शांति की खोज | Shanti ki khoj

शांति की खोज

भ्रमजालों में भटक-भटककर, जीवन अपना व्यर्थ गँवाया।
झूठे-सुख के पीछे दौड़ा, सच्चे-सुख का मर्म न पाया॥
धन-दौलत अंबार लगाये, झूठ-कपट छल की रच माया।
अत्याचारों-अन्यायों से, ऊंचे-ऊंचे महल चिनाया॥
बड़ी-बड़ी फैक्टरियां खोलीं, लम्बा कारोबार चलाया।
लक्ष्मी बनी चरण की दासी, धन-कुबेर की पदवी पाया॥
दान-धर्म में हीरे-मोती, सोना-चांदी स्वयं लुटाया।
अतुल-संपदा लगा लगाकर, मंदिर-मस्जिद चर्च बनाया॥
सारे जग के सुख-ऐश्वर्यों-भोगों का आनन्द उठाया।
सुरा-सुन्दरी संगीतों की, महफिल में भी चित्तरमाया॥
बड़े बड़े पोथों को पड़कर, मैं पंडित ज्ञानी कहलाया।
तुकबन्दी शब्दों की रचकर, महाकवी का सुयश कमाया॥
देवालय में नित्य नियम से, धूप-दीप नैवेद्य चढ़ाया।
घंटों घंटों बैठ-बैठ जप किया व्रतों से बदन सुखाया॥
राजनीति का नेता बनकर, दुनियां भर में नाम कमाया।
जन जन के मन का प्रिय वनकर ऊंचा सिंहासन भी पाया॥
सब कुछ मिला, किया सब कुछ पर, चंचलमन संतोष न पाया।
प्यासी की प्यासी तृष्णा ही रही तृषा का अंत न आया॥
अहंकार का दानव अंदर बैठा, उसको जीत कभी न पाया।
मकड़-जाल में उसके फंसकर, कैसा कैसा स्वांग रचाया॥
प्रभु अब तो जग-जंजालों से, ऊब उठा जी मन अकुलाया।
दम घुटता इस घोर-तिमिर में, थककर चूर हुई है काया॥
द्वार तुम्हारे अरे ! दयालू! बड़ी ठोकरें खाकर आया।
शरण पड़ा हूँ नहीं तजूँगा, इन चरणों की शीतल छाया॥
॥इति॥

रचयिता :- श्री कामता प्रसाद जैन, वाराणसी