श्रुत पंचमी - लघु नाटिका
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श्रुत पंचमी लघु नाटिका
विशुद्धि - अरे ! बहन सुबह सुबह कहाँ चली ?
प्रसिद्धि - बहन ! अभी स्कूल की छुट्टियाँ चल रही हैं, मैं तो मूवी देखने जा रही हूँ। तुम यह सजी हुई जिनवाणी लेकर कहाँ जा रही हो?
विशुद्धि - अरे ! बहन क्या तुम्हें पता नहीं आज तो श्रुत पंचमी है, मैं तो श्रुत पंचमी विधान में जा रही हूँ ।
प्रसिद्धि - ये श्रुत पंचमी क्यों मनाते हैं ?
विशुद्धि - ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन ही हमारी जिनवाणी माँ लिपिबद्ध हुई थी। इसी दिन षटखंडागम ग्रन्थ राज पूर्ण हुआ था। अनादि निधन णमोकार मन्त्र भी इस ग्रन्थ में पहली बार लिखा गया था। भगवान् महावीर के मोक्ष जाने के ४००-५०० वर्ष बाद हम लोगों की स्मृति धीरे धीरे कम होती गई, इससे चिंतित होकर आचार्य धरसेन को विकल्प आया, तब उन्होंने भारत के दक्षिण से दो योग्य मुनिराज को बुलवाकर उनकी परीक्षा लेकर उन्हें जिनवाणी के बारह अंगों का विस्तृत ज्ञान दिया। आज के दिन ही पुष्पदंत और भूतबली मुनिराजों ने षटखंडागम ग्रन्थ को पूर्ण किया था ।
प्रसिद्धि - अरे ! वाह मुझे तो पता ही नहीं था । मैं तो बहुत बड़ा पाप करने जा रही थी, तुमने तो मेरी आँखें खोल दी ।
विशुद्धि - इस पर्व को जैन साधर्मी बड़े ही उत्साह से मनाते हैं । सभी जैन मंदिरों में जिनवाणी की सार संभाल की जाती है । जिनवाणी को सजाने की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है ।
प्रसिद्धि - तब तो मैं भी तुम्हारे साथ मंदिर चलूंगी ।
विशुद्धि - तो फिर किस बात की देरी? चलो चलें श्रुत पंचमी विधान में । जय जिनेन्द्र ।
लेखक : डॉ. नितेश शाह
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 1694.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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