श्यादाद बाल शिक्षा भाग-१
स्याद्वाद बाल शिक्षा
भाग-१
ॐ श्री वीतरागाय नमः ॥
स्याद्वाद बाल-शिक्षा
प्रथम भाग
- लेखिका *
गणिनी आर्यिका श्री १०५ स्याद्वादमती माताजी
भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्
भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद् पुष्प संख्या- १३७
आशीर्वाद : प.पू. आचार्य श्री १०८ विमलसागरजी महाराज
: प.पू. आचार्य श्री १०८ भरतसागरजी महाराज
संयोजन : आर्यिका श्री १०५ यशस्विनी माताजी
ग्रन्थ : स्याद्वाद बाल शिक्षा (भाग-१)
लेखिका : गणिनी आर्यिका श्री १०५ स्याद्वादमती माताजी
संस्करण : तेईसवाँ
वीर निर्वाण सम्वत् २५४१ सन् २०१५
सर्वाधिकार सुरक्षित :
प्रकाशक : भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्
पुस्तक प्राप्ति स्थान : (१) गणिनी आर्यिका यशस्विनी माताजी संघ
(२) आचार्य श्री विमल भरत साहित्य सदन
सम्वेदशिखरजी
(३) श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मन्दिर
डी-२१०, स्थापनाके एसटेंशन
महावीर वाटिका, साहिबाबाद (उ.प्र.)
मूल्य : ४/- रुपये
मुद्रक : सुभाष ऑफसेट
मदनगंज-किशनगढ़ (राज.)
फोन : ०१४६३-२४२१२१
अनुक्रमणिका
१. प्रार्थना
२. नवदेवता स्तवन
३. परमेष्ठी
४. मंगल
५. तीर्थंकर
६. जीव
७. इन्द्रियाँ
८. गति
९. पाप
१०. कषाय
११. जिनवाणी भक्ति
प्रार्थना
हे वीतराग स्वामी, नित प्रार्थना हमारी।
अज्ञान को तजें हम, बन ज्ञान के पुजारी।।१।।
हिंसादि पाप तजकर
सत्यपथ पे हम चलेंगे,
क्रोध कषाय तजकर।
समभाव हम धरेंगे ।।१।। हे वीतराग०
माता पिता की सेवा,
धार्मिक गुरुजनों की,
प्रातः सुजल्दी उठकर।
नित करेंगे ईश भक्ति ।।१।। हे वीतराग०
दो नाथ हमको शक्ति
तुम सम बनें हम भी,
दुःखियों की सेवा करके।
पावेंगे आत्म शक्ति ।।१।। हे वीतराग०
नव देवता स्तवन
दोहा
परमेष्ठी पाँचों नमुँ, जिनवाणी उरलाय।
जिन मार्ग को धारकर, जैलव कैवल्य ध्याय।।
(तर्ज-अहो जगत् गुरु देव सुनियो)
अरिहन्त प्रभु का नाम, है जग में सुखदाई।
घाति चतुष्टय झारकर, केवल ज्योति पाई।
वीतराग सरवज्ञ, हित उपदेशी कहावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित भक्ति सुध्यावे ।।१।।
सिद्ध प्रभु गुणखान, सिद्धि के हो प्रदाता।
कर्म आठों सब काट, करते मुक्ति बासा।
शुद्ध बुद्ध अविकार, शिव सुखकारी गाथा।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित नावे माथा ।।२।।
आचार्य गुणकार, पञ्चाचार को पाले।
शिक्षा दीक्षा प्रधान, भविजन के दुख टाले।
अनुग्रह निग्रह काज, मुक्ति मारग चलते।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो आचारज भजते ।।३।।
ज्ञान ध्यान लवलीन, जिनवाणी रस पीते।
अध्ययन शिक्षा प्रदान, संघ में जो नित करते।
रत्नत्रय गुणधाम, उपदेशामृत देते।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित उपझाय भजते ।।४।।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ६ भाग १
दर्शन ज्ञान चारित्र, मुक्ती मार्ग कहाये।
तिनप्रति साधन रूप, साधु दिगम्बर भाये।
क्रियाशा को त्याग, निज आत्म हित पागे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित साधु ध्यावे ।।५।।
तत्व द्रव्य गुण सार, वीतराग मुख निकली।
गणधर ने गुणधार, जिनमाला इक गूंथी।
‘स्याद्वाद’ चिह्न सार, वस्तु अनेकान्त गाई।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिनवाणी ध्याई ।।६।।
सम्यक् श्रद्धा सार, देव शास्त्र गुरु भाई।
सम्यक् तत्व विचार, सम्यक् ज्ञान कहाई।
सम्यक् होय आचार, सम्यक् चारित गाई।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिन मारग धाई ।।७।।
वीतराग जिनबिम्ब, मूरत हो सुखदाई।
दर्शन सम जिनबिम्ब, दिखता जिसमें भाई।
कर्म कलंक नशाय, जो नित दर्शन पावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित चैत्य को ध्याते ।।८।।
वीतराग जिनबिम्ब, कृत्रिमकृत्रिम जितने।
शोभत है जिस देश, वे चैत्यालय उतने।
उन सबकी जो सार, भक्ति महिमा गावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो चैत्यालय ध्यावे ।।९।।
दोहा
नव देवता को नित भजे, कर्म कलंक नशाय।
भव सरि से पार हो, शिव सुख में रम जाय।।
नोट-प्रतिदिन प्रातः पाठ करने से जीवन शुद्ध, शान्ति और समृद्धि
को प्राप्त होता है।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ७ भाग १
३-परमेष्ठी
प्रश्न १- णमोकार मंत्र किसे कहते हैं?
उत्तर- जिस मंत्र में पंच परमेष्ठियों को नमस्कार किया है उसे
णमोकार मंत्र कहते हैं। इसमें ३५ अक्षर, ५ पद तथा
५८ मात्राएँ हैं।
प्रश्न २- णमोकार मंत्र कौन सा है?
उत्तर- णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।।
प्रश्न ३- इस मंत्र का महत्त्व क्या है?
उत्तर- एसो पंच णमोयारो सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवइ मंगलम् ।।
यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करने वाला है। सब
मंगलों में पहला मंगल है।
प्रश्न ४- परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- जो परम पद में स्थित हों उन्हें परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न ५- परमेष्ठी कितने हैं?
उत्तर- परमेष्ठी ५ हैं-
(१) अरहंत (२) सिद्ध (३) आचार्य (४) उपाध्याय
(५) साधु
प्रश्न ६- अरहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- घातिगण, सर्वज्ञ, हितोपदेशी जिनके ४ घातिर्या कर्म नष्ट
हो गये हों, उनको अरहंत परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न ७- अरहंत परमेष्ठी के कितने मूलगुण हैं?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी के ४६ मूलगुण हैं।
प्रश्न ८- सिद्ध परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- जो जन्म-मरण से हमेशा के लिए छूट गये हैं और आठों
कर्म से रहित हैं उनको सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ८ भाग १
प्रश्न ९- सिद्ध परमेष्ठी कहाँ रहते हैं?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी लोक के अग्र भाग में रहते हैं।
प्रश्न १०- सिद्ध परमेष्ठी के कितने मूलगुण हैं?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी के ८ मूलगुण हैं।
प्रश्न ११- आचार्य परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- जो दीक्षा और सदुपदेश देते हैं उनको आचार्य परमेष्ठी
कहते हैं।
प्रश्न १२- आचार्य परमेष्ठी के कितने मूलगुण हैं?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी के ३६ मूलगुण हैं।
प्रश्न १३- उपाध्याय परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- जो स्वयं पढ़ते हैं और अपने शिष्यों को पढ़ाते हैं उनको
उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न १४- उपाध्याय परमेष्ठी के कितने मूलगुण हैं?
उत्तर- उपाध्याय परमेष्ठी के २५ मूलगुण होते हैं।
प्रश्न १५- साधु परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर- जो विषय, आशाओं से रहित, आरंभ, परिग्रह से रहित
एवं ज्ञान ध्यान में लीन हैं, वे साधु परमेष्ठी हैं।
प्रश्न १६- साधु परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं?
उत्तर- साधु परमेष्ठी के २८ मूलगुण होते हैं।
प्रश्न १७- क्या हम भी परमेष्ठी बन सकते हैं?
उत्तर- हाँ, जो भी उनके समान महान काम करेगा वह परमेष्ठी
बच सकता है।
प्रश्न १८- पंच परमेष्ठी में हमारे समान आहार कौन-कौन लेते
हैं?
उत्तर- आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी हमारे समान आहार
करते हैं।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ९ भाग १
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १९- आहार कैसे लेते हैं ?
उत्तर- साधु खड़े-खड़े, हाथ में, दिन में एक बार शुद्ध आहार
लेते हैं।
प्रश्न २०- वे अपने पास पैसे नहीं रखते हैं, तो बाल बढ़ने पर
क्या करते हैं ? उनके बाल कौन निकालता है ?
उत्तर- बालों के बढ़ जाने पर मुनिराज (आचार्य, उपाध्याय,
साधु) अपने हाथों से सिर, दाढ़ी-मूछ के बाल निकालते
हैं। इस क्रिया को केशलोचन कहते हैं।
४-ॐ मंगल ॐ
प्रश्न २१- लोक में मंगल कितने हैं ?
उत्तर- लोक में मंगल ४ हैं।
प्रश्न २२- वे कौन-कौन मंगल हैं ?
उत्तर- (१) अरहंत (२) सिद्ध (३) साधु (४) केवली प्रणीत
धर्म।
प्रश्न २३- लोक में उत्तम कितने हैं और कौन-कौन हैं ?
उत्तर- लोक में उत्तम ४ हैं।
(१) अरहंत (२) सिद्ध (३) साधु (४) केवली प्रणीत
धर्म।
प्रश्न २४- लोक में शरण कितने हैं ? कौन-कौन हैं ?
उत्तर- लोक में शरण ४ हैं।
(१) अरहंत (२) सिद्ध (३) साधु (४) केवली प्रणीत
धर्म।
प्रश्न २५- माता पिता शरण हैं क्या ?
उत्तर- नहीं। माता-पिता, सारा परिवार कोई शरण नहीं है।
सब स्वार्थ के साथी हैं।
५-तीर्थंकर
प्रश्न २६- तीर्थंकर किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो तीर्थ को चलाते हैं, तीर्थ का उपदेश देते हैं एवं
जिनके पंचकल्याणक होते हैं उनको तीर्थंकर कहते हैं।
प्रश्न २७- तीर्थंकर कितने होते हैं ?
उत्तर- तीर्थंकर २४ होते हैं।
प्रश्न २८- भगवान कितने होते हैं ?
उत्तर- भगवान बहुत होते हैं।
प्रश्न २९- वर्तमान काल के तीर्थंकरों के नाम एवं चिह्न क्या-
क्या हैं ?
उत्तर-
वर्तमानकाल के तीर्थंकर
| क्रम संख्या | तीर्थंकरों के नाम | चिह्न |
|---|---|---|
| १. | ऋषभनाथ (आदिनाथ) | बैल |
| २. | अजितनाथ | हाथी |
| ३. | संभवनाथ | घोड़ा |
| ४. | अभिनंदननाथ | बन्दर |
| ५. | सुमतिनाथ | चकवा |
| ६. | पद्मप्रभु भगवान | लाल-कमल |
| ७. | सुपार्श्वनाथ | स्वस्तिक |
| ८. | चंद्रप्रभु भगवान | चंद्रमा |
| ९. | पुष्पदंत (सुविधिनाथ) | मगर |
| १०. | शीतलनाथ | कल्पवृक्ष |
| ११. | श्रेयांसनाथ | गेंडा |
| १२. | वासुपूज्य | भैंसा |
| १३. | विमलनाथ | शूकर |
| १४. | अनंतनाथ | सेही |
| १५. | धर्मनाथ | वज्रदण्ड |
| १६. | शांतिनाथ | हिरण |
| १७. | कुंथुनाथ | बकरा |
| १८. | अरहनाथ | मछली |
| १९. | मल्लिनाथ | कलश |
| २०. | मुनिसुव्रतनाथ | कछुआ |
| २१. | नेमिनाथ | नील कमल |
| २२. | नेमिनाथ | शंख |
| २३. | पार्श्वनाथ | सर्प |
| २४. | वर्धमान (महावीर) | सिंह |
प्रश्न ३०- तीर्थंकरों के चिह्न क्यों होते हैं ?
उत्तर- चिह्न से तीर्थंकर की पहचान होती है।
प्रश्न ३१-२४ तीर्थंकरों के जन्म स्थान कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- चौबीस
तीर्थंकरों के नाम
| क्रम संख्या | तीर्थंकरों के नाम | जन्म नगरियाँ |
|---|---|---|
| १. | आदिनाथ जी | अयोध्या |
| २. | अजितनाथ जी | अयोध्या |
| ३. | संभवनाथ जी | श्रावस्ती |
| ४. | अभिनंदन जी | अयोध्या |
| ५. | सुमतिनाथ जी | अयोध्या |
| ६. | पद्मप्रभु जी | कौशाम्बी |
| ७. | सुपार्श्वनाथ जी | बनारस |
| ८. | चंद्रप्रभु जी | चंद्रपुरी |
| ९. | पुष्पदंत जी | काकंदी |
| १०. | शीतलनाथ जी | भद्रलपुर |
| ११. | श्रेयांसनाथ जी | सिंहपुरी |
| १२. | वासुपूज्य जी | चम्पापुरी |
| १३. | विमलनाथ जी | कम्पिला |
| १४. | अनंतनाथ जी | अयोध्या |
| १५. | धर्मनाथ जी | रत्नपुरी |
| १६. | शांतिनाथ जी | हस्तिनापुर |
| १७. | कुंथुनाथ जी | हस्तिनापुर |
| १८. | अरहनाथ जी | हस्तिनापुर |
| १९. | मल्लिनाथ जी | मिथिला |
| २०. | मुनिसुव्रत जी | राजगृह |
| २१. | नेमिनाथ जी | मिथिला |
| २२. | नेमिनाथ जी | सौरीपुर |
| २३. | पार्श्वनाथ जी | बनारस |
| २४. | महावीर स्वामी | कुण्डलपुर |
प्रश्न ३२-२४ तीर्थंकर भगवान मोक्ष कहाँ-कहाँ से गये ?
उत्तर-
श्री आदिनाथ जी - कैलाश पर्वत से मोक्ष गये।
श्री वासुपूज्य जी - चम्पापुरी से मोक्ष गये।
श्री नेमिनाथ जी - गिरनार पर्वत से मोक्ष गये।
श्री महावीर जी - पावापुरी से मोक्ष गये।
और शेष २० तीर्थंकर - सम्मेद-शिखर-सिद्ध क्षेत्र से मोक्ष गये।
प्रश्न ३३-२४भगवान में अधिक नाम वाले भगवान कितने
हैं ? कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- अधिक नाम वाले भगवान ३ तीन हैं-
(१) आदिनाथ जी (२) पुष्पदंत जी (३) महावीर जी
प्रश्न ३४-आदिनाथजी और पुष्पदंतजी के कितने एवं कौन-
कौन से नाम हैं ?
उत्तर- आदिनाथ जी के २ नाम हैं-
(१) आदिनाथ जी (२) ऋषभनाथ जी
पुष्पदंत जी के २ नाम हैं-
(१) पुष्पदंत जी (२) सुविधिनाथ जी
प्रश्न ३५-महावीर भगवान के कितने और कौन-कौन से नाम
हैं ?
उत्तर- महावीर भगवान के ५ नाम हैं-
(१) वीर (२) वर्धमान (३) अतिवीर (४) सन्मति
(५) महावीर
प्रश्न ३६-२४भगवान के शरीर के रंग कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- चंद्रप्रभ, पुष्पदंत जी का शुक्ल (सफेद) वर्ण है।
मुनिसुव्रतनाथ, नेमिनाथ का श्याम (कृष्णा) वर्ण है।
पद्मप्रभुजी, वासुपूज्यजी का लाल वर्ण है।
सुपार्श्वनाथजी, पार्श्वनाथ का हरित (हरा) वर्ण है।
शेष १६ तीर्थंकरों के शरीर का वर्ण तपाये हुए सोने के
समान पीत (पीला) है।
प्रश्न ३७-अभी कौन से तीर्थंकर का तीर्थ चल रहा है ?
उत्तर- अभी २४वें तीर्थंकर महावीर का तीर्थ चल रहा है।
प्रश्न ३८-भगवान महावीर के माता-पिता का नाम क्या था ?
उत्तर- भगवान महावीर की माता का नाम त्रिशला देवी एवं
पिता का नाम सिद्धार्थ था।
प्रश्न ३९-महावीर का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर- महावीर का जन्म चैत्र शुक्ला त्रयोदशी (तेरस) सोमवार
के दिन हुआ था।
प्रश्न ४०-महावीर भगवान का मोक्ष किस दिन हुआ था ?
उत्तर- महावीर भगवान का मोक्ष कार्तिक कृष्णा अमावस्या,
दीपावली के दिन हुआ था।
प्रश्न ४१-भगवान महावीर ने शादी की थी या नहीं ?
उत्तर- नहीं, महावीर भगवान बाल ब्रह्मचारी थे।
प्रश्न ४२-बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर कितने हैं कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर ५ हैं-
(१) वासुपूज्य जी (२) मल्लिनाथ जी (३) नेमिनाथ जी
(४) पार्श्वनाथ जी (५) वर्धमान स्वामी।
प्रश्न ४३-तीन पद के धारी तीर्थंकर कितने एवं कौन-कौन से
हैं ?
उत्तर- तीन पद के धारी तीर्थंकर ३ (तीन) हैं।
शांतिनाथजी, कुंथुनाथजी, अरहनाथजी ये तीन तीर्थंकर,
चक्रवर्ती, कामदेव ऐसे तीन पद के धारी थे।
प्रश्न ४४- भूतकाल के २४ तीर्थंकरों के नाम क्या थे ?
उत्तर- भूतकाल के २४ तीर्थंकरों के नाम-
१. श्री निषंगी जी २. श्री सागर जी ३. श्री महासाधु जी
४. श्री विमलप्रभ जी ५. श्रीधर जी ६. श्री सुदत्त जी
७. श्री अनागम जी ८. श्री उदग्र जी ९. श्री इंद्रदत्त जी
१०. श्री संगति जी ११. श्री रिपुंज जी १२. श्री कुसुमांजलि जी
१३. श्री शिवगण जी १४. श्री उत्सर्ग जी १५. श्री श्रीनंदक जी
१६. श्री परंदेश्वर जी १७. श्री प्रियंकरदत्त जी १८. श्री यशोधर जी
१९. श्री कृष्णमति जी २०. श्री ज्ञानमतिजी २१. श्री शुद्धमति जी
२२. श्री भद्र जी २३. श्री अजितनाथ जी २४. श्री शांतना जी
प्रश्न ४५- भविष्यकाल के २४ तीर्थंकरों के नाम बताइये ?
उत्तर- भविष्यत काल के २४ तीर्थंकरों के नाम-
१. श्री महापद्म जी २. श्री सुरदेव जी ३. श्री सुपार्श्व जी
४. श्री स्वयंप्रभु जी ५. श्री सर्वांभूति जी ६. श्री देवश्रुत जी
७. श्री कुलपुत्र जी ८. श्री उदंक जी ९. श्री पौष्ठिल जी
१०. श्री जयकीर्ति जी ११. श्री मुनिसुव्रत जी १२. श्री अरकी (अमन)
१३. श्री निष्कष जी १४. श्री निष्काय जी १५. श्री विपुत्र जी
१६. श्री निर्मल जी १७. श्री चित्रगुप्त जी १८. श्री समाधिगुप्त जी
१९. श्री स्वयंभू जी २०. श्री अनिवृत्ति जी २१. श्री जय जी
२२. श्री विशाल जी २३. श्री देवपाल जी २४. श्री अनंतवीर्य जी
प्रश्न ४६-(अ) - विद्यमान विंशति तीर्थंकरों के नाम बताइये ?
उत्तर- विद्यमान विंशति तीर्थंकरों के नाम-
१. श्री सीमंधर २. श्री युगमंधर ३. श्री बाहु
४. श्री सुबाहु ५. श्री सुजात (संजातंक) ६. श्री स्वयंप्रभ
७. श्री ऋषभानन ८. श्री अनंतवीर्य ९. श्री सुरप्रभ (सूर्यप्रभ)
१०. श्री विशालकीर्ति ११. श्री वज्रभ १२. श्री चंद्रानन
१३. श्री भद्रबाहु (वज्रबाहु) १४. श्री भुजंगम १५. श्री ईश्वर
१६. श्री नेमिप्रभ (नेमि) १७. श्री वीरसेन १८. श्री महाभद्र
१९. श्री देवयश (यशकीर्ति) २०. श्री अजितवीर्य
प्रश्न ४६-तीर्थंकर कौन बनते हैं ? क्या हम भी तीर्थंकर बन सकते हैं ?
उत्तर- जो सब जीवों का हित चाहते हैं वे तीर्थंकर बनते हैं। हाँ, हम
भी तीर्थंकर बन सकते हैं।
६-जीव
प्रश्न ४०-द्रव्य किसे कहते हैं ? कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-द्रव्य २ हैं-(१) जीव द्रव्य (२) अजीव द्रव्य
प्रश्न ४१-जीव द्रव्य किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो जानता-देखता है उसे जीव द्रव्य कहते हैं ।
प्रश्न ४२-तुम कौन हो ?
उत्तर-हम जीव द्रव्य हैं ।
प्रश्न ४३-क्यों ?
उत्तर-हम भी जानते-देखते हैं इसलिये हम भी जीव हैं ।
प्रश्न ४४-जीव के कितने भेद हैं ?
उत्तर-जीव के दो भेद हैं ।
प्रश्न ४५-कौन-कौन से ?
उत्तर-(१) संसारी (२) मुक्त
प्रश्न ४६-संसारी जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो संसार में जन्म-मरण के दुख उठाते हैं उन्हें संसारी जीव कहते हैं ।
प्रश्न ४७-मुक्त जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो जन्म-मरण के दुख से सदा के लिये छूट गये हैं फिर लौटकर संसार में नहीं आते हैं, उन्हें मुक्त जीव कहते हैं ।
प्रश्न ४८-संसारी जीव के कितने भेद हैं ?
उत्तर-संसारी जीव के दो भेद हैं ।
प्रश्न ४९-कौन-कौन से ?
उत्तर-(१) स्थावर (२) त्रस
प्रश्न ५०-स्थावर जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिसको स्थावर नामकर्म का उदय होता है उसे स्थावर जीव कहते हैं । जैसे एकेन्द्रिय वृक्षादि ।
प्रश्न ५१-स्थावर जीव के कितने भेद हैं ? कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-स्थावर जीव के ५ भेद हैं ।
(१) पृथ्वीकायिक (२) जलकायिक (३) अग्निकायिक
(४) वायुकायिक (५) वनस्पतिकायिक ।
प्रश्न ५२-पृथ्वीकायिक किसे कहते हैं ?
उत्तर-पृथ्वी ही जिनका शरीर है वह पृथ्वीकायिक है । जैसे-
सोना, चाँदी, हीरा, पन्ना, पत्थर, मिट्टी आदि ।
प्रश्न ५३-जलकायिक जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जल ही जिनका शरीर हो वह जलकायिक जीव है ।
जैसे-ओस, ओला, वर्षादि ।
प्रश्न ५४-अग्निकायिक जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-अग्नि ही जिनका शरीर हो वह अग्निकायिक जीव है ।
जैसे-कोयले की अग्नि, कंडा की अग्नि, गैस की
अग्नि आदि ।
प्रश्न ५५-वायुकायिक जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-वायु ही जिनका शरीर है उसे वायुकायिक जीव कहते
हैं । जैसे-पंखे की हवा, चलती हुई हवा ।
प्रश्न ५६-वनस्पतिकायिक किसे कहते हैं ?
उत्तर-वनस्पति ही जिनका शरीर हो उन्हें वनस्पतिकायिक जीव
कहते हैं । जैसे-आम, केला, वृक्षादि ।
प्रश्न ५७-त्रसजीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिन जीवों का त्रस नाम कर्म उदय से २ इन्द्रिय,
३, इन्द्रिय, ४, इन्द्रिय, ५, इन्द्रिय में जन्म हो उन जीवों
को त्रस कहते हैं ।
प्रश्न ५८-पंचेन्द्रिय जीव के कितने भेद हैं ? कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-पंचेन्द्रिय जीव के दो भेद हैं-(१) सैनी (२) असैनी
प्रश्न ५९-सैनी जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-मन सहित जीव को सैनी कहते हैं ।
प्रश्न ६०-असैनी जीव किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिनके मन नहीं होता उसे असैनी जीव कहते हैं ।
७-इन्द्रियाँ
प्रश्न ६१-इन्द्रियाँ किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिससे जीव की पहचान होती है उसे इन्द्रियाँ कहते हैं ।
प्रश्न ६२-इन्द्रियाँ कितनी एवं कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-इन्द्रियाँ ५ हैं-
(१) स्पर्शन (२) रसना (३) घ्राण (४) चक्षु (५) कर्ण ।
प्रश्न ६३-स्पर्शन इन्द्रिय किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिससे छूकर पदार्थ का ज्ञान हो, उसे स्पर्शन इन्द्रिय
कहते हैं । जैसे हल्का-भारी, रूखा-चिकना, कठोर-नरम,
शीत-उष्ण ।
प्रश्न ६४-रसना इन्द्रिय किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिससे चखकर पदार्थ का ज्ञान हो उसे रसना इन्द्रिय
कहते हैं । खट्टा, मीठा, कड़वा, कषायला, चरपरा ।
प्रश्न ६५-घ्राण इन्द्रिय किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिससे द्वारा सूंघकर पदार्थ का ज्ञान हो उसे घ्राण इन्द्रिय
कहते हैं । जैसे-सुगंधि, दुर्गंधि ।
प्रश्न ६६-चक्षु इन्द्रिय किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिससे द्वारा देखकर पदार्थ का ज्ञान हो उसे चक्षु इन्द्रिय
कहते हैं । जैसे-सफेद, लाल, नीला, पीला, काला ।
प्रश्न ६७-कर्ण इन्द्रिय किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिसके द्वारा सुनकर पदार्थ का ज्ञान हो उसे कर्ण इन्द्रिय
कहते हैं । जैसे-सा, रे, ग, म, प, ध, नि, रेडियो की
आवाज आदि सुनना ।
प्रश्न ६८-किन जीवों के कितनी इन्द्रियाँ हैं ?
उत्तर-वृक्ष, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के एक स्पर्शन इन्द्रिय
है । लाट, केचुआ के दो स्पर्शन, रसना इन्द्रिय हैं ।
चींटी, खटमल, जूँ के स्पर्शन, रसना, घ्राण तीन इन्द्रियाँ
हैं । मक्खी, मच्छर आदि के स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु
चार इन्द्रियाँ हैं ।
हाथी, घोड़ा आदि तथा मनुष्य, देव, नारकी पाँच इन्द्रिय
जीव हैं । इनके स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु व कर्ण
इन्द्रियाँ हैं ।
प्रश्न ६९-मन कौनसी इन्द्रिय है ?
उत्तर-मन अनइन्द्रिय है । इसका स्थान निश्चित नहीं है इसलिए
इसकी कोई इन्द्रियाँ नहीं हैं ।
प्रश्न ७०-पाँचों इन्द्रिय विषयों में आसक्त जीव कौन-कौन हैं ?
उत्तर-स्पर्शन इन्द्रिय में हाथी ।
रसना इन्द्रिय में मछली ।
घ्राण इन्द्रिय में भ्रमर ।
चक्षु इन्द्रिय में पतंगा ।
कर्णेन्द्रिय में हिरण ।
ये जीव एक-एक इन्द्रिय के विषय में आसक्त होकर
अपने प्राणों को खोते हैं ।
प्रश्न ७१-मनुष्य तो पाँचों इन्द्रिय के विषयों में आसक्त है उनका
क्या होगा ?
उत्तर-जो मनुष्य पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हैं उन्हें
छोटी नरकगति और तिर्यंचगति में जाना पड़ता है ।
प्रश्न ७२-हमारी कितनी इन्द्रियाँ हैं ?
उत्तर-हमारी पाँचों इन्द्रियाँ हैं ।
८-गति
प्रश्न ७३-गति किसे कहते हैं ?
उत्तर-गति नामकर्म के उदय से तिर्यंच, देव, मनुष्य, नरकगति
में उत्पन्न होने को गति कहते हैं ।
प्रश्न ७४-गति कितनी होती हैं ? वे कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-गति चार होती हैं-
(१) नरक गति (२) तिर्यंच गति (३) मनुष्य गति
(४) देवगति ।
प्रश्न ७५-हमारी कौन सी गति है ?
उत्तर-हमारी मनुष्य गति है ।
प्रश्न ७६-इनमें कौन सी गति अच्छी है ?
उत्तर-मनुष्य गति और देवगति अच्छी है ।
प्रश्न ७७-मोक्ष किस गति से होता है ?
उत्तर-मोक्ष मनुष्य गति से होता है ।
९-पाप
प्रश्न ७८-पाप किसे कहते हैं ?
उत्तर-बुरे कार्य के करने को पाप कहते हैं ।
प्रश्न ७९-पाप कितने एवं कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-पाप ५ हैं-
(१) हिंसा (२) झूठ (३) चोरी (४) कुशील
(५) परिग्रह ।
प्रश्न ८०-हिंसा पाप किसे कहते हैं ?
उत्तर-किसी जीव को सताना, दुख देना, मारना, पीटना, खोटे
वचन बोलना व हिंसा-पाप है । जैसे खटमल काट रहे थे
उनको मार दिया, यह हिंसा पाप है ।
प्रश्न ८१-झूठ किसे कहते हैं ?
उत्तर-सत्य बात को छिपाना झूठ है । जैसे-राजू ने पिताजी
की जेब में से पाँच रुपये का नोट निकाल लिया ।
पिताजी ने राजू से पूछा-मेरे जेब से ५ का नोट किसने
निकाला, राजू ने कहा मैंने नहीं निकाला यह झूठ नाम
का पाप है ।
प्रश्न ८२-चोरी पाप किसे कहते हैं ?
उत्तर-किसी की गिरी हुई, रखी हुई वस्तु को बिना पूछे उठा
लेना चोरी पाप है । जैसे-राजू को भूख लग रही थी ।
माँ ने अलमारी में लड्डू रखे थे । राजू ने माँ से छुपकर
लड्डू खा लिये, यह चोरी नाम का पाप है ।
प्रश्न ८३-कुशील पाप किसे कहते हैं ?
उत्तर-दूसरे की माता, बहिन को बुरी दृष्टि से देखना कुशील
पाप है ।
प्रश्न ८४-परिग्रह पाप किसे कहते हैं ?
उत्तर-कपड़े, धनादि का जरूरत से अधिक इकट्ठा करना परिग्रह
पाप है । जैसे-एक महिला या पुरुष का १० जोड़े
कपड़ों से काम चलता है । पर उनके पास २० जोड़े हैं
और आगे फिर इच्छा है । यह परिग्रह पाप है ।
प्रश्न ८५-पाप का फल क्या है ?
उत्तर-पाप के फल से नीच गति में जन्म लेना पड़ता है ।
प्रश्न ८६-पाँचों पापों में प्रसिद्ध कौन हुए ?
उत्तर-हिंसा में भस्मी ।
झूठ में सत्यघोष ।
चोरी में तापस ।
कुशील में कोतवाल ।
परिग्रह में सम्मूख ब्राह्मण प्रसिद्ध हुए ।
१०-कषाय
प्रश्न ९४-कषाय किसे कहते हैं?
उत्तर-जो आत्मा को कसे अर्थात् दुःख दे उसे कषाय कहते हैं।
प्रश्न ९५-कषाय कितनी एवं कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-कषाय ४ हैं-
(१) क्रोध (२) मान (३) माया (४) लोभ।
प्रश्न ९६-क्रोध किसे कहते हैं?
उत्तर-गुस्सा करने को क्रोध कहते हैं।
प्रश्न ९७-मान किसे कहते हैं?
उत्तर-मान, अहंकार, अभिमान को कहते हैं।
प्रश्न ९८-माया किसे कहते हैं?
उत्तर-माया छल-कपट को कहते हैं।
प्रश्न ९९-लोभ किसे कहते हैं?
उत्तर-लोभ लालच को कहते हैं। बहुत इच्छा भी लोभ है।
प्रश्न १००-इनमें कौनसी कषाय अच्छी है और आपके पास कितनी है?
उत्तर-सभी कषायें दुःख देने वाली खराब हैं। हमारे पास सब कषायें हैं।
प्रश्न १०१-अरहंत सिद्ध के पास कौनसी कषाय है?
उत्तर-अरहंत सिद्धों के पास कोई भी कषाय नहीं है।
प्रश्न १०२-जिसके पास कषाय है वे भगवान हैं या नहीं?
उत्तर-जिसके पास कषाय है वे भगवान नहीं हैं।
स्याद्वाद बाल शिक्षा २२ भाग १
११-जिनवाणी भक्ति
अकेला हो हूँ मैं करम सब आय घिरमिठके।
लिया है मैं शरण अब माता रटमिठके।
प्रमावत है मोह्रो-करम दुःख देता जनम का।
करूँ भक्ति तेरी हरो दुःख माता भ्रमन का॥१॥
दुःखो हुआ भारी, भ्रमत फिरता हूँ जगत् में।
सहा जाता नाहीं अकल भवरूपी भ्रमन में॥
करूँ क्या माँ मोरी, चलत वश नाहीं मिटन का।
करूँ भक्ति तेरी, हरो दुःख माता भ्रमन का॥२॥
सुनो माता मोरी, अरज करता हूँ दरद में।
दुःखी जानो मोको, डरप कर आयो शरन में॥
कृपा ऐसी कीजै दरद मिट जावै मन का।
करूँ भक्ति तेरी हरो दुःख माता भ्रमन का॥३॥
पिलावे जो मोको सुखधैर्य प्याला अमृत का।
मिटावे जो मेरा सकल दुःख सारा फिकर का।
परो पंखा तेरे हरो दुःख सारा फिकर का।
करूँ भक्ति तेरी हरो दुःख माता भ्रमन का॥४॥
सवैया
मिथ्या-तम नाशेवो, ज्ञान के प्रकाशवो को।
आपा-पर भासवे को भानुसी बखानी है॥
छहों द्रव्य जानवे को बनार्थविधि भानवे को।
स्वपर पिछानवे को परम प्रमानी है॥५॥
स्याद्वाद बाल शिक्षा २३ स्याद्वाद
अनुभवी बतावे को जीव के जतावे को।
काहू न सतावे को भव्य उर आनी है॥
जहाँ तहाँ तारवेको पारखे उतावे को।
सुख विस्तारेवो को ये ही जिनवाणी है॥६॥
दोहा
यह जिनवाणी श्रुति, अलख बुद्धि परमान।
पन्नालाल विनती करे, दे माता मोहि ज्ञान॥१॥
हे जिनवाणी भारती, तोहि जपो दिन रैन।
जो तेरा शरना गहे, सो पावे सुख चैन॥२॥
जा वाणी के ज्ञानतैं, सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक चढ़ो, सदा देत ही धोक॥३॥
॥ इति ॥
स्याद्वाद बाल शिक्षा २४ भाग १
माँ जिनवाणी स्तुति
माँ जिनवाणी नमस्ता प्यारी, प्यारी-प्यारी गोद है थारी।
आँचल में मुझको तू रखले, तू तीर्थंकर राजदुलारी॥ टेक॥
वीर प्रभो पर्वत निर्झरिणी, गौतम के मुख कंठ झरी हो।
अनेकान्तत्व और स्याद्वाद की, अमृतमय माता तुम ही हो॥
भव्यजनों की कर्णपिशा, तुझसे शमन दुष्ट जिनवाणी॥ १॥
माँ जिनवाणी
सप्तभंग लहरों से माँ, तू ही सत्य तत्व प्रकटावे।
द्रव्य गुणी अर्थ पर्यायों का, ज्ञान आत्मा में करवावे॥
हेय ज्ञेय अरु उपादेय का, भान हुआ तुझसे जिनवाणी॥ २॥
माँ जिनवाणी
तुझको जाबुद्धु समझूँ, तुझसे आत्म बोध को पाऊँ।
तेरे आंचल में छिप-छिपकर दुषपान अनुभव का पाऊँ।
माँ बालक की रक्षा करना, मिथ्यातम को हर जिनवाणी॥ ३॥
माँ जिनवाणी
वीर बन्नु में वीर बनूँ माँ, कर्मबली को दल-दल जाऊँ।
ध्यान करूँ स्वाध्याय करूँ बस, तेरे गुण को निशदिन गाऊँ।
अष्ट करम की हान करे यह, अष्टम सिद्धि को दे जिनवाणी॥ ४॥
माँ जिनवाणी
ऋषि मुनि यति सब ध्यान धरे माँ, शरण प्राप्त कर कर्म हरें।
सदा मात की गोद रहूँ मैं, ऐसा शिर आशीष फले।
नमन करे “स्याद्वादमती” नित, आत्म सुधारस दे जिनवाणी॥ ५॥
माँ जिनवाणी
गणिनी आर्यिका स्याद्वादमती
स्रोत: Gyata संग्रह।
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