यह पोस्ट किसके लिए है
यह पोस्ट उस पाठक के लिए भी है जो जैन नहीं है और जिसने कभी कोई दर्शन शास्त्र नहीं पढ़ा। भारत में “दर्शन” का अर्थ है जीवन और जगत् को देखने का एक पूरा तरीका: ईश्वर है या नहीं, आत्मा क्या है, ज्ञान कैसे होता है, दुःख से छुटकारा कैसे मिलता है। आचार्य हरिभद्रसूरि के षड्दर्शनसमुच्चय में केवल ८७ कारिकाओं में छहों प्रमुख दर्शनों का सार है। यहाँ ग्रन्थ के क्रम से हर कारिका मूल रूप में, उसका हिन्दी अर्थ, और टीका से चुने हुए बिन्दु दिए गए हैं, साथ में हर दर्शन का सरल परिचय।
हर दर्शन को चार प्रश्नों से समझें (आचार्य ने स्वयं यही क्रम रखा है, कारिका २):
- देवता: उस मत में पूज्य कौन है?
- तत्त्व: जगत् किन मूल पदार्थों से बना है?
- प्रमाण: सही ज्ञान किन साधनों से होता है?
- मोक्ष: अन्तिम लक्ष्य क्या है?
ग्रन्थ और टीका: मूल ग्रन्थ आचार्य हरिभद्रसूरि का है। इस संस्करण में गुणरत्नसूरि की विस्तृत टीका तर्करहस्यदीपिका और सोमतिलकसूरि की लघुवृत्ति है, हिन्दी अनुवाद सहित। ग्रन्थ की सबसे बड़ी विशेषता: हर दर्शन को उसी के शब्दों में, बिना खण्डन किए रखा गया है, और निर्णय पाठक की बुद्धि पर छोड़ा गया है (कारिका ८७)।
मंगलाचरण और विषय (कारिका १ से ३)
कारिका १
सद्दर्शनं जिनं नत्वा वीरं स्याद्वाददेशकम् ।
सर्वदर्शनवाच्योऽर्थः संक्षेपेण निगद्यते ॥१॥
अर्थ: सद्दर्शन वाले, स्याद्वाद का उपदेश देने वाले श्री वीर जिन को नमस्कार करके, सब दर्शनों का जो प्रतिपाद्य अर्थ है, उसे संक्षेप में कहता हूँ।
कारिका २
दर्शनानि षडेवात्र मूलभेदव्यपेक्षया ।
देवतातत्त्वभेदेन ज्ञातव्यानि मनीषिभिः ॥२॥
अर्थ: मूल भेदों की अपेक्षा से दर्शन छह ही हैं। बुद्धिमानों को इन्हें देवता और तत्त्व के भेद से जानना चाहिए। (उनके उपभेद अनेक हैं, पर यहाँ छह मूल दर्शनों का ही कथन है।)
कारिका ३
बौद्धं नैयायिकं सांख्यं जैनं वैशेषिकं तथा ।
जैमिनीयं च नामानि दर्शनानाममून्यहो ॥३॥
अर्थ: हे शिष्यो! बौद्ध, नैयायिक, सांख्य, जैन, वैशेषिक और जैमिनीय, ये छह मूल दर्शनों के नाम हैं।
टीका का मंगल श्लोक: टीकाकार गुणरत्नसूरि कहते हैं कि भगवान् महावीर का शासन ऐसा गम्भीर समुद्र है जिसमें सभी नयों (दृष्टियों) के समूह बूँद के समान समा जाते हैं। यही इस पूरे ग्रन्थ को पढ़ने की कुंजी है।
१. बौद्ध दर्शन (कारिका ४ से १२)
परिचय: गौतम बुद्ध (सुगत) का मार्ग। मूल बात: सब कुछ क्षणिक है, कोई स्थायी आत्मा नहीं, दुःख का कारण तृष्णा है और उसका नाश ही निर्वाण है। टीका से (वेष और आचार): चमर, मुण्डन, चर्म का आसन और कमण्डलु इनके चिह्न हैं, धातु रंग का घुटनों तक वस्त्र इनका वेष है। धर्म, बुद्ध और संघ इनके रत्नत्रय हैं, तारा देवी शासन देवता हैं, और इनके स्तूप गोल होते हैं।
कारिका ४
तत्र बौद्धमते तावद्देवता सुगतः किल ।
चतुर्णामार्यसत्यानां दुःखादीनां प्ररूपकः ॥४॥
अर्थ: इनमें पहले बौद्ध मत: उसमें देवता सुगत (बुद्ध) हैं, जो दुःख आदि चार आर्यसत्यों के उपदेशक हैं।
कारिका ५
दुःखं संसारिणः स्कन्धास्ते च पञ्च प्रकीर्तिताः ।
विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारो रूपमेव च ॥५॥
अर्थ: संसारी स्कन्ध ही दुःख हैं। और विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार और रूप, ये पाँच स्कन्ध कहे गये हैं।
सरल शब्दों में: बौद्ध दर्शन कोई स्थायी आत्मा नहीं मानता। जिसे हम ‘मैं’ कहते हैं, वह इन पाँच स्कन्धों का प्रवाह मात्र है। टीका कहती है: इन पाँच स्कन्धों से भिन्न कोई आत्मा नाम का छठा स्कन्ध नहीं है, और ये स्कन्ध एक क्षण ही ठहरते हैं।
कारिका ६
समुदेति यतो लोके रागादीनां गणोऽखिलः ।
आत्मात्मीयभावाख्यः समुदयः स उदाहृतः ॥६॥
अर्थ: जिससे लोक में ‘मैं हूँ, यह मेरा है’ इत्यादि अहंकार और ममकार रूप समस्त रागादि भावों का समूह उत्पन्न होता है, उसे समुदय कहते हैं।
कारिका ७
क्षणिकाः सर्वसंस्कारा इत्येवं वासना यका ।
स मार्ग इह विज्ञेयो निरोधो मोक्ष उच्यते ॥७॥
अर्थ: संसार के सभी संस्कार क्षणिक हैं, इस क्षणिक भावना को मार्ग तत्त्व, और रागादि वासनाओं के नाश को निरोध अर्थात् मोक्ष कहते हैं।
टीका से: टीकाकार क्षणिकता का तर्क देते हैं: जो वस्तु अन्त में नष्ट होती है, उसका नष्ट होने का स्वभाव उत्पत्ति के समय भी था, अन्यथा अन्त में वह स्वभाव कहाँ से आता? इसलिए हर वस्तु उत्पन्न होते ही नष्ट होती है। ‘वही यह है’ ऐसा ज्ञान दीपक की लौ की तरह होता है: लौ हर क्षण नई है, पर एक जैसी होने से एक ही दिखती है।
कारिका ८
पञ्चेन्द्रियाणि शब्दाद्या विषयाः पञ्च मानसम् ।
धर्मायतनमेतानि द्वादशायतनानि च ॥८॥
अर्थ: पाँच इन्द्रियाँ, शब्द आदि पाँच विषय, मन (चित्त) और धर्मायतन (सुख दुःख आदि धर्मों का आधार), ये बारह आयतन हैं।
कारिका ९
प्रमाणे द्वे च विज्ञेये तथा सौगतदर्शने ।
प्रत्यक्षमनुमानं च सम्यग्ज्ञानं द्विधा यतः ॥९॥
अर्थ: बौद्ध दर्शन में दो प्रमाण हैं, एक प्रत्यक्ष और दूसरा अनुमान। चूँकि सम्यग्ज्ञान दो ही प्रकार का है, अतः प्रमाण भी दो ही हैं।
कारिका १०
प्रत्यक्षं कल्पनापोढमभ्रान्तं तत्र बुध्यताम् ।
त्रिरूपाल्लिङ्गतो लिङ्गिज्ञानं त्वनुमानसंज्ञितम् ॥१०॥
अर्थ: उनमें जो ज्ञान कल्पना (नाम, जाति आदि शब्द योजना) से रहित और भ्रान्ति से रहित है, वह प्रत्यक्ष है। तीन रूप वाले लिंग (हेतु) से होने वाला साध्य का ज्ञान अनुमान कहलाता है।
कारिका ११
रूपाणि पक्षधर्मत्वं सपक्षे विद्यमानता ।
विपक्षे नास्तिता हेतोरेवं त्रीणि विभाव्यताम् ॥११॥
अर्थ: हेतु के तीन रूप ये समझने चाहिए: पक्ष में रहना (पक्षधर्मत्व), सपक्ष में विद्यमान होना, और विपक्ष में न होना।
उदाहरण: ‘पर्वत पर अग्नि है, क्योंकि धुआँ है’। यहाँ धुआँ (हेतु) पर्वत (पक्ष) पर है, रसोईघर जैसे सपक्ष में भी अग्नि के साथ मिलता है, और तालाब जैसे विपक्ष में (जहाँ अग्नि नहीं) नहीं मिलता। ये तीनों बातें हों, तभी हेतु सही है।
कारिका १२
बौद्धराद्धान्तवाच्यस्य संक्षेपोऽयं निवेदितः ।
नैयायिकमतस्येतः कथ्यमानो निशम्यताम् ॥१२॥
अर्थ: बौद्ध सिद्धान्त का यह संक्षेप कहा गया। अब आगे कहे जाने वाले नैयायिक मत को सुनो।
टीका से (बौद्धों के चार सम्प्रदाय): वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार और माध्यमिक। ऊपर कहे चार आर्यसत्य सौत्रान्तिक मत की दृष्टि से हैं। योगाचार कहते हैं: ‘यह सारा जगत् विज्ञान मात्र है’।
२. नैयायिक (न्याय) दर्शन (कारिका १३ से ३३)
परिचय: महर्षि अक्षपाद गौतम का दर्शन, इसलिए ‘आक्षपाद’ भी कहलाता है। यह तर्क और प्रमाण का शास्त्र है, और ईश्वर को जगत् का कर्ता मानता है। टीका से: शिव भक्त होने से नैयायिक ‘शैव’ कहलाते हैं। इनके तपस्वी दण्ड, जटा, भस्म, कौपीन और यज्ञोपवीत धारण करते हैं और आचार के भेद से चार प्रकार के हैं: शैव, पाशुपत, महाव्रतधर और कालमुख।
कारिका १३
अक्षपादमते देवः सृष्टिसंहारकृच्छिवः ।
विभुर्नित्यैकसर्वज्ञो नित्यबुद्धिसमाश्रयः ॥१३॥
अर्थ: अक्षपाद (नैयायिक) मत में जगत् की सृष्टि और संहार करने वाले, व्यापक, नित्य, एक, सर्वज्ञ और नित्य ज्ञान के आश्रय शिव देवता हैं।
टीका से: जगत् को ईश्वर का बनाया सिद्ध करने के लिए नैयायिक अनुमान देते हैं: पृथिवी, पर्वत, समुद्र आदि किसी बुद्धिमान् के बनाये हैं, क्योंकि ये कार्य हैं, जैसे घड़ा। जो इनका बनाने वाला है, वही ईश्वर है। केवल सृष्टि होती रहे तो प्राणी तीनों लोकों में न समायें, इसलिए संहार भी ईश्वर करता है।
कारिका १४
तत्त्वानि षोडशामुत्र प्रमाणादीनि तद्यथा ।
प्रमाणं च प्रमेयं च संशयश्च प्रयोजनम् ॥१४॥
अर्थ: इस मत में प्रमाण आदि सोलह तत्त्व हैं, वे इस प्रकार: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन,
कारिका १५
दृष्टान्तोऽप्यथ सिद्धान्तोऽवयवास्तर्कनिर्णयौ ।
वादो जल्पो वितण्डा च हेत्वाभासाश्छलानि च ॥१५॥
अर्थ: दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल,
कारिका १६
जातयो निग्रहस्थानान्येषामेवं प्ररूपणा ।
अर्थोपलब्धिहेतुः स्यात्प्रमाणं तच्चतुर्विधम् ॥१६॥
अर्थ: जाति और निग्रहस्थान। इनका स्वरूप इस प्रकार है: पदार्थ की उपलब्धि (यथार्थ ज्ञान) का जो कारण हो, वह प्रमाण है, और वह चार प्रकार का है।
सरल शब्दों में: न्याय दर्शन मुख्य रूप से ‘सही सोचने और सही बहस करने’ का शास्त्र है। सोलह पदार्थों में पहले दो (प्रमाण, प्रमेय) ज्ञान के साधन और विषय हैं, बाकी चौदह चर्चा और शास्त्रार्थ की विधि बताते हैं।
कारिका १७
प्रत्यक्षमनुमानं चोपमानं शाब्दिकं तथा ।
तत्रेन्द्रियार्थसंपर्कोत्पन्नमव्यभिचारि च ॥१७॥
अर्थ: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शाब्द। उनमें इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न, अव्यभिचारी (कभी न चूकने वाला),
कारिका १८
व्यवसायात्मकं ज्ञानं व्यपदेशविवर्जितम् ।
प्रत्यक्षमनुमानं तु तत्पूर्वं त्रिविधं भवेत् ॥१८॥
अर्थ: निश्चयात्मक और शब्द व्यवहार से रहित ज्ञान प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्षपूर्वक होने वाला अनुमान तीन प्रकार का होता है।
कारिका १९
पूर्ववच्छेषवच्चैव दृष्टं सामान्यतस्तथा ।
तत्राद्यं कारणात्कार्यानुमानमिह गीयते ॥१९॥
अर्थ: पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट। उनमें पहला (पूर्ववत्) कारण से कार्य का अनुमान कहा जाता है।
कारिका २०
रोलम्बगवलव्यालतमालमलिनत्विषः ।
वृष्टिं व्यभिचरन्तीह नैवंप्रायाः पयोमुचः ॥२०॥
अर्थ: भौंरे, भैंसे के सींग, साँप और तमाल वृक्ष के समान काली कान्ति वाले, ऐसे (गर्जन, बिजली वाले) बादल वर्षा से कभी नहीं चूकते। (यह कारण से कार्य का अनुमान, पूर्ववत् का उदाहरण है।)
कारिका २१
कार्यात्कारणानुमानं यच्च तच्छेषवन्मतम् ।
तथाविधनदीपूराद्देवो वृष्टो यथोपरि ॥२१॥
अर्थ: कार्य से कारण के अनुमान को शेषवत् कहते हैं। जैसे नदी के विशिष्ट पूर (बाढ़) को देखकर नदी के ऊपरी भाग में हुई वर्षा का अनुमान करना।
कारिका २२
यच्च सामान्यतोदृष्टं तदेवं गतिपूर्विका ।
पुंसि देशान्तरप्राप्तिर्यथा सूर्येऽपि सा तथा ॥२२॥
अर्थ: और जो सामान्यतोदृष्ट है वह इस प्रकार है: किसी पुरुष का चलकर ही दूसरे स्थान पर पहुँचना देखकर, सूर्य के भी स्थान बदलने से उसकी गति का अनुमान करना।
कारिका २३
प्रसिद्धवस्तुसाधर्म्यादप्रसिद्धस्य साधनम् ।
उपमानं समाख्यातं यथा गौर्गवयस्तथा ॥२३॥
अर्थ: प्रसिद्ध वस्तु की समानता से अप्रसिद्ध वस्तु को जानना उपमान कहा गया है। जैसे ‘जैसी गाय, वैसा गवय (नीलगाय)’।
कारिका २४
शाब्दमाप्तोपदेशस्तु मानमेवं चतुर्विधम् ।
प्रमेयं त्वात्मदेहाद्यं बुद्धीन्द्रियसुखादि च ॥२४॥
अर्थ: आप्त के उपदेश को शाब्द (आगम) प्रमाण कहते हैं। इस तरह प्रमाण चार प्रकार का होता है। आत्मा, शरीर आदि तथा बुद्धि, इन्द्रिय, सुख आदि प्रमेय हैं।
टीका से: बारह प्रमेय हैं: आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव (पुनर्जन्म), फल, दुःख और अपवर्ग। अपवर्ग अर्थात् दुःख से अत्यन्त छुटकारा, यही न्याय का मोक्ष है।
कारिका २५
किमेतदिति संदिग्धः प्रत्ययः संशयो मतः ।
प्रवर्तते यदर्थित्वात्तत्तु साध्यं प्रयोजनम् ॥२५॥
अर्थ: ‘यह क्या है’ इस प्रकार के सन्दिग्ध ज्ञान को संशय कहते हैं। जिसकी प्राप्ति के लिए मनुष्य प्रवृत्ति करता है, उस साध्य अर्थ को प्रयोजन कहते हैं।
कारिका २६
दृष्टान्तस्तु भवेदेष विवादविषयो न यः ।
सिद्धान्तस्तु चतुर्भेदः सर्वतन्त्रादिभेदतः ॥२६॥
अर्थ: जिसमें किसी को विवाद न हो, ऐसा सबको मान्य अर्थ दृष्टान्त होता है। सर्वतन्त्र आदि के भेद से सिद्धान्त चार प्रकार का है।
कारिका २७
प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तोपनया निगमस्तथा ।
अवयवाः पञ्च तर्कः संदेहोपरमे भवेत् ॥२७॥
अर्थ: प्रतिज्ञा, हेतु, दृष्टान्त, उपनय और निगमन, ये पाँच अवयव हैं। सन्देह के शान्त होने के समय तर्क होता है,
कारिका २८
यथा काकादिसंपातात्स्थाणुना भाव्यमत्र हि ।
ऊर्ध्वं संदेहतर्काभ्यां प्रत्ययो निर्णयो मतः ॥२८॥
अर्थ: जैसे (दूर दिखती वस्तु पर) कौए आदि को बैठते देखकर ‘यहाँ ठूँठ ही होना चाहिए’ (यह तर्क है)। संशय और तर्क के बाद जो निश्चित ज्ञान होता है, वह निर्णय माना गया है।
कारिका २९
आचार्यशिष्ययोः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहात् ।
या कथाभ्यासहेतुः स्यादसौ वाद उदाहृतः ॥२९॥
अर्थ: शास्त्र या तत्त्व के अभ्यास के लिए गुरु और शिष्य पक्ष प्रतिपक्ष लेकर जो चर्चा करते हैं, उसे वाद कहते हैं।
कारिका ३०
विजिगीषुकथा या तु छलजात्यादिदूषणा ।
स जल्पः सा वितण्डा तु या प्रतिपक्षवर्जिता ॥३०॥
अर्थ: जीतने की इच्छा वाली जिस कथा में छल, जाति आदि से दूसरे पक्ष में दूषण दिये जाते हैं, वह जल्प है। जिस जल्प में वादी अपना पक्ष स्थापित न करके केवल दूसरे के पक्ष में दूषण ही देता है, वह वितण्डा है।
कारिका ३१
हेत्वाभासा असिद्धाद्याश्छलं कूपो नवोदकः ।
जातयो दूषणाभासाः पक्षादिर्दूष्यते न यैः ॥३१॥
अर्थ: असिद्ध आदि हेत्वाभास हैं। ‘इस कुएँ में नवोदक (नया जल) है’ यहाँ ‘नव’ का अर्थ ‘नौ प्रकार का जल’ करना छल है। जातियाँ दूषणाभास हैं, उनसे पक्ष आदि का वास्तव में खण्डन नहीं होता।
कारिका ३२
निग्रहस्थानमाख्यातं परो येन निगृह्यते ।
प्रतिज्ञाहानिसंन्यासविरोधादिविभेदतः ॥३२॥
अर्थ: जिससे प्रतिवादी पराजित होता है, उसे निग्रहस्थान कहते हैं। यह प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञासंन्यास, प्रतिज्ञाविरोध आदि के भेद से बाईस प्रकार का है।
सरल शब्दों में: कारिका २९ से ३२ शास्त्रार्थ के नियम हैं: वाद (सत्य जानने की चर्चा), जल्प (जीतने के लिए बहस), वितण्डा (केवल खण्डन), छल, जाति और निग्रहस्थान (जिन गलतियों से बहस में हार मानी जाती है)।
कारिका ३३
नैयायिकमतस्यैष समासः कथितोऽञ्जसा ।
सांख्याभिमतभावानामिदानीमयमुच्यते ॥३३॥
अर्थ: इस प्रकार नैयायिक मत का संक्षेप से यथार्थ निरूपण किया। अब सांख्य द्वारा माने गये पदार्थों का कथन करते हैं।
३. सांख्य दर्शन (कारिका ३४ से ४३)
परिचय: महर्षि कपिल का दर्शन। सब कुछ दो मूल तत्त्वों से समझाता है: जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष। दोनों का भेद जान लेना ही मुक्ति है। टीका से: सांख्य लोग अधिकतर वाराणसी में रहते थे, उनमें बहुत से मासोपवासी (एक माह का उपवास करने वाले) साधु थे, और वे वैदिक हिंसा से विरक्त रहकर आध्यात्मिक साधना करते थे।
कारिका ३४
सांख्या निरीश्वराः केचित्केचिदीश्वरदेवताः ।
सर्वेषामपि तेषां स्यात्तत्त्वानां पञ्चविंशतिः ॥३४॥
अर्थ: कुछ सांख्य निरीश्वर (ईश्वर को न मानने वाले) हैं और कुछ ईश्वर को देवता मानते हैं। पर उन सभी के मत में तत्त्व पच्चीस ही हैं।
कारिका ३५
सत्त्वं रजस्तमश्चेति ज्ञेयं तावद्गुणत्रयम् ।
प्रसादतापदैन्यादिकार्यलिङ्गं क्रमेण तत् ॥३५॥
अर्थ: सत्त्व, रज और तम, ये तीन गुण हैं। प्रसन्नता, ताप (बेचैनी) और दीनता आदि कार्यों से क्रमशः उनका अनुमान होता है।
कारिका ३६
एतेषां या समावस्था सा प्रकृतिः किलोच्यते ।
प्रधानाव्यक्तशब्दाभ्यां वाच्या नित्यस्वरूपिका ॥३६॥
अर्थ: इन तीनों गुणों की जो साम्य अवस्था है, वही प्रकृति कहलाती है। उसे ‘प्रधान’ और ‘अव्यक्त’ भी कहते हैं, और वह नित्य स्वरूप वाली है।
टीका से: पुराने सांख्य हर आत्मा के साथ अलग प्रकृति मानते थे, बाद के सांख्य सभी आत्माओं के लिए एक नित्य प्रधान मानते हैं।
कारिका ३७
ततः संजायते बुद्धिर्महानिति यकोच्यते ।
अहंकारस्ततोऽपि स्यात्तस्मात्षोडशको गणः ॥३७॥
अर्थ: प्रकृति से बुद्धि उत्पन्न होती है, जिसे ‘महान्’ भी कहते हैं। बुद्धि से अहंकार (‘मैं सुन्दर हूँ’ इत्यादि अभिमान) होता है, और अहंकार से सोलह का गण उत्पन्न होता है।
कारिका ३८
स्पर्शनं रसनं घ्राणं चक्षुः श्रोत्रं च पञ्चमम् ।
पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्यत्र तथा कर्मेन्द्रियाणि च ॥३८॥
अर्थ: स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और पाँचवाँ श्रोत्र, ये पाँच बुद्धि (ज्ञान) इन्द्रियाँ हैं। तथा कर्मेन्द्रियाँ:
कारिका ३९
पायूपस्थवचःपाणिपादाख्यानि मनस्तथा ।
अन्यानि पञ्च रूपादितन्मात्राणीति षोडश ॥३९॥
अर्थ: पायु, उपस्थ, वचन (वाणी), हाथ और पैर, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, और रूप आदि पाँच तन्मात्राएँ, इस प्रकार सोलह।
कारिका ४०
रूपात्तेजो रसादापो गन्धाद्भूमिः स्वरान्नभः ।
स्पर्शाद्वायुस्तथैवं च पञ्चभ्यो भूतपञ्चकम् ॥४०॥
अर्थ: रूप से अग्नि, रस से जल, गन्ध से पृथिवी, शब्द से आकाश और स्पर्श से वायु, इस प्रकार पाँच तन्मात्राओं से पाँच भूतों की उत्पत्ति होती है।
गिनती: प्रकृति १ + बुद्धि १ + अहंकार १ + सोलह का गण (५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय, मन, ५ तन्मात्रा) + ५ महाभूत = २४ तत्त्व, और पुरुष मिलाकर २५।
कारिका ४१
एवं चतुर्विंशतितत्त्वरूपं निवेदितं सांख्यमते प्रधानम् ।
अन्यस्त्वकर्ता विगुणश्च भोक्ता तत्त्वं पुमान्नित्यचिदभ्युपेतः ॥४१॥
अर्थ: इस प्रकार सांख्य मत में चौबीस तत्त्व रूप प्रधान का निरूपण किया। प्रधान से भिन्न पुरुष तत्त्व है, जो अकर्ता, निर्गुण, भोक्ता और नित्य चेतन माना गया है।
कारिका ४२
पञ्चविंशतितत्त्वानि संख्ययैवं भवन्ति च ।
प्रधाननरयोश्चात्र वृत्तिः पङ्ग्वन्धयोरिव ॥४२॥
अर्थ: इस प्रकार गिनती करने पर पच्चीस तत्त्व होते हैं। प्रधान (प्रकृति) और पुरुष का सम्बन्ध लँगड़े और अन्धे के समान है।
उदाहरण: जंगल में एक अन्धा और एक लँगड़ा मिले। अन्धा चल सकता है पर देख नहीं सकता, लँगड़ा देख सकता है पर चल नहीं सकता। लँगड़ा अन्धे के कन्धे पर बैठा और दोनों पार पहुँचे। प्रकृति करती है पर जानती नहीं, पुरुष जानता है पर करता नहीं, दोनों के संयोग से संसार चलता है।
कारिका ४३
प्रकृतिवियोगो मोक्षः पुरुषस्य बतैतदन्तरज्ञानात् ।
मानत्रितयं चात्र प्रत्यक्षं लैङ्गिकं शाब्दम् ॥४३॥
अर्थ: पुरुष का प्रकृति से वियोग ही मोक्ष है, और वह प्रकृति तथा पुरुष के भेद के ज्ञान से होता है। इस मत में प्रत्यक्ष, अनुमान और शाब्द, ये तीन प्रमाण हैं।
टीका से: माठर वृत्ति का एक श्लोक टीका में उद्धृत है जो सांख्य का अपना प्रचार है: ‘हँसो, पियो, मौज करो, विषय भोगो, शंका मत करो; यदि तुमने कपिल मत जान लिया तो मोक्ष सुख पाओगे’। अर्थात् उनके मत में तत्त्वज्ञान ही मुक्ति का कारण है।
४. जैन दर्शन (कारिका ४४ से ५८)
परिचय: तीर्थंकरों का उपदेश किया हुआ मार्ग, जिसे अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर ने इस युग में प्रकट किया। मूल बात: आत्मा स्वयं अपने कर्मों की कर्ता है और स्वयं ही पुरुषार्थ से मुक्त होती है; कोई जगत्कर्ता ईश्वर नहीं। टीका से: जैन गुरु निर्ग्रन्थ होते हैं और पाँच समिति (ईर्या, भाषा, एषणा, आदान निक्षेप, उत्सर्ग) तथा तीन गुप्ति (मन, वचन, काय पर संयम) का पालन करते हैं।
कारिका ४४
एवं सांख्यमतस्यापि समासो गदितोऽधुना ।
जैनदर्शनसंक्षेपः कथ्यते सुविचारवान् ॥४४॥
अर्थ: इस तरह सांख्य मत का संक्षेप कहा गया। अब प्रमाण से सिद्ध (सुविचारित) जैन दर्शन का संक्षेप कहते हैं।
कारिका ४५
जिनेन्द्रो देवता तत्र रागद्वेषविवर्जितः ।
हतमोहमहामल्लः केवलज्ञानदर्शनः ॥४५॥
अर्थ: जैन मत में देवता जिनेन्द्र हैं, जो राग और द्वेष से रहित हैं, जिन्होंने मोह रूपी महामल्ल को मार दिया है, और जो केवलज्ञान तथा केवलदर्शन के धारी हैं।
कारिका ४६
सुरासुरेन्द्रसंपूज्यः सद्भूतार्थप्रकाशकः ।
कृत्स्नकर्मक्षयं कृत्वा संप्राप्तः परमं पदम् ॥४६॥
अर्थ: वे देवों और असुरों के इन्द्रों से पूजित हैं, यथार्थ पदार्थों के प्रकाशक (उपदेशक) हैं, और समस्त कर्मों का क्षय करके परम पद (मोक्ष) को प्राप्त हुए हैं।
सरल शब्दों में: जैन दर्शन में देवता कोई जगत् बनाने वाला नहीं, बल्कि वह आत्मा है जिसने राग, द्वेष और मोह जीतकर पूर्ण ज्ञान पाया। हर आत्मा इसी मार्ग से वैसी बन सकती है।
कारिका ४७
जीवाजीवौ तथा पुण्यं पापमास्रवसंवरौ ।
बन्धो विनिर्जरामोक्षौ नव तत्त्वानि तन्मते ॥४७॥
अर्थ: जैन मत में जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बन्ध, निर्जरा और मोक्ष, ये नौ तत्त्व (पदार्थ) हैं।
कारिका ४८
तत्र ज्ञानादिधर्मेभ्यो भिन्नाभिन्नो विवृत्तिमान् ।
शुभाशुभकर्मकर्ता भोक्ता कर्मफलस्य च ॥४८॥
अर्थ: उनमें जीव अपने ज्ञान आदि धर्मों से कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है, विवृत्तिमान् (परिणमनशील) है, शुभ अशुभ कर्मों का कर्ता है और कर्मफल का भोक्ता है।
सरल शब्दों में: यहाँ जैन दर्शन बौद्ध और सांख्य दोनों से अलग खड़ा है: बौद्ध आत्मा को नहीं मानते, सांख्य आत्मा को अकर्ता मानते हैं; जैन मत में जीव स्वयं अपने कर्मों का कर्ता और फल का भोक्ता है, और परिणमन करता रहता है।
कारिका ४९
चैतन्यलक्षणो जीवो यश्चैतद्विपरीतवान् ।
अजीवः स समाख्यातः पुण्यं सत्कर्मपुद्गलाः ॥४९॥
अर्थ: जीव का लक्षण चैतन्य है। जो इससे विपरीत (चैतन्य रहित) है, वह अजीव कहा गया है। प्रशस्त कर्म पुद्गल पुण्य हैं।
कारिका ५०
पापं तद्विपरीतं तु मिथ्यात्वाद्यास्तु हेतवः ।
ये बन्धस्य स विज्ञेय आस्रवो जिनशासने ॥५०॥
अर्थ: उससे विपरीत, अप्रशस्त कर्म पुद्गल पाप हैं। जिनशासन में कर्मबन्ध के जो कारण मिथ्यात्व आदि हैं, उन्हें आस्रव जानना चाहिए।
कारिका ५१
संवरस्तन्निरोधस्तु बन्धो जीवस्य कर्मणः ।
अन्योन्यानुगमात्मा तु यः संबन्धो द्वयोरपि ॥५१॥
अर्थ: आस्रव के निरोध को संवर कहते हैं। जीव और कर्म का एक दूसरे में अनुप्रवेश रूप जो सम्बन्ध है, वह बन्ध है।
कारिका ५२
बद्धस्य कर्मणः शाटो यस्तु सा निर्जरा मता ।
आत्यन्तिको वियोगस्तु देहादेर्मोक्ष उच्यते ॥५२॥
अर्थ: बँधे हुए कर्मों का झड़ना निर्जरा मानी गई है। और देह आदि से आत्यन्तिक (सदा के लिए) वियोग मोक्ष कहलाता है।
सरल शब्दों में: नौ तत्त्वों को एक नाव से समझें: जीव नाव है, छेद से पानी आना आस्रव, पानी का भर जाना बन्ध, छेद बन्द करना संवर, भरा पानी उलीचना निर्जरा, और नाव का पार पहुँचना मोक्ष। पुण्य और पाप उस पानी के दो प्रकार हैं।
कारिका ५३
एतानि नव तत्त्वानि यः श्रद्धत्ते स्थिराशयः ।
सम्यक्त्वज्ञानयोगेन तस्य चारित्रयोग्यता ॥५३॥
अर्थ: जो स्थिर चित्त होकर इन नौ तत्त्वों पर श्रद्धा करता है, उसमें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के योग से चारित्र की योग्यता प्रकट होती है।
कारिका ५४
तथाभव्यत्वपाकेन यस्यैतत्त्रितयं भवेत् ।
सम्यग्ज्ञानक्रियायोगाज्जायते मोक्षभाजनम् ॥५४॥
अर्थ: भव्यत्व के परिपाक से जिसे ये तीनों (रत्नत्रय) प्राप्त हो जाते हैं, वह सम्यग्ज्ञान और सम्यक् क्रिया (चारित्र) के योग से मोक्ष का पात्र बन जाता है।
सरल शब्दों में: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र, ये तीनों मिलकर (रत्नत्रय) मोक्ष का मार्ग हैं, अकेला ज्ञान या अकेली क्रिया नहीं।
कारिका ५५
प्रत्यक्षं च परोक्षं च द्वे प्रमाणे तथा मते ।
अनन्तधर्मकं वस्तु प्रमाणविषयस्त्विह ॥५५॥
अर्थ: जैन मत में प्रमाण दो हैं, प्रत्यक्ष और परोक्ष। अनन्त धर्मों वाली वस्तु प्रमाण का विषय है।
कारिका ५६
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानमीदृशम् ।
प्रत्यक्षमितरज्ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥५६॥
अर्थ: जो ज्ञान पदार्थ को अपरोक्ष (स्पष्ट) रूप से जानता है, वह प्रत्यक्ष है। इससे भिन्न (अस्पष्ट) ज्ञान परोक्ष है। परोक्षता बाहरी पदार्थ के ग्रहण की अपेक्षा से है, स्वरूप से तो सभी ज्ञान स्वसंवेदी हैं।
कारिका ५७
येनोत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं यत्तत्सदिष्यते ।
अनन्तधर्मकं वस्तु तेनोक्तं मानगोचरः ॥५७॥
अर्थ: क्योंकि जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है, वही सत् माना जाता है, इसीलिए अनन्त धर्मात्मक वस्तु को प्रमाण का विषय कहा है।
सरल शब्दों में: सोने का कंगन तोड़कर हार बनाया: कंगन का व्यय हुआ, हार का उत्पाद हुआ, सोना ध्रुव रहा। हर वस्तु इसी तरह एक साथ बदलती भी है और टिकी भी रहती है। इसलिए वस्तु में अनन्त धर्म हैं, और उसे किसी एक दृष्टि से पूरा नहीं कहा जा सकता।
कारिका ५८
जैनदर्शनसंक्षेप इत्येष गदितोऽनघः ।
पूर्वापरपराघातो यत्र क्वापि न विद्यते ॥५८॥
अर्थ: इस तरह निर्दोष जैन दर्शन का संक्षेप कहा, जिसमें कहीं भी पूर्वापर विरोध नहीं है।
टीका से: टीकाकार दिगम्बर परम्परा के प्रमुख तर्क ग्रन्थ गिनाते हैं: प्रमेयकमलमार्तण्ड, न्यायकुमुदचन्द्र, आप्तपरीक्षा, अष्टसहस्री, सिद्धान्तसार और न्यायविनिश्चय टीका।
५. वैशेषिक दर्शन (कारिका ५९ से ६७)
परिचय: महर्षि कणाद का दर्शन। जगत् की हर चीज़ को छह पदार्थों (श्रेणियों) में बाँटकर समझाता है, और परमाणु सिद्धान्त के लिए प्रसिद्ध है। देवता नैयायिकों के समान शिव हैं।
कारिका ५९
देवताविषयो भेदो नास्ति नैयायिकैः समम् ।
वैशेषिकाणां तत्त्वे तु विद्यतेऽसौ निदर्श्यते ॥५९॥
अर्थ: वैशेषिकों का देवता के विषय में नैयायिकों से कोई भेद नहीं है। तत्त्व के विषय में जो भेद है, वह दिखाया जाता है।
टीका से (नाम कैसे पड़ा): एक मुनि कपोत (कबूतर) की तरह गलियों में गिरे चावल के कण (कण) चुनकर आहार करते थे, इसलिए उनका नाम ‘कणाद’ पड़ा। कथा है कि उनके सामने शिव ने उलूक (उल्लू) रूप में यह मत प्रकट किया, इसलिए यह दर्शन ‘औलूक्य’ भी कहलाता है, और कणाद के शिष्य होने से वैशेषिक ‘काणाद’ कहलाते हैं।
कारिका ६०
द्रव्यं गुणस्तथा कर्म सामान्यं च चतुर्थकम् ।
विशेषसमवायौ च तत्त्वषट्कं तु तन्मते ॥६०॥
अर्थ: वैशेषिक मत में द्रव्य, गुण, कर्म, चौथा सामान्य, विशेष और समवाय, ये छह तत्त्व हैं।
कारिका ६१
तत्र द्रव्यं नवधा भूजलतेजोऽनिलान्तरिक्षाणि ।
कालदिगात्ममनांसि च गुणाः पुनः पञ्चविंशतिधा ॥६१॥
अर्थ: उनमें द्रव्य नौ प्रकार का है: पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन। गुण पच्चीस प्रकार के हैं:
कारिका ६२
स्पर्शरसरूपगन्धाः शब्दः संख्या विभागसंयोगौ ।
परिमाणं च पृथक्त्वं तथा परत्वापरत्वे च ॥६२॥
अर्थ: स्पर्श, रस, रूप, गन्ध, शब्द, संख्या, विभाग, संयोग, परिमाण, पृथक्त्व, परत्व और अपरत्व,
कारिका ६३
बुद्धिः सुखदुःखेच्छाधर्माधर्मप्रयत्नसंस्काराः ।
द्वेषः स्नेहगुरुत्वे द्रवत्ववेगौ गुणा एते ॥६३॥
अर्थ: बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, धर्म, अधर्म, प्रयत्न, संस्कार, द्वेष, स्नेह, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग, ये (पच्चीस) गुण हैं।
कारिका ६४
उत्क्षेपावक्षेपावाकुञ्चनकं प्रसारणं गमनम् ।
पञ्चविधं कर्मैतत्परापरे द्वे तु सामान्ये ॥६४॥
अर्थ: उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), अवक्षेपण (नीचे फेंकना), आकुञ्चन (सिकोड़ना), प्रसारण (फैलाना) और गमन, ये पाँच कर्म हैं। पर और अपर के भेद से सामान्य दो प्रकार का है।
कारिका ६५
तत्र परं सत्ताख्यं द्रव्यत्वाद्यपरमथ विशेषस्तु ।
निश्चयतो नित्यद्रव्यवृत्तिरन्त्यो विनिर्दिष्टः ॥६५॥
अर्थ: उनमें सत्ता पर सामान्य है, द्रव्यत्व आदि अपर सामान्य हैं। और विशेष, निश्चय से नित्य द्रव्यों में रहने वाला ‘अन्त्य’ कहा गया है।
टीका से: ‘विशेष’ पदार्थ मानने के कारण ही इस दर्शन का नाम वैशेषिक है। विशेष वह है जो नित्य द्रव्यों (परमाणु, मुक्त आत्मा आदि) को एक दूसरे से अलग पहचान देता है।
कारिका ६६
य इहायुतसिद्धानामाधाराधेयभूतभावानाम् ।
संबन्ध इहप्रत्ययहेतुः स हि भवति समवायः ॥६६॥
अर्थ: अयुतसिद्ध (जो अलग अलग नहीं पाये जाते), आधार और आधेय रूप पदार्थों का जो सम्बन्ध ‘इसमें यह है’ इस ज्ञान का कारण है, वही समवाय है।
कारिका ६७
प्रमाणं च द्विधामीषां प्रत्यक्षं लैङ्गिकं तथा ।
वैशेषिकमतस्यैष संक्षेपः परिकीर्तितः ॥६७॥
अर्थ: वैशेषिक प्रत्यक्ष और अनुमान, ये दो प्रमाण मानते हैं। इस तरह वैशेषिक मत का संक्षेप कहा गया।
टीका से (मोक्ष): बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, धर्म, अधर्म, प्रयत्न, संस्कार और द्वेष, आत्मा के इन नौ विशेष गुणों का अत्यन्त उच्छेद ही मोक्ष है।
६. जैमिनीय (मीमांसा) दर्शन (कारिका ६८ से ७७)
परिचय: महर्षि जैमिनि का दर्शन। वेद को ही अन्तिम प्रमाण मानता है और यज्ञ आदि वैदिक कर्म को धर्म। टीका से: ये सांख्य परिव्राजकों की तरह एकदण्डी या त्रिदण्डी होते हैं, गेरुआ वस्त्र पहनते हैं, मृगचर्म पर बैठते हैं, कमण्डलु रखते हैं और सिर मुँडाते हैं। वेद ही इनका गुरु है, इसलिए ये स्वयं ही संन्यास दीक्षा लेते हैं।
कारिका ६८
जैमिनीयाः पुनः प्राहुः सर्वज्ञादिविशेषणः ।
देवो न विद्यते कोऽपि यस्य मानं वचो भवेत् ॥६८॥
अर्थ: जैमिनीय मत वाले कहते हैं कि सर्वज्ञ आदि विशेषणों वाला कोई देव है ही नहीं, जिसके वचन प्रमाण माने जा सकें।
कारिका ६९
तस्मादतीन्द्रियार्थानां साक्षाद्द्रष्टुरभावतः ।
नित्येभ्यो वेदवाक्येभ्यो यथार्थत्वविनिश्चयः ॥६९॥
अर्थ: इसलिए, अतीन्द्रिय पदार्थों को साक्षात् देखने वाला कोई न होने से, नित्य वेद वाक्यों से ही उनका यथार्थ निश्चय होता है।
सरल शब्दों में: मीमांसा दर्शन सर्वज्ञ को नहीं मानता, इसलिए धर्म जानने का एकमात्र साधन वेद है, और वेद किसी का बनाया नहीं (अपौरुषेय), नित्य है।
कारिका ७०
अत एव पुरा कार्यो वेदपाठः प्रयत्नतः ।
ततो धर्मस्य जिज्ञासा कर्तव्या धर्मसाधनी ॥७०॥
अर्थ: इसीलिए सबसे पहले प्रयत्नपूर्वक वेद का पाठ करना चाहिए। उसके बाद धर्म को सिद्ध करने वाली धर्म की जिज्ञासा करनी चाहिए।
कारिका ७१
नोदनालक्षणो धर्मो नोदना तु क्रियां प्रति ।
प्रवर्तकं वचः प्राहुः स्वःकामोऽग्निं यथा यजेत् ॥७१॥
अर्थ: धर्म का लक्षण नोदना (वेद की प्रेरणा) है। क्रिया में प्रवृत्त कराने वाले वचन को नोदना कहते हैं, जैसे ‘स्वर्ग की इच्छा वाला अग्नि का यजन करे’।
कारिका ७२
प्रत्यक्षमनुमानं च शाब्दं चोपमया सह ।
अर्थापत्तिरभावश्च षट् प्रमाणानि जैमिनेः ॥७२॥
अर्थ: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव, ये जैमिनि के छह प्रमाण हैं।
टीका से: मीमांसकों में प्रभाकर के अनुयायी अभाव को अलग प्रमाण नहीं मानते, इसलिए उनके पाँच प्रमाण हैं; कुमारिल भट्ट के अनुयायी (भाट्ट) अभाव सहित छह मानते हैं।
कारिका ७३
तत्र प्रत्यक्षमक्षाणां संप्रयोगे सतां सति ।
आत्मनो बुद्धिजन्मेत्यनुमानं लैङ्गिकं पुनः ॥७३॥
अर्थ: उनमें, विद्यमान पदार्थों से इन्द्रियों का सम्बन्ध होने पर आत्मा को जो बुद्धि उत्पन्न होती है, वह प्रत्यक्ष है। लिंग से होने वाला ज्ञान अनुमान है।
कारिका ७४
शाब्दं शाश्वतवेदोत्थमुपमानं तु कीर्तितम् ।
प्रसिद्धार्थस्य साधर्म्यादप्रसिद्धस्य साधनम् ॥७४॥
अर्थ: नित्य वेद से उत्पन्न ज्ञान शाब्द है। प्रसिद्ध अर्थ की समानता से अप्रसिद्ध की सिद्धि करना उपमान कहा गया है।
कारिका ७५
दृष्टार्थानुपपत्त्या तु कस्याप्यर्थस्य कल्पना ।
क्रियते यद्बलेनासावर्थापत्तिरुदाहृता ॥७५॥
अर्थ: देखे हुए पदार्थ की (किसी दूसरे अर्थ के बिना) अनुपपत्ति के बल से जो किसी अदृष्ट अर्थ की कल्पना की जाती है, वह अर्थापत्ति कही गई है।
उदाहरण (प्रसिद्ध): ‘देवदत्त मोटा है पर दिन में नहीं खाता’, तो मानना पड़ता है कि वह रात में खाता है। यही अर्थापत्ति है।
कारिका ७६
प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते ।
वस्तुसत्तावबोधार्थं तत्राभावप्रमाणता ॥७६॥
अर्थ: वस्तु की सत्ता जानने के लिए प्रत्यक्ष आदि पाँच प्रमाण जिस वस्तु के विषय में प्रवृत्त नहीं होते, वहाँ अभाव प्रमाण होता है।
कारिका ७७
जैमिनीयमतस्यापि संक्षेपोऽयं निवेदितः ।
एवमास्तिकवादानां कृतं संक्षेपकीर्तनम् ॥७७॥
अर्थ: जैमिनीय मत का भी यह संक्षेप कहा गया। इस तरह (जीव, परलोक, पुण्य पाप मानने वाले) आस्तिक दर्शनों का संक्षेप से कथन किया गया।
टीका से: मीमांसक दो प्रकार के हैं: पूर्व मीमांसा वाले यज्ञ आदि कर्मकाण्ड में लगे रहते हैं, और उत्तर मीमांसा (वेदान्त) वाले कहते हैं ‘जो कुछ हुआ और जो होगा वह सब ब्रह्म ही है’, ब्रह्म में लीन होना ही मुक्ति है।
७. लोकायत (चार्वाक) मत (कारिका ७८ से ८७)
परिचय: जो दिखता है वही सच है: न आत्मा, न परलोक, न पुण्य पाप। इसलिए इसे ‘नास्तिक’ दर्शन कहा जाता है। टीका से: कुछ आचार्य न्याय और वैशेषिक को एक ही मानते हैं; उनके मत में पाँच आस्तिक दर्शनों के साथ यह छठा नास्तिक दर्शन जोड़कर ‘षड्दर्शन’ की संख्या पूरी होती है। कुछ चार्वाक आकाश को पाँचवाँ भूत भी मानते हैं।
कारिका ७८
नैयायिकमतादन्ये भेदं वैशेषिकैः सह ।
न मन्यन्ते मते तेषां पञ्चैवास्तिकवादिनः ॥७८॥
अर्थ: कुछ आचार्य नैयायिक मत का वैशेषिकों से भेद नहीं मानते। उनके मत में आस्तिक दर्शन पाँच ही हैं।
कारिका ७९
षड्दर्शनसंख्या तु पूर्यते तन्मते किल ।
लोकायतमतक्षेपे कथ्यते तेन तन्मतम् ॥७९॥
अर्थ: उनके मत में लोकायत मत को मिलाने पर ही दर्शनों की छह संख्या पूरी होती है, इसलिए उस मत का भी कथन करते हैं।
कारिका ८०
लोकायता वदन्त्येवं नास्ति जीवो न निर्वृतिः ।
धर्माधर्मौ न विद्येते न फलं पुण्यपापयोः ॥८०॥
अर्थ: लोकायत ऐसा कहते हैं: न जीव है, न मोक्ष है, न धर्म अधर्म हैं, और न पुण्य पाप का कोई फल है।
कारिका ८१
एतावानेव लोकोऽयं यावानिन्द्रियगोचरः ।
भद्रे वृकपदं पश्य यद्वदन्त्यबहुश्रुताः ॥८१॥
अर्थ: यह लोक उतना ही है जितना इन्द्रियों से दिखता है। हे भद्रे! इस भेड़िये के पदचिह्न को देखो, जिसे अल्पज्ञ लोग (सच मान कर) कहते हैं।
टीका से (भेड़िये के पदचिह्न की कथा): एक चार्वाक अपनी पत्नी को अपने मत पर लाना चाहता था। रात में उसने हाथ की उँगलियों से नगर के रास्ते पर भेड़िये के पैर जैसे चिह्न बना दिए। सुबह विद्वान् लोग इकट्ठे हुए और बोले, ‘रात में भेड़िया अवश्य नगर में आया है, नहीं तो ये चिह्न कहाँ से आते?’ तब चार्वाक हँसकर पत्नी से बोला, ‘देखो भद्रे, ये बहुश्रुत कहलाने वाले भी बिना देखे अनुमान करके भेड़िया बता रहे हैं। परलोक, पुण्य पाप की बातें भी ऐसी ही हैं’।
कारिका ८२
पिब खाद च चारुलोचने यदतीतं वरगात्रि तन्न ते ।
न हि भीरु गतं निवर्तते समुदयमात्रमिदं कलेवरम् ॥८२॥
अर्थ: हे सुन्दर नेत्रों वाली! पी और खा। हे सुन्दरी! जो बीत गया, वह तेरा नहीं रहा। हे भीरु! गया हुआ लौटता नहीं। यह शरीर तो (भूतों का) समुदाय मात्र है।
कारिका ८३
पृथ्वी जलं तथा तेजो वायुर्भूतचतुष्टयम् ।
आधारो भूमिरेतेषां मानं त्वक्षजमेव हि ॥८३॥
अर्थ: पृथिवी, जल, अग्नि और वायु, ये चार भूत ही तत्त्व हैं। इनका आधार पृथिवी है। इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है।
कारिका ८४
पृथ्व्यादिभूतसंहत्यां तथा देहादिसंभवः ।
मदशक्तिः सुराङ्गेभ्यो यद्वत्तद्वच्चिदात्मनि ॥८४॥
अर्थ: पृथिवी आदि भूतों के मेल से ही देह आदि बनते हैं। जैसे मदिरा के अंगों (महुआ, गुड़ आदि) के मेल से नशे की शक्ति उत्पन्न होती है, वैसे ही (भूतों के मेल से) चैतन्य उत्पन्न होता है।
सरल शब्दों में: चार्वाक के अनुसार आत्मा अलग कुछ नहीं, शरीर में भूतों के मेल से चेतना पैदा होती है और शरीर के साथ ही खत्म हो जाती है। जैसे जल में बुलबुले उठते और उसी में विलीन हो जाते हैं।
कारिका ८५
तस्माद्दृष्टपरित्यागाद्यददृष्टे प्रवर्तनम् ।
लोकस्य तद्विमूढत्वं चार्वाकाः प्रतिपेदिरे ॥८५॥
अर्थ: इसलिए प्रत्यक्ष (दृष्ट) सुख को छोड़कर अदृष्ट (परलोक) के लिए जो प्रवृत्ति करना है, उसे चार्वाक लोगों की मूढ़ता मानते हैं।
कारिका ८६
साध्यवृत्तिनिवृत्तिभ्यां या प्रीतिर्जायते जने ।
निरर्था सा मते तेषां धर्मः कामात्परो न हि ॥८६॥
अर्थ: कर्तव्य में प्रवृत्ति और अकर्तव्य से निवृत्ति से मनुष्य को जो आत्मसन्तोष होता है, उसे चार्वाक निरर्थक बताते हैं। उनके मत में काम से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
कारिका ८७
लोकायतमतेऽप्येवं संक्षेपोऽयं निवेदितः ।
अभिधेयतात्पर्यार्थः पर्यालोच्यः सुबुद्धिभिः ॥८७॥
अर्थ: इस प्रकार लोकायत मत का भी यह संक्षेप कहा गया। इस ग्रन्थ के कथन का तात्पर्य बुद्धिमान् लोग स्वयं विचार कर समझें।
तुलनात्मक तालिका
| दर्शन | देवता | तत्त्व | प्रमाण | मोक्ष |
|---|---|---|---|---|
| बौद्ध | सुगत (बुद्ध) | ४ आर्यसत्य, १२ आयतन | २: प्रत्यक्ष, अनुमान | रागादि वासना का निरोध |
| नैयायिक | शिव (सृष्टि संहार कर्ता) | १६ पदार्थ | ४: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शाब्द | अपवर्ग: दुःख से अत्यन्त छुटकारा |
| सांख्य | कोई निरीश्वर, कोई ईश्वरवादी | २५ तत्त्व | ३: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द | प्रकृति से पुरुष का वियोग |
| जैन | जिनेन्द्र (वीतराग, सर्वज्ञ) | ९ तत्त्व | २: प्रत्यक्ष, परोक्ष | देह आदि से आत्यन्तिक वियोग |
| वैशेषिक | शिव (नैयायिक के समान) | ६ पदार्थ | २: प्रत्यक्ष, अनुमान | आत्मा के ९ विशेष गुणों का उच्छेद |
| जैमिनीय | कोई सर्वज्ञ देव नहीं | (वेद ही प्रमाण) | ६: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव | वेद विहित धर्म से स्वर्ग |
| लोकायत | कोई नहीं | ४ भूत | १: प्रत्यक्ष | नहीं मानते |
आत्मा के बारे में एक नज़र में: बौद्ध: क्षणिक स्कन्धों का प्रवाह, स्थायी आत्मा नहीं। न्याय वैशेषिक: नित्य, व्यापक, ज्ञान आदि गुण उससे भिन्न। सांख्य: नित्य चेतन पर अकर्ता। मीमांसा: नित्य आत्मा, वेद कर्म से स्वर्ग। चार्वाक: शरीर ही आत्मा। जैन: ज्ञान आदि से कथंचित् भिन्न अभिन्न, स्वयं कर्ता भोक्ता, परिणमनशील (कारिका ४८)।
अनेकान्त की दृष्टि से
हर दर्शन वस्तु के किसी एक पक्ष को पकड़ता है: बौद्ध परिवर्तन (क्षणिकता) को, सांख्य और मीमांसा नित्यता को, न्याय और वैशेषिक भेद को, चार्वाक केवल इन्द्रिय से दिखने वाले को। जैन दर्शन वस्तु को उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनों से युक्त और अनन्त धर्मात्मक मानता है (कारिका ५५, ५७), इसलिए इन सब दृष्टियों को अपने अपने नय की अपेक्षा से स्थान देता है, पर किसी एक को पूरा सत्य नहीं मानता। आचार्य हरिभद्र ने भी किसी मत का खण्डन किए बिना सबको सामने रखा और अन्त में कहा: “पर्यालोच्यः सुबुद्धिभिः”, बुद्धिमान् स्वयं विचार करें।
जैन दृष्टि से समीक्षा
पहले एक बात साफ: आचार्य हरिभद्र ने इस ग्रन्थ में किसी मत का खण्डन नहीं किया, केवल सबको उनके शब्दों में रखा। नीचे की समीक्षा मूल ग्रन्थ का भाग नहीं है। यह जैन न्याय की परम्परा से है, मुख्य रूप से आचार्य समन्तभद्र की आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र) से, जिसकी कारिकाएँ मूल रूप में दी गई हैं। समीक्षा व्यक्तियों की नहीं, एकान्त की है: जहाँ कोई मत वस्तु के एक पक्ष को ही पूरा सत्य मान लेता है।
१. बौद्ध: सर्वथा क्षणिक मानने में कठिनाई
बौद्ध मत में हर वस्तु एक क्षण में नष्ट हो जाती है और स्थायी आत्मा नहीं है। जैन आचार्य पूछते हैं: यदि करने वाला क्षण अगले ही क्षण नहीं रहा, तो कर्म किसने किया और फल कौन भोगेगा? “यह वही है” वाली पहचान (प्रत्यभिज्ञान) और स्मृति किसे होगी? परलोक, बन्ध और मोक्ष किसका होगा?
क्षणिकैकान्तपक्षेऽपि प्रेत्यभावाद्यसंभवः।
प्रत्यभिज्ञाद्यभावान्न कार्यारम्भः कुतः फलम्॥ (आप्तमीमांसा ४१)
अर्थ: वस्तु को सर्वथा क्षणिक मानने पर परलोक गमन आदि असम्भव हो जाते हैं। प्रत्यभिज्ञान, स्मृति, अनुमान न रहने से कोई कार्य आरम्भ ही नहीं होगा, फिर उसका सुख दुःख रूप फल कहाँ से?
जैन समाधान: पर्याय (अवस्था) की दृष्टि से वस्तु क्षण क्षण बदलती है, इतना बौद्ध ठीक देखते हैं। पर द्रव्य की दृष्टि से वही आत्मा बनी रहती है, इसलिए करने वाला और भोगने वाला एक है।
२. नैयायिक और वैशेषिक: सर्वथा भेद और जगत्कर्ता
(क) जगत्कर्ता ईश्वर: न्याय वैशेषिक में शिव जगत् के कर्ता संहर्ता हैं। जैन दृष्टि में जगत् अनादि है, द्रव्य अपने आप परिणमन करते हैं। जो वीतराग और कृतकृत्य है उसे बनाने की इच्छा क्यों होगी? और यदि वह कृपालु है तो जगत् में इतना दुःख क्यों? इसलिए जैन दर्शन में देव पूज्य हैं, पर कर्ता नहीं।
(ख) सर्वथा भेद: ये दोनों मत गुण को गुणी से, अवयव को अवयवी से सर्वथा भिन्न मानते हैं और उन्हें “समवाय” नामक सम्बन्ध से जोड़ते हैं।
एकस्याऽनेकवृत्तिर्न भागाऽभावाद्बहूनि वा।
भागित्वाद्वाऽस्य नैकत्वं दोषो वृत्तेरनार्हते॥ (आप्तमीमांसा ६२)
अर्थ: यदि अवयवी अपने अवयवों से सर्वथा भिन्न एक वस्तु है, तो बिना अंश वाली एक वस्तु अनेक अवयवों में कैसे रहेगी? हर अवयव में पूरी रहे तो वह बहुत हो जाएगी; अंश मानें तो वह एक नहीं रहेगी। अर्हन्त के मत से भिन्न सर्वथा भेदवाद में यह दोष आता है।
(ग) वैशेषिक का मोक्ष: वैशेषिक मोक्ष में आत्मा के ज्ञान, सुख आदि नौ विशेष गुणों का उच्छेद मानते हैं। जैन दृष्टि में ज्ञान आत्मा का स्वभाव है, उसके बिना आत्मा जड़ के समान हो जाए। मोक्ष में ज्ञान मिटता नहीं, अनन्त हो जाता है: अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य।
३. सांख्य: पुरुष सर्वथा नित्य और अकर्ता
सांख्य में पुरुष (आत्मा) नित्य, निर्विकार और अकर्ता है; बन्ध और मोक्ष वास्तव में प्रकृति का है। जैन आचार्य पूछते हैं: जो कभी बदलता ही नहीं, वह बँधा कैसे और छूटा कैसे? जो कुछ करता ही नहीं, उसके लिए मोक्ष का उपाय किस काम का?
नित्यत्वैकान्तपक्षेऽपि विक्रिया नोपपद्यते।
प्रागेव कारकाभावः क्व प्रमाणं क्व तत्फलम्॥ (आप्तमीमांसा ३७)
अर्थ: वस्तु को सर्वथा नित्य मानने पर उसमें कोई परिवर्तन बनता ही नहीं। तब पहले ही करने वाले और साधन का अभाव हो जाता है, फिर प्रमाण कहाँ और उसका फल कहाँ?
जैन समाधान: आत्मा द्रव्य रूप से नित्य है और पर्याय रूप से परिणमन करती है। इसी से वह अपने भावों की कर्ता और फल की भोक्ता है, और पुरुषार्थ से मुक्त भी होती है।
४. जैमिनीय (मीमांसा): सर्वज्ञ का निषेध
मीमांसक कहते हैं कि कोई मनुष्य सर्वज्ञ नहीं हो सकता, धर्म का ज्ञान केवल अपौरुषेय वेद से होता है। जैन आचार्य का उत्तर:
सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः प्रत्यक्षाः कस्यचिद्यथा।
अनुमेयत्वतोऽग्न्यादिरिति सर्वज्ञसंस्थितिः॥ (आप्तमीमांसा ५)
अर्थ: सूक्ष्म (जैसे परमाणु), काल से दूर (जैसे बीते हुए महापुरुष) और क्षेत्र से दूर (जैसे मेरु पर्वत) पदार्थ किसी न किसी के प्रत्यक्ष हैं, क्योंकि वे अनुमान से जाने जाते हैं, जैसे पर्वत की अग्नि। इस प्रकार सर्वज्ञ की सिद्धि होती है।
सरल शब्दों में: ज्ञान आत्मा का स्वभाव है, उस पर कर्म का आवरण है। जैसे सोने का मैल पूरा हट सकता है, वैसे आवरण पूरा हटने पर ज्ञान पूर्ण हो जाता है, यही सर्वज्ञता है। साथ ही, यज्ञ में पशु हिंसा को धर्म मानना जैन दृष्टि में अहिंसा के विपरीत है, शास्त्र का प्रमाण हिंसा को धर्म नहीं बना सकता।
५. लोकायत (चार्वाक): केवल प्रत्यक्ष
चार्वाक केवल इन्द्रिय प्रत्यक्ष को प्रमाण मानते हैं और कहते हैं कि परलोक नहीं है। जैन आचार्य दिखाते हैं कि यह बात स्वयं प्रत्यक्ष से नहीं जानी जा सकती: “परलोक नहीं है” यह किसी ने आँख से नहीं देखा, यह तो अनुमान ही है। दूसरों के मन की बात जानना, धुएँ से अग्नि जानना, सारा व्यवहार अनुमान से चलता है। और चैतन्य जड़ भूतों का गुण नहीं हो सकता, क्योंकि मृत शरीर में चारों भूत रहते हैं पर चेतना नहीं। इसलिए जीव शरीर से भिन्न द्रव्य है।
सबको जोड़ने वाली कारिका
द्रव्यपर्याययोरैक्यं तयोरव्यतिरेकतः।
परिणामविशेषाच्च शक्तिमच्छक्तिभावतः॥ (आप्तमीमांसा ७१)
अर्थ: द्रव्य और पर्याय कथंचित् एक हैं, क्योंकि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। और कथंचित् भिन्न भी हैं, क्योंकि उनका परिणमन अलग है और एक शक्तिमान है, दूसरा उसकी शक्ति।
निष्कर्ष: बौद्ध का परिवर्तन, सांख्य और मीमांसा की नित्यता, न्याय वैशेषिक का भेद, सब किसी एक अपेक्षा से सही हैं। दोष तब आता है जब उसे “सर्वथा” कहा जाए। स्याद्वाद “कथंचित्” (किसी अपेक्षा से) जोड़कर इन सबको उनका सही स्थान देता है।
कठिन शब्दों का शब्दकोश
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| दर्शन | जीवन और जगत् को देखने और समझने की एक पूरी पद्धति |
| कारिका | छोटा श्लोक जिसमें किसी सिद्धान्त का सार हो |
| टीका, वृत्ति | मूल ग्रन्थ की व्याख्या; वृत्ति छोटी, टीका विस्तृत |
| तत्त्व | वे मूल सत्य जिनसे जगत् और जीवन समझा जाए |
| पदार्थ | जो जाना और कहा जा सके, न्याय वैशेषिक की मूल श्रेणियाँ |
| द्रव्य | मूल वस्तु जो सदा रहती है, जैसे जीव, पुद्गल |
| गुण | द्रव्य में सदा रहने वाली विशेषता, जैसे जीव में ज्ञान |
| पर्याय | द्रव्य की बदलती अवस्था, जैसे मनुष्य से देव होना |
| प्रमाण | सही ज्ञान का साधन |
| प्रत्यक्ष | सीधा ज्ञान: इन्द्रिय से या (जैन मत में) सीधे आत्मा से |
| परोक्ष | दूसरे के सहारे होने वाला ज्ञान, जैसे स्मृति, अनुमान, शास्त्र |
| अनुमान | चिह्न से जानना, जैसे धुएँ से आग |
| उपमान | समानता से जानना, जैसे “गवय गाय जैसा होता है” |
| शाब्द, आगम | विश्वसनीय वक्ता के वचन से होने वाला ज्ञान |
| अर्थापत्ति | बात बिना दूसरी बात माने न बने, तो उसे मानना; जैसे दिन में न खाने वाला मोटा है तो रात में खाता होगा |
| अभाव (प्रमाण) | किसी चीज़ के न होने को जानना |
| हेत्वाभास | ऐसा तर्क जो हेतु जैसा दिखे पर दोषी हो |
| छल, जाति, निग्रहस्थान | वाद में शब्द का गलत अर्थ, गलत आपत्ति, और हार का स्थान |
| वितण्डा | अपना पक्ष रखे बिना केवल दूसरे का खण्डन करना |
| समवाय | न्याय वैशेषिक में गुण और गुणी को जोड़ने वाला नित्य सम्बन्ध |
| सामान्य, विशेष | सबमें समान धर्म (जैसे “गायपन”) और हर एक को अलग करने वाला धर्म |
| परमाणु | पुद्गल का सबसे छोटा अविभाज्य अंश |
| प्रकृति | सांख्य में जड़ मूल कारण जिससे जगत् बनता है |
| पुरुष | सांख्य में चेतन आत्मा, जो अकर्ता है |
| अहंकार, तन्मात्रा | सांख्य के तत्त्व: “मैं” का भाव, और शब्द रूप आदि के सूक्ष्म तत्त्व |
| स्कन्ध | बौद्ध मत में रूप, वेदना आदि पाँच समूह जिनसे “व्यक्ति” बनता है |
| आयतन | बौद्ध मत में इन्द्रियाँ और उनके विषय, कुल बारह |
| आर्यसत्य | बौद्ध मत के चार सत्य: दुःख, समुदय, निरोध, मार्ग |
| क्षणिक | केवल एक क्षण रहने वाला |
| वासना | पुराने अनुभव का संस्कार जो आगे असर डालता है |
| अपवर्ग | न्याय दर्शन में दुःख से पूरा छुटकारा |
| अपौरुषेय | जिसे किसी पुरुष ने न बनाया हो, मीमांसा में वेद |
| अदृष्ट | न दिखने वाला कर्म का संस्कार जो फल देता है |
| भूत | पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु; चार्वाक इन्हीं को तत्त्व मानते हैं |
| लोकायत | चार्वाक मत का दूसरा नाम |
| सर्वज्ञ | जो सब कुछ जानता हो |
| आस्रव, बन्ध | कर्म का आत्मा की ओर आना, और आत्मा से बँध जाना |
| संवर, निर्जरा | नए कर्म को रोकना, और पुराने कर्म का झड़ना |
| एकान्त | वस्तु के एक ही पक्ष को पूरा सत्य मानना |
| अनेकान्त | वस्तु में अनेक धर्म हैं, यह दृष्टि |
| स्याद्वाद | “स्यात्”, यानी किसी अपेक्षा से, लगाकर कहने की पद्धति |
| नय | किसी एक अपेक्षा से वस्तु को देखना |
| कथंचित् | किसी अपेक्षा से, सर्वथा नहीं |
| उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य | नई अवस्था का बनना, पुरानी का मिटना, और मूल का बने रहना |
समीक्षा का स्रोत: आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र), आचार्य समन्तभद्र, कारिका ५, ३७, ४१, ६२, ७१; पाठ और अर्थ आर्यिका ज्ञानमती माताजी की हिन्दी टीका सहित संस्करण से मिलाए गए। ईश्वर कर्तृत्व, वैशेषिक मोक्ष और चार्वाक वाले अंश जैन न्याय परम्परा का सार हैं, सरल शब्दों में।
नए पाठक के लिए प्रश्नोत्तर
प्रश्न १. “दर्शन” शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?
उत्तर: यहाँ दर्शन का अर्थ आँख से देखना नहीं, जीवन और जगत् को समझने की एक पूरी विचार पद्धति है। हर दर्शन चार बातों का उत्तर देता है: पूज्य देव कौन, जगत् किन तत्त्वों से बना, सही ज्ञान किन प्रमाणों से होता है, और अन्तिम लक्ष्य (मोक्ष) क्या है।
प्रश्न २. “षड्दर्शन” में कौन से छह दर्शन हैं?
उत्तर: आचार्य हरिभद्रसूरि ने बौद्ध, नैयायिक, सांख्य, जैन, वैशेषिक और जैमिनीय (मीमांसा) को छह दर्शन गिनाया है। फिर लोकायत (चार्वाक) मत भी बताया है। टीका के अनुसार कुछ आचार्य न्याय और वैशेषिक को एक मानते हैं, तब चार्वाक को जोड़कर छह की संख्या पूरी होती है।
प्रश्न ३. आचार्य जैन होकर भी दूसरे दर्शनों को उन्हीं के शब्दों में क्यों रखते हैं?
उत्तर: ग्रन्थ का उद्देश्य खण्डन नहीं, परिचय है। हर मत को उसी की मान्यता के अनुसार रखा गया है और निर्णय पाठक की बुद्धि पर छोड़ा गया है (कारिका ८७)। यही अनेकान्त की उदार दृष्टि है।
प्रश्न ४. “प्रमाण” क्या होता है?
उत्तर: जिस साधन से किसी वस्तु का सही ज्ञान हो, वह प्रमाण है। जैसे आँख से देखना प्रत्यक्ष है, धुआँ देखकर आग जान लेना अनुमान है। कौन कितने प्रमाण मानता है, इसी से उस दर्शन का स्वभाव समझ आता है: चार्वाक केवल एक, प्रत्यक्ष, और मीमांसा छह।
प्रश्न ५. क्या सभी दर्शन ईश्वर को जगत् का कर्ता मानते हैं?
उत्तर: नहीं। नैयायिक और वैशेषिक शिव को सृष्टि और संहार का कर्ता मानते हैं। सांख्य में कुछ निरीश्वर हैं और कुछ ईश्वरवादी। बौद्ध, जैन, मीमांसा और चार्वाक कोई जगत्कर्ता ईश्वर नहीं मानते। जैन दर्शन में देव वह आत्मा है जिसने राग, द्वेष और मोह जीतकर पूर्ण ज्ञान पाया।
प्रश्न ६. आत्मा के बारे में मुख्य मतभेद क्या है?
उत्तर: बौद्ध कोई स्थायी आत्मा नहीं मानते, केवल क्षण क्षण बदलते स्कन्धों का प्रवाह। सांख्य आत्मा (पुरुष) को नित्य और चेतन पर अकर्ता मानता है। न्याय वैशेषिक आत्मा को नित्य और व्यापक मानते हैं, ज्ञान को उससे भिन्न गुण। चार्वाक शरीर को ही आत्मा मानते हैं। जैन आत्मा को स्वयं कर्ता और भोक्ता, और परिणमनशील मानते हैं (कारिका ४८)।
प्रश्न ७. मोक्ष का अर्थ सब दर्शनों में एक ही है क्या?
उत्तर: नहीं। बौद्ध के लिए रागादि वासनाओं का निरोध, न्याय के लिए दुःख से अत्यन्त छुटकारा (अपवर्ग), सांख्य के लिए प्रकृति से पुरुष का वियोग, वैशेषिक के लिए आत्मा के नौ विशेष गुणों का उच्छेद, जैन के लिए देह और सब कर्मों से आत्मा का सदा के लिए छूटना। चार्वाक मोक्ष मानते ही नहीं।
प्रश्न ८. मोक्ष पाने का उपाय कौन क्या बताता है?
उत्तर: बौद्ध क्षणिकता की भावना (मार्ग सत्य), सांख्य प्रकृति और पुरुष के भेद का ज्ञान, न्याय और वैशेषिक अपने पदार्थों का तत्त्वज्ञान, मीमांसा वेद विहित कर्म (उत्तर मीमांसा ब्रह्म में लीनता)। जैन दर्शन कहता है अकेला ज्ञान या अकेली क्रिया नहीं, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र, तीनों मिलकर मोक्ष मार्ग हैं।
प्रश्न ९. जैन दर्शन के नौ तत्त्व सरल रूप में क्या हैं?
उत्तर: जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बन्ध, निर्जरा और मोक्ष। नाव के उदाहरण से: जीव नाव है, छेद से पानी आना आस्रव, पानी भर जाना बन्ध, छेद बन्द करना संवर, भरा पानी उलीचना निर्जरा, और नाव का पार पहुँचना मोक्ष।
प्रश्न १०. वेद को अन्तिम प्रमाण मानने का मीमांसा का तर्क क्या है?
उत्तर: मीमांसा कहती है कि धर्म अधर्म जैसे अतीन्द्रिय पदार्थों को साक्षात् देखने वाला कोई सर्वज्ञ नहीं है, इसलिए नित्य वेद वाक्यों से ही उनका निश्चय होता है। धर्म का लक्षण नोदना है, अर्थात् वेद का प्रेरक वचन, जैसे “स्वर्ग की इच्छा वाला अग्नि का यजन करे”।
प्रश्न ११. चार्वाक को “नास्तिक” क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि वे कहते हैं न जीव है, न मोक्ष, न धर्म अधर्म, न पुण्य पाप का फल। उनके मत में चार भूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु) ही तत्त्व हैं और इन्द्रिय से होने वाला प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है।
प्रश्न १२. अनेकान्त क्या है, और यह दूसरे दर्शनों को कैसे देखता है?
उत्तर: अनेकान्त का अर्थ है वस्तु में अनन्त धर्म हैं, और हर कथन किसी एक अपेक्षा से सत्य है। वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनों से युक्त है (कारिका ५५, ५७)। बौद्ध परिवर्तन को, सांख्य नित्यता को, न्याय वैशेषिक भेद को पकड़ते हैं; जैन दर्शन सबको अपनी अपनी अपेक्षा से स्थान देता है, पर किसी एक पक्ष को पूरा सत्य नहीं मानता।
प्रश्न १३. “स्याद्वाद” में “स्यात्” का अर्थ “शायद” है क्या?
उत्तर: नहीं। यहाँ “स्यात्” का अर्थ है “किसी अपेक्षा से”, “कथंचित्”। जैसे एक ही व्यक्ति अपने पिता की अपेक्षा से पुत्र है और अपने पुत्र की अपेक्षा से पिता। यह संशय नहीं, अपेक्षा सहित निश्चित कथन है।
प्रश्न १४. इस ग्रन्थ को पढ़ने का सरल क्रम क्या हो?
उत्तर: पहले ऊपर का “यह पोस्ट किसके लिए है” और हर दर्शन का परिचय पढ़ें। फिर नीचे की दोनों तालिकाएँ देखें। उसके बाद हर दर्शन की कारिकाएँ अर्थ सहित पढ़ें, और अन्त में “जैन दृष्टि से समीक्षा”। कठिन शब्द आए तो शब्दकोश देख लें।
छहों दर्शनों की विस्तृत तुलना
ऊपर की तुलनात्मक तालिका सार देती है। यह तालिका हर दर्शन के तत्त्व पूरे नाम सहित, और मोक्ष के साथ उसका उपाय भी दिखाती है।
| दर्शन | देव | तत्त्व (पूरे नाम) | प्रमाण | मोक्ष | मोक्ष का उपाय |
|---|---|---|---|---|---|
| बौद्ध | सुगत (बुद्ध) | ४ आर्यसत्य: दुःख, समुदय, मार्ग, निरोध | २: प्रत्यक्ष (कल्पना और भ्रान्ति से रहित), अनुमान | रागादि वासनाओं का निरोध (निर्वाण) | “सब संस्कार क्षणिक हैं” यह भावना (मार्ग सत्य) |
| नैयायिक | शिव: सृष्टि संहार कर्ता, नित्य, सर्वज्ञ | १६ पदार्थ: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान | ४: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शाब्द | अपवर्ग: दुःख से अत्यन्त छुटकारा | सोलह पदार्थों का तत्त्वज्ञान |
| सांख्य | कोई निरीश्वर, कोई ईश्वरवादी | २५ तत्त्व: प्रकृति, बुद्धि (महान्), अहंकार, ५ तन्मात्रा, ११ इन्द्रिय (५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय, मन), ५ महाभूत, और पुरुष | ३: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द | प्रकृति से पुरुष का वियोग | प्रकृति और पुरुष के भेद का ज्ञान |
| जैन | जिनेन्द्र: वीतराग, सर्वज्ञ, इन्द्रों से पूजित | ९ तत्त्व: जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बन्ध, निर्जरा, मोक्ष | २: प्रत्यक्ष (स्पष्ट), परोक्ष (अस्पष्ट) | देह आदि और सब कर्मों से आत्मा का आत्यन्तिक वियोग | रत्नत्रय: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, तीनों साथ |
| वैशेषिक | शिव (नैयायिक के समान) | ६ पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय | २: प्रत्यक्ष, अनुमान | आत्मा के ९ विशेष गुणों (बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार) का अत्यन्त उच्छेद | छह पदार्थों का तत्त्वज्ञान |
| जैमिनीय (मीमांसा) | कोई सर्वज्ञ देव नहीं, वेद ही अन्तिम प्रमाण | वेद विहित धर्म ही मुख्य विषय | ६: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव | पूर्व मीमांसा: स्वर्ग; उत्तर मीमांसा: ब्रह्म में लीनता | वेद का पाठ, धर्म जिज्ञासा, और नोदना (वेद की प्रेरणा) के अनुसार यज्ञ आदि कर्म |
| लोकायत (चार्वाक) | कोई नहीं | ४ भूत: पृथिवी, जल, अग्नि, वायु (कुछ आकाश को पाँचवाँ भी मानते हैं) | १: इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष | नहीं मानते | नहीं मानते; काम से बढ़कर कोई धर्म नहीं |
आत्मा, ईश्वर और वस्तु का स्वरूप:
| दर्शन | आत्मा | जगत्कर्ता ईश्वर | वस्तु का स्वरूप |
|---|---|---|---|
| बौद्ध | स्थायी आत्मा नहीं, क्षणिक स्कन्धों का प्रवाह | नहीं | सर्वथा क्षणिक |
| नैयायिक, वैशेषिक | नित्य, व्यापक; ज्ञान आदि गुण उससे भिन्न | हाँ, शिव | पदार्थ परस्पर सर्वथा भिन्न |
| सांख्य | पुरुष: नित्य, चेतन, पर अकर्ता | मतभेद | पुरुष नित्य, प्रकृति परिणामी |
| जैन | स्वयं कर्ता भोक्ता, ज्ञान आदि से कथंचित् भिन्न अभिन्न, परिणमनशील | नहीं | उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य युक्त, अनन्त धर्मात्मक |
| जैमिनीय | नित्य आत्मा | नहीं | वेद नित्य |
| लोकायत | शरीर ही आत्मा | नहीं | केवल चार भूतों का मेल |
देव, तत्त्व, प्रमाण और मोक्ष वाले कॉलम ऊपर दी गई कारिकाओं, उनके अर्थ और टीका के बिन्दुओं से बनाए गए हैं। न्याय और वैशेषिक के “मोक्ष का उपाय” (तत्त्वज्ञान) उनकी अपनी परम्परा के सूत्रों के अनुसार है, सरल शब्दों में।
स्रोत: षड्दर्शनसमुच्चय, आचार्य हरिभद्रसूरि, गुणरत्नसूरि कृत तर्करहस्यदीपिका और सोमतिलकसूरि कृत लघुवृत्ति सहित, हिन्दी अनुवाद सहित, सम्पादक डॉ. महेन्द्रकुमार जैन न्यायाचार्य, भारतीय ज्ञानपीठ, द्वितीय संस्करण १९८१। कारिका पाठ और संख्या इसी संस्करण के अनुसार; अर्थ इसी संस्करण के हिन्दी अनुवाद के आधार पर; “टीका से” वाले बिन्दु गुणरत्नसूरि की टीका के हिन्दी अनुवाद से। “सरल शब्दों में” और “उदाहरण” वाले अंश नए पाठकों के लिए जोड़ी गई व्याख्या हैं।