शार्दूल राह निराली
धार्मिक पहेलियाँ -
१) एक अक्षर का मेरा नाम, मैं हूँ रत्न समूह का धाम।
जन जन करते मेरा ध्यान, पुरे जिनागम का सार ।। ओम ॐ
- ओंकार
२) दो अक्षर का मेरा नाम, सबको बताता मुक्ति मार्ग।
कितना सुंदर है मेरा नाम, बोलो क्या है यह काम।
- सिद्धचक्र
३) तीन अक्षर का मेरा नाम, शुद्धात्म का मुझमें धाम।
कुन्दकुन्द ने मुझे बनाया, बताओ जल्दी मेरा नाम ।।
- समयसार
४) दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ मुक्ति के काम।
ध्यान करते जो सब बनभक्ति, उन सब का घर बन जाऊँ ।।
- धर्म
५) तीन अक्षर का मेरा नाम, चारगति में मेरा धाम ।।
झूठा श्रद्धा मेरा काम, संसारो मुझे न परेशान ।।
- मिथ्यात्व
६) मुझे कवि ने खूब ऐसा, बोलो मेरा रूप है कैसा।
पुद्गलों का माना मेरा, तीन लोक को मैं वश में करता।
- परिग्रह
७) मननशील कहलाता हूँ, चारो गति में जाता हूँ।
मैं नाम धारण करता, धर्म पुरुष भी माना हूँ ।।
- मनुष्य
८) तीन अक्षर का मेरा नाम, मुझमें चलता है संसार।
जिसने मुझे खूब जोड़ा, उसका करता हूँ मैं सार ।।
- आश्रव
९) ३ अक्षर का मेरा नाम, आत्मा है रहने का काम।
मुझसे बड़ा कोई न जग में, नाम बताओ मेरा भाई।।
- आकाश
१०) चार अक्षर का मेरा नाम, सबको बताऊँ मुक्ति मार्ग।
ज्ञान ध्यात सब व्यापार, मुक्ति रात का मैं तेवार।।
दिखने में लगता कंकाल, फिर भी हूँ मैं मालामाल।।
- मुनिराज
११) चार अक्षर का मेरा नाम, तीर्थंकर में मेरा नाम।
अहिंसा धर्म को मेरा बन जाये, मोक्ष का घर कहलाये।।
- महावीर
१२) पूर्व वित्त में विद्यमान है, भरत क्षेत्र में है मुझगाम।
केवल ज्ञान के धारी है वो, बोलो भाई इनका नाम।।
- श्रीधर स्वामी
१३) ३ अक्षर का उनका नाम, इन्द्रभूति उनका नाम।
निगम में उनका काम, द्वादशंग है उनका धाम।।
- गौतम गणधर
१४) तीन अक्षर का मेरा नाम, श्रमणों का पर्व बन।
मुझमें लोक आलोक झलकन, मैं हूँ अनंत गुणों की खान।।
- सर्वज्ञ
१५) चार अक्षर का मेरा नाम, छः खण्डों में मेरा धाम।
जीव द्रव्य का मैं बलवान, मुझको कहते दौलत राम।।
- सरलार्थ
१६) दो अक्षर का मेरा नाम, चारो गती में मेरा काम।
छहः गौण काल में जन, चेतनता जो मेरा नाम।।
- मन
१७) चार अक्षर का मेरा नाम, मेरा नाम है बड़ा महान।
प्रथमा योग की कथाओं में, मेरा ही बस दिखा है ज्ञान।।
- दर्शन आचार्य
१८) दो अक्षर का मेरा नाम, बाह्य विभूति मेरा काम।
बाहर स्वभाव मुझमें लगता, भरि बताओ मेरा नाम।।
- समवशरण
१९) पाँच अक्षर का मेरा नाम, ज्ञान का जानत मेरा काम।
मैं रहता हूँ अपने अंदर, पर मैं दुनिया भर में सर।।
- केवल ज्ञान
२०) एक पुरुष निजवर ने देखा, पाँच प्रकार खड़ा हुआ।
पद्म कर का रस बनभक्ति, उन सब का घर बन जाऊँ ।।
- त्रिलोक
२१) कर्म बंधन का मत मेरा, गुणस्थानों का मुझमें नाम।
त्रिलोक आदि का वर्णन कहा, बोलो भाई तुम मेरा नाम।।
- करणानुयोग
२२) आत्म ध्यान का, सातम् ध्यान, मोक्ष में रम जाता आत्म ध्यान।
अष्ट कर्म को करता घाता तो रहता है महात्मा ज्ञान ध्यान।।
- द्रव्यानुयोग
२३) मुनिराजों की बात बताता, वीतरागता का दृष्टा।
महापुरुषों का ज्ञान बताकर, वीतरागता का दृष्टा।।
पुण्यबंध की मैं करवाता, नाम बताओ क्या कहलाता।।
- प्रथमानुयोग
२४) क्षण-क्षण जो देखा ज्ञान, सम्यक् बताता है।
जिसने मुझे खूब जोड़ा, उसका करता हूँ मैं सार ।।
- जिनवाणी
प्रश्नोत्तरी
- आठ अक्षर का मेरा नाम, नौखण्डों का मुझमें धाम।
मैं स्वयंमें संपूर्ण हूँ, पर कहलाता लब्धि हूँ।।
- लब्धि
- निगोद से लेकर मुक्तिपुरुषों, मैं हूँ मार्ग बनाता हूँ।
छोरा सम्यग्दर्शन से नाम से मैं अपना परिचय पाता हूँ।।
- छहढाला
- रत्नों का राजा कहलाता, तीर्थंकर का वचन कहाता।
जिन्हें उधना सहस्र यत्न, कीजे उसका नाम बताओ।।
- मोक्षमार्ग
- रादगोलो से बनी हुई है कंठली कन्या मेरा नाम।
जो भी मेरा आश्रय लेता वह बन जाता है भगवान।।
- जिनवाणी
- एक भूतनी हमने देखी, नासिन-डैना उसका नाम।
बत्तीस कुल कहे सहयोग, रहती एक फूंक के धाम।।
- नीम
- दृश्यों का ज्ञान कराती, नव तत्वों को भी बतलाती।
ज्ञानकात मय नाम बताओ, ध्यानाद मेरी अपनाती।।
- जिनवाणी
- एक नागिन का ऐसा कारणो, धन कुछ जहर खाती है।
गृहस्थ के वह वश में रहती, धर्म नष्ट करवाती है।
- रत्नत्रय
- चार अक्षर का मेरा नाम, चेतन का क्या मुझमें काम।
मुझमें शामिल हुआ हेराम और तुम मैं मेरा नाम।।
- मिथ्यात्व
- मैं सबको खासकर उपादेयी, सबकी शुद्ध शांति हर लेती।
मैं हूँ साकुलता की माता, मेरा नाम साकुलता है धाता।।
- कषाय
- दो अक्षर का मेरा नाम, परिणमन का है वो धाम।।
पूरे जग में रहता हूँ, मैं कषायों द्वारा आता।।
(फिर भी मैं बलवान)
- कालद्रव्य
- विश्व के शिखर में है मेरा नाम, उसके सोहमूजा फाकसाता।
जो मुझमें भत्था हो जाता, वोरा वश में उच्च सुहाता।।
- क्रोध
- हितकारी अति सिद्धान्त, तीन जगत का इष्ट है।
जिनवाणी कहलाती है, मोक्षमार्ग बतलाती है।।
- दिलबदनी
- हल्का मुक्तिमार्ग बनाती, तीर्थंकर का मुख वो दिखती।
छह अक्षर का मेरा नाम, बोलो बच्चों मेरा नाम।।
- दिलबदनी
- मैं हूँ सब पाले का बाप, नाम बतायें मेरा आप।
सारा जग मेरे आश्रित, सब कुछ है मुझ पर अर्पित।।
- लोभ
- एक नागिन का ऐसा कारणो, धन कुछ जहर खाती है।
अनाचारी का जना हूँ, तोषाय का मेरा नाम।।
- तिर्यंचगति
- आठ अक्षरों मेरे चार आते, सात घरों में ते दाब पाते।
वित्त वित्त सह दस के बाद, मुझ पास की बात समझा।।
- नरकगति
- सुख का पूरा नाम है, पन्नामाधि की ग्राम है।
शिक्षा का तो धाम है, पंडित का क्या काम है।।
- मोक्ष
- ऐसे शाश्वत पर्व बताओ, महीने में आते दो बार।
संयम समता भाव जगाता, शिक्षा है अपना उदाहरण काम।।
- अष्टमी, चतुर्दशी
- गुरु को आता में रहते हैं, स्वाध्याय मन नित करते हैं।
द्रव्य गुण के दाता गुरु, सब का शिक्षण वह देते हैं।।
- स्वाध्याय
- चौराहा पालन करते हैं, बारिश को वह जीत रहे हैं।
ऐन सदा पद की श्रेणी में, उनको सब परिणाम रहे हैं।।
- माधु
- काम किसी के योगी का नाम, पर अपना साहित्य बनाता।
उसका हम स्वीकार रहे हैं, पर कर्ता नहीं मान रहे हैं।।
- निर्मल
- ज्ञान दान तप तीन सुविचार, भरणो बताने आता।
ज्ञान ने आचार्य हराया, विनिताय उपदेश द्वारा था।।
पर मुक्ति का है सर्वश्रेष्ठ का, दोनों का उपदेश दिया था।।
- दर्शनचारित्र
- चार अक्षर का मेरा नाम, चेतन का नहीं नाम विश्राम।
हमेशा आश्रित हुआ हेराम, सारा जग है मेरा धाम।।
- पुद्गल
- दो अक्षर का मेरा नाम, चेतन का क्या मुझमें काम।
करने का कुछ काम नहीं, द्रव्य का नामसे नाम नहीं।
- मिथ्यात्व
प्रश्नोत्तरी
- ऐसा शाश्वत पर्व बताओ, तीन बार वर्ष में आता।
चौरासी समता भाव जगाता, शुभ अचल का वह मन भाता।।
- दशलक्षण पर्व
- दो अक्षर का मेरा नाम, बिना कमाये हो हराम।
लोग अगर मुझको कहते हैं, अमृत पीने का है काम।।
फिर भी मर जाता हूँ मैं, व्यर्थो रहता हूँ बेकाम।।
- देव
- निरतिचार, नीति की प्रतिमा, श्रुति शिखामय बनगर।
अनाद्यंतन की चतुष्टय शक्ति, नाम होठ का रोहन करगर।।
- सिद्धदर्शन
- जिनको होता केवलज्ञान, चार अक्षर में आते नाम।
पहले दो अक्षर बताते गुरुवर, अन्त के अक्षर राग तान।।
- वीतरागी
- शुद्ध सुते हो लगे जवाब, जैन तीर्थ है बड़ा शुध्द।
बेबेचण्ड में ये चार सात, तीन अक्षर में पूरा नाम।।
- बेधड़जी
- बेदेवलखण्ड का तीर्थ महान, तीन अक्षर का उसका नाम।
कुंभ नगरी में नित्य समाधि, मिलता है जिन्हे सिद्ध सोपान।।
- आहार जी
- चार अक्षर का पूरा नाम, जैनत्व है जिन भगवान।
पहले दो अक्षर कहे सुज्ञान, अंत के अक्षर स्वामी यान।।
- आदिनाथ
- धीमा बोलो कम प्रमाण, उल्टा करो का नमन।
कष्ट हरण दानवीर मेधावी, घुमा फिर कर बताना नाम।।
- मान
- पाँच अक्षर का पूरा नाम, एक देवता ऋषि महान।
यदि काट दे आदि अंत बने वह वह बहुत सुजान।।
- देवस्तुति
- तीन अक्षर का पूरा नाम, डैला सीधा एक समान।
माता हु सुकने के काम, बताओ बंधुओ मेरा नाम।।
- नमन
- जैन धर्म में श्रेष्ठ विचार, दीन-दुखी पर रखना प्यार।
उल्टा कर दु मेरा याद, ऐसा धर्म झुकाऊँ साथ।।
- दया
- पाँच अक्षर नाम मनुष्य, सब कोई वेष बहु रूप।
मध्य करे से शेष होवे, पानी वाक्य उनसे लो।।
- जलविहार
- मैं एक वृक्ष का हूँ मेरा स्थान है डाते सदा सर नार।
इस समय में छायामय आप, ज्ञानवान सबको बोध।।
- वृक्ष
- दो अक्षर का ऐसा नाम, अरे कल्पना आप समान।
उल्टा कर दो अच्छा सोच, चलो जगत में सबको होय।।
- लाभ
- चार अक्षर का पूरा नाम, जैन तीर्थ है बड़ा महान।
दो अक्षर जो पर्वत जाये, शेष अक्षर में तरी मान।।
- गिरनार
- चार अक्षर का मेरा नाम, 8 दिन तक जले निवार।
कोई राजा हुआ था ठीक, बताओ बंधुओ ठीक।।
- रीछचक्र
- तीन अक्षर का मेरा नाम, सुबह बैठक मेरा काम।
होता है पूजा के काम, था माघ में मैं विराम।।
- चंदन
- चार कर्म हो दूर रहते, चार कर्म पास में रहते।
रोहीवाली कभी न खावे, हम का उसका महिमा गाते।।
- अरहत
- सीमंधर के पास गये थे, जिनको संप्रभवी नये थे।
जो समभाव पूजा के धारी, जिन महान साधु थे वे।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
- सब देवों वैराग्य बताया, भेदक जिसके मुँह मरकमाया।
शांति भावों स्वांत लाभ, चरण कमल से पूज हुमा था।।
- पूज्यपाद
- शुद्ध ज्ञान का नाम नहीं है, रागद्वेष का नाम नहीं है।
परमोदारिककाया उनकी रहे, जगत और ध्यान कहीं है।।
- अरहत
- सिद्ध सब को प्राप्त कराव, हर में तो वैरागी कहाव।
सत्यभूत में के बलवान, ऐसे विरागी का नाम बताव।।
- भरत
- महिमा जितनी हुई हमी है, मित्रता की मिसाल बड़ी है।
तुमोगिभ में माघ प्रचार, ऐसे साधु का नाम बताव।।
- सुग्रीव
- समय संग में जो जन्मे थे, नित्य पूजन का नियम लिये थे।
उत्तमगिरि में माघ प्रचार, ऐसे मुनि का नाम बताव।।
- कुंभकर्ण
प्रश्नोत्तरी
- ऐलक जी एक नग्न है साधु। दीक्षा का जब भाव जागे।
पिता गुरु के शिक्षा यथा, भेष सहज धारण कर पावे।।
- आ. मायावी
- स्याद्वाद की तो निशानी, सिद्धान्त की है ख्यानी।
अनेकान्त का रूप बताओ, सम्यक् तरंग मन में जगाओ।।
- जिनवाणी
- स्वर्ग से तलवार देव जो आये, विद्याधर नाम का रूप बनाये।
जैसे पारस और की वो, नामे वर्धमान धर्म बताया।।
- संगम देव
- भाव खाये पाप करना, भाषा नहीं किसी की करना।
अन्य लोग सब मिल जाते है, आगे अंत ही हो जाता है।।
- उपादानकाल
- मैं तो सो में दस बहुत हूँ, दुखों का यहाँ खजाना है मैं।
सिखकर हो मुझसे जानो, लक्षणों तुम मुझे पहिचानो।।
- हठ
- वो अक्षर का मेरा नाम हो, दुखों के दाता काम।
अक्षरों गति ये चलते है, चलते है फिर वो मेरा नाम।।
- धर्म (हठ)
- भावों की साधुनी देकर, जिसने अपना भार बचाया।
नेम धर्म को रक्षा करके, जग में अपना नाम कमाया।।
- निकलंक
- मोक्षमार्ग का नेवारे, एक हुआ परिग्रह नामो।
उपदेश का तुम नाम बताओ, नहीं लगे तुम बतावो।।
- विद्यावली
- ऐसा तुम स्थान बताओ, जहाँ जीव का आता जाना।
आते है अपने भावों से, जाते भी अपने भावों से।।
- वात्सल्य
- पृथ्वी ही जिसका शरीर है, केवल पत्थर जिसके नाम।
श्रावका का एक भेद है, बोलो मेरा उसका नाम।।
- पृथ्वीकायिक
- सिंह सिंह कहलाता है, जिनका बालापुर में निवास महान।
नमस्कार करता प्रकृति को वर्तमान का शासन जान।।
- महावीर
- कुछ राग की प्रथम रिता है, कहते जिसे धर्मों का भला।
हिम इसके जो भेद छब्बी है, इसके सहित सदा अनुभव।।
- सम्यग्दर्शन
- जिसके कारण जीव घूमता, विष के कारण होते पाप।
मिथ्यात्व तीन चारित्र है दुखे, जो सब भावों का बाप।।
- मिथ्यात्व
- श्रावक सीधे चलते है, मोक्षमार्ग सुनते जीव।
बीस तीर्थंकर मोक्ष पधारे, तीर्थंकर जाते है सदीव।।
- सम्यग्दृष्टि
- 66 दिनों तक मौन रहे, समवशरण का इन्तजार किया।
इस भांति भगवान आता जो जीवों का उद्धार किया।।
- महावीर
- तीन लोक को राही सात है, धर्म में भी माने सात।
जो भी उसका आश्रय लेता, कालांते बनता केवल ज्ञान।।
- वीतरागता
- ऐलाचारी जिसे कहते है, कलिकाल स्वर्गत महान।
पांच समभाग जिनको देखकर, पहले से होता है कल्याण।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
- चारों को मिलाया जिसने, फिर भी चारों के साथ।
नाह समर का नाम है उनका, नाह जानते जिनके साथ।।
- अरहंत
- 357 धुन है जिसमें संस्कृत में है, सहता ग्रंथ।
इस अध्यायों में विभक्त है, कहलाता है मुक्ति का ग्रंथ।।
- तत्त्वार्थासूत्र
- तीन अक्षर का मेरा नाम, स्थिर सहकार की तुलना है।
अति दुनिया चलकर करती, इन्द्रिय करती मेरा नाम।।
- अधर्म (हठ)
- श्वेता का पुरुषों की बात बताना, जिन वीतरागता का ही दर्शन।
मनुष्यों को बात बताकर, पुण्य बंध को करवाना।।
- प्रभावाचार्य
- ज्ञान नहीं प्रदान नहीं, सुख या दुख भी ज्ञान नहीं।
कौन भाई है मेरे जग में, मोह यह भी रहता मुझमें।।
- अजीव
- मोक्षमार्ग के दास गाये जो, उत्तम सद्भाव शब्द बने।
वज्र का हुआ के देव कहलाये, उनका नाम बताओ मेरे।।
- आ. कुन्दकुन्द
- एक प्रभु है साधन मेरा, सम्यग्दर्शन हुआ भारी।
सबको शिवपुर में ले आता, कर्मों पर है शाश्वत डाला।।
- संवर
काव्य
97 भक्ति सब की प्रथम सहेली, तब है मुझमें सम ज्ञान।
कर्म दहन की शक्ति मुझमें, बोलो क्या मेरा नाम।।
- निर्जरा
98 वो अक्षर का मेरा नाम, नरकों में है मेरा धाम।
मुझको जो अपनाता है, वह नरकों में जाता है।।
- पाप
99 सात अक्षर का मेरा नाम, पंचभावों में आता नाम।
जो शोध तो ज्ञातभाव, सदा काल है मेरा धाम।।
- पारिणामिकभाव
100 जो जीवों को दुःख देता है, वह मुझको प्राप्त करता।
मैं बेचारा नरकों बीच, मुझमें है पापों का बोझ।।
- हिंसा
101 अल्प रूप से मैं विवरित, अताला से मेरी जोत।
मुझको जो भी करता है, वह नरकों में चल जाता है।।
- शुद्ध
102 सात भागों का सात डब्बों, सबको मैं पहुँचाती नेज।
सबको वंदनाएँ करवाती, बतलाओ क्या वह खेज।।
- सारी
103 चार का बचाव है जिसने, तीन भावों का है पुज।
सात को गँवाया जिसने, पर जिनधर्म को किया मजबूत।।
- त्रिकालक
104 सात बन गया पुरुषों का सार, पड़ा लायक मन में सवार।
सात बताया दस धर्मों का, कर्म छिपाए भागे अपार।।
- सत्य धर्म
105 आत्म शब्द जब आता है, विशेषण से तेरा नाम।
नारद वशिष्ठ भारी है, बतलाओ तुम मेरा नाम।।
- मुकुंद कुंद
106 स्पष्ट वर्ण की उम्र थी चार, उनमें जिनदीक्षा धारो।
कुंद था तो चार था, परमागम्न त्यागदारो।।
- कुंदकुंदाचार्य
107 पाँच भाई पृथक कहवाते, तीनों बाल उन्हें हैं खाते।
जो उनको आर्ष निरखते, पाप हो मुक्त वे हो जाते।।
- पंचमद्धि
108 एक ऐसा मनुष्य देखा, खाता है ना पीता है।
अमृतमयी नहीं पीता है, फिर भी अनंत काल तक जीता है।।
- सर्वज्ञ
109 एक गया, दो गया, तीन गया रे।
चार गया किंतु सात रहा रे।।
- अरहंत परमेष्ठी
110 धोबी धोबन से स्पष्ट कहे, धोबी मैं तो बड़ोबा।
फिर भी मुनि को दिया आहार, भक्ति उस की अवरपार।।
- चंदनबाला
111 दोनों भाई जुड़वा आये, बलिग का देख वे सब पाये।
कुंदलगिरी से मोक्ष पधारे, तुम भी उनकी भक्ति संभालें।।
- नेमिभूषण-कुलभूषण
112 दोनों के बीच हुआ पंगा, बुंदेलखंड की बात बतावे।
दुष्ट के उत्तर नहीं बतावे, जिला टीकमगढ़ में ही कहावे।।
- आहारजी
113 एलाचार्य भी जो करावे, सिद्ध विधि को प्राप्त करावे।
अध्यापक भी उनको पूजे है, महिमा उनकी खूब धूनी।।
- कुंदकुंदाचार्य
114 ऐसे गुरु का नाम बताओ, उनका भविष्य सबका सजाओ।
सिद्ध फटी चोट सहनी पड़े, सम व्याधि से जो वे न डरे।।
- समंतभद्र
115 साधुनी ने घर में निकाला, पिता जी ने भी खूब को भगाया।
22 बरस तक वियोग में जाने वह कौन संयाग।।
- अंजना
116 एक सती थी चंदनबाला, सेठानी ने कैद में डाला।
नाम बताओ सेठानी का, जिसने चंदनबाला को सताया।।
- सुभद्रा (भद्रा)
117 काशी नगरी की बात सुनाओ, सब ने उनको बहुत सताया।
पाखंडी का झंडा फोड़े, नाम जो उनका थोड़ा जाड़े।।
- समंतभद्र
118 विशभों भक्त तुमने किया था, बिलबहार रतन था था।
बेटे का जो हरण उठाया, शक्ति में मन जो खूब लगाया।।
- धनंजय
119 रूप ने उनको पीड़ा पहुँचाई, इतने सारे शत्रु की गाई।
ध्रुवों ने भी महिमा रचाई, ताले डटे सभी सिधाई।।
- आ. मानतुंग
120 भट्टारक के भाई बनाते, जैनों में जैनाचार्य कहाते।
जो लोग शोध तो ये लेखक, उनका पूजन हम सब ध्यान।।
- आ. शुभनंद
प्रश्नोत्तरी
121] डारम नगरी जिसने बसाई, भूमि पे नगरी फिर वो बिछाई।
महायुद्ध में नाम जो आया, लीला में जो वो डराया पावे।।
- भीष्म
122] मेरा नीरव सेवाहोप्यारा, राजस्थाम में जो है न्यारा।
झेलझम मित्र सगम करावे, माधोपुर मेला में आवे।।
- महावीजी
123] ऐसे गेट का नाम बताओ, जिससे कभी न कोई घुसता।
बता है ऐसी का जो, रंग है जिसका उजला-उजला।।
- कोलगेट
124] ऐसे लोक का नाम बताओ, हिन्दुस्तान का बेटा है जो।
वह है जिसकी स्वतन्त्रता की भरी हुई है जिसने वर्षों।।
- लोकदेव
125] कोमश पंडित है वह, जिसके बनने में कई वेद करते।
उस पालिस का नाम बताओ, शाम बनाकर ऐसा पाया।।
- नेलपोलिस
126] बिलों का रंग वो है जो इतना कीजो कारस जिसने मिलता।
दोनों चुने दामों पर मिलता जो की लगाये चमड़ी मलने।।
- क्रीम
127] धर्म बल और चुने सवाल, बोल और वोपर या निजला।
जिनो तमगुणों को कटवाने, जिससे बनता शाम बतावे।।
- तमडा
128] जिसमें है कोई रक्षा ना, उसके मकान में मत फँसा।
भूखी वाले बनाये बुद्ध, लेकिन उसका खाद न वचना।।
- रचना
129] मौत का है पैगाम वो लाती, अपनी गलती मुझे बताती।
हुए में तेरे निकादीन है, बोलो सो में क्या कहलाता है।।
- पिंजर
130] दादाजी का हूँ मैं कलेजा, बेकिंग करते हो मैं बनता।
मुझे मारकर काटे मुझको, मीठा मीठा खाए मुझको।।
- केक
131] पति में यह टेढ़ी लगती लेकिन सुबह के मख ले बनती।
कालीबहादुर पिता हुआ है, मात विदेशी कब हुआ है।।
- पेप्सी
132] अन्य दिलसपर काम में आती, लेकिन गोरख से है साला।
जो भी आये बोल डराये। बेचनेवाला मौज उड़ाये।।
- रॉकी
133] एक रोज का नाम यहाँ था, दीक्षाग्रहण छेद किया था।
बिल्लों को जो बचाने वाले, वह अभिषेक बचाए किया है।।
- आ. माघनंदि
134] श्वेत वस्त्र दामोदार सुनाए, कुल को जो है वो बनाए।
माया सुन्दर चरम लखेरी, वैरागी के साथ कुमारी।।
- जीवन्दर कुमार
135] शब्द डर तुम कर आया, विज्ञानवादी यह बताया।
पर्वत पर हुए वाले पिराए, उपदेशन का नाम बनाए।।
- कैलाशपर्वत
136] छोटा तुम हो शैला तुम हो विनतावाले मुझे आज भी।
आत्मघाती के लेखक है वो उस महात्मा का नाम बताओ।।
- अमृतचन्द्राय
137] ऐसे इन्द्र का नाम बताओ, चारों ओर मुँह दिखाओ।
शन इन्द्र में आनेवाला, वह की शोभा नामे वाला।।
- सिंह
138] जन्म में निर्ग्रन्थ मेखादि दिखाया, 7 वर्ष में मुनिव्रत पाया।
ऐसे मुनि का नाम बताओ, उसका उत्तर ढूंढ के लाओ।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
139] जिनेन्द्र तर्णी एक करावे, कुललक पद को पदवी धावे।
उसको अन्दर न थी व्याधि, अर्थ सुखी उनकों समावे।।
- देसति
140] महापुरुषों को ज्ञान सिखाएँ, निराकार पद भर लिया है।
मन में उनको ज्ञानमय में, जीन में निज चेतन का में।।
- सिद्ध परमेष्ठि
141] मन में जो गया राग विराग, तुम विवाह पर हो गए त्याग।
बालदेवता की शक्ति वाले वीर पुत्र की माँ कहावे।।
- शती अंजना
142] विकृत होजई सारी रात, चुपचाप होए माताग्राम।
समाकार में की महिमा भाव, दुख से भर वो विराम।।
- सती सोमा
143] तीन बार तनाव है आया, जो भी लिए को हिता न पाया।
सारे जग में पूज्य है माना, नाम बताओ जिसका पाना।।
- सीता
144] मेरे की मैं कंचन कछार, अगरमाया, आज जग मुझ कहे सोभी कहो न, ताय।
सोभी कहो न नामदेव। पद्या की हरन, काविकल को भी जो इसे बसाया।।
- रेवती
काव्य
145] खाये माग्य से हलवो, मिलतो, प्रगट वचन सो वे अंतमोल।
नाही का समझो है तो, बोल सको दो मुख सो बोल।।
- मेना सुंदरी
146] मिथ्या गुरु का मत भलावो, सच्चे गुरु से मान बढ़ावो।
जैन धर्म का यह झण्डाओ, जिसकी संख्या में न लगा ठण्डाव।। - येला
147] सत्य स्नेह का स्वप्ना कोनी, मग की श्रद्धामय निधियाँ होनी।
मनुज लखकर श्री मुस्कान, तत्ववेदी पर हुआ बलिदान।। - होडरमलजी
148] जिनकी लेखनी में शास्त्रगार, ग्रहो तत्व का है उपकार।
वह अगर विराज बन गया, एक धार्मिक विद्वान बन गया।। - बनारसीदासजी
149] गागर में सागर भर दीना, गधे जीवों को उपदेश दे दीना।
दिव्यमति दोलन बरसाई, जिन धर्म का महिमा गाई।। - दौलतरामजी
150] जिन के शब्दों का सम्यक फल देखा रहा होसार।
तनको लखकर जो भी होते, वह जावे भवपार।। - सम्राट चन्द्रगुप्त
151] भारत की होता है वे, जैन धर्म के गौरव में।
उत में मिल कमल है वे, जिनधर्म परिधान है वे।। - भरत चक्रवर्ती
152] हर मसा का वीर पुत्र वह, अतुलवीर्यवान महान।
कामदेव पदवी का धारी इनकी महिमा जगमें भारी।। - हनुमान
153] इक प्रतिमा निश्चय धारी, नित्य श्री संघ का हितकारी।
तीर्थंकर पद पदवी पाहे, इह संतोषा रहना अब भाहे।। - पुरुखा
154] जिनशासन पर वह बलिदान, मात्र रखेगा अकल जहान।
लोक में जिन धर्म कल्याण, जिन शासन से हो अनुराग।। - निकलंक
155] वनराज जब सम्मुख आवे, तो भी उनको डिगा न पावे।
मन जो अजेय तत्व अपार, वनराज को वह शमकार।। - दीवान अमरचंद
156] ज्ञान-विराग का अद्भुत खेल, किपा विवाद पर बुझाम मेल।
मिथ्या मोक्ष पद शुभ निरीष, पठन नगरी में ज्ञान।। - जंबुस्वामी
157] छल मोह में सम्मुख महान, अताधर्म का साहो मान।
राज संखा सब ही त्यागी, राजा राम का धक्का भागे।। - विभीषण
158] लक्ष्मी जिनको दासी थी, संकत राहे महान।
नहीं नहीं वे पग धारे, वहाँ धन वैभव सम्मान।। - धनकुमार
159] नर के फले को त्यागकर, लिया परम पद शूर।
एक रूप मुनिराज का, बाधा रहे दूर।। - वज्रकुमार
160] अहोभाव वीरवर मुनिराज पूजनीय है, साक्षात् दशरथ को सुपुत्र का भाव सभी मानते।
अतुल कीर्ति परमगंभीर, नवराज का अमन्यते है, जिनके पद को जीव नवभारत बादत
मानो भरत है।। - राजा श्रेयांस
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1458.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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