पंचदेव विधान कार्यिका जैन विजय गैलन
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निवेदन
जैन धर्ममें धर्मके दश लक्षण बताये गये है अतः उसको दश लक्षण धर्म कहते हैं और इसीपर धर्मकी इमारत खड़ी है। इसका इतना महत्व है कि इसीके नामसे जैनोंका महान पर्व दश लक्षण पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
जैन भाषा शास्त्रोंमें इन दश धर्मोंका स्वरूप सामान्यरूपसे दर्शाया गया है लेकिन सर्वसाधारणके समझनेमें आजावें उस प्रकारसे इनका स्वरूप दर्शानेवाले ग्रन्थकी बड़ी आवश्यकता थी जिसको हमारे निवेदनसे स्व० धर्मरत्न पं० दीपचन्दजी वर्णी (नरसिंहपुर सी. पी. निवासी) ने २८ वर्ष हुए पूर्ण कर दी थी। तब हमने वीर सं० २४४० में उसकी २००० प्रतियां छुपाकर वितरित की थीं, फिर इसकी दूसरी आवृत्ति वीर सं० २४४३ में प्रकट की और तीसरी आवृत्ति वीर सं० २४५३ में प्रकट की थीं। वह भी खतम हो जानेसे इसकी यह चतुर्थ आवृत्ति प्रकट की जाती है।
इस आवृत्तिमें इसवार कई विशेषताएँ की गई है जैसे कि मुखपृष्ठपर खास खर्च करके ‘दशधर्म दीपक’ का आकर्षक व मावपूर्ण चित्र बनाकर रखा है तथा भीतर दश लक्षण व्रत कथाके साथ २ स्व० ब्र० शीतलप्रसादजी कृत दशधर्म भजन और आचार्यश्री सुमतिसागरजी कृत दश लक्षण व्रत उद्यापन भी जोड़
[ २ ]
दिया है जिससे दश लक्षण व्रतके १० उपवास करनेवालोंको दश-लक्षण व्रत-कथा पढ़नेमें तथा उद्यापन करनेमें सुभीता होगा। इस व्रतके उद्यापनमें १०० कोठेका साथिया निकालना पड़ता है तथा सब प्रकारके दश २ उपकरण मंदिरमें चढ़ानेका रिवाज है वह यथाशक्ति करना चाहिये तथा दश लक्षण व्रत करनेवालोंको खास करके शास्त्रदानमें अच्छी रकम निकालना चाहिये और इस पुस्तककी प्रभावना तो अवश्य २ करनी चाहिये। अब कांच व धातुके बर्तनोंकी प्रभावनाकी आवश्यकता नहीं है, यह ख्याल रखना चाहिये।
दूसरी आवश्यक सूचना यह है कि इस ग्रन्थका आद्यंत मननपूर्वक वारंवार स्वाध्याय करते रहें और दशलाक्षणिक व्रतके दिनोंमें नित्य एकर धर्मका पाठ सबको सुनाना चाहिये व उसपर विशेष उपदेश देते रहना चाहिये। यदि हम इन दश धर्मोंका अच्छी तरहसे पालन कर सकेंगे तो सब कुछ कर सकेंगे ऐसा निःसंशय कहा जा सकता है।
आशा है इस चतुर्थावृत्तिका भी शीघ्र ही प्रचार हो जायगा।
सूरत
वीर सं० २४६८
चैत्र सुदी १२
ता० २७-३-४२
निवेदक-
मूलचन्द किसनदास कापडिया।
-प्रकाशक।
श्रीवीतरागाय नमः
श्रीदशलक्षण धर्मः
वत्थु सहावो धम्मो, खमादि भावो य दसविहो धम्मो ।
रयणत्तयं च धम्मो. जीवाणं -स्वामिकातिकेयानुप्रेक्षा ।
अर्थ-वस्तुका जो स्वभाव है वह धर्म है, अर्थात् जैसे जीव दर्शनज्ञानादि उपयोग स्वभाव तथा चेतनस्वभाव अथवा पुद्गल अचेतनत्व बा स्पर्श, रस, गंध, वर्णत्व आदि स्वभाव होता है, उत्तम-क्षमादि दश प्रकारके भाव भी धर्म है और रत्नत्रय रूप भी धर्म होता है तथा अहिंसा लक्षण अर्थात् जीवोंकी रक्षा करना भी धर्म है ।
भावार्थ-यद्यपि उक्त गाथा में वस्तुके स्वभावको, उत्तम क्षमादि दश लक्षणोंको, रत्नत्रयको और अहिंसाको, इस प्रकार धर्म चार प्रकारसे कहा है तथापि निश्चयसे विचार करनेपर केवल वस्तुस्वभावमें ही अन्य तीनों प्रकार गर्भित हो सकते हैं । कारण यहाँपर जो धर्म शब्दकी व्याख्या की गई है, वह जीवकी अपेक्षा की गई है; इस लिये जिस प्रकार अजीवकका स्वभाव जड़त्व है, उसी प्रकार ‘जीवका स्वभाव चेतनत्व अर्थात् ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्यादिरूप होता है’ अर्थात् जहाँ चेतनत्व होता है, वहाँ उससे ‘अविनाभावी सम्बन्ध’ रखनेवाले दर्शन और ज्ञानगुण अर्थात् देखना व जानना अवश्य ही होता है । यह कथन अभेद नयकी अपेक्षासे है ।
श्रीदशलक्षण धर्मः
यद्यपि जीवका स्वभाव चैतन्य-दर्शन और ज्ञानमयी है तथापि यह अनादि कर्मबन्धके कारण पुद्गलसे मिला हुआ विभाव अर्थात् रागद्वेषरूप परिणमन करता रहता है और इसीसे यह इष्ट-अनिष्ट बुद्धिको प्राप्त होकर कभी क्रोध, कभी मान, कभी माया, कभी लोभ, कभी तृष्णा, कभी आशा, कभी झूठ, कभी स्वच्छन्द इन्द्रिय विषयासक्त रूप प्रवृत्ति, कभी कुशील और कभी कुध्यानरूप प्रवृत्ति करता है । कभी अन्यथा श्रद्धान अर्थात् अतरव श्रद्धान करके वस्तुस्वरूपको अन्यथा ही जानता हुआ अन्यथा प्रवृत्ति करता है । अथवा कभी स्वार्थ व प्रमादवश होकर परपीड़न रूप प्रवृत्ति करता रहता है । सो यदि वह पदार्थके यथार्थ स्वरूपका श्रद्धान व ज्ञान करके तदनुसार ही प्रवृत्ति करे जिसे कि “रत्नत्रय” कहते हैं, तो विभाव (रागद्वेष आदि) होने ही न पावें । तब ही क्रोधादि भावोंके न होनेसे उत्तम-क्षमादि दश प्रकारका धर्म कहा जासकेगा । अर्थात् जब यह जीव स्वभावरूप ही परिणमन करेगा तब न तो इससे षट्कायकी जीवोंके हननरूप बाह्य हिंसा ही होगी, और न रागादि भावरूप अंतरंग हिंसा होगी । इस प्रकार हिंसाके न होनेसे अहिंसा स्वयमेव हो जावेगी ।
इस प्रकार उक्त गाथा में कहे हुए धर्मके भिन्न भिन्न लक्षणोंकी यद्यपि भेदविवक्षासे भिन्नता प्रतीत होती है तथापि अभेद विवक्षासे एकता ही है ।
अब यहाँ उत्तमक्षमादि दश प्रकार धर्मोंका विशेष स्वरूप कहते हैं-
भगवान् उमास्वामीने धर्मका स्वरूप कहा है:-
उत्तम क्षमा ।
“उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयम-
तपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।।”
भावार्थ-उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य, ये दश प्रकार धर्म अर्थात् आत्माके स्वभाव हैं ।
सो ही कार्तिकेयस्वामीने कहा है यथा:-
सो णिय देहप्पयारो खमादि भावेहिं सुक्खसारहिं ।
ते पुण भणिज्जमाणा मुणियव्वा परमसीए ।।
सो धर्म क्षमादि भावरूप दश प्रकार है और सब सुखका देनेवाला है अथवा यही सुखस्वरूप अर्थात् सुखका सार है, और वह आगे जानेवाला दश प्रकार क्षमादि भावरूप धर्म परम भक्ति अर्थात् धर्मानुरागपूर्वक जानने व मनन करने योग्य है ।
(स्वा० का० अ०)
उत्तम क्षमा ।
कोहेण जो ण तप्पदि सुरणर तिरियहिं कीरमाणेवि ।
उवसग्गे वि रुद्धे तस्स खमा णिम्मला होदि ।।
अर्थात्-जो देव, मनुष्य तथा तिर्यंचों द्वारा घोरान्घोर उपसर्ग होनेपर भी क्रोधसे संतप्त नहीं होते हैं उनके निर्मल अर्थात् उत्तम क्षमा होती है ।
(स्वा० का० अ०)
भावार्थ-किसी भी प्रकारके देव, मनुष्य तथा तिर्यंचकृत उपसर्गोंद्वारा होनेवाले दुःखों, बिना संक्लेश भावोंके सह लेनेकी ।
श्रीदशलक्षण धर्म।
शक्तियों को उत्तम क्षमा कहते हैं। अर्थात् जिस शक्तिके कारण जीव किसी भी प्रकारके उपसर्ग व कष्ट (दुःख) आनेपर भी घबराते नहीं, अर्थात् व्याकुल न होने, किन्तु उस दुःख व क्लेशको अपना ही पूर्वोपार्जित कर्मका फल जानकर समभावोंसे सहन करे, सो क्षमानामा आत्माका गुण है। प्रायः समस्त संसारी प्राणी अपने इस उत्तमक्षमा गुणको भूले हुए इसके विपरीत-इंद्रियोंके इष्ट विषयों वा विषयोंकी योग्य सहायक सामग्रीमें और विषयानुरागी स्वमनोनुकूल चलनेवाले मित्रोंमें राग (रति) करते हैं। और इनसे उल्टे इन्द्रियोंको अनिष्ट-सूचक पदार्थ व इच्छाविरुद्ध पुरुषोंसे द्वेष अर्थात् अरति (अप्रिती) करते हैं। ऐसी अवस्थामें इष्टानिष्ठ (रति-अरति) सूचक जो कुछ भाव होते हैं वे ही आत्माके परसंयोगसे उत्पन्न हुए वैभाविक भाव हैं।
तात्पर्य—जब किसी जीवको इष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है तब वह प्रफुल्लित चित्त हुआ अपने आपको परम सुखी मानता है। और समझता है कि इस इष्ट वस्तुका वियोग मुझसे कदाचित् भी कभी नहीं होगा और इसीलिये वह उसमें तल्लीन हो जाता है। परन्तु जब कोई भी चेतन अर्थात् देव मनुष्य या पशु या अचेतन पदार्थ उसकी उस इष्ट वस्तुके वियोगका कारण बन जाता है, तब वह विषधर (सर्प) के समान क्रोधित होकर उसका सर्वस्व नाश करनेका उद्यम करता है। इसीको क्रोधभाव-कषाय कहते हैं।
क्षमा गुण इसी क्रोधभावका उल्टा आत्माका स्वभाव है। जब यह जीव निज भावरूप परिणमन करता है, तब ही इसको उतने ही समय तक, जब तक वह स्वभावोंमें स्थिर रहता है, सुखीः
उत्तम क्षमा।
कह सकते हैं क्योंकि सुख अपने आत्मस्वभावको प्राप्त होनेको कहते हैं, और ज्योंही यह स्वभावसे च्युत होकर परभाव अर्थात् विभाव भावोंको प्राप्त होता है कि यह तुरन्त दुःखी हो जाता है। तात्पर्य उपर्युक्त कथनसे यह निश्चित हो चुका कि क्रोधभाव आत्माका स्वभाव नहीं, किन्तु यह पर पदार्थोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ विभाव भाव है, इसलिये ये भाव जीवको केवल दुःखके देनेवाले हैं।
सुख प्राप्त करना जीवात्माको अभीष्ट है। इसीलिये प्राणी-मात्रको चाहिये कि विषधरके समान भयंकर और प्राणघातक जानकर इस क्रोधको छोड़देवें और उत्तम क्षमाको धारण करके सुखी होवें।
यदि यहां यह शंका उपस्थित हो कि क्षमासे पारलौकिक- (शुक्ति) सुख मिल सकता है, किन्तु संसारी सुख तो नहीं मिलता?
तो उत्तर यह है कि यह क्षमाभाव मुक्ति सुखका तो हेतु है ही किन्तु सांसारिक सुखका भी एक प्रधान हेतु है। देखो, लोकमें कहावत है कि बनिया सबसे मोटा होता है, क्योंकि वह गत् खाता-क्षमा रखता है और क्षत्रिय दुबला होता है, क्योंकि वह सदा बात बातमें क्रोधित होजाता है। कहा भी है—
कोपः करोति पितृमातृसुहृज्जनाना-
मप्यप्रियं स्वसुपकारिजनापकारम्।
देहक्षयं प्रकृतकार्यविनाशनं च,
मत्वेति कोपवशिनो न भवन्ति भव्याः॥
-सुभाषितरत्नसन्दोह।
अर्थ—क्रोधसे मातापितादि स्नेही पुरुषोंका अप्रिय, उपका-
श्रीदशलक्षण धर्म।
रियोंका अपकारी होजाता है, शरीर क्षीण होता है और सांसारिक कार्य भी बिगड़ जाते हैं, ऐसा समझकर भव्य (उत्तम) पुरुष कदापि क्रोधके वश नहीं होते हैं।
क्रोधसे जीवोंको कैसे कैसे दुःख भोगने पड़ते हैं इसीके उदा-हरण स्वरूप श्रेणिकपुराणकी एक कथा कहते हैं कि—एक नगरमें किसी ब्राह्मणकी इकलौती सुन्दर कन्या थी और वह ब्राह्मण राजपु-रोहित था। इसलिये वह छोटी कन्या पिताके साथ कभी कभी राजमहलमें आया जाया करती थी। राजा भी उस कन्यापर रूपवती होनेके कारण बहुत प्रेम करते थे। यद्यपि वह कन्या रूपवती तथा विद्यावती थी, तथापि उसमें क्रोध भी असीम था, इसलिये यदि कोई कभी उसे तू करके बोल देता, तो वह मारे क्रोधके लाल हो जाती थी। प्राणियोंकी रुचि विचित्र है। लोगोंने उसे तू शब्दसे चिढ़ती हुई जानकर और भी चिढ़ाना आरम्भ किया। यहां तक कि उसका नाम ही ‘तूकारी’ पड़ गया। तूकारी लोगोंके केवल तू शब्दपर ही अनेक गालियां देती, मारने दौड़ती और किसी किसीको मार भी बैठती थी तो भी राजाके भयसे उससे कोई कुछ भी नहीं कह सकता था।
जब वह कन्या तरुण हुई, तो उसके क्रोधी स्वभावके कारण कोई उसे नहीं व्याहता था। निदान कोई एक जुआरी-धूतव्यसनी ब्राह्मणने (जो कि जुआमें उधार द्रव्य लेकर हार गया था और जिसे अन्य जुआरी अपना उधार दिया हुआ द्रव्य न पानेके कारण नाकमें - कौड़ी-पहिनाकर और-उल्टा झाड़से टांगकर मार रहे थे, छुट्कारा
उत्तम क्षमा।
पाने की इच्छा से व्याहना स्वीकार कर लिया। सो देखो, वह तुंकारी क्रोधित होने के कारण एक रंक, गुणाहीन, कुरूप, व्यसनी पुरुषसे व्याही गई। पश्चात् किसी एक दिन उसका पति राजसभासे कुछ देरीसे आया कि इसीपरसे क्रोधित होकर वह (तुंकारी) घरसे निकल गई। और चोरोंके हाथ पड़ी और जब उन्होंने उसका शील-भंग करना चाहा, तब उसके शीलके माहात्म्यसे वहाँ वनदेवीने आकर उसकी रक्षा की। फिर जब वह चोरोंसे छूटी तो वनजारोंके हाथ पड़ी। उन्होंने भी उसी प्रकार उसपर कुदृष्टि की है, तब फिर भी उसने वनदेवीकी सहायतासे रक्षा पाई, तब वनजारोंनें शोभित होकर उसे एक छीपे (कपड़े छापनेवाले) को बेच दी। वह छीपा उसका मस्तक आठवें पन्द्रहवें दिन चीरकर लोहू निकालता और उससे कपड़े रंगता। फिर जड़ीबूटियों (हड़मूल) के तेलसे उसका घाव अच्छा कर देता था। इस प्रकार कई महीनों तक कितने ही बार उसका मस्तक चीरा गया जिससे उसे घोर वेदना भोगनी पड़ी। एक दिन भाग्यवश कहीं उसका चाचा वहाँ पहुँच गया और छीपाको कुछ द्रव्य देकर ज्यों त्यों उसे छुड़ा लाया। तबसे तुंकारीने क्रोध करना सर्वथा छोड़ दिया। तात्पर्य-क्रोधके कारण ही तुंकारीको इतने दुःख भोगने पड़े इसलिये क्रोध पिशाचको दूरसे ही छोड़ देना चाहिये, और भी कहा है कि—
“क्षमा हने औरको, अरु क्रोध हने आपको।”
देखो, जो शत्रु बड़े बड़े शत्रुधारी क्षत्रियोंसे भी अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी वश नहीं होते हैं या जो सिंह व्याघ्रादि घातक जीव
श्रीदशलक्षण धर्म।
संसारके प्राणियोंको सर्वदा भयभीत करते रहते हैं, वे सब अनायास ही क्षमावान् महात्मा पुरुषोंके वशमें हो जाते हैं।
क्षमावान् पुरुषका कभी कोई भी शत्रु नहीं होता है। देखो, जब कोई पुरुष किसी अन्य पुरुषपर कुछ क्रोध करता है और वह अन्य पुरुष यदि उसे शान्ति भावसे सहन कर लेता है, तो क्रोध करने-वाला पुरुष स्वयं ही लज्जित हो पश्चात्ताप करने लगता है।
और भी क्रोधसे क्या २ हानि होती है सो सुनिये—क्रोधी पुरुष मणिवाले सर्पवत् गुणयुक्त होनेपर भी प्रशंसा नहीं पाता, क्रोधी पुरुषके व्रत, जप, तप, नियम, उपवास, संयम, दान, पूजा, जप, स्वाध्याय, विद्या आदि समस्त गुण पुण्सहितके भी क्षणभरमें भस्म होजाते हैं। क्रोधसे धैर्य छूट जाता है, बुद्धि नष्ट होजाती है रोग घेर लेते हैं, हठ बढ़ जाता है, शरीर शिथिल होजाता है, धर्म अलग होजाता है, वचन अनर्थ्य प्रवृत्त होने लगते हैं, मुख व नेत्र लाल होजाते हैं, शरीर काँपने लगता है, रोमाँच खड़े होजाते हैं, विचारशक्ति नहीं रहती है, दया चली जाती है, मित्रताके बदले शत्रुता बढ़ जाती है, अपयश फैल जाता है, दरिद्रता घेर लेती है, इत्यादि और भी अनेक प्रकारसे हानि होती है और इसके विपरीत क्षमासे सर्व गुण प्रगट होते हैं, इसीलिये सुखाभिलाषी सत्पुरुष सदैव क्षमाभाव धारण करते हैं।
जब कोई उन्हें दुर्वचन कहता है, अर्थात् उनपर क्रोध करता है, तो वे सोचते हैं कि अमुक पुरुषके क्रोधका कारण क्या है? यदि मैंने उसका कुछ भी अपराध किया है, तब तो मुझपर उसका क्रोध कर दुर्वचन कहना ठीक ही है। मैंने क्यों ऐसा अनर्थ किया, जिससे
उत्तम क्षमा।
परके परिणामोंमें क्रोधभाव उत्पन्न होगया। अब जैसे बने उसे क्षमा ग्रहण कराना उचित है और इसलिये वे अपने दोनोंकी आलोचना करके स्व निन्दा करते हुए उस पुरुषसे नम्र शब्दोंमें क्षमा मांगकर शान्त कर देते हैं। और अपने आपको किंचित् भी क्रोध नहीं आने देते हैं।
किन्तु कदाचित् कोई निष्कारण ही क्रोध कर कुवचन बोले तो सोचते हैं कि इसमें मेरा तो कुछ भी दोष है ही नहीं, यह पुरुष व्यर्थ ही क्रोधसे अपना आत्माको मलिन कर कर्मबन्ध कर रहा है और व्यर्थ ही बिना सोचे मुझको दुर्वचन कह रहा है। यह अज्ञानी है, पागल है। इसीसे यह विवेक बिना व्यर्थ ही अपना समय नष्ट करता हुआ स्ववचन बिगाड़ रहा है सो पागल व अज्ञानीके कहनेका बुरा ही क्या मानना? वह तो अभी केवल मुँहसे ही बकता है, मारता तो है नहीं क्योंकि पागल तो मारता है, बांधता है, काटता है, कपड़े फाड़ देता है, वस्तुओंको तोड़ मरोड़ कर फेंक देता है, और अनेक नहीं करने योग्य कार्य ही करता है, सो अभी तो यह केवल मुँहसे ही दुर्वचन कह रहा है और कुछ तो नहीं करता है, सो ये दुर्वचन मेरे शरीरमें कहीं भी चिपट तो जाते नहीं है, इसलिये इनसे मेरी हानि ही क्या है? कुछ नहीं।
अब यदि उन्हें कोई मारने भी लगे तो सोचते हैं कि वह मुझे केवल मारता ही तो है, कुछ प्राण रहित तो नहीं करता है।
और यदि कोई प्राण हरण भी करने लगे, तो सोचते हैं कि यह प्राण ही तो हरण करता है, कुछ मेरा धर्म जो क्षमा (आत्माका
[१०] श्रीदशलक्षण धर्म।
स्वभाव) है, उसे तो हरण नहीं करता है। अर्थात् यह रद्द मेरे अविनाशी, सच्चिदानन्द अखण्ड स्वरूप चैतन्य आत्माको तो देख ही नहीं सकता, तब पीड़ा किसे देगा? और जिसे यह मारता काटता बांधता व हरण कर रहा है, वह तो मेरा स्वरूप ही नहीं है। वह जड़ अर्थात् अचेतन है, नाशवान् है। किसी न किसी दिन इसका वियोग तो होना ही है सो आज इसीके हाथसे सही। और यदि यह मेरे प्राण हरनेमें ही प्रसन्न है, तो अच्छा ही है। मेरा जो पूर्वकृत कर्मोंका इससे वैर था, सो यह अभी मेरी सावधान अवस्थामें लिये लेता है। यह इसका मुझपर बड़ा उपकार है। जो कदाचित् असाव- धान अवस्थामें प्राण हरण करता, तो संभवतः मेरा कुमरण होकर मैं दुर्गतिमें चला जाता।
इसलिये मेरा कर्तव्य है कि मैं इस पूर्वकृतकर्मत आये हुए उपसर्गोंको शांतिपूर्वक सहन कर समाधिमरण सहित प्राण त्याग करूँ। इसीमें मेरा कल्याण है। इसलिये वे ऐसा विचार करके कि-
खम्मामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्व भूदेसु वैरं मज्झं न केणवि ॥ १ ॥
अर्थात्-मैं सच जीवोंको क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझपर भी क्षमा करो, मेरे सबसे मित्रभाव है, मुझे किसीसे भी वैर-द्वेषभाव नहीं है, उत्तमक्षमा चारण करते हैं-
तात्पर्य-मित्र क्षमा सम जगतमें, नहीं जीवको कोय।
अरु वैरी नहीं क्रोध सम, निश्चय जानो लोय ॥
सो ही पं० यानतरायजीने कहा है-
[११] उत्तम मार्दव।
पीई दुट्ठ अनेक्क, बंध मार बहु विध करे।
धरिये क्षमा विवेक, कोप न कीजे प्रीतमा ॥ १ ॥
उत्तम क्षमा गहेगे भाई, यह भव यद्यपि परम सुखदाई।
गाली सुन मन खेद न आनौ, गुणको औगुण कहे अजानौ ॥
कहे अजानो वस्तु छीने, बंध मार बहुविधि करे।
घरसे निकारे तन विदारे, बेर तो न तहां धरे ॥
तू कर्म पूरव किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीवरा।
अति क्रोध अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य जल ले सीयरा ॥ १ ॥
इति उत्तमक्षमा धर्मार्णव नमः।
उत्तम मार्दव।
उत्तममृदुभावो उत्तम तव परण करण सीलोवि।
अप्पायणं जो ही लदि मद्दव रयण भवे तस्स ॥
अर्थात्-जो उत्तम ज्ञानमें प्रधान और उत्तम तपश्चरण करनेमें समर्थ होनेपर भी अपने आत्माको मानकषायसे मलिन नहीं करते हैं उनके उत्तममार्दव धर्म होता है। (स्व० का० अ०)
भावार्थ-निर्गुणी, दीन, दरिद्री, अशक्त, अज्ञानी, हीन, कुळजातिवाला, कुरूप, चारित्रहीन पुरुष यदि विनय (नम्रता) धारण करते हैं तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि उनको तो दबना ही पड़ता है या वे दबाये जाते ही हैं। सो उनके ऐसा करनेके
[१२] श्रीदशलक्षण धर्म।
कुछ मार्दव गुणके धारी नहीं कहे जाते। क्योंकि उनकी यह विनय व नम्रता स्वाभाविक नहीं है किन्तु दवाब व लाचारीकी है। वे अवसर पाकर पुनः मस्तक उठाकर चलने लगते हैं।
परन्तु जो उत्तम ज्ञानवान्, तपस्वी, ऐश्वर्यवान्, समर्थ, बलवान्, रूपवान्, कुलवान्, उत्तम जातिमान तथा धनवान होते हुये भी इनका मान नहीं करते और यथायोग्य विनय व शिष्टाचाररूप प्रवर्तन करते हैं अर्थात् बड़ों (जो ज्ञान चारित्र दीक्षा पद व वयमें वृद्ध हैं) की विनय भक्ति और छोटोंमें दया व मृदुभाव रखते हैं और अपने आत्माको मानकषायरुपी मलसे मलिन नहीं होने देते हैं वे ही उत्तम मार्दव धर्मधारी कहे जाते हैं। क्योंकि कहा है-
मृदोभावः इति मार्दवः अर्थात्-मृदु (नम्र) भावोंका होना सो ही मार्दव धर्म है। उत्तम अर्थात् सच्चा कि जिसमें दिखावट या बनावट न हो, ऐसा उत्तम मार्दव धर्म आत्माहीका निजस्वभाव है। यह गुण आत्मासे, मान कषायके क्षय, उपशम वा क्षयोपशम होनेसे प्रगट होता है-अर्थात् जबतक किसी जीवको मानकषायका उदय रहता है, तबतक वह प्राणी अपने आपको सर्वोच्च मानता और दूसरोंको तुच्छ गिनता हुआ, सबको अपने आधीन बनानेकी चेष्टा करता रहता है और जो कोई उसे नमस्कार व प्रणाम आदि शिष्ट व्यवहार नहीं करता है वा इससे मध्यस्थ अथवा विपक्षी होकर रहता है, तो वह उसे देख नहीं सकता तथा सदैव उसे नीचा दिखानेका विचार और उपाय किया करता है। यहां तक कि वह अपने बलको न विचारकर अपनेसे सबलका भी सामना कर बैठता है और बंदी हो
उत्तम मार्दव।
[१३
जानेपर भी वह अपनेको नतमस्तक न करके नहमायः होजाता है, इसीको मान कषाय कहते हैं।
इस कषायके उदय होते हुए विचार-शक्ति कम हो जाती है। देखो, लंकाधिपति प्रतिवालुदेव दशानन (रावण) जब सीताको हर लाया और जब मंदोदरी आदि समस्त स्वजनोंने उसे समझाया कि. सीता रामचंद्रको पीछे दे दो और अपने पवित्र कुलमें परस्त्री रूपी मल न लगाकर सुखपूर्वक राज्य करो या वनमें जाकर तपश्चरण करो इसीमें हित है, तब उसने यही उत्तर दिया कि–
“जानि हैं कायर मुझे नृपगण सभी संग्रामसे;
तासे लड़ना है मुझे धुन बांधके अब रामसे।
जीतकर अर्द्ध सिया प्यारी जु उनके प्राणसे;
यश होय मेरा विश्वमें बेशक सियाके दानसे ॥”
अर्थात्—सब क्षत्रियगणोंको विदित होगया है कि रावण सीताको हर लाया है और राम लक्ष्मण युद्धके लिये भी आगये हैं सो यदि मैं सीताको अभी रामके पास पहुंचा दूँ, तो क्षत्रियगण मुझे कायर समझकर हास्य करेंगे, इसलिये मैं रामचंद्र लक्ष्मणको युद्धमें जीतकर, सीता और उसके साथ बहुधा द्रव्य देकर उन्हें विदा करूंगा। किन्तु इस समय तो सीताको न भेजकर केवल युद्ध करना ही अभीष्ट है इत्यादि। और इस प्रकार उस महापुरुषने अन्त तक- पाण जाते हुए भी अपने प्रणको नहीं छोड़ा तथा वीरभूमि (रणक्षेत्र) में ही मृत्युको प्राप्त हुआ।
इसी लिये संसारमें मानी पुरुषोंको लोग रावणकी उपमा देकरः.
[१४
श्रीदशलक्षण धर्म।
कहा करते हैं कि देखो—
“इक लख पूत सवा लख नाती।
ता रावण घर दिया न बाती ॥”
तात्पर्य—गर्व (मान=अहंकार) मत करो, त्रिखंडी रावणका भी मान नहीं रहा है तो औरोंकी क्या बात? इत्यादि।
सो जब इस प्रकारके मान कर्मका क्षय वा उपशम होता है तभी आत्माका मार्दव नामक स्वाभाविक गुण प्रगट होता है।
इस गुणके प्रगट होते हुए जीव अपने सिवाय अन्य समस्त जीवोंको अपने समान समझता है, तब उसे किसीसे रागद्वेष नहीं होता। वह विचारता है कि सब जीव समान हैं, कोई कम-बढ़ -नहीं है। और जब कोई कम-बढ़ है ही नहीं, तब मैं जिनको आधीन करना चाहता हूं, जिनको मैं अपमानित करना चाहता हूं, जिन्हें आज्ञाकारी बनाकर नमस्कार कराना चाहता हूं, वे सब मेरे ही -समान हैं। फिर समान समानमें अधिकारी और अधिकृत भाव कैसा? और तू जो अभी अपने आपको बड़ा समझता है, सो जब नरक 'पशु आदि गतियोंमें, हीन सेवक देवोंमें व नीच गोत्रीय मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ था, तब वह तेरा बड़प्पन कहां चला गया था? तू सैकड़ों -वार क्या असंख्यात वार नरक निगोदमें गया, एक पाईकी भाजी -खरीदनेवालेके यहां रुक्नमें चला गया, मैलेका कीड़ा हुआ, तब 'तेरा बड़प्पन कहां चला गया था?
आज जो तूने यह उत्तम कुल, बल, ऐश्वर्य वा रूपादिक पाये हैं, यह सब तेरे पूर्वापार्जित शुभ कर्मोंका ही फल है सो कर्म अपनी
[१५
उत्तम मार्दव।
स्थिति पूर्ण करके निर्जर जायगा, तब मेरा यह सब विनष्ट हो जायगा। क्योंकि कहा है—
“सदा न फूले केतकी, सदा न श्रावण होय।
सदा न यौवन थिर रहे, सदा जियत नहिं कोय ॥”
अर्थात्—जिन कारणोंसे तू अपने आपको बड़ा मान रहा है, वे सब कारण एक दिन नष्ट होजायेंगे। क्योंकि प्रकृतिका ऐसा ही नियम है। कार्तिकस्वामीने भी कहा है—
“जम्मं मरणेण संगं, संपजई जुव्वणे जरा सहिया।
लच्छी विणाश सहिया, यह सव्वं खणभंगुरं मुणह ॥”
अर्थात्—जन्मके साथ मरण, यौवनके साथ बुढ़ापा और लक्ष्मीके साथ दरिद्रता लगी हुई है। इसलिये ये सब क्षणभंगुर (विनाशावान्) जानने चाहिये।
जब संसारके सर्व ही पदार्थ (पर्याय अपेक्षा) विनाशावान् हैं, तो फिर मान किस बातका? देखो, शरीरका बल और सौन्दर्य बुढ़ापे आते ही नष्ट होजाते हैं, सब इन्द्रियां शिथिल होजाती हैं जिससे वे अपने अपने विषयको ग्रहण कर नहीं सकतीं।
यौवन था तब रूप था, थे ग्राहक सब लोय।
यौवन रत्न गुमों पुन:, बात न पूछे कोय ॥
इसलिये अभी तुम जो रूप सौंदर्य आदिके मदसे अपनी तरुणवास्थामें औरोंका हास्य व निन्दा करते हो सो वे भी तुम्हारी जरावास्था होनेपर तुम्हें हँसेंगे तब तुम्हें बहुत दुःख होगा और तुम्हारा मान गल जायगा, जिससे तुमको क्रोध उत्पन्न होनेसे तुम्हारा रहा.
श्रीदशलक्षण धर्म।
[१६]
आनन्द भी जाता रहेगा और तुम शक्तिहीन होनेसे किसीका कुछ कर भी न सकोगे। प्रायः निर्वैरको क्रोध बहुत होता है क्योंकि वह क्रोधवश किसीको मनोनुकूल दंड नहीं दे सकता है, ताड़न तर्जन नहीं कर सकता है अर्थात् अपना बदला नहीं ले सका तब स्वयं अपने आपका घात कर बैठता है। इसलिये ऐसे रूप सौन्दर्य बला-दिका मान करना क्या यथार्थ है ? कभी नहीं।
यदि कर्मके क्षयोपशमसे कदाचित् तुमको कुछ भी ज्ञानका प्रकाश हुआ है, तो उसका मान मत करो, क्योंकि संसारमें तुमसे भी अधिक अनेकों ज्ञानी भर रहे हैं सो यदि तुम इस तुच्छ क्षयोपशमिक ज्ञानका मान करते हो, तो तुम उस ऊंटके समान हो, जो अपनेको संसारमें सबसे बड़ा मानता है, किंतु जब पहाड़ीकी तलहटीमें पहुंचता है, तो उसका मान भंग होजाता है, उसे हार मानना पड़ती है और भूल स्वीकारना पड़ती है कि मैं सबसे बड़ा नहीं हूँ किंतु मुझसे और भी बड़े बड़े पदार्थ संसारमें हैं।
सो प्रथम तो यह क्षयोपशमिक ज्ञान है इसका घटना बढ़ना भी संभव है। दूसरे यह ज्ञान इन्द्रियाधीन है सो इन्द्रियोंकी शक्ति कम होनेसे स्वयमेव कम होजाता है, इसीसे यह पराधीन और परोक्ष कहाता है। इसलिये जो तुम इसका मान करोगे, तो इन्द्रियोंकी शक्ति कम हो जानेपर ज्ञानमें न्यूनता व विपरीतता होनेसे तुम दूसरोंकी दृष्टिमें हीन जँच जाओगे, हंसीके पात्र बन जाओगे, लोग तुम्हारी युक्तियोंको अयुक्ति ठहरावेंगे और तुम्हारे वचनोंको अप्रमाण समझेंगे, तब तुम्हें घोर दुःख होगा और उस समय तुम मानके
उत्तम मार्दव।
[१७]
वशवर्ती होकर हठात् अपने असत्य वचनोंको भी सत्य सिद्ध करनेकी चेष्टा करोगे। जैसा कि बहुतसे आधुनिक पंडित पूर्विय तथा पश्चिमी विद्याके अभ्यासी स्ववचन पोषणार्थ अनेकों कुयुक्तियां लगाकर ज्यों-ज्यों स्वपक्ष मंडन और परपक्ष खंडन कर डालते हैं जिससे लोकमें असत्य वचनोंकी प्रवृत्ति हो जाती है और अनेकों मिथ्या मत संसारमें चल जाते हैं जिनमें भोले प्राणी फंस अपने आत्माका अकल्याण कर बैठते हैं। इसलिये ऐसे क्षयोपशमिक, पराधीन तथा अल्पज्ञानका मान करना वृथा है।
देखो, जो कोई अल्पज्ञानका मान करता है और दूसरोंको अज्ञानी समझता है, वह सदा अज्ञानी ही बना रहता है, उसके ज्ञानकी वृद्धि कभी नहीं होती है। क्योंकि कहा है—
“ विनय विना विद्या नहीं, विद्या विन नहीं ज्ञान।
ज्ञान विना सुख नहीं मिले, यह निश्चय कर जान।।”
इसलिये ज्ञानवृद्धिमें भी विनय प्रधान है और मान हानिकारक है।
यदि तुम्हें पुण्यवशकर कुछ ऐश्वर्य-अधिकार, पूजा, प्रतिष्ठादि प्राप्त हुआ है तो उसके मदमें आकर स्वच्छंद प्रवर्तना अच्छा नहीं है। क्योंकि अभिमानीके सब लोग निष्कारण ही शत्रु बनजाते हैं, जिसमें फिर अभिमानी अधिकारीका तो कहना ही क्या है ? कारण उसका सम्बन्ध बहुतोंसे रहता है और जिस जिससे सम्बन्ध रहता है वे सभी उसके अभिमानसे पीड़ित (दुःखी) रहते हैं। और अवसर देखते रहते हैं कि कब इससे प्रबल पुरुषका समागम मिलाकर इसका मानभंग करावें और बदला लेवें इत्यादि।
श्रीदशलक्षण धर्म।
[१८]
यहां तक कि कभी कभी बहुतसे मनुष्य अपने अधिकारियोंसे अप्रसन्न हो विपक्ष दलमें मिलकर अपनी २ मनोकामनाएं सिद्ध करते हैं। विशिष्टपणको देखो, कि जब रावणने उसका अपमान किया, तो वह चार अठ्ठारहणी सेना सहित आकर रामचन्द्रसे मिल गया और अपने भाईको मरवा डाला। इसीसे यह कहावत चरितार्थ हुई, कि
“ घरका भेदी लंका ढाए। ”
फिर भी यह ऐश्वर्य सदा नहीं रहेगा, बल क्षीण होते ही क्षीण हो जायगा, तब जिन्हें तुम तुच्छ समझते थे, ऐश्वर्याभिमानी हुए दूसरोंके सुख दुःख हानि लाभको नहीं देखते थे, तथा मनमानी आज्ञा चलाते थे सो वे ही मनुष्य तुमको अधिकार-भ्रष्ट देखकर प्रसन्न होवेंगे, तुमसे घृणा करेंगे और भरसक तुम्हारा अपमान और निंदा करनेमें कसर न करेंगे। देखो, रावणको मरे हजारों वर्ष होगये हैं तब भी प्रातःकाल कोई उसका नामतक नहीं लेता। इसलिये ऐश्वर्याभिमान करना भी वृथा है। कहा है—
“ दिन दश आदर पायके, करले आप बखान।
जद्यलग काक श्राद्ध पक्ष, तद्यलग तुझ सन्मान।।”
तात्पर्य-ऐश्वर्य सदा स्थिर नहीं रहता है। वह भी बल और बुद्धि तथा द्रव्यके आश्रित है, इसलिये उसका अभिमान करना भी व्यर्थ है।
यदि कुल (पितापक्ष) वा जाति (मातापक्ष) का अभिमान करते हो तो भी भूल है। क्योंकि कुल व जाति पूर्व कर्मसे प्राप्त हुए हैं। यदि ऐसा मानो तो वर्तमानमें तुम्हारा इसमें पुरुषार्थ ही क्या है,
उत्तम मार्दव।
जो इनका मान करते हो ? यदि मान करोगे और दूसरोंको तुच्छ गिनोगे, तो नीचगोत्र कर्मका आस्रव करके नीच कुलमें चले जाओगे। तब फिर उच्चपणा कहाँ रहेगा जैसा कि श्रीमद्गुस्वामीने कहा है-
परोसल्लिंदामदिपसंसाओ उच्चगोदणासेणो च नीचगोत्रस्य।
अर्थात्- पराई निंदा और आत्म-प्रशंसा करने तथा अन्यके गुणोंको आच्छादन करने व अवगुणोंको प्रगट करनेसे नीचगोत्र कर्मका आस्रव होता है।
और यदि पुरुषार्थ (उच्च आचार विचार रखने) से कुल व जाति उच्च होती है, ऐसा मानते हो, तो फिर हरकोई अपने उच्च आचार विचारोंसे उच्च बन सकता है। तब मैं ही उच्च हूँ ऐसा मान करना व्यर्थ है और एक बात यह भी है कि उच्च कुल जाति-धारी महान् पुरुष कभी अपने आपको उच्च उच्च कहकर हलके नहीं बनते हैं। जैसा कहा है-
“बड़े बड़ाई ना करे, बड़े न बोले बोल !
हीरा मुँहसे ना कहे, बड़ा हमारा मोल ॥”
लोकमें स्वप्रशंसा करनेवाला मनुष्य नीचातिनीच समझा जाता है और यह ठीक भी है क्योंकि नीच उच्चपना तो मनुष्योंके आचरण व विचारोंसे अपने आप ही प्रगट होजाता है।
मानलो; कोई मनुष्य ब्राह्मण या क्षत्रिय, वैश्यके घरमें उत्पन्न होकर हिंसा करे, झूठ बोले, चोरी करे, व्यभिचार करे, न्यायान्याय रहित हुआ अयात्था, माँसादि पदार्थोंके बढ़ानेमें तृष्णावान् रहे, मद्य माँस भक्षण करे, जुआ खेले, इत्यादि और भी कुसित कार्य करे,
श्रीदशलक्षण धर्म।
अथवा ऐसे ही हीनाचारी, व्यसनी, पापी लोगोंका संग करे, तो क्या फिर भी वह उच्च गोत्री ही रह सकता है ? नहीं कभी नहीं, कभी नहीं। वह नीच, शूद्रोंसे भी महा नीच होजाता है।
और यदि कोई शूद्र, हिंसादि पाप नहीं करता है, झूठ चोरी व्यभिचार आदि पाप व दुर्व्यसन नहीं सेवन करता है, न्यायानुकूल योग्य आजीविका करके संतुष्ट रहता है, मद्यमाँसादि निंद्य अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाता है, सदा भले मनुष्योंकी संगतिमें रहता है, तो क्या वह नीच ही कहा जासकता है ? नहीं, कदापि नहीं। संसारमें जीव मात्रको अपनी उन्नति करनेका स्वाभाविक अधिकार प्राप्त है। उच्च नीचपणा किसीकी पैतृक सम्पत्ति नहीं है। जीव स्वकृत कर्मसे उच्च नीच होसकता है, इसलिये उच्च बननेके लिये उच्चाचरण व उच्च विचार बनाना आवश्यक है, किंतु गर्व करना व्यर्थ है।
अब यदि धनका मद करते हो, तो प्रत्यक्ष देखते हुए भी अंधेके समान हो, क्योंकि तुम जानते हो कि यह लक्ष्मी अति चंचल स्वभाव है। पुण्यकी दासी है। इसे पुरुषविशेषसे प्रेम नहीं है। जैसे वेश्या धनवालेसे प्रेम करके जहाँतक उसके पास धन रहता है, दिखाऊ प्रीति बताती है, संपूर्ण धन हरणकर अपने उसी प्रेमीको छोड़ देती है, वैसे ही लक्ष्मी पुण्य क्षीण होनेपर पुरुषको छोड़ जाती है। वह नीच, उच्च, मूर्ख, विद्वान्, कुरूप, सुरूप, सबल, निर्बल, किसीपर दया नहीं करती, न प्रेम ही रखती है। वह तो केवल पुण्यवानसे ही प्रेम रखती है, जैसे कि वेश्या धनवालेसे। देखो ! किसी समय एक पुरुषने अपनी स्त्रीको लक्ष्मी कहकर संबोधन किया था, उसपर
उत्तम मार्दव।
उस स्त्रीने दुःखित होकर अपने पतिसे निम्न प्रकार प्रश्न किया और जिससे वह पुरुष लज्जित होकर निरुत्तर होगया था। वह पूछती है-
जाऊँ कहूँ न रहूँ घरमें, सहूँ दुःख सुख सबहि कठिनाई।
नीचन ऊँचनके वह (लक्ष्मी) जात है, आवत जातन नेक लजाई ॥
मेरे हु देखत गई कितकके घर मैं न दियो पग पोर पराई।
कारण क्या कुछ लेश पिया, जाते सिंधुसुता (लक्ष्मी) ठहराई ॥
तात्पर्य- ऐसी चंचल लक्ष्मीका मान करना व्यर्थ है।
यदि अपने तप, व्रत, संयम आदिका मान करते हो, तो तुम्हारे जैसा मूर्ख संसारमें और कोई भी नहीं है, क्योंकि तुम आत्मकल्याणके कारण तपको बढ़ानेकी तुच्छ इच्छासे नष्ट कर देते हो अर्थात् जिस जप, व्रत, तप, संयमसे स्वर्ग मोक्ष प्राप्त होता उसे केवल मान बड़ाईमें ही बेच देते हो और जब निरंतर तुम्हें अपने तप संयमके मानका ही ध्यान बना रहता है तब तुम तप संयम व आत्मध्यान कब करते हो या करोगे ? जब तप ही नहीं करते हो तो केवल कपट भेष बनाकर लोगोंको और अपनी आत्माको ठगते हो। ऐसा तप करना व्यर्थ है, जिसमें मान पुष्ट किया जाय। क्योंकि तप तो इच्छाओंके रोकनेको कहते हैं जैसा कि कहा है- “इच्छा निरोधस्तपः” और तुम तो निरंतर मान पानेकी इच्छा में ही मग्न रहते हो इसलिये तपका मद करना भी व्यर्थ है। इसप्रकार विचार कर उत्तम पुरुष मान कषायको छोड़कर अपना स्वाभाविक मार्दव गुण प्रगट करते हैं।
इस मार्दव गुणसे आत्मिक-स्वाभाविक सुख तो मिलता ही है, किन्तु लौकिक सुख भी मिलता है। प्रगटमें नम्र-विनयीका ही
श्रीदशलक्षण धर्म।
शत्रु नहीं, और मानीका कोई मित्र नहीं होता है। देखो, आँधीके झकोरोंसे बड़े बड़े मोटे और कठोर वृक्ष मूल सहित उखड़ जाते हैं परन्तु नम्र होनेसे पतला भी बैंतका वृक्ष आँधीसे कभी नहीं उखड़ता किन्तु वह अपने विनय गुणसे वैसा ही बना रहता है। कहा है—
कोई न मीत कठोरको, मृदुको कोई न अरातू।
इसलिये अन्तरङ्ग मान कषायको त्याग करना और व्यवहारसे अपनेसे कुल, वय, पद, विद्या, गुण, चातुर्य, तप, ज्ञान, चारित्र आदिमें जो बड़े हैं उनका यथायोग्य विनय शुश्रूषा (सत्कार) करना तथा छोटोंमें दया प्रेम व नम्रता रखना, और अविनयी व विरोधी पुरुषोंमें माध्यस्थभाव रखना, यही मार्दव गुण है। कभी अपने मुंहसे स्वप्रशंसा नहीं करना और न कभी परनिंदारूप निंद्य वाक्य कहना यही विनयका लक्षण है। अपनेसे बड़ोंको नमस्कार करना, उच्चासन देना, समक्ष होकर नहीं बोलना, उनकी आज्ञा मन, वचन, कायसे यथशक्ति पालन करना, वे चलें तो उनके पीछे पीछे चलना, उनके गुणोंकी प्रशंसा करना, उनके उत्तम गुणोंका अनुकरण करना, उनके द्वारा अपने ऊपर हुए उपकारोंको नहीं भूलना, इत्यादि विनय है। प्रसंगवश यह भी लिख देना उचित है कि किसका किसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये? यथा—
नमोऽस्तु गुरवे कुर्याद्दानं ब्रह्मचारिणे।
इच्छाकारं सधर्मिभ्यो वंदामीत्यादिशु ॥ १-॥
आद्धाः परस्परं कुर्य्युः इच्छाकारं स्वभावतः।
जुहारइति लोकेस्मिन्मंस्कारं स्वसज्जनः ॥ २ ॥
उत्तम मार्दव।
[ २३
योगायोग्यनरे दृष्ट्वा कुर्व्वीत विनयादिकं।
विधातपोर्गुणैः श्रेष्ठो लघुश्चापि गुरुर्मतः ॥ ३ ॥
श्रावकानां मुनींद्रो हि धर्मवृद्धिं ददत्यहो।
अन्येषो प्रकृतानां च धर्मलाभ मतः परै ॥ ४ ॥
आर्यिका तद्देववात्र पुण्यवृद्धिं च वर्णिणः।
दर्शनविशुद्धिं प्रायः क्वचिदेतन्मतान्तरम् ॥ ५ ॥
अर्थात्—दिगम्बर निर्ग्रन्थ साधुओंको अष्टांग नमस्कार और आर्यिका तथा ब्रह्मचारिणीजनोंको दोनों हाथ मस्तकसे लगाकर शिरोनति करता हुआ वंदना करे। तथा साधर्मी, साधर्मी परस्पर इच्छामि (इच्छाकार) करें। श्रावकजन भी परस्पर जुहारु करें अथवा अपनेसे बड़ोंको प्रणामादि करें और छोटोंको आशीर्वाद देवें। इस प्रकार यथायोग्य व्यवहार करें। मुनि तथा आर्यिकाजी श्रावकोंको धर्मशुद्धि और अजैन (श्रावकेतर) जनोंको धर्मलाभ कहें। इसी प्रकार ब्रह्मचारी श्रावकोंको पुण्यवृद्धि अथवा दर्शनविशुद्धि और जैनेतर जनोंको पापै क्षयोऽस्तु आदि कहकर आशीर्वाद देवें। यही शिष्टाचार व्यवहार है। इसलिये सब मदोंको छोड़ स्वाभाविक और उभय लौकिक सुख देनेवाले ऐसे उत्तम मार्दव धर्मको धारण करना चाहिये इसीमें हित है। सो ही कहा है—
मान महा विपरूप, करे नीच गति जगत्में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सदा ॥ १-॥
उत्तममार्दव गुण मणि माना, मान करनका कौन ठिकाना।
बसो निगोदमाहिसे आया, दूसरी रुंकन भाग विकाया ॥
[ २४ ]
श्रीदशलक्षण धर्म।
रुंकन विकाया कर्मवशते, देव इक इन्द्री भया।
उत्तम सुवा चण्डाल हुवा, भूप कीड़ेमें गया ॥
जीतव्य यौवन धन गुमान, कहा करे जल बुदबुदा।
कर विनय चहसुत बड़े जनकी, ज्ञानको पावे सुधा ॥ २ ॥
उत्तम आर्जव
जो चिंतेउ ण वंकं कुणदिण्ण वंकं ण जंपए वंकं।
ण य गोवदिणियदोसं अजव धम्मो हवे तस्स ॥
अर्थात्—जो न तो वक्र (कुटिल मायाचाररूप) चिंतन करता है, न वक्र कार्य करता है और न वक्रता लिये वचन ही बोलता है, तथा अपने दोषोंको नहीं छिपाता है, उसीके उत्तम आर्जव धर्म कहा जाता है। तात्पर्य—मन, वचन, काय और वचनोंमें जिसके सरलता हो अर्थात् जो मनमें ही वही करे और वही कहे तथा अपने दोषोंको न छिपाकर स्वीकार करे, वही आर्जवधर्मी महापुरुष कहा जाता है और उसके दोष दूर होकर वह शीघ्र ही एक पवित्रात्मा होजाता है। सो ही आगे आर्जव धर्मका भाव कहते हैं। यथा—
ऋजोर्भावः इति आर्जवः अर्थात्—सरल भावको आर्जव भाव कहते हैं। उत्तम विशेषण है, अर्थात् जिन भावोंमें किञ्चित् भी छल-कपट, दिखावट, बनावट व मायाचारी न हो वे ही भाव आर्जव भाव कहलाते हैं। ये भाव आत्माके निजस्वभाव ही हैं जो कि माया कषायके क्षय व उपशम होनेसे प्रकट होते हैं।
उत्तम आर्जव ।
जिस समय जीवके मन, वचन और काय ये तीनों योग वक्ता-मायाचार रहित सरल होते हैं, अर्थात् जो कुछ मनमें विचार हो उसे ही वचनसे प्रकाश करना और वचनसे जो कुछ प्रकाश किया हो, वही कायसे करना इसीको आर्जव नाम आत्माका स्वभाव कहते हैं।
किन्तु जिस समय यह जीव निज आत्मबुद्धि अर्थात् अपने आत्मामें ही आत्म भावनासे रहित हुआ, आत्मबुद्धि परपदार्थोंमें स्वत्व भाव धारण कर प्रवर्त्तता है, तभी यह अपने इच्छित मनोनुकूल विषयों वा कषायोंकी पुष्टयर्थ नाना प्रकारकी कुचेष्टाएँ करता है। अर्थात् मनमें कुछ और विचारता है, वचनसे कुछ और प्रगट करता है तथा कायसे कुछ अन्य ही आचरण करता है। तब इसके अंतरंग भावोंका भेद, सिवाय केवलज्ञानी व मनःपर्ययज्ञानीके और कोई भी नहीं जान सकता। इसे ही अर्थात् ऐसे ही भावोंको माया कषाय कहते हैं।
यद्यपि मायाचारी पुरुष प्रायः छद्मसे सिद्ध भाषण करता है, सौम्य आकृति बनाता है, अपने आचरणोंसे लोगोंको विश्वास उत्पन्न कराता है और अपने प्रयोजन साधनार्थ विपक्षीकी भी ही हीं भी मिला देता है परन्तु अवसर पाते ही वह अपने मन जैसी कर लेता है।
इसका स्वभाव ठीक बगुलेके सरीखा होता है—अर्थात् जैसे बगुला पानीमें एक पाँवमें खड़ा होकर मांसादि लगाता है और मछली ज्यों ही उसके पास उसे साधु समझकर आती है त्यों ही वह छद्मवेषी झटसे उन्हें पकड़ कर भक्षण कर लेता है। कहावत है कि—
उज्वल बुगि गरीच गति, एक टाँग सुख ध्यान।
देखत लागत भगवतवत, निपट कपटकी खान ॥ १ ॥
श्रीदशलक्षण धर्म ।
मायाचारी कभी सत्य तो बोलता ही नहीं है और यदि कदाचित् कभी वह कुछ सत्य भी कहे, तो उसका कहना असत्य ही समझना चाहिये और कदापि उसका विश्वास नहीं करना चाहिये और प्रायः कोई करते भी नहीं हैं।
यद्यपि वह अपने दोषोंको पूर्णरूपसे ढँकता है तो भी उसका कपटभेव अंतमें प्रकट हो ही जाता है और कपटभेव प्रगट होते ही फिर कोई उसका विश्वास नहीं करते हैं।
यद्यपि कुछ समय तक लोग बिना जाने उसके फंदेमें भले ही फँसे रहें और वह भी अपने आपको कृतकृत्य समझे, पर जैसे कि मिट्टीसे अच्छादित पूँदीसे गानीके भीतर मिट्टी गलकर फूटते ही ऊपर आ जाती है, वैसे ही कपट भेव भी बहुत समय तक नहीं छिप सकता।
मायाचारीका विश्वास लोकमेंसे उठ जानेपर उसका समस्त व्यवहार बंद होजाता है, जिससे उसे अत्यन्त दुःखी होना पड़ता है।
मायाचारी मनुष्यको कभी भी शांति नहीं मिलती, वह सदा ही उपेक्षदुगमें लगा रहता है। किसीका बुरा करना, किसीको लड़ाना, किसीकी चुगली खाना, किसीका अपमान व पराजय कराना इत्यादि। 'तालमैथे—उसे कभी सुख-नींद नहीं आती। वह निरंतर चिन्ताग्रस्त रहता है और चिन्तावानको सुख कहाँ?
मायाचारी आप तो दुःखी रहता ही है किन्तु अन्यको दुःखी करनेमें भी हर्ष मानता है। वास्तवमें ऐसे लोग शत्रुसे भी भयंकर होते हैं क्योंकि शत्रु तो प्रगट रूपसे घाव करके मारता है, इसलिये उससे तो हम सदा शंकित अर्थात् सावधान रहनेके कारण किसी
उत्तम आर्जव ।
प्रकारसे भी अपनी रक्षा कर सकते हैं परन्तु इन मीठे बोलनेवाले अस्तीनके सांपों सरीखे मायाचारियोंसे बचना तो बहुत कठिन तो क्या असंभवसा ही है। कहा है—
‘अरकसिया (करोत) के मुख नहीं, नहीं गाँचके दंत।
जे नर धीरे बोलते, इनसे बचिये संत’ ॥ १ ॥
क्योंकि ये लोग सदा मीठी मीठी बातोंमें अंतरंगका हाल जानकर जाहिर प्रगट कर देते हैं। ये कभी किसीसे मित्रता तो करते ही नहीं हैं। ये लोग तो जहां अपना मतलब होते देखते हैं कि झटसे वहीं जा मिलते हैं। इनके वचनकी स्थिरता तो होती ही नहीं है। झूठ बोलनेका तो इनका स्वभाव ही पड़ जाता है अथवा झूठ बोलनेमें ये पाप ही नहीं समझते हैं, इसलिये सदा ऐसे लोगोंसे बचते रहना ही ठीक है।
ये लोग अपने प्रयोजन साधनार्थ व कौतुकवश दूसरोंको घात पहुँचानेकी चेष्टा करते रहते हैं, परन्तु औरोंका घात तो उनके पूर्वकृत कर्मानुसार होने अथवा नहीं भी हो, किन्तु मायाचारीका घात उसके परिणामोंसे तो सदा हुआ ही करता है। जैसे दर्पणमें मुँह देखनेपर जैसा टेढ़ा सीधा करके देखो वैसा ही दिखने लगता है; ठीक, यही हाल मायाचारियोंका होता है। जो औरोंके हिये कुआ खोदते हैं, उसमें वे आप ही अनायास गिर जाते हैं। कहा है—“जो कोई कूप-खने औरनको, ताको खाई तयार।” सत्य है ओसका मोती कब-तक स्थिर रहता है?
एक समय एक कौआ मोरके पंख पहन कर अपने आपको
श्रीदशलक्षण धर्म।
२८
मोर प्रकट करता हुआ स्वजातीय कोओंके पास जा उन्हें भला बुरा कहने लगा। वे बेचारे मूर्तीतापन्न चुप होरहे और अपने संघसे उसे त्याग कर दिया। पश्चात् वह मोरोंके झुंडमें जाके अकड़ कर फिरने लगा, इससे मोरोंनें भी इसे तुरंत छलभेपी काग समझकर खूब ही चोंचोंसे इसकी खबर ली। और सब नकली पर नोंच डाले। तब वह मारसे व्याकुल हुआ, पीछे स्वजातियोंके पास आया और पूर्ववत् उनमें मिलना चाहा परन्तु उन्होंने भी इसकी मोरोंके समान खूब खबर ली और बाहर निकाल दिया। तब बेचारा महा दुःखी हो जन्म पर्यंत जातिच्युत हुआ अकेला ही वनमें मृत्युकी प्रतीक्षा करता मर गया।
तात्पर्य-कपट-जाल कभी न कभी टूटता ही है और उसके टूटनेपर कपटीकी बहुत ही दुर्दशा होती है।
सो जब इसी लोकमें कपटी मारन ताड़नादि अनेक वेदनाएँ सहता है तो परभवका कहना ही क्या है? भगवान् उमास्वामीने कहा है- ‘माया तैरयग्गोनस्य’ अर्थात् मायाभावोंसे तिर्यग्गतिका आस्रव और बंध होता है। इससे यहीं पर यह जीव अनेक प्रकार छेदन, भेदन, वध, बंधन, भूख प्यास आदि दुःख भोगता है। तथा शीत, उष्ण, छेदन, भेदन, डंस, मच्छर, भार-वहन, मारन, ताड़नादि और भी अनेकों दुःख सहता है।
यदि यह सवल हुआ तो औरोंको मारकर खाने लगा और कभी शिकारियों द्वारा आप भी मारा गया। यदि यह निर्बल हुआ तो दूसरे जीव इसे मारकर खा गये। यदि पालतू पशुओंमें हुआ तो सवारियों
उत्तम आर्जव।
२९
जोता गया, युद्धमें पेश गया, नाक, मुँह, जिह्वा, लिंगादि छेदन किये गये, भार लदा गया, शक्तिहीन होनेपर कषायीके हाथ बेचा गया, देवी देवताओंकी बलि दिया गया, यज्ञमें होमा गया, यह तो पंचेन्द्री समनस्ककी कथा हुई तब चौ-इन्द्री, तीन-इन्द्री, दो-इन्द्री, एक-इन्द्रीका तो कहना ही क्या है? जहाँ बड़े उपकारी जीवों ही की दया नहीं देखी जाती, वहाँ दीन क्षुद्र जीवोंकी तो कौन रक्षा करता है? हाय! ऐसे पशुगतिके दुःख मायाचारीको भोगने पड़ते हैं?
ये ही मायाभाव जीवको अनन्त संसारमें भ्रमण कराते हैं, इसलिये ये कुभाव सदैव त्यागने योग्य है। उत्तम पुरुष ऐसे कुभावोंको त्याग कर स्वभावों-आर्जव भावोंको प्रगट करते हैं और मन, वचन, कायकी सरलता करके अनादि कर्म बन्धनको काटकर अविनाशी सुखोंको प्राप्त होते हैं। इसलिये उत्तम पुरुषोंको सदा स्वपर हितकारी उत्तम आर्जव धर्मको धारण करना चाहिये। सो ही कहा है-
कपट न कीजे कोय, चोरनके पुर नहिं बसे।
सरल स्वभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा।।
उत्तम आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी।
मनमें होय सो वचन उच्चरिये, बचन होय सो तनसे करिये।।
करिये सरल तिहुँयोग अपने, देख निर्मल आरसी।
मुख करे जैसा लखै तैसा, कपट प्रीति अंगारसी।।
नहिं लहै लक्ष्मी अधिक छल कर, कर्मबंध विशेषतः।
भय त्याग दृष विलाष पीवे, आपदा नहिं देखता।। ३।।
श्रीदशलक्षण धर्म।
३०
उत्तम सत्य।
विषयवयणमेव भासिदं पालेदुं असक्क माणो वि।
अत्थगरेण वि अलियं ण वददि जो सव्ववाई सो।।
अर्थात्-जो सदैव जिन श्रुतानुसार ही वचन बोलते हैं और यदि वे तीव्र कर्मके उदयसे कदाचित् उनके अनुसार चल भी नहीं सकते, तो भी कभी असत्य भाषण नहीं करते, न कभी व्यवहारमें (अथवा हास्य कौतुक छलकर भी) झूठ बोलते हैं वे सत्यवादी कहे जाते हैं। ऐसे पुरुषोंके वचन सदैव स्वपर कल्याणके करनेवाले होते हैं।
(स्वा० का० अ०) कहा है कि-
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3081.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है