श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, सोनगढ़, २०२४ — जैन स्वाध्याय सामग्री | Shri Aadinath Jinbimb Panchakalyanak Pratishtha Mahotsava, Songadh, 2024

श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, सोनगढ़, २०२४

नाटक: तत् क्षण योग्यता

श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, सोनगढ, २०२४

नाटिका परिचय

मंच संचालक: तो आइए अब श्री बाहुबली भगवान के जीवन की एक अनोखी क्षण की कथा सुनते हैं। वैसे तो श्री आदिपुराण आदि प्रथमानुयोग के ग्रंथों में श्री बाहुबली भगवान के जीवन के कुछ कथानक ही मिलते हैं। लेकिन लेखक ने यहाँ एक मनोरम कल्पना के माध्यम से, श्री बाहुबली भगवान के मन में चल रहे अंतर्मंथन को उनके मन में चल रही बारह भावना के चिंतन को चित्रित किया है। इस नाटिका को अपने ज्ञानी धर्मात्माओं के वचनामृत - १) पूज्य गुरुदेव श्री के वचनामृत, २) ऋषि ना निधान, ३) पूज्य बहन श्री के वचनामृत और ४) द्रव्य दृष्टि प्रकाश के विविध बोलों के माध्यम से लिखा गया है।

नाटिका प्रारंभ

पार्श्व स्वर (Voice over):
ज्ञानी, ज्ञानी वे हैं जिन्हें स्व पर की एकत्व बुद्धि छूट गई है। ज्ञानानंद स्वभाव वह मैं हूँ और राग मुझसे भिन्न चीज है वैसा वे जानते हैं। फिर भी उन्हें राग आता है, विकार भी होता है, परंतु ऐसा उन्हें स्व पर की एकत्व बुद्धि से नहीं होता और निमित्तों के कारण से भी नहीं होता। राग तो होता है पर्यायरूप अपने भटकाव की योग्यता से और परिणति की स्वतंत्रता से।

वैसी ही एक अनोखी अद्भुत अविसरणीय योग्यता की यह बात है।

श्री भरत चक्रवर्ती के साथ युद्ध के पश्चात और दीक्षा लेने से पूर्व श्री बाहुबली भगवान ने अद्भुत पुरुषार्थ जगाया था, 12 भावनाओं का चिंतन किया था।

वह अनुपम क्षण जब श्री बाहुबलीजी विकारी से निर्विकारी होने की पगडंडी पर चल पड़े…

तो आइए देखते हैं नाटक “तत् क्षण योग्यता”

मंगलाचरण:

मंगलम् सिद्ध परमेष्ठी, मंगलम् तीर्थंकरम्।
मंगलम् शुद्ध चैतन्य, आत्म् धर्मोस्तु मंगलम्॥
विश्वयाथातथ्यो निरवद्यमोऽपरिग्रहः।
ज्ञान-ध्यान-तपोरक्तः तपस्वी स प्रशस्यते॥

(१) द्रव्य १

कथावाचक: ॐ सहज चिदानंद। मैं तत् समय की योग्यता हूँ। विश्व के प्रत्येक द्रव्य अपनी पर्यायगत योग्यता से अपने समय में परिणमन करते हैं। कोई द्रव्य अन्य द्रव्य को परिणमित नहीं कर सकता, अरे! द्रव्य स्वयं भी अपनी पर्याय में कुछ नहीं कर सकता। पर्याय स्वयं अपने बट कारक से अपने समय में परिणमित होती है। मैं वह योग्यता हूँ जो इस परिणमन में कारणभूत हूँ। मैं कभी नहीं हिलने वाला वह खूंटा हूँ जो अपने समय में अचलित रहता है। और क्रमबद्ध स्वभावी हूँ। मुझे बदलने की क्षमता इंद्र, नरेंद्र या जिनेंद्र में भी नहीं।

मेरे त्रिकाल प्रवाह में ना कोई घटना अच्छी है और ना बुरी। फिर भी कभी-कभी कोई विशेष पर्याय काल के प्रवाह में अमर हो जाती है। ऐसी ही एक अनोखी घटना तब हुई थी जब श्री बाहुबली भगवान ने भरत चक्रवर्ती को तीन युद्ध में पराजित किया और क्रोध आवेश में भरत चक्रवर्ती ने उन पर चक्र चला दिया।

(स्क्रीन पर भरत चक्रवर्ती ने बाहुबली पर चक्र चलाया ऐसा दृश्य)

श्री बाहुबलीजी स्तब्ध हो गए और उनके लिए समय जैसे थम गया। मैं भी उस क्षण का स्वयं साक्षी हूँ। श्री बाहुबलीजी को संसार असार लगने लगा। उनका अंतर्मन उनको संसारी से सिद्ध, पामर से परमेश्वर, मानव से मुनि और कामदेव से केवली बनने के लिए प्रेरित करने लगा। एक और पुरुषार्थ की प्रेरणा थी और दूसरी और कर्मों की विडंबना…

बाहुबली: अरे… धिक्कार है, धिक्कार है यह असार संसार का धिक्कार है। हाय हाय … इस पृथ्वी के राज्य के लिए भाई भरत ने मुझ पर चक्र चला दिया? है आदिप्रभु, क्या जीव इतना स्वार्थी होता है? मैंने भी तो सिर्फ अपने स्वाभिमान को पोसने के लिए भाई भरत को युद्ध में चुनौती दे दी। हे प्रभु! मेरा अंतर्मन दुःख से द्रवित हो उठा है। हे मेरे अंतर्मन, काश तुम कहीं से इस दुःख से समाधान करने का मार्ग ढूंढ लाते। काश…
अंतर्मन: काश … काश, इस दुःख से समाधान करने के लिए मैं सक्षम होता।
बाहुबली: अरे… तुम कौन हो?
अंतर्मन: हे महापराक्रमी बाहुबली! मैं आपका ही अंतर्मन हूँ। मुझे कहीं चैन नहीं पड़ रहा है। क्या यही संसार का स्वरूप है? मेरे इस क्षणिक शारीरिक संबंधी में कब तक दुःख भोगूँगा? कब तक?
बाहुबली: हे अंतर्मन इस दुःख से कैसे निकलू?
अंतर्मन: इस संसार की मायाजाल में से मैं भी थक गया हूँ। अब तो केवल वैराग्य को उत्पन्न करनेवाली बारह भावनाओं का चिंतन ही मुझे सुझा रहा है। बार-बार जिन स्वरूप का, स्वभाव का या तत्त्व का चिंतन करने से ही अपने वीतराग स्वरूप का दर्शन होगा।

बाहुबली:

हा! मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ।

अंतर्मन:

चलो बाहुबली चलो आत्मभूमि की अनंत गुणों की गुफाओं में चलो, गुफाओं में चलो…
अष्टमश्रममेकमित्यम् – संसत्तो – लोकममुच्यलम्।
आसंव – संवर – निर्जर – धर्म – बोधीति चिंतनमीयम्॥

अंतर्मन:

मैं बाहुबली का अंतर्मन। मुझे ज्ञात है की अनित्य आदि बारह भावनाओं का निरंतर मनन करने से कर्मय रूपी अग्नि बुझ जाती है, राग गल जाता है और वैराग्य प्रज्वलित होता है। अज्ञान रूपी अंधकार विलीन होकर ज्ञान दीप प्रकाशित हो जाता है।

(२) द्रव्य २

अंतर्मन:

अरे ये मेरे मरण में क्या आ रहा है? लग रहा है कि ये मेरे पूर्व के सातवे भाव की स्मृति है। हाँ! मैं जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में वत्स्कावती देश में था। वहां के राजा प्रतिवर्धन का सेनापति था.. यह दृश्य तो नजर के सामने जैसा अभी अभी हुआ हो ऐसा लग रहा है…हमने मुनिराज से आत्मबोधित संदेश सुना… और तब प्रतिवर्धन राजा ने मुझसे प्रश्न किया।

(सातवा पूर्व भव)

राजा:

सेनापतिजी, मुनिराज से अभी हमने सुना के, ये जगत में सर्व प्रकार के संयोग अनित्य है, जैसा समिका सयोगी शरीर, मरण काल आने पर जरूर ही छूटेगा, कोई भी संयोग नित्य नहीं है, आपका इस बारे में क्या मतव्य है?

सेनापति:

महाराज, आत्मज्ञानी गुरुदेव ने फरमाया के यह संयोग रूपी संसार अनित्य है… तो इसका अर्थ ये हुआ के नित्य जो वस्तु है वो तो मेरा आत्मा है।

नगर सेठ:

हा सेनापतिजी! यह बात को न स्वीकारना ही संसार परिभ्रमण का कारण है।

सेनापति:

तो चलो, जो हमारे आत्मा का स्वभाव है, वो सोचे बिना हमने अनंत दुख भोगे है, मगर अब हम सब अनित्य भावना को आत्म सात करने की, भावना भाये, आइये।

अंतर्मन:

शरीर की अनित्यता कैसी है। यहां का आयुष्य पूर्ण होने के वक्त ये बात मेरे हृदय में वार कर गई, मगर ये भव तो पूरा हो ही गया।
कैसा है ये जीव… मृत्यु के समय भेदान किया, मगर फिर दूसरे भव में भावनमरण करने चला गया। तत्पश्चात के भव में मैं उत्तर कुरु भोग भूमि में आर्य हुआ।

(छठा पूर्व भव)

आर्य-१:

प्रणाम आर्य। बहुत सारे पुण्य के प्रताप से यहीं भोगभूमि में हमारा जन्म हुआ है।

आर्य-२:

जन्म हुआ है? आपका यह तात्पर्य है कि पहले मैं कहीं था। और वहां से मेरी मृत्यु हो गई और यहां मेरा जन्म हो गया।

आर्य-१:

बंधु… जन्म और मृत्यु तो शरीर के संयोग और वियोग की बात है। मगर आत्मा तो नित्य ही है, इसके लिए आप दुखी ना हो।

आर्य-२:

अरे आर्य दुखी क्यूँ हो रहे हो? देखो ये कल्पवृक्ष, ये सुंदर महल, ये यथा इच्छा भोग, और ये पल्‍य वर्षकी आयु।

आर्य-१:

पल्‍यवर्ष की आयु?? हे प्रभु… मैं ये असंख्य वर्षकी आयु में कैसे फस गया।

आर्य-२:

बंधु क्या ये आयु नित्य है? नहीं ना… तो बीत ही जाएगी।

आर्य-१:

हाँ.. आपकी बात सत्य है.. शरीर की अनित्यता और आत्मा की नित्यता का क्या मेल?

आर्य-३:

हमें तो आत्माके नित्य स्वभावका स्वीकार करके, इस अनित्य अवस्थासे दृष्टि हटाके, अपने आत्मा का कल्याण करना चाहिए।

आर्य-२:

सत्य वचन आत्म प्रेमी, सत्य वचन

अंतर्मन:

ऐसे आत्मा के नित्य स्वभाव का चिंतन करते हुए अपनी ऐसी भोग भूमि की आयु भी पूर्ण हुई, और संसार का चक्र फिर और पुण्य के फल में अब मेरा प्रभा नामके विमान में प्रभाकर देव नाम से जन्म हुआ। और मुझे ज्ञात है कि मुझे समोशरण में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

(पांचवा पूर्व भव)

प्रभाकर देव:

ललितंग देव की जय हो।

ललितंग देव:

आओ प्रभाकर देव, आओ। बड़े प्रसन्न लग रहे हो। कहो से आ रहे हो?

प्रभाकर देव:

मैं अभी अभी तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन करके और दिव्यध्वनी में आर्षिकबात सुन कर आ रहा हूँ।

ललितंग देव:

अच्छा? हमें भी बताइए।

प्रभाकर देव:

आप, आज से आठवे भवमें भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ होने वाले है। और मैं उस भवमें आपका ही पुत्र बाहुबली बनकर मोक्ष प्राप्त करूँगा।

ललितंग देव:

अहो! प्रभु के मुख से निकली हुई बात तो विधि का विधान है। इस नश्वर भोगो को त्याग करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए मैं तत्पर हूँ।

प्रभाकर देव:

किंतु… हे ललितंग देव, क्या यह इंद्र समान भोग, रोग रहित शरीर, अप्सराओं के समान देवांगनाएं असीम पुद्गल रत्न – क्या यह कोई भी नित्य नहीं है?

ललितंग देव:

नहीं, सब अनित्य ही है। आयु पूर्ण होते ही इन सबका वियोग निश्चित है। परमार्थ से तो एक यह मेरा चैतन्य परमात्मा ही नित्य है। शाश्वत है। और ऐसे नित्यका चिंतन करना ही अनित्य भावना है।

अंतर्मन:

आयु के अंत समय की क्षण आने पर फूलों की माला भी करमाने लगी और सब वही का वही रह गया। हे अनित्य संसार… अनित्य संसार…
अब मैं फिर से मनुष्य पर्यायि पहुँच गया। लेकिन यह भव अन्य भव की तरह साधारण भव नहीं था। इस भवमें मैं राजा वज्रजंघ का अर्कपन नामक सेनापति बना… अरे मुझे स्मरण आ रहा है। और ये कैसा विचलित करने वाला दृश्य था।

(चौथा पूर्व भव)

दास:

अर्कपन सेनापति की जय हो। सेनापति, एक दुःखद समाचार है। राजन के कक्ष में रात को धूनाई लाई थी उसके धुंए से मूर्छित होकर निद्रा में ही राजा वज्रजंघ की मृत्यु हो गई। उनकी आयु पूर्ण हुई।

अर्कपन सेनापति:

क्या? इंद्र समान विभूति रखने वाले राजा वज्रजंघ का ऐसा अंत? हे प्रभु यह कैसी संसार की विचित्रता है। प्रजा तो राजा की शरण में रहती है, लेकिन मृत्यु के समय राजा स्वयं ही अशरण हो गए? मेरा चैतन्य परमात्मा ही मुझे शरण है, बाकी सारा जगत अशरण ही है।

अंतर्मन:

इस संसारकी अशरणता देखकर मैं तत्काल ही उत्कृष्ट जिनेश्वरी दीक्षा धारण करने के उद्देश्य से जा पहुँचा श्री दृढ़धर्म आचार्य के समीप।

अर्कपन सेनापति:

हे मुनिवर, कृपा करके मुझे इस अशरण जगत से छुटने का उपाय बताएँ।

श्री दृढ़धर्म आचार्य:

जैनी मति का परखे सोय मोतियों को अलग कर लेता है, उसीप्रकार आत्म को प्रज्ञा से ग्रहण करना। जो जाननेवाला है, जो देखनेवाला है सो मैं - इसप्रकार उपयोग सूक्ष्म कर के हे भव्य जीव आत्मा को और विभाव को प्रगट कर।

अर्कपन सेनापति:

प्रमाण वचन गुरुदेव।

अंतर्मन:

निर्विल्कल्प ध्यान के पहले अनेक प्रकार का चिंतन घंटो तक चला था, मगर अब तो मुझे चिंतन भी भट्ठी-सा लगने लगा था। चिंतन भी चिंता है, आकुलता ही है। पूर्णता के लक्षण से शुरुआत ही सच्ची शुरुआत हे। जब, मैंने अवंलबन अंद्र चैतन्य परमात्मा का लिया, और उसमें ही उगता होनेपर निर्विकल्पता हो गई और मैं आत्मानंद में मग्न हो गया।

(सम्यकदर्शनकी प्राप्ति)

अंतर्मन:

अंततः यह वह क्षणगत योग्यता थी जब मैंने मेरे जीवनमें मंगल सुप्रभारूप सम्यग्दर्शन प्राप्त किया; सम्यक् रत्नत्रय रूप संपदा को प्रकट किया। अहो.. सम्यग्दर्शन होने पर आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में आनन्द का जन्म हो गया। असंख्य प्रदेश आनन्द से उछल गये। सर्व गुणांशों सो सम्यक्त्व। सम्यक्त्व में चौदह ब्रह्माण्ड के भाव आ गये। “धन्य वह घड़ी, धन्य वह क्षण की योग्यता।”
मुनि दशामें उत्कृष्ट आनंद का भोग करते करते समय कहां चला गया वह पता ही नहिं चला, और समाधि पूर्वक आयु पूर्ण हुई।

(तीसरा पूर्व भव)

अंतर्मन:

अब मैं अठ्ठो ग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुआ। यह संसार दुखित भासित होने लगा। कहाँ मुनिदशाकी धोमधार आनंद की धारा… और कहां यहाँ चौथे गुणस्थानकी अल्प सुख रूप दशा। मगर ये सच को स्वीकारे बिना कोई उपाय नहीं था। तो ग्रैवेयक में मैंने चिरकाल तक अनिच्छुनीय स्वर्गिक भोगों को भोगते और तत्वचर्चा करने में अपना समय व्यतीत किया।

(दूसरा पूर्व भव)
तब संसार चक्र का चक्र फिरा और मैं फिरसे मनुष्य पर्याय में जा पहुँचा। वहाँ मैं श्री आदि प्रभुके तीसरे पूर्व भवमें वज्रनाभि चक्रवर्ती का भाई पीठ हुआ। और उस भवमें, भाई वज्रनाभि के साथ मैंने भी दीक्षा प्राप्त की। उत्कृष्ट आनंद भोगने का अवसर फिरसे मिला… मगर… यह सुखरूप दशा … यह भव तक ही सीमित रह गई।

(पहला पूर्व भव)
यह क्षणिक सुखरूप दशा से जब जब मैं विचलित होता था तब तब शुभभाव तो होते थे… किंतु यह शुभ भावका फल एसा कठोर मिला के उसके बाद के भव में मैं स्वर्ग में ३३ सागर तक सर्वार्थसिद्धि रूपी जेल में कैद हो गया। वहाँ श्रुत लेखन और मंद कषायरूप परिणाममें निरंतर तत्वचर्चा की, लेकिन सुखकी अखंड धारा दूर दूर तक कहीं नहीं थी। मुनिदशा की अखंड धाराकी इच्छा में ही वो आयुष्य भी पूर्ण हुआ, और वहाँ से च्युत हो कर यह बाहुबली के दुर्लभ मनुष्य भव को मैं प्राप्त हुआ हूँ।
प्रभु !!! प्रभु !!! एक बात बार बार मेरे अंतःस्थल में चल रही है। की संसारा!!! गतिओ के जनम मरण में घोड़े ही है? वास्तवमें जीव की विकारी पर्याय ही संसार है, और सच्चा सुख तो अपने चैतन्य स्वरूप आत्मामें ही है। और यही तो संसार भावना है। बस अब बहुत हुआ… अन्य विचारो से…अन्य विकल्पो से बहुत हुआ.. बस बहुत हुआ… अलम अलम अलम

कथावाचक:

इस तरह श्री बाहुबली भगवान के अंतर्मन ने उस क्षण में अनित्य, अशरण और संसार भावनाओं का चिंतन किया। वह सोच रहे हैं कि भव - भवांतरों में यह चैतन्य परमात्मा जीव अनेक प्रकार के संयोगों में

भी अकेला ही रहा है, और इंद्रिय सुख - दुख अकेले ही भोगता रहा है। लेकिन जैसे स्वभाव से निर्मल स्फटिक में लाल-काल फूल के संयोग से रंग दिखते हैं तथापि वास्तव में स्फटिक रंगा नहीं गया है। वैसे ही स्वभाव से निर्मल आत्मा में क्रोधादि विकारादि देह फिर भी वास्तव में आभ्यंतरमें उनसे भिन्न है। यही पर से एकत्व तोड़ने की ओर स्व से एकत्व जोड़ने की भावना श्री बाहुबली भगवान ने की।

(२) द्रव्य ३ - एकत्व भावना - जीव तू है सब बात अकेला

(४) द्रव्य ४

अंतर्मन:

यह आत्मा अनंत काल से भवों में फिरता रहा है और थक चुका है। फिर भी यह अस्थिरता जन्य राग मेरे अंतरंग में क्यूँ चल रहे है? क्यूँ मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहे है? क्यूँ मेरी निमित्त आधीन दृष्टि हटती नहीं है? मैं इनसे अन्य हूँ और अपने से अन्य हूँ ये बात क्यूँ मुझे आत्मसात नहीं हो रही है? ऐ मेरे वैराग्य भाव, मेरी सहायता करो… मेरे पुरुषार्थ को प्रेरित करो… मुझे एकत्व भावनाका स्वरूप स्वीकार करने में में मदद करो… मदद करो…

वैराग्य:

हे आत्मन, विश्व के सभी पदार्थ अन्य-अन्य है, और यही अन्यत्व भावना है। वह अन्यत्व का त्याग कर, अनंत गुणस्वरूप आत्मा, उसके एकत्व स्वरूप को दृष्टि में लेकर उसमें एकाग्रता का प्रयत्न करना वह ही पहले में पहला शांति - सुख का मार्ग है।

संयोग:

अरे अरे अंतर्मन ठहरो। जरा मेरी भी तो बात सुनो।

अंतर्मन:

तुम कौन हो?

संयोग:

मैं आपके इस भव के संयोग हूँ। श्री बाहुबली के पास मेरा पूर्ण वैभव प्रगट है। आप ऐसे कैसे पुण्यकर्मजनित इन संयोगों को ठुकरा सकते हो? इतनी सारी सुंदर सुंदर पत्नियाँ, ऐसे आज्ञाकारी पुत्र, इतनी अतुल्य अम्प संपत्ति। ये सब आपसे अन्य थोड़ी ना है ये तो आपके अपने ही तो है।

अंतर्मन:

हाँ आपकी बात सत्य तो लग रही है। मैं तो जीव हूँ, लेकिन इस भव में तो ये सारे संयोग मेरे ही है ना…

वैराग्य:

अरे रे अंतर्मन सावधान… यह तो पंछी के मेले जैसा है। इकट्ठे हुए है व सब अलग हो जायेंगे। आत्मा ही एक शाश्वत है, अन्य सब अद्यव है, सो बिखर ही जायेंगे। मनुष्य-जीवन में आत्मकल्याण कर लेना ही योग्य है।

संयोग:

हे वैराग्य भाव… चलो एक बार आपकी बात मान भी ले.. मगर भरत चक्रवर्ती इनके ही भाई है, शलाका पुरुष है, छह खंड को उन्होंने ही जीता है.. क्या यह बात गर्व करने योग्य नहीं है? क्या भरतजी इनसे अन्य है?

वैराग्य:

अरे संयोग! व्यर्थ तर्क क्यूँ प्रतिपादित करता है? समकिती चक्रवर्ती छह खण्ड को नहीं, अखण्ड को साधते है। जिनकी दृष्टि में क्षायक भाव की अखण्डता कभी छूटती नही वह तो अखण्ड को ही साधते ना।

अंतर्मन:

वैराग्य, यह तो विदित सत्य है, और मैं इसे स्वीकार करता हूँ। मगर एक विचार तुम भी तो करो के मेरे बाहु के बल के सामने तो चक्रवर्ती भाई भी नहीं टिक सके। मेरे शरीर के सहन के सामने वो भी नत मस्तक हो गये।

शरीर:

बिलकुल सही कहा। मेरा सहन अतुल्य है। मेरे सहन अतुल्य है। मेरे यह शरीर के सहनके सामने वो चक्रवर्ती भाई भी नत मस्तक हो गये। छह खंड को जीतने वाले मुझसे तीन मामूली युद्धमें हार गए। मेरी क्षमता तो अतुल्यही है।

अंतर्मन:

कौन हो तुम?

शरीर:

मैं बाहुबली का शरीर हूँ।

वैराग्य:

हे शरीर तू तेरा कार्य करता है… आत्मा आत्मा का। शरीर और आत्मा दोनों भिन्न स्वतंत्र है। (अंतर्मनकी ओर देखकर) अंतर्मन: तू तो अपने को चैतन्य स्वभावी आत्मा ही मानता है, मिथ्यात्व भाव तो नहिं करता। फिर क्यों यह शरीर में आसक्ति करता है। देहके लिये अनंत भव व्यतीत किए… पर अब यह जीवन आत्मा के लिये अर्पित कर।

संयोग:

अरे अंतर्मन मेरी एक बात सुनो। बाकी सब बात एक तरफ। आप के पिता यह भरतक्षेत्र के अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर है। तो क्या यह तीर्थंकर प्रकृति और दिव्यध्वनि अद्भुत संयोग नहीं है?

वैराग्य:

संयोग संयोग … क्यों तुम अंतर्मन के लिए असमंजस खड़ी कर रहे हो। तुम्हें पता है, जो भाव से तीर्थंकर बनता है वो भाव भी नुकसान का ही कारण है। (अंतर्मन को देख के) - अरे भव्य, तीर्थंकर का योग मिला ऐसे उसमें लाभ मानतो हो, तो कैसे छोड़ेगा? ऐसे भाव से नुकसान ही है, लाभ नहीं।

अंतर्मन:

हं … अनंत काल से जीव को स्व से एकत्व और पर से अन्यत्व की बात रूची नहीं। पर से एकत्वबुद्धि तोड़कर भिन्न तत्व को – अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष और अवयुक्त देखे तो ही आत्मा का अनुभव कर सकता है।

वैराग्य

वैरागी: मेरे अधिकांश जीव, रुको, रुको, मेरी बात भी तो सुनो! आप कोई ऐसे वैसे व्यक्ति थोड़ी हो, आप तो साक्षात कामदेव हो। आपका सौंदर्य अतुल्य है। आपका संपूर्ण रंग मनमोहित करने वाला है। आप तो पुष्पबाण ऋद्धि के धारक हो। आपको संपूर्ण भरतक्षेत्र में कौन नहीं पहचानता?

वैराण्य: अरे! फूल बाग में हो या जंगल में, उसे कोई सूंघो या न सूंघो, उसकी कीमत तो स्वयं से है; कोई सूंघे, तो उसकी कीमत बढ़ नहीं जाती, अथवा नहीं सूंघे, तो वह मुरझा नहीं जाता। इसी तरह कोई अपने को जाने या न जाने उससे अपना मूल्य थोड़ा ही है? अपना मूल्य तो अपने से ही है!20 हे भव्य! तू शरीर को न देख। राग को न देख। ये सभी तो अशुचि से भरे हुए हैं। अरे… एक समय की पर्याय को न देख। तेरे पास पूर्णानंद प्रभु स्थित है, उसे। देख।21

शरीरी: हे अंतर्मन! तूने ज्ञात है यह समग्र भरतक्षेत्रमें बाहुबली की देह सबसे ऊँची ५२५ धनुष की है, जब की भरत चक्रवर्ती जैसे महान जीवों की अवगाहना भी केवल ५०० धनुष ही है। तो क्या यह शरीर कि विशेषता प्रत्यक्ष दर्शित नहीं है?

वैराण्य: हे शरीर, जब अपनी बढ़ाई करना बस कर। क्या तुझे ज्ञात है के तुम्हारे अंदर पाँच करोड़ अड़सठ लाख निन्यानवे हजार पाँच सौ चौरासी रोम रोए हुए हैं। देह तो रोग की मूर्ति है। भगवान आत्मा आनन्द की मूर्ति है।22

वैराण्य: अरे अंतर्मन! बहार के अनिलय संयोग और अशुचि से भरे हुए शरीर पर तुझे राग आता है? संयोगों या शरीर – दोनों पर। स्वयं अशुचि है, इसलिए धर्म नहीं। इनसे तथा इनके राग से भिन्न होने पर ही भीतर आत्मा में प्रवेश होता है। ऐसा ही वस्तु का स्वरूप है।23 उस वस्तु स्वरूप में समा जाओ… समा जाओ… समा जाओ…!

अंतर्मन: अपने पूर्व भव के स्मरण और वैराग्य भाव से मेरे परिणाम भी विश्राम से विमुख होकर स्वरूप को और बढ़ना चाहते हैं। कहाँ मैं भाई भरत के चक्र चलाने से उद्वेग कर रहा था, और कहाँ अपने स्वरूप में स्थिर होने के शांत परिणाम। *धर्मोपदेशिका का फल संसार है, और द्रव्यदृष्टि का फल वीतरागता-मोक्ष है।*24 यह विभावभाव हमारा देश नहीं है। इस परदेश में हम कहाँ आ पहुँचे? हमें यहाँ अच्छा नहीं लगना। जहाँ ज्ञान, श्रद्धा, चारित्र, आनन्द, वीर्यादि अनंनुगुणमय हमारा परिवार बसता है वह हमारा स्वदेश है। हमें भी उस स्वरूपस्वदेश की ओर जाना है। हमें त्वरासे अपने मूल वतनमें जाकर आरामसे बसना है जहाँ सब हमारे हैं।25

हे वैराग्य, अभी भी मैं तो युद्ध भूमि में खड़ा हूँ। मुझे ये द्वंद्व चल रहा है। वैराग्य से भेदज्ञान की धारा तो चली, मेरी निज परिणति क्यूँ पुनः शुभ भाव के सम्मुख हो रही है? आस्रव भाव में प्रवृत्त हो रही है?

20 द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १७२
21 दृष्टि ना विधान, बोल ६
22 दृष्टि ना विधान, बोल १९९
23 गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल १०५
24 गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल ९५
25 बहनश्री के वचनामृत, बोल ४०९

(५) द्रव्य ५

वैराण्य: वैराग्य भाव से इसका समाधान करने से ही आस्रव भावना सार्थक होगी। वस्तु स्वरूप का विचार करना ही आत्माअनुभूति का एकमात्र उपाय है। इसलिए ज्ञानी जीव निरंतर भेदविज्ञान की भावना और विचार करते हैं, यह स्त्री, पुत्र इत्यादि तो मुझसे प्रत्यक्ष भिन्न है और शरीर तो मेरा स्वरूप है ही नहीं, यह अचेतन है और मैं तो चेतन हूँ। पाँच इंद्रियों के विषयों की अग्नि में जलते हुए मेरा मनुष्यभव व्यर्थ जा रहा है।

(५) द्रव्य ५

अंतर्मन: हे वैराग्य! आत्मा आराधनाके ये परिणाम अंदर में जमते नहीं हैं, बाहर क्यों दौड़ते हैं?

वैराण्य: जैसे बद्धे को बाँधे नहीं, तो भी मनुष्य भागने लगता है, यदि खूँटे में बाँध दे, तो फिरा तो करे, परंतु वहाँ से बाहर नहीं जा सकता है। ऐसे धूल में पर्याय को बाँध दे, तो पर्याय धूल में ही फिरा करेगी, बाहर नहीं जाएगी; फिरना तो उसका स्वभाव है; लेकिन धूल-खूँटे में ही फिरेगी तो सुख तो मिलता ही रहेगा।26

अंतर्मन: आस्रव को रोकने के लिए और सुख की प्राप्ति के लिए द्रव्य और पर्याय भिन्न ही है ऐसा अनुभव निरंतर कैसे करें?

वैराण्य: सूक्ष्म उपयोग करके स्व-भाव-विभावके बीच प्रजागौनी द्वारा भेद कर। जिस क्षण विभावभाव वर्तता है उसी समय ज्ञानधारा से स्वभाव को भिन्न जान।

अंतर्मन: मगर मैं तो…

वैराण्य: बस अब अगर मगर में मत अटक, आत्मा पवित्रता से भरपूर है उसके अन्दर उपयोग लगा। *आत्मा के गुणों में सराबोर हो जा।*27 आस्रव भाव का सर्वथा त्याग कर और आस्रव भावना को आत्मसात कर।

(भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरतम28, प्रथम अंतरा)

अंतर्मन: अरे रे! मैं तीन लोक का नाथ होकर राग के आस्रव में रुक गया था। राग में तो दुःख की ज्वाला सुलगती थी, वहाँ से हरि छोड़ दी! और जहाँ सुख का सागर भरा है, वहाँ दृष्टि जोड़ दी।29 तो संवर भावना प्रगट हुई।

मेरे आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में आनन्द का जन्म हो गया है। असंख्य प्रदेश आनन्द से उछल रहे हैं। आहाहा! पूरी दुनिया विस्मृत हो जावे, ऐसा मेरा परमात्मतत्त्व है। शुद्धोऽहं, बुद्धोऽहं, निर्विकल्पोऽहं, चिद्रूपोऽहं।

मेरी संवर भावना अब मुझे निर्जरा भावना की ओर अंगुली निर्देश कर रही है… मैं उसी मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ आगे बढ़ रहा हूँ…! मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा है की मेरे ज्ञान में जैसे-जैसे समझ द्वारा आभासन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ज्ञान का सामर्थ्य भी बढ़ रहा है और देखो यह ज्ञान भी जहाँ सम्यक् रूप परिणमा, वहाँ मोह

(भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरतम31, दूसरा अंतरा)

समूल नाश हो रहा है। ज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरा आत्मसिद्धि का साधन ही नहीं है। इसलिए ज्ञान से ही आत्मा की सिद्धि है यह निर्जरा भावना है।30

(६) द्रव्य ६

कथावाचक: मैंने यह अद्भुत नजारा अपनी स्वयं की आँखों से देखा था। जिस प्रकार नन्दनवन में अनेक वृक्षों के विविध प्रकार के पत्र-पुष्प-फलादि खिले उठते हैं, उसी प्रकार संवर और निर्जरा भावना से साधक आत्मा के चैतन्यरुपी नन्दनवन में अनेक गुणों की विविध प्रकार की पर्यायें खिल उठती हैं।32 चैतन्य की स्वानुभूतिरूप खिले हुए नन्दनवन में साधक आत्मा आनन्दमय विहार करता है। बाहर आने पर कहीं रस नहीं आता।33 मगर फिर भी, पूर्णता अभी हुई नहीं इसलिए भूतकाल में जहाँ परिभ्रमण किए ऐसे लोक भावना का चिंतन बाहुबली भगवान ने किया।

अंतर्मन: पर द्रव्यमई इस लोकमें आत्मा ही सार है। नर, नरक, स्वर्ग, तिर्यंच इन गतियों में परिभ्रमण ही संसार है।

बालक: ये चार गतियों की बात तो बहुत स्थूल है।

बालक: यहाँ तो धूर्ममें अपनापन करने की बात है।34

बालक: सब कुछ आत्मा में है, बाहर कुछ नहीं है।

बालक: अगर कुछ भी जानने की इच्छा होती हो तो अपने आत्मा की साधना करनी होगी।

बालक: पूर्णता प्रगट होनेपर, केवलज्ञान होने पर लोकालोक उसके ज्ञेयरूपसे ज्ञात हो जाऐंगे।35 इस तरह लोक भावना सार्थक होगी।

अंतर्मन: मैं एक चैतन्य को ही ग्रहण करूँगा। सर्व विभावों से परिमुक्त होता हुआ अत्यन्त निर्मल निज परमात्मतत्त्व को ही ग्रहण करूँगा, उसीमें ही लीन होने की अभ्यर्थना रखता हूँ। मेरी पर्याय से लक्ष हटाके, एक परमाणु मात्र की भी आसक्ति छोड़के मैं अब मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने का निर्णय करता हूँ।36

(७) द्रव्य ७

बालक: चैतन्य का ग्रहण करो।

बालक: चैतन्य का ग्रहण ही रत्नत्रय है, बोधि है।

26 द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १९५
27 बहनश्री के वचनामृत, बोल १०५
28 भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरतम, पं. दौलतरामजी
29 दृष्टि ना विधान, बोल १९
30 दृष्टि ना विधान, बोल ९२
31 भक्ति – ज्ञानी जीव नीवार भरतम, पं. दौलतरामजी
32 बहनश्री के वचनामृत, बोल १७५
33 बहनश्री के वचनामृत, बोल १७५
34 द्रव्य दृष्टि प्रकाश, बोल १२६
35 गुरुदेवश्री के वचनामृत, बोल ७०
36 बहनश्री के वचनामृत, बोल १९०

बालक: यह रत्नत्रय प्रगट करना ही अति दुर्लभ है।

बालक: अनादि से प्रगट नहि किया, इस लिए बोधिदुर्लभ है।

बालक: लेकिन अपने ही स्वभाव को प्राप्त करना है और उसमें किसी की आवश्यकता नहि इसलिए सुलभ भी है।

अन्तर्मन: एक ऐसी भावना है जो… मुझे स्वरूप की लीला जहाँ जाज्वल्य है वहाँ ले जाये। मैं मुनि वेश धारण कर चैतन्य के बाग में ही क्रीड़ा करते-करते कर्म के फल का नाश करूँ। बाहर में जो आसक्ति है उसे तोड़कर स्वरूप में लीन हो जाऊँ। स्वरूप ही मेरा आसन, स्वरूप ही मेरी निद्रा, स्वरूप ही मेरा आहार हो।^37
धन्य वह निर्ग्रंथ मुनीदशा। मुनिदशा अर्थात् केवलज्ञान की तलहटी। मुझे तब अंतर में सिर्फ चैतन्य के अनंत गुण- पर्यायों का परिग्रह होगा, विभाव बहुत छूट गया होगा। बाहर में देहमात्र परिग्रह होगा। प्रतिबधिरहित सहज दशा होगी।^38

मैं भी अखण्ड द्रव्य को ग्रहण कर के प्रमत्त- अप्रमत्त स्थितिमें स्वरूप में निरंतर जाग्रत ही रहूँगा।^39
मैं स्वरूप में ही लीला करूँगा, मैं स्वरूप में ही विचरण करूँगा। और सम्पूर्ण श्रामण्य प्रगट करके मैं लीलामार्ग में श्रेणी माँडकर केवलज्ञान प्रगट करूँगा।^40

वहाँ, भावनाओं की पूर्णता के फल में अनंत चतुष्टय रूप अपनी गुणसत्ता का अनुभव होगा। निर्विकल्प रूप प्रत्यक्ष रूप स्वसंवेदन होगा। मैं अद्भुत ऐसी धर्म भावना का उद्घोष करूँगा।

मगर मैं वहाँ अरिहंत दशा में नहीं रहूँगा। सिद्ध नगर में अनंत सिद्ध विराजते हैं। उन्होंने पहले बाहर से नजर समेटकर अन्दर का विस्तार किया था। मैं भी नहीं करूँगा। मैं तो पूर्ण अभेद परमात्मा ही हूँ, मुझ में और परमात्मा में कुछ अंतर नहीं है।^41 मैं भी गुणस्थानातीत होकर मार्गणा स्थानातीत होकर लोकके अग्रभागमें जहाँ अनंत सिद्ध विराजते हैं ऐसे सिद्धलोकमें समयांतरमें पहुँच जाऊँगा।

(८) द्रव्य ८

कथावाचक: चैतन्य को चैतन्यमें से परिणमित भावना अर्थात् राग-द्वेषमें से नहीं उदित हुई भावना- ऐसी यथार्थ भावना ही तो वह भावना फलती है। यदि नहीं फले तो चौदह ब्रह्माण्ड को शून्य होना पड़े अथवा तो इस द्रव्य का नाश हो जाय। परन्तु ऐसा होता ही नहीं। चैतन्य के परिणाम के साथ कुदरत बँधी हुई है - ऐसा ही वस्तुका स्वभाव है।^42

बाहुबली: हे भ्राताश्री मेरे यह दंडनीय अपराध को क्षमा करें। मुझे मेरे भाई की ओर ऐसा द्रोह नहीं करना चाहिए था बड़े भाई का विरोध करके मैंने यह लोक अपवाद खड़ा किया है।

भरत: अरे भाई आपका कोई अपराध नहीं। मैं ही क्रोधावेश में अपने होश खो बैठा था। आपकी कोई भी वृत्ति से मुझे असंतोष नहीं है।

बाहुबली: नहीं भाई, मैंने युद्ध के रंग में आपके तरफ विरोध दिखाने की धृष्टता की है। क्षणभंगुर कर्म के वशीभूत हो कर मैं ये कैसे निंदनीय परिणाम कर बैठा।

भरत: नहि भाई मैं आपकी कोई गलती नहीं है। हुंडा-अवसर्पिणी काल के कारण मेरी ऐसी हार होगी, एसा मुझे श्री आदि प्रभु ने पहले से बताया था।

बाहुबली: कालदोष ही हुई यह घटना मेरे निमित्त से प्रगट हुई है। यह बात मुझे खटक रही है। भाई मेरी परिणति इस संसार से विरक्त हुई है। अभी अभी मैंने वैराग्य की जननी बारह भावनाओं का चिंतन किया है। अब मैं कैलाश जाकर इस संसार का छेद करनेवाली जैनश्वरी दीक्षा लेना चाहता हूँ, आप मेरी यह प्रार्थना का स्वीकार करें।

भरत: अरे नहीं नहीं तुम इसके अलावा कुछ भी माँगो, मैं यह प्रार्थना स्वीकार नहीं कर सकता। आपके बिना यह संसार बहुत अधूरा है, बाकी भाई भी तो दीक्षा लेके चले गए… और अब तुम भी… दीक्षा लेना चाहते हो?

बाहुबली: बड़े भैया, मैं दीक्षा लेकर मोक्ष मंदिर में आपकी प्रतीक्षा करूँगा। मैं अब संसार सुख की लालसा मेरे चित्त में नहीं रही। जिस देह ने मुझ भूमि में मैं आपके विरुद्ध खड़े रहने में साथ दिया, उसी देह का ममत्व त्याग कर मैं अखंड साधना करूँगा। मुझे तो अब आत्मा ही शरणापन्न है। अरहंत अर्थात् वीतरागी पर्याय, सिद्ध अर्थात् वीतरागी पर्याय, आचार्य, उपाध्याय और साधु अर्थात् वीतरागी पर्याय- यह सब वीतरागी पर्याय मेरे आत्मा में ही पड़ी हुई है।^43

भ्राताश्री, मुक्ति के लिए हमेशा योग नहीं बनता, मगर जब बनता है तब आत्मानुशासन कर ही लेना चाहिए। इस लिये आप मुझे दीक्षा लेने की आज्ञा दे।

भरत: भाई उठो… जाओ मुक्ति पथ पे आगे बढ़ो। ध्रुव के धाम की धधकती धुली धगधसे ध्वा और धन्य हो जाओ।
वीतरागी जैन धर्म की जय हो!!!
विराजित होनेवाले बाहुबली मुनिंद्र भगवान की जय हो!

^37 बहिनजी के वचनामृत, बोल ५५
^38 बहिनजी के वचनामृत, बोल ७१
^39 बहिनजी के वचनामृत, बोल ७२
^40 बहिनजी के वचनामृत, बोल ७५
^41 दृष्टि ना विधान, बोल २४
^42 बहिनजी के वचनामृत, बोल २१
^43 दृष्टि ना विधान, बोल ६०


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2421.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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