श्री शील महिमा नाटक मनोरमा — शील (ब्रह्मचर्य) की महिमा को उजागर करता एक मंचन योग्य नाटक। शील-पालन के प्रभाव, प्रसंग व पात्रों के संवादों के माध्यम से उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की प्रेरणा। दस लक्षण पर्व (उत्तम ब्रह्मचर्य) के मंचन व बाल-संस्कार हेतु उपयुक्त।
Sheel Mahima Natak Manorama — a stage-worthy Jain drama on the glory of sheel / brahmacharya. Ideal Das Lakshan uttam brahmacharya natak for pathshala and cultural programs.
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नाटक का आरंभिक अंश
शील महिमा "नाटक
अर्थात्
सुखानन्द मनोरमा
[ प्रथमांक ]
( प्रथम गर्भाक )
स्थान-विजन्ती नगरीका राजभवन ।
(बीचमें सिंहासन है, दोनों ओर मन्त्री सेनापति बैठे हैं)
मन्त्री - (सेनाधोशसे) सेनाधीश ! आज महाराजको आनेमें
क्यों विलम्ब हुआ ?
सेनाधीश-महाराज विलम्ब क्या हुआ ? आज चतुर्दशो है,
अतएव देवपूजन इत्यादि नित्यकर्ममें अधिक समय व्यतीत हो गया
होगा। अब आते ही होंगे ।
मन्त्री - सेनापति ! देखो ! महाराजकी धर्ममें कितनी निष्ठा है
आठों पहर और चौसठों घड़ी धर्मध्यानमें और प्रजापालनमें व्य-
तीत फरते हैं। इसो धर्मके प्रतापसे आपको प्रजा सदैव सुखी रहतो
है और राज्यमें हमेशा सुख शांति रहतो है। सत्य है, जिस देशमें
शील महिमा नाटक
इस प्रकार धार्मिक नृपति शासन करते हों वहांकी प्रजा क्यों न
सुखी होगी ? क्यों सेनाधीश ! ठीक है न ?
सेनाधीश - निःसन्देह ! राजा धार्मिक और न्यायी होनेसे प्रजा
भी धर्म और न्यायमार्ग पर चलतो है। और जो पुरुष न्याय मार्ग
पर चलता है उसको स्वप्नमें भी दुःख नहीं हो सकता है। भला
फिर महाराजकी प्रजा सुखी क्यों न हो ?
(महाराज परमसेनका प्रवेश और मन्त्रीसेनाधीश
का खड़े होकर प्रणामकर बैठ जाना ।)
राजा - (प्रधान) मन्त्री ! देखो, आज चतुर्दशो है और राज्यके
सर्व कार्य बन्द रक्खो गये हैं, अतएव मेरी इच्छा है कि आज मैं
आपसे राजनीति श्रवण करू ।
मन्त्री- (हाथ जोड़कर) राजन। आप तो सर्वगुण सम्पन्न,
धार्मिक और न्यायी हैं। आपको शिक्षा देना केवल सरस्वतीके
आगे पण्डिताई करना है! फिर भी में आपका सेवक हूं। आपकी
आज्ञा पालन करना हमारा धर्म है। महाराज ! प्रथम तो नृपतिको
उचित है कि अपनी प्रजाका पुत्रवत पालन करे, प्रजाको योग्य
शिक्षा दे, देशके विद्वानों को ऊंचे २ पदों पर नियुक्ति करे । प्रत्येक
कार्यका स्वयं अवलोकन करे। जो नृपति प्रनाके दुःख सुखको
अपना दुःख सुख समझते हैं, जिन्हें रात्रि दिवस प्रजा पालन हो
की चिन्ता लगो रहती है और जो सदैव न्याययार्ग परे चलते हैं
वे सोधे देवलोकको गमन करते हैं। राजन, यह राजनीतिका कथन.
शील महिमा नाटक
है इसमें यदि इस दासकी कुछ भूल हुई हो तो क्षमा करें। और
कहा भी है किः-
दोहा-दुख सुख परजाको लखे, सुत सम पाले ताहि ।
धर्म न्याय सबको करे, राजा कहिये ताहि ॥
निशिदिन परजाको लखे, नीति-अनीति विचार ।
जो जाको अपराध तो, तैसो करि निरधार ।।
राजा - (मन्त्रीसे) प्रधान जी ! तुम्हारा कथन यथार्थमें, सत्य
है। आशा है कि जिस प्रकार तुमने राजनीति वर्णनकी उसी प्रकार
राज्यकी व्यवस्था कर रखो होगी। भला ! आपने राज्य प्रबन्ध
किस ढंगसे किया है उसका वर्णन तो कीजिए ?
मन्त्री - (विनय पूर्वक) राजन! राज्य प्रबन्धके विषयमें क्या
वर्णन करूं ? सारा प्रबन्ध अलग २ भागोंमें विभक्त किया गया है।
प्रत्येक विभागमें एक २ मन्त्रीं और उसके आधीन फई २ उपमन्त्री
नियुक्त हैं। सब विभागोंकी देख-रेख स्वयं में फरता हूं। प्रत्येक
नगरमें न्यायालय स्थापित है। गरीब-अमीर सबके साथ न्याय-
पूर्वक वर्ताव किया जाता है। भूखोंको आहारदान, वस्त्र दीनोंको
वस्त्रदान, गरीबों को विद्यादान, रोगियोंको औपपदान और भयपी- …
यह केवल आरंभिक अंश है — पूरा नाटक ऊपर दी गई PDF में उपलब्ध है