श्रमण संस्कृति सिद्धान्त प्रवेशिका द्वितीय - भाग — जैन स्वाध्याय सामग्री | Shraman Sanskriti Siddhant Praveshika Dwitiy - Bhag

श्रमण संस्कृति सिद्धान्त प्रवेशिका द्वितीय - भाग

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श्रवण संस्कृति सिद्धान्त प्रवेशिका

द्वितीय - भाग

(सर्वाधिकार सुरक्षित)


आशीर्वाद

आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज


प्रेरणा

विपिनक श्रमण मुनिपुंगव
श्री 108 सुधासागर जी महाराज (ससंघ)


कृति

श्रमण संस्कृति सिद्धान्त प्रवेशिका भाग-2


सम्पादक

पं. रतन लाल बैनाड़ा
डॉ. शीतलचन्द्र जैन


चौदहवां संस्करण : 2000

(संशोधित नवीन प्रति) अक्टूबर, 2020


सह-सम्पादक

पं. प्रदीप कुमार जैन शास्त्री


मूल्य

16/- रुपये (पुनः प्रकाशन हेतु)


प्राप्तिस्थानः

भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड
श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान
वीरगाँव नगर जैन नसियाँ रोड़
सांगानेर- 302 029 जयपुर (राज.)
फ़ोन : 0141-2730552, 9314030108
ईमेल[email protected]
वेबसाइट-www.jainsharaman sanskriti.org


मुद्रकः

डिजिटल पैक एण्ड प्रिन्ट
जी11, शर्मा कॉलोनी एमआईईशन करतारपुरा
इन्डस्ट्रियल एरिया, 22 गोदाम, जयपुर
फ़ोन : 0141-4053939

कहाँ / क्या ?

खण्ड-अ

  1. दर्शन-पाठ 1
  2. सर्वज्ञ देव-शास्त्र-गुरु 3
  3. मिथ्यात्व 4
  4. श्रावक के षट् आवश्यक कर्म 5
  5. रत्नत्रय 10
  6. षट् द्रव्य 11
  7. सप्त तत्व पदार्थ 12
  8. चतुर्दश राज 14
  9. भेदविज्ञान 15
  10. पञ्चकल्याणक 17
  11. सोलहकारण 18
  12. जैन महापुरुष 20
  13. चौबीस एवं बेनामुनश्री 22
  14. अष्टाहिका पर्व 24
  15. जिनवाणी स्तुति (मिथ्यात्व कासवे…) 26

खण्ड-ब

  1. प्रार्थना 29
  2. तोर्थंकर गर्भकल्याण 30
  3. चार प्रकार का दान 31
  4. दीक्षा-शुद्धि 32
  5. ब्रह्मचर्य 34
  6. दश लक्षण एवं सोलहकारण पर्व 36
  7. तीर्थंकर महिमाव 39
  8. बारह भावना (राजा राणा) 41
  9. भेद विज्ञान 42
  10. जिन स्तुति 44
  11. रेवती रानी 45
  12. चार अनुयोग 47
  13. हमारी प्रमुख जैन तीर्थ 48
  14. जन्मकल्याणी 49
  15. जिनवाणी स्तुति (मोक्षो यो गंगा … कारणों से…) 50

आभार

इस स्तुति में जिन मुनिराजों, त्यागी व्रतियों, ब्रह्मचारी एवं विद्वानों की रचनाओं को प्रकाशित किया गया है और जिन महापुरुषों, देवों, गुरुओं, शास्त्रों से प्रेरणा लेकर सामग्री का चयन प्रकाशन अपेक्षित किया गया है-उन सबके प्रति मैं अपने हृदय के गहनतम तल से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
सम्पादक

खण्ड-अ

पाठ-1

दर्शन-पाठ

दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम्।
दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनम्।।1।।
अर्थ-देवाधिदेव जिनेन्द्र देव का दर्शन पापों का नाश करने वाला है, स्वर्ग जाने के लिये सीढ़ी के
समान तथा मोक्ष का साधन है।
दर्शनं जिनेन्द्राणां, साधूनां वन्दनं च।
न चिद्रे तिष्ठते पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम्।।2।।
अर्थ-जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करने से तथा साधुओं की वंदना से, पाप बहुत समय तक
नहीं ठहरते। जैसे-अंजुली में छिद्र होने से पानी नहीं ठहरता।
वीतरागमुखं दृष्ट्वा, पञ्चराग समप्रभम्।
जन्मान्जम् कृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति।।3।।
अर्थ- पञ्चराग मणि के समान शोभनीक श्री वीतराग भगवान का दर्शन करने से अनेक जन्मों के
किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।
दर्शनं जिनसूर्यस्य, संसारख्यान्त नाशनम्।
बोधनं चित्तपद्मस्य, समस्ताघविनाशनम्।।4।।
अर्थ-सूर्य के समान जिनेन्द्र देव के दर्शन करने से, संसार रूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है,
चित्तरूपी कमल खिलता है और सर्वपदार्थ प्रकाश में आते हैं अर्थात् जाने जाते हैं।
दर्शनं जिनचन्द्रस्य, सद्दर्शनितु-वर्धम्।
जन्म-दाह-विनाशाय, वर्धनं सुख-वारिधेः।।5।।
अर्थ-चन्द्रमा के समान श्री जिनेन्द्र देव का दर्शन करने से सत्यधर्म रूपी अमृत की वर्षा होती है,
संसार के दुःखों का नाश होता है और सुख रूपी समुद्र की वृद्धि होती है।
जीवादि-तत्व-प्रतिपादकाय, सम्यस्त-मुख्याह-गुणोधारवाय।
प्रशान्तरूपाय दिगम्बराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय।।6।।
अर्थ- जो जीवादि सप्त तत्वों को बताने वाले हैं, सम्यक्त्व आदि आठ गुणों के समूह हैं, शान्तरूप
तथा दिगम्बर हैं, ऐसे देवाधिदेव जिनेन्द्र देव को नमस्कार हो।

(1)

चिदानन्द-रूपाय, जिनाय परमात्मने।

परमात्म प्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥7॥

अर्थ - जो ज्ञाननंद एक स्वरूप वाले हैं, अष्टकर्मों को जीतने वाले हैं, परमात्म स्वरूप हैं, ऐसे सिद्ध आत्मा को अपने परमात्म स्वरूप के प्रकाशित होने के लिए नमस्कार हो।

अप्प सहावं णविंत, तम्मेव सरणं ममं।

तस्माकालप्प भावेण, रख रख जिणेवर ॥8॥

अर्थ - आपकी शरण के अलावा संसार में मेरे लिए कोई शरण नहीं है, आप ही शरण हैं, इसलिए करुणामय करके, हे जिनेन्द्रदेव! भगवान! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।

नहिं ज्ञाता नहिं ज्ञाता, नहिं ज्ञाता जगत्त्रये।

वीतरागपरं देवो, न भूतो न भविष्यति॥9॥

अर्थ - तीनों लोकों में कोई अपना रक्षक नहीं है, रक्षक नहीं है, रक्षक नहीं है (यदि कोई रक्षक है तो वे वीतराग देव आप ही हैं) क्योंकि आपसे बड़ा न तो कोई देव हुआ है और न ही भविष्य में कभी होगा।

जिनभक्ति - जिनभक्ति - जिनभक्ति-दिनोदिने।

सदाभीष्टस्तु सदाभेस्तु, सदाभेस्तु भवे भवे॥10॥

अर्थ - मैं यह आकांक्षा करता हूँ कि जिनेन्द्र भगवान् के प्रति मेरी भक्ति प्रतिदिन और प्रत्येक भव में बनी रहे।

जिनधर्ममिमुक्तिमो, मा भवचक्रवत्प्यपि।

स्याच्चेत्तोऽपि दरिद्रोऽपि, जिनधर्ममनुशासितः॥11॥

अर्थ - जिनधर्म रहित चक्रवर्ती होना भी अच्छा नहीं है, जिनधर्म धारी, दास तथा दरिद्री हो तो भी अच्छा है।

जन्मजन्मकृतं पापं, जन्मकोटिपुपार्जितम्।

जन्मन्यु-जरा-रोग, हन्यते जिन-दर्शनात्॥12॥

अर्थ - जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन से करोड़ों जन्मों के एकत्रित हुए पाप तथा जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु एवं रोग अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं।

अद्या - भवत् सफलता नयन-दृश्य, देव! त्वदीय चरणानुज-वीक्षणेन।

अद्य त्रिलोक - तिलक प्रमिभासते मे, संसार-वारिधि - एवं चुलुक-प्रमाणः ॥13॥

अर्थ - हे देवाधिदेव! आपके कल्याणकारी चरण कमलों के दर्शन से मेरे दोनों नेत्र आज सफल हुए। हे तीनों लोकों के तिलक स्वरूप आपके प्रताप से, मेरा संसार रूपी समुद्र, हाथ में लिये गये चुलुक् भर पानी के समान प्रतीत होता है, अर्थात् आपके प्रताप से मैं सहज ही संसार समुद्र से पार हो जाऊँगा।

(2)

पाठ-2

सच्चे देव-शास्त्र-गुरु

परिभाषा

देव का लक्षण - जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं, वे सच्चे देव कहलाते हैं। अरिहन्त, तीर्थंकर, जिनेन्द्र, परमात्मा और परमेश्वर आदि सच्चे देव के नामान्तर हैं।

वीतराग का लक्षण - जो किसी वस्तु या प्राणी से राग (प्रेम) तथा द्वेष (बैर) नहीं करता, सबको सम दृष्टि से (बराबर) देखता है तथा जिसमें अठारह दोष नहीं होते, उसे वीतराग कहते हैं।

सर्वज्ञ का लक्षण - जो कुछ हो चुका है, अब हो रहा है और जो कुछ आगे होगा, उन सबको प्रत्येक समय जो जैसा का तैसा प्रत्यक्ष जानता है, वह सर्वज्ञ कहलाता है। संसार में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं जिसे सर्वज्ञ नहीं जानते हों।

हितोपदेशी का लक्षण - जो सब जीवों (प्राणियों) को हित (संसार से पार होने) का उपदेश देता है, उसे हितोपदेशी कहते हैं।

शास्त्र का लक्षण - जो सच्चे देव का कहा हुआ होता है, जिसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं होता है, जो खोटे मार्ग का नाश करता है और जिसके पढ़ने, सुनने से जीवों का कल्याण होता है, वह शास्त्र कहलाता है। जिनागम, जिनवाणी, जैनशासन, वीरशासन, भगवद्वाणी आदि सच्चे शास्त्र के नामान्तर हैं।

गुरु का लक्षण - जो इन्द्रियों के विषयों की चाह नहीं रखते, आरम्भ नहीं करते, परिग्रह नहीं रखते तथा ज्ञान, ध्यान व तप में लीन तथा पापों से दूर रहते हैं, उन्हें सच्चा गुरु कहते हैं।

गुरु के नामान्तर - यति, मुनि, ऋषि, तपस्वी, योगी, साधु और दिगम्बर आदि गुरु के नामान्तर हैं। अपने शिक्षक को शिक्षा गुरु कहा जाता है और साधु, मुनि को सच्चा गुरु कहा जाता है।

शिक्षा - इस प्रकार सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का स्वरूप जानकर सदा ही उनकी भक्ति, पूजा और सेवा करनी चाहिए, किन्तु रागी, द्वेषी, मिथ्या देवों व साधुओं को कभी भी नहीं पूजना चाहिए। अनाचार, शिथिलता तथा विषय कषाय बढ़ाने वाले मिथ्या शास्त्र भी नहीं पढ़ने चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

  1. सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का लक्षण लिखिए।
  2. सच्चे देव तथा शास्त्र के नामान्तर लिखिए।
  3. किन्हीं उनचास और कहानियों में सच्चे शास्त्र हैं या नहीं?
  4. सर्वज्ञ किसे कहते हैं?
  5. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

(3)

पाठ-3

मिथ्यात्व

परिभाषा

सत्यों पर यथार्थ श्रद्धान नहीं होना ही मिथ्यात्व है अथवा सच्चे देव, शास्त्र, गुरु पर श्रद्धान न करना या झूठे देव, शास्त्र, गुरु का श्रद्धान करना मिथ्यात्व है। विपरीत या गलत धारणा का नाम मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के उदय से जीव को सच्चा धर्म नहीं रुचता है। जैसे-पिस के रोगी को दूध भी कड़वा लगता है।

मिथ्यात्व के दो भेद होते हैं

  • गृहीत एवं अगृहीत।

गृहीत मिथ्यात्व - पर के उपदेश आदि से कुदेवतादि में जो श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है, उसे गृहीत मिथ्यात्व कहते हैं।

अगृहीत मिथ्यात्व - अनादिकाल से किसी के उपदेश के बिना शरीर को ही आत्मा मानना व पुत्र, धन आदि में अपनत्व करना, अगृहीत मिथ्यात्व है।

मिथ्यात्व के पाँच भेद भी होते हैं

  1. विपरीत - जीवादि पदार्थों में विपरीत मान्यता एवं अधर्म को धर्म मानना ही विपरीत मिथ्यात्व है। जैसे-शरीर को ही आत्मा मानना।
  2. एकान्त - जीवादि पदार्थों में पाये जाने अनेक धर्मों में से एक धर्म को ही स्वीकार करना एकान्त मिथ्यात्व है। जैसे-पदार्थ को नित्य ही मानना।
  3. विनय - सच्चे देव, शास्त्र, गुरु एवं अन्य मिथ्या देव, शास्त्र, गुरु को समान मानना विनय मिथ्यात्व है। जैसे-अरिहंत देव तथा अन्य देवों को समान विनय करना।
  4. संशय - सद् असद् धर्म में सच्चे धर्म का निश्चय नहीं होना संशय मिथ्यात्व है। जैसे-स्वर्ग-नरक होते भी हैं या नहीं।
  5. अज्ञान - जीवादि पदार्थों के समझने का प्रयास न करना अज्ञान मिथ्यात्व है।

इस तरह सामान्य से मिथ्यात्व के पाँच भेद हैं। आगम में अधिक भेद करने से 363 भेद भी वर्णित हैं अथवा विस्तार से असंख्यात लोक प्रमाण भेद भी कहे जाते हैं।

भावार्थ

भारत में अनेक राजा हुए हैं। उनमें से एक राजा धनदत्त कानपुर में राज्य करता था। राजा धनदत्त का मन्त्री बौद्ध धर्म का अनुयायी था। एक दिन राजा एवं मन्त्री दोनों राजमहल की छत पर विचार-विमर्श कर रहे थे। आकाश में, आकाश मार्ग से आते हुए दो धारण ऋद्धिधारी मुनिराज दिखे। राजा ने वन्दना करके उन्हें काष्ठसन पर विराजमान होने का अनुरोध किया।

मुनिराज ने धर्मोपदेश दिया, जिससे प्रभावित होकर बौद्ध मन्त्री ने सम्यक्त्व सहित श्रावक के व्रत ग्रहण कर लिए। उस दिन मन्त्री अपने बौद्ध गुरुओं की वन्दना के लिए नहीं गया। यह देखकर बौद्ध गुरुओं ने उसे बुलाया फिर भी उसने वन्दना नहीं की और सारी बातें सुना दीं। बौद्ध संघ के गुरुओं ने उसे अनेकों उपदेश देकर वापस बौद्ध धर्म बना लिया। श्रावक फिर संघ की मीठी-मीठी बातों में आ गया और सम्यक्त्व से विचलित हो गया।

(4)

शिक्षा

अनादिकालीन से मिथ्यात्व में फँसे होने के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है अतः हमें इसको छोड़ना चाहिए। मिथ्यात्व वह दलाली है जो कि हमारी मानव रूपी श्रेष्ठ पर्याय का भरम (नष्ट) कर रही है। इसलिए हमें शीघ्र ही मिथ्यात्व को नष्ट करना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

  1. मिथ्यात्व किसे कहते हैं?
  2. गृहीत और अगृहीत मिथ्यात्व में क्या अन्तर है?
  3. मिथ्यात्व के पाँच भेद कौन-कौन से हैं?
  4. विपरीत और एकान्त मिथ्यात्व का लक्षण लिखिए।
  5. मिथ्यात्व के अधिक से अधिक कितने भेद हो सकते हैं, विनय मिथ्यात्व क्या है?

पाठ-4

श्रावक के षट् आवश्यक कर्म

प्रत्येक मानव सुख शांति चाहता है और सुख शांति धर्म कार्य से प्राप्त होती है। अतः धर्म कार्य करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये परमावश्यक है। हमें मनुष्य जन्म की प्राप्ति महाल पुण्यार्जन से हुई है। इसमें भी आर्यक्षेत्र, उत्तम कुल, निरोगी काया, सत्पुरुषों की संगति आदि उत्तम निमित्त मिलने पर भी जो ज्ञान पूजादि षट् आवश्यक कार्यों को नहीं करता है, उसे आचार्यों ने पशु के समान माना है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को षट् आवश्यक कार्यों को परमावश्यक समझकर प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए, जिससे इस भव में और पर भव में सुख शान्ति की प्राप्ति हो।
षट् आवश्यक के नाम इस प्रकार हैं:

देवपूजा, गुरुपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान ये षट् आवश्यक कर्म प्रत्येक गृहस्थ को नित्य करना चाहिए

देवपूजा

मन-वचन-काय से भगवान जिनेन्द्र के गुणों का विशेष रूप से चिन्तन-मनन करना देवपूजा कहलाती है। इसके लिये सर्वप्रथम छने हुए शुद्ध जल से स्नान कर, शुद्ध धुले हुए धोती-दुप्पट्टा पहनना चाहिए, श्री जी के अभिषेक व सामग्री होने के लिये जल कूप का ही काम में लेना चाहिए।
सर्वप्रथम जिनेन्द्र देव का अभिषेक करके अष्टद्रव्य का थाल सजाकर, विनय पूर्वक, सर्वप्रथम णमोकार मंत्र, स्वस्ति मंगल पाठ बोलकर अपनी इच्छा से देव-शास्त्र-गुरु आदि की पूजन, आह्वान-स्थापना-सन्निधिकरण करते हुए क्रमशः जलादि अष्टद्रव्यों के छन्द पढ़कर द्रव्य चढ़ाते जाना चाहिए तत्पश्चात् शेष अर्घ चढ़ाने के बाद शांतिपाठ व विसर्जन करना चाहिए इसके बिना पूजा अधूरी रहती है। पूजा के 6 अंग है- 1. अभिषेक 2. आह्वानम् 3. स्थापन 4. सन्निधिकरण 5. पूजन 6. विसर्जन।

गुरु उपासना

समस्त परिग्रह रहित दिगम्बर मुनि तथा ऐलक, क्षुल्लक, आर्यिकादि व्रती-त्यागियों का विनय के साथ उपदेश सुनना, उनकी सेवा शुश्रूषा करना, उनकी आवश्यकता के अनुसार उनको पीठी, कमण्डलु, शास्त्रादि उपकरण देना, विधि पूर्वक यथायोग्य यथाशक्ति से शुद्ध आहार कराना आदि गुरु-उपासना कहलाती है।

स्वाध्याय

श्री जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए और गणधरों द्वारा निरूपित तथा आचार्यों द्वारा लिखे गये ग्रन्थों का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना, पूछना-बताना, चिन्तन-मनन करना, चर्चा करना स्वाध्याय कहलाता है।

संयम

अपने मन और इन्द्रियों को नियंत्रण में रखना संयम कहलाता है। संयम दो प्रकार का होता है- इन्द्रिय संयम, प्राणी संयम। पाँचों इन्द्रियों और मन को वश में करना इन्द्रिय संयम कहलाता है। दयाभाव से षट्काय (स्थावर जीव के पाँच भेद है- पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक एवं वनस्पतिकायिक) के जीवों का घात नहीं करना प्राणी संयम कहलाता है।

तप

अपनी इच्छाओं का निरोध करना तप कहलाता है। छह अन्तरंग और छह बहिरंग की अपेक्षा तप के बारह भेद होते हैं-

बाह्य तप के छह भेद हैं-

  1. अनशन
  2. अवमौदर्य
  3. वृत्तिपरिसंख्यान
  4. रसपरित्याग
  5. कायक्लेश
  6. विविक्त-शय्यासन।

अभ्यंतर तप के छह भेद हैं-

  1. प्रायश्चित्त
  2. विनय
  3. वैयावृत्य
  4. स्वाध्याय
  5. व्युत्सर्ग
  6. ध्यान।
    इनको अपनी शक्ति अनुसार नित्य करना चाहिए।

दान

मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका को निज और पर के कल्याण के लिये, चार प्रकार के दान में अपने धन को त्याग दान कहलाता है। दीन दुखियों को भी आवश्यकतानुसार सहायता करना करुणा दान कहलाता है।
दान के चार भेद हैं- 1. आहार दान 2. ज्ञान दान 3. औषधि दान 4. अभय दान

अभ्यास प्रश्न

  1. श्रावक के षट् आवश्यक के नाम बताइए।
  2. देवपूजा किसे कहते हैं? देवपूजा करने की विधि बताइए।
  3. स्वाध्याय किसे कहते हैं?
  4. दान किसे कहते हैं? कितने प्रकार का होता है?
  5. इन्द्रिय संयम किसे कहते हैं?

पाठ - 5

रत्नत्रय

सम्यग्दर्शन का लक्षण व भेद

सच्चे श्रद्धान (विश्वास या यकीन) को सम्यग्दर्शन कहते हैं। निश्चय सम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्दर्शन ये दो सम्यग्दर्शन के भेद हैं।
आत्मा का जैसा का तैसा परद्रव्यों से भिन्न श्रद्धान (विश्वास) निश्चय सम्यग्दर्शन कहलाता है। सच्चे देवशास्त्र-गुरु, दयामयधर्म और सातों तत्त्वों का सच्चे दिल से यथार्थ श्रद्धान करना व्यवहार सम्यग्दर्शन कहलाता है।

सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति और आवश्यकता

सम्यग्दर्शन धर्मरूपी पेड़ की जड़ है। जड़ के बिना पेड़ नहीं ठहरता, वैसे ही सम्यग्दर्शन के बिना सब धर्मकर्म व्यर्थ होते हैं, उनसे कुछ अधिक लाभ नहीं होता। इसलिए आत्म-कल्याण के लिए सबसे पहले सम्यग्दर्शन प्राप्त करना आवश्यक है।

सम्यग्दर्शन की महिमा

जिस प्राणी को सम्यग्दर्शन हो जाता है, वह मरने पर स्वर्ग का देव या भोगभूमि में मनुष्य गति में उत्पन्न होता है, स्त्री नहीं होता, पहले नरक को छोड़ अन्य छह नरकों में नहीं जाता, भवनत्रिक, स्थावर, विकलत्रय, पशु, नपुंसक, अल्पायु, गरीब, हीनांग, पक्षी और नीचकुली भी नहीं होता।

सम्यग्ज्ञान का लक्षण व भेद

ठीक-ठीक जैसा का तैसा जानना, किसी प्रकार का संशय नहीं होना सम्यग्ज्ञान कहलाता है। निश्चय सम्यग्ज्ञान और व्यवहार सम्यग्ज्ञान ये दो सम्यग्ज्ञान के भेद हैं।
आत्मा को जैसा का तैसा पर द्रव्यों से भिन्न जानना, निश्चय सम्यग्ज्ञान कहलाता है। पदार्थों के स्वरूप को ठीक-ठीक जैसा का तैसा जानना, उसमें किसी प्रकार का संशय नहीं होना, व्यवहार सम्यग्ज्ञान कहलाता है।

सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति और आवश्यकता

सम्यग्ज्ञान होने के पहले जो ज्ञान मिथ्या होता है, सम्यग्दर्शन होने पर वही ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाने लगता है। सम्यग्ज्ञान से ही आत्मज्ञान और केवलज्ञान प्राप्त होता है।

सम्यग्ज्ञान की महिमा

सम्यग्ज्ञान होने पर त्रिगुप्ति (मन, वचन, काय की एकाग्रता) से जन्म-जन्म के पाप कट जाते हैं, जो पाप अज्ञानी प्राणियों के करोड़ों जन्मों तक तप करने पर भी नहीं कटते।

सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति का उपाय

सच्चे शास्त्रों को पढ़ने, पढ़ाने, सुनने, सुनाने तथा बार-बार विचारने, आत्मचिन्तन करने, पाठशाला खुलवाने, शास्त्रदान करने या छात्रवृत्ति देने आदि से सम्यग्ज्ञान प्राप्त होता है।

सम्यक् चारित्र का लक्षण व भेद

अशुभ कार्यों को छोड़ना, शुभ कार्यों में प्रवृत्ति करना सम्यक् चारित्र कहलाता है। निश्चय सम्यक् चारित्र और व्यवहार सम्यक् चारित्र ये दो सम्यक् चारित्र के भेद हैं। आत्मस्वरूप में लीन होना, निश्चय सम्यक् चारित्र कहलाता है। हिंसा,
(8)
झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापों तथा क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों का त्याग करना, व्यवहार सम्यक् चारित्र कहलाता है।

सम्यक् चारित्र की प्राप्ति का उपाय

वीतरागी निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधुओं की संगति करने, दान देने, वैय्यावृत्ति आदि करने तथा व्रत, समिति, गुप्ति, तप, धर्म आदि करने से सम्यक् चारित्र प्राप्त होता है। इन सम्यक् चारित्र से ही संवर व निर्जरा होती है।

रत्नत्रय और मोक्षमार्ग

सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र को रत्नत्रय कहते हैं, इन तीनों की ही एकता को मोक्षमार्ग कहते हैं। यथार्थ में यही मोक्ष प्राप्ति का उपाय है।

शिक्षा

संसार के दुःखों से छूटने का सच्चा उपाय रत्नत्रय ही है, अतः हमको रत्नत्रय धारण करना चाहिए हमारे मनुष्य जन्म की सफलता भी इसी में है। रत्नत्रय को धारण करने वाले व्रती, श्रावक या मुनि होते हैं।

अभ्यास प्रश्न

  1. रत्नत्रय किसे कहते हैं? भेद बताइए।
  2. रत्नत्रय प्राप्ति का उपाय बताइए।
  3. रत्नत्रय और मोक्षमार्ग में क्या अन्तर है?
  4. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
    (9)

पाठ - 6

षट् द्रव्य

द्रव्य का लक्षण

जिसमें गुण और पर्याय होते हैं, उसे द्रव्य कहते हैं अथवा जिसमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य होते हैं, उसे द्रव्य कहते हैं।

द्रव्य के भेद

जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य हैं। इनमें जीव द्रव्य को छोड़कर पाँच द्रव्य अजीव हैं।

जीव द्रव्य

जिसमें जानने-देखने की शक्ति होती है, उसे जीव कहते हैं। जैसे- देव, मनुष्य, नारकी, पशु आदि।

पुद्गल द्रव्य

जिसके परमाणु मिलते और बिछड़ते हैं अथवा जिसमें स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण होता है, और जो कुछ भी हमारे देखने में आता है, उसे पुद्गल कहते हैं। जैसे पुस्तक, कलम, परमाणु, गोली, पाषाण आदि
परमाणु - पुद्गल के सबसे छोटे (अविभागी) टुकड़े को परमाणु या अणु कहते हैं। वह इतना छोटा (बारीक) होता है कि रूपवान (रूपी या मूर्तिक) होने पर भी हमें दिखाई नहीं देता।
स्कन्ध - दो या दो से अधिक मिले हुए पुद्गल परमाणुओं को स्कन्ध कहते हैं। जैसे-गोलियां, चूर्ण, चटनी आदि।

पुद्गल द्रव्य की पर्याय

शब्द, बन्ध, स्थूलता, सूक्ष्मता, आकार, हिस्सा, अन्धकार, परछाई, प्रकाश, चांदनी और धूप ये सब पुद्गल द्रव्य की पर्यायें हैं।

धर्म द्रव्य

जो द्रव्य स्वयं चलते हुए जीव और पुद्गलों को चलने या उड़ने में उदासीन रूप से मदद करता है, तथा ठहरे हुए को चलाता नहीं है उसे धर्मद्रव्य कहते हैं। जैसे जल मछली को चलने तथा हवा पतंग को उड़ने में सहायक होती है। यदि धर्मद्रव्य नहीं होता तो जीव और पुद्गल चल नहीं सकते।

अधर्म द्रव्य

जो द्रव्य स्वयं ठहरते हुए जीव और पुद्गलों को ठहरने में उदासीन रूप से सहायक होता है, वह अधर्मद्रव्य कहलाता है। जैसे वृक्ष की छाया थके हुए मुसाफिर को ठहरने में सहायक होती है। यदि अधर्मद्रव्य नहीं होता तो जीव और पुद्गल ठहर नहीं सकते।

आकाश द्रव्य

जो द्रव्य समस्त द्रव्यों को ठहरने के लिए स्थान देता है, उसे आकाशद्रव्य कहते हैं। यदि आकाश द्रव्य नहीं होता तो किसी वस्तु को रहने के लिए जगह नहीं मिलती। लोकाकाश (लोक) और अलोकाकाश (अलोक) ये दो आकाश द्रव्य के भेद हैं।
लोकाकाश
जिसमें स्थान में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छहों द्रव्य रहते हैं, उतने आकाश या स्थान को लोकाकाश या लोक कहते हैं।
(10)

परिभाषा

अलोकाकाश - जिस स्थान में केवल आकाश ही आकाश है, अन्य कोई द्रव्य नहीं है, उसे अलोकाकाश या अलोक कहते हैं।
काल द्रव्य - अपनी-अपनी पर्याय रूप से स्वयं परिणमित होते हुए जीवादि द्रव्यों के परिणमन में जो निमित्त हो, उसे कालद्रव्य कहते हैं। निश्चयकाल और व्यवहारकाल ये दो कालद्रव्य के भेद हैं।
निश्चय काल - जो स्वयं पलता है तथा स्वयं पलते हुए अन्य द्रव्यों के पलटने (परिणमन करने) में कुम्हार के चाक की कील के समान सहायक होता है, उसे निश्चयकाल कहते हैं।
व्यवहार काल - घड़ी, घण्टा, दिन, सप्ताह, पक्ष और मास आदि को व्यवहारकाल कहते हैं।

विशेष

  1. बहुप्रदेशी द्रव्य को अस्तिकाय कहते हैं। कालद्रव्य अस्तिकाय नहीं है, क्योंकि उसका प्रत्येक अणु अलग-अलग रहता है। शेष पाँच द्रव्य एक अणु से अधिक जगह घेरते हैं, इससे वे अस्तिकाय हैं।
  2. धर्म और अधर्म द्रव्य, जीव तथा पुद्गल को प्रेरित कर नहीं चलाते या ठहराते हैं, किन्तु जब वे चलते या ठहरते हैं तब उनको मदद अवश्य देते हैं।
  3. ये छह द्रव्य समस्त लोक में व्याप्त हैं, फिर भी एक दूसरे के रहने में बाधक नहीं होते।
  4. पुद्गल द्रव्य को छोड़कर शेष द्रव्य दिखाई नहीं देते क्योंकि वे रूप रहित (अरूपी) या अमूर्तिक हैं।
  5. धर्म, अधर्म और आकाश ये तीनों द्रव्य एक-एक ही हैं। इनके हिस्से या भेद नहीं होते।
  6. धर्म और अधर्म से नहीं पुण्य और पाप नहीं समझना, किन्तु षड्द्रव्यों के अन्तर्गत द्रव्य समझना चाहिए। अन्यत्र धर्म और अधर्म का अर्थ शुभाशुभ कर्म का फल पुण्य और पाप जानना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

  1. द्रव्य किसे कहते हैं ?
  2. छह द्रव्यों के नाम बताओ ?
  3. पुद्गल द्रव्य किसे कहते हैं, इसकी पर्यायें बताएँ ?
  4. धर्म द्रव्य जीव और पुद्गल को किस प्रकार की सहायता देता है ?
  5. अलोकाकाश में कौन-कौन से द्रव्य रहते हैं ?
  6. हम कहाँ रहते हैं लोकाकाश में या अलोकाकाश में ?

तत्व एवं पदार्थ

तत्व

जिनके जानने या श्रद्धान करने से हमें अपने आत्मा के सच्चे हित का ज्ञान हो सके और हम अपनी आत्मा को पवित्र कर सकें, ऐसे वस्तु के स्वभाव को तत्व कहते हैं।

तत्वों के भेद

जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्व हैं, इनमें पुण्य और पाप मिला देने से नौ पदार्थ हो जाते हैं।

  1. जीव - जिसमें चेतना पायी जाती है, उसे जीव कहते हैं।
  2. अजीव - जिसमें चेतना नहीं पायी जाती है, उसे अजीव कहते हैं।
  3. आस्रव - रागद्वेष आदि भावों के द्वारा आत्मा में आने वाले कर्मों के द्वार को आस्रव कहते हैं।
  4. बन्ध - रागद्वेष आदि भावों के द्वारा आये हुए कर्मों का आत्मा के साथ दूध और जल के समान मिलकर एकमेक हो जाना, बन्ध कहलाता है।
  5. संवर - आस्रव का न होना अर्थात् आते हुए कर्मों का रुकना, संवर कहलाता है।
  6. निर्जरा - आत्मा के साथ बद्ध कर्मों का एकदेश (थोड़ा भाग) क्षय हो जाना, निर्जरा कहलाता है।
  7. मोक्ष - ज्ञानावरणादि आठों कर्मों का क्षय होकर आत्मा का सर्वथा शुद्ध हो जाना, मोक्ष कहलाता है।

सात तत्वों का उदाहरण

जैसे एक नाव है वह अजीव है, उसमें बैठे व्यक्ति जीव है। नाव में एक छेद है, उस छेद से पानी अन्दर नाव में आ रहा है, यह जो पानी आ रहा है वही आस्रव है, और पानी का नाव में एकत्रित होना बन्ध है, अब नाविक के द्वारा नाव डूब जाने के भय से पानी को रोकने के लिए छिद्र को बन्द कर देना संवर है, और फिर अन्दर भरा हुआ पानी धीरे-धीरे निकाला जा रहा है वही निर्जरा है, और जब सारा पानी निकाल दिया, तब नाव पूर्ण हल्की हो गयी है यही मोक्ष है।
शरीर भी एक नाव है, यह अजीव तत्व है, आत्मा जीव तत्व है, शुभ अशुभ कर्म का आना आस्रव है, आये हुए कर्मों का आत्मा के साथ एकपना बन्ध है, मन वचन काय की चंचलता को रोकना संवर है, तप के द्वारा कर्मों का आत्मा से एक देश छूट जाना निर्जरा है और कर्मों से आत्मा का पूर्ण रूप से अलग हो जाना यही मोक्ष है।

पदार्थ का लक्षण और भेद

जिसमें तत्व पाया जाता है, उसे पदार्थ कहते हैं। सात तत्वों में पुण्य तथा पाप मिलाकर नौ पदार्थ होते हैं।
पुण्य : जिससे प्राणी को इष्ट वस्तु की प्राप्ति तथा सुखदायक सामग्री प्राप्त होती है उसे पुण्य कहते हैं। जैसे - सुपुत्र की प्राप्ति, व्यापार में लाभ और उच्च पद की प्राप्ति ये पुण्य के उदय से होते हैं।
धर्म पालन करना, पूजन करना, दान देना, शिक्षा प्रचार, परोपकार आदि पुण्य संचय के कारण हैं।
पाप : जिससे प्राणी को अनिष्ट वस्तु और दुःखदायक सामग्री प्राप्त होती है उसे पाप कहते हैं। जैसे पुत्र मर जाना, चोरी हो जाना, रोग हो जाना आदि पाप के उदय से होते हैं।
हिंसा करना, झूठ बोलना, चोरी करना, परिग्रह रखना, परनिन्दा करना, किसी का बुरा विचारना, जुआ खेलना आदि खराब कार्य पाप संचय के कारण हैं।

अभ्यास प्रश्न

  1. तत्व किसे कहते हैं ?
  2. तत्वों के कितने भेद हैं ? नाम लिखो।
  3. जीव और अजीव तत्व में क्या अन्तर है ?
  4. आस्रव और संवर को उदाहरण सहित समझाइए।
  5. निर्जरा और मोक्ष में क्या अन्तर है ?
  6. पदार्थ कितने होते हैं ?

पाठ-8

उदयन राजा

वत्सदेश में शेखपुर नगर के राजा उदयन बहुत ही समर्थ थे। उनकी रानी का नाम प्रभावती था। एक समय सौधर्म इन्द्र ने अपनी सभा में सम्यक्त्व गुण की प्रशंसा करते हुए निविर्धिक्षा अंग में राजा उदयन की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

इस प्रशंसा को सुनकर सभी देव राजा उदयन से अत्यन्त प्रभावित हुए। तब एक देव उदयन राजा एवं उनकी रानी प्रभावती की परीक्षा लेने के लिए कुष्ठरोग से ग्रसित अत्यन्त दुर्गन्धित शरीर में, रत्नत्रय से पवित्र दिगम्बर मुनि मुद्रा का रूप धारण कर, आहारचर्या के लिए शेखपुर नगर में निकल पड़ा।

शरीर दुर्गन्ध से नगर के समस्त श्रावक उनसे देखते ही भाग गये, किन्तु उदयन राजा एवं रानी प्रभावती ने बड़ी भक्ति व विनय से मुनि का प्रक्षालन किया और नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान दिया। अधिक परीक्षा लेने के लिए उन्होंने आहार के बाद दुर्गन्धित वमन कर दिया। जिसकी बदबू से महल के सभी दासी दास भाग गये। किन्तु उदयन राजा और रानी प्रभावती, विनय से मुनिराज की शुश्रूषा करते हुए अपने ही आहार दान की निन्दा करने लगे। तभी अचानक वह मुनि वास्तविक देव पर्याय में प्रकट हो, राजा और रानी की प्रशंसा करने लगा। उसने उनका सम्मान किया और फिर अपने स्थान चला गया।

कालान्तर में राजा उदयन संसार तथा भोगों से विरक्त हो, कर्मों को सहकर मोक्ष चले गये और रानी प्रभावती ने आगामी पर्याय में स्वर्ग प्राप्त किया।

इसलिए हमें कभी भी अपने देव, शास्त्र, गुरु के स्वरूप को देखकर ग्लानि नहीं करनी चाहिए बल्कि अटूट श्रद्धा के साथ अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

  1. उदयन राजा किस देश के किस नगर पर राज्य करते थे?
  2. देव ने कैसा रूप बनाया?
  3. राजा उदयन एवं रानी प्रभावती आगे कहाँ उत्पन्न हुए?
  4. देव मुनि बनकर आहार चर्या के लिये किस नगर में आया था?
  5. किस अंग में राजा उदयन की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है?

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पाठ-9

भेद-विज्ञान

जिनवाणी अर्थात् सच्चे दिगम्बर जैन शास्त्रों का अध्ययन करके और उनका बार-बार चिंतन करके ऐसा पक्का दृढ़ विश्वास बनाना कि-

  1. जो जन्म-मरण आदि 18 दोषों से रहित होने से वीतरागी है, समस्त द्रव्यों की अनंत पर्यायों को जानने से सर्वज्ञ है, सच्चे आत्मकल्याण का उपदेश देने वाले होने से हितोपदेशी है, ऐसे तीन गुणों से सहित जो अरिहंत भगवान है वे ही सच्चे देव है, इनके अलावा अन्य कोई सच्चा देव नहीं है।
  2. दिगम्बर जैन वीतरागी साधुओं द्वारा लिखे गये शास्त्र ही सच्चे शास्त्र है इनके अलावा अन्य शास्त्र सच्चे शास्त्र नहीं है।
  3. पंचेंद्रियों के विषयों से दूर रहने वाले, समस्त हिंसाजनित कार्यों से रहित, समस्त परिग्रह से रहित, ज्ञान, ध्यान तथा तप में लीन रहने वाले ऐसे रागद्वेष से रहित दिगम्बर जैन निर्ग्रन्थ मुनि ही सच्चे गुरु है, अन्य गुरु सच्चे गुरु नहीं है।
  4. आत्मा और बंध का सच्चा स्वरूप जानकर ये तो हेय है, तथा संवर और निर्जरा का स्वरूप जानकर, ये उपादेय है तथा कर्म से रहित आत्मा का जो स्वरूप है वही मेरी आत्मा का सच्चा स्वरूप है।
  5. मेरी जो ये मनुष्य पर्याय है, इसमें आत्मा और शरीर दो द्रव्य मिले हुये है। जो दिखाई पड़ता है, वह तो शरीर है और इसमें जो शक्ति रूप से जानने-देखने रूप कार्य को करने वाला है, वह आत्मा है। जब आत्मा शरीर से पृथक हो जाता है तो मात्र शरीर रह जाता है, जिसे हम मृत शरीर कहते है।
  6. आत्मा की दो पर्याय होती है-शुद्ध पर्याय अर्थात् मुक्त या सिद्ध पर्याय तथा अशुद्ध पर्याय अर्थात् संसारी जीव की पर्याय।
  7. मेरी वर्तमान मनुष्य पर्याय अशुद्ध पर्याय है। मेरी आत्मा द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म लगे होने से अशुद्ध है आत्मा के साथ जो पुद्गल कर्म चिपके हुये है, वे तो द्रव्यकर्म है। आत्मा में जो राग-द्वेष-मोह आदि विकार परिणाम होते है, वे भावकर्म है और शरीर आदि नोकर्म है। मैं आत्मा स्वभाव से तो सिद्ध भगवान जैसा अनन्त ज्ञान-दर्शन शक्ति वाला द्रव्य हूँ लेकिन वर्तमान संसारी पर्याय में उपरोक्त तीन कर्मों से सहित होता हुआ, संसार में भटक रहा हूँ।
  8. यद्यपि मैं जानने-देखने अर्थात् चेतना वाला द्रव्य द्रव्य हूँ फिर भी अज्ञानवश अपने स्वरूप का न पहचान कर जिस-जिस शरीर को प्राप्त करता हूँ उसी को अपना स्वरूप मान लेता हूँ, यह मेरी महान भूल है और इसी से मैं संसार में भटक रहा हूँ।
  9. कर्म के फलस्वरूप मुझे सुख-दुःख रूप जो भी अच्छी या बुरी वस्तुओं का संयोग प्राप्त होता है, मैं उन रूप होकर अपने को सुखी-दुःखी मानने लगता हूँ, जबकि मेरा स्वभाव तो अनंत सुख वाला है और इसी भूल के कारण मैं भटक रहा हूँ।
  10. मैंने अपने को दूसरे का सुख-दुःख देने वाला मान रखा है। दूसरे को सुख-दुःख वास्तव में उसके अपने कर्मों के उदयानुसार होता है, परन्तु मैं अपने अज्ञान से अपने को अन्य के सुख-दुःख का कर्ता मानता हूँ। यह मेरी महान्

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भूल है और इसी भूल के कारण संसार में भटक रहा हूँ।
11. संसार का कोई भी पदार्थ अच्छा या बुरा नहीं है। मैं अपनी कल्पनाओं के अनुसार उनमें अच्छे बुरे की कल्पना कर लेता हूँ। मुझे वस्तु के स्वरूप को जानकर ऐसी भूल नहीं करना चाहिए। यही भूल मेरे संसार भ्रमण का कारण है।
12. उपरोक्त सच्चे देव, शास्त्र, गुरु का श्रद्धान करता हुआ, सात तत्व का श्रद्धान करता हुआ, अज्ञान बुद्धि समभ्रता हुआ, मैं इस निर्णय पर पहुँचता हूँ कि इस शरीर में मौजूद अनन्त ज्ञान, दर्शन, शक्ति तथा सुख स्वभाव वाला ऐसा मैं आत्मा हूँ। द्रव्यकर्म, भावकर्म तथा शरीरादि नोकर्म न तो मेरे है, न मेरे थे और न मेरे होंगे। मैं भी इनका नहीं हूँ, कभी इनका नहीं था और कभी इनका नहीं होऊँगा। ये सब मुझसे सर्वथा भिन्न है, और मैं चैतन्य आत्मा इन सबसे भिन्न हूँ। अब मैं इन सबको अपने से भिन्न मानता हुआ अपने शुद्ध स्वभाव का निर्णय करता हूँ।

उपरोक्त प्रकार से अपने स्वरूप का और अपने से भिन्न समस्त अन्य द्रव्यों के स्वभाव का निर्णय करते हुये अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान व निर्णय करना भेदविज्ञान है।

अभ्यास प्रश्न

  1. भेदविज्ञान किसे कहते है?
  2. संसार भ्रमण की कोई दो भूलें लिखिए।
  3. आत्मा और बंध को जानकर क्या करना चाहिए?

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पाठ-10

पंचकल्याणक

कल्याणक का लक्षण

तीर्थंकरों के निमित्त से देवों के द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव कल्याणक कहलाता है। अथवा देवों और मनुष्यों के द्वारा तीर्थंकर के जीवन की विशेष घटना को उत्सव के रूप में मनाना कल्याणक कहलाता है।

कल्याणक के नाम

गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, तपकल्याणक, ज्ञानकल्याणक, मोक्षकल्याणक। इस प्रकार कल्याणक पाँच होते हैं।

(1) गर्भकल्याणक – सौधर्म इन्द्र अपने दिव्य अवधिज्ञान से भगवान् के गर्भावतरण को निकट जानकर कुबेर को तीर्थंकर की जन्म नगरी में दिन में चार बार रत्नों की वर्षा करने की आज्ञा देता है। इस प्रकार रत्नों की वर्षा गर्भ में आने से 6 माह पूर्व से जन्म होने तक, 15 माह तक, निरन्तर होती रहती है।
छह माह के उपरान्त तीर्थंकर जब माता के गर्भ में आने को होते हैं तब माता रात्रि के अन्तिम प्रहर में अत्यन्त सुहावने, मनभावन, आह्लादकारी सोलह स्वप्नों को देखती है, ये स्वप्न तीर्थंकर के गर्भावतरण के सूचक होते हैं।
उसी समय सौधर्म इन्द्र भगवान् के गर्भावतरण को जानकर श्री आदि देवकुमारियों को जिनमाता के गर्भावतरण करने की आज्ञा प्रदान करता है। तीर्थंकर के गर्भावतरण होते ही समस्त देव उस नगर की परिक्रमा कर माता-पिता को नमस्कार करते हैं। गर्भ स्थित शिशु की स्तुति कर महान् उत्सव मनाते हैं। इसी उत्सव को गर्भकल्याणक कहते हैं।

(2) जन्मकल्याणक – गर्भावाधि पूर्ण होते ही जिन माता, ग्रहों की शुभ बलवान् स्थिति में, तीर्थंकर पुत्र को जन्म देती है। जिस समय तीर्थंकर बालक का जन्म होता है, उस समय तीनों लोकों में आनन्द और सुख का प्रसार होता है। प्रभु बालक के जन्म के माहात्म्य से नारकी जीवों को भी क्षणभर अपूर्वसुख की प्राप्ति होती है।
जन्म के कुछ क्षण बाद ही स्वर्ग में इन्द्र का आसन कम्पायमान हो जाता है, उसी समय समस्त देव जन्म सूचना को अपने अवधिज्ञान से जान लेते हैं और शीघ्र ही सौधर्म इन्द्र अपनी इन्द्राणी के साथ ऐरावत हाथी पर सवार होकर जन्म नगरी को आता है और सर्वप्रथम नगरी की तीन परिक्रमा देता है। तदनन्तर शची (इन्द्राणी) प्रसूती गृह में प्रच्छन्न रूप से पहुँचकर जिन माता को प्रदक्षिणा देकर, जिन माता को मायामयी निद्रा में निद्रित कर, अत्यन्त हर्ष और उल्लास के साथ जिन बालक को छवि को निहारती हुई, तीर्थंकर बालक को लाकर सौधर्म इन्द्र को सौंप देती है। तब इन्द्र बालक का दर्शन पाकर भाव विभोर हो जाता है। तत्पश्चात् ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर सुमेरु पर्वत पर जाकर विधिविधान पर बालक को बिठाकर अन्य इन्द्रों तथा देवों सहित उत्सव-उल्लास के साथ क्षीरसागर के जल से अभिषेक करता है। तदनन्तर इन्द्राणी बालक को वस्त्राभूषणों से सुशोभित करती है। फिर इन्द्र बालक के दाहिने पैर के अँगूठे पर सदृशतम जो चिह्न देखता है उसे चिह्न के रूप में घोषित कर भगवान् का नामकरण करता है। तत्पश्चात् इन्द्र व देव आदि जन्म नगरी आकर तीर्थंकर माता-पिता का विशेष उत्सव कर महान् उत्सव करते हैं। इसी उत्सव को जन्म कल्याणक कहते हैं।

(3) तपकल्याणक – तीर्थंकर के मन में वैराग्य उत्पन्न होते ही लौकान्तिक देव आकर उनके वैराग्य की सराहना करते हुए स्तुति करते हैं। तत्पश्चात् तीर्थंकर पालकी में आरूढ़ होते हैं, जिसे देव, मनुष्य, विद्याधर आदि सात-सात
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कदम अपने कंधे पर रखकर दीक्षावन तक ले जाते हैं। वहाँ चन्दकान्तमणि की शिला पर विराजमान हो, पद्मासन मुद्रा में पूर्वाभिमुख होकर सिद्धपरमेष्ठी को नमस्कार करके पंचमुष्ठी केशलोंचन करते हुए तीर्थंकर जिनमुद्रा को धारण करते हैं। सौधर्म इन्द्र केशों को क्षीरसागर में विसर्जित करता है। इस प्रकार दीक्षोपरान्त तीर्थंकर की पूजामक्ति कर देवगण स्वस्थान लौट जाते हैं। इसी को तपकल्याणक कहा जाता है।

(4) ज्ञानकल्याणक – अपनी कठोर तपस्या के द्वारा घातिआ कर्मों के नष्ट होने से तीर्थंकर को केवलज्ञान प्राप्त होता है। जिसके प्रभाव से सब कुछ निष्प्रयास दर्शनानुभव ज्ञान में झलकने लगता है। इसी बीच सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर समवशरण की अद्भुत रचना करता है। जिसमें विराजमान तीर्थंकर की समस्त देव भक्तिभाव पूर्वक अर्चना कर केवलज्ञान महोत्सव मनाते हैं। इसी को ज्ञानकल्याणक कहते हैं।

(5) मोक्षकल्याणक – सम्पूर्ण कर्मों के नष्ट होने के बाद तीर्थंकर को निर्वाण पद की प्राप्ति होती है। तब देवगण मोक्षलक्ष्मी पर आकर अति सत्कार करते हैं। तदनन्तर उस स्थल को मस्तक पर लगाकर उन जैसा बनने की भावना भाते हैं। फिर समस्त इन्द्र मिलकर आनन्द नाटक करते हैं। इस प्रकार सभी देव विधिपूर्वक निर्वाण की पूजा कर अपने-अपने स्थान लौट जाते हैं। इसी को मोक्षकल्याणक कहते हैं।

अभ्यास प्रश्न

  1. कल्याणक किसे कहते हैं?
  2. कल्याणक कितने प्रकार के होते हैं?
  3. तपकल्याणक-जन्मकल्याणक से आप क्या समझते हैं?
  4. सौधर्म इन्द्र रत्नों का वर्षा कब और कितनी बार करता है?
  5. तीर्थंकर का अभिषेक किस पर्वत पर किससे होता है?
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पाठ-11

समवशरण

तीर्थंकर भगवान् की उपदेश सभा को समवशरण कहते हैं। इसमें प्रत्येक प्राणी को समानतातपूर्वक शरण मिलती है इसलिए समवशरण यह इसकी सार्थक संज्ञा है। जहाँ बैठ कर तिर्यंच, मनुष्य और देव भगवान् की अमृत वाणी से कर्ण तृप्त करते हैं। उक्त सभा को समवशरण कहते हैं।

समवशरण की संरचना

तीर्थंकर के केवलज्ञान होने के तुरन्त बाद, सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर समवशरण की रचना करते हैं। यह पृथ्वी से पाँच हजार धनुष की ऊँचाई पर वृत्ताकार रूप में होता है। इसकी चारों दिशाओं में 20-20 हजार सीढ़ियाँ होती हैं। प्रत्येक दिशा में सीढ़ियों से लगी एक-एक पीठ/सड़क बनी होती है, जो समवशरण के केन्द्र में स्थित गन्धकुटी में प्रवेशादि तक जाती है।
समवशरण में अत्यन्त आकर्षक और अनुपम शोभा सहित चैत्याप्रासाद भूमि, जलखालिका भूमि, लतावनभूमि, उपवनभूमि, ध्वजभूमि, कल्पवृक्षभूमि, भवनभूमि, श्रीभूमि, प्रेक्षाभूमि, दिव्यपीठ, तृतीयपीठ भूमि इस प्रकार कुल ग्यारह भूमियाँ होती हैं।

द्वादशसभा

श्री मण्डप भूमि में स्फटिक मणिमय दीवारों से विभाजित बारह कोठे होते हैं। जिनमें 12 सभाएँ होती हैं। पूर्व दिशा को आदि करके बारह सभाओं में क्रमशः गणधरमुनि, कल्पवासिनी देवी, आर्यिका और श्राविका, ज्योतिषी देवी, व्यन्तरदेवी, भवनवासिनी देवी, भवनवासी देव, व्यन्तर देव, ज्योतिष देव, कल्पवासी देव, सकलती आदि मनुष्य तथा सिंह आदि तिर्यंच प्राणी अपने जन्मजात बैर आदि को छोड़कर उपदेश भाव से बैठकर भगवान् के उपदेशामृत का लाभ लेते हैं।

मानस्तम्भ

समवशरण की आठवीं भूमि के प्रवेश द्वार पर चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तम्भ होता है, जिसके देखने मात्र से मानयुक्त मिथ्यादृष्टि जीव का अभिमान गलित हो जाता है। अत्यन्त भावुक और श्रद्धालु व्यक्ति ही अष्ट भूमि में प्रवेश कर साक्षात् भगवान् के दर्शनों से उन सबकी अमृतवाणी से नेत्र, कर्ण व जीवन सफल करते हैं।

दिव्यध्वनि

समवशरण में भगवान् की दिव्यध्वनि चौबीस घंटे में चार बार, छह-छह घड़ी सुबह, दोपहर, शाम तथा अर्द्धरात्रि में खिलती है। किसी शिष्योपलब्धमा जीव के भाग्य से अमृतमयी भी खिलती है।
समवशरण का माहात्म्य – समवशरण में जिनेन्द्र देव के माहात्म्य से आतप, रोग, प्यास, उत्पत्ति, बैर, काम, बाधा एवं क्षुधा-तृषा आदि की पीड़ाएँ कदापि नहीं होती। साथ ही श्रीमान्देव भूमि में सोहई हुई क्षेत्र में असंख्यात जीव एक दूसरे से अस्पृश्य हुए सुखपूर्वक विराजते हैं। योजनाएँ विस्तार वाले इस समवशरण में प्रवेश और निकलने में बाल-वृद्ध सभी को अन्तर्मुहूर्त से अधिक समय नहीं लगता है।

अभ्यास प्रश्न

  1. समवशरण किसे कहते हैं?
  2. समवशरण की रचना किस प्रकार से होती है?
  3. समवशरण में कितनी भूमियाँ होती हैं?
  4. समवशरण की बारह सभाओं में कौन कहाँ बैठता है?
  5. मानस्तम्भ की अपनी क्या विशेषता होती है?
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पाठ-12

जैन महापुरुष

महापुरुष :- जो पुरुष वासनाओं, विकारों, कषायों आदि के दास न बनकर आत्मवलंबी हो अपने रत्नत्रय धर्म को उज्जवल बनाते हुए, आत्मविकास के क्षेत्र में वर्धमान होते हैं, उन मनस्वी व्यक्तियों को महापुरुष कहते हैं।

नाम :- 24 कुलकर, 24 तीर्थंकर, 24-24 तीर्थंकर के माता-पिता, 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9 वासुदेव (नारायण), 9 प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण), 9 नारद, 11 रुद्र और 24 कामदेव। ये सब मिलाकर 169 महापुरुष होते हैं।

इनमें से तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव (नारायण) तथा प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) मिलकर 63 शलाका पुरुष कहलाते हैं।

1. कुलकर :- ये कुशल मनीषी, जो कर्मभूमि के प्रारम्भ में होते हैं, मानव समूह को कुल के आधार पर व्यवस्थित कर मानव सभ्यता के सूत्रधार बनते हैं, वे कुलकर कहलाते हैं। ये मानव समाज को जीने की कला सिखाते हैं, विवेक-विचार की शिक्षा देते हैं। जैन परम्परा में कुलकरों का सही सम्मान है, जो वैदिक परम्परा में मनुओं का है।

2. तीर्थंकर :- जो धर्म परम्परा में आयी मलिनता और विकृतियों का नाश कर धर्म के मूल स्वरूप को पुनः स्थापित करते हैं, ऐसे ही जगत उद्धारक तीर्थंकर कहलाते हैं।

ये समस्त विकारों पर विजय पाकर केवलज्ञान को प्राप्त कर निर्वाण के अधिकारी बनते हैं और मानव जाति को दिव्यध्वनि के द्वारा मोक्ष का मार्ग बतलाकर उस पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

3. चक्रवर्ती :- जो छह खण्ड के अधिपति होते हैं, जिनका समस्त भूमंडल पर एक छत्र राज्य होता है, पृथ्वी तल के समस्त मनुष्यों में श्रेष्ठ वैभव और भोग के स्वामी होने के कारण इन्हें नरेन्द्र भी कहते हैं।

चक्रवर्ती के पास वैभव अतुलनीय होता है। यह चौदह रत्नों के, 9 निधियों के, 7 प्रकार की सेना के, पृथक तिथिया के तथा 32000 हजार मुकुटबद्ध राजाओं के स्वामी होते हैं। इनकी पदरानी सहित 96000 रानियाँ होती हैं और 3 करोड़ 50 हजार परिवारजन होते हैं।

4. बलदेव :- ये नारायण के भ्राता होते हैं और उनसे प्राग स्नेह रखते हैं, ये अतुल पराक्रम के धनी, अतिशय रूपवान और यशस्वी होते हैं। इनकी 8 हजार रानियाँ होती हैं तथा ये पाँच रत्नों के स्वामी होते हैं।

5-6. वासुदेव (नारायण) - प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) :- ये दोनों समकालीन होते हैं। पूर्वभव में निदान सहित तपश्चरण कर स्वर्ग में देव होते हैं और वहाँ से च्युत होकर वासुदेव-प्रतिवासुदेव बनते हैं। दोनों अर्धचक्रवर्ती होते हैं। इनकी सोलह-सोलह हजार रानियाँ होती हैं। प्रतिनारायण (प्रतिवासुदेव) प्रायः विद्याधर होते हैं और नारायण (वासुदेव) भूमिगोचरी। इनका आपस में जन्मजात बैर होता है। इनमें किसी निमित्त से युद्ध होता है, जिसमें नारायण के द्वारा प्रतिनारायण मारा जाता है। ये दोनों निकट भव्य होते हैं, परन्तु अनुबद्ध बैर के कारण नरक में जाते हैं।

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7. नारद :- ये नारायण-प्रतिनारायण के काल में होते हैं, ये अत्यन्त कोध्रणी और कलहप्रिया होते हैं। नारायण और प्रतिनारायण को आपस में लड़ाने में इनकी प्रमुख भूमिका रहती है। ये ब्रह्मचारी होते हैं और इन्हें राजर्षि का सम्मान प्राप्त होता है। ये सारे राजभवन में बेरोक-टोक आते जाते रहते हैं, ये निकट भव्य होते हैं परन्तु कलहप्रियता के कारण नरक में जाते हैं।

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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