श्री यशोधर गाथा | Shri Yashodhar Gatha

धन्य यशोधर मुनि-सी समता, मम परिणति में प्रगटावे।
ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ बस, राग-द्वेष विनश जावे ।।टेक।।

एक दिवस जंगल में मुनिवर, आतम ध्यान लगाया है।
जैन धर्म प्रति द्वेष धरे, श्रेणिक मृगया को आया है।
किन्तु यत्न सब व्यर्थ हुये, कोई शिकार नहिं पाता है।
तभी शिला पर श्री मुनिवर का, पावन रूप दिखाता है।
जिनकी वीतरागमुद्रा लख, भव-भव के दुःख नश जावें ।। ज्ञाता…॥१॥

जान चेलना के गुरु हैं, तो बदला लेने की ठानी।
क्रूर शिकारी कुत्ते छोड़े, किंचित् दया न उर आनी।।
उन ऋषिवर का साम्यभाव लख, वे कुत्ते तो शान्त हुये।
किन्तु समझ कीलित कुत्तों को, भाव नृपति के क्रुद्ध हुये।।
जैसी होनहार हो जिसकी, वैसी परिणति हो जावे।। ज्ञाता…॥२॥

देखो सबका स्वयं परिणमन, निमित्त नहीं कुछ करता है।
नहीं प्रेरणा, मदद, प्रभावित कोई किसी को करता है।
वस्तु स्वभाव न जाने मूरख, व्यर्थ खेद अभिमान करे।
ठाने उद्यम झूठे जग में, सदाकाल आकुलित रहे ।।
छोड़ निमित्ताधीन दृष्टि निज भाव लखे सुख ही पावे।
ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ बस, राग-द्वेष विनश जावे ।।३।।

तत्क्षण सर्प भयंकर देखा, मार गले में डाल दिया।
क्रूर रौद्र परिणामों से, तब नरक सातवाँ बंध किया ।।
अट्टहास कर घर आया, पर तीन दिनों तक व्यस्त रहा।
समाचार देने चौथे दिन, सती चेलना पास गया ।।
मोही पाप बंध करके भी देखो कैसा हरषावे ।। ज्ञाता…॥४।।

सुनकर दुखद भयानक घटना, भक्ति उर में उमड़ानी।
त्याग अन्न जल उसी समय, उपसर्ग निवारण की ठानी।।
श्रेणिक बोला अरे प्रिये ! क्यों मुनि ने कष्ट सहा होगा।
मेरे आने के तत्क्षण ही, सर्प दूर फेंका होगा।
अज्ञानी क्या ज्ञानीजन का, अन्तर रूप समझ पावे।। ज्ञाता… ।।५।।

बोली तुरन्त चेलना राजन्! यदि वे सच्चे गुरु होंगे।
उसी अवस्था में अविचल, निजध्यान लीन बैठे होंगे ।।
तुमने द्वेष भाव से भूपति, घोर पाप का बंध किया।
मुनि पर कर उपसर्ग, स्वयं को स्वयं दुःख में डाल दिया।
व्यर्थ कषायें करके प्राणी, खुद ही भव-भव दुख पावे ।। ज्ञाता…॥६॥

आगे-आगे चले चेलना, उर दुख-सुख का मिश्रण था।
कौतूहलमय विस्मय पूरित, श्रेणिक का अन्तस्तल था।
परमशान्त निजध्यान लीन, मुनिवर को ज्यों ही देखा था।
किया दूर उपसर्ग शीघ्र ही, श्रद्धा से नत श्रेणिक था ।।
ज्ञानीजन तो पहले सोचे, मूरख पीछे पछतावे ।। ज्ञाता…।।७।।।

धन्य मुनीश्वर साम्यभाव धर, धर्मवृद्धि दोनों को दी।
श्रेणिक और चेलना में नहिं, इष्ट-अनिष्ट कल्पना की।
पश्चाताप नृपति को भारी, कैसे मुँह दिखलाऊँ मैं।
अश्रुपूर्ण हो गये नेत्र अरु, आत्मघात आया मन में।
निज दुष्कृत्यों पर अब नृप को, बार-बार ग्लानि आवे ।। ज्ञाता…।।८।।

मन की बात ऋषीश्वर जानी, बोले नृप क्या सोच रहे।
पाप नहीं पापों से धुलते, आत्मघात क्यों सोच रहे ।।
प्राग्भाव है भूतकाल में, ग्लानि चिंता दूर करो ।।
धर्म नहीं पहिचाना अब तक, तो अब ही पुरुषार्थ करो।।
जागो तभी सवेरा राजन् ! गया वक्त फिर नहिं आवे ।। ज्ञाता…॥९॥

पर्यायें तो प्रतिक्षण बदलें, मैं उन रूप नहीं होता।
आभूषण बहु भाँति बनें, स्वर्णत्व नहीं सोना खोता ।।
मत पर्यायों को ही देखो, ध्रुवस्वभाव पर दृष्टि धरो।
परभावों से भिन्न ज्ञानमय, ही मैं हूँ श्रद्धान करो ।।
ये ही निश्चय सम्यक् दर्शन, मुक्तिपुरी में ले जावे ।। ज्ञाता…॥१०||

सच्चे सुख का मार्ग प्रदर्शक, जिनशासन ही सुखकारी।
भावी तीर्थंकर तुम होगे, सोच तजो सब दुखकारी।
आनंदित होकर श्रेणिक तब, जैनधर्म स्वीकार किया।
अन्तर्दृष्टि धारण करके, सम्यग्दर्शन प्रगट किया।।
आयु बंध भी हीन हो गया, प्रथम नरक में ही जावे ।। ज्ञाता…।।११॥

देखो निमित्त न सुख-दुख देता, झूठी पर की आश तजो।
पर से भिन्न सहज सुख सागर में ही प्रतिक्षण केलि करो।।
दोष नहीं देना पर को, निज में सम्यक् पुरुषार्थ करो।
मोह हलाहल बहुत पिया है, साम्य सुधा अब पान करो।
साम्यभाव ही उत्तम औषधि, भ्रमण रोग जासों जावे ।। ज्ञाता…॥१२॥

Artist - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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