संयम-प्रकाश — जैन स्वाध्याय सामग्री | Sanyam-Prakash

संयम-प्रकाश

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

आचार्य श्री सूर्यसागरजी महाराज द्वारा विरचित

संयम-प्रकाश

(उत्तरार्ध प्रथम एवं द्वितीय भाग)

प्रकाशक
श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट
केशोरायपाटन रोड, गिरधरपुरा, कोटा

: मुद्रण व्यवस्था :
प्री ऐलविल सन (संजय शास्त्री) सर्वोदय अहिंसा, जयपुर + 91 95092 32733

प्रथम आवृत्ति : 1000 प्रतियाँ
प्रकाशन तिथि : अष्टाव्ह्निका पर्व, फाल्गुन माह, रविवार, 17 मार्च 2014
द्वितीय आवृत्ति : 1000 प्रतियाँ
प्रकाशन तिथि : अष्टाव्ह्निका पर्व, फाल्गुन माह, रविवार, 21 मार्च 2021
न्योछावर राशि : 150/- रुपये

प्राप्ति स्थान

  1. श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन
    मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट
    केशोरायपाटन रोडसंत
    गिरधरपुरा, कोटा (राजस्थान)
    E-mail : [email protected]
  2. सर्वोदय अहिंसा
    बी. 180 ए. 2 मंगल मार्ग, बापू नगर
    जयपुर-15 +91 9785 999100
  3. श्री प्रेमचन्द बजाज
    बजाज पैलेस, नगर परिषद कॉलोनी
    छावनी, कोटा-324 007

: मुद्रण एवं वितरण व्यवस्था :
प्री ऐलविल सन (संजय शास्त्री) सर्वोदय अहिंसा, जयपुर + 91 95092 32733

प्रकाशकीय

जैनधर्म में संयम का स्थान सर्वोपरि है। मनुष्य गति की सार्थकता भी संयम धारण करने में है। जैनाचार्यों ने भी संयम धर्म पर विशेष प्रकाश डाला है। द्वादशांगरूपिणी गंगा में आचारांग सूत्र का प्रथम स्थान है। इससे भी संयम की महिमा स्पष्ट होती है। यथार्थ में मानव जीवन की अनुपम विभूति संयम ही है, जो कि अन्य पदार्थों में सुलभ नहीं होती।

संसारी जीव के समक्ष दो मार्ग हैं - एक निवृत्ति मार्ग, दूसरा प्रवृत्ति मार्ग अर्थात् एक मोक्षमार्ग और दूसरा संसारमार्ग। मोक्षमार्ग संसारमार्ग से विपरीत मार्ग है और वह अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करने से अर्थात् संयम के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रस्तुत ग्रन्थ में आचार्य सूर्यसागर महाराज द्वारा उसी संयम-रत्न पर प्रकाश डाला गया है।

इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें संयम का वर्णन है। इसमें संयम के भेद-प्रभेदों को सविस्तार प्रतिपादित किया गया है। ग्रन्थ के प्राथमिक मंगलाचरण से यह भी स्पष्ट है कि यह कोई नवीन रचना नहीं है, अपितु संयम प्ररूपक विभिन्न ग्रन्थों के विषयों का संग्रह मात्र है। इसमें प्रायः सभी जैन ग्रन्थों के संयम विषयक प्रमाण उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं, जैनेतर साहित्य के प्रमाणों को भी संयम को समझाने के लिए उद्धृत किया गया है। इससे यह ग्रन्थ सर्व साधारण के लिए विशेष उपयोगी बन गया है। विभिन्न विषयों को देखने के लिए पाठक को यह चाहता है कि वह थोड़े समय में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करे। ऐसे जिज्ञासु पाठकों के लिए इसप्रकार के संग्रह-ग्रन्थ बहुत उपयोगी होते हैं।

ऐसे अमूल्य जिनआगम को प्रकाशित कराने का भाव मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा के अध्यक्ष तत्त्वार्यिक श्री प्रेमचन्दजी बजाज को हुआ तथा उन्होंने अपने भावों की मूर्त रूप प्रदान करते हुए मुमुक्षुओं के लाभार्थ संयम-प्रकाश ग्रन्थ को प्रकाशित कराने का निर्णय लिया। फलस्वरूप मार्च 2013-14 की अष्टाव्ह्निका पर्व के अवसर पर इसके तीन भागों का प्रकाशन हुआ। अब पुनः तृतीय भाग का प्रकाशन किया जा रहा है।

ग्रन्थ के सुन्दर प्रकाशन एवं आद्योपांत अवलोकन-संशोधन हेतु संजय शास्त्री (सर्वोदय अहिंसा) जयपुर, सक्षम सेटिंग हेतु श्रीमती प्रीति जैन, जयपुर एवं पुनः संशोधन हेतु पण्डित सचिन्द्र शास्त्री, गहोड़ा, श्री जिनेश सेठ धन्यवादी हैं। महाविद्यालय के प्राचार्य पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के अमूल्य सुझाव भी हमारे लिए उपयोगी रहे। एतदर्थ हम उनके हृदय से आभारी हैं। ग्रन्थ के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग देने वाले महानुभावों के प्रति भी हम कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

तत्त्वपिपासु जन प्रस्तुत कृति के द्वारा मोक्षमार्ग में अग्रसर हों - इसी मंगल भावना के साथ विराम।

  • प्रेमचन्द बजाज
    अध्यक्ष, मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा

श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा

।। संक्षिप्त परिचय ।।

अनन्त तीर्थंकरों और आचार्यों की भावनाओं के अनुरूप कल्याणकारी जिनवाणी और जिनधर्म चिरकाल तक जीवन्त रहे - इसी मंगलमय भावना से आध्यात्मिक सद्गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के पुण्य प्रभावन में 4 फरवरी से 10 फरवरी 2006 तक अनेक विद्वानों के सान्निध्य में श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम का पंचकल्याणक संपन्न हुआ।
आश्रम की स्थापना के समय से ही शास्त्र स्वाध्याय, पूजन, विधान, ग्रुप शिविर एवं शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर आदि का आयोजन, धर्म-शिक्षा हेतु विद्यालय एवं महाविद्यालय की स्थापना तथा जिनवाणी का प्रकाशन आदि गतिविधियाँ निरन्तर संचालित हो रही है।
आठ बीघा क्षेत्र में फैले मुमुक्षु आश्रम में भव्य श्री शीतलनाथ जिनालय, श्री महावीर स्वामी जिनालय, श्री सीमन्धर जिनालय, उगा श्री मानस्तम्भ जिनालय एवं कृत्रिम पहाड़ी पर ग्यारह फीट ऊँची कायोत्सर्ग मुद्रा वाली श्री मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा युक्त जिनालय है।

मुमुक्षु आश्रम द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय

आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय

जिनवाणी के प्रचार-प्रसार हेतु रत्नज्ञान को हृदयंगम करने वाले व वाणी में ओज धारण करने वाले विद्वानों का होना अत्यन्त आवश्यक है। अतः इसी भावना के साथ आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय की स्थापना जुलाई 2008 में की गई। इस काल में जहाँ अन्य बालक/युवा पाश्चात्य की अंधी दौड़ में अपने धर्म एवं संस्कार को खाते जा रहे हैं। वहीं इस महाविद्यालय में छात्रों को धार्मिक व नैतिक संस्कार सहित लौकिक शिक्षा व कम्प्यूटर/अंग्रेजी आदि की शिक्षा प्रदान की जाती है।
पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के प्राचार्यत्व एवं पण्डित अभिनव शास्त्री, पण्डित नीतेश शास्त्री, पण्डित निन्य शास्त्री एवं पण्डित चर्चित शास्त्री के अधीक्षकत्व में संचालित महाविद्यालय में किसी जाति-भाषा-प्रान्त के भेदभाव के बिना तप-रुचिवन्त छात्रों को कक्षा दसवीं में प्राप्त 60 प्रतिशत या अधिक अंकों के आधार पर साक्षात्कार की प्रक्रिया द्वारा प्रवेश दिया जाता है। दसवीं के पश्चात् छात्र यहाँ रहकर प्रथम दो वर्षों में अजमेर बोर्ड (राजस्थान) की वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षा उत्तीर्ण करके तीन वर्षों में राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय की जैनदर्शन शास्त्री (बी.ए.) की डिग्री प्राप्त करते हैं, जो पूरे भारत में मान्य है। छात्रों को भोजन, आवास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि की उच्च स्तरीय सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान पण्डित ज्ञानरजी शास्त्री (जेवर) एवं श्री प्रेमचन्द बजाज का सान्निध्य भी यहाँ के छात्रों को निरंतर प्राप्त होता है।
छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए महाविद्यालय में सह-शैक्षणिक एवं शिक्षणेतर गतिविधियाँ, साप्ताहिक गोष्ठी, प्रवचन प्रशिक्षण, साहित्यिक प्रतियोगिताएँ, चर्चा-समाधान, शैक्षिक भ्रमण, खेल-

कूद, व्यायाम, धार्मिक विधि-विधान और संगीत-भजन आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है एवं समय-समय पर बाहर से आमन्त्रित विशिष्ट विद्वानों एवं विषय विशेषज्ञों का मार्गदर्शन भी छात्रों को प्राप्त होता है। महाविद्यालय में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ आदि प्रान्तों के छात्र अध्ययन कर रहे हैं। इसमें अब तक 68 छात्र शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं।

आचार्य समन्तभद्र छात्रवृत्ति

अप्रैल 2018 से नन्हें-मुन्ने बालकों में बचपन से धर्म-संस्कार रोपित करने के उद्देश्य से ट्रस्ट द्वारा आचार्य समन्तभद्र विद्यानिकेतन की स्थापना की गई। पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के प्राचार्यत्व एवं पण्डित पीयूष शास्त्री, पण्डित चर्चित शास्त्री के अधीक्षकत्व में संचालित इस विद्यालय की प्रवेश-प्रक्रिया आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय की तरह ही है।
विद्यानिकेतन की कुछ विशेषताएँ निम्नानुसार हैं -

  • अंग्रेजी माध्यम द्वारा सी.बी.एस.ई. के प्रतिनिश्चित विद्यालय में अध्ययन।
  • लौकिक शिक्षा के साथ धर्म अध्ययन व चारित्रिक निर्माण का स्वर्ण अवसर।
  • आधुनिक सर्व सुविधायुक्त आवासीय परिसर।
  • कम्प्यूटर शिक्षा एवं छात्र की रुचि-अनुसार वाद्य-यन्त्र आदि सीखने की समुचित व्यवस्था।
  • विद्यानिकेतन में अध्ययन के दौरान धार्मिक एवं लौकिक परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को स्कूल फीस में 50 प्रतिशत तक की छात्रवृत्ति।
  • विद्यानिकेतन में 85 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने और आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रों को शास्त्री-अध्ययन हेतु छात्रवृत्ति प्रदान की दी जाएगी।
  • आवास-भोजन एवं विद्यालय-बस आदि की निःशुल्क व्यवस्था। प्रतिवर्ष 20 छात्रों को प्रवेश।
    वर्तमान में विद्यानिकेतन में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली एवं छत्तीसगढ़ राज्य के पचास छात्र अध्ययन-रत हैं एवं 11 छात्र दसवीं कक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं।

कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन महाविद्यालय, कोटा

कहान समवसार समिति शताब्दी वर्ष के अवसर पर पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के नाम सहित वर्ष 2021 से प्रारंभ होने वाला देश का यह प्रथम महाविद्यालय है। जिसमें प्रवेश लेकर शास्त्री के अतिरिक्त छात्र बी.ए., बी.एस.सी., बी.कॉम., बी.एड. की डिग्री भी प्राप्त की जा सकती है।
झालावाड़ रोड़, रंगपुर-कोटा में स्थित यह महाविद्यालय कोटा विश्वविद्यालय कोटा एवं जगद्गुरु रामानन्द शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर से सम्बद्ध है। यहाँ 115 कक्षों का सर्व-सुविधायुक्त छात्रावास भी है।

अतिथि भवन/भोजनशाला

मुमुक्षु आश्रम में बाहर से पधारे वाले साधर्मी मुमुक्षु बन्धुओं एवं छात्रों के अभिभावकों के लिए अतिथि भवन बनाया गया है। यहाँ पधारे वाले साधर्मियों के लिए शुद्ध भोजन की व्यवस्था भी है।

औषधालय

आश्रम परिसर में ही निःशुल्क औषधालय संचालित है, जिसमें महाविद्यालय के छात्रों के अलावा आसपास के निवासियों का भी शुद्ध रीति से तैयार आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा उपचार किया जाता है।

सारस्वत प्रकाशन

ट्रस्ट द्वारा अप्रकाशित एवं वर्तमान में अनुपलब्ध दिगम्बर जैन ग्रन्थ प्रकाशित करके अल्प मूल्य में साधर्मियों को स्वाध्याय हेतु उपलब्ध कराये जाते हैं। इसके अन्तर्गत प्रस्तुत ग्रन्थ के अलावा, संयम प्रकाश सम्पूर्ण (तीन भाग), क्रियाकोश, धर्मपरीक्षा, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्रव्य संग्रह, बाईस परीषहजय विवेचन, शान्ति सुधा, श्री जिनेन्द्र पूजन तथा सर्वसिद्धि प्रश्नोत्तर आदि भी प्रकाशित हो चुके हैं। इसी क्रम में बचा सहा प्रकाशनधीन है।

शिविरों में सहयोग

ट्रस्ट द्वारा आध्यात्मिक शिक्षण शिविरों, ग्रुप शिविरों एवं बाल संस्कार शिविरों के संचालन में सहयोग किया जाता है।

आगामी योजनाएँ

मासिक पत्रिका का प्रकाशन। प्रवचन मंडप का निर्माण। मुमुक्षु आराधना निलय का निर्माण। कोटा एवं आसपास के नगरों में वीतराग विज्ञान पाठशालाओं एवं स्वाध्याय सभाओं का संचालन।

प्रेमचन्द बजाज अध्यक्ष
तनमय बजाज उपाध्यक्ष
ध्याता बजाज मंत्री
श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा

प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोग देने वाले दातार

21000/- श्री प्रेमचन्द जैन बजाज-श्रीमती सुनीता बजाज, ध्याता बजाज, कोटा
21000/- श्री तन्मय जैन बजाज-श्रीमती चन्दा बजाज, कोटा
11000/- स्व. श्री स्वरूपचन्द जैन की स्मृति में राजेश जैन विवेक जैन करहल
5100/- श्री अरुणजी बजाज-श्रीमती सुनीता बजाज, संभव बज परिवार, कोटा
5100/- श्री अपूर्व जैन-श्रीमती दिव्या जैन, संभव बज परिवार, कोटा
5100/- श्रीमती तारा देवी ध.प. श्री प्रकाशजी, खटोड़, कोटा
5000/- श्रीमती सरोज जैन, कोटा
5000/- श्री जितेन्द्र जैन-आभा जैन, कोटा
5000/- श्री रोहित जैन-सविता जैन, जयपुर
5000/- श्रीमती संतोष जैन-डॉ. मानमल जैन, कोटा

5000/- श्रीमती मंजुला जैन-डॉ. कमल जैन बाकलीवाल, कोटा
3100/- श्रीमती सीमा जैन-रमेश जैन, भीलवाड़ा
2500/- श्री मुकेश जैन-रेणु जैन, कोटा
2100/- श्रीमती उमा जैन-सुभाष जैन पालीवाल, कोटा
2100/- श्री वर्धमान जैन, कोटा
2100/- श्री सुमित जैन-रिंकू जैन, कोटा
2100/- श्रीमती बीना-भानुकुमार पाटनी, कोटा
2100/- श्री त्रिशला जैन, कोटा
2100/- श्री त्रिशला मण्डल, छावनी-कोटा
2100/- श्री अद्वैत जैन क्षपक जैन, कोटा
2100/- कु. आयुषी जैन शुभम जैन, कोटा
2100/- श्रीमती रुचिका जैन अतुल जैन, भानपुरा
1500/- गुप्तदान
1100/- श्रीमती गीता जैन सतीशचन्द जैन, कोटा
1100/- श्रीमती बीना जैन सुशील जैन पाटौदी, कोटा
1100/- श्रीमती चंद्रकला जैन, कोटा
1100/- श्री त्रिलोक जैन-रुचि जैन, कोटा
1100/- श्री रविन्द्र जैन-अनीता जैन, कोटा
1100/- श्रीमती अमिता जैन-नवीन जैन, कोटा
1100/- श्रीमती आकांक्षा जैन-पीयूष जैन, जयपुर
1100/- श्री शोभित जैन-श्रीमती मेघा जैन, कोटा
1100/- कु. आरुषी जैन, श्री मोक्ष जैन, कोटा
1100/- श्रीमती रूबी जैन-मनोज जैन, कोटा
1100/- श्री आदीश जैन पाटनी, कोटा
1100/- श्रीमती सोनू जैन-अमित जैन, दिल्ली
1000/- श्रीमती कमलेश जैन-जगदीश जैन, कोटा
1000/- श्रीमती कविता जैन-प्रीतम जैन, कोटा
1000/- श्रीमती कल्पना जैन-राजकुमार जैन पाटौदी, कोटा
500/- गुप्तदान
500/- श्रीमती शोभा जैन, कोटा

श्री 108 आचार्य श्री सूर्यसागरजी महाराज का जीवन-परिचय

श्री आचार्य सूर्यसागरजी महाराज का जन्म कार्तिक शुक्ल नवमी, शुक्रवार विक्रम सम्वत् 1940 को खालिय रियासत के शिवपुर जिलान्तर्गत पेमसर नामक ग्राम में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री हीरालाल व माता का नाम मेंदाबाई था। आप पोरवाल दिगम्बर जैन जाति के वत्सल गोत्र में उत्पन्न हुए थे।
गुरुस्वाम्य में आपका नाम हजारीमलजी था। हीरालालजी के सहोदर भाई श्री बलदेवजी के कोई संतान नहीं थी, अतः हजारीमलजी उनके दत्तक हो गये। बलदेवजी की धर्मपत्नी का नाम भूलाबाई था। बलदेवजी झालरापाटन में अफीम की दलाली करते थे। हजारीमलजी बाल्यावस्था में ही झालरापाटन आ गये और वहीं ही उन्हें सामान्य शिक्षा प्राप्त हुई। दुर्भाग्यवश सं. 1952 में जबकि हजारीमलजी बारह वर्ष के ही थे, बलदेवजी की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद हजारीमलजी का पालन-पोषण झालरापाटन के प्रसिद्ध सज्जन नाथूरामजी जोरजी राव के द्वारा हुआ। ये बलदेवजी के परम मित्र थे। परिस्थितिवश हजारीमलजी को विशेष शिक्षा प्राप्त न हो सकी और छोटी अवस्था में ही शिवपुर जिले के मेवाड़ ग्राम में ओंकारमलजी पोरवाल की सुपुत्री मोताबाई के साथ विवाह भी हो गया। इसके कुछ दिनों बाद हजारीमलजी इन्दौर चले गये और वहाँ अपने राज राजा सर सेठ आदि अनेक पद विभूषित श्री हुकुमचन्दजी के यहाँ तथा बाद में स्वर्गीय सेठ कल्पराममलजी के यहाँ नौकरी की, किन्तु आपको नौकरी करना पसंद नहीं आया। स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना ही आपने अच्छा समझा और एक कपड़े की दुकान इन्दौर में ही कर ली। साथ में कपड़े की दलाली भी करते रहे। इससे आपकी आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक रही।
आपके कई सन्तानें हुई। उनमें श्री शिवनारायणजी एवं समीमलजी दो पुत्र अब भी मौजूद हैं, जो इन्दौर में ही कपड़े का व्यवसाय करते हैं।
हजारीमलजी की बाल्यावस्था से ही धर्म की ओर बहुत रुचि थी। शास्त्र स्वाध्याय, पूजन-प्रक्षाल, सामाजिक आदि में आप बचपन से ही काफी समय लगाया करते थे। ज्यों-ज्यों अवस्था बढ़ती गई, धर्म की ओर आप अधिकाधिक झुकते गये। भागवत आपको धर्मपत्नी भी ऐसी ही मिली, जो धार्मिक चर्चाओं को अच्छी तरह समझती और गोम्मटसार आदि सिद्धान्त ग्रन्थों का स्वाध्याय करती थी। इससे आपको ज्ञानवृद्धि में काफी सहायता मिली, पर दुर्भाग्यवश यह सहयोग बहुतकाल तक न रहा। विक्रम संवत् 1972 में आपकी पत्नी का देहान्त हो गया। पत्नी वियोग के

पश्चात् संसार, शरीर और भोगों से आप उदासीन रहने लगे और हृदय में वैराग्य-मय जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा बढ़ने लगी।
संवत् 1981 को वर्ष था। एक दिन रात्रि के समय श्री हजारीमलजी को यह स्वप्न आया कि जलाशय में एक रहने पर बैठा हुआ आदमी उनसे कह रहा है कि चलो आओ, देर न करो। पर उसके आग्रह करने पर भी उन्होंने जलाशय में प्रवेश नहीं किया। तब उस आदमी ने तटको को किनारे पर लगाया और उनको किसी तरह तटले पर चढ़ाकर थोड़ी दूर जल में ले जाकर एक स्थान पर रखे हुए पीली-कमण्डल की ओर संकेत करके कहा- इन्हें उठा लो, पर उन्होंने इनकार कर दिया। उस व्यक्ति के दो-तीन बार कहने पर भी जब उन्होंने पीली-कमण्डल नहीं उठाये और ‘नहीं उठाऊँगा’ यह कहते हुए ही बिस्तर पर छूटे तो पलंग पर से गिर पड़े।
यह सब स्वप्न था। कोई सच्ची घटना नहीं फिर भी इस घटना ने हजारीमलजी के जीवन में पर्याप्त परिवर्तन कर दिया और उनका संसार छोड़ने का विचार और दृढ़ हो गया। संवत् 1984 में श्री शान्तिसागरजी महाराज (छण्णी) का चातुर्मास योग इन्दौर में ही था। हजारीमलजी को संसार से विरक्ति हो गई थी। फलस्वरूप आषाढ़ शुक्ला षष्ठी, वि. सं. 1981 को श्री आचार्य शान्तिसागरजी महाराज (छण्णी) के पास आपने ऐलक दीक्षा ले ली। ऐलक हो जाने के बाद इन्हीं हजारीमलजी का नाम सूर्यसागरजी रखा गया था। इसके 51 दिन पश्चात् मंगसर कृष्णा एकादशी को हाटपीपल्या (मालवा) में उन्हीं आचार्य शान्तिसागरजी के पास सर्व परिग्रह को त्यागकर आपने निर्ग्रन्थ दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली।
मुनि जीवन की दीक्षा के बाद स्वात्मानुभव का विचार तो आपके सामने रहा ही, पर स्वेटर प्राणियों पर किस तरह धर्म पर लगाया जाये, यह विचार भी आपके हृदय में सतत बना रहा और इसके अनुसार आपकी शुभ प्रवृत्तियाँ भी होती रहीं। आपके सद्प्रदशों से अनेकों स्थानों पर पाठशालाएँ, औषधालय आदि अनेक परोपकारी संस्थाएँ खुली। सैकड़ों स्थानों पर विनाशकारी संघर्ष मिटकर शान्ति स्थापित हुई। जो झगड़े न्यायालयों से न मिट सके थे, जो पचासों वर्षों से समाज की शान्ति को क्षीण कर रहे थे। जिनमें हजारों रुपये नष्ट हो चुके थे, जिनको लेकर बीसों बार मारपीट और फिर फुटबॉल तक हो चुकी थी, परस्पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, स्त्री-पुरुष आदि में जिनके कारण खूब लड़ाइयाँ चल रही थीं, परस्पर कुटुम्बियों में जिनके वजह से आना-जाना और मुँह से बोलना तक बंद था। ऐसे एक नहीं सैकड़ों व्यक्तिगत, सामाजिक पंचायतें परोपकारी सम्बन्धित चौमू, भिंड, जयपुर, टोंक, मुंगावली, दशपुर, छांदरी, हाटपीपल्या, टीकमगढ़, नेगार्डा, उदयपुर, नेपावाली, भीलवाड़ा, नरसिंहपुरा, डबक, सोकोटा, भादवा आदि सैकड़ों स्थानों में झगड़े आपके उपदेशामृत से शान्त हुए। इससे जैन समाज का बच्चा-बच्चा परिचित है। जिन-जिन नगरों व

भूमिका

ग्रामों में आपका पदार्पण हुआ है, शान्ति की लहर दौड़ गई है। यही वर्तमान मुनि-समाज में आपका आदरणीय स्थान है और सभी नवीन तथा प्राचीन विचार वालों की आप में श्रद्धा है। जैन समाज में ही नहीं, जैनेतरों पर भी आपके उपदेशों का प्रभाव पड़ता है और फलस्वरूप वे प्रतिज्ञाएँ लेते हैं।
मुनि दीक्षा के बाद अब तक निम्नलिखित स्थानों पर आपका चातुर्मास योग हुआ है -
विक्रम संवत् 1982 में ललितपुर। सं. 83-84 में इन्दौर। सं. 85 में कोड़मा। सं. 86 में जबलपुर। सं. 87 में दमोह। सं. 88 में खुरई। सं. 89 में टीकमगढ़। सं. 90 में भिंडा। सं.91 में आगरा। सं. 92 में लाड़नूँ। सं. 94 में अजमेर। सं. 95 में उदयपुर (मेवाड़)। सं. 97 में भिंडर (मेवाड़)। सं. 98 में भीलवाड़ा (मेवाड़)। सं. 99 में लाड़नूँ। सं. 2001 में जयपुर। इन सभी स्थानों पर आपकी पावन-कृपा से जनता को बहुत लाभ पहुँचा है।
(उक्त परिचय श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, शालिमार बाग, दिल्ली से प्रकाशित ग्रन्थ के अनुसार है।)

प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रयुक्त गाथाओं/श्लोकों आदि के क्रमांक

निम्न ग्रन्थों में प्रदत्त क्रमांकों के अनुसार हैं -

अष्टपाहुड़ - सत्साहित्य प्रकाशक पाटनी ग्रन्थमाला, कोलकाता 2007
आत्मानुशासन - गम्भीरचन्द प्रकाशचन्द जैन, अहमदाबाद 1999
छहढाला - विमल ग्रन्थमाला प्रकाशन, दिल्ली 2007
नाटक समयसार - पण्डित टोडरमल सर्वोच्च ट्रस्ट, जयपुर 2009
नियमसार - पण्डित टोडरमल सर्वोच्च ट्रस्ट जयपुर 2009
पुरुषार्थसिद्धयुपाय - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
प्रवचनसार - श्री दिगम्बर जैन ट्रस्ट, बैंगलोर 1997
बृहद् द्रव्यसंग्रह - श्री दिगम्बर जैन कुन्दकुन्द परमागम ट्रस्ट, इन्दौर 2010
भगवती आराधना - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 2004
मूलाचार - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 2000
मोक्षशास्त्र - शैलेय डाभाभाई कापड़िया, सूरत
रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पण्डित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर 2007
समयसार - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
हरिवंश पुराण - भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
ज्ञानार्णव - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 1998
धर्मसंग्रहश्रावकाचार - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 1998

विषय सूची

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
मंगलाचरण 1 सम्यक्त्व के भेद 18
ग्रन्थ का विषय श्रावकाचार 1 सच्चे देव का स्वरूप 18
सम्यग्दर्शनार्थाधिकार 2 18 दोषों के नाम व आप्त का स्वरूप 18
देशसंयमी व मिथ्यात्वी का स्वरूप 2 सच्चे शास्त्र का स्वरूप 20
मिथ्यात्वी द्वारा विपरीत श्रद्धान 2 जैनेतर शास्त्रों में पूर्वापर विरोध 20
मिथ्यात्व के दो भेद 2 सच्चे गुरु का लक्षण 21
किस जीव के कौन-सा मिथ्यात्व होता है 3 जैनेतर ग्रन्थों में सच्चे गुरु का स्वरूप 22
क्रियावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 180, अक्रिया-वादी के 84 विनयावादी के 32 एवं अज्ञानावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 67 भेद 4 कुगुरु का स्वरूप 23
सद्गुरु का स्वरूप 24
पाखण्ड के 363 भेद 6 जैनेतर ग्रन्थों में राष्ट्रीय नेता श्री तिलक के विचार 25
मिथ्यादर्शन के पाँच भेद और उनका स्वरूप 6 रत्नत्रय धर्म 25
एकान्त मत, संशय मत, विपरीत मत, वैनयिक मत एवं अज्ञान मत की उत्पत्ति 7-9 व्यवहार सम्यग्दर्शन 26
जीव तत्त्व एवं उसके प्राण 27
मिथ्यात्व के सात भेद 10 पर्याप्ति-अपर्याप्ति जीवों के प्राण 28
चार्वाक मत एवं सांख्य मत 10 सिद्धों के प्राण 29
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति की योग्यता वाला जीव 10 सिद्धों के भेदों की अपेक्षा बारह भेद और उनका स्वरूप 29
संसारी जीवों के दो भेद 29
सम्यक्त्व के भेद व उपशम सम्यक्त्व 13 स्थावर जीवों का स्वरूप और उनके भेद 31
उपशम सम्यक्त्व के दो भेद 13 त्रस जीवों के भेद 31
प्रथमोपशम सम्यक्त्व किसके होता है 14 जीव का विशेष स्वरूप 32
द्वितीयोपशम सम्यक्त्व किसके होता है 14 1 कर्त्ता 2 भोक्ता 3 अमूर्त्त 4 शरीर परिमाण 5 नित्य 6 उपयोगवान 32-34
क्षायिक सम्यक्त्व 15 उपयोग के भेद, अजीव तत्त्व, पुद्गल द्रव्य एवं उसके दो भेद 35
औपशमिक सम्यक्त्व 16 स्कन्ध रूप पुद्गलों की उत्पत्ति 35
सम्यक्त्व का विशेष विवेचन 17 पुद्गल स्कन्धों की पर्यायें व उनका स्वरूप 36
(I)
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य एवं काल 37-39 उपगूहन, स्थितिकरण व वात्सल्य अंग 67-70
द्रव्य का स्वरूप 39
द्रव्य में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य 41 सम्यग्दृष्टि की पहचान 71
परिणामों के दो भेद 41 व्यवहार सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व में दोष 72
क्रिया के दो भेद 41 सम्यक्त्व के पच्चीस दोष 72
द्रव्य सामान्य का विषय 41 आठ दोषों का स्वरूप 72
द्रव्य के गुण एवं विशेष गुण 42-43 आठ मद का स्वरूप 72
किस द्रव्य में कौन-से गुण रहते हैं 44 पद अनातन का स्वरूप 73
द्रव्य की पर्याय 44 तीन मूढ़ताएँ एवं उनका स्वरूप 75-77
जीव के चार प्रकार की पर्यायें 44 सम्यक्त्व के पाँच अतिचार 77
पुद्गल की चार प्रकार की पर्यायें 45 सात भय और उनका स्वरूप 78
पंचास्तिकाय 45 क्षायिक सम्यग्दृष्टि निर्भय होता है 80
षट् द्रव्यों की विशेषता 47 सम्यग्दर्शन के पाँच दूषण 81
आस्रव तत्त्व, भेद और कारण 48 सम्यक्त्व के पाँच भूषण 82
साम्परायिक आस्रव की कारणभूत पच्चीस क्रियायें और उनका स्वरूप 50 सम्यक्त्व के पाँच अतिचार 83
द्रव्यास्त्रव एवं बन्ध तत्त्व का स्वरूप 53 सम्यक्त्व की प्रशंसा 83
संवर तत्त्व एवं उसके दो भेद 55 मुक्ति के लिए रत्नत्रय की आवश्यकता 85
निर्जरा तत्त्व एवं दो भेद 57 सम्यग्दर्शन से सुगति प्राप्ति 85
मोक्ष तत्त्व 58 सम्यक्त्वी कर्त्ता-भोक्ता नहीं 86
मोक्ष की प्राप्ति का क्रम 59 सम्यक्त्वी ज्ञाता-दृष्टा होता है 87
मुक्त के सुख कैसा है 60 सम्यग्दृष्टि परम वीतरागी है 88
नौ पदार्थ, पुण्य और पाप पदार्थ 61 व्यवहार व शुद्धनय की अपेक्षा सम्यक्त्व के विचार 89
पुण्य और पाप रूप कर्म प्रकृतियाँ 62 शुद्ध निश्चयनय से आत्मा का स्वरूप 91
पुण्य मोक्ष में बाधक कैसे 62 ज्ञानी और अज्ञानी जीव के विचार 92
सम्यग्दर्शन के बाह्य चिह्न 65 सम्यक्त्व की उत्पत्ति पर अज्ञान का नाश और ज्ञान की प्राप्ति 93
सम्यक्त्व के 8 गुण व उनका स्वरूप 67 सम्यक्त्व के कर्म बन्ध नहीं होता 97
निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढ़ दृष्टि, 67 सम्यक्त्वी कार्यों में आसक्त नहीं होता 98
(II)

विषय

सम्यक्त्व की अनासक्ति के दृष्टान्त
मिथ्यात्व और पाखण्ड त्याज्य है
सम्यग्दृष्टि के प्रत्येक कार्य ज्ञान पूर्वक होते हैं
सम्यक्त्वी आत्मा को बंधरहित मानता है
सम्यग्दृष्टि के मिथ्यात्वका निरोग होना है
सम्यग्दृष्टि केवल ज्ञाता-दृष्टा है
सम्यग्दृष्टि के विचार
भोगों में सम्यक्त्वी की विरक्ति
सम्यक्त्वी निर्लिप्त होता है
अज्ञान गुण कर्मनिर्जा
अधिंक निर्जरा के कारण
कर्मों की दश अवस्थाएँ
बन्ध के कारण
उत्कर्षण करण, संक्रमण करण, अपकर्षण करण,
उदीरणा करण, सत्व करण, उदय करण, उपशम
करण, निधत्ति करण, निकाचित करण
सम्यक्त्वी के सामान्य स्वरूप का उपसंहार
उतरार्ध की सद्गुणदर्शनाधिकार नामक प्रथम
किरण की समाप्ति

पाशिकाधिकार प्रारम्भ

मंगलाचरण
प्राणी क्या चाहता है
धर्म से सुख प्राप्ति
धर्म का स्वरूप
रत्नत्रय का स्वरूप
सम्यक्चारित्र के भेद
श्रावक का स्वरूप

विषय

धर्म के तीन भेद
पाक्षिक, नैष्ठिक एवं साधक श्रावक का स्वरूप
श्रावक के गृहस्थ धर्म के पालन की योग्यता
न्यायोपगत धनवाला ही सच्चा गृहस्थ है
धन की सफलता
गुण और गुरु पूजा क्या है
सद्गुरू:- हित-मित-मधुर भाषी सद्गुरू है
तीन पुरुषों को सेवन करनेवाला सद्गुरू है
सद्गुरूही वाला सद्गुरू है
स्त्री का कर्तव्य
सद्गुरूही का लज्जाशीलपना
युक्तहार बिहार
सत्संगति
बुद्धिमान सद्गुरू
कृतज्ञ सद्गुरू
जितेन्द्रिय सद्गुरू
सद्गुरू को श्रवण करनेवाला सद्गुरू
दयालु सद्गुरू
दया का लक्षण
पापभीरू
श्रावकों के मूल और अवान्तर भेद
आठ मूलगुण
मद्यपान निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मद्यनिषेध
मांसभक्षण निषेध

विषय

फलादि में मांसभक्षण दोष नहीं
जैनेतर शास्त्रों द्वारा मांस निषेध
मधु निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मधु निषेध
उदुम्बरादि पाँच फलों का त्याग
पंचोदुम्बरों में भ्रम
जैनेतर शास्त्रों में उदुम्बर निषेध
जैन शास्त्रों में मद्य-मांसादि निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मद्य-मांसादि निषेध
आठ मूलगुणों में मतभेद
श्रावक का शुद्ध सम्यग्दृष्टि नामक बारहवाँ भेद
श्रावक का चतुर्थ गुणस्थान
जमात श्रावक का कर्तव्य
बालक के आठ मूलगुण
मूलगुण गृहस्थों के लिए आवश्यक
आठ से अधिक मूलगुण
श्वेताम्बर सम्प्रदाय मूलगुण सम्बन्ध में भिन्नता
मदिरा त्याग के अतिचार
पंचोदुम्बर त्याग के अतिचार
मद्यत्याग, मांसत्याग एवं मधुत्याग के अतिचार
मिथ्यात्व का वर्णन
कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु एवं कुधर्म का स्वरूप
देव का स्वरूप
अठारह दोष
सच्चे शास्त्र का लक्षण
सच्चे पदार्थ का स्वरूप

विषय

सच्चे गुरु का लक्षण
जघन्य पाक्षिक श्रावक का संस्कार
मध्यम पाक्षिक का स्वरूप
पाक्षिक श्रावक के अन्य कर्तव्य
नित्य देव दर्शन - जिन भक्ति
देवदर्शन आवश्यक भक्ति
राग-द्वेष रहित देव से हमारा कल्याण कैसे - इसका
उत्तर
जैन प्रतिमाओं की प्राचीनता
श्वेताम्बर समाज में मूर्ति पूजा विरोध की उत्पत्ति
दिगम्बर समाज में तारापंथ की उत्पत्ति
मूर्ति पूजा का सब मतों में अस्तित्व
जप मूर्तियों - आकारों से लाभ
जिन-मूर्ति से द्वेष
जैनेतर मत में जैन तीर्थंकर व साधुओं का स्तवन
मूर्ति का प्रभाव
स्तुति, स्तोत्र, स्तुत्य और स्तुतिफल
जिन-स्तुति भक्ति आदि के सम्बन्ध में विभिन्न
प्रश्नोत्तरों द्वारा विवेचन
जल छानने का विधान
अनछने जल में दोष एवं बिना छना जल पीने का
जैनेतर शास्त्रों में निषेध
रात्रि भोजन त्याग छाडा अनुव्रत है
आचार्यों के उपदेशों में अन्तर होते हुए भी उद्देश्य
एक
उत्पन्न भिन्नता का सामाजिक और छेदोपस्थापना
के उदाहरण द्वारा वर्णन

विषय

रात्रिभोजन त्याग समर्थन जैनेतर ग्रंथों से
मध्यम पाक्षिक श्रावक के लिए वर्जनीय सत्तर दुर्गुण
मध्यम पाक्षिक श्रावक की पात्रता
श्रावक की 53 क्रियाएँ
सप्त व्यसन
व्यसनों का त्याग प्रथम प्रतिमा है
एक-एक व्यसन भी अनर्थकारी है
द्यूत व्यसन
मांसभक्षण व्यसन
मद्यपान व्यसन
वेश्यागमन व्यसन
आखेट (शिकार) व्यसन
शिकारी ब्रह्मदत्त ग्रुप की कथा
चोरी व्यसन
परस्त्री गमन व्यसन
द्यूत व्यसन के अतिचार
मांस त्याग के अतिचार
मदिरा त्याग के अतिचार
वेश्यागमन त्याग के अतिचार
आखेट (शिकार) त्याग के अतिचार
अचौर्य के अतिचार
परस्त्री त्याग के अतिचार
उत्तम पाक्षिक श्रावक का स्वरूप
अभावस्य वर्णन
श्वेताम्बर सम्प्रदाय में बाईस अभक्ष्य
ओला आदि बाईस अभक्ष्यों का भिन्न-भिन्न स्वरूप
पाक्षिक श्रावक के कर्तव्य

विषय

अष्टमूली स्त्री
मासिक धर्म के समय स्त्रियों का कर्तव्य
सौर-सूक्तक पातक विवेचन
सौर-सूक्तक के उदाहरण
सौर-सूक्तक पातक का समय
गर्भांत का सौर-सूक्तक
पशु उत्पत्ति का सौर-सूक्तक
कुटुम्बी जनों का सौर-सूक्तक
मरण सूक्तक
सूक्तक की विशेषता
पातक का वर्णन
भोजन के पदार्थों की मर्यादा
दूध की मर्यादा
नमक की मर्यादा
नवनीत की अभक्ष्यतता
शीत, ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में मर्यादा
दही, छाछ, घी, तेल, सिंघाड़े, साबूदाने आदि की
मर्यादा
दही में मेरा-मिष्टान्न मिलाने की मर्यादा
जल की मर्यादा
मातने (जल छानने का वस्त्र) का प्रमाण
जल छानने का विधान
व्रती श्रावक के पीने योग्य जल
जल के चार भेद
मुनि कैसी भूमि में गमन करें
वनस्पति काय का वर्णन
सचित्ताचित्त विचार
वनस्पति के भेद
सप्रतिष्ठितादि वनस्पति का विवेचन

विषय

पुष्टिवाद चार भेद
पुष्टिवाद के तीन भेद भी
भिन्न-भिन्न आचार्यों द्वारा संचित स्वरूप
फलों में सजीवता पर शास्त्रीय प्रमाण
दृष्टान्त द्वारा संचित विचार
अष्टम्यादि पर्व में हरित का त्याग
अभक्ष्य वनस्पति
अष्टम्यादि पर्व का महत्त्व
पंचमकाल का कितना समय बीता
वीर निर्वाण संवत्
विक्रम संवत् की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न
भगवान महावीर की आयु के सम्बन्ध में मतभेद
जिनप्रतिमा व मंदिर निर्माण का
चौका सम्बन्धी विचार
चौके में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव शुद्धि
टट्टी के जल का निषेध
कण्डे (उपले) का निषेध
सचित्त को प्रासुक करने की विधि
बनाई हुई वस्तुओं की मर्यादा
2, 4 तथा 8 प्रहर की मर्यादित वस्तु
पिसे हुए पदार्थों की मर्यादा
बूरा तथा विनोदे की मर्यादा
घोर, जलेबी, दिद्दल
दिद्दल में जड़सिसा
आयुर्वेद के अनुसार दिद्दल में दोष
दिद्दल सिद्धि में आचार्यों के प्रमाण

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विषय

दिद्दल का अर्जन ग्रन्थों में निषेध
काष्ठ और अकाष्ठ दिद्दल
घी के साथ दिद्दल क्यों नहीं
राह और सरसों का सम्बन्ध
बर्तनों की शुद्धि
प्रमादचर्या
क्रियाकोष के अनुसार क्रियायें
शुद्ध सम्बन्धी विवेचन
शुद्धि की परिभाषा
शब्दों के भोजन
सकरा-नकरा विवेचन
भोजन के अन्तराय

उत्तरांश किरण की समाप्ति

दर्शनप्रतमाधिकार

मंगलाचरण
श्रावक शब्द की व्युत्पत्ति
धर्मात्मा का स्वरूप
श्रावकों के षट् कर्तव्य
धर्माचरण हीन व्यक्ति मूर्ख है
मानव जीवन की दुर्लभता और उसकी उपयोगिता
शरीर से ममत्व छोड़कर धार्मिक-कर्तव्य पालन का
उपदेश
धर्माचरण से सब दुःख मिलता है

षट् कर्म

देव पूजा का माहात्म्य

ईश्वर भक्ति का माहात्म्य
पूजन के प्रकार और भेद

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(VI)

विषय

तीन लोकों में जिनमंदिर और प्रतिमाएँ
मूर्ति आत्मकल्याण के लिए है
जिनेंद्र ही पूज्य क्यों?
कृत्रिम प्रतिमाएँ
कृत्रिम प्रतिमाओं का प्रादुर्भाव
नवीन मंदिर निर्माण की अपेक्षा जीर्णोद्धार में विशेष
पुण्य
पूजा द्रव्य का वर्णन
पूजा करते से पूर्व स्नानशुद्धि
पूजक का लक्षण
पूजकाचार्य का लक्षण
पूजक और पूजकाचार्य के लक्षण स्वपूज्य शुद्ध में
घटित होते है या नहीं
अशुद्ध पूज्य पूजा कर सकता है या नहीं
तीर्थच भी पूजन करते है
मेंढक की कथा
पूजा खड़े होकर की जाये या बैठकर
स्तुति और पूजन में भेद नहीं है
पूजक किस दिशा की ओर मुख करे
प्रतिमा के सम्मुख पूजा करने का विधान
पूजनीय देव कैसा हो
देव-पूजा मुक्ति का कारण
पूजा करना आवश्यक है
पूजा का माहात्म्य
पूजा के भेद और उनका स्वरूप
नित्यमह पूजा के पाँच उपचार
स्थापना का स्वरूप और भेद
नित्यमह पूजा का विशेष स्वरूप
प्रतिमा का स्वरूप और केशार्चना

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विषय

प्रतिमा पर केशर नहीं चढ़ाना - इसके लिए भिन्न-
भिन्न आचार्यों के प्रमाण
नित्य पूजन का स्वरूप
जल द्रव्य से पूजन
चन्दन एवं अक्षत द्रव्य से पूजन
पुष्प द्रव्य से पूजन
पुष्पों को भगवान के चरणों में चढ़ाना योग्य है या
नहीं
नैवेद्य द्रव्य से पूजन
आसमन का निषेध
दीप द्रव्य से पूजन
क्या आरती करना योग्य है
सामायिक का काल
धूप एवं फल द्रव्य से पूजन
रात्रि को द्रव्य पूजन का निषेध
श्राद्ध ऋतु व दीपमालिकोत्सव
पूजा के पश्चात् शान्ति पाठ का विधान कब से
मंदिर आदि में सभी वास के बालों का निषेध
जिनपूजन में चढ़ाये गये द्रव्य का विचार
निर्माल्या क्या है
निर्माल्या द्रव्य का क्या किया जाये
द्रव्य और भाव पूजा विशेष स्वरूप
पूजा का द्रव्य निर्माल्या क्यों
प्रतिमाजी का स्नानान्तर
अभिषेक कथन
जलाभिषेक ही योग्य है
अभिषेक पूजन से पूर्व होना चाहिए या पीछे
स्त्री एवं शूद्रों के लिए पूजा-अभिषेक सम्बन्धी

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(VII)

विषय

स्त्री प्रक्षाल सम्बन्धी विचार
शूद्रों को पूजा का अधिकार है या नहीं
शूद्रोल्लक दीक्षा का पात्र
शूद्रों के लक्षण एवं भेद
स्थापना भेद
निर्दोष सन्नी
रात्रि पूजन का निषेध
जिनेंद्र पूजन की प्रचलित पद्धति
भगवान महावीर के पश्चात् आचार्य और उनका
समय
कुन्दकुन्द स्वामी का परिचय
आचार्य कुन्दकुन्द के पाँच नाम
आठ प्रकार के निमित्तज्ञान
अन्तर्मित श्रुतज्ञान
भीम निमित्त श्रुतज्ञान
अंग निमित्त श्रुतज्ञान
स्वर निमित्त श्रुतज्ञान
व्यंजन निमित्त श्रुतज्ञान
लक्षण निमित्त श्रुतज्ञान
भिन्न निमित्त श्रुतज्ञान
स्वप्न निमित्त श्रुतज्ञान
चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्न
बहुबाहु स्वामी की जीवनी
रामल्वाचार्य व स्थूलभद्राचार्य की जीवनी
अवन्तिदेश का अकाल व उसका प्रभाव
अर्धकाष्ठक मत की उत्पत्ति
पंचामृताभिषेक कब से चले
पंचामृताभिषेक दिगम्बर मान्यता नहीं

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विषय

दिगम्बर मत की प्राचीनता
दूसरे कुन्दकुन्द मुनि का वर्णन
द्रविड़, यापनीय एवं काष्ठासंघ की उत्पत्ति
काष्ठा संघ में पंचामृताभिषेक
मूलसंघ आचार्य से विपरित कथन करने वाले ग्रन्थ
और उनके कर्ता
क्रियाकोष के अनुसार क्रियायें
षट् भट्टारक मार्ग की उत्पत्ति
चौरासी आसाधना
केशर तथा पुष्प चढ़ाने का प्रारम्भ
मूलसंघ के प्रचारक विद्वान
मूलसंघी आचार्यों की नामावली
भट्टारकों के शास्त्र विरुद्ध आचरण
स्वर्गों में देव-अभिषेक
काष्ठा संघी ग्रन्थों में जलाभिषेक का समर्थन
जलाभिषेक के सम्बन्ध में विभिन्न ग्रन्थों के प्रमाण

गुरुपास्ति

गुरु भक्ति आवश्यक कार्य है
गुरुओं के समीप त्याज्य क्रियायें
सच्चे गुरु का स्वरूप
गुरुओं का अवर्णवाद
सच्चा गुरु ही उपासनीय है
भक्ति का स्वरूप
आचार्य का लक्षण
उपाध्याय का लक्षण
यादव अंग और चौदह पूर्व
दश प्रकार के साधु और उनका स्वरूप

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(VIII)

विषय सूची

| विषय

विषय सूची

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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