पहले सिद्धांत का अध्ययन करना आवश्यक है या पहले दृष्टि या भेदज्ञान समझना आवश्यक है ?
आध्यात्मिक शास्त्र जैसे समयसार जी का अध्ययन पहले करके, उसी में से सिद्धांत निकालना क्या उचित है ?
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जैसे समय सार जी के अनुसार - एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं करता, लेकिन अगर हम इसको सिद्धांत बना ले, और सारे सैद्धांतिक शास्त्रों का इसी नजरिए से अध्ययन करें, तो क्या यह उचित है ?
हो सकता है कि आचार्य भगवान् कुंदकुंद ने इसलिए ऐसा लिखा हो ताकि हमारी दृष्टि पर पदार्थों से हट जाए। लेकिन हमने इसको सिद्धांत ही बना दिया और कर्म सिद्धांत को भी इसी के basis पर अध्ययन किया ।
@Abhay जी, जय जिनेन्द्र। श्रुतम् में शास्त्रों से जो मिला, वह यहाँ रख रहे हैं।
1. अध्ययन का क्रम: मोक्षमार्ग प्रकाशक के अनुसार पहले द्रव्यानुयोग के अभ्यास से स्व-पर का श्रद्धान, फिर चरणानुयोग अनुसार व्रत।
जिनमत में तो ऐसी परिपाटी है कि पहले सम्यक्त्व होता है और फिर व्रत होते हैं। सो सम्यक्त्व तो स्व-पर के श्रद्धान होने पर होता है तथा वह श्रद्धान द्रव्यानुयोग का अभ्यास करने से होता है। इसलिये प्रथम द्रव्यानुयोग के अनुसार श्रद्धान करके सम्यग्दृष्टि होना और पश्चात् चरणानुयोग अनुसार व्रतादि धारण करके व्रती होना।
(मोक्षमार्ग प्रकाशक प्रवचन भाग ३, पृष्ठ ३७८)
2. “एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं करता”: श्रुतम् के उत्तर का भाव यह है कि यह वस्तु का स्वभाव है, और कर्म तथा आत्मा के बीच निमित्त-नैमित्तिक संबंध है, कर्ता-कर्म का नहीं।
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य पर कभी असर करता है, वह बात सही नहीं है। एक द्रव्य दूसरे पर कभी असर नहीं करता, लेकिन एक में कार्य होता है तब जिसके ऊपर अनुकूलता का आरोप आता है, ऐसे दूसरे पदार्थ की उपस्थिति होती है।
(मोक्षमार्ग प्रकाशक ना किरणो भाग १ और २, पृष्ठ २६८)
3. निश्चय और व्यवहार नय:
निश्चयनय से जो निरूपण किया हो उसे तो सत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान अंगीकार करना और व्यवहारनय से जो निरूपण किया हो उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना।