श्री महावीर स्वामी चरित्र
- यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -
ग्रन्थमाला—१३
एकांकी नाटक
[ हिन्दी के प्रमुख कलाकारों के एकांकी नाटकों का संग्रह ]
संपादक
प्रोफेसर अमरनाथ गुप्त एम० ए०
डूंगर कालिज, बीकानेर।
प्रकाशक
गयाप्रसाद एंड संस
शफखाना रोड, आगरा
[ मूल्य १ ]
सजिल्द २॥) : अजिल्द २)
मुद्रक
जगदीशप्रसाद अग्रवाल, बी० कॉम०,
दी एज्यूकेशनल प्रेस, आगरा ।
समर्पणा
६१४
हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत के प्रकांड पंडित
डा० सर सीताराम जी
प्रेसीडेण्ट लेजिस्लेटिव असेम्बली
के
कर कमलों में
समर्पित
अनुक्रम
मेरा विचार एकांकी नाटक पर समालोचनात्मक पुस्तक लिखने का बहुत दिनों से था। गत वर्ष इस विषय में मुझे प्रोत्साहन हिन्दी के प्रमुख कवि और समालोचक डा० रामकुमार वर्मा से भी मिला। इसी बीच में हिन्दी में एकांकी नाटक पर दो-एक संग्रह भी निकले। एक ‘हंस’ के मई और जून सन् '३८ वाले एकांकी नाटक-अंक वाले एकांकियों का पुस्तकवद्ध रूप और दूसरा श्री उदयशंकर जी द्वारा सम्पादित आधुनिक एकांकी नाटक। एकांकी नाटक की टेकनीक पर मेरी एक पुस्तक तैयार है। उसके प्रकाशन से पहले हिन्दी में एक ऐसे एकांकियों के संग्रह की आवश्यकता मैंने महसूस की जिसमें भूमिका आदि के अतिरिक्त कलाकारों के प्रमुख एकांकियों का ही संग्रह हो और जिसमें हिन्दी-साहित्य में प्रचलित एकांकियों के सभी टाइप आ जाएँ। कुछ इन्हीं बातों को ध्यान में रख मैंने इस पुस्तक का निर्माण किया है। हिन्दी-साहित्य में एकांकी नाटक की सर्व-प्रियता देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इसका भविष्य उज्ज्वल है। इसका जन्म-काल कल ही की बात है। और इतने थोड़े समय में ऐसी आश्चर्योचित उन्नति। ध्यान देने से हिन्दी में इसके कई प्रकार दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे एकांकी जिनका कथानक ऐतिहासिक है,
( २ )
और जो भारतवर्ष के भूतकाल की याद दिलाते हैं, कुछ ऐसे जिनका निर्माण अँग्रेज़ी साहित्य के सम्पर्क से हुआ है, विशेषकर “शा” और “इब्सन” के प्रभाव से जिनमें विद्रोह की आगि जल रही है और जिन्हें हम समस्या-मूलक एकांकियों के नाम से पुकारते हैं। अनुवाद भी हिन्दी में धड़ाधड़ निकल रहे हैं। अभी अनुवादों का युग समाप्त नहीं हुआ है। अच्छे अनुवादों की आवश्यकता है। इस साहित्य-निर्माण-काल में। मैंने संग्रह में दो अनुवाद भी दिये हैं। इसलिए कि सुन्दर अनुवाद हिन्दी की उन्नति में बाधक नहीं वरन् वर्द्धक हैं। अनुवाद भी हिन्दी में दो प्रकार के देखने में आते हैं। एक तो रचना का कायापलट कर दी जाती है, और दूसरे वह जो बिना किसी बदले के सीधे-सादे अनुवाद हैं, “कलिंग युद्ध की एक रात” और “दैठ-वाला” ऐसी ही रचनाएँ हैं। दो प्रहसन के भी उदाहरण हैं, क्योंकि हिन्दी में इसका प्रचलन काफी है। सामाजिक और प्रहसन एकांकियों के दूसरे प्रकार हैं। इन सबके उदाहरण इस संग्रह में मैंने संकलित किये हैं। इसके अतिरिक्त एकांकी का जन्म हिन्दी-साहित्य में अँग्रेज़ी साहित्य के सीधे प्रभाव से हुआ। इसलिए मैं दो-एक एकांकियों का, जिन पर अँग्रेज़ी का सीधा प्रभाव है, देना अनिवार्य समझता हूँ। ‘ऊसर’ और ‘स्पद्ध’ ऐसे ही एकांकी हैं। यह भी ध्यान रक्खा है कि हिन्दी-साहित्य में एकांकी नाटक सम्बन्धी प्रचलित टेकनीक के भी मुख्य-मुख्य प्रकार आ जायें। एक एक्ट और कई दृश्य वाले एकांकी और केवल एक एक्ट और
( ३ )
एक सीन वाले एकांकी। ‘टकराहट’ पहले और ‘ऊसर’ दूसरे के उदाहरण हैं। संग्रह को भरसक representative बनाने की मैंने चेष्टा की है। इस कार्य में कहाँ तक सफल हुआ हूँ, मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ। अपनी बुराइयाँ स्वयं नहीं मालूम पड़ा करतीं। भूमिका भी बृहद् है। पाठक इसे मेरी अप्रकाशित एकांकी नाटक पर पुस्तक का अंश ही समझें। वह कृति भी पाठकों के सम्मुख शीघ्र रख सकूँगा, मुझे पूर्ण आशा है।
अँग्रेज़ी साहित्य में एकांकियों का जन्म बहुत पहले हो चुका है। इसलिए वहाँ एकांकी नाटकों की अनेकानेक मालाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं और होती जा रही हैं। प्रति वर्ष के प्रमुख एकांकियों के संग्रह निकल आते हैं। एकांकी की टेकनीक पर भी पुस्तकें निकल चुकी हैं। हिन्दी में भी कुछ ऐसी ही मालाओं की आवश्यकता है।
मेरी इस प्रथम पुस्तक के प्रकाशन का भार आगरा के प्रमुख प्रकाशक श्रीयुत रामप्रसाद जी अग्रवाल (गयाप्रसाद एंड संस) ने लिया है। पुस्तक की सजधज और उसका इतना शीघ्र प्रकाशन सब उन्हीं के कारण है। हिन्दी से उन्हें विशेष प्रेम है और उनकी ‘साधना’ उनकी निःस्वार्थ और निःशुद्ध हिन्दी-सेवा का फल है। हिन्दी को ऐसे होनहार प्रकाशकों की विशेष आवश्यकता है।
अन्त में मैं उन कलाकारों और प्रकाशकों का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिनके नाटक इस संग्रह में संकलित किए गए हैं।
डूंगर काजिज
बीकानेर
}
अमरनाथ गुप्त
सूची
भूमिका
(१) एकांकी नाटक-विषयक कतिपय भ्रान्तियों का निवारण १
(२) एकांकी क्या है? … … ६
स्टेज डायरेक्शन और एकांकी
एकांकी नाटक
(३) अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी के एकांकी का तुलनात्मक अध्ययन २२
ऐतिहासिक
(१) श्रीरामकुमार वर्मा … … ७२-८४
पृथ्वीराज की आँखें … … ७५
सामाजिक
(१) श्रीगोविन्ददास सेठ … … ८५-११०
स्पर्धा … … ९७
(२) श्रीगणेशप्रसाद द्विवेदी … … १११-१२५
सौभाग्यविदो … … १२३
(३) श्रीउपेंद्रनाथ अश्क … … १२६-१७६
अधिकार का रक्षक … … १३५
समस्यात्मक
(१) श्रीभुवनेश्वरप्रसाद वर्मा … … १७७-१९४
ऊसर … … १८०
( २ )
(१) श्री जैनेन्द्रकुमार वर्मा
टकरहाट …
१६५-२२५
१६७
प्रहसन
(१) श्रीरामकुमार वर्मा
रेशमी टाई
(२) श्रीभगवतीचरण वर्मा
सबसे बड़ा आदमी
२२६-२४६
२२६
२४७-२६०
२४८
अनूदित
(१) श्रीअमरनाथ गुप्त
हैटवाला
(२) श्रीदुर्गादत्त भास्कर
कलिंग युद्ध की एक रात
२६१-२८४
२६१
२८५-३००
२८६
एकांकियों नाटक
एकांकी-विषयक कतिपय भ्रान्तियों का निवारण
एकांकी नाटक हिंदी में सर्वथा नवीनतम कृति है। इसका जन्म हिंदी-साहित्य में अंग्रेज़ों के प्रभाव से, कुछ ही वर्ष हुए, हुआ। यह कहना अत्युक्ति-गत न होगा कि पिछले दस वर्षों में इसने साहित्य-भंडार की पूर्ति के हेतु आश्चर्यजनक उन्नति की। अब अपने यहाँ एकांकियों की कमी नहीं है, और दिनोंदिन यह उन्नति करेगा, हमें पूर्ण आशा है। इतने थोड़े-से समय में इसका जो साहित्य दृष्टिगोचर होता है वह कम नहीं। फिर भी यह इसका शैशव काल है। इसके बचपन में बचपन के साथ-साथ कुछ भ्रान्तियों का आ जाना स्वाभाविक ही था, क्योंकि प्रत्येक के इतिहास, चाहे हमारे यहाँ के साहित्य अथवा पाश्चात्य, पर दृष्टि डालने से हमें मालूम होता है कि साहित्य में नये-नये वादों का जन्म होता है और उन पर वाद-संवाद और खंडन भी। एक समय जिस साहित्य-क्षेत्र को अपना कर मनुष्य को साहित्यिक क्षेत्र में आकर्षित किया, कल वही दूसरी ओर
( २ )
“अब रहस्यवाद के युग की समाप्ति हो रही है।”१ अभी तक कविता-क्षेत्र
में रहस्यवाद का बोलबाला था। तो साहित्य में किसी भी नई शैली की
उत्पत्ति के समय कुछ झगड़ा खड़ा होना संभव ही है, क्योंकि पुरानी लीक
के समालोचकों को उनकी ज्ञान की कमी के कारण अथवा किसी और
कारण से नई बातें शीघ्र ही स्वीकृत नहीं हो जातीं। कुछ समालोचक
हिन्दी-साहित्य में आज भी दिखाई पड़ते हैं जिनके मतानुसार रहस्यवाद के
आदि काल के समान एकांकी व्यर्थ हैं और शायद इनसे समाज या
साहित्य की हानि, लाभ की बजाय ज़्यादा संभव है। ऐसे समालोचकों का
ध्यान आते ही मुझे टामस हार्डी के कथन का तुरंत स्मरण हो आता है;
उनके अनुसार ‘समालोचक संसार के लिए हानिकारक है और क्या ही
अच्छा होता कि संसार उनसे छुटकारा पा लेता।’२
हिन्दी-साहित्य में एकांकी नाटक-विषयक भ्रांतियों का निवारण कम-
से-कम ऐसे महानुभावों के लिए आवश्यक प्रतीत
दो स्कूल होता है और इसलिए भी कि हमें आगामी अध्यायों
में एकांकी का साहित्य में क्या स्थान है, यह बताने में आसानी होगी, इन
भ्रांतियों को हम दो स्कूलों में विभाजित कर सकते हैं:—
( १ ) प्रथम वह समालोचक जो चंद्रगुप्त विद्यालंकार के समान
एकांकी को कहानी का एक छोटा संस्करण-मात्र३ कहकर ही टाल देते
हैं। उनके विचार से एकांकी का साहित्य में कोई भी स्थान नहीं है।
एकांकी उनके अनुसार ‘विज्ञापनमय वस्तु की खूबियों, प्रयोग, कीमत और
१. देखिये लक्ष्मीनारायणसिंह ‘सुधांशु’ का ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’
पृष्ठ १२८।
२. “He regarded professional critics no less
noxious than autoggaph-hunters. He wished the
world were rid of them.” Robert Graves’
“Good-Bye to all that”.
३. देखिये ‘हंस’ का ‘एकांकी नाटक-अंक’ पृष्ठ ८०१।
( ३ )
मिलने का पता आदि सभी कुछ कर्ची-गोचर कर४ देने का साधन-मात्र है।
‘एकांकी नाटक की कोई निश्चित और निजी टेकनीक न तो अभी तक बन
पाई है और न बन सकती है।’५ ‘पात्रों के व्यक्तित्व का चित्रण अथवा
विकास भी वहाँ नहीं किया जा सकता।६ एकांकी का ध्येय सिर्फ़ मनोरंजन
अथवा अर्थपूर्ण वार्तालाप है, बस इतना ही। इससे अधिक कुछ नहीं।८
एकांकी नाटक लिखना बहुत आसान है। जो व्यक्ति मनोरंजक ढंग से
थोड़ी-सी बातचीत लिख सकता है, वह एकांकी नाटक भी लिख सकता
है।९ भारतवर्ष में एकांकी नाटकों की लोकप्रियता कुछ अंश तक रेडियो
के कारण से भी बढ़ रही है। साहित्य में एकांकी का स्थान बहुत नगण्य-
सा है।’१०
( २ ) दूसरे स्कूल के अंतर्गत हम उन समालोचकों को लेते हैं जो
जैनेंद्र के समान एकांकी नाटक को साहित्य के बहुत-से रूपों में से एक
रूप मानते हैं। इसकी स्थापना परिस्थितियों के कारण संभव हुई, यह
उनका मत है। एकांकी नाटक कोई ऐसी चीज़ नहीं जिस पर विशेषार्क
निकाला जाय।११ एकांकी नाटक कृत्रिम है, क्योंकि उसकी रचना काल्पनिक
स्टेज को ध्यान में रखकर की जाती है। उनमें जो कोष्ठक लगते हैं वे
तमाशा तक बन जाते हैं।१२ विलायतों में नाटक और एकांकी नाटक भी
१. वही, पृष्ठ ८०१।
२. वही, पृष्ठ ८०२।
३. ” ” १
४. ” ” १
५. ” ” ८०३।
६. ” ” १
७. ” ” १
८. देखिये, ‘हंस’ में प्रकाशित जैनेंद्र का पत्र जो उन्होंने उपेंद्रनाथ
को लिखा था। पृष्ठ ६६३, हंस-चायुगी।
दिखाने के लिए लिखे जाते हैं । यदि ऐसा यहाँ नहीं, तो ग़लती है ।
एकांकी की नाटक, अगर वह छपता है, तो छुपाव्य होना चाहिये और चस ।
तो जैनेंद्रकुमार और इनके विचारवाले समालोचक प्रथम वर्ग के समालोचकों से भिन्न एकांकी नाटक की साहित्य में स्थिति को स्वीकार तो करते हैं, वरन् कुछ सोच-विचार के बाद । इनका भगड़ा एकांकी की टेकनीक तक ही है । यह ग्रुप एकांकी को बिलकुल निरर्थक नहीं मानता ।
भ्रांतियाँ
चतुभुर्जजी के लेख से निम्नलिखित भ्रांतियाँ साहित्य में फैली हैं :-
उपसंहार
( १ ) एकांकी की अपनी कोई टेकनीक नहीं है और इसलिए साहित्य में उसका कोई स्थान नहीं है ।
( २ ) एकांकी केवल मनोरंजन की चीज है और संभाषणा-मात्र ही है ।
( ३ ) एकांकी की लिखना बहुत आसान है ।
( ४ ) एकांकी की लोकप्रियता रेडियो के कारण ही हुई है ।
( ५ ) एकांकी नाटक में क्लाइमैक्स का होना आवश्यक नहीं ।
( ६ ) पात्रों के व्यक्तित्व का चित्रण अथवा विकास वहाँ नहीं हो सकता ।
जैनेंद्र के विचार एकांकी नाटक के विषय में इस प्रकार हैं :-
( १ ) एकांकी नाटक की व्याख्याओं और परिभाषाओं से पूरा काम नहीं होता । उससे हिंदी में लिखे जानेवाले एकांकी नाटक का परिष्कार नहीं होगा, वरन् लेखक कुछ दिक्कत में पड़ जायगा । इसलिये एकांकी नाटक-साहित्य की सरसमीलोचना अनुचित है ।
१. वही, पृष्ठ ६६५ ।
२. ,
( ५ )
( २ ) एकांकी नाटक में व्यवहृत प्रैक्टिस या कोएक्ट फ़ैशन के हैं । वे ईमानदारी के फैक्ट नहीं ।
( ३ ) एकांकी नाटक आज के लिए कृत्रिम चीज है । उसके अपनेये जाने का कारण फ़ैशन है, न कि आवश्यकता ।
( ४ ) जब हिंदी में अपना रंगमंच ही नहीं तब निर्देय की क्या आवश्यकता ?
( ५ ) एकांकी नाटक, अगर वह छपता है, छुपाव्य होना चाहिये ।
उपर्युक्त दो स्कूलों के अतिरिक्त हिंदी-साहित्य में एक ऐसे समालोचकों का भी ग्रुप है जो, भ्रांतियों को एकांकी की उत्पत्ति में बाधक व्यवधानों को दूर करने में तत्पर हैं और ऐसा करना अपना एकांकी के शुभ- परम कर्तव्य समझते हैं । इन्हें हम एकांकी के शुभचिंतकों के नाम से पुकारेंगे । उपेंद्रनाथ अश्क ही इस मत के प्रवर्तक हैं । कुछ ऐसे भी जिनमें ‘हंस’ के संपादक श्रीपतिरायजी अग्रगण्य हैं, जो एकांकी नाटक के खिलाफ़ चतुर्भुजजी की शिकायतें अंशों में ही सही मानते हैं, पर उसकी उपयोगिता और उपादेयता में संदेह करना अनुचित ही समझते हैं ।
जैसा कि ऊपर कहा गया है, चतुर्भुजजी ने अपने लेख में लिखा है—
“संसार के अनेक प्रामाणिक साहित्यिक आलोचकों के मतानुसार एकांकी नाटक कहानी का रंगमंच पर खेला जानेवाला संस्करण
एकांकी और मात्र है ।” आलोचक ने एकांकी को कहानी के साथ
कहानी रखकर जिस प्रश्न की उपज की है वह विचारणीय है ।
समझ में नहीं आता ऐसा क्यों किया गया, जब यह सर्वसम्मति से विदित है कि कहानी की अपनी ही टेकनीक है, कहानी को उपन्यास का भी छोटा संस्करण मानने को हम तैयार नहीं । उपन्यास और कहानी में अंतर तो हम स्वीकार करें और कहानी और एकांकी में नहीं, बड़े आश्चर्य की बात है ! अब यह प्रश्न कि कहानी उपन्यास का स्थान ले लेगी असंभवतः
( ६ )
और असामयिक है ।१ हाँ, उपन्यास और कहानी, उपन्यास और नाटक, निबंध और कविता, एकांकी और निबंध, एकांकी और नाटक, उपन्यास और कहानी, में साध्य अवश्य होता है वरन् हम एक को दूसरे का स्थान कभी नहीं दे सकते । यदि आलोचक एकांकी को नाटक का संक्षिप्त संस्करण कहकर संतोष कर लेते हैं तो बात और थी । यद्यपि वह भी न्यायसंगत नहीं होता, परंतु एकांकी को रंगमंच पर खेले जानेवाली कहानी मानने को हम सर्वथा तैयार नहीं । कदाचित् एकांकी के शैशव-काल में उसकी टेकनीक से अनभिज्ञ होने के कारण हम उसे किसी नाम से पुकारें । पर क्या हमारे सामने पश्चिम का दृष्टान्त नहीं है जहाँ एकांकी का स्वतंत्र स्थान है, उसकी अपनी टेकनीक है, अपना रंगमंच है और अपने ही साधन । जैसा हम आगे चलकर बतायेंगे, नाटक और एकांकी भिन्न हैं, एक का स्थान दूसरा नहीं ले सकता, तब एकांकी कहानी का स्वरूप कैसे हो सकता है ?
उनके विचार से कहानी आसानी से एकांकी के रूप में बदल दी जा सकती है । ऐसा हुआ भी है । जान गैल्सवर्दी ने अपने “The first and the last” नामक एकांकी को कहानी के रूप में और फिर उपन्यास के रूप में परिवर्तित किया है । Jacobs को कहानी ‘Monkey’s Paw’ का एकांकी नाटक भी बन चुका है । चंद्रगुप्तजी की कहानी ‘ताँगेवाला’ ‘काफिर’ के एकांकी-रूप में आ गई है । परंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि ऐसा करना आसान है और यदि यह परिवर्तन हो भी गया तो वह सफल ही होगा । ‘ताँगेवाला’ ‘काफिर’ के रूप में आकर इतनी दिलचस्प नहीं रही और न उतनी प्रभावोत्पादक । ‘Monkey’s Paw’ का एकांकी नाटकवाला संस्करण जितना लोक-प्रिय हुआ इसकी संसार जानता है ।
१. ‘Short Story will not displace the Novel’ Hudson’s Introduction to the Study of Literature chapter on “The Short Story”.
( ७ )
कहानी और एकांकी के ध्येय भिन्न हैं । कहानी का निर्माण रंगमंच के लिये नहीं होता, वह केवल पढ़ने की ही सामग्री है और गल्पकार लिखते समय केवल पढ़नेवाले का ही ध्यान रख उसको लिखता है । उसके विपरीत एकांकी ( यदि वह स्टेज के लिये लिखा गया है ) रंगमंच का विचार कर लिखा जाता है । यदि एक में लेखक का व्यक्तित्व अधिक रहता है तो दूसरे में न्यून, कभी बिल्कुल ही नहीं । एकांकी में लेखक का ध्यान केवल घटनाओं तक ही सीमित न रहकर पात्रों के चरित्र-चित्रण और वार्तालाप की ओर भी रहता है । संक्षिप्त में दोनों के उद्देश्य भिन्न हैं । इस विषय में एक समालोचक का कथन है—“उपन्यास और कहानी का एक बड़े नाटक या एकांकी में परिवर्तित करना उतना आसान नहीं, जितना वे समझते हैं और इसी तरह एक एकांकी का ( जो खेले जाने के लिए लिखा गया है ) उससे अच्छी कहानी में परिवर्तित करना सुगम नहीं । ऐसा करने-वाले के लिये स्टेज और कहानी का पूरा-पूरा ज्ञान होना अत्यावश्यक है ।”१
लंदन-युनिवर्सिटी के हिंदुस्तानी के अध्यापक T. Graham Bailey ने भी यह कहकर कि ‘हिंदी का कहानी-साहित्य संसार के किसी भी देश के कहानी-साहित्य से पीछे नहीं है यद्यपि उपन्यास-साहित्य अधिक-तर निम्न श्रेणी का है’, कहानी और उपन्यास के उद्देश्य में भिन्नता मानी है ।२ उसी प्रकार कहानी और एकांकी में भी ।
चंद्रगुप्तजी ने३ निम्नलिखित घटना लेकर यह बताने का भरसक प्रयत्न
१. देखिये उपेन्द्रनाथ अश्क का ‘क्या एकांकी का साहित्य में कोई स्थान नहीं ?’ ‘हंस’ मई सन् ३६, पृष्ठ ५८८ ।
२. देखिये T. Graham Bailey—‘Recent Literature of Hindi’.
३. देखिये ‘हंस’, मई ३८, चंद्रगुप्तजी का एक पत्र ‘एकांकी नाटक का साहित्य में कोई स्थान है ?’ पृष्ठ = ७१ ।
( ८ )
किया है कि एकांकी नाटक महज संभाषण तक ही परिमित है, वह संभाषण
ही है, बस और कुछ नहीं। उनका कथन है कि ‘लाहीरी,
एकांकी और
मैं विज्ञापनवासी का एक अनोखा ढंग मैं बहुत
संभाषण
दिनों से देख रहा हूँ। संभव है, कि वह ढंग और भी
बहुत जगह बरता जाता हो, फिर भी, मैं उसे ‘अनोखा’ इसलिये कह रहा
हूँ कि दो विशेष व्यक्तियों ने यहाँ उसे बहुत आकर्षक बना रखा है। कोई
दो व्यक्ति हैं, एक बड़ी उम्र का लंबा-चौड़ा पुरुष और दूसरा एक बालक,
संभव है, वे परस्पर सवधु सचा-भतीजा हों, क्योंकि अपना परिचय
वे इसी प्रकार देते हैं। जिस चेतकल्कूफी का व्यवहार वे एक दूसरे से
करते हैं, उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि वे पिता-पुत्र तो हो ही
नहीं सकते। और यह भी संभव है कि उनमें परस्पर केवल व्यावसायिक
संबंध ही हो। अनारकल्ली-बाजार में आप उन्हें प्रतिदिन एक दूसरे के
सामने खड़े होकर बहुत ऊँची आवाज में बातें करते हुए पाएँगे। उनकी
बातचीत का विषय भी प्रतिदिन क्या होता है ? कभी वे जूतों के बारे में
बातें कर रहे होते हैं, कभी कपड़ों के बारे में और कभी दवाइयों के बारे में
हाँ। दोनों की पोशाक भी कुछ निराली-सी होती है। अपने चाचा से पाँच-
छः कदम की दूरी पर खड़ा होकर बालक सवाल करता चला जाता है और
चचा साहब आवश्यक भावभंगी के साथ जवाब देते जाते हैं। इस बातचीत
में विज्ञापननीय वस्तु की खूबियाँ, प्रयोग, कीमत और मिलने का पता आदि
सभी कुछ श्रोताओं के कर्णगोचर कर दिया जाता है।’ चंद्रगुप्तजी के
विचार से एकांकी नाटक लगभग इसी प्रकार की चीज है।
एकांकी के बाल्यकाल में अंग्रेजी-साहित्य में भी इसी प्रकार का वाद-
विवाद चला था और कुछ समालोचकों ने एकांकी को केवल संभाषण-मात्र
ही कहकर वहाँ भी इसकी कला से पूर्ण अनभिज्ञता दिखलाई थी।
२. देंगेज में प्रकाशित चंद्रगुप्त का ‘एकांकी नाटक का साहित्य
में मोटे स्थान है ?’ पृष्ठ ७१-७२.
( ६ )
और उनके विचारों का खंडन भी खूब हुआ था। William Archer
ने अपनी ‘नाटक किस प्रकार से लिखा जाय’ ? ( Play-making )
नामक पुस्तक में एकांकी की व्याख्या केवल संभाषण का एक अंग कहकर
ही की थी।
संभाषण एकांकी नाटक के लिये आवश्यक है, इसमें संदेह नहीं,
संभाषण द्वारा ही नाटककार चरित्र का विकास और घटनाओं का घात-प्रतिघात
प्रदर्शित करता है। परंतु संभाषण ही एकांकी है यह कहना सर्वथा
अनुचित है, क्योंकि संभाषण के अतिरिक्त भी उसकी स्थिति और बातों पर
भी निर्भर है। एकांकी के लिये आवश्यक है कि वह थोड़े समय
में ही समाप्त हो सके और उसे देखकर पाठकों का मनोरंजन भी
हो जाय और वे संतुष्ट भी हो जायँ। इसके लिए निहायत जरूरी
है ऐक्य अथवा साम्य, चाहे वह उद्देश्य का हो अथवा प्रसंग का,
अभिनय का और प्रभाव का हो। इसी ऐक्य की प्राप्ति पर ही,
जितनी वह एक एकांकी में होगी एकांकी की सफलता अथवा असफलता
निर्भर है। इसके अतिरिक्त इन्हीं सब बातों के कारण तथा उसकी
संक्षिप्तता, उसके साम्य और उद्देश्य के कारण एकांकी के लक्ष्य अथवा
आधारभूत विचार तथा एकांकी में आनेवाली निम्न-से-निम्न घटना पर
भी ध्यान रखना आवश्यक है। एकांकी नाटक क्या है, उसकी क्या टेकनीक
है, यह विस्तार-पूर्वक हम आगामी अध्यायों में बताएँगे। यहाँ यह कह
देना पर्याप्त होगा कि एकांकी नाटक वार्तालाप से कहीं अधिक है, वार्ता-
लाप केवल उसका एक अंग है, जिसकी उसे समयानुसार आवश्यकता
पड़ती है। परंतु वही सब कुछ नहीं है। यहाँ हमें उपेंद्रनाथ अश्क के.
१. देखिये B. Roland Lewis का ‘The Technique of
the One-Act Play’ पृष्ठ ११। William Archer का कथन
इस प्रकार है :—“…a one-act play, a mere piece of
dialogue.”
( ६ )
किंवा है कि एकांकी नाटक महज संभाषण तक ही परिमित है, वह संभाषण
ही है, वह और कुछ नहीं। उनका कथन है कि 'लाहौरः
एकांकी और
में विज्ञापनबाजी का एक अनोखा ढंग मैं बहुत
संभाषण
दिनों से देख रहा हूँ। संभव है, कि वह ढंग और भी
बहुत जगह वरता जाता हो, फिर भी, मैं उसे ‘अनोखा’ इसलिये कह रहा
हूँ कि दो विशेष व्यक्तियों ने यहाँ उसे बहुत आकर्षक बना रखा है। कोई
दो व्यक्ति हैं, एक बड़ी उम्र का लंबा-चौड़ा पुरुष और दूसरा एक बालक,
संभव है, वे परस्पर सवधु सचा-भतीजा हों, क्योंकि अपना परिचय
वे इसी प्रकार देते हैं। जिस चेतकल्लुफी का व्यवहार वे एक दूसरे से
करते हैं, उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि वे पिता-पुत्र तो हो ही
नहीं सकते। और यह भी संभव है कि उनमें परस्पर केवल व्यावसायिक
संबंध ही हो। अनारकली-बाजार में आप उन्हें प्रतिदिन एक दूसरे के
सामने खड़े होकर बहुत ऊँची आवाज में बातें करते हुए पाएँगे। उनकी
बातचीत का विषय भी प्रतिदिन क्या होता है ? कभी वे जूतों के बारे में
बातें कर रहे होते हैं, कभी कपड़ों के बारे में और कभी दवाइयों के बारे में
ही। दोनों की पोशाक भी कुछ निराली-सी होती है। अपने चाचा से पाँच-
छह कदम की दूरी पर खड़ा होकर बालक सवाल करता चला जाता है और
चाचा सादर आवश्यक भावभंगों के साथ जवाब देते जाते हैं। इस बातचीत
में विज्ञापनवाजी की खूबियों, प्रयोग, कीमत और मिलने का पता आदि
सभी कुछ श्रोताओं के कर्णगोचर कर दिया जाता है।'१२ चंद्रगुप्तजी के
विचार से एकांकी नाटक लगभग इसी प्रकार की चीज है।
एकांकी के बाल्यकाल में अंग्रेजी-साहित्य में भी इसी प्रकार का वाद-
विवाद चला था और कुछ समालोचकों ने एकांकी को केवल संभाषण-मात्र
ही कहकर वहाँ भी इसकी कला से पूर्ण अनभिज्ञता दिखलाई थी।
१. देखिये 'हंस में प्रकाशित चंद्रगुप्त का ‘एकांकी नाटक का साहित्य
में कोई स्थान भी है ?’ पृष्ठ ८०१-८०२.
( ६ )
और उनके विचारों का खंडन भी खूब हुआ था। William Archer
ने अपनी ‘नाटक किस प्रकार से लिखा जाय’? (Play-making)
नामक पुस्तक में एकांकी की व्याख्या केवल संभाषण का एक अंग कहकर
ही की थी।१
संभाषण एकांकी नाटक के लिये आवश्यक है, इसमें संदेह नहीं,
संभाषण द्वारा ही नाटककार चरित्र का विकास और घटनाओं का घात-प्रतिघात
प्रदर्शित करता है। परंतु संभाषण ही एकांकी है यह कहना सर्वथा
अनुचित है, क्योंकि संभाषण के अतिरिक्त भी उसकी स्थिति और बातों पर
भी निर्भर है। एकांकी के लिये आवश्यक है कि वह थोड़े समय
में ही समाप्त हो सके और उसे देखकर पाठकों का मनोरंजन भी
हो जाय और वे संतुष्ट भी हो जायँ। इसके लिए निहायत जरूरी
है ऐक्य अथवा साम्य, चाहे वह उद्देश्य का हो अथवा प्रसंग का,
अभिनय का और प्रभाव का हो। इसी ऐक्य की प्राप्ति पर ही,
जितनी वह एक एकांकी में होगी एकांकी की सफलता अथवा असफलता
निर्भर है। इसके अतिरिक्त इन्हीं सब बातों के कारण तथा उसकी
संक्षिप्तता, उसके साम्य और उद्देश्य के कारण एकांकी के लक्ष्य अथवा
आधारभूत विचार तथा एकांकी में आनेवाली निम्न-से-निम्न घटना पर
भी ध्यान रखना आवश्यक है। एकांकी नाटक क्या है, उसकी क्या टेकनीक
है, यह विस्तार-पूर्वक हम आगामी अध्यायों में बताएँगे। यहाँ यह कह
देना पर्याप्त होगा कि एकांकी नाटक वार्तालाप से कहीं अधिक है, वार्ता-
लाप केवल उसका एक अंग है, जिसकी उसे समयानुसार आवश्यकता
पड़ती है। परंतु वही सब कुछ नहीं है। यहाँ हमें उपेन्द्रनाथ अश्क के,
१. देखिये B. Roland Lewis का ‘The Technique of
the One-Act Play’ पृष्ठ ११। William Archer का कथन
इस प्रकार है :—“…a one-act play, 'a mere piece of
dialogue.”
( १९ )
कथन का स्मरण हो आता है। १ उनके विचार से 'एकांकी नाटक कहानी से भी कुछ ज़्यादा है और यदि मुझे इसके लिए क्षमा किया जाय तो विनय के साथ निवेदन करूँगा कि यह आवश्यक नहीं है कि हर कहानी-लेखक अथवा नाटककार सफल और उत्तम एकांकी और विशेष रूप से अँग्रेज़ी लिख सके। Walter Prichard raton का कथन है कि 'एकांकी को जीवित रहने का अधिकार उतना ही है जितना कहानी को और उदाहरण को कमी नहीं है जिससे हम कहते हैं कि एकांकी संक्षिप्त, गूढ़ और मुख्य हो सकता है। और एकांकी ही के कारण आज हमारे देश में कल्पना और जीवन-संबंधी व्याख्याओं की आंतरिकता के चित्र दृष्टिगोचर होते हैं।'२
उदाहरण के लिये हम पाश्चात्य साहित्य और हिन्दी-साहित्य के कुछ एकांकियों का जिक्र कर सकते हैं कि वे सर्वथा वार्तालाप-मात्र नहीं हैं, उनका ध्येय केवल पाठकों का मनोरंजन ही नहीं है। पाश्चात्य से हम उद्धृत कर सकते हैं Barrie का ‘The Twelve Pound Look’, Marion Craig Wentworth का ‘War Brides’, Fenn & Price का “Op-O’Me Thumb,” William Butler
१. देखिये ‘हंस’ वैशाख सं० १६६५ में प्रकाशित ‘क्या एकांकी का साहित्य में कोई स्थान है?’
२. “But the one-act play,” says Walter Prichard raton, “has an obvious right to existence, as much as the short story, and there are plentiful proofs that it can be terse, vivid and significant…It is the One-act Play in our country to-day which will bear the most watching for signs of imagination and for flashes of insight and interpretative significance.”
( २१ )
Yeats का “The Hour Glass”, Zoa Jale का “Neighbours”, Paul Hervieu’s का “Modesty”, August Strindberg का “Facing Death”, Edward Goodman का “Eugenically Speaking”, Lord Dunsany का “The Glittering Gate”; और “The Lost Silk Hat”, George Cram Cook और Susan Flatfell का “Suppressed Desires” तथा Alice Ferstenberg का “Overtones”। हिन्दी-साहित्य से भी रामकुमार वर्मा का ‘एक्ट्रेस’ ‘रेशमी-टाई’ और ‘पृथ्वी-राज की आँखें’, भगवतीचरण वर्मा का ‘स्ट्राइक’, भुवनेश्वरप्रसाद मिश्र का ‘उसर’ और ‘श्यामा’ गणेशप्रसाद द्विवेदी का ‘सोहाग-बिंदी’ आदि मुख्य हैं। इन्हें पढ़कर कौन कहेगा कि एकांकी की चबा-चबीज वाली विज्ञापन जैसा संभोग-मात्र ही है।
कहा जाता है कि एकांकी की अपनी कोई टेकनीक नहीं है और इस- लिये साहित्य में इसका कोई स्थान नहीं है। पात्रों के व्यक्तित्व का विकास एकांकी की क्या अथवा चारित्र-चित्रण यहाँ मुमकिन नहीं। एकांकी इसी टेकनीक है? से केवल नवसिखियों के ही लिये है। साहित्य-महारथियों
से इसका कोई संबंध नहीं, इसकी रचना में पाँच अथवा चार अंकवाले नाटकों की अपेक्षा बहुत कम समय लगता है। इस प्रकार की भ्रांति के उद्भावक और पोषक, हिन्दी-साहित्य में श्रीयुत चंद्रगुप्तजी हैं जिन्होंने स्वयं तीन या चार एकांकी नाटक लिखे हैं। उनका ‘अशोक’ प्रकाशित हो चुका है, दूसरा नाटक वह लिख रहे हैं और तीसरे की कल्पना उनके मस्तिष्क में है। यह सब जानते हैं कि कुछ कहानियाँ लिखने, उपन्यास लिखना आसान होता है दूसरों की अपेक्षा, कुछ नाटकों के निर्माण में थोड़ा समय लगता है, कुछ एक महीने में, कुछ दिनों में ही तैयार हो जाते हैं। परंतु यह कहना कि सभी नाटकों अथवा सभी उप-न्यासों का रचना-काल एक ही समय लेगा, यह गलत है। कोई एकांकी भी इतना समय लेंगे जितना एक पूर्ण नाटक। एकांकी नाटककारों के कथनानुसार एकांकी की रचना गौण विषय नहीं है, इसकी रचना में उनका उतना ही
( १२ )
समय लगता है, उतना ही ध्यान उधर दे देते हैं जितना किसी और रचना के निर्माण में। किसी प्रकार का भी तुलना इस विषय में व्यर्थ है। यह प्रश्न कि एकांकी नाटक की रचना में जो समय लगता है वह बड़े नाटक की रचना के लिये केवल तैयारी-मात्र है सर्वथा एकांकी के साथ अन्याय करना है, क्योंकि जिस प्रकार कहानी को हम उपन्यास के लिये सीढ़ी-मात्र देखते हैं ठीक उसी प्रकार एकांकी को बड़े नाटक के संबंध में समझना चाहिये। यहाँ पर एक पाश्चात्य आलोचक का कथन सारगर्भित है—“एकांकी कहानियों के समान स्वतन्त्र रचना है। यह कहना कि एकांकी का बड़े नाटक लिखने से पहले अभ्यास के रूप में प्रयोग हो सकता है, भूल को छोड़कर, उसके साथ अन्याय करना है।”
यही एकांकी की अपनी टेकनीक की बात और उसमें चरित्र-चित्रण के विषय में। इस विषय में यह कह देना समुचित है कि एकांकी की अपनी टेकनीक है और उसमें चरित्र-चित्रण के लिए भी जीवन की झाँकी के अतिरिक्त संपूर्ण को पर्याप्त स्थान मिल जाता है। सफल एकांकी में दोनों का होना अनिवार्य है। एक समालोचक का कथन है कि एकांकी नाटक का एक संक्षिप्त क्षेत्र है, वह जीवन की झाँकी ही हमारे सम्मुख रखता है। इसका आकार सुदृढ़ होने की अपेक्षा परिमित, पूर्ण के स्थान में इसमें अपूर्णता का भाव होता है।"
- “The One-act play, like the short-story is a type unto itself; and to suggest that the prospec- tive playwright uses the one-act play only as a means on which to practise before attempting the larger form, is, in but exceptional individual cases, almost an insult to the type.” Vide Roland Lewis "The Technique of the One-act Play.
- डेंपसे मैनन का Twentieth Century में प्रकाशित
( १३ )
हिंदी-साहित्य में, नहीं संपूर्ण भारतवर्ष में, एकांकी नाटक की लोक-प्रियता का कारण चंद्रगुप्तजी ने रेडियो को ही माना है। साहित्य के नाम पर हमारे यहाँ के ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन जो प्रोग्राम देते हैं, उनमें एकांकी नाटकों को विशेष महत्ता दी जा रही है। चंद्रगुप्तजी की इस चालतर्फहमी का कारण एकांकी जो पढ़े अथवा रंगमंच पर खेले जाने के लिए लिखे जाते हैं और एकांकी जो ब्रॉडकास्टिंग स्टेशनों से ब्रॉडकास्ट होते हैं, उन दोनों में फ़र्क़ न मानने से ही है। उनके अनुसार ये दोनों एक प्रकार की रचना हैं। एकांकी जो केवल बीस या पचीस मिनट, कभी-कभी इससे भी कम समय, का ध्यान रख ब्रॉडकास्टिंग के लिए लिखे जायेंगे, भिन्न होंगे पढ़े जानेवाले एकांकियों से। एक में वार्तालाप का आधिक्य, जनता की अभिरुचि का पूरा ध्यान, ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन की माँग का, अथवा जनता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए गानों को, स्थान आदि सभी बातों का ध्यान रखा जायगा। चाहे उनमें चरित्र-विकास की ओर ध्यान रखा जाय या नहीं
One-act play in Hindi Literature नामक लेख।
“The one-act play is a detached picture, a part, it merely gives us a peep into life, instead of variety, concentration, instead of complete- ness, incompleteness, instead of elaboration, intensification, instead of length, brevity, instead of exhaustion, suggestion, compression.”
१, ‘हंस’ के मई अंक में प्रकाशित चंद्रगुप्तजी का ‘एकांकी नाटक का साहित्य में भी कोई स्थान है ?’ लेख पृष्ठ ८०३।
( १४ )
दूसरी कुछ क्षमता-विमूढ़ता नहीं। वे तो केवल जनता के मनोरंजन के लिए ही लिखे जाते हैं। उनमें नाटकीय संकेतों की भी कोई आवश्यकता नहीं। अथवा उनकी उपस्थिति अस्वीकृत होती। इसका भेद हमें तब अच्छी तरह मालूम होगा जब हम भुवनेश्वरप्रसाद के रंगमंच पर लिखे गये वे, हेतु लिखे गये ‘इनामा’ का स्वीकार करें। उपेन्द्रनाथ अश्क का ‘पापी’, जो ‘विशाल-भारत’ में प्रकाशित हुआ था। ५, फरवरी सन् ३८ को लाहौर स्टेशन से ब्रॉडकास्ट हुआ और संभवतः प्रथम है कि उसे रेडियो के लिये Adopt करने में जितने परिवर्तन मुझे करने पड़े मैं ही जानता हूँ।" ब्राडकास्टिंग स्टेशन से ब्राडकास्ट हुए एक साहित्यिक लेख और मासिक या त्रैमासिक पत्रिका के लिये लिखे गये लेख में जो विभिन्नता है करीब-करीब वही एकांकी में जो ब्राडकास्टिंग के लिये हैं और जो पढ़े जाने के लिये लिखा गया है। दोनों में ही काफी तरमीम की आवश्यकता पड़ती है। अच्छा हो, संभावना हो हम Dialogue के नाम से लिखें और पुकारें, एकांकी जो रंगमंच के लिये है एकांकी के नाम से और एकांकी जो रेडियो के लिये है उसे Radio Play के नाम से। ऐसा करने से बहुत कुछ झगड़ा मिट जाने की संभावना है। रेडियो के एकांकी की और रंगमंच के एकांकी की टेकनीक भिन्न है। एक रंगमंच की आवश्यकताओं और पाठक की अभिरुचि को ध्यान में रखकर लिखा जाता है और दूसरा ब्राडकास्टिंग के सुननेवालों की प्रतिच्छया मात्र है। एक साहित्यिक है, दूसरा वाचिक।
“और तो और, एकांकी नाटक में क्लाइमैक्स (Climax) का भी होना आवश्यक नहीं।” क्या यह कहना कि कहानियों और एकांकियों में क्लाइमैक्स का होना आवश्यक है, ठीक है। देखने में आता है कि बहुत-सी कहानियाँ लिखी जाती हैं जिनमें क्लाइमैक्स होता ही नहीं, ऐसे एकांकी भी मिल
एकांकी और क्लाइमैक्स
१. वही।
( १५ )
जायेंगे। किसी रचना में क्लाइमैक्स का होना-न-होना उसके घटना-प्रवाह पर निर्भर है। यह सोचना कि उसकी उपस्थिति से उसका मूल्य बढ़ जाता है, वह सर्वोत्तम हो जाती है और उसकी अनुपस्थिति में हीन, सर्वथा गलत है। साहित्य में अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ क्लाइमैक्स न होते हुए भी रचना भली बन पड़ी है और उसका मूल्य आंकने में आलोचकों को कुछ भी कठिनाई नहीं होती। अंग्रेजी-साहित्य में ‘Mimi’ ऐसा ही एकांकी है। नाटककार का ध्येय घटनाओं का विकास न दिखलाकर बिंदु तक केवल कुछ कलाकारों के जीवन की परिचर्या करना है, जिसमें उसे पूर्ण सफलता मिली है। उसके विपरीत Harold Brig house का ‘The Dumb and the Blind’ क्लाइमैक्स को लेकर और उसके कारण ही लेखक की प्रतिभा का द्योतक है। लेखक का ध्येय शरीर मजदूरों के जीवन का दिग्दर्शन कराने के अतिरिक्त घटना की गुत्थियों को सुलझाना भी है और इसी में उसकी सफलता है। यह घटना-प्रधान रचना है। किस प्रकार एक दुष्ट-प्रकृति मनुष्य अपनी स्त्री द्वारा, उसको परमात्मा से प्रार्थना करते हुए देखकर, एक सज्जन-प्रकृति मनुष्य में परिणत हो जाता है, इसका कथानक है। स्त्री को प्रार्थना करते हुए देखना ही उसके जीवन की महत्तू-पूर्ण घटना है और यहाँ से उसकी अमानुषिकता का अंत और उसकी मनुष्यता का सूत्रपात समझिये। यही एकांकी का क्लाइमैक्स है। हिंदी-साहित्य में भी रामकुमार वर्मा का ‘ऐक्ट्रेस’ घटना-प्रधान है। लेखक ने घटना का विकास अधिकतर कथोपकथन द्वारा ही कराने की चेष्टा की है। सिनेमा-स्टूडियो में ऐक्ट्रेस के जीवन का अवलोकन करना तो लेखक का ध्येय ही है, परंतु उसके अतिरिक्त कथानक के सुचारु संकलन का भी यह सुंदर उदाहरण है। हिंदी-साहित्य में ऐसे नाटकों का उद्भव उसके शैशव-काल में है जो, उसकी प्रतिभा का द्योतक है। ऐसे नाटक पाश्चात्य एकांकियों से किसी बात में भी कम नहीं। इसका क्लाइमैक्स भी सुंदर है। यह ऐक्ट्रेस कौन थी, किन कारणों से उसने यह किया,
( १६ )
उसके बाह्य आवरण और प्रकृति के भीतर कितनी अग्नि प्रज्वलित थी और अंत में उसके जीवन की भाँति-भाँति रूप में भस्मसात् का वर्णन, यह सब लेखक ने कितने गहरे समय और शब्दों में भर दिया कि हमारे पास उसकी प्रशंसा के अतिरिक्त और कोई शब्द नहीं है? मनफ में नहीं आता कि प्रकाशचंद्र गुप्त को ‘एक्ट्रेस’ में निराशा क्यों हुई।१ भुवनेश्वर-प्रसाद के ‘स्ट्राइक’ की कल्पना, उसकी कथा-वस्तु वास्तव में विचारपूर्ण होते हुए भी नवीन है। इनमें आधुनिक भारतीय फैशनेबुल गोमांस का वर्णन है, और है उसके लिए अत्यन्त-पूर्ण डाँटडपट, सर्वप्रथम इसकी इस रचना में है अवश्य परंतु उसका नाटक में कितना सुंदर सम्मिश्रण है। ‘रुपयों’ में नाटकीयता न होती हुए भी नाटक को मार्मिकता अति सुंदर है।
जैनेंद्रकुमारजी ने अपने उपदेशात्मक वक्त वाले पत्र में नाटकीय संकेत की अनावश्यकता बताकर उसकी कृत्रिमता की ओर ध्यान भर जो समस्या रखी थी वह विचारणीय है। “पर्दा में एकांकी और अपना कोई रंगमंच नहीं। फिर इसकी तथा नाटकीय संकेत की आवश्यकता है। जब स्टेज-संचालकों और मंचप्रयोग का प्रभाव है, फिर उनके लिए ये निर्देश कैसे ?” प्रश्न गंभीर है। "हिंदी में इसका प्रचलन था परंतु केवल निम्नरूप में। स्टेज (Directions) इतने लंबे और व्यापक पहले कभी नहीं होते थे। यह निर्विवाद सत्य है कि इनका व्यापक रूप से उपयोग हिंदी में पाश्चात्य नाट्य-शास्त्र के ही प्रभाव से आया। अब तो गैरसरकारी आदि पाश्चात्य नाटककारों के समान हिंदी नाटकों में भी एक-एक दो-दो, कहीं इससे भी अधिक लंबे निर्देश रहते हैं। यहाँ हम इसकी टेकनीक पर दृष्टिपात न करके केवल यही बताने का प्रयत्न करेंगे कि स्टेज न होते हुए भी, पाश्चात्य परिपाटी को
१. देखिए प्रकाशचंद्र गुप्त का लेख 'गुप्तों के नाटक ‘हंस’, मई ३८, पृष्ठ १२६।
( १७ )
सफलतम होते हुए भी इनकी आवश्यकता है। हिंदी में अपना स्टेज नहीं है, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि स्टेज हिंदी में कभी भी नहीं बनेगा। हिंदी में नाटक को उन्नति न होने का एक कारण यहाँ का रूढ़ि-ग्रस्त समाज भी है। समाज की रूढ़ियों के विकारों से नाटककार की तीव्र दृष्टि के लिये पूर्ण क्षेत्र ही नहीं मिलता। इन रूढ़ियों में से पर्दा भी एक है। एकांकी की उपज के कारण हृदयों के होते हुए भी हमें उसका भविष्य उज्ज्वल प्रतीत होता है। क्योंकि उसके लिये नाटककार को बड़े क्षेत्र की तो आवश्यकता है ही नहीं जिसका मिलना भारतवर्ष में असंभव नहीं मुश्किल अवश्य है। एकांकी स्कूल और कॉलेजों में खेले भी गये हैं, उनमें सफलता हुई और पाठकों का मनोरंजन भी, और खेले जाते हैं। क्या हम नहीं जानते कि इन्हीं दुर्मुहूर्तों से प्रयासों से हिंदी के रंगमंच की उद्भावना होगी। रही इनकी कृत्रिमता की बात। किसी नवीन ढंग का अनुकरण अथवा उसका उद्-भावन सर्वथा अग्राह्य नहीं हो सकता। नवीन आरम्भ में कृत्रिम ही दिखलाई दिया करता है उन हीरक के समान जो प्रारम्भिक अवस्था में भद्दे और मैले होते हैं परन्तु जौहरी के पास से निकल जाने के बाद बिजली की रोशनी में कितने चमचमाते हैं। उनको कृत्रिम कहनेवाले मेरे विचार से हिंदी-साहित्य में हैं अवश्य परन्तु कितने थोड़े। हमारे लिये प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता और अप्रगति शक्तियों का प्रभंजन जिससे साहित्य की गति अवरुद्ध होती है आवश्यक है। इसी में हिंदी-साहित्य की सफलता और उन्नति है।
क्या एकांकी नाटक की टेकनीक पर लेख अथवा पुस्तकें उसकी उद्भूत हुई गुत्थियों को सुलझाने के अतिरिक्त उसकी और भी कठिन बनायेंगी? सरललोचना का साहित्य में सदैव स्थान रहा है और रहेगा। उसकी उद्भावना साहित्य में स्वतः हो जाया करती है जब साहित्य का निर्माण एक हद तक हो जाया करता है। एकांकी पर पाश्चात्य साहित्य में कई पुस्तकें लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। वहाँ भी एकांकी नाटक
२
( १६ )
‘चली’ आदि साहित्य की अमर कृतियाँ हैं। वर्तमान युग क्षुद्रक रचनाओं का
ही युग है, प्रबंध-रचनाओं की धूम यहाँ नहीं है। प्रबंध-रचनाओं का
निर्माण यहाँ बहुत कम हुआ है। किसी रचना का बड़ा अथवा
छोटा होना साहित्यिक कौशल की माप नहीं हो सकती। एकांकी छोटे
भले ही हों परन्तु बाज़-घात उनमें साहित्य की कृतियाँ हैं। कौन कहेगा
कि Synge का Riders to the Sea प्रभावोत्पादक नहीं है और उसकी
संक्षिप्तता, उसकी सर्वप्रियता तथा ख्याति में बाधक है। वह कला की
चरम सुन्दरता का अच्छा उदाहरण है। हिन्दी-साहित्य में यद्यपि ऐसे एकांकी
नहीं हैं, यदि हैं भी तो एक या दो। परंतु ध्यान रहे अभी तो हिन्दी एकांकी
साहित्य अपनी शैशवावस्था में ही है। भुवनेश्वरप्रसाद का ‘स्ट्राइक’ और
‘ऊसर’, रामकुमार का ‘रेशमी टाई’ और ‘जुलाई की शाम’, भगवतीचरण
वर्मा का ‘मैं और तू’ अमर रत्न हैं। साहित्यिक रचना वास्तव में कला
है, चाहे उसकी कथा-वस्तु छोटे स्केल पर हो अथवा बड़े पर। सुक्तक
काव्य कला है, उसी प्रकार जिस प्रकार महाकाव्य, कहानी और उपन्यास
भी कला के दो भिन्न-भिन्न अंग हैं। छोटा खिलौना भी कला का स्वरूप है
वही मूर्ति के समान। कभी-कभी छोटी तस्वीर बड़ी की अपेक्षा अधिक
सुंदर होती है। एकांकी को हमें कूड़े-कर्कट की वस्तु न समझ
बैठना चाहिये, उसका साहित्यिक मूल्य इसलिए कम नहीं हो जाता, क्योंकि
वह नाटक के मुकाबले में छोटा है। एक पाश्चात्य आलोचक के शब्दों में
किसी प्रकार की कला की समीक्षा का आधार उसका स्वरूप नहीं
होना चाहिये।
एकांकी की सफलता और सर्वप्रियता में बाधक सबसे अधिक बड़े
…
१ देखिये Art of any kind must not be judged
in the light of the cult of mere bigness. Roland
Lewis. The Technique of the One-act Play Page18
( २१ )
उसकी प्रतिच्छाया रूप में साहित्य में भी एक विशेष प्रकार की टेकनीक विद्यमान रहती है। आधुनिक नाटक-साहित्य एकांकी का है, यह जनता की रुचि का परिचायक है। इसकी उपस्थिति जनता की उपस्थिति है। नाटक की ओर लोगों का ध्यान अवश्य है परंतु एकांकी की ओर जनता की बढ़ती हुई अभिरुचि को देखकर भविष्यवाणी की जा सकती है कि एकांकी उन्नति करेगा, इसका भविष्य उज्जवल है।
इस कारण एकांकी को किसी ऐसे मित्र की आवश्यकता नहीं जो उसका बचाव कर सके। यदि तो अच्छा है। वह अपनी रक्षा स्वयं ही कर लेगा। उनमें जीवन के सामयिक चित्र और चरित्र-चित्रण का विकास विद्यमान रहता है। उनकी रचना जीवन के अंग-प्रत्यंगों का पूर्ण ज्ञान हुए बगैर नहीं हो सकती। उसकी सारता नाटकीय अभिव्यंजन में है जो यति गढ़ और सुदृढ़ है। कहानी भी एक समय, अभी थोड़े ही दिन हुए हैं, शैशव काल में थी, वरन् अब उसका साहित्य है। यह कहना इसके साथ-साथ असंगत होगा कि सारे एकांकी, जो लिखे जाते हैं साहित्यिक सामग्री नहीं। उनको हम छोड़ सकते हैं। हमारा विचार उन्हीं एकांकी से है जो साहित्य की चिर-सामग्री हो सकें।
एकांकी को निस्सार और व्यर्थ कहना अब असंगत है। साहित्य से उसका बहिष्कार नहीं हो सकता। उनको ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
( २० )
नाटक की परंपरागत टेकनीक और स्टेज की रूढ़ियाँ हैं। यह सुना जाता है कि स्टेज पर यदि संगीत एक ही प्रकार का न होकर एकांकी नाटक विभिन्न रूप धारण करे तो वह आकर्षक नहीं हो पाता। तथा स्टेज-रूढ़ियाँ जनता के मनोरंजन के लिये एक ही प्रकार का Concert होना चाहिये। सिनेमा में होते हुए खेल के साथ-साथ Walt Disney के एकांकी का दिखाया जाना और नाटक के साथ दूसरे एकांकियों का अभिनय, जैसा पश्चिम में अक्सर देखने में आता है, जनता की अभिरुचि के विरुद्ध है। परंतु मनोवैज्ञानिक रूप से देखने से और व्यावहारिक अनुभव से यह निर्विवाद सिद्ध है कि जनता की अभिरुचि किसी और वस्तु द्वारा भी आकर्षित की जा सकती है। कोई हानि नहीं होगी यदि बड़े नाटक के साथ एकांकी का भी अभिनय हो, वरन् इसकी आवश्यकता है। हिंदी में रंगमंच की अनुपस्थिति में यदि सिनेमा में ही एकांकी को खेल के साथ-साथ स्थान दिया जाय तो बड़ा उपकार हो। जनता का भी मनोरंजन हो और हिंदी में अथवा अन्य भाषाओं के नाटक-साहित्य में विशेष उन्नति हो। सिनेमा-डायरेक्टर्स इसको और ध्यान दें। परंतु यह तभी हो सकता है जब एकांकी टेकनीक की दृष्टि से सब दोषों से मुक्त हो। अन्यथा नहीं।
एकांकी की आधुनिक समय में सर्वप्रियता ही उसके जीवित रहने का परिचायक है। एकांकियों का अभिनय विशेष रूप से विश्वविद्यालयों और एकांकी की कॉलेजों में होता है और सफलता के साथ, विद्यार्थी इनकी बड़े चाव से पढ़ते हैं, इसकी स्थिति नाटककार, सर्वप्रियता संपादक तथा एक्टर आदि सभी मानते हैं, कदाचित् हिंदी में कोई ऐसी मासिक-पत्रिका हो जिसमें एकांकी मासिक अथवा त्रैमासिक रूप से प्रकाशित न होते हों। किसी साहित्यिक कृति का विषय और उसकी टेकनीक उस समय की सामाजिक अथवा राजनैतिक स्थिति पर निर्धारित बहुत कुछ अंश में रहती है। जिस प्रकार समाज में किसी काल-विशेष में एक सामाजिक धारा का होना अनिवार्य है, उसी प्रकार
( २१ )
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2436.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है