श्रमण संस्कृति सिद्धान्त प्रवेशिका भाग - तृतीय
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प्रार्थना
हे ! शान्त सन्त अनन्त अनन्त दाता, हे ! शुद्ध बुद्ध चिन सिद्ध अब्द धाता।
आचार्यवर्य उवझाय सुसाधु सिन्धु, मैं बार-बार तुम पाद-पयोज वन्दूँ ॥
हे मूलमंत्र नवकार सुखी बनाता, जो भी पढ़े विनस दे अघ को मिटाता।
हे आद्य मंगल यही सब मंगलों में, ब्याओ इसे न भटकौ जग जंगलों में ॥
सर्वज्ञ देव अरहन्त परोपकारी, श्री सिद्ध वंद्य परमातम निर्विकारी।
श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार मंगल, अमंगल को निवारे ॥
श्री वीतराग अरहन्त कुकर्मनाशी, श्री सिद्ध शाश्वत सुखी शिवधाम वासी।
श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार उत्तम, अनुत्तम श्रेष्ठ सारे
जो श्रेष्ठ है शरण, मंगल कर्मजीता, आराध्य है परम है शिवपंथ नेता।
है वंद्य खचर नरों असुरों सुरों के, वे ध्येय पंचगुरु हों, हम बालकों के ॥
1
पाठ-2
पंचपरमेष्ठी के मूलगुण
जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते हैं, राजा महाराजा व इन्द्र जिन्हें सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं अथवा जो परमपद में स्थित हों, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं। परमेष्ठी पाँच होते हैं - 1. अरिहंत, 2. सिद्ध, 3. आचार्य, 4. उपाध्याय और 5. साधु।
1. अरिहंत परमेष्ठी
जिनके ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिया कर्म नष्ट हो गये हैं। जिनके 46 मूलगुण होते हैं और जो 18 दोषों से रहित होते हैं, उन्हें अरिहंत परमेष्ठी कहते हैं।
अरिहंत परमेष्ठी के मूलगुण -
चौंतीसों अतिशय सहित, प्रतिहार्य युनि आठ।
अनंत चतुष्टय गुण सहित ये छियालीस ठाठ ॥
दश अतिशय हैं जन्म के, दश ही केवलज्ञान।
चौदह होते देवकृत, अतिशय चौंतीस जान ॥
अर्थात् 34 अतिशय, 8 प्रातिहार्य और 4 अनन्तचतुष्टय ये 46 मूलगुण हैं। 34 अतिशयों में से 10 अतिशय जन्म के होते हैं, 10 केवलज्ञान के होते हैं और 14 देवकृत होते हैं।
जन्म के दश अतिशय -
अतिशय रूप सुगन्ध तन, नाहिं पसेव निहार।
प्रियहितवचन अतुल्यबल, रुधिर श्वेत आकार ॥
लक्षण सहस्र 8 आठ तन, समचतुष्क संस्थान।
वज्रवृषभनाराचदू, ये जमत दश जान ॥
भावार्थ-1. अरिहंत भगवान् का शरीर जन्म से ही बड़ा सुन्दर सुडौल होता है। 2. उनके शरीर से बड़ी अच्छी सुगन्ध आती है। 3. उनके शरीर में पसीना नहीं आता है। 4. मल-मूत्र नहीं होता है। 5. वे सबसे मीठे वचन बोलते हैं। 6. उनके शरीर में अतुल्य बल होता है। 7. उनका रक्त दूध के समान सफेद होता है। 8. उनके शरीर में 1008 शुभ लक्षण होते हैं। 9. उनका समचतुष्क संस्थान होता है। 10. उनके शरीर के हाड़ वगैरह वज्र के होते हैं।
केवलज्ञान के दश अतिशय-
योजन शत इक में सुभिख, गगन गमन सुख चार।
नहिं अदया उपसर्ग नहिं, नाहिं कबलाहार ॥
सब विद्या-ईश्वरपनों, नाहिं बड़े नख केश।
अनिमिष दृग छाया रहित, दश केवल के वेश ॥
भावार्थ-1. अरिहंत भगवान् के केवलज्ञान होता है तो उस समय नहीं भगवान् होते हैं, उस स्थान पर चारों तरफ सौ-सौ योजन तक सुकाल रहता है। 2. आकाश में गमन होता है। 3. देखने वालों को चारों तरफ उनका मुख दिखलाई देता है। 4. उनके शरीर से किसी भी जीव को हिंसा नहीं होती। 5. उन पर कोई उपसर्ग नहीं कर सकता। 6. कबलाहार नहीं लेते हैं, 7. वे समस्त विद्या और शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं। 8. उनके बाल और नाखून नहीं बढ़ते हैं। 9. उनकी पलकें नहीं झपकती हैं, 10. शरीर की परछाई नहीं पड़ती है। ये दश अतिशय केवलज्ञान होने के समय प्रकट होते हैं।
देवकृत चौदह अतिशय -
देवकृत हैं चारदश, अद्धनागधी भाष।
आपस माहीं मित्रता, निर्मल दिश आकाश ॥
होत फूल फल ऋतु सबै, पृथ्वी काँप समान।
चरण कमल तल कमल हैं, नभ तैं जय जय बान ॥
मन्द सुगन्ध बयारि पुनि, गन्धोदक की वृष्टि।
भूमि विधि कण्टक नहीं, हर्षमयी सब सृष्टि ॥
धर्मचक्र आगे रहे, पुनि बज्र मंगल सार।
अतिशय श्री अरिहंत के, ये चौंतीस प्रकार ॥
भावार्थ-1. भगवान् की दिव्यध्वनि अर्द्धमागधी भाषा में होना। 2. समस्त जीवों में परस्पर मित्रता का होना। 3. दिशाओं का निर्मल होना। 4. आकाश का निर्मल होना। 5. सब ऋतुओं के फल-फूल भाष्यादि का एक ही समय फलना फूलना। 6. एक योजन तक की पृथ्वी का दर्पण की तरह निर्मल होना। 7. चलते समय भगवान् के चरण कमलों के नीचे स्वर्ण कमलों का होना। 8. आकाश में जय-जय ध्वनि का होना। 9. मन्द सुगन्धित पवन का चलना। 10. सुगन्धमय जल की वृष्टि होना। 11. पवनकुमार देवों के द्वारा भूमि का कण्टक रहित होना। 12. समस्त जीवों का आनन्दमय होना। 13. भगवान् के आगे धर्मचक्र का चलना। 14. छत्र, चमर, ध्वजा, घंटा आदि अष्ट मंगल द्रव्यों का साथ रहना। इस प्रकार सब मिलाकर 34 अतिशय अरिहंत भगवान् के होते हैं।
अष्ट प्रातिहार्य-
तरु अशोक के निकट में, सिंहासन छबिदार।
तीन छत्र सिर पर लखें, भामण्डल पिछवार ॥
दिव्यध्वनि मुखतें खिरै, पुष्पवृष्टि सुर होय।
ढोरै चौंसठ चमर जब, बाजै दुन्दुभि जोय ॥
भावार्थ-1. भगवान् के समीप अशोक वृक्ष का होना। 2. रत्नमय सिंहासन होना। 3. भगवान् के सिर पर तीन छत्र का होना। 4. भगवान् की पीठ के पीछे भामण्डल का होना। 5. भगवान् के मुख से दिव्यध्वनि का खिरना। 6. देवों के द्वारा फूलों की वर्षा होना। 7. यक्ष जाति के देवों द्वारा चौंसठ चमर्रों का ढुरना। 8. दुंदुभि बाजों का बजना, ये आठ प्रातिहार्य हैं।
अनन्त चतुष्टय -
ज्ञान अनन्त, अनन्त सुख, दश अनन्त प्रधान।
बल अनन्त अरिहंत सो, इष्टदेव पहिचान ॥
भावार्थ-1. अनन्त दर्शन, 2. अनन्त ज्ञान, 3. अनन्त सुख, 4. अनन्त वीर्य ये चार अनन्त चतुष्टय कहे जाते हैं। इस प्रकार 34 अतिशय, 8 प्रातिहार्य, 4 अनन्त चतुष्टय। सब मिलाकर 46 मूलगुण अरिहंत भगवान् के होते हैं।
2. सिद्ध परमेष्ठी
जो आठों कर्मों का नाश करके संसार के बन्धन से सदैव के लिए मुक्त हो गए हैं, अर्थात् जो फिर कभी संसार में लौटकर नहीं आयेंगे, उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं। इनके 8 मूलगुण होते हैं-
सिद्ध परमेष्ठी के मूलगुण -
समकित दर्शन ज्ञान, अरुगुलघु अवगाहना।
सूक्ष्म बीरजान, निबाध गुण सिद्ध के ॥
- अनन्त सम्यक्त्व, 2. अनन्त दर्शन, 3. अनन्त ज्ञान, 4. अगुरुलघु, 5. अवगाहत्व, 6. सूक्ष्मत्व, 7. अनन्तवीर्य, 8. अव्याबाधत्व।
3. आचार्य परमेष्ठी
जो मुनि संघ के अधिपति होते हैं, उनको दीक्षा तथा प्रायश्चित्त आदि देते हैं। जिनके 36 मूलगुण होते हैं तथा जो पञ्चाचार का पालन स्वयं करते हैं एवं दूसरे मुनियों से कराते हैं, उन्हें आचार्य परमेष्ठी कहते हैं।
आचार्य परमेष्ठी के मूलगुण -
द्वादश तप, दश धर्मजुत, पालें पंचाचार।
षट आवश्यक, गुप्ति त्रय, आचार गुण सार ॥
बारह तप -
अनशन ऊनोदर करे, व्रतसंख्या रस छोर।
विविक्त शय्यासन धरै, कायक्लेश सुठोर ॥
प्रायश्चित्त धर विनयजुत, वैयावृत स्वाध्याय।
पुनि उत्सर्ग विसर्गारै, धरे ध्यान मन लाय ॥
इच्छाओं का जीतना तप है। 1. अनशन तप- चार प्रकार के आहार का त्याग करना। 2. ऊनोदर तप- भूख से कम भोजन करना। 3. वृत्तिपरिसंख्यान तप- भोजन को जाते समय अटपटी प्रतिज्ञा लेना। 4. रसपरित्याग तप- छहों रसों या एक दो आदि रसों का त्याग करना। 5. विविक्तशय्यासन तप- स्वाध्याय ध्यान आदि की सिद्धि के लिये एकान्त तथा पवित्र स्थान में सोना बैठना। 6. कायक्लेश तप- शरीर को वश करने के लिये उसे सर्दी, गर्मी आदि का कष्ट देना। 7. प्रायश्चित्त तप- दोषों की शुद्धि के लिये दंड ग्रहण करना। 8. विनय तप- रत्नत्रय व उसके धारकों की विनय करना। 9. वैयावृत्त्य तप- रोगी या वृद्ध मुनि की सेवा करना।
दश धर्म-
क्षमा मार्दव आरजव, सत्यवचन, चित्तयाग।
संयम तप त्यागी सत्व, आकिंचन नित्याग।।
- उत्तम क्षमा-क्रोध के कारण उपस्थित रहते हुए भी क्रोध नहीं करना। 2. उत्तम मार्दव-उत्तम कुल, विद्या, बल आदि का घमंड नहीं करना। 3. उत्तम आर्जव-मायाचार का त्याग करना। 4. उत्तम शौच-लोभ का त्याग करना आत्मा को पवित्र बनाना। 5. उत्तम सत्य-(गद्येव पूर्वक असत्य वचनों को छोड़कर हित प्रिय वचन बोलना)। 6. उत्तम संयम-5 इन्द्रिय और मन को वश में करना तथा छह काय के जीवों की रक्षा करना। 7. उत्तम तप-बाह्य-आन्तर 12 प्रकार के तपों का करना। 8. उत्तम त्याग-कीर्ति तथा प्रत्युपकार की आशा से रहित होकर चार प्रकार का दान देना। 9. उत्तम आकिंचन-पर पदार्थों में ममत्वपन परिणामों का त्याग करना। और 10. उत्तम ब्रह्मचर्य-स्त्री मात्र का त्यागकर एवं आत्मा के शुद्ध स्वरूप में लीन रहना) जो प्राणियों को संसार से छुड़ाकर उत्तम सुख प्राप्त कराता है, वह धर्म कहलाता है।
पञ्चाचार और तीन गुप्ति-
दर्शन ज्ञान चरित्र तप, वीर्य पंचाचार।
गोपे मन वच काय को, तीन गुप्तीस गुण सार।।
दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार ये पाँच आचार हैं। 11. सम्यग्दर्शन के दोष हटाना दर्शनाचार कहलाता है। 12. सम्यग्ज्ञान को बढ़ाना और उसके दोष हटाना ज्ञानाचार कहलाता है। 13. सम्यक्चारित्र को विशुद्ध करना चारित्राचार है। 14. तप की वृद्धि करना तपाचार कहलाता है। 15. आत्मबल को प्रकट करना वीर्याचार कहलाता है। ज्ञान आदि के दोष हटाना और उन्हें बढ़ाना आचार है।
छह आवश्यक-
समता धर वंदन करे, नाना वृत्ति बनाय।
प्रत्याख्यान प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग लगाय।।
आवश्यक-प्रतिदिन करने योग्य जरूरी कार्यों को आवश्यक कहते हैं। समता, वन्दना, स्तुति, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग ये 6 आवश्यक हैं। 1। समस्त जीवों से समताभाव समता कहलाती है। 2। किसी एक तीर्थंकर या सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा साधु परमेष्ठी को गुणगान करना वन्दना कहलाती है। 3। चौबीस तीर्थंकरों का स्तवन स्तुति कहलाती है। 4। लगे हुये दोषों पर पश्चाताप प्रतिक्रमण कहलाता है। 5। भविष्यत् काल में दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान कहलाता है। 6. खड़े होकर ध्यान लगाना तथा शरीर से ममत्व छोड़ना कायोत्सर्ग कहलाता है।
4. उपाध्याय परमेष्ठी
जो 11 अंग और 14 पूर्व के पाठी होते हैं, जो स्वयं पढ़ते हैं और अन्य पास में रहने वाले भव्य-जीवों को पढ़ाते हैं, जिनके 25 मूलगुण होते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।
उपाध्याय परमेष्ठी के 25 मूलगुण-
ग्यारह अंग
प्रथमाहि आचारांग गनि, दूजो सुकृतंग।
ठाणांगम तीजो सुभग, चौथो समवायांग।।
व्याख्याप्रणाति पाँचवाँ, जतुक्था षट जान।
पुनि उपासकाध्ययन है, अंतः कृत दश ठान।।
अनुत्तरोव उत्पाद दश, सूत्रविपाक विधान।
बहुरि प्रश्नव्याकरण नुत, ग्यारह अंग प्रमान।।
1-आचारांग, 2-सूत्रकृतांग, 3-स्थानांग, 4-समवायांग, 5-व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग, 6-ज्ञातृधर्मकथांग, 7-उपासकाध्ययनांग, 8-अंतकृद्दशांग, 9-अनुत्तरोपपादिकादशांग, 10-प्रश्नव्याकरणांग, 11-विपाकसूत्रांग ये 11 अंग हैं।
चौदह पूर्व
उत्पादपूर्व अग्रायणी, तीजो वीरजवाद।
अस्तिनास्तिप्रवाद पुनि, पंचम ज्ञानप्रवाद।।
छठ्ठो कर्मप्रवाद है, सत्यप्रवाद पहिचान।
अष्टम आत्मप्रवाद पुनि, नवमो प्रत्याख्यान।।
विद्यानुवाद पूरब दशम, पूर्वकल्याण महन्त।
प्राणवाद क्रिया बहुल, लोकबिन्दु है अन्त।।
उत्पादपूर्व, अग्रायणीपूर्व, वीर्यानुवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, कर्मप्रवाद पूर्व, सत्यप्रवादपूर्व, आत्मप्रवादपूर्व, प्रत्याख्यानप्रवाद पूर्व, विद्यानुवाद पूर्व, कल्याणानुवादपूर्व, प्राणप्रवादपूर्व, क्रियाविशाल तथा लोकबिंदुसार ये 14 पूर्व हैं।
5. साधु परमेष्ठी
जिनके 28 मूलगुण होते हैं, जो ज्ञान, ध्यान और तप में लीन रहते हैं, जो आरम्भ, परिग्रह नहीं रखते हैं, जो हमेशा आत्मा साधना स्वरूप मोक्षमार्ग में लगे रहते हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं।
साधु परमेष्ठी के 28 मूलगुण-
षट् महाव्रत समिति औ, षट्इन्द्रिय का रोध।
षट् आवश्यक साधुगण, सात शेष अवबोध।।
5 महाव्रत, 5 समिति, 5 इन्द्रियनिग्रह 6 आवश्यक और शेष ये 28 साधु परमेष्ठी के मूलगुण हैं।
5 महाव्रत-
हिंसा अनृत तस्करी, अब्रह्म परिग्रह पाप।
मन वच तन नै त्यागवो, पंच महाव्रत थाप।।
मन, वचन, काय से पाँचों पापों का पूर्णत्याग होना, महाव्रत कहलाता है। अहिंसादि पाँच महाव्रत हैं।
मन, वचन, काय से सर्वथा हिंसा का त्याग होना अहिंसा महाव्रत कहलाता है। मन, वचन, काय से सर्वथा असत्य का त्याग होना सत्य महाव्रत कहलाता है। मन, वचन, काय से चोरी का सर्वथा त्याग होना अचौर्य महाव्रत कहलाता है। मन, वचन, काय से मैथुन का सर्वथा त्याग होना ब्रह्मचर्य महाव्रत कहलाता है। मन, वचन, काय से परिग्रह का सर्वथा त्याग होना अपरिग्रह महाव्रत कहलाता है।
पञ्च समिति-
ईर्या भाषा एषणा, पुनि क्षेपण आदान।
प्रतिष्ठापनानुव्रत क्रिया, पाँचों समिति विधान।।
गमनादि में जीवघात से बचने के लिए यत्नाचार रखना समिति कहलाती है। ईर्यादि पाँच समितियाँ होती हैं।
ईर्यासमिति-चार हाथ आगे जमीन देखकर चलना। भाषा समिति-हित मित प्रिय वचन बोलना। एषणा समिति-दिन में एकबार शुद्ध निर्दोष आहार लेना। आदान निक्षेपण समिति-देखभालकर किसी वस्तु को उठाना रखना। और प्रतिष्ठापनासमिति-जीव रहित स्थान में मलमूत्र क्षेपण करना।
शेष गुण-
सपरस रसना नासिका, नयन श्रोत्र का रोध।
शेष सात मंजन शयन, शयन भूमिका शोध।।
वस्त्रत्याग कचलुंच अरु, लघु भोजन इकबार।
दातुन मुख में ना करे, ठाड़े लेहि आहार।।
- स्पर्शन, 2. रसना, 3. घ्राण, 4. चक्षु, 5. श्रोत्र, इन पाँच इन्द्रियों को वश में करना, 6. मनगुप्ति, 7. वचनगुप्ति, 8. कायगुप्ति, 9. प्रतिक्रमण, 10. प्रत्याख्यान, 11. कायोत्सर्ग, 12. वन्दन का त्याग करना, 13. निर्जन्तु भूमि पर सोना, 14. वस्त्रत्याग करना, 15. बालों का उखाड़ना, 16. एक बार थोड़ा भोजन करना, 17. दन्तधावन अर्थात् दातुन न करना, 18. खड़े होकर आहार लेना और 5 महाव्रत, 5 समिति इस प्रकार से सब मिलाकर 28 मूलगुण सर्व सामान्य मुनियों के होते हैं। मुनिजन इनका पालन करते हैं। यदि एक भी मूलगुण इनमें से रह जाये तो मुनिपना नहीं रहता।
तीर्थंकर पार्श्वनाथ
पोदनपुर के राजा अरविन्द के कमठ और मरुभूति नामक दो मंत्री थे। ये दोनों सगे भाई होकर भी विष और अमृत के समान विसदृश स्वभाव से भिन्न थे। एक समय राजकार्य से मरुभूति बाहर गया था, उस समय कमठ ने मरुभूति की स्त्री के साथ व्यभिचार का प्रयास किया। परिणामस्वरूप राजा अरविन्द ने उसे दण्डित कर देश से निकाल दिया। तब कमठ अपमान से दुःखी होकर किसी तापस आश्रम में जाकर हाथ में पत्थर की शिला उठाकर कुतप करने लगा।
मरुभूति को पता चलते ही भ्रातृ स्नेह के कारण उसे वापस लेने को पहुँचा, परन्तु मरुभूति को देखते ही कमठ ने क्रोध से उसके सिर पर शिला पटक दी। मरुभूति मरकर हाथी हुआ। एक दिन राजा अरविन्द मुनि होकर संघ सहित यात्रा पर जा रहे थे, तो मार्ग में उपद्रव करता हुआ हाथी वहाँ आया और उसे मुनिराज को देखते ही जातिस्मरण हो गया। इसके कारण वह शांत हो गया। मुनिराज के उपदेश से उसने सम्यक्त्व और पंचाणुव्रत ग्रहण कर लिए। एक दिन वह सूखे पत्ते खाकर नदी में पानी पीने गया और वहाँ कीचड़ में फँस गया। तब पूर्वजन्म से कमठ का जीव जो सर्प बना था उसने उसे काट लिया, तब हाथी णमोकार मंत्र का स्मरण करते हुए मरकर देव बना और सर्प मरकर नरक गया।
हाथी का जीव देवपर्याय से चय कर रश्मिलेग राजा हुआ, पुनः मुनि होकर स्वर्ग को प्राप्त हुआ, पुनः वहाँ से आकर वज्रनाभि चक्रवर्ती हुआ, पुनः दीक्षा ली तब मोक्ष (कमठ के जीव) ने उन पर उपसर्ग किया। वज्रनाभि चक्रवर्ती का जीव वैदेयक में अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुआ और वहीं से आकर आनन्द नामक मंडलेश्वर राजा हुआ, पुनः जिनदीक्षा लेकर सोलहकारण भावनाओं के भाने से तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया और समाधिपूर्वक मरण करके सोलहवें स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त किया।
काशी देश की बनारस नगरी में आज से करीब तीन हजार वर्ष पहले इक्ष्वाकुवंश के करपय गोत्रीय राजा अश्वसेन एवं उनकी विदुषी रानी वामादेवी के गर्भ से पौष कृष्णा एकादशी के दिन बालक का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरुपर्वत पर जन्माभिषेक के बाद तीर्थंकर बालक का नाम पार्श्वकुमार रखा। इनकी आयु 100 वर्ष की थी। शरीर का वर्ण मरकत मणि के समान हरा था। शरीर की ऊँचाई 9 हाथ प्रमाण थी। पार्श्वकुमार जन्म से ही प्रतिभाशाली और शांति-सूत एवं अवधान के धारक थे। वे अनेक शुभलक्षणों के धनी, अतुल्य बल से युक्त, आकर्षक व्यक्तित्व वाले बालक थे।
एक दिन प्रातःकाल वे अपने साथियों के साथ घूमने जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि उनके नाना साधुवेश में पंचाग्नि तप कर रहे थे। पार्श्वकुमार ने कहा कि इसमें नागयुगल जल रहे हैं तो उन्होंने क्रोध के आवेश में लकड़ी चीर डाली। इसमें से एक सर्प युगल निकला, जो अधजला तड़फ रहा था। पार्श्वकुमार के उपदेश के प्रभाव से वह सर्प युगल प्रसन्न और पद्मावती हुआ। यह ताप्सी मरकर संवर नामक ज्योतिषी देव हुआ।
युवा होने पर माता-पिता के बहुत प्रयत्न करने पर भी पार्श्वकुमार ने विवाह नहीं किया, वे बाल ब्रह्मचारी ही रहे। एक दिन राजा अश्वसेन के पास अयोध्या का एक दूत आया। पार्श्वकुमार ने अयोध्या का हाल पूछा तो उसने ऋषभ आदि तीर्थंकरों का चरित्र सुनाया। पार्श्वकुमार को ऋषभ आदि का चरित्र सुनने से वैराग्य हो गया और उन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में ही पौषकृष्णा एकादशी के दिन दिगम्बर जिनदीक्षा धारण कर ली।
वे अखण्ड मौन व्रत धारणकर आत्मसाधना में लीन हो गये। एक बार वे अहिक्षेत्र वन में ध्यानस्थ थे। ऊपर आकाश मार्ग से संवर ज्योतिषी देव निकला, अचानक विमान रुक जाने से जब उसने मुनि को देखा तो उसने क्रोध में आकर महान् उपसर्ग किया परन्तु पार्श्वनाथ आत्म साधना से नहीं डिगे और उन्हें चैत्र कृष्णा एकादशी के दिन केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और तत्काल वहाँ समवसरण निर्मित हो गया। तब कमठ ने भी अपने कुकर्मों का पश्चात्ताप करते हुये धर्मलाभ को लिया। चौबीस संवर वर्ष तक सारे आर्यखण्ड में समवसरण सहित विहार करते हुये भगवान् पार्श्वनाथ ने भव्य-जीवों को धर्मों का उपदेश दिया। श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने सम्मेदशिखरजी से मोक्ष प्राप्त किया। इसी कारण इस पर्वत को आज भी पार्श्वनाथ हिल कहा जाता है।
अभ्यास प्रश्न
- तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जीवन चरित्र संक्षेप में लिखिए।
- किस भव में पार्श्वनाथ के जीव ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था?
- इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- तीर्थंकर मुनि पार्श्वनाथ पर किसने और क्यों उपसर्ग किया था?
स्तुति
सकल ज्ञेय ज्ञायक नदपि, निजानन्द-रस-लीन।
सो जिनेंद्र जयवंत हो, अरि-रज-रहित वीन।।
अर्थ-जो सब ज्ञेयों को जानने वाले हैं, फिर भी अपने ही आनन्द-रस में निमग्न हैं, लीन हैं, ऐसे जिनदेवेन्द्र आपकी जय हो। आप मोहनीय (अरि), ज्ञानावरण-दर्शनावरण (रज) व अंतराय कर्म (रक्स) से रहित हैं अर्थात् आपके घातिचतुष्क का क्षय हो चुके हैं।
जय वीतराग विज्ञान पुर, जय मोह - तिमिर को हरन सूर।
जय ज्ञान अनंतवंत धार, दुख-सुख-वीरज मंडित अपार ।।1।।
अर्थ-आप वीतराग विज्ञान से पूरे-पूरे हैं, आपकी जय हो। आप मोहस्पी अंधकार को नष्ट करने वाले सूर्य हैं, आपकी जय हो। आप अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख व अनंतबल के धारी हो।
जय परम शांति मुद्रा सहित, भवि-जन को निज अनुभूति हेत।
भविक-भागन वश जोग्य वशाय, तुम धुन है सुनि विषम नशाय ।।2।।
अर्थ-परमशांति की धारक आपकी छवि, भव्य प्राणियों को निज की अनुभूति कराने के लिए हेतु है, साधन है। भव्यजनों के सौभाग्य तथा मन-वचन-काय के योग से आपकी दिव्यध्वनि प्राप्त होती है, जिसे सुनकर जीवों का मिथ्यात्व दूर हो जाता है।
तुम गुण भूषण-त्रिभुवन-विभुक्त, प्रगट विरदें धारें आप अनेक।
तुम जग-भूषण-त्रिभुवन-विभुक्त, सब महिमायुक्त विकल-मुक्त ।।3।।
अर्थ-आपके गुणों का चिंतन करने से निज व पर का भेदज्ञान प्रकट होता है और उदय में आयी विपदाएँ भी नष्ट हो जाती हैं, छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती हैं। आप जगत के भूषण हैं, सब दोषों से रहित हैं, सब महिमा के धारक हैं, सब विकल्पजाल (चिंताओं) से मुक्त हैं।
अविच्छिन्न शुद्ध चेतनस्वरूप, परमात्म मम पावन अनूप।
शुभ-अशुभ विभाव-अभाव कोप, स्वाभाविक परिणतिरूप अखोप ।।4।।
अर्थ-आप शुद्ध चेतन-स्वरूप हैं, अबाधित हैं। अद्भुत, परमात्मन, परम आत्म स्वरूप हैं। शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के विभावों का आपने अभाव कर दिया है और सदैव स्वाभाविक परिणति से युक्त हैं।
अष्टादश दोष विमुक्त धीर, खरदूषणमथ्यत राजत गंभीर।
मुनि गणधरादि सेवत महंत, सब केवल-लब्धि-रमा धरंत ।।5।।
अर्थ-आप धीर हैं, अठारह दोषों से रहित हैं, अरिहंत अवस्था में अनंत चतुष्टय (अनंत दर्शन-ज्ञान-सुख व वीर्य) सहित, गंभीर मुद्रा में सुशोभित हैं। मुनि-गणधर आदि महानुभाव आपकी स्तुति करते हैं, भक्ति करते हैं, आप नौ शारीरिक लक्ष्मियों रूपी लक्ष्मी के धारक हैं।
काव्य
तुम शासन सेय अजेय जीव, शिव गयै जाहूँ जे हैं सदीव।
भव-सागर में दुःख क्षति वारि, शासन को अबर न आप टारि ॥6॥
अर्थ-आपके शासन अर्थात् आप द्वारा दिखाए गए मोक्षमार्ग पर चलकर अनगिनत जीव मोक्ष गए हैं, जा रहे हैं और सदैव जाएंगे। इस खारे भव-सागर के दुःखों को जीवों को आपके अतिरिक्त, आपके सिवा अन्य कोई टालने वाला नहीं है।
यह लखि निज दुःखद-हरण-काज, तुम ही निमित्त कारण इलाज।
जाते तारौं मैं शरण आय, उबरौं निज दुःख जो चिर लहाय ॥7॥
अर्थ-मेरे दुःखरूपी रोग को हरने के लिए, शमन करने के लिए, आप ही निमित्त कारण होकर इलाज के साधन हैं, यह देख-जानकर मैं आपकी शरण में आया हूँ और सदा से / अनादि से भोग रहे अपने दुःखों को व्यक्त कर रहा हूँ, कह रहा हूँ।
मैं भ्रम्यो अपनपो बिसरि आय, आपनाये विचि-फल-पुण्य-पाय।
निज को पर को करता सिधान, पर में अनिष्टता इष्ट ठान ॥8॥
अर्थ-मैं अपने स्वरूप को भूलकर स्वयं ही भटक रहा हूँ मैंने पुण्य व पाप के फल को स्वीकार कर लिया है, मैं अपने को पर का / पर को अपना कर्ता समझता हूँ तथा पर में इष्ट और अनिष्ट को मान्यता करता रहा हूँ। (ये मेरी अनादिकालीन चार भूल हैं)
आकुलित भयो अज्ञान धारि, ज्यो मृग-मृगतृष्णा जानि वारि।
तन-परिणति में आपो विचार, कबहुँ न अनुभवो स्व-पद सार ॥9॥
अर्थ-मैं अनादिकाल से अज्ञान धारण कर भटकता हुआ दुःखी हो गया हूँ। जैसे हरिण मृगतृष्णावश आकुलित होता है। मैंने अपनी इस देह की पर्यायों को अपना स्वरूप ही जाना और उससे निज-स्वरूप के सार का कभी अनुभव नहीं किया।
तुमको बिन जाने जो कलेश, पाये सो तुम जानत जिनेश।
पशु-नारका-सुर-गति-मंझार, भव धरि मरणो अनन्त बार ॥10॥
अर्थ-आपको जाने बिना मैंने जो दुःख पाये, हे जिनेश! आप वे सब जानते हैं। नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव पर्यायों में, मैं अनेक बार भव / जन्म धारण करता रहा और मरता रहा हूँ।
अब काललब्धि बसतै दयाल, तुम दानि पय भयो खुशाल।
मन शांत भयो मिटि सकल द्वन्द्व, चारख्यो स्वातमरस दुःखनिंद ॥11॥
अर्थ-अब काल लब्धि आने पर हे प्रभु! मैंने आपके दर्शन पाये हैं और आनंदित हुआ हूँ। सारे विकल्पजाल से मुक्त होकर मेरा मन शांत हुआ है और दुःखों से मुक्त करने वाले अपने आत्मरस का आस्वादन मैंने किया है।
तारौं अब ऐसी करहु नाथ, बिछुरै न कभी तुझ चरण साथ।
तुम गुण गण को साहि छेव देव, जग तारन को तुम विरद एव ॥12॥
अर्थ-इसलिए अब ऐसा कुछ कीजिए कि कभी आपके चरणों का साथ न छूटे। आपके गुणों के समूह का पार नहीं है। आपकी प्रसिद्धि है कि आप संसार को तारने वाले हैं।
अतप्त के अहित विषय कषाय, इनमैं मेरी परिणति न आय।
मैं रहूँ आप में आप लीन, सो करौ होकें ज्यों निजाधीन ॥13॥
अर्थ-आत्मा का अहित करने वाले पंचेंद्रिय के विषय और चार कषाय हैं। इनमें मेरी कोई रुचि जागृत न हो। ऐसा कीजिए कि मैं सदा अपने स्वभाव में ही लीन रहूँ / और आपकी तरह अपने ही आधीन हो जाऊँ।
मेरे न चाह कछु और ईश, रत्नत्रय-निधि दीजे मुनीश।
पुद्गल काज के कारण सु आप, शिव करहु-हरहु मम मोह ताप ॥14॥
अर्थ-हे ईश! मेरे और / अन्य कुछ भी चाह नहीं है। हे मुनीश! मुझे रत्नत्रय रूप संपत्ति दीजिए। मेरे कार्य के लिए आप ही कारण हैं। मेरे मोहरूपी ज्वर का दमन कर मुझे शांति प्रदान कीजिए, मेरा कल्याण कीजिए।
शशि शांति करन तप हरन हेत, स्वपरहित तथा तुम कुशल देत।
पीवत पियूष ज्यों रोग जाय, त्यों तुम अनुभवतैं भव नशाय ॥15॥
अर्थ-चन्द्रमा शांति करने में और गर्मी के हरने में कारण है, उसी प्रकार आप भी स्वयं ही शांति प्रदान करने वाले और दुःखों को नाश करने वाले हैं। जैसे अमृत पीने से रोग चला जाता है, उसी प्रकार आपका अनुभव करने से संसार भ्रमण का नाश होता है।
त्रिभुवन तिहुँकाल मंझार कोय, नहिं तुम बिन निज सुखदाय होय।
मो डर यह निश्चय भयो आज, दुःख-जलधि उतारन तुम जिहाज ॥16॥
अर्थ-तीन लोक व तीन काल में आपके सिवा सुख-दाता अन्य कोई नहीं है। यह मैंने अपने हृदय में निश्चित कर लिया है। आप ही इस दुःख-समुद्र से पार ले जाने हेतु एकमात्र जहाज हो।
तुम गुणगण-मणि गणपति, गणत न पावैहँ पार।
‘दौल’ स्वल्प-मति किम कहै, नमूँ त्रिभवन संहार ॥
अर्थ-जब गणधर भी आपके गुणों रूपी मणियों की गिनती नहीं कर सके, फिर मैं आपके गुणों का कथन कैसे कर सकता हूँ? कवि दौलतराम जी कहते हैं कि मैं तो छोटी बुद्धि वाला हूँ अतः क्या कहूँ। मैं मन, वचन, काय को संभालकर, साधकर, आपको नमन करता हूँ।
तीर्थंकर वर्द्धमान
तीर्थंकर वर्द्धमान का जन्म आज (सन् 2005 से लगभग 2603 वर्ष पूर्व कुण्ड ग्राम (वैशाली) में हुआ था। इनके पिता सिद्धार्थ, बड़े ही नीतिवंत एवं धर्म परायण राजा थे। माता त्रिशला ने चैत्र सुदी 13 को तीर्थंकर बालक को जन्म दिया। इनके जन्मोत्सव हेतु स्वर्ग से अनेक देव आये थे। उन सभी देवों ने सर्वप्रथम आपको ऐरावत हाथी पर बैठाया और सुमेरु की पाण्डुक शिला पर ले गये। वहाँ पर सभी ने धूमधाम से बालक वर्द्धमान का जन्माभिषेक किया। तदनन्तर सौधर्म इन्द्र ने उनके दाहिने पैर के अंगूठे में सिंह का चिह्न देखकर उनका चिह्न ‘सिंह’ रखा। उसी समय तीर्थंकर बालक के जय-जयकारों से सारा भूमंडल गूँज गया। तदनन्तर सभी ने राजमहल के प्रांगण में आकर जन्मोत्सव मनाया और इन्द्र ने ताण्डव नृत्य किया। साथ ही, बालक की देवोचित्त सर्व व्यवस्था कर सभी देव अपने-अपने स्थान को चले गए।
जन्म होते ही राजा सिद्धार्थ के धन, वैभव, ऐश्वर्य, सुखशांति, आनंद में वृद्धि होने लगी इस कारण उनका नाम वर्द्धमान रखा गया।
संजय-विजय नाम के दो मुनिराजों को तत्त्वार्थ के विषय में कुछ शंका थी, उस शंका का राजकुमार महावीर के दर्शन मात्र से ही समाधान हो गया तब उन मुनियों ने आपका नाम सम्मति रख दिया।
मदोन्मत्त हाथी को राजकुमार वर्द्धमान ने एक क्षण में वश में कर लिया तब सबने मिलकर आपका नाम वीर रख दिया।
यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:
वीर शासन जयन्ती
जैन शास्त्रों के अनुसार नये वर्ष का प्रारम्भ श्रावण कृष्ण प्रतिपदा का होता है। युग का प्रारम्भ अथवा उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी सब कालों का आरम्भ इसी तिथि से होता है। युग की समाप्ति आषाढ़ पूर्णिमा को होती है। पर श्रावण कृष्ण प्रतिपदा को युग आरम्भ हुआ करता है।
भगवान् महावीर, केवलज्ञान होने के बाद 66 दिन तक मौन विहार करते हुए राजगृही में आये। नियमानुसार तो जहाँ केवलज्ञान प्राप्त होता है, वहाँ तत्काल तीर्थंकर की दिव्यध्वनि खिरने लगती है। लेकिन यहाँ गणधर के अभाव होने से ऐसा नहीं हुआ। आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन महातेजस्वी विश्वश्रेष्ठ इन्द्रभूति गौतम, अग्निभूति, वायुभूति तथा कौण्डिन्य आदि प्रसिद्ध इन्द्र की प्रेरणा से भगवान् महावीर के समवसरण में आये। वे सभी पण्डित अपने-अपने 500-500 शिष्यों से सहित थे। जिनधर्म का वास्तविक स्वरूप समझने के बाद स्वार्थों का परित्याग कर संयम धारण कर लिया। उसी समय राजा चेटक की पुत्री चन्दना एक प्रबल तप धारण कर आर्यिकाओं में प्रमुख हो गई। राजा श्रेणिक भी अपनी सुपुत्री श्रेणिका को साथ समवसरण में पहुँचा और जिनेंद्र देव को नमस्कार किया।
तब वर्द्धमान प्रभु ने श्रावणमास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को प्रातःकाल के समय अभिजीत नक्षत्र में दिव्यध्वनि के द्वारा शासन परम्परा चलाने के लिए उपदेश दिया। इस प्रमाण के अनुसार श्रावणकृष्ण प्रतिपदा को अभिजीत नक्षत्र के होने पर ही वीरशासन जयन्ती सम्पन्न की जाती है।
भगवान् महावीर की दिव्यध्वनि अनर्गल, बुद्धिभूमि के समान गंभीर तथा एक योजन तक फैलने वाली थी। भगवान् महावीर ने ग्यारह अंग का, चौदहपूर्वी का, सप्ततत्व और नवपदार्थों का वर्णन किया। इस प्रकार भगवान् महावीर की वाणी वीतरागता के घोतक थी। उनकी वाणी सर्वज्ञ आम्नादेशों से निकलती थी। वह वाणी निरक्षरी एवं ओकार रूप थी, फिर भी सभी प्राणी अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते थे।
प्रतिवर्ष वीरशासन जयन्ती को मनाते समय भगवान् महावीर के संदेशों को हृदय में अंकित कर उनकी वाणी का घर-घर में प्रचार-प्रसार करने का सतत प्रयत्न करना प्रत्येक सत्पुरुष का कर्त्तव्य है।
अभ्यास प्रश्न
- युग का प्रारम्भ व अंत कब-कब होता है?
- भगवान् महावीर की वाणी कितने दिन तक नहीं खिरी थी?
- भगवान् महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि नहीं खिरने का क्या कारण था?
- भगवान् महावीर स्वामी को प्रथम दिव्यध्वनि किस तिथि पर खिरी?
- वीरशासन जयन्ती पर किसका प्रचार करना चाहिए?
- गुरुपूर्णिमा मनाने का क्या अभिप्राय है?
- गौतम गणधर आदि के कितने-कितने शिष्य थे?
पट्लेश्य
कृपया आप योग से अनुप्रेरित आत्मा के परिणामों को लेश्या कहते हैं। मूलतः लेश्या के दो भेद हैं- द्रव्यलेश्या तथा भावलेश्या।
शरीर के रंग को द्रव्यलेश्या एवं कर्म सहित जीव के परिणाम विशेष को भाव लेश्या कहते हैं। वैमानिक देवों और नारकियों में द्रव्य व भावलेश्या समान होती है परन्तु अन्य जीवों में इनकी समानता का कोई नियम नहीं है। द्रव्यलेश्या जीवनपर्यन्त एक ही रहती है पर भावलेश्या परिणामों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है।
सामान्यतः भावलेश्या के छह भेद हैं- कृष्णा, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल। इनमें से आदि की तीन अशुभ लेश्या और बाद की तीन शुभ लेश्या हैं। अशुभ लेश्याओं से प्रभावित व्यक्ति के मन में पाप क्रिया के भाव जागृत होते हैं। शुभलेश्याओं से व्यक्ति के मन में सन्तोष, सौहार्द, अहिंसा, दया, मैत्री, शान्ति आदि पवित्र भावनाओं का विकास होता है। लेश्याओं के लक्षण इस प्रकार हैं-
(1) कृष्णा लेश्या- सदा बुरे विचार करना, बात-बात में क्रोध करना, दूसरों से घृणा करना, दया धर्म से रहित होना, बैरभाव रखना, सदा शोक संतप्त रहना आदि कृष्णा लेश्या वालों के लक्षण हैं। अर्थात् अत्यन्त नीचता (WORST) परिणाम।
(2) नील लेश्या- आलसी, बुद्धिहीन, कामी, भोगी, उपद्रवी, ठग, सदा मान सम्मान पाने के भाव आदि नील लेश्या वालों के लक्षण हैं। अर्थात् नीचतम (WORSE) परिणाम।
(3) कापोत लेश्या- परिन्दा, आलस्यग्रस्त, बात-बात में नाराज होना, शंकाकुल होना आदि कापोत लेश्या वालों के लक्षण हैं। अर्थात् नीच (BAD) परिणाम।
(4) पीतलेश्या- दयालु, विवेकी, संतोषी, तीव्र बुद्धिमान होना, सबसे प्रेम करना आदि पीतलेश्या वालों के लक्षण हैं। अर्थात् मंद अथवा (GOOD) परिणाम।
(5) पद्म लेश्या- सदा प्रसन्न रहना, सदा परोपकार करना, देवपूजा-दानादि करना, त्याग के भाव रखना आदि पद्म लेश्या वालों के लक्षण हैं। मेंहतर अथवा (BETTER) परिणाम।
(6) शुक्ल लेश्या- राग द्वेष से रहित होना, प्राणी मात्र के प्रति स्नेह भाव रखना, शोक-चिंता आदि से रहित होना शुभ लेश्या वालों के लक्षण हैं। अर्थात् मेंहतरम अथवा (BEST) परिणाम।
देव ने परीक्षा करने के लिये भयंकर नाग का रूप धारण कर लिया। निर्भय वर्द्धमान उसके फण पर पैर रखकर उतरे और उसे घुमाकर निर्भीक कर दिया, तब देव ने प्रकट हो नमस्कार करके महावीर नाम रख दिया।
देव ने परीक्षा करने के लिये अभराओं को भेजकर, हर प्रकार से तप से डिगाना चाहा किन्तु महावीर सुमेरु की तरह अडिग साधना में तल्लीन रहे। तब देव ने आपका नाम अतिवीर रख दिया।
आपके शरीर का रंग तपे हुए स्वर्ण के समान था और शरीर की ऊँचाई 7 हाथ थी। कुल आयु 72 वर्ष थी। आपने तीस वर्ष की अल्पायु में ही बाल ब्रह्मचारी रहते हुए मुनि दीक्षा ले ली और सर्व परिग्रह का त्याग कर कठोर साधना करने लगे। आप जंगलों में ही रहते थे। आहार के लिये दिन में एक ही बार निकलते थे और श्रावकों के यहाँ अपने करपात्र (हाथों) में ही शुद्ध आहार लेते थे। कई दिनों की तपस्या के बाद एक दिन आपको केवलज्ञान हुआ जिससे आपको सभी पदार्थ एक साथ ही प्रत्यक्ष दिखने लगे। इस समय इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने मणिमयी समवशरण की रचना की। उसमें क्रमअनुसार सभी मुनि, आर्यिका, देव, मनुष्य, तिर्यंच आदि बैठे थे। केवलज्ञान होने के पश्चात् (66) दिन बाद भगवान् वर्द्धमान की दिव्यध्वनि खिरी अर्थात् धर्मोपदेश हुआ। महावीर स्वामी के प्रमुख गणधर गौतम स्वामी हुए। इस प्रकार भगवान् महावीर स्वामी का केवल अवस्था में देश-देश में धर्मोपदेश हुआ। तत्पश्चात् आप पावापुर के सरोवर के मध्य स्थित शिला पर ध्यानमग्न हो गये और दो दिन कठोर ध्यान साधना से समस्त कर्मों को नष्ट कर कार्तिक वदी अमावस्या को प्रातःकालीन वेला में मोक्ष को प्राप्त कर लिया अर्थात् सिद्ध हो गये। उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान हुआ। इसी खुशी में घर-घर दीप जलाये गए। इसी दिन से यह दिन दीपावली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अभ्यास प्रश्न
- तीर्थंकर वर्द्धमान को मोक्ष किस दिन हुआ?
- तीर्थंकर वर्द्धमान के प्रमुख गणधर कौन थे?
- तीर्थंकर वर्द्धमान स्वामी ने कहाँ से मोक्ष प्राप्त किया?
- तीर्थंकर वर्द्धमान स्वामी ने कितने वर्ष की अवस्था में दीक्षा ली?
- दीपावली किस खुशी में मनाई जाती है?
अभ्यास प्रश्न
लेश्याओं के स्वरूप को समझने के लिए एक उदाहरण प्रचलित है-छह मित्र एक बगीचे में गये। वहाँ उन्होंने आम से लदा हुआ वृक्ष देखा, पहला मित्र बोला-चलो इस वृक्ष को उखाड़ डालें और पेट भर आम खायें। दूसरे मित्र ने कहा-वृक्षों को उखाड़ने से क्या प्रयोजन, केवल बड़ी-बड़ी शाखाओं को काटने से ही हमारा काम हो जायेगा। तीसरे ने कहा-यह भी उचित नहीं है, हमारा काम तो छोटी-छोटी टहनियों के काटने से हो जायेगा। चौथे मित्र ने कहा-टहनियों को तोड़ने से क्या लाभ, केवल गुच्छों को तोड़ना ही पर्याप्त है। पाँचवा मित्र बोला-हमें गुच्छों से क्या प्रयोजन, केवल पके फल तोड़ लेना ही अच्छा है। तब अन्त में छठा मित्र गम्भीर होकर बोला-आप सब क्या सोच रहे हैं। हमें जितने फल चाहिए उतने तो नीचे ही पड़े हैं, फिर व्यर्थ में फल तोड़ने से क्या लाभ? इस दृष्टान्त से लेश्याओं का स्वरूप समझ में आ जाता है। पहले मित्र के परिणाम कृष्ण एवं छठे मित्र के परिणाम शुक्ल लेश्या के हैं। यह उदाहरण केवल परिणामों की तारतम्यता का सूचक है।
गुणस्थान की अपेक्षा-चौथे गुणस्थान तक छहों लेश्या होती है। पाँचवें से सातवें गुणस्थान तक तीन शुभ लेश्या ही होती है इससे ऊपर तेरहवें गुणस्थान तक मात्र एक शुक्ल लेश्या होती है। कषाय व योग का अभाव होने से अयोग केवली और मुक्तजीवों के लेश्या नहीं होती है।
गति की अपेक्षा-देवगति में पीत, पद्म, शुक्ल तीन शुभ लेश्यायें ही होती हैं। किन्तु जब वे अपर्याप्तक होते हैं उस समय अनौपमिकी में तीन अशुभ लेश्यायें भी हो सकती हैं। मनुष्य में छहों लेश्यायें पायी जाती हैं। तिर्यंचों में पर्याप्तक में असंख्य भेदहीन तक के सभी जीवों के नियततः तीन अशुभ लेश्यायें होती हैं और संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के छहों लेश्यायें सम्भव हैं।
देवों और नारकियों की भवलेखया आयु पर्यन्त एक ही होती है, जबकि मनुष्यों और तिर्यंचों की भाव लेश्या अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती है।
अभ्यास प्रश्न
- लेश्या किसे कहते हैं?
- लेश्या के मूलतः कितने भेद हैं? स्पष्ट कीजिए।
- लेश्या के स्वरूप को दृष्टान्त द्वारा स्पष्ट कीजिए।
पाठ-8
जीवंधर स्वामी
एक समय भरतक्षेत्र में हेमनाद नामक एक देश था, उसकी राजधानी का नाम राजपुरी था। वहाँ राजा सत्यंधर राज्य किया करते थे। उनकी रानी का नाम विजया था। एक दिन रानी विजया ने रात्रि के अन्तिम पहर में तीन स्वप्न देखे। प्रातः होते ही रानी ने षट् आवश्यक क्रियाओं से निवृत्त हो, राजा के पास जाकर उन स्वप्नों का फल पूछा तब राजा ने कहा :
राजा। अशोभन कुछ नहीं हो रहा है।
फल। महाराज ने पहले स्वप्न का अशुभ फल समझकर कुछ नहीं कहा क्योंकि यह स्वप्न उनकी मृत्यु का सूचक था।
स्वप्न 2. मुकुट सहित नया अशोक वृक्ष।
फल। आपके एक तेजस्वी पुत्र होने वाला है।
स्वप्न 3. आठ सुन्दर मालायें।
फल। उसकी आठ सुन्दर पत्नियाँ होंगी।
दोनों दम्पती सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। कुछ ही दिनों में रानी गर्भवती हो गई। तब राजा ने मृत्यु को निकट जानकर अपनी रानी व पुत्र की रक्षा के लिये एक यक्ष-युकृति का विधान बनाया और रानी को उड़ना सिखाया। एक दिन रानी काष्ठांगार ने राजशासन के लालच में राजा से युद्ध करने की घोषणा की। तब राजा ने शीघ्र ही रानी को विमान में बिठाकर उड़ा दिया और स्वयं प्रजा के हित एवं आत्मकल्याण के लिये राजपाट छोड़कर, जिनदीक्षा धारण कर ली और सल्लेखना पूर्वक मरण कर देवपर्याय को प्राप्त किया।
रानी विजया का विमान राजगृहों के ही श्मशान में जा गिरा। वहीं पर रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। तब एक देवी भाव का रूप धारण कर वहाँ रानी की सहायतार्थ प्रकट हुई। जिस दिन रानी के पुत्र हुआ उसी दिन उस नगर के सेठ गन्धोत्कट के भी पुत्र हुआ। उन दोनों पुत्रों को देवी ने एक साथ पाला।
यही पुत्र जन्मा और उसी समय मृत्यु को प्राप्त हो गया। जब वह अन्तर्द्वष्टि के लिये श्मशान में आया तो उसे विजया का पुत्र दिखाई दिया। सेठ जब उस पुत्र को घर ले जाने लगा, तब पेड़ के नीचे छिपी हुई विजया ने उसे ‘जीव’ शब्द कहकर आशीर्वाद दिया। सेठ ने जीव शब्द सुनकर शिशु का नाम जीवंधर रख दिया। विजया को देवी दण्डक वन में रहने वाले तपस्विनियों के आश्रम ले गई।
कुछ दिन बाद सेठ की पत्नी सुनन्दा ने पुनः एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम नन्दव्यव रख गया। उसका नाम धीरभूत भी जीवंधर के साथ होने लगा। जीवंधर ने प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, सर्व विद्या विशारद नामक पाठशाला में आर्यदत्त से शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् आर्यदत्त ने जीवंधर को शिक्षा देकर स्वयं आत्मकल्याण हेतु जिनदीक्षा धारण कर ली।
जीवंधर का विवाह आठ सुन्दर कन्याओं के साथ हो गया।
एक बार जीवंधर अपने मित्रों के साथ क्रीड़ा स्थल पर पहुँचे जहाँ ब्राह्मणों द्वारा रखी गयी हवन सामग्री को किसी कुत्ते ने दूषित कर दिया। तब क्रोधित ब्राह्मणों ने कुत्ते को मार-मार कर अधमरा सा कर दिया। जीवंधर ने जब कष्टार्त उस कुत्ते को देखा तो शीघ्र उसके पास जाकर उसके प्राण बचाने लगे। परन्तु बहुत देर हो चुकी थी। तब अन्त में उन्होंने उसे णमोकार महामंत्र सुनाया, जिसके प्रभाव से वह कुत्ता स्वर्ग में यक्षों का अधिपति देव बन गया।
जीवंधर एक दिन विहार करते हुए दण्डक वन के तपस्वी आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ अपनी माता विजया को देखने ही प्रसन्न हो गए। माता ने जीवंधर को आशीर्वाद देते के बाद अपने पिता का राज्य पुनः प्राप्त करने की प्रेरणा दी। जिसके फलस्वरूप उन्होंने काष्ठांगार को मार भगाया। जिससे अन्य सभी राजाओं ने जीवंधर को अधीनता स्वीकार कर ली। जब राजा जीवंधर कुशलता से शासन करने लगे तब एक दिन उनकी दोनों माताओं विजया और सुनन्दा ने पद्म नाम की आर्यिका से दीक्षा ले ली। तब राजा भी एक कुशल शासन करने के बाद एक दिन बंदर की क्रीड़ा को देख उन्हें वैराग्य हो गया तब गंधर्वदत्ता के पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं आठों रानियों के साथ श्री महावीर स्वामी के समवशरण में जा पहुँचे। वहाँ भगवान् की स्तुति कर, उनकी दिव्यध्वनि का रसास्वादन किया, फिर गणधर देव को नमस्कार कर जिनदीक्षा धारण कर ली और अपने कठोर तपश्चरण के प्रभाव से आठों कर्मों को नष्ट कर सिद्धालय को प्राप्त किया।
अभ्यास प्रश्न
- जीवंधर स्वामी की माता ने कितने स्वप्न देखे थे एवं उनका क्या फल था?
- जीवंधर स्वामी ने किसे णमोकार मंत्र सुनाया था और उसका क्या फल हुआ था?
- जीवंधर स्वामी के माता-पिता का नाम बताइए।
- जीवंधर स्वामी को किस घटना से वैराग्य हुआ था?
पाठ-9
कर्म
कर्म का लक्षण
जो आत्मा का असली स्वभाव प्रकट नहीं होने देता, उसे कर्म कहते हैं। जैसे बहुत सी धूल या मिट्टी उड़कर सूर्य के प्रकाश को ढक देती है, उसी प्रकार लोक में सब जगह भरे हुए जो पुद्गल परमाणु, राग-द्वेषादि के निमित्त से, आत्मा के प्रदेशों के साथ मिलकर आत्मा का स्वभाव ढक देते हैं, उन पुद्गल परमाणुओं को कर्म कहते हैं।
रागद्वेष के निमित्त से उन कर्मों में सुख-दुःख आदि देने की शक्ति भी हो जाती है।
कर्म के भेद-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ कर्म हैं।
इनमें से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय कर्म घातिया तथा शेष कर्म को अघातिया कहते हैं।
1. ज्ञानावरण कर्म
जो कर्म आत्मा के ज्ञानगुण को ढकता है (प्रकट नहीं होने देता) उसे ज्ञानावरण कर्म कहते हैं।
दृष्टान्त-जैसे किसी मूर्ति पर पर्दा पड़ा हो तो जिस तरह उसका रूप नहीं दिखता, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म आत्मा के ज्ञानगुण को ढक देता है, प्रकट नहीं होने देता। जैसे-सुरेश अपना पाठ खूब याद करता है, परन्तु उसे याद नहीं होता, इसमें सुरेश के ज्ञानावरण कर्म का उदय समझना चाहिये।
बन्ध के कारण-ज्ञान के साधनों में विघ्न डालना, पुस्तक फाड़ देना, छिपा देना, किसी को नहीं बताना, अपने ज्ञान का गर्व करना, जिनवाणी में संशय करना, अर्थ का अनर्थ करना, गुरु की निन्दा करना, झूठा उपदेश देना आदि कार्यों से ज्ञानावरणकर्म का बन्ध होता है। इनसे उल्टे कार्य करने से ज्ञान का विकास होता है।
2. दर्शनावरण कर्म
जो कर्म आत्मा के दर्शन गुण को ढकता है (प्रकट नहीं होने देता) उसे दर्शनावरण कर्म कहते हैं।
दृष्टान्त-जिस प्रकार कोई पहरेदार राजा के दर्शन नहीं होने देता, उसी प्रकार दर्शनावरण कर्म आत्मा को पदार्थों का दर्शन नहीं होने देता। जैसे-रमेश मन्दिर दर्शन के लिये गया, किन्तु ताला लगा पाया, इसमें रमेश के दर्शनावरण कर्म का उदय समझना चाहिये।
बन्ध के कारण-जिनदर्शन में विघ्न डालना, किसी को आँख फोड़ना, दिन में शयन करना, मुनियों को देखकर घृणा करना, अपनी दृष्टि का गर्व करना इत्यादि कार्यों से दर्शनावरण कर्म का बन्ध होता है।
3. वेदनीय कर्म
जो आत्मा को सुख-दुःख देता है और अव्याबाध सुख (बाधा का अभाव रूप) गुण का घात करता है, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं। इसके दो भेद हैं- असातावेदनीय और सातावेदनीय।
दृष्टान्त-जिस प्रकार शहद-लपेटी तलवार की धार चाटने से सुख-दुःख दोनों होते हैं अर्थात् शहद मीठा लगने से सुख होता है और तलवार द्वारा जीभ कट जाने से दुःख होता है, वैसे ही वेदनीयकर्म सुख-दुःख दोनों देता है।
बन्ध के कारण-अपने व दूसरे के विषय में दुःख करना, शोक करना, पश्चात्ताप करना, रोना, मारना, पशुवध करना, बलि चढ़ाना आदि कार्यों से असातावेदनीय कर्म का बन्ध होता है।
दया करना, दान करना, संयम पालना, लोभ न करना, वात्सल्य रखना, वैयावृत्ति करना, व्रत पालन करना, प्रशंसा करना आदि कार्यों से सातावेदनीय कर्म का बन्ध होता है।
4. मोहनीय कर्म
जो कर्म आत्मा के सम्यक्त्व और चारित्र गुण का घात करता है अथवा जिसके उदय से यह जीव स्वभाव को भूलकर अपने से जुदा पर वस्तुओं में लुब्ध जाता है, उसे मोहनीयकर्म कहते हैं।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3045.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है