - नहीं नहीं, नहीं नहीं।
मस्त - (कान पकड़कर)
सॉरी पूँछ-पूँछ कर खाऊँगा मैं केक जी।
अनजाने में भी लगता है पाप जी ।।
गुरुजी - पूँछ पूँछ कर खाना भैया केक जी।
केक में डाले जाते हैं अण्डे जी ।।
7 अरहंत भगवान
सदा लीन हैं अपने में, अनन्त चतुष्टय आनन्द में।
सर्व लोक के ज्ञाता-दृष्टा, दोष रहित सब हो गये ही ।।
बतलाओ हैं कौन वो ?
8 चार गति
एक था चेतन गतियाँ चार,
दुःख का देखा कभी न पार।
नरक से तिर्यंच में आये,
नर सुर गति में भी दुःख पाये ।।
चारों गति से थककर आये,
जिनवाणी के वचन सुहाये ।।
हमने देखा है जग सारा,
भगवान आत्मा सबसे प्यारा ।।
9 मुक्ति
सब दुःखों से मुझे छुड़ाती, मेरी प्यारी मुक्ति ।।
जिनवाणी से जानी है, मैंने सच्ची मुक्ति ।।
अनादि काल से नहीं मिली है, मुझको मेरी मुक्ति।
एक बार गर मिल जाये तो सदा रहेगी मुक्ति ।।
चारों गति में मिलती मुक्ति’, मनुष्य जन्म से मुक्ति।
आत्म लीनता देती मुक्ति, यही है सच्ची मुक्ति ।।
मेरी मम्मी कहती है कि खा ले बेटा मुक्ति।
पर मैं कहती मम्मी से, मुझको प्यारी मुक्ति ।।
१ चारों गतियों में सम्यग्दर्शन हो सकता है।
10 भक्ति से मुक्ति
प्रभुवर की भक्ति होती है, प्रभुवर सी भक्ति होती है।
प्रभु सा चिन्तन प्रभु सा जीवन यही तो प्रभुवर भक्ति है।
निज आत्म की महिमा करना यही तो प्रभुवर भक्ति है।
निज आत्म की श्रद्धा करना प्रभु की सच्ची भक्ति है।
निज आत्म का ज्ञान करना प्रभु की सच्ची भक्ति है।
निज आत्म में लीनता प्रभु की सच्ची भक्ति है।
इसीलिये तो कहते हैं भक्ति से मुक्ति होती है।
11 सिद्ध भगवान
आठ कर्म भी नहीं हैं, देह भी जिनके नहीं हैं,
संसारी भी वो नहीं, लोक में ही रहते हैं;
बच्चों बतलाओ तो उनको क्या कहते हैं ।।
12 सिद्ध सम
मैं अपनी प्रभुता भूल गया, यह मोह का अंधेरा है।
मैं ज्ञानरत्न को भूल गया, यह मोह का अंधेरा है ।।
जहाँ ज्ञान किरण चमकी, वही ज्ञायक का बसेरा है।
ज्ञायक के आश्रय से ज्ञान का उजेरा है ।।
आँखों से यह नहीं दिखता, कानों से नहीं सुनता।
जीभ से नहीं चखता, हाथ से नहीं छूता।
फिर भी अनुभव से जो जाना जाता है ।।१।।
यह देह नहीं जिसमें, न कर्म बसें जिसमें।
न राग है आत्म में, न द्वेष रहे इसमें ।।
फिर भी ज्ञानमयी सिद्ध सम ही रहता है ।।२।।
13 सांधिया
शुभ कारज में करते याद, धर्मध्वज में देखो आप।
चतुर्गति का नाशक जो, कौन हूँ मैं बतलाओ तो ।।
14 मुनिराज (साधु)
बारह तपों को करते हैं जो, वन खण्डादि में रहते हैं जो।
उपसर्गों को सहते हैं जो, परिषहों से न डरते हैं जो ।।१।।
अट्ठाईस मूलगुण पालते हैं जो, चौबीस परिग्रह रहित हैं जो।
पाप रूपी कीचड़ से दूर हैं जो, पुण्यमयी फूलों से विरक्त हैं जो ।।२।।
शुद्ध भाव में केलि करते हैं जो, मुक्ति वधु को ही वरते हैं जो।
उनका ही आश्रय करते हैं हम, उन जैसा बनने तरसते हैं हम ।।३।।
15 आचार्य मुनिराज
मोक्षमार्ग में आचार्य गुरुवर कैसे होते हैं ?
३६ गुणों से शोभित गुरुवर पूज्य होते हैं।
आचार्य होते हैं, गुरुवर पूज्य होते हैं ।।
दीक्षा वांछक जीवों को जो दीक्षा देते हैं,
जिनवाणी में सारे साधु रहते हैं।
मुक्ति पथ पर चलें चलावें पूज्य होते हैं,
आचार्य होते हैं, गुरुवर पूज्य होते हैं ।।
आत्मा में लीन रहे उपदेश देते हैं,
प्रवचन विधि से साधु को जो शुद्ध करते हैं।
मुनि संघ के नायक प्रायः मौन’ रहते हैं,
आचार्य होते हैं गुरुवर पूज्य होते हैं ।।
16 उपाध्याय मुनिराज
मुनिराजों में एक मुनिवर ऐसे होते हैं, जो ज्ञान देते हैं।
द्वादशांग के ज्ञाता मुनिवर पूज्य होते हैं, उपाध्याय होते हैं।
सब शास्त्रों का सार समझते और समझाते हैं।
शेष समय तो निज आत्म में लीन रहते हैं, उपाध्याय होते हैं।
मुनिसंघ के सब साधक को ज्ञान प्रदाता हैं।
२५ गुणों से युक्त मुनिवर तुम होते हो, उपाध्याय होते हो।
17 तीर्थंकर अरहंत
चार कर्मों सहित हैं पर दुःखी नहीं,
देह में रहते हुये हमसे हैं दुःखी नहीं;
समवशरण में रहते हैं, परिषही नहीं,
मुक्त कहते हुये भी वो सिद्ध नहीं।
18 स्वभाव - विभाव
जीव में स्वभाव और विभाव होता है।
ज्ञान है स्वभाव जिससे सुख होता है।
राग है विभाव जो सुख को होने हैं।
ज्ञान है स्वभाव जिससे सबको जाने है।
राग है विभाव जो निगोद देता है।
ज्ञान है स्वभाव जो राग नशाता है।
राग है विभाव जो परलक्ष्य से होता है।
ज्ञान है स्वभाव जो परलक्ष्य को तजता है।
राग है विभाव जिससे दुनिया रोती है।
ज्ञान है स्वभाव जिससे मुक्ति होती है।
19 विशेष
छः जाति के द्रव्य से, सदा भरा ही रहता हूँ।
लोक अलोक विभग में मेरे, निराधार ही रहता हूँ ।।
20 विश्व
(कोरस) छह द्रव्यों की दुनियाँ में, इनका कर्ता कोई नहीं।
अनादि काल से अनंत काल तक, किसी का कर्ता कोई नहीं।
प्रश्न - तो फिर इस विश्व को संचालित कौन करता है ?
उत्तर - सब द्रव्यों से विश्व बना, अनंतगुणों से भरा।
गुणों में होता परिणमन, इससे विश्व का संचालन।
कोई किसी का नहीं कर्ता, कोई किसी का नहीं हर्ता।
सहज हो रहा परिणमन, इससे विश्व का संचालन।
21 द्रव्य गुण पर्याय
(कोरस) दुनिया में बस तीन चीज हैं, द्रव्य गुण पर्याय।
द्रव्य गुण अमर हैं, क्षण भंगुर पर्याय।
द्रव्य बिन गुण नहीं, गुण बिन पर्याय।
पर्याय बिन गुण नहीं, गुण बिन द्रव्य। १
द्रव्य है जो गुण नहीं, गुण नहीं द्रव्य।
गुण जो पर्याय नहीं, पर्याय नहीं द्रव्य। २
द्रव्य गुण ध्रुव है उत्पाद व्यय पर्याय।
उत्पाद तो उत्पाद है वह तो व्यय नहीं। ३
व्यय भी व्यय है वह तो उत्पाद नहीं।
वस्तु व्यवस्था सुंदर है जिससे ने कही। ४
अनादि काल से अनंत काल तक है।
क्रमबद्ध परिणमें न फेर फार हो। ५
22 द्रव्य
छह द्रव्यों का लगा है मेला, न कोई अंतिम न कोई पहला।
अनंत गुणों के धारी हम, क्षण - क्षण रूप बदलते हम।
क्षण - क्षण रूप बदलते हैं, फिर भी नहीं बदलते हम।
नहीं जन्मेंगे नहीं मरेंगे, नहीं मिटेंगे नहीं बनेंगे।
साय साथ ही रहते हम, एकमेक नहीं होते हम।
जाति से कहलाते छह, अनंततामें रहें हरदम ॥
23 गुण
ज्यों मिठास रहती शक्कर में, त्यों ही द्रव्य में रहता है।
सदा रहें मैं सब में रहें मैं, कभी नष्ट नहीं होता हूँ।
संख्या में अनंत हैं, अनन्त हूँ गुण कहलाता हूँ।
24 पर्याय
सदा बदलती रहती हो क्योंकि तुम पर्याय हो।
एक समय का जीवन है, क्योंकि तुम पर्याय हो ॥
आगे पीछे कभी न होती, क्योंकि तुम पर्याय हो।
क्रम क्रम से तुम होती हो, क्योंकि तुम पर्याय हो ॥
द्रव्य गुणों का परिचय देती क्योंकि तुम पर्याय हो।
सब द्रव्यों में सदा तुम दिखती क्योंकि तुम पर्याय हो ॥
सब गुणों में सदा तुम दिखती क्योंकि तुम पर्याय हो।
संसार में भी बदलती रहती क्योंकि तुम पर्याय हो ॥
मोक्ष में भी बदलती रहती क्योंकि तुम पर्याय हो।
सदा बदलती रहती हो क्योंकि तुम पर्याय हो ॥
25 जीव द्रव्य
देखे जाने जाने देखे - ४
सुख दुख का वेदन जो करता, वह तो जीव द्रव्य है।
आँखों से तो कभी न दिखता, वह तो जीव द्रव्य है ॥
ज्ञाता दृष्टा कहलाता, वह तो जीव द्रव्य है।
ज्ञायक भी तो कहलाता, वह तो जीव द्रव्य है ॥
आत्म से परमातम बनता, वह तो जीव द्रव्य है।
सब दुःखों को क्षण में नशाता, वह तो जीव द्रव्य है ॥
निज प्रभुता को भूल भ्रमाता, वह तो जीव द्रव्य है।
देखे जाने जाने देखे देखे जाने वह तो जीव द्रव्य है।
26 जीव द्रव्य
जानता और देखता जीव वह कहलाता है।
राग द्वेष जो करता है जीव वह कहलाता है।
जीवत्व शक्ति से जीता है जीव वह कहलाता है।
चार गति में जाता है जीव वह कहलाता है।
सुख दुःख को जो भोगता जीव वह कहलाता है।
रत्नत्रय को प्रगटाता जीव वह कहलाता है।
मोक्षमार्ग में जाता है जीव वह कहलाता है।
जानता और देखता जीव वह कहलाता है।
27 शुद्धात्मा
क्रोधी मानी मायाचारी, लोभी नहीं मैं ज्ञायक हूँ।
रागी द्वेषी अर संसारी, सिद्ध नहीं मैं ज्ञायक हूँ।
28 पुद्गल द्रव्य
छूकर जाना जाता है, वह तो पुद्गल द्रव्य है।
चखकर जिसको जान सके वह तो पुद्गल द्रव्य है।
सूंघने में आता है, वह तो पुद्गल द्रव्य है।
रंग बिरंगा दिखता है जो वह तो पुद्गल द्रव्य है।
कानों से सुनने में आता, वह तो पुद्गल द्रव्य है।
मिलता और बिखर जाता है, वह तो पुद्गल द्रव्य है।
सुख दुख का वेदन नहीं करता,वह तो पुद्गल द्रव्य है।
छूकर जाना जाता है, वह तो पुद्गल द्रव्य है।
29 धर्म द्रव्य
हिलो डुलो, डुलो, हिलो, इधर आओ उधर जाओ।
आने जाने में जो निमित्त, वह तो धर्म द्रव्य है।
जीव पुद्गल के गमन में निमित्त, मैं तो धर्म द्रव्य हूँ।
मेरी संख्या एक है, मैं तो धर्म द्रव्य हूँ।
जीव और पुद्गल चलते हैं, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
जीव और पुद्गल हिलते हैं, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
धर्म कभी नहीं कर सकता हूँ, मैं तो धर्म द्रव्य हूँ।
धर्म करे तो जीव करे, मैं तो धर्म द्रव्य हूँ।
आता जाता मैं नहीं, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
जब तुम खाना खाते हो, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
हवाई जहाज के आने में धर्म द्रव्य निमित्त है।
रेलगाड़ी के आने में धर्म द्रव्य निमित्त है।
श्वास के आने जाने में धर्म द्रव्य निमित्त है।
जब तुम हंसते गाते हो, धर्म द्रव्य निमित्त है।
30 अधर्म द्रव्य
(कोरस) रुक रुक रुक रुक रुक रुक।
रुक गये तो रुकने में तो मात्र निमित्त हूँ।
जीव और पुद्गल रुकते हैं, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
चलता पंखा रुक जाता, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
चलती टुक रुकती है, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
मैं न चलाता रुकता हूँ, मैं तो अधर्म द्रव्य हूँ।
अधर्म कभी न कर सकता, मैं तो अधर्म द्रव्य हूँ।
अधर्म करे तो जीव करे, मैं तो अधर्म द्रव्य हूँ।
मेरी संख्या एक है, मैं तो अधर्म द्रव्य हूँ।
31 आकाश द्रव्य
इस जगह हूँ मैं, उस जगह हूँ मैं।
सब जगह हूँ मैं, कौन? आकाश ॥
ऊपर हूँ मैं, नीचे हूँ मैं।
आर में पार में, और हूँ पहार में कौन? आकाश ॥
लोक में हूँ मैं, अलोक में हूँ मैं।
छह द्रव्यों का आवास कौन? आकाश ॥
नदी में हूँ, समुद्र में हूँ मैं।
सब जगह है मेरा वास कौन? आकाश ॥
नीला नहीं मैं, काला नहीं मैं।
अंधकार और न प्रकाश कौन? आकाश ॥
अनेक नहीं, अनंत नहीं मैं।
संख्या में एक हूँ मैं कौन? आकाश ॥
शेष नहीं मैं, अशेष नहीं मैं।
प्रदेश है इकाई जिसकी कौन? आकाश ॥
32 काल द्रव्य
(रस) तुम बदलो, हम बदलें, सब बदलें बदला करें।
लोकाकाश में रहता हूँ, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
प्रत्येक प्रदेश पर रमणी रहता, मैं तो काल द्रव्य हूँ।
संख्या में असंख्यात हूँ, मैं तो काल द्रव्य हूँ।
मेरी इकाई समय कहावे, मैं तो काल द्रव्य हूँ।
सब द्रव्यों को बदलने में मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
गेहूँ का आटा बन जाता, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
आटे की लोई बन जाती, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
लोई की रोटी बन जाती, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
रोटी चबकर पेट में गई, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
रोटी पचकर खून बनी, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
सोने का कंगन बन जाता, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
पापी से परमातम बनता, मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
33 अस्तित्व गुण
द्रव्य है ..गुण है..पर्याय है, है..है..है..है ही बताता हूँ मैं।
अनादि से आज तक है यहाँ, है..है..है..है ही बताता हूँ मैं।
द्रव्य कभी नहीं, द्रव्य मरता नहीं, भ्रांति से डरता नहीं।
नरकादि में भी नष्ट न हो, पापोदय में भी नष्ट न हो।
द्रव्य है ..गुण है..पर्याय है, है..है..है..है ही बताता हूँ मैं।
कर्म आदि से भी नष्ट न हो, कषायों से भी नष्ट न हो।
सत् कहलाता द्रव्य सदा, अस्तित्व गुण के कारण यहाँ।
द्रव्य है ..गुण है..पर्याय है, है..है..है..है ही बताता हूँ मैं।
34 वस्तुत्व गुण
वस्तुपना ही साधता है, वस्तुत्व मेरा नाम।
द्रव्य है तो काम करे, कभी न कोई विश्राम ॥
शक्कर करती अपना काम, नमक करता अपना काम।
वस्तुपना ही साधता है, वस्तुत्व मेरा नाम ॥
तेल करता अपना काम, घी करता अपना काम।
सोना करता अपना काम, चाँदी करती अपना काम ॥
वस्तुपना ही साधता है, वस्तुत्व मेरा नाम।
जीव करता अपना काम, अजीव करता अपना काम ॥
संग संग करता अपना काम, भिन्न रह करते अपना काम।
वस्तुपना ही साधता है, वस्तुत्व मेरा नाम ॥
35 द्रव्यत्व गुण
जो भी द्रव्य होता है, दशा बदलता रहता है।
इसी से द्रव्य कहलाता है, त्यों का त्यों ही रहता है।
नये से पुराना होता है, छोटे से बड़ा होता है।
अज्ञानी से ज्ञानी होता है, पापी से पंडित होता है।
रागी विरागी होता है, बालक बूढ़ा होता है।
फिर भी कुछ नहीं होता है, न जाने वो होता है।
36 लोक
तीन लोक होते हैं जग में, रहते इसमें जीव - ही जीव।
ऊर्ध्वलोक में सिद्ध विराजे, उनके नीचे रहते देव-हृदय देव ॥
मध्यलोक में हम तुम रहते, पशु भी रहे सदैव - सदैव।
नारकी रहते अधोलोक में, भोगें दुःख अनेक-अनेक ॥
37 प्रमेयत्व गुण
कोरस - लुका छिपी, छुपा-छिपी - १
छुप न सकोगे कभी कहीं, जाने जाता सदा सभी ॥
ट्रेक चौथी तुम्हारी कभी न छिपी, झूठ तुम्हारा कभी न छिपा।
रात्री भोजन कभी न छिपा, तुम से तो छिप न सकोगे ॥
भगवान से तो छिप न सकोगे, जाने जाते सदा सभी।
छुप न सकोगे कभी कहीं, जाने जाता सदा सभी ॥
नियम तोड़ना छिप न सकेगा, गाली देना छिप न सकेगा।
पाप करना छिप न सकेगा, कषाय करना छिप न सकेगा ॥
भगवान से तो छिप न सकोगे, जाने जाते सदा सभी।
छुप न सकोगे कभी कहीं, जाने जाते सदा सभी ॥
जाननहार को जान रहे हो, अपने को पहचान रहे हो।
सम्यग्दर्शन है आसान, मुक्तिनगर को करो प्रमान ॥
भगवान बनकर सदा रहोगे, वही से आना कभी नहीं।
छुप न सकोगे कभी कहीं, जाने जाते सदा सभी ॥
38 वन्दना गीत
कोरस जय जय जय बोलो - १
समवशरण में उपदेश दाता - २
अरहंत प्रभु की, जय - ३
सिद्ध शिला पर रहने वाले, - २
सिद्ध प्रभु की, जय - ३
मुक्ति पथ पर चलने वाले, - २
सर्व साधु की, जय - ३
सब जीवों को आनन्दकारी, आनन्दकारी, मंगलकारी
जैन धरम की, जय - ३
39 अमूर्त्तत्व गुण
घटे नहीं बढ़े नहीं, छोटा नहीं बड़ा नहीं। … टेक
द्रव्य की सत्ता घटे नहीं, द्रव्य की सत्ता बढ़े नहीं।
नरक निगोद में घटे नहीं, स्वर्ग मोक्ष में बढ़े नहीं ॥
शकर की मिठास घटे नहीं, शकर की मिठास बढ़े नहीं।
पोलीथीन में घटे नहीं, सोने के डिब्बे में बढ़े नहीं ॥
मिट्टी में जाकर घटे नहीं, खीर में जाकर बढ़े नहीं।
गाली देने से घटे नहीं, पूजा करने से बढ़े नहीं ॥
पापोदय में घटे नहीं, पुण्योदय में बढ़े नहीं।
मूर्खता में घटे नहीं, ज्ञानोदय में बढ़े नहीं ॥
तेरी प्रभुता घटे नहीं, तेरी प्रभुता बढ़े नहीं।
निराशा कभी नहीं, अहंकार भी करना नहीं ॥
40 प्रदेशत्व गुण
हर द्रव्य में हो आकार, प्रदेशत्व गुण करे साकार।
शक्कर का घोड़ा देखा होगा, वह भी एक आकार है ॥
मिट्टी का हाथी देखा होगा, वह भी एक आकार है।
सोने का कंगन देखा होगा, वह भी एक आकार है ॥
कुर्ता पैजामा देखा होगा, वह भी एक आकार है।
लकड़ी की कुर्सी देखी होगी, वह भी एक आकार है।
कुत्ता बिल्ली देखे होंगे, वह भी एक आकार है।
जीव भी रखता है आकार, पुद्गल का होता आकार।
छहों द्रव्यों में हो आकार, बदला करता है आकार।
हर द्रव्य में हो आकार, प्रदेशत्व गुण करे साकार ॥
41 औदारिक शरीर
मल मूत्र से भरा हुआ जो शरीर है।
हाड़-मांस से भरा हुआ जो शरीर है।
दिन-दिन बुढ़ा होता जाता शरीर है।
सोता-जगता जगता-सोता शरीर है।
आंखों से दिखता जो यही शरीर है।
नर तिर्यंच में होता यही शरीर है।
छिन-छिन गलता जाता यही शरीर है।
औदारिक कहलाता वही शरीर है।
42 वैक्रियिक शरीर
मन चाहे जो बनावे रूप, स्वर्ग नरक में धरते रूप।
हल्का रूप भारी रूप, नदी का रूप वृक्ष का रूप ॥
नारकी बनावें गंदा रूप, टेढ़ा रूप काला रूप।
देव बनावें सुन्दर रूप, गोरे रूप सलोने रूप ॥
ऐरावत का रखे रूप, आनंद करते रख-रख रूप।
आंखों से नहीं दिखता रूप, वैक्रियिक देह का ऐसा रूप ॥
43 कार्मण शरीर
आठ कर्मों से बना है, चार गति में रहता हूँ।
सिद्धप्रभु संग नहीं रहूँ, शेष सभी के संग रहूँ ॥
आगमचक्षु से दिखता हूँ, केवलज्ञान में दिखता हूँ।
आँखों से नहीं दिखता हूँ, कार्मण शरीर कहलाता हूँ ॥
44 तैजस शरीर
तीन शरीरों को मैं कांति देता हूँ।
इसीलिए तैजस शरीर कहलाता हूँ।
विग्रह गति में भी तो मैं संग रहता हूँ।
चारों गतियों में भी तो मैं जाता हूँ।
मनुष्य शरीर चमकता है - मेरे से मेरे से
देव शरीर चमकता है - मेरे से मेरे से
नारकी शरीर चमकता है - मेरे से मेरे से
घोड़ा का शरीर चमकता है - मेरे से मेरे से
हीरा - सोना चमकता है - मेरे से मेरे से
सब्जियाँ चमकती है - मेरे से मेरे से
45 आहारक शरीर
ऋद्धिधारी मुनियों को जब शंका हो।
अथवा जिनवर देव के दर्शन करना हो।
एक हाथ प्रमाण पुष्टुषाकार जो,
मस्तक से निकलता होता श्वेत जो,
समघातु से रहित चमकता दिखता है,
तीव्रगति से जाता है और आता है।
पूर्ण अहिंमय जो होता है,
आहारक शरीर वही कहलाता है।
46 गति
नर नारक पशु देव रूप है मैं, इनमें जीव बहुत दुःख पाता है।
जीव की अवस्था विशेष कहते, बतलाओ मुझको क्या कहते ॥
47 मेरी भूल
अब तक कितनी बड़ी भूल कर रहा था,
संसार छोड़ने वाले से संसार सुख चाह रहा था।
भाव भोजनत्याग में धर्म मान रहा था,
पाप-पुण्य में ही अब तक झूल रहा था।
आत्मज्ञान रूप धर्म नहीं जाना था,
मोक्षसुख का स्वरूप नहीं पहचाना था।
धर्म के नाम पर नाना क्रियायें करता था,
फल में स्वर्गसुख की कामना करता था।
क्योंकि
स्वर्ग के दुःखों का ज्ञान नहीं था,
अपने स्वरूप का भान नहीं था।
इसलिए
प्राप्त नरभव की कीमत नहीं कर रहा था,
अप्राप्त स्वर्ग के पीछे ही भाग रहा था।
जबकि
देवता भी नरभव को तरसते हैं,
क्योंकि भगवान नरभव से बनते हैं।
48 वीतरागी
रागी नहीं जो - देवी नहीं जो,
अजीव नहीं, वो तो जीव है।
49 सर्वज्ञ
जो होगा हो गया, हो रहा लोक में।
द्रव्य - गुण - पर्याय, जाने धोक में ॥
50 स्वपर प्रकाशक
पर में ढूँढा सुख को न मिली सुख की छाया।
निज में देखा सुख को तो खुद में समाया।
स्व को कैसे ज्ञान से जानता है आत्मा ?
पर को कैसे ज्ञान से जानता है आत्मा ?
ज्ञान से ही जाना जाता आत्मा परमात्मा।
क्योंकि स्व-पर प्रकाशक होता है अपना आत्मा।
कमजोर होता ज्ञान तब इन्द्रियों से जानता।
बलवान होता तब उपयोग से ही जानता।
संसार में भी जानता सिद्धांलय में भी जानता।
क्योंकि स्व-पर प्रकाशक होता है अपना आत्मा।
51 समझ रहे हैं हम
समझ गये हैं हम, समझ रहे हैं हम।
प्रभु चरणों में आकर के, सीख रहे हैं हम ॥
किन भावों का क्या फल होता, समझ गये हैं हम।
इनके वश हो चार गति के दुःख न सहेंगे हम ॥
सत्संगति में आकर के अब मोह तजेंगे हम।
आपके चरणों में रम के पुण्य करेंगे हम ॥
अच्छे - अच्छे काम करेंगे, नहीं डरेंगे हम।
निज स्वभाव में रमण करेंगे, पुण्य तजेंगे, हम ॥
शुद्ध भाव ही धर्म भाव है, सदा करेंगे हम।
अष्ट कर्म को नाश कर, मोक्ष वरेंगे हम ॥
52 प्रार्थना
हे भगवन् !
आप तो मेरे सारे कष्ट जानते हैं,
फिर भी आप मौन खड़े हैं।
आपके राग में अन्यायी दुष्ट राज कर रहे हैं,
न्यायी-ईमानदार कष्टों से जूझ रहे हैं।
माना आप ज्ञाता-दृष्टा हो,
सब-कुछ जान सकते हो।
पर आप कुछ करते क्यों नहीं ?
समझ गया, आपको इच्छा ही नहीं है।
यदि आपको भी इच्छायें होतीं,
तो आप भी हम जैसे ही दुःखी होते।
फिर हम आपको भगवान क्यों कहते ?
भगवान आपका यह स्वरूप,
समझ नहीं आ रहा है मुझे।
जानते हो सब कुछ,
पर करते नहीं आप कुछ।
करने से क्या बिगड़ जाएगा आपका,
अनंत शक्तियों में कुछ कम न होगा आपका।
माना, एक द्रव्य-दूसरे में कुछ कर सकता नहीं,
अतः आप भी पर में कुछ कर सकते नहीं ?
फिर भी हे भगवन् !
सोचिए ! कितनी इज्जत करते हैं सब आपकी ?
सोचिए ! कितनी कीमत करते हैं सब आपकी ?
गलत कामना कर ली मैंने आपसे,
भूल हो गई स्वरूप जानने में मुझसे।
सोचना काम नहीं आपका,
मात्र जानना काम है आपका।
सोचते हम जैसे अल्पज्ञानी हैं,
आप तो सर्वज्ञ केवलज्ञानी हैं।
53 जानते हैं हम
राग नहीं करते हो जानते हैं हम।
द्वेष नहीं करते हो जानते हैं हम ॥
सब कुछ जानते हो देखते हो तुम।
भला बुरा कुछ नहीं करते हो तुम ॥
हित उपदेश ही करते हो तुम।
पूर्ण सुखी इसी से हो गये हो तुम ॥
आप जैसा सुख ही चाहते हैं हम।
चरणों में इसी से नमते हैं हम ॥
54 सम्यक्दृष्टि
आत्मा को ही निज मान और जान कर।
अपने स्वभाव में ही रमकर जानकर।
मोक्षमार्ग की एकता हुई है जिनको।
बतलाओ तो क्या कहते हैं उनको।
उत्तर - सम्यक्दृष्टि।
55 रत्न पारखी
शिष्य
रत्नों का पारखी हूँ मैं,
रत्नों की नस-नस जानता हूँ मैं।
रत्नों का व्यापार करता हूँ मैं,
व्यापार के प्रति ईमानदार हूँ मैं।
अपने पराये का भेद नहीं करता हूँ मैं,
समय की कीमत पहचानता हूँ मैं।
अतः समय से भी बँधा नहीं हूँ मैं,
दिन-रात व्यापार करता हूँ मैं।
जब सब सोते प्यारी नींद मैं,
तब कंप्यूटर में लवलीन मैं।
हानि का कोई सौदा नहीं करता मैं,
लाभ को दांतों से पकड़कर रखता मैं।
अपने बनाए उसूलों पर चलता हूँ मैं,
व्यापार में समझदारी रखता हूँ मैं।
ऊँच नीच का भेद नहीं करता हूँ मैं,
छोटे-बड़े का लिहाज नहीं रखता हूँ मैं।
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए,
पर हाँ भरोसा करता हूँ।
संबंध तोड़ सकता हूँ,
पर व्यापार नहीं छोड़ सकता हूँ।
संबंधों की जगह संबंध निभाता हूँ,
व्यापार को संबंध से नहीं जोड़ता हूँ।
व्यापार में तो सबको एक लाठी से हाँकता हूँ,
इसीलिए तो सफल व्यापारी कहलाता हूँ।
गुरुजी
जड़ रत्नों के पारखी तुम,
आत्म रत्न को नहीं जानते तुम।
राग-द्वेष का व्यापार करते तुम,
अपना ही संसार बढ़ाते हो तुम।
यदि अपने प्रति ईमानदार होते तुम,
तो स्व-पर भेद विज्ञान करते तुम।
तब समय (आत्मा) में भी बँधते तुम,
दिन-रात आत्म चिंतन करते तुम।
हे वत्स !
संसार-मोक्ष का भेद नहीं जानते तुम ?
सफल व्यापारी भी नहीं हो तुम ?
व्यापार में तो संबंध जोड़े जाते हैं,
संबंध तोड़ेंगे वाले सफल नहीं हो पाते हैं।
संसार में तो संबंधों को निभाया जाता है,
मोक्षमय में संबंधों को तोड़ा जाता है।
ना संसार रीति निभा रहे हो तुम,
ना मोक्षमय पर बढ़ रहे हो तुम।
व्यर्थ ही राग-द्वेष की भट्टी में जल रहे हो,
पूर्व पुण्य की कमाई ही अभी खा रहे हो।
नरभव में तो कुछ नई कमाई करो तुम,
मुक्तिपथ पर बढ़ने का यत्न करो तुम।
अभिमान को अब त्यागो तुम,
गलती अपनी अब मानो तुम।
नरभव सफल करो अब तुम,
आत्म रत्न को अब जानो तुम।
आत्म रत्न को तुम जानेंगे जब,
आत्म रत्न को तुम पहचानेंगे जब।
दिन-रात आत्म चिंतन ही होगा जब,
रत्न पारखी कहलाओगे तुम तब।
56 भगवान कैसे बनूँ ?
शिष्य
कोई अपना नहीं संसार में,
सब स्वार्थी हैं संसार में।
मन लगता नहीं संसार में,
बतलाओ ? क्या करूँ अब मैं ?
गुरुजी
संसार से उदासीन हो जाते हैं जो,
मुक्तिपथ पर बढ़ते हैं वो।
तुम भी आत्म कल्याण करो,
मुक्ति रमा को शीघ्र वरो।
शिष्य
आपका कहना सही है,
पर मेरी भी मजबूरी है।
कैसे करूँ आत्मकल्याण मैं ?
कष्टों से घबराता हूँ मैं।
क्योंकि
खाली पेट रह सकता नहीं मैं,
दिन में दस बार खाता मैं।
मुनिराज बन सकता नहीं मैं,
भगवान कैसे बनूँगा मैं ?
जमीं पर सो सकता नहीं मैं,
डनलप पर ही नित सोता मैं।
पैदल चल सकता नहीं मैं,
भगवान बन सकता नहीं मैं।
सर्दी-गर्मी सह सकता नहीं मैं,
ए. सी. में ही सदा रहता मैं।
समदर्शी रह सकता नहीं मैं,
भगवान बन सकता नहीं मैं।
अकेले रह सकता नहीं मैं,
सबके बीच रहता हूँ मैं।
कष्ट सह सकता नहीं मैं,
भगवान बन सकता नहीं मैं।
एकाग्र रह सकता नहीं मैं,
चंचल चित्त वाला हूँ मैं।
तप कर सकता नहीं मैं,
भगवान बन सकता नहीं मैं।
गुरुजी
बाह्य क्रियाओं से परिचित तुम,
अंतरंग भावों से अपरिचित तुम।
व्यवहार में ही उलझे तुम,
निश्चय स्वरूप नहीं जानते तुम।
निश्चय स्वरूप में जमते हैं जब,
निश्चय स्वरूप में ही रमते हैं जब।
बाह्य में कुछ करना नहीं पड़ता तब,
सब हो जाता है अपने आप तब।
अनन्त शक्ति के पुंज तुम,
सब कुछ कर सकते हो तुम।
अपनी शक्ति पहचानो तुम,
अपना स्वरूप जानो तुम।
आत्मदर्शी जो होते हैं,
समदर्शी वे ही होते हैं।
आत्मलीन जो होते हैं,
भगवान वे ही बनते हैं।
57 अनुपम सुख
वास्तव - प्रत्यक्ष - परोक्ष के चक्कर में नहीं पड़ते हम,
‘खाओ-पिओ, मौज करो’ पर भरोसा करते हम।
चिंतन - खाने - पीने को तो जानवर जीते हैं,
पर क्या वे सुखी नज़र आते हैं?
वास्तव - दुःख, अनुपम सुख को क्यों छोड़ें हम ?
अदृश्य सुख के पीछे क्यों भागें हम ?
चिंतन - सुख का सही स्वरूप नहीं जानते तुम,
इन्द्रिय सुख को सुख मानते तुम।
गरम - (बीच में ही)
सही कह रहा है वास्तव -
उपलब्ध सुख को क्यों छोड़ें हम ?
अनुपलब्ध सुख के पीछे क्यों भागें हम ?
भविष्य में सुख मिलेगा या नहीं ? हमको पता नहीं,
वर्तमान में सुख है इससे इंकार करते नहीं।
चिंतन - उपलब्ध सुख है इन्द्रिय सुख,
वस्तुतः दुःख ही है इन्द्रिय सुख।
सच्चा सुख है अतीन्द्रिय सुख,
जिससे कभी नहीं मिलता दुःख।
वास्तव - भूत की चिंता करते नहीं हम,
भविष्य के पीछे भागते नहीं हम।
वर्तमान में ही जीवित हैं हम,
प्राप्त पर्याय में सुखी हैं हम।
चिंतन - याद कर-करके दुःखी होना भूत की चिंता है,
प्लानिंग करना ही भविष्य के पीछे भागना है।
उपलब्ध में जो दुःखी होते हैं,
सुख के लिए वही प्लानिंग करते हैं।
उत्तम भविष्य की चाह में सदा रहते दुःखी,
पुरानी याद कर-करके सदा होते रहते दुःखी।
प्राप्त पर्याय में भी तुम कहाँ हो सुखी?
इसप्रकार होने तो नज़र आते हो दुःखी।
वास्तव - भूतकाल में भगवान की सत्ता में इंकार करता नहीं,
पर वर्तमान में तो कोई भगवान बन सकता नहीं।
फिर क्यों असंभव को उद्देश्य बनाएँ हम ?
जो मिलता है उससे ही संतुष्ट क्यों न हो हम ?
चिंतन - तुम्हारा कहना सही है,
अभी भगवान बनते नहीं हैं।
किन्तु
आत्मातुभ्य तुम कर सकते अभी,
उसे उद्देश्य बनाओ अभी।
इन्द्रिय भोग में सुख संभव नहीं,
उसे उद्देश्य बनाओ नहीं।
वास्तव - उपलब्ध भोग को क्यों न भोगें हम ?
यदि वर्तमान में सुखी न हो सकें हम।
तो क्यों करें ऐसी गलती हम ?
स्वातुभ्य के पीछे क्यों भागें हम ?
चिंतन - भोग नहीं है सुखरूप,
भोगने समय भी वे हैं दुःखरूप।
पर स्वातुभ्य है सुखस्वरूप,
स्वातुभ्य है मोक्ष स्वरूप।
वर्तमान में स्वातुभ्य करोगे,
तो कर्मबंधन काटोगे।
सच्चा मार्ग अपनाओगे,
तो भविष्य में सुखी हो जाओगे।
58 समझ गया में…
गुरुजी -
समझ गया सम्यग्दर्शन का स्वरूप मैं,
पहचान गया मोक्ष का स्वरूप मैं।
तत्त्वार्थ श्रद्धान व्यवहारसम्यग्दर्शन है,
आत्म श्रद्धान निश्चयसम्यग्दर्शन है।
अतः
जिनोपदिष्ट तत्त्वों को जानते जो,
सच्चे देव, शास्त्र, गुरु को मानते जो;
जिनमत में दृढ़ श्रद्धानी हैं जो,
व्यवहार सम्यग्दृष्टि होते हैं वो।
शुद्धात्म श्रद्धान करते हैं जो,
निश्चय सम्यग्दृष्टि होते हैं वो।
इसप्रकार तो -
जिनमत में दृढ़ श्रद्धानी हैं जो,
क्या व्यवहार सम्यग्दृष्टि होते हैं वो ?
गुरुजी - निश्चय जब तक होगा नहीं,
व्यवहार तब तक पाएगा नहीं।
निश्चय सम्यग्दर्शन होता जब,
व्यवहार सम्यग्दर्शन नाम पाता तब।
शिष्य - तत्त्वों का श्रद्धान मुझे हो गया,
तो व्यवहार सम्यग्दृष्टि मैं हो गया।
तन मैं नहीं, चेतन मैं हूँ जान गया,
तन से भिन्न चेतन का ज्ञान मुझे हो गया।
तो अपने पराये का ज्ञान भी मुझे हो गया,
अतः मैं निश्चय सम्यग्दृष्टि भी हो गया।
गुरुजी - नहीं, भाई नहीं, बहुत भोले हो तुम,
श्रद्धान का नहीं मतलब नहीं समझे तुम।
विश्वास को श्रद्धा मान कर बैठे हो,
श्रद्धा को श्रद्धान समझ कर बैठे हो।
आत्मलीनता स्व-पर श्रद्धान है,
आत्मलीनता शुद्धात्म श्रद्धान है।
आत्मलीनता स्व-पर भेदविज्ञान है,
आत्मलीनता निश्चय सम्यग्दर्शन है।
59 कषाय
चार कषाय हैं मेरा नाम,
सब को दुःख देना मेरा काम।
मोही जीव में मेरा धाम,
चार गति में ही विश्राम।
सुख शान्ति का न नामोनिशां,
झुकना मेरी कभी न शान।
सरलता का नाम नहीं है,
सुचिता का कुछ काम नहीं है।
क्रोधी मैं भी रहता हूँ,
मानी को भी छोड़ूँ ना।
मायावी में भी बसता,
लोभी को भी त्यागूँ ना।
60 द्वेष
नहीं किसी से करता प्यार, क्रोध मान हैं मेरे यार।
बदला लेने को तैयार, झगड़ा करने को तैयार।
बुरा बताकर दूर हटाने को तैयार मैं तैयार।
उत्तर देने को जल्दी से, हो जाओ अब तुम तैयार।
61 आत्मध्यान से
दुर्लभ नर जन्म मिला पुण्योदय से।
उत्तम सत्संग मिला शुभकर्मों से।
जिनवाणी संयोग मिला पुण्योदय से।
सच्चा सुख पंथ मिला शुभकर्मों से।
शुद्धात्म से प्रीति हुई पुण्योदय से।
कषायें मंद पड़ी तत्त्वज्ञान से।
आत्म का ज्ञान हुआ तत्त्वरुचि से।
आत्म में लीनता तत्त्वज्ञान से।
संयम को धारूंगा पुण्योदय से।
मुक्ति का मार्ग मिला पुण्योदय से।
मुनि बन जाऊँगा- पुण्योदय से।
उपसर्ग जीतूँगा ध्यानबल से।
अरहंत कहलाऊँगा मोह नाश से।
सिद्धों के संग रहूँ कर्म नाश से।
जन्म मरण मिटेगा कर्म नाश से।
मुक्ति में रहूँगा कर्म नाश से।
जग में न आऊँगा कर्म नाश से।
अनंतसुख पाऊँगा आत्मध्यान से।
लेखिका की कृतियाँ
शिशु वर्ग
(१) जैन संस्मृति-हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, तमिल)
(२) जैन जी. के. भाग - १ (हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, तमिल)
(३) जैन जी. के. भाग - २ (हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, तमिल)
(४) जैन जी. के. भाग - ३ (हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, तमिल)
(५) जैन कलर बुक भाग - १ (ड्राइंग बुक)
(६) जैन कलर बुक भाग - २ (ड्राइंग बुक)
बाल वर्ग
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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