श्री दशलक्षण धर्म विधान
श्री दशलक्षण धर्म विधान
स्वर :
पण्डित सुनीलजी शास्त्री, राजकोट
रचयिता :
कविवर पण्डित राजमल परैया
स्वर :
सुश्री शीतल जैन, राजकोट
श्री दशलक्षण धर्म विधान
मंगलाचरण
(अनुष्टुप)
मंगलं सिद्ध परमेष्ठी मंगलं तीर्थकरम्।
मंगलं शुद्धचैतन्यं आत्मधर्मोऽस्तु मंगलम्।।
(दोहा)
जयति पंच परमेष्ठी जिनप्रतिमा जिनधाम।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि श्री जिनधर्म प्रणाम।।
श्री दशलक्षण धर्म विधान
मंगलाचरण
(चामर)
वीतराग श्री जिनेंद्र ज्ञान रूप मंगलम्।
गणधरादि सर्व साधु ध्यान रूप मंगलम्।।
वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम्।
जैन धर्म विश्व धर्म सर्व धर्म मंगलम्।।
श्री दशलक्षण धर्म विधान
मंगलाचरण
(चामर)
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव मंगलम्।
शौच सत्य संयम तप त्याग श्रेष्ठ मंगलम्।।
धर्म आकिंचन्य ब्रह्मचर्य मंगलम्।
धर्म दश धारणीय सर्वश्रेष्ठ मंगलम्।।
मुक्ति सोपान दश यही भव्य मंगलम्।
भावमयी नवविधान परम दिव्य मंगलम्।।
(दोहा)
दशलक्षण ध्रुव धर्म की, पूजन करूँ महान।
पार करूँ सोपान दश, पाऊँ पद निर्वाण।।
इति पुष्पांजलि क्षिपेत्
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है