श्री थूतदेव रतवन — जैन स्वाध्याय सामग्री | Shri Thutdev Ratvan

श्री थूतदेव रतवन

श्रुत परम्परा का इतिहास स्मरण कराने रूप

श्री श्रुतदेव स्तवन

मैंने आचार्य इंद्रनंदी देव द्वारा रचित श्रुतावतार ग्रंथ को आधार बनाकर श्रुतदेव स्तवन काव्य की रचना आर्थिका रत्न 105 मृदुमति माताजी द्वारा रचित पुरुदेव स्तवन काव्य की धुन पर यह की है जिसमे आदिनाथ भगवान से लेकर श्रुत रचना तक किस प्रकार श्रुत ज्ञान की परंपरा चली है उसे संक्षिप्त में उन सब की समयावधि बताते हुए श्रुतदेव स्तवन काव्य लिखने का प्रयत्न किया है।

रचयिता
नायक अम्बर जैन बलेह
Mo.9329779375

{दोहा}

जिनवर श्री अरहन्त को, नमोस्तु बारंबार।
जयतु श्री श्रुतदेवता, द्वादशांग हित सार ॥
गणधर मुनि की श्रृंखला, चली सुश्रुत व्याख्यान।
श्री मुनि ने लिपिबद्ध कर, किया भव्य कल्याण ॥

है प्रमाण श्रुत देवता, जैन धर्म के मूलभूत यह प्राण।
इनकी भक्ति हो किस तरह, यदि न होवे इनका वर्णित ज्ञान ॥

भावार्थ

मैं श्री अरहन्त जिनेंद्र देव को, गणधर मुनियों की श्रुत परंपरा और आचार्यों मुनियों द्वारा लिपिबद्ध हित रूप द्वादशांगमय श्रुतदेव को नमस्कार करता हूं।
यह श्रुत अर्थात् आगम वस्तु का ज्ञान कराने हेतु प्रमाण ही है, इन श्रुत को जाने बिना हम उनकी भक्ति नहीं कर सकते, अतः इन्हें जानना आवश्यक है।

जो ये दिखते हैं सत्यधर्म सारे, कैसे जाने हम कौन हैं प्रामाणिक।
उनके शास्त्रों के अध्ययन से सत्य पंथ अवलोकन,
लेकिन पढ़ते आवश्यक, किसके द्वारा लिखे गये हैं शास्त्र ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥।

उनको ही हम मानते प्रामाणिक, जो लिपिबद्ध हो सत्य उद्घाटित।
पर सत्य वही कह पाता जो स्वयं सत्य का ज्ञाता,
ज्ञाता केवली सर्वज्ञ हैं, जिनके द्वारा कहा गया द्वादशांग।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥२॥

भावार्थ

हर किसी को अपना कुल परम्परा से चला हुआ धर्म सही लगता है, प्रत्येक धर्म में उनके आगम मान्य हैं जो कि अनंत अगल अगल व्यक्ति द्वारा कहे गए हैं जिनमें परस्पर विशेष दिखता है, उनके अध्ययन से ही हमें सत्यता की पहचान हो सकती है, हमने जिनवाणी का अध्ययन किया है, और वह श्री सर्वज्ञ के ही वचन है यह उनके इतिहास को जानने से ही हमें सिद्ध होगा। इसीलिए मैं श्री श्रुत देव का इतिहास आपको सुना रहा हूं।
प्रामाणिक वही होता है जो नित्य सत्य का उद्घाटन करता हो, सत्य उद्घाटित वही कर सकता है जो स्वयं सत्य को जानता हो और सत्य जानने वाले मात्र सर्वज्ञ ही हैं जिनके द्वारा द्वादशांग कहा गया है।
वह सर्वज्ञ अनंत हुए हैं, जिनमें से वर्तमान में चौबीस तीर्थंकरों ने इस श्रुतपरंपरा को प्रवाह रूप लिया।

युग के आदि में आय प्रवर्तक, द्वितीय श्री अजित जिनेश्वर।
संभव अभिनंदन वांचा, श्री सुमति पद जिन धास,
वही धारा श्रुतज्ञान की, अनेकांतमय वस्तु की प्रतिपाध ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥३॥

काव्य

सुपारसनाथ जी ने इसी को यथाक्रम, चंद्रप्रभ ने श्रुत परमागम।
वल्ली पुष्पदंत तक गाथा, अनवरत रूप श्रुत धारा,
कोट्योदधि गुणी वल्ली धारा, नो नो नो नो नो नो शून्य प्रमाण ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यो की गाथा करूं बखान ॥५॥

भावार्थ

इस युग (हौंडासर्पिणी काल) के आदि में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ
द्वितीय अजितनाथ फिर संभव, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और पद्मप्रभ भगवान
हुए जिन्होंने अनेकांतमय वस्तु का प्रतिपादन किया, इसी अनेकांतवस्तु को
उसी क्रम में श्री सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ और पुष्पदंत भगवान ने अनवरत रूप से
बताया।

और इन्हीं तीर्थंकरों (आदिनाथ भगवान से पुष्पदंत भगवान ) तक श्रुतपरम्परा
अनवरत रूप से ९९९९९९० करोड़ वर्ष तक वर्तती रही।

दोहा

श्रुतवारे से तुम थी, वसुधा चोबे काल।
बंजर भूमि हो गई, पुष्पदंत के बाद ॥
मुनि न कोई धर्म न, न प्रभु का सद्भाव।
दशा हुई उस काल की, व्युच्छुती के बाद ॥

है प्रमाण श्रुत देवता, जैन धर्म के मूलभूत यह प्राण।
इनकी भक्ति हो किस तरह, यदि न होवे इनका गर्भित ज्ञान ॥

भावार्थ

उस चतुर्थ काल में श्रुतरूप जल से पृथ्वी तुम थी परंतु पुष्पदंत
भगवान के बाद ( नौ करोड़ सागर प्रमाण गणना से युक्त पत्योपम के चतुर्थ
भाग शेष रहने पर ) यह पृथ्वी बंजर हो गई अर्थात् धर्म की व्युच्छुति (चतुर्विध
संग, धर्म का अभाव) हो गई।

काव्य

भल्यो हेतु श्री शीतलना स्वामी, शीतलता जग में फैलाई।
पर पुनः कड़ी यह टूटी, बस अर्ध पल्ल अवधि थी,
फिर श्री आए श्रेयांसजिन, चौवन सागर चली ये श्रुत की धार ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यो की गाथा करूं बखान ॥१॥

काव्य

वसुपूज्य सुत ने फहराई, तीस सागर बस ध्वज उड़ पाई।
फिर हुई धर्म व्युच्छुती, पर विमलनाथ उत्पत्ति,
से हुई धर्म भावना, पूर्ण अनंत की टूट गई फिर धार ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यो की गाथा करूं बखान ॥२॥

भावार्थ

इसके बाद श्री वसुपूज्य के पुत्र अर्थात् वासुपूज्य स्वामी ने धर्म तीर्थ
का प्रवर्तन तीन सागर तक किया, परंतु पल्य के अंतिम भाग तक के लिए पुनः
धर्म व्युच्छुति हो गई, इसके बाद विमलनाथ भगवान ने नौ सागर पौल्य
समय तक तत्त्व उद्घाटित किया, बाद में पल्य के चौथे तक के लिए पुनः धर्म की
व्युच्छुति हो गई।

फिर अनंतनाथ भगवान ने चार सागर के अंतिम पल्य के आधे भाग तक धर्म
स्थापित किए रखा परन्तु पुनः पल्य के आधे भाग के लिए पुनः धर्म विच्छेद हो
गया।

काव्य

चार सागर के अंतिम पल्य के, आधे भाग में धर्म से अलम हुए।
फिर आए धर्म जिनेशा, स्यात्वाद तब उपदेशा,
धर्म फिरसे विधादित हुआ, पौल्य पल्य कम तीन उदधि के बाद ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यो की गाथा करूं बखान ॥३॥

भावार्थ

पुष्पदंत भगवान के बाद पुनः धर्म ध्वजा को फहराने के लिए
शीतलनाथ स्वामी का उदय हुआ, १०० सागर ६६ लाख २६ हजार वर्ष कम

करोड़ सागर प्रमाण काल तक शीतलनाथ स्वामी द्वारा श्रुत परम्परा चली परन्तु आधे पल्य के लिए पुनः धर्म की व्युच्छुति हो गई।

उसके बाद श्रेयांसनाथ भगवान का उदय हुआ जिन्होंने 54 सागर प्रमाण काल में पल्य का 3/4 भाग शेष रहने तक श्रुत परम्परा चलाई।

ऐसे पाप के विषम समय पर, आए शांतिप्रभु वर्द्धन पद धर
अनवरत चली शांतिधारा, कुंथु अर मल्लिनाथ,
नाथा मुनिसुव्रत नाथ जी, नमि नेम पारस जिन वर्धमान ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥1॥

भावार्थ

  • इसके बाद धर्म स्थापनाार्थ सोलहवें तीर्थंकर पांचवें चक्रवर्ती श्री शांतिनाथ जिनेश्वर का उदय हुआ, और इनके बात श्री कुंथुनाथ, श्री अरनाथ, श्री मल्लिनाथ, श्री मुनिसुव्रतनाथ, श्री नमिनाथ, श्री नेमीनाथ, श्री पार्श्वनाथ एवं श्री महावीर भगवान के साथ तीन अनुबद्ध केवली (गौतमस्वामी, जंबुस्वामी, सुधर्म स्वामी) तक अनवरत रूप से धर्मचक्र चलता रहा। इन्होंने दिव्यध्वनि से भव्यों का कल्याण किया।

{दोहा}

खिरी अनवरत दिव्यध्वनि, धारा रहा अखंड।
शांतिनाथ भगवान से, वर्धमान पर्यंत ॥
अनुबद्ध त्रय केवली, इस युज पंचम काल।
जिनवाणी उपदेश से, किया भव्य कल्याण ॥

है प्रमाण श्रुत देवता, जैन धर्म के मूलभूत यह प्राण।
इनकी भक्ति हो किस तरह, यदि न होवे इनका गर्भित ज्ञान ॥

सारे केवली जब मोक्ष पधारे, कौन दिव्यध्वनि पान करावे।
श्री यतिवर्यों ने आकर, थामा फिर श्रुत का शासन,
विष्णु नंदी अपराजित, गोवर्धन अरु भद्रबाहु शुभनाम ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥1॥

ग्यारह अंग चौदह पूर्व धारी, मुनिजन थे विष्णु आदि।
सौ वर्ष सुशासन थामा, शुद्धातम को पहचान।
फिर दस पूर्व के धारी, ग्यारह यति ने किन्हा धर्म प्रचार ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥2॥

भावार्थ

  • यहां तक कि श्रुत परम्परा साक्षात् केवली भगवन्तों के द्वारा चल रही थी परन्तु अब पंचम काल का प्रारम्भ हो गया और केवलज्ञान सूर्य का अस्त हो

गया, केवलियों के बाद विष्णुकुमार, नंदी, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु इन 11 अंग और 14 पूर्व के धारी आचार्यों ने जिनवाणी का रसपान कराया।

पंताधिक एकसौ अस्सी, विशाखदत्त प्रोष्ठिल क्षत्रिय।
जय, नाग, विजयसेन नाम, सिद्धार्थ, धृति बुद्धिमान,
नंदृग, धर्म मुनिनाथ से, श्रुतवाणी को कर के रखा सम्हाल ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥3॥

भावार्थ

  • इन पांचों श्रुतज्ञानियों के 100 वर्ष व्यतीत होने के बाद 10 पूर्व एवं 11 अंग के धारी ग्यारह मुनिराजों ने तत्व प्रचार किया, जिनके नाम इस प्रकार हैं - विशाखदत्त, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयसेन, नागसेन, सिद्धार्थ, धृतिसेन, विजयसेन बुद्धिमान, गंग तथा धर्म।

द्रुमसेन पांडु कंस जयपाल, नक्षत्र ये पांच हुए महाराज।
ये ग्यारह अंग मुनि थे, बीस दोसो वर्ष रहे थे।
इनके चिंतन में आत्मा, आत्म रूप का नित्य रहे मम ध्यान ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥4॥

द्वादशांग का प्रथमा अंग अठरह वर्ष तक आवरेग।
शुभद्र, अभय, जयबाहु, लोहाचार्य महामुनि साधु,

इनका ज्ञान अगम्य था इनके पीछे क्रमशः हुआ हास ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करू बखान ॥१॥

आचाराङ्ग का एकदेश भाग, विनयधर श्रीदत्त के पास।
शिव, अर्हद्दत्त ने जाना, श्रुतवाणी को अपनाया,
इनके मध्य इक महान संत, अर्हद्दली मुनिवर का प्रादुर्भाव ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता, गुरुवर्यों की गाथा करू बखान ॥१॥

भावार्थ

इनके बाद ग्यारह अंग के धारी पाँच मुनि नक्षत्र, जयपाल, पांडु,
द्रुमसेन, और कंस यह 220 वर्ष तक इस भारत भूमि पर रहे।
इनके बाद क्रमशः चार आचार्य सुभद्र, अभयभद्र, जयबाहु और लौहार्य ये
द्वादशांग के प्रथम अंग (आचारांग) के ज्ञानी थे, इन तक ज्ञान का क्षयोपशम
बहुत था इनके बाद और अधिक पतन होने लगा।

पश्चात विनयधर, श्रीदत्त, शिवदत्त, और अर्हद्दत्त के पास एक देश अंगपूर्व का ज्ञान
शेष रहा इन्हीं ज्ञानी आचार्यों के समय में पुण्ड्रवर्धन नगर में अष्टांग के ज्ञाता
अर्हद्दली नाम के मुनि का उदय हुआ।

{दोहा}

श्रुतधारा थी अनवरत, सुनते ही बस याद।
मति की लघुता बढ़ गई, इन मुनियों के बाद ॥
अर्हद्दली समकाल में, यतिवर श्रेष्ठ महान।
जूनागढ़ के निकट में, चंद्र गुफा में वास ॥

है प्रमाण श्रुत देवता जैन धर्म के मूलभूत यह प्राण।
इनकी भक्ति हो किस तरह यदि न होवे इनका गर्भित ज्ञान ॥

भावार्थ

इन मुनिराजों तक श्रुतधारा श्रुति रूप अनवरत रूप से चल रही थी,
परंतु इनके बाद लोगों का क्षयोपशम कम होने लगा, लोग सुने हुए को याद
रखने में असमर्थ होने लगे, यही विकल्प इन्हीं मुनिराजों के समय में ही
जूनागढ़ के निकट चंद्र गुफा में ध्यानस्थ धरसेन आचार्य को हो आया।

युगप्रतिक्रम संघसम्मिलन में, अनुग्रह निग्रह दक्ष मुनिवर ने।
जब पूछा कि सब आ गए अर्हद्दत्तबली श्री मुनि नायक,
उत्तर आया हम आ गए अपने अपने संग सहित मुनिवर।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करू बखान ॥१॥

यति ने तब मन में विचारा, कैसे चले अब धर्म की धारा।
तब संघ अनेकों बन गए, मुनिजन सब संघ में बट गए,
गुणधर नंदी अपराजित चंद्र आदि तब नाम रखे मुनिवर।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करू बखान ॥२॥

भावार्थ

अर्हद्दली आचार्य ने उस समय 100 योजन तक के मुनिराजों को बुला
कर युगप्रतिक्रमण कराया, उस समय सभी मुनिराजों के आने पर आचार्यदेव ने
पूछा कि ‘क्या सभी मुनि आ गए’ तब मुनिराजों ने उत्तर में कहा कि ‘हे आचार्य
हम अपने अपने संघ सहित आ गए हैं’! इस उत्तर को सुनकर आचार्यदेव ने मन
में विचारा की अब धर्म इस प्रकार ही संघों में विभाजित होकर चलेगा। अतः
उन्होंने गुफा से आए मुनियों को नंदी व किन्हीं को वीर संज्ञा दी, जो प्रसिद्ध
अशोक उद्यान से आए थे उन्हें अपराजित किन्हीं को देव नाम से अभिहित किया,
जो गुह विरक्त साधु पंचस्तूप निवास से आए थे उनमें किन्हीं को सेन तथा
किन्हीं को भद्र नाम दिया, शाल्मलि केशर वृक्षों को छोड़ से आए भद्र तथा
सिंह, इन सबको मुख्य रूप से नंदी, देव, वीर, भद्र और सिंह इन नाम से
अभिहित किया।

यति श्री धरसेन मन में विचारे, श्रुतधारा कैसे बढ़ावें।
एक पत्र किया तब सर्जन, भेजो जो ज्ञानी मुनिजन,
अर्हद्दली ने तब भेजे, तीक्ष्ण बुद्धि के धारी मुनिराज।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करू बखान ॥३॥

धरसेन मुनि ने स्वप्न देखा आता हुआ बैल का जोड़ा।
तब नेत्र स्वतः ही खुल गए मुख वू-वचन निकल गए,
जयतु सिरी (श्री) सुद देवता अब होगा जिनवाणी का लिपि काम।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥४॥

दक्षिण से पश्चिम आना, दो मुनि का फल यह जाना।
थी अर्हद्बली की आज्ञा, दोनों मुनि रखी प्रतिज्ञा,
पहुँचे धरसेन मुनि पास में पुष्पदंत और भूतबली मुनिराज ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥५॥

भावार्थ

  • उस समय के प्रमुख आचार्यों को अब यही चिंता मन में होने लगी थी कि श्रुत परम्परा आगे कैसे बढ़े, उनमें धरसेन आचार्य ने जिनवाणी को लिपिबद्ध करने के लिए अर्हद्बली आचार्य को दो योग्य मुनिराजों को बुलवाने के लिए पत्र भेजा।

तब वहाँ से आचार्यदेव ने दो अत्यंत तीव्र बुद्धि के धारी मुनिराजों को जुलाहब भेजा, और जैसे ही वह मुनिराज धरसेन आचार्य के पास आने के लिए निकले उस रात्रि को उन्हें स्वयं में दो श्वेत बैलों का जोड़ा आता हुआ दिखा।
उस स्वप्न का फल जानकर उनके मुंह से तुरंत “जयतु श्रुत देवता” अर्थात् भी श्रुत देवता जयवंत हो यह वचन निकल गए, और यह विश्वास हो गया कि अब जिनवाणी का लिपिबद्ध कार्य प्रारंभ हो जाएगा।

{दोहा}

दोनों मुनि को साधने, दिए मंत्र मुनिराज,
यदि कर पाए सिद्ध, तो, हो जाओगे पासा
दोनों मुनि ने कर दिया, प्राप्त सूत्र का ध्यान,
सिद्ध होय पर अटपटी, देवी आएं पासा॥

है प्रमाण श्रुत देवता जैन धर्म के मूलभूत यह प्राण।
इनकी भक्ति हो किस तरह यदि न होवे इनका गर्हित ज्ञान॥

दोनों ने मन में विचारा, क्या है इन मंत्र में बाधा।
मुनियों ने मंत्र सुधारे, अब सुंदर देवी आवें,
लेकिन उनसे क्या प्रयोजन, जब हो केवल आत्मरूप का ध्यान ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥१॥

सब विधि हुई सफल परीक्षा, प्राप्त हुई गुरु की शिक्षा।
गुरु ने तब कार्य को सौंपा, आशीष वचन से बोला,
उनने तत्क्षण स्वीकारा, निकल पड़े देने श्रुति को श्रुत रूप।
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥२॥

सुदी ज्येष्ठा पंचमी आई, मुनियों ने कृतियां बनाई।
षट् नमस्कार का ढीलाढ कमी की व्याख्या किन्हा,
पहला श्रुत वह स्कंध था, षडा ग्रंथ का षट्खण्डागम शुभ नाम ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥३॥

आगे हुई रचनाएं बहुधा, सब की रही हम पर करुणा।
इस कलिकाल में आए, सबको आतम बतलाए,
वे थे कुक्कुट महान संत, चौरासी पाहुड़ का दे वरदान ॥
जयतु जिनवर श्रुतदेवता गुरुवर्यों की गाथा करूं बखान ॥

भावार्थ

  • धरसेन आचार्य के निवेदन से अर्हद्बली आचार्य की आज्ञा को पाकर दक्षिण पश्चिम आने वाले उन दोनों मुनिराजों का नाम पुष्पदंत और भूतबली था।
    जिनवाणी को लिपिबद्ध करना यह बहुत विशाल कार्य था अतः धरसेन आचार्य ने पहले दोनों मुनिराजों की योग्यता जांचने के लिए उन्हें दो मंत्र दिए जिसमें से एक में एक अक्षर कम और एक में एक अक्षर अधिक था।
    जब मुनिराजों ने इन मंत्रों को साधना प्रारंभ किया तो उनके सामने एक दांत अधिक एक एक आंख वाली देवी प्रकट हुई इस घटना को देख मुनिराजों ने तुरंत ही मंत्रों को सुधार का पुनः मंत्र सिद्ध किए जिससे उनके सामने सुंदर देवियां प्रगट होकर सेवा का आदेश मांगने लगी परंतु मुनिबंधु के प्रेमी मुनिराजों को उनसे क्या ही प्रयोजन।
    और फिर पूर्ण विश्वास के साथ आचार्य धरसेन ने दोनों मुनिराजों को संपूर्ण जिनवाणी का अध्ययन करा कर ग्रंथ रचना का कार्य सौंप दोनों को विहार करने का आदेश दे दिया।

दोनों मुनिराजों ने पूर्वाचार्यों से प्राप्त श्रुत को ज्योंल श्रुत पंचमी के दिन ग्रंथ रूप
लिया और वह प्रथम श्रुत स्कंध षटखण्डागम कहलाया, जिसमें जीव समास,
गुणस्थान, मार्गण स्थान आदि अनेक जिन सिद्धांतों का वर्णन किया।

तब से ही ग्रंथों की रचना का कार्य प्रारम्भ हो गया और आगे इसी क्रम में हमारे
महाभाग्य से कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य भगवान कुंदकुंद देव ने स्वर्ग का परिचय
कराने वाले समयसार आदि 84 ग्रंथों की रचना।

दोहा

यद्यपि अरहन्त ने, बतलाया द्वादशांग।
प्राप्त नहीं पर प्राप्त है, स्व पर भेद विज्ञान ॥
द्वादशांग का सार है, जानू आत्मराम।
अनुयोगों का प्रयोजन, शुद्धात्म का भान ॥
करूं भान शुद्धात्म का, यदि हो कोई विकल्प।
श्री जिनेंद्र पद माथ हो, शीघ्र करू भव अंत।

भावार्थ

अरहन्त भगवान की दिव्यध्वनि में अनेक बातें आई और आचार्यों ने
अनेक ग्रंथों की रचना की जो वर्तमान में हमें सम्पूर्ण प्राप्त नहीं है, हां लेकिन हमें
प्रयोजनभूत स्व-पर भेद विज्ञान प्राप्त है और सम्पूर्ण द्वादशांग, अनुयोगों का
प्रयोजन ही आत्मा को जानना है, अतः हम शुद्धात्म को जाने उसी में लीन हो,
और यदि आत्मा से अलग कोई विकल्प हो तो वह केवल श्री जिनेंद्र का स्मरण
हो।

इस प्रकार अति संक्षेप में मैंने यह श्रुत परम्परा की कथा कही इसका विस्तार भी
श्रुतावतार ग्रंथ में है, वह भी मात्र 70 पृष्ठों का अत्यंत सरल ग्रंथ है जिसमें
आपको ग्रंथ रचना आदि का विशेष इतिहास जानने को मिलेगा इसीलिए आप
उसे अवश्य पढ़े।

स्रोत: Gyata संग्रह।

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