श्रमण संस्कृति बाल संस्कार २
शमन संस्कृति बाल संस्कार
आदर्श विद्यार्थी
- उत्साही
- निष्कपट
- सत्यवादी
- प्रतिभा सम्पन्न
- विनीत
- दृढ़निश्चयी
मात-पिता गुरु सेवा करते, है जिसका अध्ययन ही काम |
निडर रहे बाधाओं से जो, है उसका विद्यार्थी नाम ||
प्रकाशक :
श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान
वीरोदय नगर, सांगानेर, जयपुर (राज.)
मुद्रण
सौलहवाँ संस्करण : 3000
फरवरी, 2021
- (सर्वाधिकार सुरक्षित)
- आशीर्वाद
आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज - प्रेरणा
मुनिसुव्रत श्री 108 सुधासागर जी महाराज
( ससंघ ) - कृति
श्रमण संस्कृति बाल संस्कार भाग-2 - सम्पादक
पं. रतन लाल बैनाड़ा
डॉ. शीतलचन्द्र जैन - मूल्य
20/- रुपये ( पुनः प्रकाशन हेतु ) - प्रतिष्ठान :
भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड
श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान
वीरौदय नगर, भद्रिया रोड
सांगानेर- 302 029 जयपुर (राज.)
फ़ोन : 0141-2730552, 93140 30108 - मुद्रक :
द प्रिंट पैलेस
केशरीसिंह रोड, मालवीय नगर, जयपुर (राज.)
फ़ोन : 0141-4002016
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कहाँ / क्या ?
- जैन धर्म
- पंचपरमेष्ठी
- जैनों के तीन चिह्न
- हमारे जिनालय
- जीव-अजीव
- दिनचर्या
- भगवान महावीर
- भोजन के नियम
- अहिंसक आहार
- जैन पर्व
- तीर्थंकरों के निर्वाण क्षेत्र
- दान
- परोपकार
- सत व्यसन
आभार
इस कृति में जिन मुनिराजों, त्यागी व्रतियों, मनीषियों एवं विद्वानों की रचनाओं को समावेशित किया गया है और जिन महत्त्वपूर्ण पुस्तकों, कृतियों, ग्रंथों से श्रमणपूर्वक सामग्री का चयन प्रत्यक्षतः परोक्षतः किया गया है - उन सबके प्रति मैं अपने हृदय के गहनतम गहन तल से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
इस कृति के प्रकाशन में पाण्डुक्षा परिवार ने अर्थ सहयोग कर पुस्तक की कीमत को कम किया है। उनके इस पुण्यार्जन के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
सम्पादक
जैन धर्म
शिष्य : जैन धर्म किसे कहते हैं?
गुरु जी : जो जिनेंद्र के द्वारा कहा हुआ धर्म है, वह जैन धर्म कहलाता है।
शिष्य : जिनेंद्र भगवान किसे कहते हैं?
गुरु जी : जो रागद्वेष आदि दोषों से रहित होने के कारण वीतराग कहे जाते हैं, जो प्रत्येक द्रव्य की अनंत पर्यायों को जानने वाले होने से सर्वज्ञ कहे जाते हैं, जो संसारी जीवों को हित का उपदेश देने से हितोपदेशी कहे जाते हैं। इस प्रकार जिन भगवान में वीतरागता, सर्वज्ञ व हितोपदेशी तीनों विशेषण पाये जायें, उन्हें जिनेंद्र भगवान कहते हैं।
शिष्य : जैन धर्म किसने चलाया है?
गुरु जी : इसका चलाने वाला कोई नहीं है। यह धर्म तो अनादिकाल से होने के कारण शाश्वत धर्म है। श्रीच-बीस में इसका प्रवर्तन होता रहता है। इस अवसर्पिणी के तृतीय चतुर्थ काल में जो चौबीस तीर्थंकर भगवान हुये थे, उनमें से भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे और भगवान वर्द्धमान चौबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान वर्द्धमान ने जो उपदेश दिया था, वही आज तक शास्त्रों में लिखा हुआ चला आ रहा है।
शिष्य : जैन धर्म कितना प्राचीन है?
गुरु जी : जब से सृष्टि है तभी से जैनधर्म विद्यमान है। सृष्टि का प्रारम्भ कभी नहीं हुआ। यह तो अनादिकाल से चली आ रही है, इसलिए जैनधर्म भी अनादिकाल से है। इसके अंतिम प्रवर्तक भगवान वर्द्धमान का निर्वाण लगभग 2530 वर्ष पूर्व हुआ था।
शिष्य : भगवान वर्द्धमान के अनुसार जैन धर्म के मूल सिद्धान्त क्या हैं?
गुरु जी : इसके मूल सिद्धान्त चार हैं - 1. अहिंसा 2. अनेकांत 3. स्याद्वाद 4. अनेकान्त
शिष्य : जैनदर्शन की क्या-क्या विशेषतायें हैं? बताइये।
गुरु जी : जैन दर्शन ईश्वर को विश्व या सृष्टि का कर्ता नहीं मानता। इस दर्शन में सृष्टि का बनाने वाला या नाश करने वाला या नाश करने वाला कोई नहीं है। सृष्टि अनादिकाल से है और अनंत काल तक रहेगी।
शिष्य : गुरु जी फिर संसार को किसने बनाया है, बिना बनाये संसार कैसे बन सकता है?
गुरु जी : इस सृष्टि को रचने वाला कोई नहीं है यह तो अनादिकाल से अर्थात् हमेशा इसी प्रकार से चली आ रही है, जैसे सूर्य चन्द्रमा हमेशा से इसी तरह उदय और अस्त होते हैं। छहों ऋतुयें अपने समय से आती हैं और चली जाती हैं। फूल खिलते हैं और झड़ जाते हैं यह सब स्वभाव से होता है, इसका करने वाला कर्ता कोई नहीं है।
पंच परमेष्ठी
जो आत्मा के पद और गुणों में सबसे बड़े होते हैं तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं। परमेष्ठी पाँच होते हैं। 1. अरिहंत 2. सिद्ध 3. आचार्य 4. उपाध्याय 5. साधु।
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अरिहंत- जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर दिया है, जिसमें छियालीस मूलगुण होते हैं और अठारह दोषों से रहित होते हैं, उन्हें अरिहंत परमेष्ठी कहते हैं।
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सिद्ध- जिन्होंने आठों कर्मों का नाश कर दिया है, और अष्टगुणों से सहित होते हैं, लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं, उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं।
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आचार्य- जिन मुनिराज के छत्तीस मूलगुण होते हैं, जो संघ के नायक हैं और अपने शिष्यों को शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित्त और धर्मोपदेश देते हैं, उन्हें आचार्य परमेष्ठी कहते हैं।
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उपाध्याय- जो मुनिराज संघ में रहकर सेषस्थ शिष्यों को ज्ञान-पाठन का कार्य कराते हैं जो जिनके 25 मूलगुण होते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।
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साधु- जो ज्ञान, ध्यान, तप में लीन रहते हैं तथा आरम्भ, परिग्रह से रहित होते हैं एवं जिनके 28 मूलगुण होते हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं।
जैनों के तीन चिह्न
हमको बड़े भाग्य से उच्चकुल एवं जैनधर्म की प्राप्ति हुई है। अतः हमको अपना आचरण, खानपान आदि भी धर्म के अनुसार उचित बनाना चाहिए। जिसके लिए तीन बातों पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है-
- देवदर्शन
हमको प्रतिदिन प्रातःकाल श्री जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन अवश्य करने चाहिए। जिसकी विधि इस प्रकार है- प्रातः उठते ही णमोकार मंत्र का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद मंजन, स्नान आदि क्रियाकर शुद्ध वस्त्र पहनकर हाथ में सामग्री लेकर, जीव जन्तुओं की रक्षा करते हुए जिनमंदिर जाना चाहिए। मंदिर के बाहर जूते, चप्पल उतार कर पानी से हाथ पैर धोकर, भगवान् की जय-जयकार करते हुए तीन बार निःसिहि, निःसिहि, निःसिहि बोलना चाहिए। इसके बाद ओम् जय, जय, जय, णमोत्थु, णमोत्थु, णमोत्थु बोलते हुए अष्ट द्रव्य या अक्षत (चावल) चढ़ाना चाहिए। पश्चात् णमोकार मंत्र बोलना चाहिए, इसके बाद ढोक देनी चाहिए। इसके उपरांत णमोकार मंत्र का माहात्म्य (एसो पंच णमोयारो…) तथा 24 तीर्थंकरों के नाम बोलने चाहिए। इसके बाद प्रभुप्रतिमा पावन आदि स्तुति बोलते हुए भगवान् की तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिए। प्रदक्षिणा देते समय सभी दिशाओं में भगवान् की तरफ देखते हुए नमस्कार करना चाहिए। इसके बाद पुनः ढोक देकर णमोदक लगाते समय यह मंत्र बोलना चाहिए।
निर्मल निर्मलीकरणं, पवित्रं पाप नाशनम्।
जिन गंधोदकं वंदे, अष्टकर्म विनाशम्॥
इसके उपरांत नौ बार णमोकार मंत्र पूछते के बाद मंदिर जी में रखे हुए शास्त्र अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि समय हो तो णमोकार मंत्र की एक माला जपनी चाहिए एवं भगवान् की तरफ पीठ न करते हुए मंदिर जी से बाहर आना चाहिए।
नोट:
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मंदिर जी में चमड़े आदि की अशुद्ध वस्तुएँ पहन कर नहीं जानना चाहिए।
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झूठे मुँह मंदिर जी में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
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हाथ-पैर धोकर ही मंदिर जी में प्रवेश करना चाहिए।
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मंदिर जी में जब तक दर्शन करें तब तक भगवान् की मूर्ति की ओर देखना चाहिए। अन्य ओर नज़र नहीं करना चाहिए तथा किसी अन्य से कोई बात भी नहीं करनी चाहिए।
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रात्रिभोजन त्याग
जीवों की रक्षा करना हमारा प्रमुख कर्तव्य है। दिन में सूर्य की किरणों जीवों को उत्पन्न नहीं होने देती। जैन मत देखता है कि बारिश के दिनों में सूर्य अस्त होने ही बिजली के खम्भे पर कीड़े आने लगते हैं। जबकि वे दिन में नहीं आते। इससे सिद्ध है कि दिन में जीवों की उत्पत्ति बहुत कम या नहीं होती। इसलिए हमको दिन में ही भोजन बनाना एवं करना चाहिए। रात्रि में भोजन करने से माँसभक्षण जैसा दोष लगता है। रात्रि में भोजन करके सो जाने पर पाचन क्रिया खराब हो जाती है, जिससे कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रात्रि में भोजन करते समय सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का अभाव रहता है और हमें पूर्ण रूप से विटामिन ‘डी’ नहीं मिल पाता है। अतः भोजन दिन में ही करना चाहिए। -
पानी छानकर पीना
पानी की एक बूँद में असंख्यात जीव होते हैं, ऐसा जैनाचार्यों ने बताया है। बिना छाने पानी से उन जीवों का घात होता है और स्वास्थ्य भी बिगड़ता है। वैज्ञानिकों ने भी बिना छाने पानी की एक बूँद में 36450 जीव बताए हैं। इसलिए सदा ही पानी छानकर पीना चाहिए। पानी छानने के लिये मोटे कपड़े का दोहरा छन्ना होना चाहिए (जिससे सूर्य की रोशनी न दिखे)। छना हुआ पानी 48 मिनट तक जब जीव रहित रहता है तदुपरांत उसमें जब जीव उत्पन्न हो जाते हैं अतः उसे फिर से छानना चाहिए।
हमारे जिनमंदिर
मंदिर के वैभव के वैभव है और मानव हृदय के प्रतिबिंब है क्योंकि मंदिर से ही व्यक्ति के नैतिक जीवन को शुरुआत होती है। मंदिर से हमें आचरण की शिक्षा मिलती है। हम किस तरह पापों से बचें, कषायों से किस तरह मुक्त हों, अपने भावों में विशुद्धि कैसे लाएँ, प्रीति प्रेम के आंगन में कैसे हिलें, मिला तथा मानवता क्या है? आदि शिक्षाएँ मंदिर के अन्तरंग कहीं प्राप्त नहीं होती। मंदिर पवित्रता का अनुष्ठान है। मंदिर में प्रवेश करते ही मनुष्य कषायों से मुक्त होकर शांति का अनुभव करने लगता है। अतः हमें मंदिर में प्रवेश करते ही निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
- मंदिर में प्रश्रात नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में कषाय नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में थूकना दौड़ना नहीं चाहिए।
- मंदिर में मूर्तिकायों नहीं लेना चाहिए।
- मंदिर में हाथ-पैर धोकर जाना चाहिए।
- मंदिर में हँसी मजाक नहीं करना चाहिए।
- भगवान की अविनय नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में आपसी चर्चा नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में अव्यवस्था नहीं फैलाना चाहिए।
- मंदिर की दीवारों को नहीं सोचना चाहिए।
- भगवान को गैर सोते में नहीं छूना चाहिए।
- मंदिर में हिसकअगार को नहीं लाना चाहिए।
- मंदिर में जूठा मुँह लेकर नहीं जाना चाहिए।
- मंदिर में किसी की निन्दा नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में दान देने में संकोच नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में प्रशंसावद टिककर नहीं बैठना चाहिए।
- मंदिर में बिजली का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
- मंदिर में किसी को व्यवधान नहीं पहुँचाना चाहिए।
- मंदिर में भड़कीले वस्त्र पहनकर नहीं आना चाहिए।
- मंदिर में चमड़े आदि की वस्तु नहीं ले जाना चाहिए।
- मंदिर में भगवान की ओर पीठ नहीं करना चाहिए।
- शास्त्र आदि रखने की चौंग को नहीं लांघना चाहिए।
- देवदर्शन के समय वेदी से नहीं टिकना चाहिए।
- मंदिर जी में काले कपड़े पहनकर नहीं जाना चाहिए।
जीव-अजीव
शिष्य : गुरु जी यह जीव और अजीव क्या है?
गुरु जी : जीव-अजीव नहीं जानते? तुम जीव ही तो हो। जो जानता है, जिसमें ज्ञान है, जो देखता है तथा सुख-दुःख का अनुभव करता है, वही जीव है। जैसे-मनुष्य, देव, नारकी, हाथी, घोड़ा आदि तिर्यंच, खटमल, लट, वृक्ष आदि।
शिष्य : और अजीव?
गुरु जी : जिसमें ज्ञान नहीं, जो जान नहीं सकता तथा सुख-दुःख का अनुभव नहीं कर सकता, वही अजीव है। जैसे-खिलौना, घड़ी, मोटर, टेबिल, टेलीविजन, मकान आदि।
शिष्य : जीव और अजीव में क्या अन्तर है?
गुरु जी : जीव में जानने और देखने की शक्ति होती है, किन्तु अजीव में जानने तथा देखने की शक्ति नहीं होती यही जीव और अजीव में अन्तर है।
शिष्य : क्या जीव के भेद होते हैं?
गुरु जी : हाँ सुनो।
जीव के दो भेद होते हैं- 1. मुक्त जीव 2. संसारी जीव
शिष्य : मुक्त जीव किसे कहते हैं?
गुरु जी : जिनके आठों कर्म नष्ट हो चुके हैं, जो इस संसार के जन्म-मरण के दुःखों से छूट गए हैं, जिनको मोक्ष हो गया है। लौटकर इस संसार में कभी नहीं आयेंगे, उन्हें मुक्त जीव कहते हैं। जैसे-सिद्ध भगवान्।
शिष्य : संसारी जीव किसे कहते हैं?
गुरु जी : जो संसार में रहकर जन्म-मरण आदि के दुःखों को सहन करता है, जिसके आठों कर्म होते हैं, उसे संसारी जीव कहते हैं। जैसे-नारकी, देव, मनुष्य, बन्दर, जुँ, बिच्छू, जोंक और वृक्ष आदि।
शिष्य : मुक्त जीव और संसारी जीव में क्या अन्तर है?
गुरु जी : मुक्त जीव के तो कर्म, जन्म, मरण और दुःख नहीं होते किन्तु संसारी जीव के कर्म, जन्म, मरण और दुःख होते हैं। यही इन दोनों में अन्तर है।
शिष्य : संसारी जीव के क्या और भी भेद होते हैं?
गुरु जी : हाँ सुनो।
संसारी जीव के दो भेद हैं-स्थावर जीव और त्रस जीव।
जिनके एक स्पर्शन इन्द्रिय होती है, उसे स्थावर जीव कहते हैं। इनके पाँच भेद होते हैं-1. पृथ्वीकायिक 2. जलकायिक 3. अग्निकायिक 4. वायुकायिक 5. वनस्पतिकायिक। जैसे- पहाड़-खान की मिट्टी या पत्थर, जल, ओला, ओस, आग की लौ, वायु, वृक्ष, बेल, फल आदि।
जिनके दो, तीन, चार अथवा पाँच इन्द्रियाँ होती हैं, उन्हें त्रसजीव कहते हैं। जैसे-लट, चींटी, भौंरा, मनुष्य, सर्प, हाथी आदि।
अभ्यास प्रश्न
- जीव किसे कहते हैं?
- अजीव किसे कहते हैं?
- जीव और अजीव में क्या अन्तर है?
- मुक्त जीव और संसारी जीव में क्या अन्तर है?
- स्थावर जीव किसे कहते हैं? तथा उनके भेद बताइए।
दिनचर्या
एक राजकुमार नाम का लड़का था। उसकी उम्र 7 वर्ष की थी तब उसके पिताजी का मरण हो गया। वह अपनी माँ के पास अकेला रहता था। उसकी माँ दूसरों के यहाँ जाकर रोटी बनाती, कपड़े धोती, बर्तन माँजती और अपने बेटे राजकुमार को पालती व अपना पेट भरती।
राजकुमार के पिता नहीं थे तो उसके साथ पढ़ने वाले उसे चिढ़ाते थे-लावारिस, भिखारी। उनको कोई भी अपने साथ नहीं खिलाता था, न उसके साथ कोई खेलता था। एक दिन उसकी माँ ने उसे बड़े प्यार से एक कहानी सुनाई। उस कहानी को सुनकर उसके भी मन में विचार किया कि मैं भी एक बड़ा व्यक्ति बनकर दिखाऊँगा और उसने एक कागज़ पर 24 घंटे में कब क्या करना है क्रमशः अपनी दिनचर्या बनाई। बनाकर अपने घर के अन्दर दीवार पर चिपका दी एवं उसके आजू-बाजू दो कागज़ चिपकाए जिस पर लिखा था - “मुझे नित्य-प्रति अपनी दिनचर्या स्वयं पर पूरी करना है क्योंकि मुझे महान् बनना है।” मैं अपनी माँ की आज्ञा मानूँगा क्योंकि माँ अच्छी होती है, वह महान् बनाती है। राजकुमार सदा आता-जाता उसको पढ़ता और अपना कार्य मन लगाकर करता।
राजकुमार की दिनचर्या इस प्रकार थी -
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प्रातः 5 बजे सूर्य निकलने से पहले सोकर उठना और उठकर सर्वप्रथम भगवान् का नाम स्मरण कर, नमोऽस्तु करना, मुँह हाथ धोकर प्रार्थना करना फिर माता के चरण स्पर्श करना।
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इसके बाद थोड़ा सा व्यायाम करना।
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फिर विद्यालय का पाठ याद करना।
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इसके बाद दन्तशुद्धि कर, स्नान करके, दूध पीकर, विद्यालय जाना।
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विद्यालय में गुरुजी के चरण स्पर्श करना और कक्षा की सफाई कर फिर गुरुजी जो पढ़ाते वह ध्यान से पढ़ना। जो समझ में नहीं आता पूछ लेना।
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गुरुजी जो गृहकार्य करने देते, उसे प्रतिदिन करके लाना।
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विद्यालय की छुट्टी होने पर गुरुजी के चरण स्पर्श करके सीधे घर जाना। यहाँ-वहाँ नहीं जाना एवं मार्ग में अपरिचितों से बातचीत नहीं करना।
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घर पर अपने कपड़े, कॉपी, किताब, बस्ता आदि सामान एक निश्चित स्थान पर सम्हाल कर रखना।
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घर के छोटे-छोटे काम स्वयं करना। जैसे - सफाई करना, घर का सामान निश्चित स्थान पर जमाना, दीपक जलते हुए नहीं छोड़ना, स्नान करना, कपड़े धोना। पानी के लिए स्वयं ही उठकर लेना, घर का दरवाज़ा बन्द रखना, आदि कार्य स्वयं ही अपने हाथों से करना।
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प्रतिदिन सुबह अहिंसा भगवान् के दर्शन अवश्य करना। छुट्टी के दिनों में अभिषेक पूजन करना।
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माँ जो खिलाती-पिलाती वही खाना-पीना। बाजार की नहीं वस्तुएँ नहीं खाना।
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शाम को 6:30 से 9:00 बजे तक पढ़ाई करना फिर माँ से कहानी सुनना।
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सोने से पहले माता के चरण स्पर्श करना फिर 9 बार भगवान् के नाम का स्मरण कर सोना।
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कोई दीन-दुःखी दिख जाता तो उनकी सेवा करना।
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किसी भी पशु-पक्षी को मारना नहीं, उनका प्रतिदिन दाना-पानी रखना।
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राजकुमार अपनी माता से जो प्रतिदिन कहानी सुनता था उसमें से शिक्षा ग्रहण करता, जो अच्छी बात होती वह अपनी कॉपी में लिख लेता था और फिर उस बात पर स्वयं अमल करता। इस कारण वह बहुत अच्छा बच्चा बनता गया।
बड़ों की विनय, गरीबों की सेवा, अपने साथ पढ़ने वाले सहपाठियों की सहायता करना वह अपना कर्तव्य समझता था। वह जब भी बोलता सत्य बोलता और मीठी वाणी बोलता। बड़ों से जी लगाकर बात करता।
जब वह 18 साल का हो गया था तो एक नगर के एक घर में भयंकर आग लग गई थी तब राजकुमार ने जलते हुए घर में घुस कर के उस घर में रहने वालों को बचाया था। उसी समय राज्य के बुजुर्ग राजा ने अपने राज्य का राजा बनाने के लिए हाथी छोड़ा और जो हाथी पर बैठकर हाथी को लेकर महल में आयेगा उसको राज्य का राजा बनाया जायेगा यह घोषणा करवाई।
कोई भी नहीं बैठ पाया हाथी पर, किन्तु जैसे ही हाथी ने दयालु राजकुमार को देखा तो हाथी उसके सामने बैठ गया और राजकुमार को अपने ऊपर बैठा लिया। राजकुमार को महल में ले गया, वहाँ पर राजा ने राजकुमार का सम्मान कर उसको राजा बना दिया। फिर भी उसने अपनी दिनचर्या नहीं छोड़ी। उसकी प्रशंसा प्रजा एवं साधु-संत तो करते ही, स्वर्ग के देवता भी करते। दिनचर्या के नियम पालने से एक गरीब लड़का प्रसिद्ध राजा बन गया।
शिक्षा
- कभी भी किसी को चिढ़ाना नहीं चाहिए।
- कभी भी किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए।
- अपनी दिनचर्या बनानी चाहिए (कब क्या करना है उसका टाइम टेबल बनाना चाहिए) और उसका पालन प्रतिदिन समय पर करना चाहिए।
- दिनचर्या का कागज़ घर की दीवार पर चिपका कर प्रतिदिन सुबह पढ़ना चाहिए।
- दिनचर्या के कागज़ के आजू-बाजू कागज़ पर लिखना चाहिए- “मुझे प्रतिदिन समय पर दिनचर्या का पालन करना है क्योंकि मुझे महान् बनना है।” हम अपनी माँ की आज्ञा का पालन करेंगे क्योंकि माँ अच्छी होती है, महान् बनाती है।
अभ्यास प्रश्न
- राजकुमार ने कहानी सुनकर क्या विचार किया?
- राजकुमार ने क्या बनाकर कहाँ पर चिपकाया?
- राजकुमार ने दो अन्य कागज़ों पर क्या लिखा था?
- राजकुमार ने जो दिनचर्या बनाई थी वह लिखो?
- राजकुमार क्या करने को अपना कर्तव्य समझता था?
भगवान् महावीर
भगवान् महावीर जैन धर्म के अंतिम 24 वें तीर्थंकर थे। भगवान् महावीर का जन्म चैत्र शुक्ला तेरस के दिन राजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला देवी से कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। वे आत्मज्ञानी, दिव्यज्ञानी त्रिलोकी और निर्भीक थे।
उनके जन्म होते ही पिता के धन, वैभव, ऐश्वर्य, सुखशांति, आनंद में वृद्धि होने लगी थी। इस कारण उनका नाम “वर्द्धमान” रखा गया।
संजय-विजय नाम के दो मुनिराजों को तलवार के विषय में कुछ शंका थी, उन शंका का राजकुमार महावीर के दर्शन मात्र से ही समाधान हो गया तब उन मुनियों ने आपका नाम “सन्मति” रख दिया।
मदभंजन हाथी को राजकुमार वर्द्धमान ने एक क्षण में वश में कर लिया तब सबने मिलकर आपका नाम “वीर” रख दिया।
देव ने परीक्षा करने के लिए भयंकर नाग का रूप धारण कर लिया। निर्भय वर्द्धमान उसके फण पर पैर रखकर उतरे और उसे शुभंकर निर्दोष कर दिया, तब देव ने प्रकट हो नमस्कार करके “महावीर” नाम रख दिया।
देव ने परीक्षा करने के लिए अप्सराओं को भेजकर, हर प्रकार से तप से डिगाना चाहा किन्तु वर्द्धमान सुमेरु की तरह अडिग साधना में संलग्न रहे। देव ने आपका “अतिवीर” नाम रख दिया।
भगवान् महावीर ने विवाह नहीं किया। 30 वर्ष की अवस्था तक घर पर रहे। पश्चात् दिगम्बर साधु होकर घोर तपश्चरण किया। 12 वर्ष तक आत्मसाधना की। 42 वर्ष की आयु में ऋजुवाल (केवलज्ञान) की प्राप्ति हुई। ऋजुवाल 30 वर्ष तक सारे देश में समवशरण सहित विहार तथा दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश होता रहा। अन्त में 72 वर्ष की आयु में पावापुर से कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन निर्वाण की प्राप्ति हुई। भगवान् महावीर के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में दीपावली पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर प्रातः जिनामंदिर में भगवान् महावीर का पूजन करके निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं एवं संध्या को उनके प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, इस उपलक्ष्य में घर-घर दीप जलाये जाते हैं।
अभ्यास प्रश्न
- राजकुमार वर्द्धमान का जन्म कब हुआ था?
- राजकुमार वर्द्धमान के माता-पिता का नाम था?
- राजकुमार वर्द्धमान का नाम वीर किस कारण से रखा गया?
भोजन के नियम
भोजन जीवन का आधार है, आहार हमेशा मजबूत होना चाहिए। भोजन को मजबूरी, लापरवाही, अज्ञानता से नहीं करना चाहिए। भोजन करते समय हमारे विचार जितने अच्छे रहेंगे भोजन उतना सुपाच्य लाभकारी होगा। यदि हम भोजन को विधि पूर्वक ग्रहण करेंगे तो वह हमें स्वस्थ जीवन प्रदान करेगा। भोजन करने के निम्न नियम इस प्रकार है-
- अच्छी तरह हाथ पैर धोकर भोजन करना।
- मैले नाखून वाले हाथों से भोजन नहीं करना।
- हाथों को जीभ से नहीं चाटना।
- भोजन थाली से बाहर नहीं गिराना।
- भोजन की थाली स्वच्छ रखना।
- लालच के साथ भोजन नहीं करना।
- उतावली के साथ भोजन नहीं करना।
- चलते-फिरते भोजन नहीं करना।
- भोजन जूठा नहीं छोड़ना।
- भोजन करते समय खेल नहीं करना।
- अशुद्ध भोजन नहीं करना।
- भोजन अच्छी तरह चबा कर खाना।
- लेटे-लेटे भोजन नहीं करना।
- खड़े-खड़े भोजन नहीं करना।
- समय पर भोजन करना।
- पचवे लायक भोजन करना।
- मेहनत करके तुरंत भोजन नहीं करना।
- भोजन के बाद स्नान नहीं करना।
- बार-बार भोजन नहीं करना।
- बिना भूख के भोजन नहीं करना।
- साफ-सुथरे ढंग से भोजन करना।
- स्वच्छ बर्तनों में भोजन करना।
- भोजन के समय लड़ाई नहीं करना।
- सभ्यता से भोजन करना।
- भोजन के समय नखरे नहीं करना।
- अच्छी चीजें बार-बार नहीं माँगना।
- अपरिचित व्यक्ति का भोजन नहीं लेना।
- खाने की खास चीजों को जेब में नहीं रखना।
- जूठे आदि पहनकर भोजन नहीं करना।
- भोजन करते समय डकार नहीं लेना।
- भोजन करते समय बालों को हाथ नहीं लगाना।
- भोजन के पहले और अंत में भगवान् का स्मरण करना।
- भोजन के अंत में बनाने/परोसने वाले से कुछ मीठे शब्द बोलना।
- मुख के किसी वस्तु को बाहर निकालते हुए थू-थू की आवाज नहीं करना।
- भोजन करते समय चप-चप की आवाज नहीं करना अर्थात् होंठ बंद करके भोजन चबाना।
- भोजन के समय पुस्तक नहीं पढ़ना, टी.वी. नहीं देखना, रेडियो नहीं सुनना और गप्पें नहीं करना।
अहिंसक आहार
शिष्य गुरु जी अहिंसक आहार किसे कहते हैं?
गुरु जी बच्चों! जिस आहार को तैयार करने में हिंसा नहीं होती उस आहार को अहिंसक आहार कहते हैं।
शिष्य अहिंसक आहार हमें क्यों करना चाहिए?
गुरु जी अहिंसक आहार जैनदर्शन का मूल सिद्धान्त है। हमको अपने भोजन में कोई भी ऐसी वस्तु प्रयोग नहीं करनी चाहिए, जिसमें जीव हिंसा हुई हो अर्थात् नॉनवेज खाना, अण्डे, केक आदि खाना, शहद खाना एवं शराब आदि मादक पदार्थ पीना जैन दर्शन में महापाप माना गया है।
शिष्य नॉनवेज, अण्डा आदि तो हम नहीं खाते तो क्या हम अहिंसकआहारी हो जायेंगे?
गुरु जी नहीं। मात्र इतना नहीं खाने से कोई अहिंसकआहारी नहीं होता, उसके लिए और भी त्याग करना चाहिए।
शिष्य गुरु जी और क्या-क्या आहार में नहीं खाना चाहिए?
गुरु जी सड़े-गले फल, बाजार की चाट-पकौड़ी, होटल या हलवाई की अशुद्ध मिठाई, बिस्कुट, डबलरोटी (ब्रेड), विदेशी चॉकलेट, भरे विज्ञापन वाली खाद्य वस्तुएँ, बाजार की जलेबी, प्याज, लहसुन, गोभी, बैंगन तथा जमीन के अंदर पैदा होने वाली आलू, मूली, गाजर आदि सब्जियाँ नहीं खानी चाहिए। बेसन या दाल से बने हुए पदार्थों को दही के साथ मिलाकर (द्विदल) भी नहीं खाना चाहिए।
शिष्य अभक्ष्य भोजन करने से हमें क्या हानि है?
गुरु जी अभक्ष्य भोजन करने से अनेकों प्रकार के रोग हो जाते हैं इसलिए स्वस्थ और सुखी रहने के लिए सादा और शुद्ध भोजन करना चाहिए। जितने भी शरीर में रोग होते हैं वे सभी अशुद्ध भोजन करने से होते हैं।
शिष्य गुरु जी अहिंसक आहार का सम्बन्ध मात्र खाने पीने की वस्तुओं तक सीमित है या फिर कुछ और भी है?
गुरु जी अहिंसक आहारी मनुष्य को ऐसी सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएँ भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिनमें किसी पशु आदि के शरीर का कोई पदार्थ प्रयोग किया गया हो, जैसे चर्बी वाले साबुन प्रयोग में न लायें, हड्डी चूरा जिसमें मिला हो, ऐसे टूथपेस्ट उपयोग न करें। जिसमें जानवरों का खून मिला हो ऐसी लिपस्टिक न लगायें। रेशम बनाने में बड़ी हिंसा होती है, अतः रेशमी कपड़े का उपयोग न करें। चमड़े के जूते बेल्ट आदि प्रयोग न करें। अहिंसक आहारी व्यक्ति इन सबसे दूर रहता है।
जैन पर्व
पर्व का अर्थ पवित्र दिवस होता है अर्थात् वह मुख्य, विशेष या पवित्र दिवस, जिसमें श्रावक ज्ञान एवं सदाचरण के द्वारा आत्मशुद्धि या आत्मकल्याण करता है। अपने अधिक समय को धर्मध्यान, स्वाध्याय आदि में लगाता है।
जैन पर्व के मुख्यतः तीन प्रकार हैं-: 1. साधारण पर्व 2. नैमित्तिक पर्व 3. नैसर्गिक पर्व।
(1) साधारण पर्व - अष्टमी, चतुर्दशी, पंचमी आदि प्रतिमाह में होते हैं। प्रत्येक माह की अष्टमी, चतुर्दशी और पंचमी को नित्य पर्व भी कहा है।
(2) नैमित्तिक पर्व - जो महापुरुषों के निमित्त से होते हैं, वे नैमित्तिक पर्व कहे जाते हैं- जैसे-दीपावली, महावीर जयन्ती, रक्षाबन्धन आदि।
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दीपावली पर्व - कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की रात्रि के अन्तिम प्रहर में और अमावस्या के प्रातःकाल के समय अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था, वहीं सायंकाल के समय गौतम गणधर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए दीपावली को पर्व के रूप में मनाया जाता है।
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महावीर जयन्ती - महावीर जयन्ती पर्व चैत्र शुक्ला तेरस को भगवान् महावीर के जन्म महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
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रक्षाबंधन पर्व - रक्षाबंधन पर्व श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन 700 मुनियों की रक्षा, विष्णुकुमार मुनि ने की थी। विघ्न दूर होते ही प्रजा ने खुशियाँ मनाई और मुनिसंघ को स्वास्थ्य के अनुकूल आहार दिया, वैशाख मुनि को, बहनों ने इस पर्व की स्मृति में भाईयों की कलाई में रक्षा का सूत्र बाँधा। तभी से इस पर्व का नाम भारत वर्ष में रक्षाबन्धन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
(3) नैसर्गिक पर्व - जिनमें महापुरुषों की जीवन घटना का कोई निमित्त नहीं है परन्तु जो अनादि काल से चले आ रहे हैं, वे नैसर्गिक पर्व कहे जाते हैं, जैसे दशलक्षण पर्व, षोडशकारण पर्व, अष्टाह्निका पर्व आदि। ये पर्व भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में अहर्निश चलते रहते हैं।
1. दशलक्षण पर्व -
यह पर्व वर्ष में तीन बार माघ-चैत्र-भाद्रपद मास में आता है। परन्तु सामान्यतः यह पर्व भाद्रपद में ही मनाया जाता है। इस पर्व में आत्मा के उत्तम क्षमादि दश धर्मों/गुणों की आराधना की जाती है।
2. सोलह कारण पर्व -
प्रतिवर्ष सोलहकारण पर्व भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक मनाया जाता है। इस पर्व में सोलहकारण भावनाओं का चिन्तन किया जाता है। शास्त्रों में 16 भावनायें कही गई हैं। इन भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है। इस प्रकृति के उदय से समवशरण में अष्ट प्रातिहार्य रूप विभूति प्राप्त होती है।
3. अष्टाह्निका पर्व -
प्रतिवर्ष कार्तिक-फाल्गुन-आषाढ़ की शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा तक तीन बार आता है, जो बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व में नन्दीश्वर द्वीप में स्थित अकृत्रिम जिनालयों की देवगण पूजा अर्चना करते हैं। मनुष्य अपनी शक्ति की लघुता को ध्यान में रखकर यहाँ पर ही जिनमंदिर में नन्दीश्वर द्वीप और जिनबिम्ब की कल्पना कर पूजन क्रिया करते हैं। इन दिनों लोग प्रायः नन्दीश्वर द्वीप मण्डल विधान को पूजन करते हैं।
इन पर्व के दिनों में विशेष रूप से व्रत, नियम, संयम का पालन करना चाहिए तथा अपनी शक्ति के अनुसार एकासन-उपवास करते हुए आत्मा का चिन्तन करना चाहिए।
अभ्यास प्रश्न
- पर्व किसे कहते हैं?
- जैन पर्व के कितने भेद होते हैं?
- दीपावली पर्व क्यों और कब मनाते हैं?
- अष्टाह्निका पर्व वर्ष कितने बार आते हैं और कब-कब?
- हमें पर्वों में क्या करना चाहिए?
11 तीर्थंकरों के निर्वाण क्षेत्र
1. सम्मेदशिखर -
तीर्थराज सम्मेदशिखर भारत के सभी क्षेत्रों में सर्वोपरि माना जाता है। इस सर्वोपरि तीर्थ को सम्मेदशिखर, सम्मेदगिरि, सम्मेदशिखर व पारसनाथ पहाड़ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। अनादिकाल से अनंत तीर्थंकरों ने यहाँ से मोक्ष पधारकर इस तीर्थ को पवित्र बनाया है। यहाँ का कण-कण महान, पवित्र व पूज्यनीय है। इस भूमि के स्पर्श मात्र से मानव की आत्मा प्रफुल्लित होकर प्रभु के स्मरण में लीन हो जाती है। यहाँ की भूमि के कण-कण में निर्मलता तो है ही, यहाँ के वायुमण्डल में भी ऐसी अलौकिक शक्ति व गुण है, जिससे मानव अपने आपको प्रभु में खोकर पापों का क्षय करके महान पुण्यार्जन करता है। इस तीर्थ क्षेत्र की भाव भक्ति सहित वंदना करने से नरक और तिर्यंच गति नहीं होती। कहा भी है - “एक बार वन्दे जो कोई, ताके नरक पशु गति नहीं हो।”
वर्तमान में 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने यहाँ से मोक्ष पधारे हैं। पर्वत पर चौबीस टोंक व 2 मंदिर हैं, इनके अतिरिक्त चौपड़ा कुण्ड पर भी मंदिर है। मधुवन (समेत) पर अनेक जिनालय व धर्मशालायें हैं।
2. कैलाशगिरि -
कैलाश पर्वत प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान् का निर्वाण स्थली है। यहाँ पर भरत चक्रवर्ती ने 72 जिनमंदिर भी बनवाये थे। परन्तु वर्तमान में ये सभी बर्फ से ढके हुए हैं, जिसके कारण दर्शन करना संभव नहीं है। कैलाशगिरि चीन देश की सीमा में आता है।
3. चम्पापुरी -
भागलपुर स्टेशन के निकट चम्पापुरी सिद्धक्षेत्र है। यहाँ पर 12 वें तीर्थंकर वासुपूज्य स्वामी के पाँचों कल्याणक हुए हैं। बीस पंथी कोठी एवं तेरहपंथी कोठी की धर्मशालाओं में ही मंदिर व क्षेत्र कार्यालय स्थित है।
4. गिरनार जी -
गिरनार जी गुजरात प्रांत में जूनागढ़ के निकट है। जिसे ऊर्जयन्तगिरि भी कहा जाता है। इस पर्वत पर पाँच टोंक हैं - पहला टोंक में एक जिनालय है। दूसरी टोंक में मुनि अनिरुद्ध कुमार, तीसरी टोंक में मुनि शंभुकुमार, चौथी टोंक में मुनि प्रद्युम्न कुमार के चरण चिन्ह हैं और अंतिम पाँचवी टोंक में 22 वें तीर्थंकर नेमिनाथ के चरण चिन्ह हैं। अनेक अन्य मुनि यहाँ से मोक्ष पधारे हैं। भगवान् नेमिनाथ के तप, ज्ञान व निर्वाण, तीन कल्याणक इस पर्वत पर हुए हैं।
5. पावापुरी जी -
पावापुरी भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली है। भगवान महावीर यहाँ से कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के रात्रि के अंतिम प्रहर में निर्वाण को प्राप्त हुए। यहाँ वे पद्म सरोवर के मध्य में श्वेत संगमरमर का जैन मंदिर है। सरोवर में खिले हुए कमल अत्यन्त मनोहारी दृश्य उपस्थित करते हैं।
कहा जाता है कि प्रभु वीर का अंतिम देशना इसी पावन भूमि में हुई थी। अतः यहाँ का शुद्ध वातावरण आत्मा को परम शांति प्रदान करता है। पावन पर्व दीपावली मनाने की परम्परा महावीर भगवान् के निर्वाण दिवस से ही प्रारम्भ हुई।
दान
आहार दान का फल
भोगवती नगरी के राजा काममुष्टि की रानी विदुल्हना के गर्भ में पापी बालक के आते ही राजा की मृत्यु हो गई और राजा के नीकर सुकृतपुण्य के हाथ में राज्य चला गया। माता ने बालक को पूर्ण ज्ञान समझकर उसका नाम ‘अकृतपुण्य’ रख दिया और परायी मजदूरी कराकर उसका पालन किया। किसी समय वह बालक राजा सुकृतपुण्य के खेत पर काम करने के लिए चला गया। राजा ने उसे अपने स्वामी का पुत्र समझकर बहुत कुछ दान में दिया। उसने हाथ में आ ही ही दीनारे अंगारे गिने तब उसकी जानकारी इन्द्रजाल बने रहे, वे भी लोहे के बन गये। माता ने इस घटना से द्वेष होने दिया और सीमांतक गाँव के बलभद्र नामक जैन श्रावक के यहाँ भोजन बनाने का काम करने लगी। सेठ के बालक को खीर खाते देखकर वह अकृतपुण्य भी खीर माँगने लगा। तब एक दिन सेठ के लड़कों ने अकृतपुण्य को थप्पड़ से मारा। सेठ ने उक्त घटना को जानकर बहिन विदुल्हना को खीर बनाने के लिए सारा सामान दे दिया। माता ने खीर बनाकर बालक से कहा बेटा, मैं पानी भरने जाती हूँ, इसी बीच में यदि कोई मुनिराज आवें तो उन्हें रोक लेना, मैं मुनिराज को आहार देकर तुझे खीर खिलाऊँगी। भाग्य से सुदत्त मुनिराज उधर आ गये। बालक ने कहा मुनिराज! आप रुको, मेरी माँ ने खीर बनाई है, आपको आहार देंगे। मुनिराज के न रुकने से बालक ने जाकर उनके पैर पकड़ लिए और बोला अब कब के आओगे?
अब माता ने आकर षड्भाव कहकर विशिष्ट आहार दिया। बालक आहार देखकर बहुत प्रसन्न हो रहा था। मुनिराज अक्षीण ऋद्धिधारी थे। ऋद्धि के प्रभाव से उन दिन खीर का भोजन समाप्त ही नहीं हुआ। तब विदुल्हना ने सपरिवर सेठ जी को, अंतर सारे गाँव को भोजन करा दिया। फिर भी खीर ज्यों की त्यों
औषधि दान का फल
किसी समय मुनिसुव्रत योगिराज महल के पास एक गड्ढे में ध्यान में लीन थे। नौकरानी ने उन्हें हटाना चाहा। जब वे नहीं उठे तब उसने सारा कचरा इकट्ठा करके मुनिराज पर डाल दिया। प्रातः राजा ने वहाँ से मुनि को निकालकर विनय से सेवा की। उस समय नौकरानी नागरी ने भी पश्चात्ताप करके मुनि के कष्ट को दूर करने हेतु उनका औषधि से उपचार का पुण्य की भरपूर सेवा की। अंत में नौकरानी मरकर वृषभसेना हुई। जिसके स्नान के जल से सभी प्रकार के रोग-विष नष्ट हो जाते थे। आगे चलकर वह राजा उग्रसेन की पटरानी हो गई। किसी समय रानी के शील में आशंका होने से राजा ने उसे समुद्र में गिरवा दिया किंतु रानी के शील के माहात्म्य से देवों ने सिंहासन पर बैठाकर उनकी पूजा की।
देखो! नौकरानी ने जो मुनि पर उपसर्ग किये थे, उसके फलस्वरूप उसे रानी अवस्था में भी कलंकित होना पड़ा और जो उसने मुनि की सेवा करके औषधिदान दिया था उसके प्रभाव से उसे ऐसी विशेषता प्राप्त हुई कि जिसके प्रभाव से उसके स्नान के जल से सभी के कुष्ठ आदि भयंकर रोग और विष आदि दूर हो जाते थे। इसलिए औषधिदान अवश्य देना चाहिए।
शास्त्रदान का फल
कुरुमई गाँव के एक ग्वाले ने एक बार जंगल की वृक्ष की काटर में एक जैन ग्रंथ देखा। उसे ले जाकर वह उसकी पूजा करने लगा। एक दिन मुनिराज को उसने वह ग्रन्थ दान में दे दिया। वह ग्वाला मर कर उसी गाँव के चौधरी का पुत्र हो गया। एक दिन उन्हीं मुनि को देखकर जाति स्मरण हो जाने से उन्हीं से दीक्षित होकर मुनि हो गया। कालान्तर में वह जीव राजा कोहेश हो गया। राज्य सुखों को भोगकर राजा ने मुनि दीक्षा ले ली। ग्वाले के जन्म में शास्त्र दान किया था, उसके प्रभाव से वे मुनिराज थोड़े ही दिनों में द्वादशांग के पारगामी श्रुतकेवली हो गये। वे भविष्य में केवली होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। इसलिए ज्ञानदान सदा ही देना चाहिए।
अभयदान का फल
एक गाँव में एक कुम्हार और नाई ने मिलकर एक धर्मशाला बनवाई। कुम्हार ने एक दिन एक मुनिराज को उसमें लाकर ठहरा दिया। तब नाई ने दूसरे दिन मुनि को निकालकर एक सन्यासी को लाकर ठहरा दिया। इस निमित्त से दोनों लड़कर मरे और कुम्हार का जीव सूकर हो गया तथा नाई का जीव व्याघ्र हो गया। एक बार जंगल की गुफा में मुनिराज विराजमान थे। पूर्व संस्कार से यह व्याघ्र उन्हें खाने को आया और सूकर ने उन्हें बचाना चाहा। दोनों लड़ते हुए मर गये। सूकर के भाव मुनिश्रद्धा के थे अतः वह मरकर देवगति को प्राप्त हो गया और व्याघ्र हिंसा के भाव से मरकर नरक में चला गया। देखो! अभयदान के माहात्म्य से सूकर ने स्वर्ग प्राप्त कर लिया।
परोपकार
एक बुढ़िया थी। उसके लड़के का नाम राजेंद्र था। घर में बड़ी गरीबी थी। बुढ़िया ने कहा- पुत्र! बाजार में जाओ, पूछकर आओ कि अपनी गरीबी कैसे दूर हो? राजेंद्र गया। दुकानदारों से पूछने लगा। एक व्यापारी ने कहा- यहाँ से पचास कोस पर एक महात्मा रहता है, वह इस प्रश्न का उत्तर देने में समर्थ है। घर आया और बोला- माँ, मुझे आशीर्वाद दो, मैं जाता हूँ महात्मा जी के पास इस प्रश्न का उत्तर लेने। माँ ने खुशी-खुशी विदाई दी। वह चला। चलते-चलते एक गाँव आ गया। रात हो गई। उसने सेठ की हवेली में विश्राम लिया। सुबह जाने लगा तब सेठानी ने जानकारी ली। वह बोली मेरे भी एक प्रश्न का उत्तर ले आना- मेरी लड़की कब बोलेगी? राजेंद्र आगे बढ़ा। जंगल में एक साधु मिल गये। बातचीत हुई। साधु ने कहा- मुझे साधु हुए पचास वर्ष हो गये किंतु अभी तक साधुत्व का स्वाद क्यों नहीं आया? इस प्रश्न का भी उत्तर लाना। वह आगे चला- मार्ग में माली मिला। उसने कहा- इस वृक्ष के चारों तरफ कोई भी वृक्ष जड़ क्यों नहीं पकड़ रहा है, इसका उत्तर अवश्य लाना। राजेंद्र महात्मा जी के पास पहुँचा। नमस्कार किया और बोला- मैं कुछ प्रश्नों का उत्तर लेने आया हूँ। कृपा कीजिये। महात्मा ने कहा- इस समय एक साथ तीन प्रश्नों का उत्तर दे सकता हूँ, आगे सो पूछ सकते हो। राजेंद्र विषम समस्या में पड़ गया। प्रश्न चार हैं। आखिर अपना प्रश्न छोड़कर उन तीनों प्रश्नों का उत्तर लेकर वापस चला। माली मिला। राजेंद्र ने कहा माली! इस वृक्ष के चारों तरफ शहरों से भरे हुए चार कलश हैं। जब तक कलश रहेंगे, तब तक कोई भी दूसरा वृक्ष जड़ नहीं
काव्य
पकड़ेगा। माली ने वहाँ खोदा। चार कलश मिल गये।
माली ने आभार प्रदर्शित करते हुए कहा - राजेन्द्र!
मोहरों का यह कलश देह है। कलश लेकर वह आगे
चला। साधु मिले उसने कहा- महात्मा! आपकी छाती
में रत्न है। जब तक यह रहेगा, साधुत्व का स्वाद नहीं
आयेगा। साधु ने कहा- तुम उपकारी हो, यह लो रत्न।
राजेन्द्र सेठानी के घर पहुँचा। उसने कहा- आपकी
लड़की जब अपने पति का मुँह देखेगी, वह बोलने लग
जायेगी। अचानक वह लड़की बोल गई। राजेन्द्र को
देखते ही बोलने लगी। सेठानी ने कहा- इसके पतिदेव
आप ही हैं। राजेन्द्र का विवाह हो गया। लाखों का धन
लेकर राजेन्द्र रथ में धर्मलाभ सहित घर पहुँचा। माँ ने
पूछा पुत्र! गरीबी कैसे दूर होगी, उत्तर ले आया? पुत्र
बोला- माता जी, आपके आशीर्वाद से लाखों का धन
मिल गया और साथ में मेरा विवाह भी हो गया। उसने
आदि से अंत तक की कहानी सुनाई। वह अब ठाठ-
बाट से रहने लगा। गरीबी दूर हो गई।
जो व्यक्ति दूसरों का उपकार करते हैं, दूसरों का
भला करते हैं, उनका भला अपने आप हो जाता है
किन्तु परोपकारी संसार में विरले मिलते हैं। महापुरुष
पर- उपकार के लिये जीवन खपा देते हैं।
सप्त व्यसन
जो पापों में प्रवृत्ति करायें, उन्हें व्यसन कहते हैं अथवा किसी भी बुरी आदत में तल्लीन होने
को व्यसन कहते हैं। व्यसन सेवन करने वाला व्यसनी कहलाता है और लोक में बुरी दृष्टि से देखे जाते हैं।
व्यसन सात हैं- 1. जुआ खेलना, 2. मांस खाना, 3. मदिरापान करना, 4. वेश्यागमन करना,
5. शिकार खेलना, 6. चोरी करना और 7. परस्त्री सेवन करना।
जुआ खेलना
हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र के पुत्रराष्ट्र, पाण्डु और
विदुर ये तीन पुत्र थे। धृतराष्ट्र के दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए
और पाण्डु के युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव ये पाँच
पुत्र हुए। दुर्योधन आदि कौरव तथा युधिष्ठिर आदि पाण्डव
कहलाते थे। ये सब शासित ही राज्य करते थे।
कुछ दिन बाद कौरवों की पाण्डवों के प्रति ईर्ष्या
देखकर भीष्म पितामह आदि बुजुर्गों ने कौरवों और पाण्डवों
में आधा-आधा राज्य बाँट दिया किन्तु इस पर दुर्योधन आदि कौरव अशान्ति ही क्रिया करते थे।
किसी समय कौरव और पाण्डव जुआ खेलने लगे उस समय देव वश दुर्योधन से युधिष्ठिर हार गये
यहाँ तक कि अपना राज्य तक जुए में हार गए। तब दुर्योधन ने दुष्टता वश बारह वर्ष तक उन्हें वन में
घूमने का आदेश दे दिया और दुःशासन ने द्रौपदी को चोटी पकड़कर घसीटकर भारी अपमान किया
किन्तु शील शिरोमणि द्रौपदी का यह कुछ भी बिगाड़ न सका। पाँचों पाण्डव द्रौपदी को साथ लेकर
बाहर वर्षों तक इधर उधर घूमे और बहुत ही कष्ट उठाये। इसलिये जुआ खेलना महापाप है।
मांस खाना
किसी समय पाँचों पाण्डव माता कुंती सहित श्रुतपुर नगर में
एक धार्मिक के यहाँ ठहर गये। रात्रि में उसकी स्त्री का करुण
क्रंदन सुनकर माता कुंती ने कारण पूछा। उसने कहा- माता
इस नगर का बक नामक राजा मनुष्य का मांस खाने लगा था,
तब लोगों ने उसे राज्य से हटा दिया। तब भी वह वन में रहकर
मनुष्यों को मार मारकर खाने लगा। तब लोगों ने यह निर्णय
किया कि प्रतिदिन बारी-बारी से एक-एक घर से एक-एक
मनुष्य को देना चाहिए। दुर्भाग्य से आज मेरे घर की बारी है।
इतना सुनकर कुंती ने भीम को सारी घटना सुनाई।
प्रातःकाल में भीम ने उसके लड़के के बारी में पहुँच कर उस बक राजा के साथ भयंकर युद्ध
करके उसे समाप्त कर दिया। वह मरकर सातवें नरक चला गया जो कि वहाँ पर आज तक दुःख उठा
रहा है।
मदिरापान
किसी समय भगवान नेमिनाथ की दिव्यध्वनि से श्रीकृष्ण को
मालूम हुआ कि बारह वर्ष बाद शराब के निमित्त से द्वैपायन मुनि द्वारा
द्वारिका नगरी भस्म हो जायेगी। तब श्री कृष्ण ने आकर सारी मद्य
सामग्री और मदिरा को नाव के बाहर करालयों में फिकवा दिया।
अनंता बारह वर्ष बीत चुके हैं, उसे भक्तिवश कुछ दिन पहले ही
द्वैपायन मुनि द्वारिका के बाहर आकर ध्यान में लीन हो गये।
इधर सब यदु कुमारों ने वन क्रीड़ा में प्यास से व्याकुल होकर
कन्दराओं में संचित मदिरा का जल समझकर पी लिया। फिर क्या था,
वे सब उन्मत्त होकर आ रहे थे। मार्ग में द्वैपायन मुनि को देखकर
उन्होंने उपद्रव करना व वन्दना प्रारंभ कर दिया।
मुनिराज ने बहुत कुछ सहन किया। अंत में उनके क्रोध की तीव्रता से तेजस पुतला निकला और
धू-धू करके सारी द्वारिका को भस्मसात् कर दिया।
उस समय वहाँ का दृश्य कितना करुणाई होगा, उसका वर्णन कौन कर सकता है। मात्र
श्रीकृष्ण और बलभद्र ही वहाँ से बचकर निकल सके थे। देखो, मदिरापान से द्वारिका नष्ट हो गई।
वेश्या सेवन
चम्पापुर के भद्रदत्त सेठ और भार्या देविला के पुत्र का
नाम चारुदत्त था। वह सदैव धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने में
अपना समय व्यतीत करना रहता था। वहीं के सेठ सिद्धार्थ ने
अपनी पुत्री मित्रवती का विवाह चारुदत्त के साथ कर दिया
किन्तु चारुदत्त अपने पढ़ने लिखने में इतना मग्न था कि अपनी
पत्नी के पास बहुत दिनों तक गया ही नहीं।
तब चारुदत्त का चाचा रूदन अपनी भार्या की प्रेरणा से उसे गुरुगृह आश्रम में फँसाने हेतु एक
बार वेश्या के यहाँ ले गया और उसे चौदह खेलने के बहाने वहीं छोड़कर चला गया।
उधर चारुदत्त ने बसंतसेना वेश्या में बुरी तरह फँसकर कई करोड़ की सम्पत्ति समाप्त करके पर
भी गिरवी रख दिया। अंत में बसंतसेना वेश्या की माता ने चारुदत्त को धन रहित जानकर गाँव में सोते
समय उसको बाँधकर संडास में डाल दिया। सुबह नौकरों ने देखा कि सूअर उसका मुँह चाट रहे हैं
तब संडास से निकालकर उसको घटना सुनकर सब उसे धिक्कारने लगे।
शिकार करना
उज्जयिनी नगरी के राजा ब्रह्मदत्त शिकार खेलने के बड़े शौकीन थे। एक दिन वन में ध्यानाबद्ध दया मूर्ति मुनिराज के निमित्त से उन्हें शिकार का लाभ नहीं हुआ। दूसरे दिन भी ऐसे ही शिकार न मिलने से राजा क्रोधित हो गया और जब मुनिराज आहार चर्या के लिये गये तब उसने बैठने की पत्थर की शिला को अग्नि से तपाकर खूब गरम कर दिया।
मुनिराज आहार करके आये और उसी पर बैठ गये। उसी समय अग्नि सदृश गरम शिला से उपसर्ग समझ कर उन्होंने चारों प्रकार का आहार का त्याग कर दिया। उस गरम शिला से मुनिराज को असह्य वेदना हुई फिर भी वे आत्मा को शरीर से भिन्न समझ कर ध्यानार्ग द्वारा अष्टकर्मों का नाश करके अनन्तकृत केवली हो गये अर्थात् 48 मिनट में ही केवली होकर मोक्ष चले गये।
इधर सात दिन के भीतर ही राजा को भयंकर कुष्ठ रोग हो गया और अग्नि से जलकर वह मर गया और सातवें नरक में चला गया। वहाँ से निकल कर निर्बंध गति के दुःखों को भोगकर पुनः नरक चला गया। देखो, शिकार खेलने के कारण ब्रह्मदत्त को नरक जाना पड़ा।
चोरी करना
बनारस में शिवभूति ब्राह्मण था। उसने अपनी जनेक में कंठी बांध ली थी और कहता था कि यदि मेरी जिह्वा झूठ बोल दे तो मैं उसी क्षण उसे काट डालूँ इसलिये उसका नाम सत्यघोष पड़ गया।
एक बार सेठ धनपाल पाँच-पाँच करोड़ के चार रत्न उसके पास रखकर व्यापार करने चला गया। जहाज डूबने से बेचारा निर्धन हो गया। सत्यघोष के पास अपने रत्न मांगने आया तो सत्यघोष ने उसे पागल कहकर निकलवा दिया।
छः महीने तक उन सेठ को रोते बिलखते देखकर रानी ने चूंकि पूर्वक उसके रत्न वहाँ से मंगा लिये। राजा ने सत्य घोष के लिये तीन दण्ड कहे।
- गोबर खाना
- मल्लों के मुक्के खाना
- सब धन देना।
क्रम से वह लोभी तीनों दण्ड भोगकर राजा के भण्डार में सर्प हो गया तथा कालान्तर में अनेकों कष्ट उठाये।
परस्त्री सेवन
एक समय श्री रामचन्द्र जी, सीता जी व लक्ष्मण जी के साथ दण्डक वन में ठहरे हुये थे। वहाँ पर खरदूषण के साथ युद्ध में रावण जा रहा था, रास्ते में रावण ने वहाँ सीता को देखा उसके ऊपर मुग्ध होकर युक्ति से उसका हरण कर लिया। सभी के समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तब रामचन्द्र ने लक्ष्मण को साथ लेकर अनेकों विद्याधरों को सहायता से रावण से युद्ध ठान लिया। बहुत ही भयंकर युद्ध हुआ। अन्त में रावण ने अपने चक्ररत्न को लक्ष्मण पर चला दिया। वह चक्ररत्न लक्ष्मण की प्रदक्षिणा देकर उनके हाथ में आ गया। लक्ष्मण ने उस समय भी रावण से कहा कि तुम सीता जी को वापस कर दो। रावण नहीं माना तब लक्ष्मण ने चक्ररत्न से रावण का सिर काट डाला। वह मरकर नरक में गया। वहाँ आजतक असंख्य दुःखों को भोग रहा है।
आवश्यक कार्य- सभी छात्रों को सद्व्यसन के त्याग का नियम करना चाहिए।
अभ्यास प्रश्न
- व्यसन किसे कहते हैं? और ये कितने होते हैं?
- इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- शिवभूति ब्राह्मण का नाम सत्यघोष किस कारण से रखा गया?
- रावण आजतक कहाँ पर रह कर असंख्य दुःखों को भोग रहा है?
- बसंतसेना की माता ने चारुदत्त को विद्यागृह में क्यों डाल दिया?
चलें पाठशाला हम तुम
आओ बच्चों, आओ बच्चों, चलें पाठशाला हम तुम।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
पाप पुण्य क्या कहलाता ? स्वर्ग नरक क्या कहलाता?
किससे अधर्म धर्म बोलें हम ? सत्य झूठ क्या कहलाता?
सारे जग की सच्चाई को, सद्विक्षा पायेंगे हम ।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
क्या होता पूजन अर्चन से? क्या होता अभिनंदन से ?
क्या होता तीर्थयात्रा से ? क्या होता गुरु के वंदन से ?
वीतरागता क्या कहलाती? इसको पहचानेंगे हम ।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
विनय पिता-माता गुरुओं की, सेवा, दया, अहिंसा क्या?
क्या पापों का फल होता है ? जानो चोरी हिंसा क्या?
करनी का फल किसने पाया? ये जाने जायेंगे हम।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
कैसे हमको वस्त्र पहनना ? क्या हमको खाना पीना?
कैसे हमको बाल काटना ? कैसे यह जीवन जीना?
सदाचार की अच्छी शिक्षा, शीघ्र मुख्य पायेंगे हम ।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
क्या करें मनोरंजन हम, क्यों? करें टी.वी.देखें हम।
किससे जीवन स्वस्थ रहेगा? खेल कौन से खेलें हम ?
महत्त्वपूर्ण जीवन की जीवन, सम्यक्त्व पायेंगे हम।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
कैसी पुस्तक हमको पढ़ना ? कैसे मित्र बनाना है?
क्या? सीमाएँ हैं अपनी, कैसे गुरु अपनाना है?
नियम व्रतों का फल क्या होता? कैसे वे जानेंगे हम?
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
जैसे प्यारा हमको जीवन, और सुखी हमको बनना।
वैसे ही औरों का जीवन, दुःखी नहीं पर को करना ॥
रखो मित्रता सब जीवों से, सबको गले लगायें हम।
वहाँ मिलेंगे सद्गुण हमको, और धर्म सीखेंगे हम ॥
आओ बच्चों, आओ बच्चों, चलें पाठशाला हम तुम ॥
प्रार्थना
मिलता है सच्चा सुख केवल, भगवान् तुम्हारे चरणों में।
यह विनती है पल-पल छिन-छिन रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥
जिह्वा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे।
ये काम रहे, ये याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥1 ॥
चाहे काँटों पर ही चलना हो, चाहे छोड़ के देश निकलना हो।
चाहे जंगल या घर रहना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।।2 ॥
निशदिन मैं दीप जलाता हूँ, फिर भी मन में क्यों अंधेरा है।
प्रभु ज्ञानदीप हमको दे दो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥3 ॥
चाहे बैरी कुल संसार रहे, चाहे जीवन मुझ पर वार रहे।
चाहे मौत गले का हार रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥4॥
चाहे संकट ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अंधेरा हो।
पर मन न डगमग मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥5॥
भव सिंधु के प्रभु खिवैया तुम, इस भव से पार लगा दो तुम।
स्वीकार करो आरति मेरी, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥6॥
स्रोत: Gyata संग्रह।
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