श्री दशलक्षण धर्म शिक्षा
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मैं ज्ञानानन्दस्वभावी हूँ
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
मैं हूँ अपने में स्वयं पूर्ण
पर की मुद्रा में कुछ अल्प नहीं।
मैं अरस अरूपी अस्पर्शी
पर से कुछ भी सम्बन्धी नहीं॥
मैं रंग-राग से भिन्न भेद से
भी मैं भिन्न निराला हूँ।
मैं हूँ अखण्ड चैतन्यपिण्ड
निज रस में रमने वाला हूँ॥
मैं ही मेरा कर्ता-धर्ता,
मुझ में पर का कुछ काम नहीं।
मैं मुझ में रहने वाला हूँ,
पर में मेरा विश्राम नहीं॥
मैं शुद्ध, बुद्ध, अविरुद्ध, एक,
पर-परिणति से अप्रभावी हूँ।
आत्मानुभूति से प्राप्त तत्त्व,
मैं ज्ञानानन्दस्वभावी हूँ॥
श्री समभावनी पूजन/५६
जयमाला
(दोहा)
उत्तम क्षमा स्वधर्म को, वन्दन करूँ त्रिकाल।
नाश दोष पच्चीस का, काटू भव जंजाल॥
(तार्किक)
सोलहकारण पुण्यांजलि दशालक्षण रत्नत्रय व्रत पूर्ण।
इनके सम्यक् पालन से हो जाते हैं वसुकर्मा विपूर्ण॥
भाद्र मास में सोलहकारण तीर्थ दिवस तक होते हैं।
शुक्ल पक्ष में दशालक्षण पंचम से दश दिन होते हैं॥
पुण्यांजलि दिन पाँच पंचमी से नवमी तक होते हैं।
पावन रत्नत्रयत् अंतिम तीन दिवस के होते हैं॥
अंतिम कृष्णा एकम् उत्तम क्षमावाणि का होता है।
उत्तमक्षमा धार उर श्रावक मोक्षमार्ग को जोता है॥
भाद्र मास अश्व माघ मास अरु चैत्र मास में आते हैं।
तीन बार आ परवेराज जिनवर संदेश सुनाते हैं॥
‘जीवे कम्मं बद्धं पुट्ठं’ वह तो है व्यवहार कथन।
है अबद्ध अमूर्त कर्म से निश्चय नय का नहीं कथन॥
जीव-देव को एक बताना यह है नय व्यवहार अरे।
जीव देव तो पृथक्-पृथक् है निश्चय नय कह रहा अरे॥
निश्चय नय का नित्य छोड़ व्यवहार माहिं करते गर्तन।
उनको मोक्ष नहीं हो सकता और न ही सम्यग्दर्शन॥
‘दोहविहाणेण भणियं जाणे’ जो पक्षाश्रित होता।
चित्तस्वरूप का अनुभव करता सकलकर्म मल को खोता॥
ज्ञानी ज्ञानस्वरूप छोड़कर जब अज्ञान रूप होता।
तब अज्ञानी कहलाता है पुद्गल बन्ध रूप होता॥
१. जीव कर्मों को बाँधता है तथा स्पर्शित करता है। (समयसार, गाथा-१४१)
२. दोनों ही नयों के कथन को मात्र जानता है। (समयसार, गाथा-१४३)
श्री दशरक्षण धर्म विधान/१
ॐ नमः सिद्धेभ्यः
मंगलाचरण
(छंद-अनुष्टुप)
मंगलम् सिद्ध परमेष्ठी मंगलम् तीर्थंकरम्।
मंगलम् शुद्ध केवल ज्ञानपूर्णोऽस्तु मंगलम्॥
(दोहा)
जयात् पंचपरमेष्ठी जिनमुक्तिना विनष्टधाम।
जय जादवे द्विव्यध्वनि श्रीजिनधर्म प्रणाम॥
(छंद-नाम)
वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञान रूप मंगलम्।
गणधरादि सर्व साधु ध्यानरूप मंगलम्॥
वस्तु का स्वभाव ही अनासक्त मंगलम्।
जैनधर्म विश्वधर्म सर्वधर्म मंगलम्॥
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव मंगलम्।
शौच सत्य संयम तप त्याग ब्रह्म मंगलम्॥
धर्म आकिंचन्य ब्रह्मचर्य मंगलम्।
धर्म दश धारणीय सर्वश्रेष्ठ मंगलम्॥
मुक्ति सोपान दशा यही भव्य मंगलम्।
भावमयी नवविधान परम दिव्य मंगलम्॥
(दोहा)
दशालक्षण शुद्ध धर्म की, पूजन करूँ महान।
पार करूँ सोपान दश, पाऊँ पद निर्वाण॥
॥ पुण्यांजलि क्षिपामि ॥
पूजन क्रमांक १
सम्यक्त्व पूजा
स्थापना
(छंद-गतिका)
धर्म दशलक्षण परम महिमामयी का ज्ञान दूँ।
धार इनको हृदय में शुद्धात्मा को ज्ञान दूँ।।
धर्म उत्तम क्षमा पावन क्रोध का करता विनाश।
धर्म उत्तम मार्दव मान का करता प्रकाश।।
धर्म उत्तम आर्जव ऋजुतामयी सुखकार है।
धर्म उत्तम सत्य श्रेष्ठ असत्य नाशनहार है।।
धर्म उत्तम शौच तृष्णा लोभ हर्ता है महान।
धर्म उत्तम परम संयम मुक्ति सुखदाता प्रधान।।
धर्म उत्तम तप अनिच्छुक भाव करता है प्रदान।
धर्म उत्तम त्याग शोभा आत्मा की है महान।।
धर्म उत्तम पूर्ण आकिंचन परम सुखरूप है।
ब्रह्मचर्य स्वधर्म उत्तम शील सिन्धु अनूप है।।
यही हैं दश धर्म उत्तम सर्व में पूजत सदा।
मार्ग भव का छोड़ कर शिवमार्ग पावें सौखदा।।
(छंद-सोरठा)
क्षमा आदि दश धर्म, निज आत्मा के धर्म हैं।
इनसे जो विपरीत, वे सब भव के कर्म हैं।।
आत्म धर्म की प्राप्ति, होती है सम्यक्त्व से।
कष्ट विधान महान, सम्यक् दर्शन प्राप्ति हि।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम तप त्याग आकिंचन ब्रह्मचर्य
दशलक्षण धर्म अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापन।
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
श्री दशलक्षण धर्म विधान/७५
राग-द्वेष मोहादिक आयव ज्ञानी को होते न कभी।
ज्ञाता-दृष्टा को ही होते उत्तम संवर भाव सभी।।
शुद्धात्म की भक्ति सहित जो परभावों से नहीं जुड़ा।
उपयोग का अधिकारी है सम्यग्दृष्टि महान बड़ा।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण मोहनाशरविनाशाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्म बन्ध के चारों कारण मिथ्या अविरति योग कषाय।
तेनहित्या इनका छेदन कर, करता है निर्वाण उपाय।।
जो उपसर्ग छोड़कर निज को निज में सुस्थापित करता।
स्थितिकरण युक्त होता वह सम्यग्दृष्टी स्वहित करता।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण अष्टकर्मविनाशाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प-पादमय सभी शुभाशुभ योगों से रहता वह दूर।
सर्व संग से रहित हुआ वह दर्शन-ज्ञानमयी सुख पूर।।
सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रधारी के प्रति भो वत्सलभाव।
वात्सल्य का धारी सम्यग्दृष्टि मिटाता पूर्ण विभाव।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानविहीन कभी भी पलभर ज्ञानस्वरूप नहीं होता।
बिना ज्ञान के ग्रहण किए कभी से मुक्त नहीं होता।।
विद्यारूपी रथ पर चढ़ जो ज्ञानरूप रथ चलवाता।
वह जिन-शासन की प्रभावना करता शिवपथ दरशाता।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री दशलक्षण पूजन/७६
सप्त भयों से रहित निशंकित निजस्वभाव में सम्यग्दृष्टि।
मिथ्यादिक भावों में जो रहता वह है मिथ्यादृष्टि।।
तीन मूढ़ता छह अनायतन तीन शल्य का नाम नहीं।
आठ दोष संक्रमित के अंश आठों पद का कुछ काम नहीं।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण संसारातपविनाशाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अशुभ कर्म ज्ञाना कुशील शुभ को सुशील है मानत रे।
जो संसार बंध का कारण वह कुशील न जानत रे।।
कर्म फलों के प्रति जिनकी आकांक्षा उर में रही नहीं।
वह निकांक्षित सम्यग्दृष्टी भव की वांछा रही नहीं।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
राग शुभाशुभ दोनों ही संसार भ्रमण का कारण है।
शुद्धात्मा ही एकमात्र परमार्थ भवदोषि तारण है।।
चतुर्थ स्वभाव धर्म के प्रति जो लेश जुगुप्सा करे नहीं।
निर्विचिकित्सक जीव वही है निश्चय सम्यग्दृष्टि वही।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण कामाबाधविनाशाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्मा जो ध्याता वह पूर्ण शुद्धता पाता है।
जो अशुद्ध को ध्याता है वह ही अशुद्धता पाता है।।
परभावों में जो न मुह है वह यथार्थ सदा जिसकी।
वह अमूढ़दृष्टि का धारी सम्यग्दृष्टि सदा उसकी।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निज स्वरूप को पहचानूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण क्षुधारोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री दशलक्षण धर्म विधान/३
अष्टक
(वीरछंद)
समभावी निर्मल जल धोकर आत्मा का अभिषेक।
जन्म जरा मरणारि रोग हर गुण अनंत पाऊँ प्रत्येक।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं नि।
जन्मभावी निज चंद लाऊँ तिलक लगाऊँ भली प्रकार।
भव्वरनाई ताप विनाशरी शीतल शिशु सुख मिले अपार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो क्षोभकषाय विनाशनाय चंदनं नि।
समभावी अक्षत गुण पाऊँ करूँ आत्मा का उद्धार।
अक्षय पद की प्राप्ति करूँ प्रभु सुख पाऊँ अपरंपार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मानकषाय विनाशनाय अक्षतं नि।
समभावी निज शील पुष्प लाऊँ करूँ आत्मा का श्रृंगार।
कामबाण विध्वंस करूँ मैं महाशांति गुण तू दर्शाए।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मायाकषाय विनाशनाय पुष्प नि।
समभावी नैवेद्य चढ़ाऊँ परम तृप्ति पाऊँ अधिकार।
क्षुधा रोग विध्वंस करूँ पद निहारकर पाऊँ इस बार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि।
श्री दशलक्षण पूजन/७
समभावी निज दीप उजाऊँ पाऊँ मैं ज्ञान अपार।
दर्शनमोह परिमोह हर केवलरवि पाऊँ शिवकार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशाय दीपं नि।
समभावी निज धूप ले आत्माधर्म का लूँ आधार।
अष्टकर्म विध्वंस करूँ मैं जो पाऊँ स्वामी निर्भर।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो विषाद परिणति विनाशनाय धूपं नि।
समभावी फल के फल महामोक्ष फल के दातार।
भाव-द्रव्यमयनि बन पाऊँ सुख शुद्धात्म अपार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो महामोक्षफलप्राप्तये फलं नि।
समभावी गुण अर्घ्य बनाऊँ हो जाऊँ भव सागर पार।
पद अनर्घ्य अविनाश्वर पाऊँ सादि अनंत सौख्य दातार।।
उत्तम क्षमा आदि दश धर्म का पालन कर भरली प्रकार।
चढ़ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति भवन का द्वार।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं नि।
महार्घ्य
(वीरछंद की विशेष धुन)
समकित के फिर आए बहार, तत्वज्ञान की चली बयार।
भेदज्ञान की दामिनी दमकी, अनुभव से की झरी फुहार।।
तब हृदय वदनसम शीतल, क्षीण क्षणिक मैं राग विकार।
शुद्धात्म की अक्षत महिमा, की छावी है अजब बहार।।
श्री दशलक्षण धर्म विधान/७३
पूजन क्रमांक १
श्री क्षमावाणी पूजन
स्थापना
(छंद-ताटक)
क्षमावाणी का पर्व सुपावन देवा जीवों को संदेश।
उत्तम क्षमाधर्म को धारो जो अभिमुख्य जीव का वेश।।
मोह नींद से जागो चेतन अब त्यागो मिथ्यातिनिंदेश।
इन्द्रियसुख निज निजस्वभाव से चलो सिद्धि के देश।।
क्षमा, मार्दव, आर्जव, संयम, शौच, सत्य को अपनाओ।
त्याग, तपस्या, आकिंचन, व्रत ब्रह्मचर्य हो जाओ।।
एक धर्म का सार यही है समतामय ही बन जाओ।
सब जीवों पर समभाव रख स्वयं समभाव ही जाओ।।
क्षमा धर्म की महिमा अनुपम क्षमा धर्म ही जग में सार।
तीन लोक में गूँज रही है क्षमावाणी की जयजयकार।।
ज्ञाता-दृष्टा हो समग्र को देखो उत्तम निर्मल भेव।
रागों से विरहित हो जाओ ले न दुख का किंचित लेव।।
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमा धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ ठः ठः।
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
जीवादि नव तत्वों का श्रद्धान यही सम्यक्त्व प्रथम।
इनका ज्ञान ज्ञान है, रागादिक का त्याग चारित्र परम।।
‘संते पुण्विच्छदं जाणदि’ वह अबंध का ज्ञाता है।
सम्यग्दृष्टि सुजीव आवद्ध-वनरहित हो जाता है।।
उत्तम क्षमा धर्म धारे जन्म-मरण भय कर मारूँ।
परद्रव्यों से दृष्टि हटाके निजस्वरूप को पहचानूँ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिगण जन्ममरणदुःखविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
१. (सम्यग्दृष्टि) जीव सत्ता में मौजूद पूर्वबद्ध कर्मों को जानता है।
भजन/७२
भजन
धर्म दशरक्षण धारो जी।
यही मोक्ष सोपान इन्हीं पर तन-मन वारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।टेका।।
उत्तम क्षमा क्रोध का घाता,
उत्तम मार्दव विनय प्रदाता,
उत्तम आर्जव धर्म धार ऋजुता सिंगारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।१।।
उत्तम सत्य धर्म सुखकारी,
उत्तम शौच लोभ परिहारी,
उत्तम संयम धर्म हृदय ले मुनिपद धारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।२।।
उत्तम तप निर्जरा कर्म की,
जय जय उत्तम त्याग धर्म की,
उत्तम आकिंचन ले निज का रूप संवारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।३।।
उत्तम ब्रह्मचर्य विख्याता,
महाशील गुण उर में लाता,
ये दशधर्म कर्म वसु हर्ता सदा विचारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।४।।
ये दशरक्षण धर्म सुपावन,
भव्यों को है बहु मन-भावन,
इनका पालन कर निज को भवपार उतारो जी।।
धर्म दशरक्षण धारो जी।।५।।
श्री दशरक्षण धर्म विधान/१
परम विवेक मयूर कुंजता, नावत मावत शुद्ध मत्तहार।
पुण्य-पाप शुभ-अशुभ आसव, के सब बंद हो गए द्वार।।
संवर नाचे छम छम छम छम, हुई निर्जरा अब साकार।
शिव सरिउड़-उड़उड़ लहरावी, बहा ले गई सब विकार।।
रत्नत्रय की बची बांसुरी, चेतन हो भव सागर पार।
मोक्षमहल की सुख गैय्या पर, मुक्ति वधू की ली मनुहार।।
(दोहा)
महाअर्घ्य अर्पण करूँ श्री दश धर्म महान।
एकमात्र पुण्यधाम निज का श्रृंगार प्रधान।।
ॐ ह्रीं श्री दशरक्षणधर्मेभ्यो महाअर्घ्यं नि. स्वाहा।
जयमाला
(छंद-चौपाई)
उत्तम दश लक्षण उर धारूँ। कर्म दोष सब ही निवारूँ।।
अब इनकी जयमाला गाऊँ। इन्द्र धर उर शिवसुख लाऊँ।।
(बीछंद)
एकदेश श्रावक जन पालन करते हैं दशरक्षण धर्म।
सर्वदेश मुनि पालन करते हो जाते हैं वे निष्कर्म।।
केवल आकिंचनता करते विषयों की अभिलाषा त्याग।
निर्ग्रन्थ मुनिवर होते हैं तिल तुल्य तब से कभी न राग।।
आत्मध्यान में रत रहते हैं परमतपस्वी श्री मुनिराज।
वे दश उत्तम धर्म पाल कर पा लेते हैं निज पदराज।।
पहले सम्यक् दर्शन सेति फिर व्रत धारण करते हैं।
माया मोह विनाश शीघ्र ही निज अनुभव रस भरते हैं।।
स्वपर विवेक बिना सम्यक्दर्शन का होता कभी न नाम।
सम्यक् दर्शन बिना न मिलता मुनि को भी सच्चा विश्राम।।
बिन समकित के जप तप व्रत सब कर्म बंध के ही कारण।
समकित हो तो जप तप व्रत संयम सब ही भवदुख हारण।।
समुच्चय पूजन/६
जैसे अगर इकाई हो तो शून्य सभी होते बलवान।
बिना इकाई शून्य शून्य है सभी जानते हैं गुणवान।।
उसी भक्ति समकित बिन सारा श्रम है शून्य समान सदा।
भव सागर दुख का कारण ही होता है यह सदा सदा।।
पहले दशरक्षण व्रत का अभ्यास करके हम सचिपूर्वक।
जब सम्यक् दर्शन हो जाए तब व्रत धारि विधि पूर्वक।।
यही धर्म है श्रेष्ठ लोक में यही मोक्ष के दस सोपान।
इन पर क्रम-क्रम से चढ़ने पर प्राणी पा लेते निर्वाण।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग,
आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशरक्षणधर्मेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा।
आशीर्वाद
(रोला)
दशरक्षण विधान की पूजन उर को भायी।
अब तो काललब्धि भी देखो मेरी आयी।।
दशधर्मों का पालन करूँ सदा हो स्वामी।
आत्मध्यान का शिवसुख पाऊँ अन्तर्यामी।।
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि दशरक्षणधर्मेभ्यो नमः।
क्षमा और शांति में सुखी रहें सदैव जीव,
क्रोध में न एक पल रहे सुख चैन से।
आयत ही क्रोध अङ्ग अङ्ग से ऐसे गिरे,
होठ डसे, दाँत पिसे, आग झरे नैन से।।
औरत को मारे, अपनी शरीर कूट डरे,
नाक भी चढ़ाय कुराफात बके बैन से।
ज्ञान-ध्यान भूल जात, आपा-पर की घात,
ऐसे रिपु क्रोध को भगावो क्षमा सैन से।।
शांति पाठ
(दोहा)
परम शान्ति पाठ पढूँ, पाऊँ सम्यक् धर्म।
रत्नत्रय की भक्ति से, नाशूँ, सारे कर्म।।
सकल जगत में शान्ति हो, सुखी रहे सब जीव।
घटघटलोक के जीव सब, दुखी न होय कदीव।।
जीव मात्र पर क्षमा रख, पाऊँ अपना धर्म।
शुद्धात्मा का ध्यान धर, पाऊँ निश्चय धर्म।।
यही भावना है प्रभु, घर-घर मंगल चार।
पूर्ण शान्ति हो विश्व में, हो सबका उद्धार।।
पुष्पांजलि क्षिपेत्।
(पंचपरमेष्ठी का स्मरण करते हुए चार बार णमोकार मंत्र का जाप करें।)
क्षमापना
मैं लौटकर निगोद कभी जाऊँगा नहीं।
सम्यक्त्व धन जो पाया है गँवाऊँगा नहीं।।
मेहनत से मैंने भेदज्ञान पा ही लिया है।
मिथ्यात्व मोहभाव कभी लाऊँगा नहीं।।
स्वर्गों के सुख का मार्ग तो पाया अनंत वार।
स्वर्ग की क्षणिक सत्ता में लुभाऊँगा नहीं।।
संसार मार्ग छोड़ मोक्षमार्ग पाया है।
निज मोक्षमार्ग तब के कहीं लाऊँगा नहीं।।
गाए हैं मैंने गीत सदा ही विधान के।
अब ये विषाद गीत कभी लाऊँगा नहीं।।
मंगलमय भगवान वीर प्रभु मंगलमय गौतम गणधर।
मंगलमय श्री कुन्दकुन्द ऋषि मंगल जैनधर्म सुखकर।।
सर्व मंगलों में मंगल है श्रेष्ठ सर्व कल्याणमयी।
श्री जिनधर्म प्रधान जगत में जिन शासन हो सर्व जयी।।
पुष्पांजलि क्षिपेत्।
समुच्चय महाअर्घ्य/१०
आशीर्वाद
(छंद-सोरठा)
निश्चय ब्रह्मचर्य की महिमा ऋषि मुनि गणधर ने गायी।
निजस्वरूप के दर्शन पाए आत्मज्ञान महिमा आयी।।
निश्चय धर्म आत्मा ही है परब्रह्म शिवसुखदायी।
पूजन करते ही प्रभु मेरे परम शान्ति अनुपम पायी।।
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र
ॐ ह्रीं श्री दशरक्षणधर्मेभ्यो नमः।
समुच्चय जाप्य मंत्र
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव-सत्य-शौच-संयम-तप त्याग-
आकिंचन-ब्रह्मचर्यधर्माय नमः।
समुच्चय महाअर्घ्य
(छंद-गाथा)
निज भावों का महाअर्घ्य ले पाँचों घेरी घेरी।
जिनवाणी जिनधर्म पाकर देव शास्त्र गुरु उर धारी।।
तीस चौबीसी बीस जिनवर कृत्रिम अकृत्रिम गृह धारी।
सर्व सिद्धप्रभु पंचमेरु चन्द्रीश्वर गणधर गुण गारी।।
सोलहकारण रत्नत्रय दशरक्षण नव सुदेव गारी।
चौबीसी जिन युत अविनाशी दर्शन जिनवर धारी।।
तीन लोक के सर्व जिन वन्दूँ जिनवर गुण गारी।
अविनाशी अनन्त पद पाऊँ आत्मगुण प्रगटारी।।
(दोहा)
महाअर्घ्य अर्पण करूँ पुण्य विनय से देव।
आप कृपा से प्राप्त हो परमशान्ति स्वमेव।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त-जिनरूप-पूज्यदेवेभ्यो महाअर्घ्यं निवापामि स्वाहा।
पूजन क्रमिक/२
श्री उत्तम क्षमा धर्म पूजन
स्थापना
(रोला)
उत्तम क्षमा महान भाव, सहित पूजन करूँ।
क्रोध कषाय विनष्ट करूँ स्वयं की शक्ति से।।
निर्मल सहज स्वभाव प्राप्त करूँ मैं हे प्रभो।
क्रोध न हो उत्पन्न ऐसा ही श्रम नित करूँ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिण अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिण अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिण अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टक
(छंद-मानव)
प्रभु उत्तम शान्ति प्रदाता लाल लाऊँ शीरोवधि सम।
अष्टक बिना निज होऊँ क्षय रोग नाश में सक्षम।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिणाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म का शीतल चंदन उर लाऊँ।
भव ताप निवारण करके आनन्द अतीन्द्रिय पाऊँ।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिणाय क्रोधकषाय विनाशनाय चंदनं नि.।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के अखियारे अक्षत लाऊँ।
निज अक्षय पद पाने को निज शुद्धात्मा ही धाऊँ।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मिणाय अक्षयपद विनाशनाय अक्षतं नि.
श्री उत्तम क्षमा पूजन/८
प्रभु उत्तम क्षमा के नव कुसुम शीशमय लाऊँ।
कामरिपु नाश करने को अपना स्वरूप ही ध्याऊँ।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय भावाश्रव विनाशनाय पुष्प नि।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के श्वेतव भावमय लाऊँ।
परिपूर्ण तृप्ति पाने को अपना स्वभाव ही ध्याऊँ।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के दीपक उर में उजियारे।
मोहान्धकार के क्षय हित मिथ्यात्व तिमिर निवारें।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म की निज ध्यान धूप उर लाऊँ।
आठों ही कर्म विनाशूँ वीर्यगुण प्रौढ़य सुख पाऊँ।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय विषय भोगोपत्ति विनाशनाय धूपं नि।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म का फल पाऊँ महा मोक्षालय।
संसार भाव क्षय करके पाऊँ निर्वाण सौख्यमय।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय महामोक्षफल प्राप्तये फलं नि।
प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के गुण अर्घ्य बनाऊँ अनुपम।
पदवी अनर्घ्य पाने में हो जाऊँ स्वामी सक्षम।।
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहिले इसको ही धारण करना आवश्यक।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मार्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि।
श्री रत्नत्रय धर्म विधान/६६
अंतिम महाघ्यानाष्टका
(वीरछंद)
बहिरात्मा है राग-द्वेष से ओत-प्रोत रागों का दास।
अन्तरात्मा राग-द्वेष से भिन्न किन्तु रागों के पास।।
परमात्मा है राग-द्वेष के भावों से विरहित शिवरूप।
इनतीनोंका लक्षण जानो जिन निरखो निज आत्मस्वरूप।।
अकायरूपी स्वभाव चेतन का वीतराग है शुद्ध स्वरूप।
सबसे भीतर वीतराग परमात्मा है सर्वज्ञ स्वरूप।।
भाव-द्रव्य-नोकर्म त्याग दे हो जाएगा तू निर्भार।
मात्र एक अन्तर्मुहूर्त में जाएगा तू भव के पार।।
ज्ञानस्वरूप जाननवाला आत्मा ही होता अविष्कार।
आत्मज्ञान होते ही करा राग-द्वेष पूर्ण परिहार।।
ऐसा अन्तरात्मा अपने परमात्मा का लेकर पक्ष।
शुद्ध भाव के द्वारा करता है अपना परिचय प्रत्यक्ष।।
ऐसी दृढ़ निश्चयी हो वह पाता है केवलज्ञान।
झट संसार भाव को हर कर पा लेता है पद निर्वाण।।
थोड़ा-सा ही श्रम करने पर हो जाता है परमाल्य।
फिर कभी भी हो सकता है पल भर को भी बहिरात्म।।
उत्तम क्षमादि दश धर्मों के सोपानों पर जो चढ़ता।
वही जीव आत्मत्व शक्ति से शिखर पर आगे बढ़ता।।
धर्ममार्ग तो सम्यक् दर्शन से ही होता है प्रारंभ।
रत्नत्रय की तरणी मिलती बन जाता है धर्मस्तंभ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि दशलक्षणधर्मेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्यं नि।
अंतिम महाअर्घ्य/६८
अंतिम महाअर्घ्य
(छंद-विधाता)
शुद्ध सम्यक्त्व पाने का ये मौसम आज आया है।
मोह मिथ्यात्व भ्रम क्षय का सुअवसर आज पाया है।।
अर्घ्य पुरुषार्थ कर लोगे तो समकित शीघ्र पाओगे।
स्वरूपारम्भ भी पाकर मुक्ति के पथ में जाओगे।।
धर्म दश मोक्ष सुख दाता इन्हें धारण करो चेतन।
बिना दशधर्म के जग में सदा ही दुख उठाओगे।।
शीघ्र अविगति विनाशो तुम शुद्ध अमृत अभी धारो।
प्रमाद को करोगे क्षय तो संयम पूर्ण पाओगे।।
चौकड़ी तीव्र क्षय कीनी तो होगी संज्वलन भी क्षय।
धर्मध्यानी बनोगे तुम निजआत्म को ही ध्याओगे।।
बड़ा तत्वार्थी रथ को शुद्धात्मध्यानी बनोगे फिर।
चढ़ोगे श्रेणी पर तत्क्षण दशा अविकल्प पाओगे।।
यथाख्याती बनोगे फिर घातिया कर्म नाशोगे।
दशा अरहंत पाकर के तुम योगी पद सहज लोगे।।
योग भी नाश करके तुम अयोगी पद सहज लोगे।
मुक्ति मंदिर जाकर के सिद्धपद अपना पाओगे।।
यही दशधर्म की महिमा यही दशधर्म का फल है।
अनंतानंत कालों तक शाश्वत सुख ही पाओगे।।
(दोहा)
महाअर्घ्य अर्पण करूँ श्री दशधर्म महान।
दशधर्मों की भक्ति से पाऊँ पद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि दशलक्षणेभ्यो अंतिम महाअर्घ्यं नि।
श्री रत्नत्रय धर्म विधान/६५
अर्घ्यावलि
(वीरछंद)
घोर अशुभ से पाप प्रकृतियों को करता है प्राणी बंध।
थावर नामक कर्म बंधता है उदय समय होता दुख द्वंद्व।।
पृथ्वीकायिक जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम।।११।।
ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
एकेन्द्रिय जलकायिक प्राणी पापोदय में दुख पाते।
महामोह मिथ्यात्व ग्रसित हो कभी न पलभर सुख पाते।।
जलकायिक जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम।।१२।।
ॐ ह्रीं श्री जलकायिकविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
अग्निकाय एकेन्द्रिय प्राणी बहु दुख से जलते रहते।
महापाप से पीड़ित होकर भवदीय में बहते रहते।।
अग्निकाय जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम।।१३।।
ॐ ह्रीं श्री अग्निकायिकविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
पवनकाय के जीव पाप के कारण बहु संकट पाते।
ये भी एकेन्द्रिय प्राणी हैं अध का घट भरते जाते।।
वायुकाय जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम।।१४।।
ॐ ह्रीं श्री वायुकायिकविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
हरित वनस्पतिकायिक प्राणी एकेन्द्रिय बहु दुख पाते।
छेदन भेदन कष्ट कर पाप का उदय भरते जाते।।
हरित वनस्पति के जीवों की रक्षा करना है उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
श्री उत्तम क्षमा पूजन/१०
पापोदय से थावर प्राणी पाँच भेद के होते हैं।
दो है भेद सूक्ष्म अरु बादर जो पाँचों में होते हैं।।
इन सबका दुख दान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम।।१६।।
ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मस्थूलपृथ्वीजलअग्निवायुवनस्पतिकायधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
दो इन्द्रिय लट हड्डी शंख रीछोला जोंक व कीड़ी जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी करूँ सदैब।।
इन सबका दुख दान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम।।१७।।
ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
बिच्छु कुत्ता चींटी खटमल पिसु सुन तेइन्द्रिय जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी करूँ सदैब।।
इन सबका दुख दान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम।।१८।।
ॐ ह्रीं श्री त्रीन्द्रियजीवविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
मकड़ी मच्छर मक्खी भँवरा बरी आदि चतुरिन्द्रिय जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी करूँ सदैब।।
इन सबका दुख दान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम।।१९।।
ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
मन बिन पाँचों इन्द्रिय धारी सकल श्रेणी प्राणी जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी रक्षा करूँ सदैब।।
इन सबका दुख दान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम।।२०।।
ॐ ह्रीं श्री असैनीपंचेन्द्रियजीवविरतिरूपोत्तमक्षमाधर्मार्थाय अर्घ्यं नि।
पापोदय से जीव नारकी जुम्भी बहु दुख पाते।
करुणा का सागर उर में पर क्या हम रक्षा कर पाते।।
श्री रत्नत्रय धर्म विधान/६७
जयमाला
ढाई अक्षर आत्मा दो अक्षर का ज्ञान।
जो यह सम्यक् जानता पाता पद निर्वाण।।
आत्मब्रह्म ही ब्रह्म है परब्रह्म से युक्त।
ब्रह्मचर्य उर धार कर प्राणी हो मुक्त।।
(छंद-दिगपाल)
किस मार्ग में जाते हो इसका निर्णय कर लो।
शिष्यता है या भवपथ इसका निश्चय कर लो।।
मत नयन बंद करना अज्ञान होकर जाना।
पहिले समकित लेकर मिथ्यात्व विजय कर लो।।
समकित बिन तुम सम्यक् काम न आएगा।
तप संयम लेना है तो समकित उर धर लो।।
फिर भवपथ को तज कर शिवपथ पर आ जाना।
चौकड़ी कषायों की तीनों ही जय कर लो।।
निज धर्मध्यान ध्याना ध्यानादि भाव हरना।
दृढ़ शुक्लध्यान लेकर मोक्षदिक क्षय कर लो।।
श्रेणी पर चढ़ते ही दृढ़ यथाख्यात ले लो।
घातिया कर्म घात संपूर्ण विजय कर लो।।
केवलज्ञान लेना जो स्व-पर प्रकाशक है।
सर्वज्ञ स्वाद लेकर आत्मत्व प्रगट कर लो।।
फिर योग नाश करना क्षय अघातिया करना।
सिद्धत्व स्वरूप पाकर संसार सर्व हर लो।।
ब्रह्मचर्य का स्रोत शुद्धात्म के पास है।
शुद्धात्म ओत-प्रोत ब्रह्मचर्य निज धर्म है।।
ॐ ह्रीं श्री शुद्धब्रह्मचर्यधर्माय जयमाला अर्घ्यं नि।
पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ ब्रह्मचर्य का स्रोत।
ब्रह्मचर्य निज ही शुद्धात्म ओत-प्रोत।।
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय नमः।
श्री उत्तम ब्रह्मचर्य पूजन/५५
रूप त्रिया का लखकर जो हर्षित होता है।
वृथा पाप का बोझ शीश अपने ढोता है॥
नहीं कामगर जिनके मन होता सुख मानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में मानो॥१७॥
ॐ ह्रीं श्रीं मुक्तिकामकामभोगनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
बार-बार नारी को जो देखना चाहता।
अवलोकन कर स्वयं आग में ओरे दाहता॥
अपने उर में ऐसा शूल नहीं तुम लाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१८॥
ॐ ह्रीं श्रीं अवलोकनकामभोगनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
हास्यवचन कह जो नारी को मृदु रिझाते।
वह न चाहती पर ये संतोष न लाते॥
यही काम कर कभी नहीं तुम उर में लाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१९॥
ॐ ह्रीं श्रीं हास्यकामभोगनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
प्रगट वचन नारी से जब कह यह नहीं पाता।
किन्तु इशारे कर नारी का चित्त ललचाता॥
इंगित चेष्टा वर्जनीय मन मन में लाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥२०॥
ॐ ह्रीं श्रीं इंगितचेष्टाकामभोगनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
कामचेष्टादि से स्त्री के चित्त प्राण गंवाता।
माता सुता बहिन पत्नी प्रतिमान न पाता॥
कामभाव जो जब करता है कष्ट न पाता।
उत्तम ब्रह्मचर्य धारण कर बहु सुख पाता॥२१॥
ॐ ह्रीं श्रीं मातुकामकामभोगनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
शील बाड़ की ही विधि से जो रक्षा करते।
दश प्रकार से कामभाव को पल में हरते॥
मुक्ति वधू से परिणय करके वे हर्षते।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म से शिवसुख पाते॥२२॥
ॐ ह्रीं श्रीं शुद्धब्रह्मचर्याय धर्म नि.।
श्री दशलाक्षण धर्म विधान/५५
इन सबका दुख जान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीं नरकीजीवविरलक्षणोत्तमक्षमाधर्माय अर्घ्यं नि.।
पापोदय से जीव असह्यौ पशुवृत्ति पाते दुखदायी।
छेदन भेदन मार वचन की पीड़ा ही सदैव पायी॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥१२॥
ॐ ह्रीं श्रीं तिर्यक्जीवविरलक्षणोत्तमक्षमाधर्माय अर्घ्यं नि.।
क्रोध मान माया लोभादिक वश में मनुज महा दुखिया।
राग-द्वेष-मोह के कारण कभी न हो पाया सुखिया॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥१३॥
ॐ ह्रीं श्रीं मनुष्यजीवविरलक्षणोत्तमक्षमाधर्माय अर्घ्यं नि.।
चक्र निकाय के देवों में जा जीव नहीं सुख पाता है।
मरण समय यह दूर-दूर कर रोता है बिछड़ता है॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरुँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥१४॥
ॐ ह्रीं श्रीं चतुर्गतिचक्रवर्तीजीवविरलक्षणोत्तमक्षमाधर्माय अर्घ्यं नि.।
सारे ही थावर दस प्राणी कर्मों के वश भ्रमते हैं।
चारों गति का भ्रमण बढ़ाते कभी न निज में जमते हैं॥
करुणा का सागर लहराता श्री मुनियों के हृदय महान।
उत्तम क्षमा धर्म उर पाके करूँ आत्मा का कल्याण॥१५॥
ॐ ह्रीं श्रीं त्रसस्थावर-समस्तजीवविरलक्षणोत्तमक्षमाधर्माय अर्घ्यं नि.।
जयमाला
(दोहा)
उत्तम क्षमा महान ही परमोत्तम निज धर्म।
क्रोध रहित यदि हो हृदय सब हो सर्व अपर्म॥
श्री उत्तम ब्रह्मचर्य पूजन/५२
(छंद-नाटक)
वस्तु स्वयं की सदा स्वयं में मिलती आत्मानुभव द्वारा।
श्री शुक्ला आत्मा-अनुभव से मिलती शुद्ध ज्ञान धारा॥
तत्त्वों के अभ्यासरूपकरो करो यथार्थ तत्त्वनिर्णय।
फिर संकल्प-विकल्प तोड़कर निजस्वभाव का लो आश्रय॥
अब जोड़ो उपयोग आत्मा के स्वरूप से निज बल।
शुद्ध स्वानुभव निर्विकल्प हो साधक बन जाओ निर्मल॥
पहिले की अग्रुदत्ता जो अब टल कर हुई शुद्ध पर्याय।
अनुभव हो शुद्ध स्वभाव प्राप्ति का एक उपाय॥
शुद्ध स्वानुभव में आनंद अतीन्द्रिय का आता है स्वाद।
शुद्ध स्वानुभव में विकल्प का अणु भर रहता नहीं विवाद॥
हृदय कमल में सुस्थित ज्ञानानंद स्वभावी शुक्लात्मा।
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित होता है चेतन परमात्मा॥
सम्यक्दृष्टि जीव की होती सिद्ध वधू से पावन लग्न।
सुख समृद्ध रूपी ज्ञानामृत सागर में हो जाता मग्न॥
उत्तम क्षमा धर्म का पावन फल पाता है ध्रुव निर्वाण।
दश धर्मों का पालन करके हो जाता है वह भगवान॥
(दोहा)
पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ विनय सहित भगवान।
बाह्यान्तर प्रगटित करूँ उत्तम क्षमा महान॥
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तमक्षमाधर्माय चन्दनाय पूर्णार्घ्यं नि.।
आशीर्वाद
(दोहा)
हो प्रभु मेरे हृदय में क्षमा धर्म का भान।
निश्चय से पालन करूँ पाऊँ पद निर्वाण॥
इत्याशीर्वादः
जाग्र मंत्र – ॐ ह्रीं श्रीं उत्तमक्षमाधर्माय नमः।
श्री दशलाक्षण धर्म विधान/५५
क्रूर काम वश बड़े बड़े प्राणी हो जाते।
क्रूर काम ज्वर से पीड़ित हो बहु दुख पाते॥
शोषण कामबाण से होना कभी न प्राणी।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म उर धरते ज्ञानी॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीं शोषणकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
कामबाण जिसके भ्रम होता बहु दुख पाता।
मन संताप ताप होता व्याकुलता पाता॥
कामबाण संताप न हो गुण शील ज्ञाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१२॥
ॐ ह्रीं श्रीं संतापकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
कामबाण उचाटन हो तो होता दुखिया।
उचाटन शर काम न हो तो बनता सुखिया॥
कामबाण उचाटन निज उर में मत लाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१३॥
ॐ ह्रीं श्रीं उचाटनकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
काम व्याधिशर कामी जन को कुंदन सुखाता।
वशीकरण शर काम न हो तो वह सुख पाता॥
कामबाण के वशीकरण से तुम बच जाना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१४॥
ॐ ह्रीं श्रीं वशीकरणकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
कामदेव से मूर्छित प्राणी सुख-दुख खोते।
शीलवंत ही कामदेव के बल को धोते॥
मोहन कामबाण से बचकर निज को ध्याना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१५॥
ॐ ह्रीं श्रीं मोहनकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
मोह शत्रु को जयकर काम शत्रु को जीतो।
कामबाण की सकल व्याधियों से अब रीतो॥
पंच प्रकार कामबाण क्षय कर सुख पाता।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही हृदय सजाना॥१६॥
ॐ ह्रीं श्रीं पंचप्रकारकामबाणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
श्री उत्तम ब्रह्मचर्य पूजन/५४
पूर्ण शील भावना सदा ही हृदय सजाओ।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीं कुशीलत्वनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
तन श्रृंगार न तेल फुलेल आदि से करना।
शील भूषण आभूषण तन पर धरना॥
शील आभरण से दूषित हो निज को जानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीं स्वपरस्त्रीशृंगारनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
महिलाओं की शैय्या पर तुम नहीं पोढ़ना।
महिलाओं के वस्त्रों को भी नहीं ओढ़ना॥
महा शीलव्रत दृढ़ता से पालन हो ताना।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीं शैय्यावस्त्रनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
कामचेष्टा में कभी भूल मन को लगाना।
विकथाओं को कभी न सुनना तथा सुनाना॥
काम मदन कंदर्प न पलभर मन में आनो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीं कामकथाश्रवणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
उत्तर पूर्ण भोजन तब अनीति ही करना।
उत्तम पूर्ण शीलव्रत पालन में चित्त धरना॥
इससे शील दृढ़ता दृढ़ होगा यह जानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीं उदरपोषणनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
जो नव कामैष्टिक शील सुपालन करते।
अपने भीष्ट दुख हरने के भी दुख हरते॥
महा शील गुण धारण कर भव कष्ट मिटानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीं नवकामैष्टिकनिवृत्त्यर्थमुत्तमब्रह्मचर्य धर्म नि.।
पूजन क्रमांक ३
श्री उत्तम मार्दव धर्म पूजन
स्थापना
(झूलना)
उत्तम मार्दव धर्म ही विनय समुद्र महान।
विनय रत्नगुण को प्राप्त कर करूँ आकल्याण॥
करूँ आकल्याण भावना निर्मल भावों।
समकित लेकर सम्यक् ज्ञान हृदय प्रगटाऊँ॥
दुष्ट सम्यक् चारित्र धार सुख पाऊँ सुखिया।
मोक्ष प्राप्त में प्रभु हो जाऊँ सक्षम॥
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्मान् अत्र अवतरत संवौषट् आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्मान् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्मान् अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टक
(छंद-नाटक)
शुद्ध भाव जल पाने को प्रभु ज्ञान भाव में लाऊँ।
विविध रोग सर्वथा नष्ट कर आत्मज्ञान वैभव पाऊँ॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
परम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्माय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
शुद्धभाव चंदन पाने शीलशीलता का ज्ञान करूँ।
फिर संसार ताप हरने को निज स्वरूप का भान करूँ॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
परम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्माय क्रोधमान विनाशनाय चंदनं नि.।
शुद्धभाव के गुणमान अक्षर विनय भाव से मिलते हैं।
अक्षयपद पाते ही उर कमल स्वतः ही खिलते हैं॥
श्री उत्तम क्षमा धर्म पूजन /१४
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये मानस्तंभकाय विनाशनाय अक्षतम् नि.।
शुद्धभाव के पुष्ट अणुसे कामबाण पीड़ा हरले।
लाख चौरासी उत्तर गुण दे परमसुख उर में भरले॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये मानस्तंभकाय विनाशनाय पुष्पम् नि.।
शुद्धभाव के सुदृढ़ सम्यमी अनुभव से निर्मोह होते।
अनाहार पद के ही पाणि पूर्ण शुभ्र होते॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि.।
शुद्धभाव के दीप ज्योतिकाव्य का है विनय भाव आधार।
मोह तिमिर मिथ्यात्व नष्ट कर अनंत ज्ञान करा अधिकार॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये मोहन्धकार विनाशनाय दीपं नि.।
शुद्धभाव की धूप ध्यानमय अक्षकर्म क्षय करती है।
विनय भाव की पावन गंगा निज अंग में भरती है॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये विभावरति विनाशनाय धूपं नि.।
शुद्धभाव तब फल पाने का जो निश्चय कर लेता है।
महा मोक्षसुख वह पाता है सकल व्याधि हर लेता है॥
उत्तम मार्दव धर्म प्राप्त करने को विनय भाव लाऊँ।
पदम शुद्ध चैतन्य तत्व का निर्णय कर शिवसुख पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मप्राप्तये महामोक्षफलप्राप्तये फलम् नि.।
श्री दशलाक्षण धर्म विधान /१३
निज गुणमय अर्थ अपूर्व शुद्ध बनाऊँगा।
परती अनर्थ के हेतु निज को ध्याऊँगा॥
पूर्व उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म सदा स्वामी।
पाऊँ चौरासी लाख उत्तर गुण नामी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्मप्राप्तये अनंगोच्छेदनाय अर्घ्यम् नि.।
अर्घ्यावलि
(छंद-रोला)
जहाँ वास हो महिलाओं का वहाँ न रहना।
अपने शील स्वभाव भाव रस में ही बहना॥
सभी नारियों को माता के समान मानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥१॥
ॐ ह्रीं श्री श्रीउत्तमब्रह्मचर्यधर्मसुखसंप्राप्तये अर्घ्यम् नि.।
नारी तन की ओर न रति से देखो चेतन।
उनका हाव भाव विप्रम मत देखो चेतन॥
शील धर्म पालन से ही सुख होता मानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥२॥
ॐ ह्रीं श्री शीलरत्नौघनिर्मलज्ञानदर्शनसुखसंप्राप्तये अर्घ्यम् नि.।
राग वचन मद कभी किसी से बोलो चेतन।
जिनवाणी श्रुत नोल-तोल कर बोलो चेतन॥
राग वचन सुन पाप नहीं उर में उपजानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥३॥
ॐ ह्रीं श्री रागवचनकषायविनाशसुखसंप्राप्तये अर्घ्यम् नि.।
पूर्व भोग जो भोगे उनका करो न चिंतन।
परम शील भावों को धरो मन में चेतन॥
राग भाव पूरा त्यागो निज रस को जानो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ही उर में आनो॥४॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वभोगसुखस्मरणविनाशसुखसंप्राप्तये अर्घ्यम् नि.।
कामोद्दीपक भोजन थोड़ा भी मत खाना।
षट्दस व्यंजन देख भी मत ललचाना॥
श्री उत्तम ब्रह्मचर्य पूजन /१२
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3086.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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