शुद्ध जैन किसे कहते हैं?
“अनेकान्तमैत्रीपवित्रितचित्तेषु शुद्धेषु जैनेषु।”
-आचार्य अमृतचंद्र, प्रवचनसारटीका, 3/ 51
अर्थ- जिनका चित्त अनेकांत की मैत्री से सदा पवित्र रहता है उन्हें शुद्ध जैन कहते हैं।
शुद्ध जैन किसे कहते हैं?
“अनेकान्तमैत्रीपवित्रितचित्तेषु शुद्धेषु जैनेषु।”
-आचार्य अमृतचंद्र, प्रवचनसारटीका, 3/ 51
अर्थ- जिनका चित्त अनेकांत की मैत्री से सदा पवित्र रहता है उन्हें शुद्ध जैन कहते हैं।