पंचदेव विधान कार्यिका जैन विजय गैलन
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | निवेदन |
| 2 | श्रीवीतरागाय नमः |
| 3 | श्रीदशलक्षण धर्मः |
| 4 | उत्तम क्षमा । |
| 5 | उत्तम मार्दव। |
| 6 | उत्तम आर्जव |
| 7 | उत्तम सत्य। |
निवेदन
जैन धर्ममें धर्मके दश लक्षण बताये गये है अतः उसको दश लक्षण धर्म कहते हैं और इसीपर धर्मकी इमारत खड़ी है। इसका इतना महत्व है कि इसीके नामसे जैनोंका महान् पर्व दश लक्षण पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
जैन भाषा शास्त्रोंमें इन दश धर्मोंका स्वरूप सामान्यरूपसे दर्शाया गया है लेकिन सर्वसाधारणके समझनेमें आजावें उस प्रकारसे इनका स्वरूप दर्शानेवाले ग्रन्थकी बड़ी आवश्यकता थी जिसको हमारे निवेदनसे स्व० धर्मरत्न पं० दीपचन्दजी वर्णी (नरसिंहपुर सी. पी. निवासी) ने २८ वर्ष हुए पूर्ण कर दी थी। तब हमने वीर सं० २४४० में उसकी २००० प्रतियां छुपाकर वितरित की थीं, फिर इसकी दूसरी आवृत्ति वीर सं० २४४३ में प्रकट की और तीसरी आवृत्ति वीर सं० २४५३ में प्रकट की थीं। वह भी खतम हो जानेसे इसकी यह चतुर्थ आवृत्ति प्रकट की जाती है।
इस आवृत्तिमें इसवार कई विशेषताएँ की गई है जैसे कि मुखपृष्ठपर खास खर्च करके ‘दशधर्म दीपक’ का आकर्षक व मावपूर्ण चित्र बनाकर रखा है तथा भीतर दश लक्षण व्रत कथाके साथ २ स्व० ब्र० शीतलप्रसादजी कृत दशधर्म भजन और आचार्यश्री सुमतिसागरजी कृत दश लक्षण व्रत उद्यापन भी जोड़
दिया है जिससे दश लक्षण व्रतके १० उपवास करनेवालोंको दश-लक्षण व्रत-कथा पढ़नेमें तथा उद्यापन करनेमें सुभीता होगा। इस व्रतके उद्यापनमें १०० कोठेका साथिया निकालना पड़ता है तथा सब प्रकारके दश २ उपकरण मंदिरमें चढ़ानेका रिवाज है वह यथाशक्ति करना चाहिये तथा दश लक्षण व्रत करनेवालोंको खास करके शास्त्रदानमें अच्छी रकम निकालना चाहिये और इस पुस्तककी प्रभावना तो अवश्य २ करनी चाहिये। अब कांच व धातुके बर्तनोंकी प्रभावनाकी आवश्यकता नहीं है, यह ख्याल रखना चाहिये।
दूसरी आवश्यक सूचना यह है कि इस ग्रन्थका आद्यंत मननपूर्वक वारंवार स्वाध्याय करते रहें और दशलाक्षणिक व्रतके दिनोंमें नित्य एकर धर्मका पाठ सबको सुनाना चाहिये व उसपर विशेष उपदेश देते रहना चाहिये। यदि हम इन दश धर्मोंका अच्छी तरहसे पालन कर सकेंगे तो सब कुछ कर सकेंगे ऐसा निःसंशय कहा जा सकता है।
आशा है इस चतुर्थावृत्तिका भी शीघ्र ही प्रचार हो जायगा।
सूरत
वीर सं० २४६८
चैत्र सुदी १२
ता० २७-३-४२
निवेदक-
मूलचन्द किसनदास कापडिया।
-प्रकाशक।
श्रीवीतरागाय नमः
श्रीदशलक्षण धर्मः
वत्थु सहावो धम्मो, खमादि भावो य दसविहो धम्मो ।
रयणत्तयं च धम्मो. जीवाणं -स्वामिकातिकेयानुप्रेक्षा ।
अर्थ-वस्तुका जो स्वभाव है वह धर्म है, अर्थात् जैसे जीव दर्शनज्ञानादि उपयोग स्वभाव तथा चेतनस्वभाव अथवा पुद्गल अचेतनत्व बा स्पर्श, रस, गंध, वर्णत्व आदि स्वभाव होता है, उत्तम-क्षमादि दश प्रकारके भाव भी धर्म है और रत्नत्रय रूप भी धर्म होता है तथा अहिंसा लक्षण अर्थात् जीवोंकी रक्षा करना भी धर्म है ।
भावार्थ-यद्यपि उक्त गाथा में वस्तुके स्वभावको, उत्तम क्षमादि दश लक्षणोंको, रत्नत्रयको और अहिंसाको, इस प्रकार धर्म चार प्रकारसे कहा है तथापि निश्चयसे विचार करनेपर केवल वस्तुस्वभावमें ही अन्य तीनों प्रकार गर्भित हो सकते हैं । कारण यहाँपर जो धर्म शब्दकी व्याख्या की गई है, वह जीवकी अपेक्षा की गई है; इस लिये जिस प्रकार अजीवकका स्वभाव जड़त्व है, उसी प्रकार ‘जीवका स्वभाव चेतनत्व अर्थात् ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्यादिरूप होता है’ अर्थात् जहाँ चेतनत्व होता है, वहाँ उससे ‘अविनाभावी सम्बन्ध’ रखनेवाले दर्शन और ज्ञानगुण अर्थात् देखना व जानना अवश्य ही होता है । यह कथन अभेद नयकी अपेक्षासे है ।
यद्यपि जीवका स्वभाव चैतन्य-दर्शन और ज्ञानमयी है तथापि यह अनादि कर्मबन्धके कारण पुद्गलसे मिला हुआ विभाव अर्थात् रागद्वेषरूप परिणमन करता रहता है और इसीसे यह इष्ट-अनिष्ट बुद्धिको प्राप्त होकर कभी क्रोध, कभी मान, कभी माया, कभी लोभ, कभी तृष्णा, कभी आशा, कभी झूठ, कभी स्वच्छन्द इन्द्रिय विषयासक्त रूप प्रवृत्ति, कभी कुशील और कभी कुध्यानरूप प्रवृत्ति करता है । कभी अन्यथा श्रद्धान अर्थात् अतरव श्रद्धान करके वस्तुस्वरूपको अन्यथा ही जानता हुआ अन्यथा प्रवृत्ति करता है । अथवा कभी स्वार्थ व प्रमादवश होकर परपीड़न रूप प्रवृत्ति करता रहता है । सो यदि वह पदार्थके यथार्थ स्वरूपका श्रद्धान व ज्ञान करके तदनुसार ही प्रवृत्ति करे जिसे कि “रत्नत्रय” कहते हैं, तो विभाव (रागद्वेष आदि) होने ही न पावें । तब ही क्रोधादि भावोंके न होनेसे उत्तम-क्षमादि दश प्रकारका धर्म कहा जासकेगा । अर्थात् जब यह जीव स्वभावरूप ही परिणमन करेगा तब न तो इससे षट्कायकी जीवोंके हननरूप बाह्य हिंसा ही होगी, और न रागादि भावरूप अंतरंग हिंसा होगी । इस प्रकार हिंसाके न होनेसे अहिंसा स्वयमेव हो जावेगी ।
इस प्रकार उक्त गाथा में कहे हुए धर्मके भिन्न भिन्न लक्षणोंकी यद्यपि भेदविवक्षासे भिन्नता प्रतीत होती है तथापि अभेद विवक्षासे एकता ही है ।
अब यहाँ उत्तमक्षमादि दश प्रकार धर्मोंका विशेष स्वरूप कहते हैं-
भगवान् उमास्वामीने धर्मका स्वरूप कहा है:-
“उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयम-
तपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।।”
भावार्थ-उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य, ये दश प्रकार धर्म अर्थात् आत्माके स्वभाव हैं ।
सो ही कार्तिकेयस्वामीने कहा है यथा:-
सो णिय देहप्पयारो खमादि भावेहिं सुक्खसारहिं ।
ते पुण भणिज्जमाणा मुणियव्वा परमसीए ।।
सो धर्म क्षमादि भावरूप दश प्रकार है और सब सुखका देनेवाला है अथवा यही सुखस्वरूप अर्थात् सुखका सार है, और वह आगे जानेवाला दश प्रकार क्षमादि भावरूप धर्म परम भक्ति अर्थात् धर्मानुरागपूर्वक जानने व मनन करने योग्य है ।
(स्वा० का० अ०)
उत्तम क्षमा ।
कोहेण जो ण तप्पदि सुरणर तिरियहिं कीरमाणेवि ।
उवसग्गे वि रुद्धे तस्स खमा णिम्मला होदि ।।
अर्थात्-जो देव, मनुष्य तथा तिर्यंचों द्वारा घोरान्घोर उपसर्ग होनेपर भी क्रोधसे संतप्त नहीं होते हैं उनके निर्मल अर्थात् उत्तम क्षमा होती है ।
(स्वा० का० अ०)
भावार्थ-किसी भी प्रकारके देव, मनुष्य तथा तिर्यंचकृत उपसर्गोंद्वारा होनेवाले दुःखों, बिना संक्लेश भावोंके सह लेनेकी ।
शक्तियों को उत्तम क्षमा कहते हैं। अर्थात् जिस शक्तिके कारण जीव किसी भी प्रकारके उपसर्ग व कष्ट (दुःख) आनेपर भी घबराते नहीं, अर्थात् व्याकुल न होने, किन्तु उस दुःख व क्लेशको अपना ही पूर्वोपार्जित कर्मका फल जानकर समभावोंसे सहन करे, सो क्षमानामा आत्माका गुण है। प्रायः समस्त संसारी प्राणी अपने इस उत्तमक्षमा गुणको भूले हुए इसके विपरीत-इन्द्रियोंके इष्ट विषयों वा विषयोंकी योग्य सहायक सामग्रीमें और विषयानुरागी स्वमनोनुकूल चलनेवाले मित्रोंमें राग (रति) करते हैं। और इनसे उल्टे इन्द्रियोंको अनिष्ट-सूचक पदार्थ व इच्छाविरुद्ध पुरुषोंसे द्वेष अर्थात् अरति (अप्रिती) करते हैं। ऐसी अवस्थामें इष्टानिष्ठ (रति-अरति) सूचक जो कुछ भाव होते हैं वे ही आत्माके परसंयोगसे उत्पन्न हुए वैभाविक भाव हैं।
तात्पर्य—जब किसी जीवको इष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है तब वह प्रफुल्लित चित्त हुआ अपने आपको परम सुखी मानता है। और समझता है कि इस इष्ट वस्तुका वियोग मुझसे कदाचित् भी कभी नहीं होगा और इसीलिये वह उसमें तल्लीन हो जाता है। परन्तु जब कोई भी चेतन अर्थात् देव मनुष्य या पशु या अचेतन पदार्थ उसकी उस इष्ट वस्तुके वियोगका कारण बन जाता है, तब वह विषधर (सर्प) के समान क्रोधित होकर उसका सर्वस्व नाश करनेका उद्यम करता है। इसीको क्रोधभाव-कषाय कहते हैं।
क्षमा गुण इसी क्रोधभावका उल्टा आत्माका स्वभाव है। जब यह जीव निज भावरूप परिणमन करता है, तब ही इसको उतने ही समय तक, जब तक वह स्वभावोंमें स्थिर रहता है, सुखीः
कह सकते हैं क्योंकि सुख अपने आत्मस्वभावको प्राप्त होनेको कहते हैं, और ज्योंही यह स्वभावसे च्युत होकर परभाव अर्थात् विभाव भावोंको प्राप्त होता है कि यह तुरन्त दुःखी हो जाता है। तात्पर्य उपर्युक्त कथनसे यह निश्चित हो चुका कि क्रोधभाव आत्माका स्वभाव नहीं, किन्तु यह पर पदार्थोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ विभाव भाव है, इसलिये ये भाव जीवको केवल दुःखके देनेवाले हैं।
सुख प्राप्त करना जीवात्माको अभीष्ट है। इसीलिये प्राणी-मात्रको चाहिये कि विषधरके समान भयंकर और प्राणघातक जानकर इस क्रोधको छोड़देवें और उत्तम क्षमाको धारण करके सुखी होवें।
यदि यहां यह शंका उपस्थित हो कि क्षमासे पारलौकिक- (शुक्ति) सुख मिल सकता है, किन्तु संसारी सुख तो नहीं मिलता?
तो उत्तर यह है कि यह क्षमाभाव मुक्ति सुखका तो हेतु है ही किन्तु सांसारिक सुखका भी एक प्रधान हेतु है। देखो, लोकमें कहावत है कि बनिया सबसे मोटा होता है, क्योंकि वह गत् खाता-क्षमा रखता है और क्षत्रिय दुबला होता है, क्योंकि वह सदा बात बातमें क्रोधित होजाता है। कहा भी है—
कोपः करोति पितृमातृसुहृज्जनाना-
मप्यप्रियं स्वसुपकारिजनापकारम्।
देहक्षयं प्रकृतकार्यविनाशनं च,
मत्वेति कोपवशिनो न भवन्ति भव्याः॥
-सुभाषितरत्नसन्दोह।
अर्थ—क्रोधसे मातापितादि स्नेही पुरुषोंका अप्रिय, उपका-
रियोंका अपकारी होजाता है, शरीर क्षीण होता है और सांसारिक कार्य भी बिगड़ जाते हैं, ऐसा समझकर भव्य (उत्तम) पुरुष कदापि क्रोधके वश नहीं होते हैं।
क्रोधसे जीवोंको कैसे कैसे दुःख भोगने पड़ते हैं इसीके उदा-हरण स्वरूप श्रेणिकपुराणकी एक कथा कहते हैं कि—एक नगरमें किसी ब्राह्मणकी इकलौती सुन्दर कन्या थी और वह ब्राह्मण राजपु-रोहित था। इसलिये वह छोटी कन्या पिताके साथ कभी कभी राजमहलमें आया जाया करती थी। राजा भी उस कन्यापर रूपवती होनेके कारण बहुत प्रेम करते थे। यद्यपि वह कन्या रूपवती तथा विद्यावती थी, तथापि उसमें क्रोध भी असीम था, इसलिये यदि कोई कभी उसे तू करके बोल देता, तो वह मारे क्रोधके लाल हो जाती थी। प्राणियोंकी रुचि विचित्र है। लोगोंने उसे तू शब्दसे चिढ़ती हुई जानकर और भी चिढ़ाना आरम्भ किया। यहां तक कि उसका नाम ही ‘तूकारी’ पड़ गया। तूकारी लोगोंके केवल तू शब्दपर ही अनेक गालियां देती, मारने दौड़ती और किसी किसीको मार भी बैठती थी तो भी राजाके भयसे उससे कोई कुछ भी नहीं कह सकता था।
जब वह कन्या तरुण हुई, तो उसके क्रोधी स्वभावके कारण कोई उसे नहीं व्याहता था। निदान कोई एक जुआरी-धूतव्यसनी ब्राह्मणने (जो कि जुआमें उधार द्रव्य लेकर हार गया था और जिसे अन्य जुआरी अपना उधार दिया हुआ द्रव्य न पानेके कारण नाकमें - कौड़ी-पहिनाकर और-उल्टा झाड़से टांगकर मार रहे थे, छुट्कारा
पाने की इच्छा से व्याहना स्वीकार कर लिया। सो देखो, वह तुंकारी क्रोधित होने के कारण एक रंक, गुणाहीन, कुरूप, व्यसनी पुरुषसे व्याही गई। पश्चात् किसी एक दिन उसका पति राजसभासे कुछ देरीसे आया कि इसीपरसे क्रोधित होकर वह (तुंकारी) घरसे निकल गई। और चोरोंके हाथ पड़ी और जब उन्होंने उसका शील-भंग करना चाहा, तब उसके शीलके माहात्म्यसे वहाँ वनदेवीने आकर उसकी रक्षा की। फिर जब वह चोरोंसे छूटी तो वनजारोंके हाथ पड़ी। उन्होंने भी उसी प्रकार उसपर कुदृष्टि की है, तब फिर भी उसने वनदेवीकी सहायतासे रक्षा पाई, तब वनजारोंनें शोभित होकर उसे एक छीपे (कपड़े छापनेवाले) को बेच दी। वह छीपा उसका मस्तक आठवें पन्द्रहवें दिन चीरकर लोहू निकालता और उससे कपड़े रंगता। फिर जड़ीबूटियों (हड़मूल) के तेलसे उसका घाव अच्छा कर देता था। इस प्रकार कई महीनों तक कितने ही बार उसका मस्तक चीरा गया जिससे उसे घोर वेदना भोगनी पड़ी। एक दिन भाग्यवश कहीं उसका चाचा वहाँ पहुँच गया और छीपाको कुछ द्रव्य देकर ज्यों त्यों उसे छुड़ा लाया। तबसे तुंकारीने क्रोध करना सर्वथा छोड़ दिया। तात्पर्य-क्रोधके कारण ही तुंकारीको इतने दुःख भोगने पड़े इसलिये क्रोध पिशाचको दूरसे ही छोड़ देना चाहिये, और भी कहा है कि—
“क्षमा हने औरको, अरु क्रोध हने आपको।”
देखो, जो शत्रु बड़े बड़े शत्रुधारी क्षत्रियोंसे भी अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी वश नहीं होते हैं या जो सिंह व्याघ्रादि घातक जीव
संसारके प्राणियोंको सर्वदा भयभीत करते रहते हैं, वे सब अनायास ही क्षमावान् महात्मा पुरुषोंके वशमें हो जाते हैं।
क्षमावान् पुरुषका कभी कोई भी शत्रु नहीं होता है। देखो, जब कोई पुरुष किसी अन्य पुरुषपर कुछ क्रोध करता है और वह अन्य पुरुष यदि उसे शान्ति भावसे सहन कर लेता है, तो क्रोध करने-वाला पुरुष स्वयं ही लज्जित हो पश्चात्ताप करने लगता है।
और भी क्रोधसे क्या २ हानि होती है सो सुनिये—क्रोधी पुरुष मणिवाले सर्पवत् गुणयुक्त होनेपर भी प्रशंसा नहीं पाता, क्रोधी पुरुषके व्रत, जप, तप, नियम, उपवास, संयम, दान, पूजा, जप, स्वाध्याय, विद्या आदि समस्त गुण पुण्सहितके भी क्षणभरमें भस्म होजाते हैं। क्रोधसे धैर्य छूट जाता है, बुद्धि नष्ट होजाती है रोग घेर लेते हैं, हठ बढ़ जाता है, शरीर शिथिल होजाता है, धर्म अलग होजाता है, वचन अनर्थ्य प्रवृत्त होने लगते हैं, मुख व नेत्र लाल होजाते हैं, शरीर काँपने लगता है, रोमाँच खड़े होजाते हैं, विचारशक्ति नहीं रहती है, दया चली जाती है, मित्रताके बदले शत्रुता बढ़ जाती है, अपयश फैल जाता है, दरिद्रता घेर लेती है, इत्यादि और भी अनेक प्रकारसे हानि होती है और इसके विपरीत क्षमासे सर्व गुण प्रगट होते हैं, इसीलिये सुखाभिलाषी सत्पुरुष सदैव क्षमाभाव धारण करते हैं।
जब कोई उन्हें दुर्वचन कहता है, अर्थात् उनपर क्रोध करता है, तो वे सोचते हैं कि अमुक पुरुषके क्रोधका कारण क्या है? यदि मैंने उसका कुछ भी अपराध किया है, तब तो मुझपर उसका क्रोध कर दुर्वचन कहना ठीक ही है। मैंने क्यों ऐसा अनर्थ किया, जिससे
परके परिणामोंमें क्रोधभाव उत्पन्न होगया। अब जैसे बने उसे क्षमा ग्रहण कराना उचित है और इसलिये वे अपने दोनोंकी आलोचना करके स्व निन्दा करते हुए उस पुरुषसे नम्र शब्दोंमें क्षमा मांगकर शान्त कर देते हैं। और अपने आपको किंचित् भी क्रोध नहीं आने देते हैं।
किन्तु कदाचित् कोई निष्कारण ही क्रोध कर कुवचन बोले तो सोचते हैं कि इसमें मेरा तो कुछ भी दोष है ही नहीं, यह पुरुष व्यर्थ ही क्रोधसे अपना आत्माको मलिन कर कर्मबन्ध कर रहा है और व्यर्थ ही बिना सोचे मुझको दुर्वचन कह रहा है। यह अज्ञानी है, पागल है। इसीसे यह विवेक बिना व्यर्थ ही अपना समय नष्ट करता हुआ स्ववचन बिगाड़ रहा है सो पागल व अज्ञानीके कहनेका बुरा ही क्या मानना? वह तो अभी केवल मुँहसे ही बकता है, मारता तो है नहीं क्योंकि पागल तो मारता है, बांधता है, काटता है, कपड़े फाड़ देता है, वस्तुओंको तोड़ मरोड़ कर फेंक देता है, और अनेक नहीं करने योग्य कार्य ही करता है, सो अभी तो यह केवल मुँहसे ही दुर्वचन कह रहा है और कुछ तो नहीं करता है, सो ये दुर्वचन मेरे शरीरमें कहीं भी चिपट तो जाते नहीं है, इसलिये इनसे मेरी हानि ही क्या है? कुछ नहीं।
अब यदि उन्हें कोई मारने भी लगे तो सोचते हैं कि वह मुझे केवल मारता ही तो है, कुछ प्राण रहित तो नहीं करता है।
और यदि कोई प्राण हरण भी करने लगे, तो सोचते हैं कि यह प्राण ही तो हरण करता है, कुछ मेरा धर्म जो क्षमा (आत्माका
स्वभाव) है, उसे तो हरण नहीं करता है। अर्थात् यह रद्द मेरे अविनाशी, सच्चिदानन्द अखण्ड स्वरूप चैतन्य आत्माको तो देख ही नहीं सकता, तब पीड़ा किसे देगा? और जिसे यह मारता काटता बांधता व हरण कर रहा है, वह तो मेरा स्वरूप ही नहीं है। वह जड़ अर्थात् अचेतन है, नाशवान् है। किसी न किसी दिन इसका वियोग तो होना ही है सो आज इसीके हाथसे सही। और यदि यह मेरे प्राण हरनेमें ही प्रसन्न है, तो अच्छा ही है। मेरा जो पूर्वकृत कर्मोंका इससे वैर था, सो यह अभी मेरी सावधान अवस्थामें लिये लेता है। यह इसका मुझपर बड़ा उपकार है। जो कदाचित् असाव- धान अवस्थामें प्राण हरण करता, तो संभवतः मेरा कुमरण होकर मैं दुर्गतिमें चला जाता।
इसलिये मेरा कर्तव्य है कि मैं इस पूर्वकृतकर्मत आये हुए उपसर्गोंको शांतिपूर्वक सहन कर समाधिमरण सहित प्राण त्याग करूँ। इसीमें मेरा कल्याण है। इसलिये वे ऐसा विचार करके कि-
खम्मामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्व भूदेसु वैरं मज्झं न केणवि ॥ १ ॥
अर्थात्-मैं सच जीवोंको क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझपर भी क्षमा करो, मेरे सबसे मित्रभाव है, मुझे किसीसे भी वैर-द्वेषभाव नहीं है, उत्तमक्षमा चारण करते हैं-
तात्पर्य-मित्र क्षमा सम जगतमें, नहीं जीवको कोय।
अरु वैरी नहीं क्रोध सम, निश्चय जानो लोय ॥
सो ही पं० यानतरायजीने कहा है-
पीई दुट्ठ अनेक्क, बंध मार बहु विध करे।
धरिये क्षमा विवेक, कोप न कीजे प्रीतमा ॥ १ ॥
उत्तम क्षमा गहेगे भाई, यह भव यद्यपि परम सुखदाई।
गाली सुन मन खेद न आनौ, गुणको औगुण कहे अजानौ ॥
कहे अजानो वस्तु छीने, बंध मार बहुविधि करे।
घरसे निकारे तन विदारे, बेर तो न तहां धरे ॥
तू कर्म पूरव किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीवरा।
अति क्रोध अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य जल ले सीयरा ॥ १ ॥
इति उत्तमक्षमा धर्मार्णव नमः।
उत्तम मार्दव।
उत्तममृदुभावो उत्तम तव परण करण सीलोवि।
अप्पायणं जो ही लदि मद्दव रयण भवे तस्स ॥
अर्थात्-जो उत्तम ज्ञानमें प्रधान और उत्तम तपश्चरण करनेमें समर्थ होनेपर भी अपने आत्माको मानकषायसे मलिन नहीं करते हैं उनके उत्तममार्दव धर्म होता है। (स्व० का० अ०)
भावार्थ-निर्गुणी, दीन, दरिद्री, अशक्त, अज्ञानी, हीन, कुळजातिवाला, कुरूप, चारित्रहीन पुरुष यदि विनय (नम्रता) धारण करते हैं तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि उनको तो दबना ही पड़ता है या वे दबाये जाते ही हैं। सो उनके ऐसा करनेके
कुछ मार्दव गुणके धारी नहीं कहे जाते। क्योंकि उनकी यह विनय व नम्रता स्वाभाविक नहीं है किन्तु दवाब व लाचारीकी है। वे अवसर पाकर पुनः मस्तक उठाकर चलने लगते हैं।
परन्तु जो उत्तम ज्ञानवान्, तपस्वी, ऐश्वर्यवान्, समर्थ, बलवान्, रूपवान्, कुलवान्, उत्तम जातिमान तथा धनवान होते हुये भी इनका मान नहीं करते और यथायोग्य विनय व शिष्टाचाररूप प्रवर्तन करते हैं अर्थात् बड़ों (जो ज्ञान चारित्र दीक्षा पद व वयमें वृद्ध हैं) की विनय भक्ति और छोटोंमें दया व मृदुभाव रखते हैं और अपने आत्माको मानकषायरुपी मलसे मलिन नहीं होने देते हैं वे ही उत्तम मार्दव धर्मधारी कहे जाते हैं। क्योंकि कहा है-
मृदोभावः इति मार्दवः अर्थात्-मृदु (नम्र) भावोंका होना सो ही मार्दव धर्म है। उत्तम अर्थात् सच्चा कि जिसमें दिखावट या बनावट न हो, ऐसा उत्तम मार्दव धर्म आत्माहीका निजस्वभाव है। यह गुण आत्मासे, मान कषायके क्षय, उपशम वा क्षयोपशम होनेसे प्रगट होता है-अर्थात् जबतक किसी जीवको मानकषायका उदय रहता है, तबतक वह प्राणी अपने आपको सर्वोच्च मानता और दूसरोंको तुच्छ गिनता हुआ, सबको अपने आधीन बनानेकी चेष्टा करता रहता है और जो कोई उसे नमस्कार व प्रणाम आदि शिष्ट व्यवहार नहीं करता है वा इससे मध्यस्थ अथवा विपक्षी होकर रहता है, तो वह उसे देख नहीं सकता तथा सदैव उसे नीचा दिखानेका विचार और उपाय किया करता है। यहां तक कि वह अपने बलको न विचारकर अपनेसे सबलका भी सामना कर बैठता है और बंदी हो
जानेपर भी वह अपनेको नतमस्तक न करके नहमायः होजाता है, इसीको मान कषाय कहते हैं।
इस कषायके उदय होते हुए विचार-शक्ति कम हो जाती है। देखो, लंकाधिपति प्रतिवालुदेव दशानन (रावण) जब सीताको हर लाया और जब मंदोदरी आदि समस्त स्वजनोंने उसे समझाया कि. सीता रामचंद्रको पीछे दे दो और अपने पवित्र कुलमें परस्त्री रूपी मल न लगाकर सुखपूर्वक राज्य करो या वनमें जाकर तपश्चरण करो इसीमें हित है, तब उसने यही उत्तर दिया कि–
“जानि हैं कायर मुझे नृपगण सभी संग्रामसे;
तासे लड़ना है मुझे धुन बांधके अब रामसे।
जीतकर अर्द्ध सिया प्यारी जु उनके प्राणसे;
यश होय मेरा विश्वमें बेशक सियाके दानसे ॥”
अर्थात्—सब क्षत्रियगणोंको विदित होगया है कि रावण सीताको हर लाया है और राम लक्ष्मण युद्धके लिये भी आगये हैं सो यदि मैं सीताको अभी रामके पास पहुंचा दूँ, तो क्षत्रियगण मुझे कायर समझकर हास्य करेंगे, इसलिये मैं रामचंद्र लक्ष्मणको युद्धमें जीतकर, सीता और उसके साथ बहुधा द्रव्य देकर उन्हें विदा करूंगा। किन्तु इस समय तो सीताको न भेजकर केवल युद्ध करना ही अभीष्ट है इत्यादि। और इस प्रकार उस महापुरुषने अन्त तक- पाण जाते हुए भी अपने प्रणको नहीं छोड़ा तथा वीरभूमि (रणक्षेत्र) में ही मृत्युको प्राप्त हुआ।
इसी लिये संसारमें मानी पुरुषोंको लोग रावणकी उपमा देकरः.
कहा करते हैं कि देखो—
“इक लख पूत सवा लख नाती।
ता रावण घर दिया न बाती ॥”
तात्पर्य—गर्व (मान=अहंकार) मत करो, त्रिखंडी रावणका भी मान नहीं रहा है तो औरोंकी क्या बात? इत्यादि।
सो जब इस प्रकारके मान कर्मका क्षय वा उपशम होता है तभी आत्माका मार्दव नामक स्वाभाविक गुण प्रगट होता है।
इस गुणके प्रगट होते हुए जीव अपने सिवाय अन्य समस्त जीवोंको अपने समान समझता है, तब उसे किसीसे रागद्वेष नहीं होता। वह विचारता है कि सब जीव समान हैं, कोई कम-बढ़ -नहीं है। और जब कोई कम-बढ़ है ही नहीं, तब मैं जिनको आधीन करना चाहता हूँ, जिनको मैं अपमानित करना चाहता हूँ, जिन्हें आज्ञाकारी बनाकर नमस्कार कराना चाहता हूँ, वे सब मेरे ही -समान हैं। फिर समान समानमें अधिकारी और अधिकृत भाव कैसा? और तू जो अभी अपने आपको बड़ा समझता है, सो जब नरक 'पशु आदि गतियोंमें, हीन सेवक देवोंमें व नीच गोत्रीय मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ था, तब वह तेरा बड़प्पन कहां चला गया था? तू सैकड़ों -वार क्या असंख्यात वार नरक निगोदमें गया, एक पाईकी भाजी -खरीदनेवालेके यहां रुक्नमें चला गया, मैलेका कीड़ा हुआ, तब 'तेरा बड़प्पन कहां चला गया था?
आज जो तूने यह उत्तम कुल, बल, ऐश्वर्य वा रूपादिक पाये हैं, यह सब तेरे पूर्वापार्जित शुभ कर्मोंका ही फल है सो कर्म अपनी
स्थिति पूर्ण करके निर्जर जायगा, तब मेरा यह सब विनष्ट हो जायगा। क्योंकि कहा है—
“सदा न फूले केतकी, सदा न श्रावण होय।
सदा न यौवन थिर रहे, सदा जियत नहिं कोय ॥”
अर्थात्—जिन कारणोंसे तू अपने आपको बड़ा मान रहा है, वे सब कारण एक दिन नष्ट होजायेंगे। क्योंकि प्रकृतिका ऐसा ही नियम है। कार्तिकस्वामीने भी कहा है—
“जम्मं मरणेण संगं, संपजई जुव्वणे जरा सहिया।
लच्छी विणाश सहिया, यह सव्वं खणभंगुरं मुणह ॥”
अर्थात्—जन्मके साथ मरण, यौवनके साथ बुढ़ापा और लक्ष्मीके साथ दरिद्रता लगी हुई है। इसलिये ये सब क्षणभंगुर (विनाशावान्) जानने चाहिये।
जब संसारके सर्व ही पदार्थ (पर्याय अपेक्षा) विनाशावान् हैं, तो फिर मान किस बातका? देखो, शरीरका बल और सौन्दर्य बुढ़ापे आते ही नष्ट होजाते हैं, सब इन्द्रियां शिथिल होजाती हैं जिससे वे अपने अपने विषयको ग्रहण कर नहीं सकतीं।
यौवन था तब रूप था, थे ग्राहक सब लोय।
यौवन रत्न गुमों पुन:, बात न पूछे कोय ॥
इसलिये अभी तुम जो रूप सौंदर्य आदिके मदसे अपनी तरुणवास्थामें औरोंका हास्य व निन्दा करते हो सो वे भी तुम्हारी जरावास्था होनेपर तुम्हें हँसेंगे तब तुम्हें बहुत दुःख होगा और तुम्हारा मान गल जायगा, जिससे तुमको क्रोध उत्पन्न होनेसे तुम्हारा रहा.
आनन्द भी जाता रहेगा और तुम शक्तिहीन होनेसे किसीका कुछ कर भी न सकोगे। प्रायः निर्वैरको क्रोध बहुत होता है क्योंकि वह क्रोधवश किसीको मनोनुकूल दंड नहीं दे सकता है, ताड़न तर्जन नहीं कर सकता है अर्थात् अपना बदला नहीं ले सका तब स्वयं अपने आपका घात कर बैठता है। इसलिये ऐसे रूप सौन्दर्य बला-दिका मान करना क्या यथार्थ है ? कभी नहीं।
यदि कर्मके क्षयोपशमसे कदाचित् तुमको कुछ भी ज्ञानका प्रकाश हुआ है, तो उसका मान मत करो, क्योंकि संसारमें तुमसे भी अधिक अनेकों ज्ञानी भर रहे हैं सो यदि तुम इस तुच्छ क्षयोपशमिक ज्ञानका मान करते हो, तो तुम उस ऊंटके समान हो, जो अपनेको संसारमें सबसे बड़ा मानता है, किन्तु जब पहाड़ीकी तलहटीमें पहुंचता है, तो उसका मान भंग होजाता है, उसे हार मानना पड़ती है और भूल स्वीकारना पड़ती है कि मैं सबसे बड़ा नहीं हूँ किन्तु मुझसे और भी बड़े बड़े पदार्थ संसारमें हैं।
सो प्रथम तो यह क्षयोपशमिक ज्ञान है इसका घटना बढ़ना भी संभव है। दूसरे यह ज्ञान इन्द्रियाधीन है सो इन्द्रियोंकी शक्ति कम होनेसे स्वयमेव कम होजाता है, इसीसे यह पराधीन और परोक्ष कहाता है। इसलिये जो तुम इसका मान करोगे, तो इन्द्रियोंकी शक्ति कम हो जानेपर ज्ञानमें न्यूनता व विपरीतता होनेसे तुम दूसरोंकी दृष्टिमें हीन जँच जाओगे, हंसीके पात्र बन जाओगे, लोग तुम्हारी युक्तियोंको अयुक्ति ठहरावेंगे और तुम्हारे वचनोंको अप्रमाण समझेंगे, तब तुम्हें घोर दुःख होगा और उस समय तुम मानके
वशवर्ती होकर हठात् अपने असत्य वचनोंको भी सत्य सिद्ध करनेकी चेष्टा करोगे। जैसा कि बहुतसे आधुनिक पंडित पूर्विय तथा पश्चिमी विद्याके अभ्यासी स्ववचन पोषणार्थ अनेकों कुयुक्तियां लगाकर ज्यों-ज्यों स्वपक्ष मंडन और परपक्ष खंडन कर डालते हैं जिससे लोकमें असत्य वचनोंकी प्रवृत्ति हो जाती है और अनेकों मिथ्या मत संसारमें चल जाते हैं जिनमें भोले प्राणी फंस अपने आत्माका अकल्याण कर बैठते हैं। इसलिये ऐसे क्षयोपशमिक, पराधीन तथा अल्पज्ञानका मान करना वृथा है।
देखो, जो कोई अल्पज्ञानका मान करता है और दूसरोंको अज्ञानी समझता है, वह सदा अज्ञानी ही बना रहता है, उसके ज्ञानकी वृद्धि कभी नहीं होती है। क्योंकि कहा है—
“ विनय विना विद्या नहीं, विद्या विन नहीं ज्ञान।
ज्ञान विना सुख नहीं मिले, यह निश्चय कर जान।।”
इसलिये ज्ञानवृद्धिमें भी विनय प्रधान है और मान हानिकारक है।
यदि तुम्हें पुण्यवशकर कुछ ऐश्वर्य-अधिकार, पूजा, प्रतिष्ठादि प्राप्त हुआ है तो उसके मदमें आकर स्वच्छंद प्रवर्तना अच्छा नहीं है। क्योंकि अभिमानीके सब लोग निष्कारण ही शत्रु बनजाते हैं, जिसमें फिर अभिमानी अधिकारीका तो कहना ही क्या है ? कारण उसका सम्बन्ध बहुतोंसे रहता है और जिस जिससे सम्बन्ध रहता है वे सभी उसके अभिमानसे पीड़ित (दुःखी) रहते हैं। और अवसर देखते रहते हैं कि कब इससे प्रबल पुरुषका समागम मिलाकर इसका मानभंग करावें और बदला लेवें इत्यादि।
यहां तक कि कभी कभी बहुतसे मनुष्य अपने अधिकारियोंसे अप्रसन्न हो विपक्ष दलमें मिलकर अपनी २ मनोकामनाएं सिद्ध करते हैं। विशिष्टपणको देखो, कि जब रावणने उसका अपमान किया, तो वह चार अठ्ठारहणी सेना सहित आकर रामचन्द्रसे मिल गया और अपने भाईको मरवा डाला। इसीसे यह कहावत चरितार्थ हुई, कि
“ घरका भेदी लंका ढाए। ”
फिर भी यह ऐश्वर्य सदा नहीं रहेगा, बल क्षीण होते ही क्षीण हो जायगा, तब जिन्हें तुम तुच्छ समझते थे, ऐश्वर्याभिमानी हुए दूसरोंके सुख दुःख हानि लाभको नहीं देखते थे, तथा मनमानी आज्ञा चलाते थे सो वे ही मनुष्य तुमको अधिकार-भ्रष्ट देखकर प्रसन्न होवेंगे, तुमसे घृणा करेंगे और भरसक तुम्हारा अपमान और निंदा करनेमें कसर न करेंगे। देखो, रावणको मरे हजारों वर्ष होगये हैं तब भी प्रातःकाल कोई उसका नामतक नहीं लेता। इसलिये ऐश्वर्याभिमान करना भी वृथा है। कहा है—
“ दिन दश आदर पायके, करले आप बखान।
जद्यलग काक श्राद्ध पक्ष, तद्यलग तुझ सन्मान।।”
तात्पर्य-ऐश्वर्य सदा स्थिर नहीं रहता है। वह भी बल और बुद्धि तथा द्रव्यके आश्रित है, इसलिये उसका अभिमान करना भी व्यर्थ है।
यदि कुल (पितापक्ष) वा जाति (मातापक्ष) का अभिमान करते हो तो भी भूल है। क्योंकि कुल व जाति पूर्व कर्मसे प्राप्त हुए हैं। यदि ऐसा मानो तो वर्तमानमें तुम्हारा इसमें पुरुषार्थ ही क्या है,
जो इनका मान करते हो ? यदि मान करोगे और दूसरोंको तुच्छ गिनोगे, तो नीचगोत्र कर्मका आस्रव करके नीच कुलमें चले जाओगे। तब फिर उच्चपणा कहाँ रहेगा जैसा कि श्रीमद्गुस्वामीने कहा है-
परोसल्लिंदामदिपसंसाओ उच्चगोदणासेणो च नीचगोत्रस्य।
अर्थात्- पराई निंदा और आत्म-प्रशंसा करने तथा अन्यके गुणोंको आच्छादन करने व अवगुणोंको प्रगट करनेसे नीचगोत्र कर्मका आस्रव होता है।
और यदि पुरुषार्थ (उच्च आचार विचार रखने) से कुल व जाति उच्च होती है, ऐसा मानते हो, तो फिर हरकोई अपने उच्च आचार विचारोंसे उच्च बन सकता है। तब मैं ही उच्च हूँ ऐसा मान करना व्यर्थ है और एक बात यह भी है कि उच्च कुल जाति-धारी महान् पुरुष कभी अपने आपको उच्च उच्च कहकर हलके नहीं बनते हैं। जैसा कहा है-
“बड़े बड़ाई ना करे, बड़े न बोले बोल !
हीरा मुँहसे ना कहे, बड़ा हमारा मोल ॥”
लोकमें स्वप्रशंसा करनेवाला मनुष्य नीचातिनीच समझा जाता है और यह ठीक भी है क्योंकि नीच उच्चपना तो मनुष्योंके आचरण व विचारोंसे अपने आप ही प्रगट होजाता है।
मानलो; कोई मनुष्य ब्राह्मण या क्षत्रिय, वैश्यके घरमें उत्पन्न होकर हिंसा करे, झूठ बोले, चोरी करे, व्यभिचार करे, न्यायान्याय रहित हुआ अयात्था, माँसादि पदार्थोंके बढ़ानेमें तृष्णावान् रहे, मद्य माँस भक्षण करे, जुआ खेले, इत्यादि और भी कुसित कार्य करे,
अथवा ऐसे ही हीनाचारी, व्यसनी, पापी लोगोंका संग करे, तो क्या फिर भी वह उच्च गोत्री ही रह सकता है ? नहीं कभी नहीं, कभी नहीं। वह नीच, शूद्रोंसे भी महा नीच होजाता है।
और यदि कोई शूद्र, हिंसादि पाप नहीं करता है, झूठ चोरी व्यभिचार आदि पाप व दुर्व्यसन नहीं सेवन करता है, न्यायानुकूल योग्य आजीविका करके संतुष्ट रहता है, मद्यमाँसादि निंद्य अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाता है, सदा भले मनुष्योंकी संगतिमें रहता है, तो क्या वह नीच ही कहा जासकता है ? नहीं, कदापि नहीं। संसारमें जीव मात्रको अपनी उन्नति करनेका स्वाभाविक अधिकार प्राप्त है। उच्च नीचपणा किसीकी पैतृक सम्पत्ति नहीं है। जीव स्वकृत कर्मसे उच्च नीच होसकता है, इसलिये उच्च बननेके लिये उच्चाचरण व उच्च विचार बनाना आवश्यक है, किन्तु गर्व करना व्यर्थ है।
अब यदि धनका मद करते हो, तो प्रत्यक्ष देखते हुए भी अंधेके समान हो, क्योंकि तुम जानते हो कि यह लक्ष्मी अति चंचल स्वभाव है। पुण्यकी दासी है। इसे पुरुषविशेषसे प्रेम नहीं है। जैसे वेश्या धनवालेसे प्रेम करके जहाँतक उसके पास धन रहता है, दिखाऊ प्रीति बताती है, संपूर्ण धन हरणकर अपने उसी प्रेमीको छोड़ देती है, वैसे ही लक्ष्मी पुण्य क्षीण होनेपर पुरुषको छोड़ जाती है। वह नीच, उच्च, मूर्ख, विद्वान्, कुरूप, सुरूप, सबल, निर्बल, किसीपर दया नहीं करती, न प्रेम ही रखती है। वह तो केवल पुण्यवानसे ही प्रेम रखती है, जैसे कि वेश्या धनवालेसे। देखो ! किसी समय एक पुरुषने अपनी स्त्रीको लक्ष्मी कहकर संबोधन किया था, उसपर
उस स्त्रीने दुःखित होकर अपने पतिसे निम्न प्रकार प्रश्न किया और जिससे वह पुरुष लज्जित होकर निरुत्तर होगया था। वह पूछती है-
जाऊँ कहूँ न रहूँ घरमें, सहूँ दुःख सुख सबहि कठिनाई।
नीचन ऊँचनके वह (लक्ष्मी) जात है, आवत जातन नेक लजाई ॥
मेरे हु देखत गई कितकके घर मैं न दियो पग पोर पराई।
कारण क्या कुछ लेश पिया, जाते सिंधुसुता (लक्ष्मी) ठहराई ॥
तात्पर्य- ऐसी चंचल लक्ष्मीका मान करना व्यर्थ है।
यदि अपने तप, व्रत, संयम आदिका मान करते हो, तो तुम्हारे जैसा मूर्ख संसारमें और कोई भी नहीं है, क्योंकि तुम आत्मकल्याणके कारण तपको बढ़ानेकी तुच्छ इच्छासे नष्ट कर देते हो अर्थात् जिस जप, व्रत, तप, संयमसे स्वर्ग मोक्ष प्राप्त होता उसे केवल मान बड़ाईमें ही बेच देते हो और जब निरंतर तुम्हें अपने तप संयमके मानका ही ध्यान बना रहता है तब तुम तप संयम व आत्मध्यान कब करते हो या करोगे ? जब तप ही नहीं करते हो तो केवल कपट भेष बनाकर लोगोंको और अपनी आत्माको ठगते हो। ऐसा तप करना व्यर्थ है, जिसमें मान पुष्ट किया जाय। क्योंकि तप तो इच्छाओंके रोकनेको कहते हैं जैसा कि कहा है- “इच्छा निरोधस्तपः” और तुम तो निरंतर मान पानेकी इच्छा में ही मग्न रहते हो इसलिये तपका मद करना भी व्यर्थ है। इसप्रकार विचार कर उत्तम पुरुष मान कषायको छोड़कर अपना स्वाभाविक मार्दव गुण प्रगट करते हैं।
इस मार्दव गुणसे आत्मिक-स्वाभाविक सुख तो मिलता ही है, किन्तु लौकिक सुख भी मिलता है। प्रगटमें नम्र-विनयीका ही
शत्रु नहीं, और मानीका कोई मित्र नहीं होता है। देखो, आँधीके झकोरोंसे बड़े बड़े मोटे और कठोर वृक्ष मूल सहित उखड़ जाते हैं परन्तु नम्र होनेसे पतला भी बैंतका वृक्ष आँधीसे कभी नहीं उखड़ता किन्तु वह अपने विनय गुणसे वैसा ही बना रहता है। कहा है—
कोई न मीत कठोरको, मृदुको कोई न अरातू।
इसलिये अन्तरङ्ग मान कषायको त्याग करना और व्यवहारसे अपनेसे कुल, वय, पद, विद्या, गुण, चातुर्य, तप, ज्ञान, चारित्र आदिमें जो बड़े हैं उनका यथायोग्य विनय शुश्रूषा (सत्कार) करना तथा छोटोंमें दया प्रेम व नम्रता रखना, और अविनयी व विरोधी पुरुषोंमें माध्यस्थभाव रखना, यही मार्दव गुण है। कभी अपने मुंहसे स्वप्रशंसा नहीं करना और न कभी परनिंदारूप निंद्य वाक्य कहना यही विनयका लक्षण है। अपनेसे बड़ोंको नमस्कार करना, उच्चासन देना, समक्ष होकर नहीं बोलना, उनकी आज्ञा मन, वचन, कायसे यथशक्ति पालन करना, वे चलें तो उनके पीछे पीछे चलना, उनके गुणोंकी प्रशंसा करना, उनके उत्तम गुणोंका अनुकरण करना, उनके द्वारा अपने ऊपर हुए उपकारोंको नहीं भूलना, इत्यादि विनय है। प्रसंगवश यह भी लिख देना उचित है कि किसका किसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये? यथा—
नमोऽस्तु गुरवे कुर्याद्दानं ब्रह्मचारिणे।
इच्छाकारं सधर्मिभ्यो वंदामीत्यादिशु ॥ १-॥
आद्धाः परस्परं कुर्य्युः इच्छाकारं स्वभावतः।
जुहारइति लोकेस्मिन्मंस्कारं स्वसज्जनः ॥ २ ॥
योगायोग्यनरे दृष्ट्वा कुर्व्वीत विनयादिकं।
विधातपोर्गुणैः श्रेष्ठो लघुश्चापि गुरुर्मतः ॥ ३ ॥
श्रावकानां मुनींद्रो हि धर्मवृद्धिं ददत्यहो।
अन्येषो प्रकृतानां च धर्मलाभ मतः परै ॥ ४ ॥
आर्यिका तद्देववात्र पुण्यवृद्धिं च वर्णिणः।
दर्शनविशुद्धिं प्रायः क्वचिदेतन्मतान्तरम् ॥ ५ ॥
अर्थात्—दिगम्बर निर्ग्रन्थ साधुओंको अष्टांग नमस्कार और आर्यिका तथा ब्रह्मचारिणीजनोंको दोनों हाथ मस्तकसे लगाकर शिरोनति करता हुआ वंदना करे। तथा साधर्मी, साधर्मी परस्पर इच्छामि (इच्छाकार) करें। श्रावकजन भी परस्पर जुहारु करें अथवा अपनेसे बड़ोंको प्रणामादि करें और छोटोंको आशीर्वाद देवें। इस प्रकार यथायोग्य व्यवहार करें। मुनि तथा आर्यिकाजी श्रावकोंको धर्मशुद्धि और अजैन (श्रावकेतर) जनोंको धर्मलाभ कहें। इसी प्रकार ब्रह्मचारी श्रावकोंको पुण्यवृद्धि अथवा दर्शनविशुद्धि और जैनेतर जनोंको पापै क्षयोऽस्तु आदि कहकर आशीर्वाद देवें। यही शिष्टाचार व्यवहार है। इसलिये सब मदोंको छोड़ स्वाभाविक और उभय लौकिक सुख देनेवाले ऐसे उत्तम मार्दव धर्मको धारण करना चाहिये इसीमें हित है। सो ही कहा है—
मान महा विपरूप, करे नीच गति जगत्में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सदा ॥ १-॥
उत्तममार्दव गुण मणि माना, मान करनका कौन ठिकाना।
बसो निगोदमाहिसे आया, दूसरी रुंकन भाग विकाया ॥
रुंकन विकाया कर्मवशते, देव इक इन्द्री भया।
उत्तम सुवा चण्डाल हुवा, भूप कीड़ेमें गया ॥
जीतव्य यौवन धन गुमान, कहा करे जल बुदबुदा।
कर विनय चहसुत बड़े जनकी, ज्ञानको पावे सुधा ॥ २ ॥
उत्तम आर्जव
जो चिंतेउ ण वंकं कुणदिण्ण वंकं ण जंपए वंकं।
ण य गोवदिणियदोसं अजव धम्मो हवे तस्स ॥
अर्थात्—जो न तो वक्र (कुटिल मायाचाररूप) चिंतन करता है, न वक्र कार्य करता है और न वक्रता लिये वचन ही बोलता है, तथा अपने दोषोंको नहीं छिपाता है, उसीके उत्तम आर्जव धर्म कहा जाता है। तात्पर्य—मन, वचन, काय और वचनोंमें जिसके सरलता हो अर्थात् जो मनमें ही वही करे और वही कहे तथा अपने दोषोंको न छिपाकर स्वीकार करे, वही आर्जवधर्मी महापुरुष कहा जाता है और उसके दोष दूर होकर वह शीघ्र ही एक पवित्रात्मा होजाता है। सो ही आगे आर्जव धर्मका भाव कहते हैं। यथा—
ऋजोर्भावः इति आर्जवः अर्थात्—सरल भावको आर्जव भाव कहते हैं। उत्तम विशेषण है, अर्थात् जिन भावोंमें किञ्चित् भी छल-कपट, दिखावट, बनावट व मायाचारी न हो वे ही भाव आर्जव भाव कहलाते हैं। ये भाव आत्माके निजस्वभाव ही हैं जो कि माया कषायके क्षय व उपशम होनेसे प्रकट होते हैं।
जिस समय जीवके मन, वचन और काय ये तीनों योग वक्ता-मायाचार रहित सरल होते हैं, अर्थात् जो कुछ मनमें विचार हो उसे ही वचनसे प्रकाश करना और वचनसे जो कुछ प्रकाश किया हो, वही कायसे करना इसीको आर्जव नाम आत्माका स्वभाव कहते हैं।
किन्तु जिस समय यह जीव निज आत्मबुद्धि अर्थात् अपने आत्मामें ही आत्म भावनासे रहित हुआ, आत्मबुद्धि परपदार्थोंमें स्वत्व भाव धारण कर प्रवर्त्तता है, तभी यह अपने इच्छित मनोनुकूल विषयों वा कषायोंकी पुष्टयर्थ नाना प्रकारकी कुचेष्टाएँ करता है। अर्थात् मनमें कुछ और विचारता है, वचनसे कुछ और प्रगट करता है तथा कायसे कुछ अन्य ही आचरण करता है। तब इसके अंतरंग भावोंका भेद, सिवाय केवलज्ञानी व मनःपर्ययज्ञानीके और कोई भी नहीं जान सकता। इसे ही अर्थात् ऐसे ही भावोंको माया कषाय कहते हैं।
यद्यपि मायाचारी पुरुष प्रायः छद्मसे सिद्ध भाषण करता है, सौम्य आकृति बनाता है, अपने आचरणोंसे लोगोंको विश्वास उत्पन्न कराता है और अपने प्रयोजन साधनार्थ विपक्षीकी भी ही हीं भी मिला देता है परन्तु अवसर पाते ही वह अपने मन जैसी कर लेता है।
इसका स्वभाव ठीक बगुलेके सरीखा होता है—अर्थात् जैसे बगुला पानीमें एक पाँवमें खड़ा होकर मांसादि लगाता है और मछली ज्यों ही उसके पास उसे साधु समझकर आती है त्यों ही वह छद्मवेषी झटसे उन्हें पकड़ कर भक्षण कर लेता है। कहावत है कि—
उज्वल बुगि गरीच गति, एक टाँग सुख ध्यान।
देखत लागत भगवतवत, निपट कपटकी खान ॥ १ ॥
मायाचारी कभी सत्य तो बोलता ही नहीं है और यदि कदाचित् कभी वह कुछ सत्य भी कहे, तो उसका कहना असत्य ही समझना चाहिये और कदापि उसका विश्वास नहीं करना चाहिये और प्रायः कोई करते भी नहीं हैं।
यद्यपि वह अपने दोषोंको पूर्णरूपसे ढँकता है तो भी उसका कपटभेव अंतमें प्रकट हो ही जाता है और कपटभेव प्रगट होते ही फिर कोई उसका विश्वास नहीं करते हैं।
यद्यपि कुछ समय तक लोग बिना जाने उसके फंदेमें भले ही फँसे रहें और वह भी अपने आपको कृतकृत्य समझे, पर जैसे कि मिट्टीसे अच्छादित पूँदीसे गानीके भीतर मिट्टी गलकर फूटते ही ऊपर आ जाती है, वैसे ही कपट भेव भी बहुत समय तक नहीं छिप सकता।
मायाचारीका विश्वास लोकमेंसे उठ जानेपर उसका समस्त व्यवहार बंद होजाता है, जिससे उसे अत्यन्त दुःखी होना पड़ता है।
मायाचारी मनुष्यको कभी भी शांति नहीं मिलती, वह सदा ही उपेक्षदुगमें लगा रहता है। किसीका बुरा करना, किसीको लड़ाना, किसीकी चुगली खाना, किसीका अपमान व पराजय कराना इत्यादि। 'तालमैथे—उसे कभी सुख-नींद नहीं आती। वह निरंतर चिन्ताग्रस्त रहता है और चिन्तावानको सुख कहाँ?
मायाचारी आप तो दुःखी रहता ही है किन्तु अन्यको दुःखी करनेमें भी हर्ष मानता है। वास्तवमें ऐसे लोग शत्रुसे भी भयंकर होते हैं क्योंकि शत्रु तो प्रगट रूपसे घाव करके मारता है, इसलिये उससे तो हम सदा शंकित अर्थात् सावधान रहनेके कारण किसी
प्रकारसे भी अपनी रक्षा कर सकते हैं परन्तु इन मीठे बोलनेवाले अस्तीनके सांपों सरीखे मायाचारियोंसे बचना तो बहुत कठिन तो क्या असंभवसा ही है। कहा है—
‘अरकसिया (करोत) के मुख नहीं, नहीं गाँचके दंत।
जे नर धीरे बोलते, इनसे बचिये संत’ ॥ १ ॥
क्योंकि ये लोग सदा मीठी मीठी बातोंमें अंतरंगका हाल जानकर जाहिर प्रगट कर देते हैं। ये कभी किसीसे मित्रता तो करते ही नहीं हैं। ये लोग तो जहां अपना मतलब होते देखते हैं कि झटसे वहीं जा मिलते हैं। इनके वचनकी स्थिरता तो होती ही नहीं है। झूठ बोलनेका तो इनका स्वभाव ही पड़ जाता है अथवा झूठ बोलनेमें ये पाप ही नहीं समझते हैं, इसलिये सदा ऐसे लोगोंसे बचते रहना ही ठीक है।
ये लोग अपने प्रयोजन साधनार्थ व कौतुकवश दूसरोंको घात पहुँचानेकी चेष्टा करते रहते हैं, परन्तु औरोंका घात तो उनके पूर्वकृत कर्मानुसार होने अथवा नहीं भी हो, किन्तु मायाचारीका घात उसके परिणामोंसे तो सदा हुआ ही करता है। जैसे दर्पणमें मुँह देखनेपर जैसा टेढ़ा सीधा करके देखो वैसा ही दिखने लगता है; ठीक, यही हाल मायाचारियोंका होता है। जो औरोंके हिये कुआ खोदते हैं, उसमें वे आप ही अनायास गिर जाते हैं। कहा है—“जो कोई कूप-खने औरनको, ताको खाई तयार।” सत्य है ओसका मोती कब-तक स्थिर रहता है?
एक समय एक कौआ मोरके पंख पहन कर अपने आपको
मोर प्रकट करता हुआ स्वजातीय कोओंके पास जा उन्हें भला बुरा कहने लगा। वे बेचारे मूर्तीतापन्न चुप होरहे और अपने संघसे उसे त्याग कर दिया। पश्चात् वह मोरोंके झुंडमें जाके अकड़ कर फिरने लगा, इससे मोरोंनें भी इसे तुरंत छलभेपी काग समझकर खूब ही चोंचोंसे इसकी खबर ली। और सब नकली पर नोंच डाले। तब वह मारसे व्याकुल हुआ, पीछे स्वजातियोंके पास आया और पूर्ववत् उनमें मिलना चाहा परन्तु उन्होंने भी इसकी मोरोंके समान खूब खबर ली और बाहर निकाल दिया। तब बेचारा महा दुःखी हो जन्म पर्यंत जातिच्युत हुआ अकेला ही वनमें मृत्युकी प्रतीक्षा करता मर गया।
तात्पर्य-कपट-जाल कभी न कभी टूटता ही है और उसके टूटनेपर कपटीकी बहुत ही दुर्दशा होती है।
सो जब इसी लोकमें कपटी मारन ताड़नादि अनेक वेदनाएँ सहता है तो परभवका कहना ही क्या है? भगवान् उमास्वामीने कहा है- ‘माया तैरयग्गोनस्य’ अर्थात् मायाभावोंसे तिर्यग्गतिका आस्रव और बंध होता है। इससे यहीं पर यह जीव अनेक प्रकार छेदन, भेदन, वध, बंधन, भूख प्यास आदि दुःख भोगता है। तथा शीत, उष्ण, छेदन, भेदन, डंस, मच्छर, भार-वहन, मारन, ताड़नादि और भी अनेकों दुःख सहता है।
यदि यह सवल हुआ तो औरोंको मारकर खाने लगा और कभी शिकारियों द्वारा आप भी मारा गया। यदि यह निर्बल हुआ तो दूसरे जीव इसे मारकर खा गये। यदि पालतू पशुओंमें हुआ तो सवारियों
जोता गया, युद्धमें पेश गया, नाक, मुँह, जिह्वा, लिंगादि छेदन किये गये, भार लदा गया, शक्तिहीन होनेपर कषायीके हाथ बेचा गया, देवी देवताओंकी बलि दिया गया, यज्ञमें होमा गया, यह तो पंचेन्द्री समनस्ककी कथा हुई तब चौ-इन्द्री, तीन-इन्द्री, दो-इन्द्री, एक-इन्द्रीका तो कहना ही क्या है? जहाँ बड़े उपकारी जीवों ही की दया नहीं देखी जाती, वहाँ दीन क्षुद्र जीवोंकी तो कौन रक्षा करता है? हाय! ऐसे पशुगतिके दुःख मायाचारीको भोगने पड़ते हैं?
ये ही मायाभाव जीवको अनन्त संसारमें भ्रमण कराते हैं, इसलिये ये कुभाव सदैव त्यागने योग्य है। उत्तम पुरुष ऐसे कुभावोंको त्याग कर स्वभावों-आर्जव भावोंको प्रगट करते हैं और मन, वचन, कायकी सरलता करके अनादि कर्म बन्धनको काटकर अविनाशी सुखोंको प्राप्त होते हैं। इसलिये उत्तम पुरुषोंको सदा स्वपर हितकारी उत्तम आर्जव धर्मको धारण करना चाहिये। सो ही कहा है-
कपट न कीजे कोय, चोरनके पुर नहिं बसे।
सरल स्वभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा।।
उत्तम आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी।
मनमें होय सो वचन उच्चरिये, बचन होय सो तनसे करिये।।
करिये सरल तिहुँयोग अपने, देख निर्मल आरसी।
मुख करे जैसा लखै तैसा, कपट प्रीति अंगारसी।।
नहिं लहै लक्ष्मी अधिक छल कर, कर्मबंध विशेषतः।
भय त्याग दृष विलाष पीवे, आपदा नहिं देखता।। ३।।
उत्तम सत्य।
विषयवयणमेव भासिदं पालेदुं असक्क माणो वि।
अत्थगरेण वि अलियं ण वददि जो सव्ववाई सो।।
अर्थात्-जो सदैव जिन श्रुतानुसार ही वचन बोलते हैं और यदि वे तीव्र कर्मके उदयसे कदाचित् उनके अनुसार चल भी नहीं सकते, तो भी कभी असत्य भाषण नहीं करते, न कभी व्यवहारमें (अथवा हास्य कौतुक छलकर भी) झूठ बोलते हैं वे सत्यवादी कहे जाते हैं। ऐसे पुरुषोंके वचन सदैव स्वपर कल्याणके करनेवाले होते हैं।
(स्वा० का० अ०) कहा है कि-
उत्तम आर्जव ।
प्रकारसे भी अपनी रक्षा कर सकते हैं परन्तु इन मीठे बोलनेवाले अस्तीनके साँपों सरीखे मायाचारियोंसे बचना तो बहुत कठिन तो क्या असंभवसा ही है। कहा है—
'अरकसिया (करोंत) के मुख नहीं, नहीं गौंचके दंत ।
जे नर धीरे बोलते, इनसे बचिये संत” ॥ १ ॥
क्योंकि ये लोग सदा मीठी मीठी बातोंमें अन्तरंगका हाल जानकर बाहिर प्रगट कर देते हैं। ये कभी किसीसे मित्रता तो करते ही नहीं है। ये लोग तो जहाँ अपना मतलब होते देखते हैं कि झटसे वहीं जा मिलते हैं। इनके वचनकी स्थिरता तो होती ही नहीं है। झूठ बोलनेका तो इनका स्वभाव ही पड़ जाता है अथवा झूठ बोलनेमें ये पाप ही नहीं समझते हैं, इसलिये सदा ऐसे लोगोंसे बचते रहना ही ठीक है।
एक समय एक कौआ मोरोंके पंख, पहिन कर अपने आपको
श्रीदशलक्षण धर्म ।
मोर प्रकट करता हुआ स्वजातीय कौओंके पास जा उन्हें भला बुरा कहने लगा । वे बेचारे इसकी मूर्खतापर चुप होरहे और अपने संघसे उसे त्याग कर दिया । पश्चात् वह मोरोंके झुंडमें जाके अकड़ कर फिरने लगा, इससे मोरोंने भी इसे तुरत छद्मभेषी काग समझकर खूब ही चोंचोंसे इसकी खबर ली । और सब नकली पर नोंच डाले । तब वह मारसे व्याकुल हुआ, पीछे स्वजातियोंके पास आया और पूर्ववत् उनमें मिलना चाहा परन्तु उन्होंने भी इसकी मोरोंके समान खूब खबर ली और बाहर निकाल दिया । तब बेचारा महा दुःखी हो जन्म पर्यंत जातिच्युत हुआ अकेला ही बनमें मृत्युकी प्रतीक्षा करता करता मर गया ।
तात्पर्य-कपट-जाल कभी न कभी टूटता ही है और उसके
टूटनेपर कपटीकी बहुत ही दुर्दशा होती है।
सो जब इसी लोकमें कपटी मारन ताड़नादि अनेक वेदनाएँ
सहता है तो परभवका कहना ही क्या है? भगवान् उमास्वामीने कहा है-‘माया तैर्यग्योनस्य’ अर्थात् मायाभावोंसे तिर्यञ्चगतिका आस्रव और बंध होता है। इससे वहाँ पर यह जीव अनेक प्रकार छेदन, भेदन, बध, बंधन, भूख प्यास आदि दुःख भोगता है । तथा शीत, उष्ण, छेदन, भेदन, डंस, मच्छर, भार-वहन, मारन, ताड़नादि और भी अनेकों दुःख सहता है।
यदि यह सबल हुआ तो औरोंको मारकर खाने लगा और कभी
जोता गया, युद्धमें मेरा गया, नाक, मुँह, जिह्वा, लिंगादि छेदन किये गये, भार लादा गया, शक्तिहीन होनेपर कषायीके हाथ बेचा गया, देवी देवताओंकी बलि दिया गया, यज्ञमें होमा गया, यह तो पञ्चन्द्री समनस्ककी कथा हुई तब चौ-इन्द्री, तीन-इन्द्री, दो-इन्द्री, एक-इन्द्रीका तो कहना ही क्या है ? जहाँ बड़े बड़े उपकारी जीवों ही की दया नहीं देखी जाती, वहां दीन क्षुद्र जीवोंकी तो कौन रक्षा करता है ? हाय ! ऐसे पशुगतिके दुःख मायाचारीको भोगने पड़ते हैं ?
इसलिये ये कुभाव सदैव त्यागने योग्य हैं । उत्तम पुरुष ऐसे कुभावोंको त्याग कर स्वभावों-आर्जव भावोंको प्रगट करते हैं और मन, वचन, कायकी सरलता करके अनादि कर्म बन्धनको काटकर अविनाशी
सुखोंको प्राप्त होते हैं । इसलिये उत्तम पुरुर्षोको सदा स्वपर हितकारी उत्तम आर्जव धर्मको धारण करना चाहिये । सो ही कहा है—
कपट न कीजे कोय, चोरनके पुर नहिं बसे ।
सरल स्वभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा ।।
उत्तम आर्जव रीति वखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी ।
मनमें होय सो वचन उचरिये, बचन होय सो तनसे करिये ।।
करिये सरल तिहुंयोग अपने, देख निर्मल आरसी ।
मुख करे जैसा लरखे तैसा, कपट प्रीति अंगारसी ॥
नहि लहे लक्ष्मी अधिक छल कर, कर्मबंध विशेषता ।
भय त्याग दूध विलाव पीवे, आपदा नहिं देखता ॥ ३ ॥
श्रीदशलक्षण धर्म ।
उत्तम सत्य ।
जिणवयणमेव भासदितं पालेढुं असक माणो वि ।
वव्वहारेण वि अलियं ण वददि जो सच्चवाई सो ।।
अर्थात्—जो सदैव जिन सूत्रानुसार ही वचन बोलते हैं और यदि वे तीव्र कर्मके उदयसे कदाचित् उनके अनुसार चल भी नहीं सकते, तो भी कभी असत्य भाषण नहीं करते, न कभी व्यवहारमें ( अथवा हास्य कौतुक छलकर भी ) झूठ बोलते हैं वे सत्यवादी कहे जाते हैं । ऐसे पुरुषोंके वचन सदैव स्वपर कल्याणके करनेवाले होते हैं। (स्वा० का० अ०) कहा भी है कि—
सते हितं यत् कथ्यते तत् सत्यम् = अर्थात् भलाईके लिये जो बोला जाय उसे ही सत्य कहते हैं और भलाई तब ही हो सकती है जब कि वस्तुका स्वरूप जैसा है वैसा ही—न्यूनाधिकता रहित कहा जाय, इसलिये यथार्थ बोलना ही सत्य बोलना हो सकता है । उत्तम शब्द गुणवाचक है । यह बताता है कि जिस कथनमें अपनी ओरसे कुछ भी न मिलाया जाय अर्थात् जैसाका तैसा ही कहा जाय वह •सत्य है । अपनी ओरसे न्यूनाधिक तब ही किया जाता है, जब कि कुछ रागद्वेष हो, या विषय कषाय पुष्ट करना हो क्योंकि अपेक्षा -रहित पुरुष किसलिये अपने निर्मल आत्माको बात बनानेकी व्यर्थकी उलझनमें डालकर दुःखी करेगा ? अर्थात् नहीं करेगा । तात्पर्य—यह है. कि विषय, कषाय, रागद्वेषादि भाव आत्माके निजस्वभाव नहीं हैं, और झूठ बिना विषय तथा कषायभावोंके बोला उत्तम सत्य ।
नहीं जाता, इससे यह निश्चित हुआ कि झूठ परभाव है । अर्थात् आत्माका स्वभाव नहीं है और जो आत्माका स्वभाव नहीं है वह धर्म भी नहीं होसकता । इसलिये जब आत्मासे रागद्वेषादि भाव अलग होते हैं—अर्थात् जैसा जैसा इनका क्षय, क्षयोपशम व उपशम होता है, वैसा वैसा ही आत्माका स्वभाव प्रगट होता है । स्वभावके प्रगट होनेपर ही जो वस्तु जैसी है, वैसी कही जा सकती है और उसीको सत्य कहते हैं ।
इसलिये जीवमात्रका कर्तव्य है कि वे सत्य बोलें । क्योंकि व्यवहार कार्य भी सत्यके विना नहीं चल सकता । लोकमें भी जिसके वचनकी प्रतीति नहीं होती है, वह निंद्य समझा जाता है । लोग उससे घृणा करते हैं, उसका कभी कोई विश्वास नहीं करता जिससे उसका सब व्यवहार अटक जाता है, आजीविका नष्ट होजाती है । और कोई भी उसकी विपत्तिमें सहायक नहीं होता है । कहा है— “मिथ्याभापी सांच हूँ, कहे न माने कोय ।
भांड़ पुकारे पीर वश, मिस समझे सब कोय ॥ ”
झूठ बोलनेके कई कारण हैं । कोई भयसे बोलता है तो कोई लोभसे बोलता है, कोई मोहसे बोलता है, तो कोई वैरवशं बोलता है । कोई आशावश तो कोई क्रोधवश । कोई मानवश, कोई लज्जावश । कोई कौतुकसे, कोई केवल मनोरंजनके ही लिये बोलता है । इत्यादि ऐसे ही अनेक कारणोंसे लोकमें प्रायः झूठका ही व्यवहार होता है । यद्यपि बोलते समय बोलनेवालेको थोड़ा आनंदसा प्रतीत होता है अथवा झूठ प्रगट : होनेतक लोगोंमें उसकी सत्यवन्तवत् प्रतीति श्रीदशलक्षण धर्म ।
होनेसे कथंचित् उसके विषय और कषायोंकी पुष्टि भी होजाती है, तौभी प्रगट होने अर्थात् भेद खुल जानेपर सब पोल खुल जाती है और फिर उसकी एकवार भी झूठ पकड़ जानेपर सदाके लिये उससे विश्वास उठ जाता है ।
कितनेक लोग कहते हैं कि झूठ विना व्यवहार नहीं चल सकता है, परन्तु यह कल्पना उनकी झूठी है । कारण, यदि झूठ विना व्यवहार न चलता, तो सत्यकी आवश्यकता ही संसारमें न रहती । यहां तक कि लोग सत्यका नाम भी भूल जाते, परन्तु देखा जाता है कि जो लोग झूठ बोलते हैं, या अपनी झूठी बातोंका प्रचार करना चाहते हैं, या झूठसे द्रव्योपार्जन करना चाहते हैं, या मानादि कषा- योंको पुष्ट करना चाहते हैं या मनोरंजन व हास्यादिक करना चाहते हैं, वे भी तो लोगोंमें अपने झूठको सत्यरूपसे ही प्रगट करके लोगोंका विश्वास अपने ऊपर खींचते हैं और तब सत्यकी ओटमें होकर ही अपने इच्छित विषयकी पूर्ति करते हैं ।
क्योंकि यदि पहिलेसे ही लोगोंको यह प्रगट होजाय कि यह पुरुष झूठ बोलता है, तो फिर भला उसके जालमें फंसे ही कौन ? क्या कोई संसारमें ऐसा भी मनुष्य है कि जो आँखसे देखता हुआ और जानता हुआ भी अर्थात् अपने हाथमें दीपकः लिये हुबे उसका प्रकाश रहते भी कुएमें गिर जाय ? और मान लो कि कदाचित् कोई भूलसे किसी प्रकार गिर भी जाय, तो क्या वह लोकमें चतुर कहा जा सकता है ? और क्या वह सुखी हो सकता है ? नहीं, कभी नहीं । तात्पर्य-जो झूठ भी संसारमें चल जाता है और उससे जो उत्तम सत्य ।
कुछ भी लोगोंको लाभ या स्वार्थ साधन होजाता है, वह सब सत्य हीकी ओटमें होना है ।
देखो, उन लोग भी पहिले उत्तमसे उत्तम वस्तुका नमूना दिखाने के और पीछेसे कम दामकी मिलाकर माप तौल देते हैं । यदि खरीददारको पहिलेते ही यह विदित होजाय, तो वह ले ही नहीं और कदाचित् आवश्यक्तानुसार लेनेको लाचार हो, तो उतने दाम न दे, और यदि दाम भी दे तो जितना लेना चाहता था उससे कितने ही अंशोंमें कम लेवे । तात्पर्य-भेद खुलनेसे फिर उसकी बिक्री ठीक २ नहीं होगी ।
प्रायः देखा जाता है कि ऐसे धूर्त अधिकतर देशापर्यटन ही किया करते हैं, अर्थात् वे स्थिर होकर कहीं एक जगह दुकान नहीं खोल सकते, क्योंकि स्थिर कारखाने तो विश्वासपात्र पुरुषोंके ही चल सकते हैं, धूर्तोंके नहीं, इसीलिये वे हरजगहसे अपनी पोल खुलनेके पहिले ही नौ दो ग्यारह होजाते हैं, अर्थात् अन्यत्र चल देते हैं, कारण कि प्रगट होनेपर राजदंड मिलनेकी तो पूरी पूरी संभावना है । वे सदैव शंकित रहते हैं कि कहीं कोई मेरी पोल न खोलदे । और जो शंकित रहे, वह सुखी कैसा ?
तात्पर्य-झूठा सदा ही दुःखी रहता है, इसलिये सुखी होनेके लिये सदा सत्य बोलना चाहिये ।
संसारमें भी झूठ बोलनेवालेको जिहाछेदन, ताड़न, मारन, फांसी, देशनिकाला और कारागार, आदि नाना प्रकारके दंड होते हैं । और इसके विपरीत सत्यवादीका ठौर २ आदर होता है ।
श्रीदशलक्षण धर्म ।
तथा सब उसकी प्रतीति करते और चाहते हैं। देखो, महाराज रामचन्द्रजी और महाराज धर्मराजजी आदिके बचनोंका प्रभाव शत्रुपक्षपर भी पड़ता था। महाराज हरिश्चंद्र तथा राजा बलि आदिका नाम उनके सत्यवादी होने हीसे लोकमें अमर होगया । महाराज दशरथ, रतिपति वसुदेव अपने बचनों हीसे लोकमें चिरस्मरणीय हुए हैं। आजकल भी एक वचन हीकी प्रतीतिपर हुंडी पुरजादि द्वारा लाखों करोड़ों रुपयोंका व्यवहार चलता है । तात्पर्य-जहांतक लोकमें प्रतीति है वहांतक ही सब कुछ है और दिवाला निकलनेपर अर्थात् बात बिगड़ जानेपर मुँह काला होजाता है। राजा वसु झूठके कारण ही तीसरे नरकमें गया और कौरव, लोकमें निंद्य कहाये ।
ध्यान रहे कि थोड़ासा भी झूठ कभी २ प्राण तकका घात
कर डालता है। एक कथा है कि किसी एक स्थानमें कोई सेठ था, उसने एक नौकर रक्खा । उस नौकरने सेठसे यह बचन लेलिया था कि सालभर.आपका काम तनमनसे सच्चा करूंगा, परन्तु वर्षमें एक दिन केवल एक ही बार झूठ बोलूँगा। सेठजीने यह स्वीकारकर लिया, यह सोचकर कि एकबार झूठ बोलनेमें क्या होगा ? सालभर तो अच्छा कार्य कर सकेगा। निदान नौकरने सालभरतक कठिन परिश्रमद्वारा सेठजीको बहुत प्रसन्न किया और सालके अन्तमें सेठसे बोला कि—“मैं कल झूठ बोलूंगा ।” सेठने यह सुनकर भी इस बातको उपेक्षाभावसे भुला दिया ।
बस, नौकरने दूसरे दिन सवेरे सेठानीसे कह दिया कि “सेठ व्यभिचारी हैं और वे नित्य अमुक वेश्याके यहां जाते हैं इसलिये उत्तम सत्य ।
आज रातको तुम उस्तरासे सोते समय सेठजीकी एक ओरकी दाड़ी व मृछ मुण्ड देना । इससे जब वे वहां जायेंगे और जब वेश्या उन्हें पहिचानेगी नहीं, तब पीछे आंयगे और उनका सब भेद खुल जायगा, त्तव हंसीका अवसर होगा और सेठजी यह निंद्यकर्म छोड़ देंगे ।” सेठानीके सहमत होनेपर वह सेठजीके पास गया और बोला—
“स्वामिन् ! मैं आपका सेवक हूँ, इसलिये सवप्रकार आपकी भलाईमें रहना मेरा कर्त्तव्य है । आपके प्राण अपने प्राणोंसे भी प्रिय जानता हूँ, इसलिये निवेदन करता हूँ कि आज रात्रिको आप सचेत्त रहें, क्योंकि प्राणोंका भय है ।”
सेटने पूछा-“तुझे कैसे मालूम हुआ ?” तब वह नौकर
बोला-“ स्वामिन् ! सेठानीजी नित्यप्रति रात्रिको चुपकेसे किसी पुरुषको घर बुलाती हैं सो आजतक मैंने यह बात भय तथा लज्जावश आपसे छिपा रक्खी थी, परन्तु जब आज आपके प्राणोंपर ही चोट आन पहुंची तब कहना ही पड़ा कि आज सेठानी अपने प्रेमीके आदेशानुसार उस्तरेसे सोते समय आपका गला काटनेवाली हैं और इसलिये वे पहिले परीक्षाके लिये आपकी दाढ़ी और मुंछे खूब पानीसे त्तर करेंगी । जब आपको अचेत सोया जानेंगी, झटसे. उस्तरा निकाल- कर तमाम काम कर देंगी” इसलिये आप सावधान रहें ।
सेट तो नौकरके झूठ बोलनेकी बातको भूल ही चुके थे,
इसलिये उसकी बात पर विश्वास करके संचित्य होगये और जब रात्रि हुई तो बगलमें नंगी, तलवार छुपाकर पलंगपर पड़ रहे । इधर सेठानी भी अपना उस्तरा और पानी रखपड़ रहीं। निदान मध्यरात्रिका ।
श्रीदशलक्षण धर्म ।
समय हुआ तो सेठानीने सेठकी दाढ़ी भिजाकर ज्यों ही उनकी दाढ़ी मूछ मूंडनेको छुरा निकाला कि सेठजी झटसे तलवार लेकर उठ बैठे और चोटी पकड़कर सेठानीको मारना ही चाहते थे, कि सेठानी चिल्लाई और उसके चिल्लानेसे फेरीवाला (गस्तवाला) सिपाही एकदम आगया और हल्ला मचा दिया । जत्र सवेरा हुआ और इस विषयकी खोज की गई, तो नौकरने सच बात कहदी जिससे स्ठ सेठानी आंतिरहित हुए अन्यथा सेठानीकी हत्या और सेठको सूली तो होती ही जिससे एक गृहस्थका नाम निःशेष होजाता ।
इस घटना के कारण नौकर सदाके लिये नौकरीसे अलग किया गया, और भी दूसरे लोग उससे हिचकने लगे। उसका सत्र कठिन परिश्रम व्यर्थ गया और इनाम यह मिली कि आजीविका नष्ट होगई फिर उसे किसीने नहीं रक्खा, वेचारा भृख, प्यासले पीड़ित हो भिक्षा मांगते मांगते मर गया । तात्पर्य-एकबार के झूटसे जब यहांतक नौबत पहुंची तो जो निरंतर झूठ बोलें उसका कहना ही क्या है ? इसलिये झूठ उभयपक्षमें हानिकर समझकर छोड़ देना ही हितकारी है। और भी देखो, कि यदि घरका पुत्र, स्त्री, भाई, बहिन आदि कोई भी झूठा हो तो लोग उसका विश्वास न करके करोड़ोंकी सम्पत्ति गैरआदमी (मुनीम, रोकड़िया, दिवान, भंडारी आदि) को सौंप देते हैं। यह सत्यहीका प्रभाव है। कहा भी है- " सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पापः ।
जाके हृदय सांच है, ताके हृदय आप ॥ "
इसलिये कदाचित् सच बोलनेमें प्रगटरूपसे कुछ आपत्तिः भी उत्तम सत्य ।
आवे, भय भी हो, तो भी अपने सत्यको नहीं छोड़ना चाहिये, क्योंकि यह आपत्ति भी परीक्षाके लिये आती है। कहा भी है-
“धीरज धर्म मित्र अरु नारी ।
आपत काल परखिये चारी ।।”
वास्तवमें आपत्ति एक कसौटी है, इससे ही पुरुषोंके धैर्यादि धर्मोंकी दृढ़ताकी परीक्षा होती है। सोना जितनी चार आंच देकर तपाया जाता है या कसौटीपर कसा जाता है, उतनी ही उसकी कीमत बढ़ती है। ठीक, इसी प्रकार सत्यनिष्ठ पुरुषोंका भी हाल होता है। वे परीक्षा होनेसे जगत्पूज्य होजाते हैं और परीक्षामें फैल हो जानेसे वे फिर घूरेका कूरा (कचरा) होजाते हैं, इसलिये सदा दृढ़ सत्यव्रती बनना चाहिये ।
देखो, एकेन्द्री, द्वीन्द्री, त्रीन्द्री और चतुरिन्द्री तथा असैनी पंचेंद्री आदि जीवोंके तो भाषावर्गणा (बोलनेकी शक्ति) ही नहीं होती और सैनी पंचेंद्री पशुओंके यद्यपि बोलनेकी शक्ति होती है तो भी वे साक्षर वचन कोई भापात्मक शब्द नहीं बोल सकते और मनुष्योंमें भी बच्चे दो तीन वर्षतक तो गूँगे ही रहते हैं, और कई तो आजन्म तक भी गूँगे रहते हैं। इसलिये बड़ी कठिनतासे प्राप्त की हुई यह वाक्य-शक्ति मिथ्या भाषण करके ज्योंत्यों खो देना कितनी बड़ी भूल है ?
किसी भी बातको विपर्यय कहना मात्र ही झूठ नहीं है, किन्तु जिस वचनसे अपने आप व परको पीड़ा उपजे, या स्वपरका घात हो जावे यह सब ही झूठ है। निंदा करना, हास्य करना, परस्पर कलह श्रीदशलक्षण धर्म ।
करना या करा देना, किसीकी गुप्त वार्ता प्रगट करना, खोटा लेख लिखना, राजाज्ञा भंग करना, शब्दोंका अर्थ बदल देना, हठवाद करना, पापीजनोंका पक्ष लेना और धर्मात्माओंसे विरोध करना आर्पप्रणीत सत् शास्त्रोंको दूषित व स्वार्थीजनों द्वारा संपादित बताना, स्वप्रशंसा करना, झूठी साक्षी भरना, भण्ड वचन बोलना, गाली देना, विषय और कषायोंमें फँसानेवाला उपदेश देना, शृङ्गाररसके ग्रंथ बनाना, न्यायविरुद्धः वचनें बोलना, इत्यादि और भी अनेक प्रकारका झूठ होता है, जिससे मनुष्यमात्रको बचना चाहिये । सत् पुरुष योग्या- योग्य अवसर देखकर ही बहुत सोच समझकर वचन बोलते हैं अथवा झूठ बोलनेके बदले मौन ही धारण कर लेते हैं । क्योंकि जहांपर सत्य बोलने अर्थात् जैसाका वैसा कहनेमें भी सत्यको झूठ समझे जानेकी संभावना हो, या उससे अपने आप व परको अन्यायपूर्वक पीड़ा होजानेकी संभावना हो, वहांपर मौन ही रखना श्रेष्ठ समझा जाता है । इसलिये द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका विचार करके तदनुसार न्यायपूर्वक हितमित वचन बोलना सो ही सत्य वचन है ।
इसलिये इस लौकिक और पारलौकिक दुःखोंसे निवृत्त होने
व सुखकी प्राप्तिके लिये सत्य वचन ही ग्रहण करना योग्य है । सो ही कहा है—
कठिन वचन मत बोल, परनिंदा अरु झूठ तज ।
सांच जवाहर खोल, सतवादी जगमें सुखी ॥ १ ॥
उत्तम सत्य वरत पालीजे, पर विश्वासघात ना कीजे ।
सांचे झूठे मानस देखे, आपन पूत स्वपास न पेखे ॥ २ ॥
• उत्तम शौच ।
पेखे तिहायत पुरुप, सांचेको दरब सब दीजिये ।
मुनिराज श्रावककी प्रतिष्ठा, सांच गुन लख लीजिये ॥ ३ ॥ ऊँचे सिंहासन बैठी वसु, नृप धर्मका भूपति भया ।
वसु झूठसेती नर्क पहुंचा, स्वर्गमें नारद गया ॥ ४ ॥ “ सत्यमेव सदा जयति
उत्तम शौच।
सम संतोष जलेण य जो धोवदि तिण्ह लोहमले पुं।
भोयणगिद्धिविहिणो तस्सु सुचित्तं हवे विमलं ॥
अर्थात् —जो समता अर्थात् संतोषरूपी जलसे तृष्णा (लोभ) रूपी महा मलको धोते हैं, यहांतक कि भोजनमें भी जिनको गृद्धता अर्थात् तीव्र लालसा (चाहना) नहीं होती, उसीके उत्तम शौच धर्म कहा जाता है। (स्वा० का० अ०) और भी कहते हैं—
शुचेर्भावः इति शौचः—अर्थात् भावोंकी शुद्धिका होना सो ही शुद्धता अर्थात् शौच है। उत्तम विशेषण है, जो कि किंचिन्मात्र भी मलीनताके अभावका सूचक है। वास्तवमें यह शौचधर्म आत्माका ही स्वभाव है कारण कि शौच धर्म अन्तरङ्ग आत्मासे लोभादि कषायोंके अलग हो जानेपर ही प्रगट होता है। लोभादि कषायें पर पदार्थोकी चाह रूप प्राप्तिकी इच्छासे उत्पन्न होती हैं, इसलिये ये परभाव हैं। सो इन परभावोंके अभाव होनेपर जो आत्माका स्वभाव प्रगट होना सो निश्चय शौच धर्म है ।
श्रीदशलक्षण धर्म ।
व्यवहार शौच, बाह्य शुद्धिको कहते हैं-अर्थात् देह, गेह, वसन, भूषण आदिकी शुद्धताको शौच कहते हैं, परन्तु अंतरंग शुद्धि विना यह बाह्य शुद्धि विशेष प्रयोजनीय नहीं होती। वह बाह्य शुद्धि तो केवल उस मद्यसे भरे हुए घड़ेके समान है कि जो बाहिरसे तो साफ सुथरा है परन्तु भीतर मद्यसे मलिन होरहा है। अर्थात् जिस घड़ेमें शराब भरी है, उस घड़ेको बाहिरसे खूच मलमलकर धोनेपर भी उसकी दुर्गधि कभी दूर नहीं हो सक्ती ।
इसी प्रकार यह शरीर जो रज (माताके रुधिर) और वीर्य
(पिताके शुक्र) का पिंडरूप मल, मूत्र, रुधिर, पीव, मांस, मज्जा आदिका घृणित थैला है सो नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंसे धोने- पर भी कभी शुद्ध नहीं होता किन्तु उल्टे इसके स्पर्शमात्रसे संपूर्ण शुद्ध व सुगन्धित पदार्थ भी दुर्गंधित व घृणित होजाते हैं। देखो, निरंतर इस शरीरसे आंख, नाक, कान, मुँह, गुदा, योनि, लिंग आदि द्वारोंमेंसे दुर्गंधित पदार्थ (मल) ही झड़ता रहता है। यह अपने संबं- धसे केशर, कस्तूरी, कर्पूर आदि पदार्थोंको भी अल्पकालमें ही मलरूप कर डालता है। ऐसा दुर्गंधित घृणित महा-अपवित्र शरीर जलादिकसे धोनेपर कैसे पवित्र हो सकता है ? कदापि नहीं, कदापि नहीं । यह सदा मैला है, क्योंकि यह स्वभावसे अपवित्र है। इसलिये ऐसे मैले अपवित्र शरीरको धो पोंछ करके शुद्ध मानं लेना नितान्त भूल है । इसलिये साधुजन, जिन्होंने अपने अखण्ड सच्चिदानन्द स्वरूप परम शुद्धात्माको इस शरीरसे सर्वथा भिन्न जान- कर इसे छोड़ रक्खा है, वे इसकी कुछ भी अपेक्षा न करके अपने उत्तम शौच ।
अनन्त दर्शन, ज्ञान, सुखमयी चैतन्य स्वरूप आत्मामें ही मग्न रहते हैं । वे इम घृणित शरीरके संस्कार करनेमें अपना समय व्यर्थ नहीं बिताते क्योंकि वे जानते हैं कि प्रथम तो यह शरीर अपवित्र है सो तो कदापि शुद्ध हो ही नहीं सकता जैसे कि कोयला दूधसे धोनेपर भी कभी सफेद नहीं होता । दूसरे यह आयु-कर्मके आधीन होनेसे अस्थिर है । तीसरे बुढ़ापा और रोगोंसे भरा हुवा तथा जड़ अर्थात् अचेतन है, अनेक प्रकारसे सुरक्षित रखनेपर भी सुरक्षित नहीं रह सकता और न कभी साथ ही देता है । किसी कबिने कहा है- (प्रश्नोत्तर, चेतन और कायका ।)
'चेतन-सोलह श्रृंगार विलेपन भूपणसे निशिवासर तोहि सम्हारे, पुष्टि करी बहु भोजनपान दे धर्म अरु कर्म सबै ही विसारे। सेये मिथ्यात्व अन्याय करे बहुते तुझ कारण जीव संहारे, भक्ष गिनो न अभक्ष गिनों अब तो चल संग तू काय हमारे ।।१ काय-ये अनहोनी कहो क्या चेतन भांग खाय कै भये मतवारे, संग गई न चलूं अब हूँ लखि ये तो स्त्रभाव अनादि हमारे। इन्द्र नरेन्द्र धनेन्द्रनके नहिं संग गई तुम कौन विचारे, कोटि उपाय करो तुम चेतन तो हू चलूँ नहिं संग तुम्हारे ॥२॥ तात्पर्य - जड़ और चेतन ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, तब अनमेलका मेल कैसा ; ऐसा समझकर वे इसकी कुछ भी अपेक्षा न करके सोचते हैं-
यावन्न ग्रस्यते रोगेः यावन्नाभ्येति ते जरा ।
यांवन्न क्षीयते 'चायुस्तावत् कल्याणमाचर ।।
४२ ] श्रीदशलक्षण धर्म ।
अर्थात् – जबतक रोगोंने नहीं घेरा है, बुढ़ापा नहीं आया है और आयु क्षीण नहीं हुई है, तबतक कल्याण कर लेना चाहिये । क्योंकि—
“सदा दौर दौरा जु रहता नहीं ।
गया वक्त फिर हाथ आता नहीं ॥”
यही कारण है कि साधु आदिका शरीर यद्यपि ऊपरसे मलीन
दिखता है, परन्तु उनका अन्तरंग आत्मा तो सदा शुद्ध ही होता है । परन्तु सँसारी गृहस्थियोंका चरित्र इससे बिलकुल उल्टा है— अर्थात् वे केवल शारीरिक शुद्धिको ही शुद्धि मानते और गंगादि नदियोंमें नहाकर अपनेको कृत्यकृत्य मान बैठते हैं, परन्तु उनकी यह भूल है, यद्यपि शारीरिक अथवा बाह्य शुद्धि गृहस्थियोंको अत्यावश्यक है, सो वह तो उन्हें रखना ही चाहिये, क्योंकि देह, गेह, भोजनादि बाह्य शुद्धि विना प्रथम तो उनका व्यवहार मलीन होजाता है, उनके नाना प्रकारके रोम उत्पन्न होजाते हैं, चित्तकी प्रसन्नता नष्ट होजाती है, सदा आलस्य आया करता है और लोकनिंद्य भी होजाते हैं । इसके सिवाय बाह्य शुद्धि गृहस्थोंको अन्तरंग शुद्धिका भी कारण है, तो भी यह शुद्धि अन्तरंगकी शुद्धि विना विशेष लाभकारी नहीं होती । इसलिये बाह्य शुद्धिके साथ साथ अन्तरंग शुद्धिका होना आवश्यक है ।
सबसे अधिक अन्तरंग मैलापन आत्मामें लोभसे होता है ।
देखो, यह (सूक्ष्म लोभ भी) उपशम श्रेणीवाले मुनियों तकको भी ग्यारहवें गुणस्थानसे गिराकर नीचे पटक देता है । कहा भी है किः उत्तम शौच ।
“लोभ पापका बाप बखाना” अर्थात् लोभी पुरुष न करने योग्य भी सब कार्य करता है । वह हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील आदि किसी पापसे भी नहीं डरता है तथा निरन्तर जिस तिस प्रकार तीन लोककी संपत्तिको अपनाना चाहता है, परन्तु विना पुण्यके क्या कुछ भी कभी पा सकता है ? कभी नहीं । इसके सिवाय सोचो तो सही कि लोकमें तो संपत्ति जितनी है, उतनी ही है । और उतनी ही रहती रहेगी और प्रत्येक जीवको तृष्णा इतनी है कि कदाचित् उसे यह सब संपत्ति मिल जाय जैसा कि होना असंभव है तो भी उसकी तृष्णाके असंख्यातवें अंशकी पूर्ति न हो, और जीव संसारमें अनंता- नंत हैं, तब कैसे कहा जाय कि वह कभी भी उसका स्वामी होकर तृप्त हो सकेगा अर्थात् उसकी इच्छाकी पूर्ति होकर वह सुखी हो सकेगा ? कभी नहीं, कभी नहीं ।
इसलिये ऐसी लोभ तृष्णाको छोड़नेवाले परम वीतरागी पुरुष ही सुखी हुए वा हो सकते हैं और शेष संसारी जीव तो निरन्तर तृष्णाग्निमें जला ही करते हैं । इससे निश्चित है कि—जहांतक आशा तृष्णा वा चाह लगी रहती है, वहांतक जीव कभी सुखी नहीं हो सकता । एक संतोषी पुरुष ही सदा सुखी रहता है । संतोषी ही उच्च और लोभी पुरुष संसारमें नीच समझा जाता है । जैसा कि कहा है—
"देव कहे सो नीच है, नहीं कहे महा नीच ।
लेब कहे ऊँचा पुरुष, नहीं लेय महा ऊँ ॥ "
संसारमें मनुष्योंका तभीतक आदर रहता है, जबतक वे कुछ श्रीदशलक्षण धर्म ।
किसीसे मांगते नहीं हैं और ज्यों ही उन्होंने किसीसे कुछ मांगा कि उसी समय वे लोगोंकी दृष्टिसे उतर जाते हैं । लोभी पुरुष चाहे जहां नीच उच्च सबके साम्हने, दीन होता है । लज्जा तो उससे कोसों दूर चली जाती है । वह शीत, उष्ण, भूख, प्यास, सब कुछ सहता है, स्त्री पुत्रोंसे विलग होजाता है, सब लोगोंका निष्कारण वैरी बन जाता है, देश विदेशोंमें भटकता रहता है, भक्षाभक्ष खाता है । वह न कभी पेटभर अनाज खाता है और न तनभर कपड़े पहिनता है, किन्तु निरं- तर सम्पत्ति जोड़ता जोड़ता मर जाता है । वह आप तो खर्चना जानता ही नहीं, परन्तु औरोंको भी खर्चते देखकर घबरा जाता है । जैसा कहा है—
“ नारी पूछे सूमकी, काहे बदन मलीन ? ।
क्या तुम्हरो कुछ गिर गयो ? या काहूको दीन ? ॥१॥
सूम कहे नारी सूनो गिरो न मैं कुछ दीन ।
देतन देखो औरको, तासों वदन मलीन ॥२॥ इत्यादि ।
यद्यपि संसारके सभी प्राणी यह प्रत्यक्ष देखते हैं कि जब मनुष्य उत्पन्न हुआ था तब नग्न ही था और जब मरता है, तब भी नग्न ही मरेगा और यह सब परिग्रह यहीं पड़ा रह जायगा, एक तागा भी साथ नहीं जायगा, जैसा कि कहा है—
“आये कुछ लाये नहीं; गये न कुछ लेजायँ ।
बिच पायो बिच ही नश्यो, चिंता करे बलाय ।।”
तात्पर्य—तृष्णा किस वस्तुकी ? यह सब तो कर्मकृत उपाधि है इसलिये ऐसे लोभ तथा तृष्णादिसे. अपने अन्तरंग आत्माको रहित उत्तम संयम ।
करना और बाह्य शरीरादिकी शुद्धि करना यही उत्तम शौचधर्म सब जीवोंको उपादेय है। कहा है कि—
धार हृदय संतोष. करहि तपस्या देहसों ।
शौच सदा निर्दोष, सुख पावे प्राणी सदा ।।
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पापका बाप बखाना।
आशा फांस महा दुखदानी, सुख पावे संतोपी प्राणी ॥ प्राणी सदा शुचिशील, जप. तप, ज्ञान, ध्यान, प्रभावतें । नित गंग, यमुन समुद्र व्हाये अशुचि दोष स्वभावतें ॥ ऊपर अमल मद भरो भीतर कौन विधि घट शुचि कहे।
बहु देह मैली सुगुण थैली शौच गुण साधु लहे ॥५॥
उत्तम संयम ।
जो जीव रक्खणपरो, गमणागमणादिसव्वकम्मेसु ।
तण छेदंषि ण इच्छदि संयम भावो हवे तस्स ॥ ६ ॥
अर्थात्—जो गमनागमनादि समस्त क्रिया कर्मोंमें भी तृण (हरितकाय स्थावरजीव) तक छेदना नहीं चाहते, इस प्रकार जीवोंकी रक्षामें तत्पर (सावधान) रहते हैं तथा अपनी इन्द्रियोंको विषयोंसे रोकते हैं ताकि उनके निमित्तसे किसी भी प्राणीके द्रव्य व भाव- प्राणोंका घात न हो, और न उनके आश्रय अपने कर्मास्रव हो, उनके उत्तम शौच धर्म होता है ।
"(स्वा० का० अ०)
और भी कहते है—
“इन्द्रियनिरोधः संयमः” इन्द्रियोंको विषयोंसे रोकना सो संयम श्रीदशलक्षण धर्म ।
है । उत्तम शब्द विशेषण है, अर्थात् किसी भी प्रकारके छल कपट वा ख्याति लाभादिकी इच्छाके विना भले प्रकारसे इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे रोकना अर्थत् विषयोंका सेवन नहीं करना जिससे कि प्राण रक्षा हो सके सो उत्तम संयम है ।
यह संयम धर्म आत्माका स्वभाव है और ये इन्द्रियां नड़ हैं जो नामकर्मके उदयसे प्राप्त हुई हैं, और इनके विषय भी जड़ हैं जो उदयजनित अन्तरायकर्मके क्षयोपशमसे कर्मानुसार प्राप्त होते हैं, और इनको भोगनेवाला भी जड़ शरीर ही है तथा जीव चैतन्य स्वभाववाला दर्शन, ज्ञान, सुख, वीर्यादि अनन्त गुणोंका आधार स्वरूप शुद्ध चेतना मात्र है । वह इन कर्मजनित उपाधियोंसे भिन्न है और जो सदा अपने ही दर्शन ज्ञानमयी स्वरूपमें रमण करनेवाला है । सो वह इस जड़ शरीरके साथ विषयोंकी इच्छासे अपने अपने वास्तविक स्वरूपको भूला हुआ, अनादि काल्से संसारमें सुर, नर, नरक और पशुगति सम्बन्धी चौरासी लक्ष योनियोंके १९९॥ लक्ष कोटि कुलोंमें भटकता अर्थात् जन्म मरण करता और दुःख भोगता रहता है, परन्तु जिस- समय वह अपने स्वरूपको विचारता है, तत्र ही शरीरादि समस्त जड़ पदार्थोंसे भिन्न अपने ही भीतर आप ही अपने एक ज्ञायकस्वरूप शुद्ध परमात्माको देखता है और इन्द्रियोंके विषयोंको कर्मकृत उपाधि समझकर उनसे अपना मुँह मोड़ लेता है, अर्थात् उन्हें छोड़ देता है, तत्र ही यह अपने सच्चे ज्ञायक स्वरूपका लाभ करके स्वानुभवरूपी सुखमें मग्न हुआ परम वीतराग अवस्थाको प्राप्त होता है, और तत्र ही सच्चा सुखी कहा जाता है ।
उत्तम संयम ।
परन्तु जबतक इन्द्रियोंकी चंचलता बनी रहती है अर्थात् जब- तक वे विषयोंकी ओर लगी रहती हैं, अर्थात् इन्द्रियां विषयोंको चाहती व भोगती रहती हैं तबतक स्वरूपका अनुभव नहीं होसक्ता इसलिये इन्द्रियोंको विषयोंसे रोकना ही उत्तम संयमको प्राप्त होना अर्थात् स्वभावकी प्राप्ति होना है और यही आत्माका धर्म है, इस- लिये संयम धर्म आत्माका है और सुखाभिलाषी जीवोंको इसे अवश्य ही धारण करना चाहिये ।
प्रायः संसारी जीवोंको विषयसेवन करनेमें ही आनन्दानुभव होता है और इसलिये उन्होंने अपना यह सिद्धांत निकाल रखा है कि- “ यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनरागमनं कुतः ॥ १ ॥
अर्थात् - जबतक जीना सुखपूर्वक-इन्द्रियभोग भोगते हुए जीना चाहे कर्ज भी क्यों न करना पड़े, तो भी चिन्ता नहीं करना और ऋण लेकर भी घी पीना, क्योंकि शरीरके भस्मीभूत होजानेपर फिर आवागमन कैसा ? अंग्रेजीमें कहते हैं:—
अर्थात् - खावो, पीवो और मजा उड़ावो, परन्तु उनका यह विचार ठीक नहीं है। क्योंकि ऐसा विचार वे ही अज्ञानी, नास्तिक मती करते हैं, जो आत्माका अस्तित्व व आवागमन और परलोक नहीं मानते और यदि ऐसा भी माने तो ये विषय सामग्रियां इच्छा- नुसार प्राप्त ही कहां होती है ? अथवा कदाचित् कर्मयोगसे थोड़ी बहुत मिलती भी है, तो निरन्तर चाह बढ़ती ही जाती है, जिससे श्रीदशलक्षण धर्म ।
कभी तृप्ति नहीं होती । जैसे कि अग्निमें ज्यों ज्यों ईंधन डाला जाता है त्यों त्यों वह और प्रज्वलित होती है तैसे ही विषयोंको सेवन करते हुए निरंतर चह बढ़ती ही जाती है । अथवा जैसे खाजको खुजानेसे यद्यपि प्रथम सुख जैसा मालूम होता है, परन्तु पीछे और भी अधिक वेदना बढ़ जाती है और खुजानेकी लालसा भी कम
नहीं होती वैसे ही विषयभोग पहिले तो सेवन करते हुए अच्छेसे लगते हैं, परन्तु अन्तमें फल भोगते हुए दुःखदायी होकर परिणमते हैं। इन्हींके कारण कई आदमी आतशक, सुजाक आदिको बीमा-
रियोंसे पीड़ित देखे जाते हैं । विषयी जीवोंके हाथ पांव शिथिल हो जाते हैं, आंखें अंदर गुस जाती और दृष्टि मंद पड़ जाती है, शरीरकी कांति बिगड़ जाती है, कानोंसे कम सुनाई देने लगता है, नाकसे श्लेष्म वहा करता है, मुँहसे लार टपकने लगती है, शरीरकी सब हड्डी पसली दिखने लग जाती हैं, रक्त, मांस, वीर्यादि सत्र सूख जाते हैं, द्रव्य नाश होजाता है, लोकसे प्रतीति उठ जाती है, सब लोग उनसे घृणा करने लगजाते हैं, यहांतक कि उनको मक्खियां उड़ाते हुए घरोघर भीख मांगने पर भी खानेको दाने नहीं मिलते हैं । कहा है—
“ यौवन था तब रूप था, ग्राहक थे सब कोय ।
यौवन रूप गयो जबै, बात न पूछे कोय ॥ १ ॥ ”.
विषयोंका सुख क्षणभंगुर है । फिर भी यदि विषयोंमें कदाचित् क्षणस्थायी सुख समझा जाय तो भी असंगत है । कारण, एक जीव जिस पदार्थको भला मानता है दूसरा उसीको बुरा समझता है, तब उत्तम संयम ।
कैसे कहा जाय कि विषयोंमें सुख है? यदि विषयोंमें सुख होता, तो फिर उनके सेवन करनेका फरु दुःखदायी क्यों होता ? देखो, कहा है- “अली. मातंग, मृग, सल, मीन, विषय इक इकमें मरते हैं। नतीजा क्या न पावें वे, विषय पांचों जो करते हैं ? ।।” अर्थात्-भौंरा नासिका वश. हाथी मैथुन वश, मृग कानवश, पतंग आंख वश, और मछली जिह्वा वश, ये पांचों एक एक इन्द्रियके आधीन होकर प्राण खो बैठते हैं तब जो पांचों इन्द्रियोंके वश रहते हैं वे क्यों नही दुःख भोगेंगे ? अवश्य ही भोगेंगे ।
इसलिये ये विषय सच्चे सुखाभिलापी पुरुर्योको विपधर सर्पके समान छोड़ने योग्य हैं। संसारमें जो मोही जीव हैं वे ही इनका दुष्परिणाम देखते हुए भी नहीं छोड़ते हैं, सो वे पुरुष आंख रहते हुए भी अन्धेके समान संसार-कूपमें गिरते हैं और अपने साथ अनु- यायियोंको भी ले डूचते हैं। कहा है-
" आप डुबन्ते पांडे, ले डूवें यजमान ।"
यथार्थमें जो पुरुष अन्य जीवोंको विषय कपायोंसे छुड़ाकर सन्मार्गमें नहीं लगाते, न आप सन्मार्गमें लगते हैं; किन्तु उल्टा उन्हें विषयोंमें फँसानेके लिये उत्तेजना वा सिखावन देते हैं सो ऐसे पुरुष प्रगटरूपसे भले ही 'हितू जैसे प्रतीत होतें हैं, परन्तु वास्तवमें तो उनके परम शत्रु हैं, 'कारण कि जो बात विना सिखाये ही जीवोंमें आजाती हैं तब उनके सिखानेसे तो क्या होगा, उसका कहना ही क्या है ? जैसा कि कहा है-
श्रीदशलक्षण धर्म ।
"राग उदै जग अन्ध भयो सहजहि सब लोगन लाज गमाई।
सीख विना सब सीखत हैं विपयानके सेवनकी चतुराई ।।
तापर और रचें रसकाव्य कहा कहिये तिनकी निट्टराई ।
अन्ध असूझनकी अंखियानमें झोंकत हैं रज रामदुहाई ।।१।।" तात्पर्य – विषय कपाय तो अनादिसे ही जीवको लग रहे
हैं जिनके कारण वे चतुर्गतियोंमें दुःख भोगते हैं । इसलिये इनके सेवनका उपदेश देना व्यर्थ है । वास्तवमें आवश्यकता तो है इन विषयोंके छोड़ने और उपदेश द्वारा अन्यको इनसे विरक्त कराकर छुड़ानेकी तथा सन्मार्गमें लगानेकी । कारण, कि यदि यह अपूर्व और दुर्लभ अवसर हाथसे निकल गया, अर्थात् मनुष्य जन्म विषयोंमें बीत गया. तो फिर अनन्त भवोंमें भी इसका पाना दुर्लभ है । जैसे-समुद्रमें गिरी हुई राईका दाना फिर हाथ आना कठिन है और यह उत्तम संयम सिवाय मनुष्य-जन्मके अन्य देव, नरक, पशु आदि गतियोंमें नहीं हो सकता, इसलिये यदि अवसर पर चूके, तो पछतावा मात्र रह जायगा । जैसे कोई अज्ञानी पुरुष चिन्तामणिको पाकर काग उड़ा- नेमें फेंककर पीछे पछताता है । इसलिये ऐसा समझकर किः— “ मानुष्यं वरवंशजन्मविभवो दीर्घायुरारोग्यता ।
सन्मित्रं सुसुतः सती प्रियतमा भक्तिश्च नारायणे ।
विद्वत्त्वं सुजनत्वमिन्द्रियजयः सत्पात्रदाने रतिः । 'ते पुण्वेन विना चतुर्दशगुणाः संसारिणां दुर्लभाः ॥” अर्थात् — मनुष्यत्व, उत्तमकुलमें जन्म होना, विभवै, सम्पत्ति, दीर्घ आयु, आरोग्य शरीर, उत्तम संगैति, सुपुत्र, 'सती स्त्री, प्रभुं उत्तम संयम ।
(जिनेन्द्र) मैक्ति, विधी (ज्ञान विवेक); सञ्जनता, इन्द्रियविजय, और सत्पात्र दानमें रति होना ये १४ बातें संसारी जीवोंको उत्तरोत्तर दुर्लभ हैं, यह विचार कर सदा उत्तम संयम धर्मको यथाशक्ति धारण करके सच्चे अविनाशी सुखको प्राप्त करना चाहिये । यह संयम धर्म इन्द्रियोंके रोकने पर होता है। और इन्द्रियोंको विषयोंसे रोकनेका सहज उशय यह है कि संसार, देह, भोगके स्वरूपका विचार करना, अर्थात् अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आश्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म इन द्वादशानुप्रेक्षाओंका इस प्रकार चितवन करना कि— विश्वमें जो वस्तु उपजत नाश तिनका होयगा ।
तू त्याग इनहि अनित्य लखकर नहीं पीछे रोयगा ॥१॥
देव इन्द्र नरेन्द्र खगपति तथा पशुगति जानिये ।
आयु अंदे मेरे सब ही शरण किसकी ठानिये ॥२॥
पिता मरकर पुत्र हो अरु पुत्र मर आता सही ।
'परिवर्तरूपी जगतमें चहु स्वांग धारत जीव ही ॥३॥ स्वर्ग नर्क हि एक जावे दुख सुःख भोगे एक ही ।
कर्म-फल शुभ अशुभ जेते अन्यको वाटें नहीं ॥४॥
काय जब अपनी न होवे सेव ज़िर्हि नित ठानिये । .
त्तो अन्य वस्तु प्रत्यक्ष पर है अपनी कैसे मानिये ॥५॥ मल मूत्र आदि पुरीष जामें हाड़ मांस सु. जानिये । बिन देह गेह सु चाम लिपटी महां अशुचि वखानिये ॥६॥ श्रीदशलक्षण धर्म ।
मन वचन काय त्रियोग द्वारा भाव चंचल होरहे ।
तिनसे जु द्रव्य अरु भाव आस्रव होय मुनिवर यों कहे ॥७॥ योगका चंचलपना रोके जु चतुर बनायके ।
तब कर्म आवत रुकें निश्चय यह सुनो मन लायके ॥८॥
व्रत समिति पंचरु गुप्ति तीनों धर्म दश उर धारके । तप तपें द्वादश सहें परिषह कर्म डारें जारके ॥९॥ यह लोक मनुजाकर तीनों ऊर्ध्व मथ पाताल है।
तिनमें सुजीव अनादिसे भटके हुवा बेहाल है ॥१०॥
कल्पतरु अरु कामधेनू रत्न चिन्तामणि सही ।
जांचे बिना फल देत. नाहीं धर्म दे बिन इंच्छही ॥११॥ संसारमें सब सुलभ जानो द्रव्य या पदवी सही ।
इक “दीपचन्द्र” अनन्तभवमें बोधिदुर्लभ है यही ॥१२॥ इत्यादि चिंतवन करनेसे संयम भाव दृढ़ रहते हैं।
यह संयम दो प्रकारका है-इन्द्रियसंयम और प्राणिसंयम । बाह्य इन्द्रियोंको विषयसेवनसे रोकना और अंतरंग आत्मासे विषयोंकी इच्छाको दूर कर देना सो इन्द्रियसंयम है और षट्कायके जीवोंकी -रक्षारूप दया पालना सो प्राणिसंयम है। वास्तवमें अन्तरंग संयमके विना बाह्य संयम कार्यकारी नहीं होता है । जैसे ऊपरसे किसी प्रका- -रका त्याग कर दिया, या उपवासादि कर लिया और अन्तरङ्ग विषय कषाय कैसी ही बनी रहीं, तो उससे कुछ लाभ नहीं होता । कहा है- " कषायविषयाहारो, त्यागो 'यंत्र विधीयते ।-
उपवासो स विज्ञेयः, शेषं लंघनके विदुः ॥११॥"
उत्तम संयम ।
अर्थात्-विषय कपायोंका त्याग जहां होता है, वहीं उपवास है, शेष सब लंघनवत् कहा जाता है। इसलिये अन्तरङ्गसे ही विषयोंकी इच्छाको घटाते हुए, तदनुसार बाहिर भी इन्द्रियोंको विषयोंसे रोका जाय, तभी वह संयम विशेष लाभदायक होसकता है ।
यह संयम देशसंयम और सकलसंयमके भेदसे भी दो प्रकारका
होता है । सकलसंयम वह है जिससे यावज्जीव पांचों इन्द्रियोंके विषयोंको, षट्कायके जीवोंकी हिंसाको मन, वचन काय और कृत- कारित अनुमोदनासे सर्वथा त्याग कर दिया जाता है और देशसंयमें शक्ति अनुसार नियमरूपसे तथा यमरूपसे इन्द्रियोंके विषयोंकी सीमा करली जाती है, संकल्प करके त्रस जीवोंकी हिंसाका यथायोग्य त्याग किया जाता है और फिर निरंतर उसे बढ़ाते हुए सकलसंयम तक पहुँचा दिया जाता है-अर्थात् देशसंयम भी सकलसंयमका साधनरूप ही होता है ।
साधु मुनियोंका सकल अर्थात् उत्तम संयम होता है, उसमें वे इन्द्रियोंके विषयोंको तो छोड़ते ही हैं, किन्तु उन विषयोंके कारण हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांचों पापोंका भी सर्वथा त्याग करते हैं और किसी प्रकारका इनमें दोष भी नहीं लगने देते, जिसके लिये ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण और व्युत्सर्ग ये पांच समिति; तथा मनवश, वचनवश और कायवश ये तीन गुप्तियां पालते हैं । उपसर्ग और परोपहादि भी सहन करते हैं ।
देशसंयम गृहस्थियोंका होता है; जिसमें वे यम, नियमों द्वारा अपनी इन्द्रियोंको वश करने तथा जीवोंकी यथासंभव दया पालनेका श्रीदशलक्षण धर्म ।
यथाशक्ति साधन करते हैं। यह देशसंयम एकादश प्रतिमाओंमें विभक्त है जो ग्रन्थान्तरों श्रावकाचारोंसे जानना चाहिये । जो पुरुष उत्तम संयम धारण नहीं कर सकते वे देशसंयमद्वारा क्रमसे अपनी शक्तिको बढ़ाते हैं और जब सब प्रकारसे इन्द्रियां वश हो जाती हैं, तब वे सकल संयमको प्राप्त होते हैं। सो ही कहा है-
काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री मन वश करो।
संयम रतन सम्हाल, विषय चोर बहु फिरत हैं ॥
उत्तम संयम गह मन मेरे, भव भवके भाजें अघ तेरे ।
स्वर्ग नर्क पशुगतिमें नाहीं. आलस हरन करन सुख ठाहीं ॥ ठाहीं मही जल अग्नि मारुत, रूख त्रस करुणा धरें ।
स्पर्श रसना घ्राण नयना, कान मन सब वश करें ॥
जिस विना नहि जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग कीचमें ।
इक घड़ी मत विसरो भविक, तुझ आयु यम मुख बीचमें ॥
उत्तम तप ।
इहपरलोयसुहाणं णिरवेक्खो जो करेदि समभावो ।
विविहं कायकिलेसे तवधम्मो णिम्मलो तस्स ॥ ७॥
अर्थात् - जो इस लोक और परलोक सम्बन्धी सुखोंकी अपेक्षा न करके शत्रु, मित्र, कांच, कंचन, महल, मसान, सुख, दुःख, निंदा प्रशंसा आदिमें राग, द्वेष, भाव विना किये समभाव रखते हैं और निर्वाछित हुआ अनशनादि बारह प्रकार तपश्चरण करते हैं, उनके उत्तम तप होता है, सो ही आगे बताते हैं (स्वा० का० अ०) उत्तम तप ।
’ इच्छा निरोधस्तपः '- अर्थात् इच्छाको रोकना अर्थात् मनको वश करना या उसके विषयोंके प्रति इन्द्रियोंको प्रेरकरूप गतिको रोकना सो तप है । उत्तम इसका विशेषण है, इससे विदित होता है कि जो तप यश, कीर्ति, पूजा, प्रख्याति, लाभ तथा और अनेकों लौकिक प्रयोजनोंके साधनार्थ न हो, लोक-दिखाऊ न हो, मारन, मोहन, वशीकरण, उच्चाटनार्थ न हो, यन्त्र, मंत्र, तंत्र, जड़ीबूटी, औषधादिकी सिद्धि करनेके अर्थ न हो, किन्तु अपने सच्चिदानन्द- स्वरूप निर्मल आत्माको अनादि कर्मबंधसे छुड़ानेवाला हो, वही उत्तम तप कहा जाता है ।
यह तप धर्म आत्माका स्वभाव है, इसलिये ही यह धर्म कहा जाता है । कारण कि आत्मा अमूर्तीक ( रूप, रस, गन्ध और वर्णसे रहित ) अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्यमयी, अखण्ड एक अवि- नाशी, सच्चिदानन्द स्वरूप, शुद्ध, बुद्ध, अजर, और अजन्मा है । यह स्वभावसे ही रोग, शोक, ग्लानि, स्वेद, खेद, क्षुधा, तृषा, राग, द्वेष, भय, विस्मय, निद्रा, मद, मोह, अरति, रति, वेद, कपाय ( क्रोध, मान, माया, लोभ, ) आदिसे रहित, अखण्ड, अविनाशी, सदानन्द- स्वरूप, एक, स्थिर, चैतन्य पदार्थ है । उपर्युक्त दोष तो इसमें कर्मपुद्- गलके सम्बन्धसे उत्पन्न होरहे हैं, क्योंकि यह इस पुद्गलको अपनाकर उसके हानि, लाभ, सुख, दुःखको अपना ही हानि लाभ सुख
वा दुःख समझ रहा है । इसीसे यह रागद्वेषादिरूप परिणमन करके नवीन नवीन कर्मबन्ध करता है तथा प्राचीन बांधे हुए कर्मोंके उदयजनित फलमें अरति व रति भाव करता है । इसप्रकार नवीन कर्म श्रीदशलक्षण धर्म ।
बांधना और संक्लेश भावोंसे पूर्वोपार्जित शुभाशुभ कर्मोंको भोगकर छोड़ना, यही इसका एक प्रधान कार्य होगया है ।
इस प्रकार कर्मचक्रमें फँसे रहनेसे इसे कभी भी अपने निज स्वरूपका ध्यानतक नहीं आता, जिससे पराधीन हुवा, संसारमें परिवर्तन करता और दुःख भोगता रहता है । जीव कर्म करनेमें तो स्वतंत्र है, परन्तु उसके फल भोगनेमें इसे परतंत्र होना पड़ता है । यह भोला जीव मृगमरीचिवत् वास्तविक सुखको न जानकर इन्द्रियोंके आकुलतापूर्ण अल्पकालस्थायी पराधीन थोड़ेसे विषयसुखोंको पाकर उनमें मग्न होजाता है और उनके अभावमें अथवा शीत, उष्ण, क्षुधा, तृषादि बाधाओं और रोगादिकोंके होनेपर व्याकुलित होता है । किन्तु जब यही संसारी आत्मा कोई कारण पाकर अपने
स्वरूपका विचार कर अनुभव करता है, तो वह इन सब जन्म, मरण, क्षुधा, तृषा, शीतोष्णादि व्याधियोंको कर्मकृत उपाधियोंको मानता हुआ उनसे भिन्न अपने आपको सच्चिदानन्द स्वरूप, एक अखण्ड अविनाशी, अनंतदर्शन, ज्ञान, सुख, वीर्यका स्वामी. देखता व जानता है और तब ही सब ओरसे अपने चित्तको रोककर एकाग्र अपने स्वरू- पमें लगा देता है । उस समय निजानन्दमें मग्न हुआ यह तेजस्वी आत्मा अनेकों प्रकारकी व्याधियोंके उपस्थित होने या उपसर्गो तथा परीषहोंके आनेपर उनको सहता हुआ, कभी भी अपने ध्यानसे च्युत नहीं होता ।
इसप्रकार जब वह निश्चल होकर ध्यानमें मग्न होजाता है, तवं उसे बाह्य शरीरपर होनेवाले उपसर्गोंका किंचित् भी ध्यान 'नहीं उत्तम तप ।
रहता है । भले ही लोग उसे गाली देवें, मारन ताड़न करें, घाणीमें पेलें, करवतसे चीरें फाड़ें, सिंह व्याघ्रादि दुष्ट पशु भक्षण करें व विदारे, शीत, उष्ण आदिका तीव्रतम प्रकोप हो अथवा संपूर्ण रोग एकत्र होकर एकसाथ उदयमें आजावें और असहनीय तीव्र वेदना आजाय तो भी वे अपनेको सुमेरुवत् स्थिर रखते हैं । इसीसे वे राग द्वेषके न होनेके कारण नवीन कर्मोंको नहीं बांधते और प्राचीन अनन्त जन्मोंके किये हुए कर्मोंको भी बहुत थोड़े समयमें भस्म कर ढलते हैं । इसप्रकार संवर पूर्वक निर्जरा करने और पश्चात् संपूर्ण कर्मोंके नष्ट होजानेपर अविनाशी अव्याबाध स्वाधीन सुख (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं, इसलिये उत्तम तप आत्माका ही स्वरूप कहा जाता है । उत्तम तपस्वी नग्न (दिगम्बर) मुनि ही होते हैं, जिनका स्वरूप इस प्रकार है—
“ विषयाशावशातीतो, निरारंभोऽपरिग्रहः ।
ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी सः प्रशस्यते ॥१॥”
अर्थात्—जो साधु विषयोंकी आशा और आरंभ तथा परिग्रहसे
रहित होकर निरंतर ज्ञान, ध्यान और तपमें लीन रहते हैं, वे ही तपस्वी प्रशंसनीय हैं ।
तपश्चरण यदि विषयोंकी आशासे करना, अर्थात् जंत्र, मंत्र तंत्र व औषधादि सिद्धि करनेको या अन्य लौकिक प्रयोजन ख्याति, लाभ, पूजादिकी इच्छासे घर छोड़कर वनवास करना और नाना प्रकार कायक्लेश करना केवल आडम्बर मात्र व्यर्थ है क्योंकि इससे उल्टा संक्लेश भावोंके होनेसे दुर्गतिका ही बंध होता है ।
अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3081.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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