संयम-प्रकाश
— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —
आचार्य श्री सूर्यसागरजी महाराज द्वारा विरचित
संयम-प्रकाश
(उत्तरार्ध प्रथम एवं द्वितीय भाग)
प्रकाशक
श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट
केशोरायपाटन रोड, गिरधरपुरा, कोटा
: मुद्रण व्यवस्था :
प्री ऐलविल सन (संजय शास्त्री) सर्वोदय अहिंसा, जयपुर + 91 95092 32733
प्रथम आवृत्ति : 1000 प्रतियाँ
प्रकाशन तिथि : अष्टाव्ह्निका पर्व, फाल्गुन माह, रविवार, 17 मार्च 2014
द्वितीय आवृत्ति : 1000 प्रतियाँ
प्रकाशन तिथि : अष्टाव्ह्निका पर्व, फाल्गुन माह, रविवार, 21 मार्च 2021
न्योछावर राशि : 150/- रुपये
प्राप्ति स्थान
- श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन
मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट
केशोरायपाटन रोडसंत
गिरधरपुरा, कोटा (राजस्थान)
E-mail : [email protected] - सर्वोदय अहिंसा
बी. 180 ए. 2 मंगल मार्ग, बापू नगर
जयपुर-15 +91 9785 999100 - श्री प्रेमचन्द बजाज
बजाज पैलेस, नगर परिषद कॉलोनी
छावनी, कोटा-324 007
: मुद्रण एवं वितरण व्यवस्था :
प्री ऐलविल सन (संजय शास्त्री) सर्वोदय अहिंसा, जयपुर + 91 95092 32733
प्रकाशकीय
जैनधर्म में संयम का स्थान सर्वोपरि है। मनुष्य गति की सार्थकता भी संयम धारण करने में है। जैनाचार्यों ने भी संयम धर्म पर विशेष प्रकाश डाला है। द्वादशांगरूपिणी गंगा में आचारांग सूत्र का प्रथम स्थान है। इससे भी संयम की महिमा स्पष्ट होती है। यथार्थ में मानव जीवन की अनुपम विभूति संयम ही है, जो कि अन्य पदार्थों में सुलभ नहीं होती।
संसारी जीव के समक्ष दो मार्ग हैं - एक निवृत्ति मार्ग, दूसरा प्रवृत्ति मार्ग अर्थात् एक मोक्षमार्ग और दूसरा संसारमार्ग। मोक्षमार्ग संसारमार्ग से विपरीत मार्ग है और वह अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करने से अर्थात् संयम के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रस्तुत ग्रन्थ में आचार्य सूर्यसागर महाराज द्वारा उसी संयम-रत्न पर प्रकाश डाला गया है।
इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें संयम का वर्णन है। इसमें संयम के भेद-प्रभेदों को सविस्तार प्रतिपादित किया गया है। ग्रन्थ के प्राथमिक मंगलाचरण से यह भी स्पष्ट है कि यह कोई नवीन रचना नहीं है, अपितु संयम प्ररूपक विभिन्न ग्रन्थों के विषयों का संग्रह मात्र है। इसमें प्रायः सभी जैन ग्रन्थों के संयम विषयक प्रमाण उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं, जैनेतर साहित्य के प्रमाणों को भी संयम को समझाने के लिए उद्धृत किया गया है। इससे यह ग्रन्थ सर्व साधारण के लिए विशेष उपयोगी बन गया है। विभिन्न विषयों को देखने के लिए पाठक को यह चाहता है कि वह थोड़े समय में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करे। ऐसे जिज्ञासु पाठकों के लिए इसप्रकार के संग्रह-ग्रन्थ बहुत उपयोगी होते हैं।
ऐसे अमूल्य जिनआगम को प्रकाशित कराने का भाव मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा के अध्यक्ष तत्त्वार्यिक श्री प्रेमचन्दजी बजाज को हुआ तथा उन्होंने अपने भावों की मूर्त रूप प्रदान करते हुए मुमुक्षुओं के लाभार्थ संयम-प्रकाश ग्रन्थ को प्रकाशित कराने का निर्णय लिया। फलस्वरूप मार्च 2013-14 की अष्टाव्ह्निका पर्व के अवसर पर इसके तीन भागों का प्रकाशन हुआ। अब पुनः तृतीय भाग का प्रकाशन किया जा रहा है।
ग्रन्थ के सुन्दर प्रकाशन एवं आद्योपांत अवलोकन-संशोधन हेतु संजय शास्त्री (सर्वोदय अहिंसा) जयपुर, सक्षम सेटिंग हेतु श्रीमती प्रीति जैन, जयपुर एवं पुनः संशोधन हेतु पण्डित सचिन्द्र शास्त्री, गहोड़ा, श्री जिनेश सेठ धन्यवादी हैं। महाविद्यालय के प्राचार्य पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के अमूल्य सुझाव भी हमारे लिए उपयोगी रहे। एतदर्थ हम उनके हृदय से आभारी हैं। ग्रन्थ के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग देने वाले महानुभावों के प्रति भी हम कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।
तत्त्वपिपासु जन प्रस्तुत कृति के द्वारा मोक्षमार्ग में अग्रसर हों - इसी मंगल भावना के साथ विराम।
- प्रेमचन्द बजाज
अध्यक्ष, मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा
श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा
।। संक्षिप्त परिचय ।।
अनन्त तीर्थंकरों और आचार्यों की भावनाओं के अनुरूप कल्याणकारी जिनवाणी और जिनधर्म चिरकाल तक जीवन्त रहे - इसी मंगलमय भावना से आध्यात्मिक सद्गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के पुण्य प्रभावन में 4 फरवरी से 10 फरवरी 2006 तक अनेक विद्वानों के सान्निध्य में श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम का पंचकल्याणक संपन्न हुआ।
आश्रम की स्थापना के समय से ही शास्त्र स्वाध्याय, पूजन, विधान, ग्रुप शिविर एवं शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर आदि का आयोजन, धर्म-शिक्षा हेतु विद्यालय एवं महाविद्यालय की स्थापना तथा जिनवाणी का प्रकाशन आदि गतिविधियाँ निरन्तर संचालित हो रही है।
आठ बीघा क्षेत्र में फैले मुमुक्षु आश्रम में भव्य श्री शीतलनाथ जिनालय, श्री महावीर स्वामी जिनालय, श्री सीमन्धर जिनालय, उगा श्री मानस्तम्भ जिनालय एवं कृत्रिम पहाड़ी पर ग्यारह फीट ऊँची कायोत्सर्ग मुद्रा वाली श्री मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा युक्त जिनालय है।
मुमुक्षु आश्रम द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय
आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय
जिनवाणी के प्रचार-प्रसार हेतु रत्नज्ञान को हृदयंगम करने वाले व वाणी में ओज धारण करने वाले विद्वानों का होना अत्यन्त आवश्यक है। अतः इसी भावना के साथ आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय की स्थापना जुलाई 2008 में की गई। इस काल में जहाँ अन्य बालक/युवा पाश्चात्य की अंधी दौड़ में अपने धर्म एवं संस्कार को खाते जा रहे हैं। वहीं इस महाविद्यालय में छात्रों को धार्मिक व नैतिक संस्कार सहित लौकिक शिक्षा व कम्प्यूटर/अंग्रेजी आदि की शिक्षा प्रदान की जाती है।
पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के प्राचार्यत्व एवं पण्डित अभिनव शास्त्री, पण्डित नीतेश शास्त्री, पण्डित निन्य शास्त्री एवं पण्डित चर्चित शास्त्री के अधीक्षकत्व में संचालित महाविद्यालय में किसी जाति-भाषा-प्रान्त के भेदभाव के बिना तप-रुचिवन्त छात्रों को कक्षा दसवीं में प्राप्त 60 प्रतिशत या अधिक अंकों के आधार पर साक्षात्कार की प्रक्रिया द्वारा प्रवेश दिया जाता है। दसवीं के पश्चात् छात्र यहाँ रहकर प्रथम दो वर्षों में अजमेर बोर्ड (राजस्थान) की वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षा उत्तीर्ण करके तीन वर्षों में राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय की जैनदर्शन शास्त्री (बी.ए.) की डिग्री प्राप्त करते हैं, जो पूरे भारत में मान्य है। छात्रों को भोजन, आवास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि की उच्च स्तरीय सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान पण्डित ज्ञानरजी शास्त्री (जेवर) एवं श्री प्रेमचन्द बजाज का सान्निध्य भी यहाँ के छात्रों को निरंतर प्राप्त होता है।
छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए महाविद्यालय में सह-शैक्षणिक एवं शिक्षणेतर गतिविधियाँ, साप्ताहिक गोष्ठी, प्रवचन प्रशिक्षण, साहित्यिक प्रतियोगिताएँ, चर्चा-समाधान, शैक्षिक भ्रमण, खेल-
कूद, व्यायाम, धार्मिक विधि-विधान और संगीत-भजन आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है एवं समय-समय पर बाहर से आमन्त्रित विशिष्ट विद्वानों एवं विषय विशेषज्ञों का मार्गदर्शन भी छात्रों को प्राप्त होता है। महाविद्यालय में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ आदि प्रान्तों के छात्र अध्ययन कर रहे हैं। इसमें अब तक 68 छात्र शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं।
आचार्य समन्तभद्र छात्रवृत्ति
अप्रैल 2018 से नन्हें-मुन्ने बालकों में बचपन से धर्म-संस्कार रोपित करने के उद्देश्य से ट्रस्ट द्वारा आचार्य समन्तभद्र विद्यानिकेतन की स्थापना की गई। पण्डित धर्मेन्द्र शास्त्री के प्राचार्यत्व एवं पण्डित पीयूष शास्त्री, पण्डित चर्चित शास्त्री के अधीक्षकत्व में संचालित इस विद्यालय की प्रवेश-प्रक्रिया आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय की तरह ही है।
विद्यानिकेतन की कुछ विशेषताएँ निम्नानुसार हैं -
- अंग्रेजी माध्यम द्वारा सी.बी.एस.ई. के प्रतिनिश्चित विद्यालय में अध्ययन।
- लौकिक शिक्षा के साथ धर्म अध्ययन व चारित्रिक निर्माण का स्वर्ण अवसर।
- आधुनिक सर्व सुविधायुक्त आवासीय परिसर।
- कम्प्यूटर शिक्षा एवं छात्र की रुचि-अनुसार वाद्य-यन्त्र आदि सीखने की समुचित व्यवस्था।
- विद्यानिकेतन में अध्ययन के दौरान धार्मिक एवं लौकिक परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को स्कूल फीस में 50 प्रतिशत तक की छात्रवृत्ति।
- विद्यानिकेतन में 85 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने और आचार्य धर्मसेन दिगम्बर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रों को शास्त्री-अध्ययन हेतु छात्रवृत्ति प्रदान की दी जाएगी।
- आवास-भोजन एवं विद्यालय-बस आदि की निःशुल्क व्यवस्था। प्रतिवर्ष 20 छात्रों को प्रवेश।
वर्तमान में विद्यानिकेतन में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली एवं छत्तीसगढ़ राज्य के पचास छात्र अध्ययन-रत हैं एवं 11 छात्र दसवीं कक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं।
कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन महाविद्यालय, कोटा
कहान समवसार समिति शताब्दी वर्ष के अवसर पर पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के नाम सहित वर्ष 2021 से प्रारंभ होने वाला देश का यह प्रथम महाविद्यालय है। जिसमें प्रवेश लेकर शास्त्री के अतिरिक्त छात्र बी.ए., बी.एस.सी., बी.कॉम., बी.एड. की डिग्री भी प्राप्त की जा सकती है।
झालावाड़ रोड़, रंगपुर-कोटा में स्थित यह महाविद्यालय कोटा विश्वविद्यालय कोटा एवं जगद्गुरु रामानन्द शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर से सम्बद्ध है। यहाँ 115 कक्षों का सर्व-सुविधायुक्त छात्रावास भी है।
अतिथि भवन/भोजनशाला
मुमुक्षु आश्रम में बाहर से पधारे वाले साधर्मी मुमुक्षु बन्धुओं एवं छात्रों के अभिभावकों के लिए अतिथि भवन बनाया गया है। यहाँ पधारे वाले साधर्मियों के लिए शुद्ध भोजन की व्यवस्था भी है।
औषधालय
आश्रम परिसर में ही निःशुल्क औषधालय संचालित है, जिसमें महाविद्यालय के छात्रों के अलावा आसपास के निवासियों का भी शुद्ध रीति से तैयार आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा उपचार किया जाता है।
सारस्वत प्रकाशन
ट्रस्ट द्वारा अप्रकाशित एवं वर्तमान में अनुपलब्ध दिगम्बर जैन ग्रन्थ प्रकाशित करके अल्प मूल्य में साधर्मियों को स्वाध्याय हेतु उपलब्ध कराये जाते हैं। इसके अन्तर्गत प्रस्तुत ग्रन्थ के अलावा, संयम प्रकाश सम्पूर्ण (तीन भाग), क्रियाकोश, धर्मपरीक्षा, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्रव्य संग्रह, बाईस परीषहजय विवेचन, शान्ति सुधा, श्री जिनेन्द्र पूजन तथा सर्वसिद्धि प्रश्नोत्तर आदि भी प्रकाशित हो चुके हैं। इसी क्रम में बचा सहा प्रकाशनधीन है।
शिविरों में सहयोग
ट्रस्ट द्वारा आध्यात्मिक शिक्षण शिविरों, ग्रुप शिविरों एवं बाल संस्कार शिविरों के संचालन में सहयोग किया जाता है।
आगामी योजनाएँ
मासिक पत्रिका का प्रकाशन। प्रवचन मंडप का निर्माण। मुमुक्षु आराधना निलय का निर्माण। कोटा एवं आसपास के नगरों में वीतराग विज्ञान पाठशालाओं एवं स्वाध्याय सभाओं का संचालन।
प्रेमचन्द बजाज अध्यक्ष
तनमय बजाज उपाध्यक्ष
ध्याता बजाज मंत्री
श्री कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन मुमुक्षु आश्रम ट्रस्ट, कोटा
प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोग देने वाले दातार
21000/- श्री प्रेमचन्द जैन बजाज-श्रीमती सुनीता बजाज, ध्याता बजाज, कोटा
21000/- श्री तन्मय जैन बजाज-श्रीमती चन्दा बजाज, कोटा
11000/- स्व. श्री स्वरूपचन्द जैन की स्मृति में राजेश जैन विवेक जैन करहल
5100/- श्री अरुणजी बजाज-श्रीमती सुनीता बजाज, संभव बज परिवार, कोटा
5100/- श्री अपूर्व जैन-श्रीमती दिव्या जैन, संभव बज परिवार, कोटा
5100/- श्रीमती तारा देवी ध.प. श्री प्रकाशजी, खटोड़, कोटा
5000/- श्रीमती सरोज जैन, कोटा
5000/- श्री जितेन्द्र जैन-आभा जैन, कोटा
5000/- श्री रोहित जैन-सविता जैन, जयपुर
5000/- श्रीमती संतोष जैन-डॉ. मानमल जैन, कोटा
5000/- श्रीमती मंजुला जैन-डॉ. कमल जैन बाकलीवाल, कोटा
3100/- श्रीमती सीमा जैन-रमेश जैन, भीलवाड़ा
2500/- श्री मुकेश जैन-रेणु जैन, कोटा
2100/- श्रीमती उमा जैन-सुभाष जैन पालीवाल, कोटा
2100/- श्री वर्धमान जैन, कोटा
2100/- श्री सुमित जैन-रिंकू जैन, कोटा
2100/- श्रीमती बीना-भानुकुमार पाटनी, कोटा
2100/- श्री त्रिशला जैन, कोटा
2100/- श्री त्रिशला मण्डल, छावनी-कोटा
2100/- श्री अद्वैत जैन क्षपक जैन, कोटा
2100/- कु. आयुषी जैन शुभम जैन, कोटा
2100/- श्रीमती रुचिका जैन अतुल जैन, भानपुरा
1500/- गुप्तदान
1100/- श्रीमती गीता जैन सतीशचन्द जैन, कोटा
1100/- श्रीमती बीना जैन सुशील जैन पाटौदी, कोटा
1100/- श्रीमती चंद्रकला जैन, कोटा
1100/- श्री त्रिलोक जैन-रुचि जैन, कोटा
1100/- श्री रविन्द्र जैन-अनीता जैन, कोटा
1100/- श्रीमती अमिता जैन-नवीन जैन, कोटा
1100/- श्रीमती आकांक्षा जैन-पीयूष जैन, जयपुर
1100/- श्री शोभित जैन-श्रीमती मेघा जैन, कोटा
1100/- कु. आरुषी जैन, श्री मोक्ष जैन, कोटा
1100/- श्रीमती रूबी जैन-मनोज जैन, कोटा
1100/- श्री आदीश जैन पाटनी, कोटा
1100/- श्रीमती सोनू जैन-अमित जैन, दिल्ली
1000/- श्रीमती कमलेश जैन-जगदीश जैन, कोटा
1000/- श्रीमती कविता जैन-प्रीतम जैन, कोटा
1000/- श्रीमती कल्पना जैन-राजकुमार जैन पाटौदी, कोटा
500/- गुप्तदान
500/- श्रीमती शोभा जैन, कोटा
श्री 108 आचार्य श्री सूर्यसागरजी महाराज का जीवन-परिचय
श्री आचार्य सूर्यसागरजी महाराज का जन्म कार्तिक शुक्ल नवमी, शुक्रवार विक्रम सम्वत् 1940 को खालिय रियासत के शिवपुर जिलान्तर्गत पेमसर नामक ग्राम में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री हीरालाल व माता का नाम मेंदाबाई था। आप पोरवाल दिगम्बर जैन जाति के वत्सल गोत्र में उत्पन्न हुए थे।
गुरुस्वाम्य में आपका नाम हजारीमलजी था। हीरालालजी के सहोदर भाई श्री बलदेवजी के कोई संतान नहीं थी, अतः हजारीमलजी उनके दत्तक हो गये। बलदेवजी की धर्मपत्नी का नाम भूलाबाई था। बलदेवजी झालरापाटन में अफीम की दलाली करते थे। हजारीमलजी बाल्यावस्था में ही झालरापाटन आ गये और वहीं ही उन्हें सामान्य शिक्षा प्राप्त हुई। दुर्भाग्यवश सं. 1952 में जबकि हजारीमलजी बारह वर्ष के ही थे, बलदेवजी की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद हजारीमलजी का पालन-पोषण झालरापाटन के प्रसिद्ध सज्जन नाथूरामजी जोरजी राव के द्वारा हुआ। ये बलदेवजी के परम मित्र थे। परिस्थितिवश हजारीमलजी को विशेष शिक्षा प्राप्त न हो सकी और छोटी अवस्था में ही शिवपुर जिले के मेवाड़ ग्राम में ओंकारमलजी पोरवाल की सुपुत्री मोताबाई के साथ विवाह भी हो गया। इसके कुछ दिनों बाद हजारीमलजी इन्दौर चले गये और वहाँ अपने राज राजा सर सेठ आदि अनेक पद विभूषित श्री हुकुमचन्दजी के यहाँ तथा बाद में स्वर्गीय सेठ कल्पराममलजी के यहाँ नौकरी की, किन्तु आपको नौकरी करना पसंद नहीं आया। स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना ही आपने अच्छा समझा और एक कपड़े की दुकान इन्दौर में ही कर ली। साथ में कपड़े की दलाली भी करते रहे। इससे आपकी आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक रही।
आपके कई सन्तानें हुई। उनमें श्री शिवनारायणजी एवं समीमलजी दो पुत्र अब भी मौजूद हैं, जो इन्दौर में ही कपड़े का व्यवसाय करते हैं।
हजारीमलजी की बाल्यावस्था से ही धर्म की ओर बहुत रुचि थी। शास्त्र स्वाध्याय, पूजन-प्रक्षाल, सामाजिक आदि में आप बचपन से ही काफी समय लगाया करते थे। ज्यों-ज्यों अवस्था बढ़ती गई, धर्म की ओर आप अधिकाधिक झुकते गये। भागवत आपको धर्मपत्नी भी ऐसी ही मिली, जो धार्मिक चर्चाओं को अच्छी तरह समझती और गोम्मटसार आदि सिद्धान्त ग्रन्थों का स्वाध्याय करती थी। इससे आपको ज्ञानवृद्धि में काफी सहायता मिली, पर दुर्भाग्यवश यह सहयोग बहुतकाल तक न रहा। विक्रम संवत् 1972 में आपकी पत्नी का देहान्त हो गया। पत्नी वियोग के
पश्चात् संसार, शरीर और भोगों से आप उदासीन रहने लगे और हृदय में वैराग्य-मय जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा बढ़ने लगी।
संवत् 1981 को वर्ष था। एक दिन रात्रि के समय श्री हजारीमलजी को यह स्वप्न आया कि जलाशय में एक रहने पर बैठा हुआ आदमी उनसे कह रहा है कि चलो आओ, देर न करो। पर उसके आग्रह करने पर भी उन्होंने जलाशय में प्रवेश नहीं किया। तब उस आदमी ने तटको को किनारे पर लगाया और उनको किसी तरह तटले पर चढ़ाकर थोड़ी दूर जल में ले जाकर एक स्थान पर रखे हुए पीली-कमण्डल की ओर संकेत करके कहा- इन्हें उठा लो, पर उन्होंने इनकार कर दिया। उस व्यक्ति के दो-तीन बार कहने पर भी जब उन्होंने पीली-कमण्डल नहीं उठाये और ‘नहीं उठाऊँगा’ यह कहते हुए ही बिस्तर पर छूटे तो पलंग पर से गिर पड़े।
यह सब स्वप्न था। कोई सच्ची घटना नहीं फिर भी इस घटना ने हजारीमलजी के जीवन में पर्याप्त परिवर्तन कर दिया और उनका संसार छोड़ने का विचार और दृढ़ हो गया। संवत् 1984 में श्री शान्तिसागरजी महाराज (छण्णी) का चातुर्मास योग इन्दौर में ही था। हजारीमलजी को संसार से विरक्ति हो गई थी। फलस्वरूप आषाढ़ शुक्ला षष्ठी, वि. सं. 1981 को श्री आचार्य शान्तिसागरजी महाराज (छण्णी) के पास आपने ऐलक दीक्षा ले ली। ऐलक हो जाने के बाद इन्हीं हजारीमलजी का नाम सूर्यसागरजी रखा गया था। इसके 51 दिन पश्चात् मंगसर कृष्णा एकादशी को हाटपीपल्या (मालवा) में उन्हीं आचार्य शान्तिसागरजी के पास सर्व परिग्रह को त्यागकर आपने निर्ग्रन्थ दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली।
मुनि जीवन की दीक्षा के बाद स्वात्मानुभव का विचार तो आपके सामने रहा ही, पर स्वेटर प्राणियों पर किस तरह धर्म पर लगाया जाये, यह विचार भी आपके हृदय में सतत बना रहा और इसके अनुसार आपकी शुभ प्रवृत्तियाँ भी होती रहीं। आपके सद्प्रदशों से अनेकों स्थानों पर पाठशालाएँ, औषधालय आदि अनेक परोपकारी संस्थाएँ खुली। सैकड़ों स्थानों पर विनाशकारी संघर्ष मिटकर शान्ति स्थापित हुई। जो झगड़े न्यायालयों से न मिट सके थे, जो पचासों वर्षों से समाज की शान्ति को क्षीण कर रहे थे। जिनमें हजारों रुपये नष्ट हो चुके थे, जिनको लेकर बीसों बार मारपीट और फिर फुटबॉल तक हो चुकी थी, परस्पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, स्त्री-पुरुष आदि में जिनके कारण खूब लड़ाइयाँ चल रही थीं, परस्पर कुटुम्बियों में जिनके वजह से आना-जाना और मुँह से बोलना तक बंद था। ऐसे एक नहीं सैकड़ों व्यक्तिगत, सामाजिक पंचायतें परोपकारी सम्बन्धित चौमू, भिंड, जयपुर, टोंक, मुंगावली, दशपुर, छांदरी, हाटपीपल्या, टीकमगढ़, नेगार्डा, उदयपुर, नेपावाली, भीलवाड़ा, नरसिंहपुरा, डबक, सोकोटा, भादवा आदि सैकड़ों स्थानों में झगड़े आपके उपदेशामृत से शान्त हुए। इससे जैन समाज का बच्चा-बच्चा परिचित है। जिन-जिन नगरों व
भूमिका
ग्रामों में आपका पदार्पण हुआ है, शान्ति की लहर दौड़ गई है। यही वर्तमान मुनि-समाज में आपका आदरणीय स्थान है और सभी नवीन तथा प्राचीन विचार वालों की आप में श्रद्धा है। जैन समाज में ही नहीं, जैनेतरों पर भी आपके उपदेशों का प्रभाव पड़ता है और फलस्वरूप वे प्रतिज्ञाएँ लेते हैं।
मुनि दीक्षा के बाद अब तक निम्नलिखित स्थानों पर आपका चातुर्मास योग हुआ है -
विक्रम संवत् 1982 में ललितपुर। सं. 83-84 में इन्दौर। सं. 85 में कोड़मा। सं. 86 में जबलपुर। सं. 87 में दमोह। सं. 88 में खुरई। सं. 89 में टीकमगढ़। सं. 90 में भिंडा। सं.91 में आगरा। सं. 92 में लाड़नूँ। सं. 94 में अजमेर। सं. 95 में उदयपुर (मेवाड़)। सं. 97 में भिंडर (मेवाड़)। सं. 98 में भीलवाड़ा (मेवाड़)। सं. 99 में लाड़नूँ। सं. 2001 में जयपुर। इन सभी स्थानों पर आपकी पावन-कृपा से जनता को बहुत लाभ पहुँचा है।
(उक्त परिचय श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, शालिमार बाग, दिल्ली से प्रकाशित ग्रन्थ के अनुसार है।)
प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रयुक्त गाथाओं/श्लोकों आदि के क्रमांक
निम्न ग्रन्थों में प्रदत्त क्रमांकों के अनुसार हैं -
अष्टपाहुड़ - सत्साहित्य प्रकाशक पाटनी ग्रन्थमाला, कोलकाता 2007
आत्मानुशासन - गम्भीरचन्द प्रकाशचन्द जैन, अहमदाबाद 1999
छहढाला - विमल ग्रन्थमाला प्रकाशन, दिल्ली 2007
नाटक समयसार - पण्डित टोडरमल सर्वोच्च ट्रस्ट, जयपुर 2009
नियमसार - पण्डित टोडरमल सर्वोच्च ट्रस्ट जयपुर 2009
पुरुषार्थसिद्धयुपाय - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
प्रवचनसार - श्री दिगम्बर जैन ट्रस्ट, बैंगलोर 1997
बृहद् द्रव्यसंग्रह - श्री दिगम्बर जैन कुन्दकुन्द परमागम ट्रस्ट, इन्दौर 2010
भगवती आराधना - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 2004
मूलाचार - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 2000
मोक्षशास्त्र - शैलेय डाभाभाई कापड़िया, सूरत
रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पण्डित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर 2007
समयसार - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
हरिवंश पुराण - भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
ज्ञानार्णव - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 1998
धर्मसंग्रहश्रावकाचार - जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 1998
विषय सूची
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मंगलाचरण | 1 | सम्यक्त्व के भेद | 18 |
| ग्रन्थ का विषय श्रावकाचार | 1 | सच्चे देव का स्वरूप | 18 |
| सम्यग्दर्शनार्थाधिकार | 2 | 18 दोषों के नाम व आप्त का स्वरूप | 18 |
| देशसंयमी व मिथ्यात्वी का स्वरूप | 2 | सच्चे शास्त्र का स्वरूप | 20 |
| मिथ्यात्वी द्वारा विपरीत श्रद्धान | 2 | जैनेतर शास्त्रों में पूर्वापर विरोध | 20 |
| मिथ्यात्व के दो भेद | 2 | सच्चे गुरु का लक्षण | 21 |
| किस जीव के कौन-सा मिथ्यात्व होता है | 3 | जैनेतर ग्रन्थों में सच्चे गुरु का स्वरूप | 22 |
| क्रियावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 180, अक्रिया-वादी के 84 विनयावादी के 32 एवं अज्ञानावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 67 भेद | 4 | कुगुरु का स्वरूप | 23 |
| सद्गुरु का स्वरूप | 24 | ||
| पाखण्ड के 363 भेद | 6 | जैनेतर ग्रन्थों में राष्ट्रीय नेता श्री तिलक के विचार | 25 |
| मिथ्यादर्शन के पाँच भेद और उनका स्वरूप | 6 | रत्नत्रय धर्म | 25 |
| एकान्त मत, संशय मत, विपरीत मत, वैनयिक मत एवं अज्ञान मत की उत्पत्ति | 7-9 | व्यवहार सम्यग्दर्शन | 26 |
| जीव तत्त्व एवं उसके प्राण | 27 | ||
| मिथ्यात्व के सात भेद | 10 | पर्याप्ति-अपर्याप्ति जीवों के प्राण | 28 |
| चार्वाक मत एवं सांख्य मत | 10 | सिद्धों के प्राण | 29 |
| सम्यग्दर्शन की प्राप्ति की योग्यता वाला जीव | 10 | सिद्धों के भेदों की अपेक्षा बारह भेद और उनका स्वरूप | 29 |
| संसारी जीवों के दो भेद | 29 | ||
| सम्यक्त्व के भेद व उपशम सम्यक्त्व | 13 | स्थावर जीवों का स्वरूप और उनके भेद | 31 |
| उपशम सम्यक्त्व के दो भेद | 13 | त्रस जीवों के भेद | 31 |
| प्रथमोपशम सम्यक्त्व किसके होता है | 14 | जीव का विशेष स्वरूप | 32 |
| द्वितीयोपशम सम्यक्त्व किसके होता है | 14 | 1 कर्त्ता 2 भोक्ता 3 अमूर्त्त 4 शरीर परिमाण 5 नित्य 6 उपयोगवान | 32-34 |
| क्षायिक सम्यक्त्व | 15 | उपयोग के भेद, अजीव तत्त्व, पुद्गल द्रव्य एवं उसके दो भेद | 35 |
| औपशमिक सम्यक्त्व | 16 | स्कन्ध रूप पुद्गलों की उत्पत्ति | 35 |
| सम्यक्त्व का विशेष विवेचन | 17 | पुद्गल स्कन्धों की पर्यायें व उनका स्वरूप | 36 |
| (I) |
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य एवं काल | 37-39 | उपगूहन, स्थितिकरण व वात्सल्य अंग | 67-70 |
| द्रव्य का स्वरूप | 39 | ||
| द्रव्य में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य | 41 | सम्यग्दृष्टि की पहचान | 71 |
| परिणामों के दो भेद | 41 | व्यवहार सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व में दोष | 72 |
| क्रिया के दो भेद | 41 | सम्यक्त्व के पच्चीस दोष | 72 |
| द्रव्य सामान्य का विषय | 41 | आठ दोषों का स्वरूप | 72 |
| द्रव्य के गुण एवं विशेष गुण | 42-43 | आठ मद का स्वरूप | 72 |
| किस द्रव्य में कौन-से गुण रहते हैं | 44 | पद अनातन का स्वरूप | 73 |
| द्रव्य की पर्याय | 44 | तीन मूढ़ताएँ एवं उनका स्वरूप | 75-77 |
| जीव के चार प्रकार की पर्यायें | 44 | सम्यक्त्व के पाँच अतिचार | 77 |
| पुद्गल की चार प्रकार की पर्यायें | 45 | सात भय और उनका स्वरूप | 78 |
| पंचास्तिकाय | 45 | क्षायिक सम्यग्दृष्टि निर्भय होता है | 80 |
| षट् द्रव्यों की विशेषता | 47 | सम्यग्दर्शन के पाँच दूषण | 81 |
| आस्रव तत्त्व, भेद और कारण | 48 | सम्यक्त्व के पाँच भूषण | 82 |
| साम्परायिक आस्रव की कारणभूत पच्चीस क्रियायें और उनका स्वरूप | 50 | सम्यक्त्व के पाँच अतिचार | 83 |
| द्रव्यास्त्रव एवं बन्ध तत्त्व का स्वरूप | 53 | सम्यक्त्व की प्रशंसा | 83 |
| संवर तत्त्व एवं उसके दो भेद | 55 | मुक्ति के लिए रत्नत्रय की आवश्यकता | 85 |
| निर्जरा तत्त्व एवं दो भेद | 57 | सम्यग्दर्शन से सुगति प्राप्ति | 85 |
| मोक्ष तत्त्व | 58 | सम्यक्त्वी कर्त्ता-भोक्ता नहीं | 86 |
| मोक्ष की प्राप्ति का क्रम | 59 | सम्यक्त्वी ज्ञाता-दृष्टा होता है | 87 |
| मुक्त के सुख कैसा है | 60 | सम्यग्दृष्टि परम वीतरागी है | 88 |
| नौ पदार्थ, पुण्य और पाप पदार्थ | 61 | व्यवहार व शुद्धनय की अपेक्षा सम्यक्त्व के विचार | 89 |
| पुण्य और पाप रूप कर्म प्रकृतियाँ | 62 | शुद्ध निश्चयनय से आत्मा का स्वरूप | 91 |
| पुण्य मोक्ष में बाधक कैसे | 62 | ज्ञानी और अज्ञानी जीव के विचार | 92 |
| सम्यग्दर्शन के बाह्य चिह्न | 65 | सम्यक्त्व की उत्पत्ति पर अज्ञान का नाश और ज्ञान की प्राप्ति | 93 |
| सम्यक्त्व के 8 गुण व उनका स्वरूप | 67 | सम्यक्त्व के कर्म बन्ध नहीं होता | 97 |
| निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढ़ दृष्टि, | 67 | सम्यक्त्वी कार्यों में आसक्त नहीं होता | 98 |
| (II) |
विषय
सम्यक्त्व की अनासक्ति के दृष्टान्त
मिथ्यात्व और पाखण्ड त्याज्य है
सम्यग्दृष्टि के प्रत्येक कार्य ज्ञान पूर्वक होते हैं
सम्यक्त्वी आत्मा को बंधरहित मानता है
सम्यग्दृष्टि के मिथ्यात्वका निरोग होना है
सम्यग्दृष्टि केवल ज्ञाता-दृष्टा है
सम्यग्दृष्टि के विचार
भोगों में सम्यक्त्वी की विरक्ति
सम्यक्त्वी निर्लिप्त होता है
अज्ञान गुण कर्मनिर्जा
अधिंक निर्जरा के कारण
कर्मों की दश अवस्थाएँ
बन्ध के कारण
उत्कर्षण करण, संक्रमण करण, अपकर्षण करण,
उदीरणा करण, सत्व करण, उदय करण, उपशम
करण, निधत्ति करण, निकाचित करण
सम्यक्त्वी के सामान्य स्वरूप का उपसंहार
उतरार्ध की सद्गुणदर्शनाधिकार नामक प्रथम
किरण की समाप्ति
पाशिकाधिकार प्रारम्भ
मंगलाचरण
प्राणी क्या चाहता है
धर्म से सुख प्राप्ति
धर्म का स्वरूप
रत्नत्रय का स्वरूप
सम्यक्चारित्र के भेद
श्रावक का स्वरूप
विषय
धर्म के तीन भेद
पाक्षिक, नैष्ठिक एवं साधक श्रावक का स्वरूप
श्रावक के गृहस्थ धर्म के पालन की योग्यता
न्यायोपगत धनवाला ही सच्चा गृहस्थ है
धन की सफलता
गुण और गुरु पूजा क्या है
सद्गुरू:- हित-मित-मधुर भाषी सद्गुरू है
तीन पुरुषों को सेवन करनेवाला सद्गुरू है
सद्गुरूही वाला सद्गुरू है
स्त्री का कर्तव्य
सद्गुरूही का लज्जाशीलपना
युक्तहार बिहार
सत्संगति
बुद्धिमान सद्गुरू
कृतज्ञ सद्गुरू
जितेन्द्रिय सद्गुरू
सद्गुरू को श्रवण करनेवाला सद्गुरू
दयालु सद्गुरू
दया का लक्षण
पापभीरू
श्रावकों के मूल और अवान्तर भेद
आठ मूलगुण
मद्यपान निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मद्यनिषेध
मांसभक्षण निषेध
विषय
फलादि में मांसभक्षण दोष नहीं
जैनेतर शास्त्रों द्वारा मांस निषेध
मधु निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मधु निषेध
उदुम्बरादि पाँच फलों का त्याग
पंचोदुम्बरों में भ्रम
जैनेतर शास्त्रों में उदुम्बर निषेध
जैन शास्त्रों में मद्य-मांसादि निषेध
जैनेतर शास्त्रों में मद्य-मांसादि निषेध
आठ मूलगुणों में मतभेद
श्रावक का शुद्ध सम्यग्दृष्टि नामक बारहवाँ भेद
श्रावक का चतुर्थ गुणस्थान
जमात श्रावक का कर्तव्य
बालक के आठ मूलगुण
मूलगुण गृहस्थों के लिए आवश्यक
आठ से अधिक मूलगुण
श्वेताम्बर सम्प्रदाय मूलगुण सम्बन्ध में भिन्नता
मदिरा त्याग के अतिचार
पंचोदुम्बर त्याग के अतिचार
मद्यत्याग, मांसत्याग एवं मधुत्याग के अतिचार
मिथ्यात्व का वर्णन
कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु एवं कुधर्म का स्वरूप
देव का स्वरूप
अठारह दोष
सच्चे शास्त्र का लक्षण
सच्चे पदार्थ का स्वरूप
विषय
सच्चे गुरु का लक्षण
जघन्य पाक्षिक श्रावक का संस्कार
मध्यम पाक्षिक का स्वरूप
पाक्षिक श्रावक के अन्य कर्तव्य
नित्य देव दर्शन - जिन भक्ति
देवदर्शन आवश्यक भक्ति
राग-द्वेष रहित देव से हमारा कल्याण कैसे - इसका
उत्तर
जैन प्रतिमाओं की प्राचीनता
श्वेताम्बर समाज में मूर्ति पूजा विरोध की उत्पत्ति
दिगम्बर समाज में तारापंथ की उत्पत्ति
मूर्ति पूजा का सब मतों में अस्तित्व
जप मूर्तियों - आकारों से लाभ
जिन-मूर्ति से द्वेष
जैनेतर मत में जैन तीर्थंकर व साधुओं का स्तवन
मूर्ति का प्रभाव
स्तुति, स्तोत्र, स्तुत्य और स्तुतिफल
जिन-स्तुति भक्ति आदि के सम्बन्ध में विभिन्न
प्रश्नोत्तरों द्वारा विवेचन
जल छानने का विधान
अनछने जल में दोष एवं बिना छना जल पीने का
जैनेतर शास्त्रों में निषेध
रात्रि भोजन त्याग छाडा अनुव्रत है
आचार्यों के उपदेशों में अन्तर होते हुए भी उद्देश्य
एक
उत्पन्न भिन्नता का सामाजिक और छेदोपस्थापना
के उदाहरण द्वारा वर्णन
विषय
रात्रिभोजन त्याग समर्थन जैनेतर ग्रंथों से
मध्यम पाक्षिक श्रावक के लिए वर्जनीय सत्तर दुर्गुण
मध्यम पाक्षिक श्रावक की पात्रता
श्रावक की 53 क्रियाएँ
सप्त व्यसन
व्यसनों का त्याग प्रथम प्रतिमा है
एक-एक व्यसन भी अनर्थकारी है
द्यूत व्यसन
मांसभक्षण व्यसन
मद्यपान व्यसन
वेश्यागमन व्यसन
आखेट (शिकार) व्यसन
शिकारी ब्रह्मदत्त ग्रुप की कथा
चोरी व्यसन
परस्त्री गमन व्यसन
द्यूत व्यसन के अतिचार
मांस त्याग के अतिचार
मदिरा त्याग के अतिचार
वेश्यागमन त्याग के अतिचार
आखेट (शिकार) त्याग के अतिचार
अचौर्य के अतिचार
परस्त्री त्याग के अतिचार
उत्तम पाक्षिक श्रावक का स्वरूप
अभावस्य वर्णन
श्वेताम्बर सम्प्रदाय में बाईस अभक्ष्य
ओला आदि बाईस अभक्ष्यों का भिन्न-भिन्न स्वरूप
पाक्षिक श्रावक के कर्तव्य
विषय
अष्टमूली स्त्री
मासिक धर्म के समय स्त्रियों का कर्तव्य
सौर-सूक्तक पातक विवेचन
सौर-सूक्तक के उदाहरण
सौर-सूक्तक पातक का समय
गर्भांत का सौर-सूक्तक
पशु उत्पत्ति का सौर-सूक्तक
कुटुम्बी जनों का सौर-सूक्तक
मरण सूक्तक
सूक्तक की विशेषता
पातक का वर्णन
भोजन के पदार्थों की मर्यादा
दूध की मर्यादा
नमक की मर्यादा
नवनीत की अभक्ष्यतता
शीत, ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में मर्यादा
दही, छाछ, घी, तेल, सिंघाड़े, साबूदाने आदि की
मर्यादा
दही में मेरा-मिष्टान्न मिलाने की मर्यादा
जल की मर्यादा
मातने (जल छानने का वस्त्र) का प्रमाण
जल छानने का विधान
व्रती श्रावक के पीने योग्य जल
जल के चार भेद
मुनि कैसी भूमि में गमन करें
वनस्पति काय का वर्णन
सचित्ताचित्त विचार
वनस्पति के भेद
सप्रतिष्ठितादि वनस्पति का विवेचन
विषय
पुष्टिवाद चार भेद
पुष्टिवाद के तीन भेद भी
भिन्न-भिन्न आचार्यों द्वारा संचित स्वरूप
फलों में सजीवता पर शास्त्रीय प्रमाण
दृष्टान्त द्वारा संचित विचार
अष्टम्यादि पर्व में हरित का त्याग
अभक्ष्य वनस्पति
अष्टम्यादि पर्व का महत्त्व
पंचमकाल का कितना समय बीता
वीर निर्वाण संवत्
विक्रम संवत् की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न
भगवान महावीर की आयु के सम्बन्ध में मतभेद
जिनप्रतिमा व मंदिर निर्माण का
चौका सम्बन्धी विचार
चौके में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव शुद्धि
टट्टी के जल का निषेध
कण्डे (उपले) का निषेध
सचित्त को प्रासुक करने की विधि
बनाई हुई वस्तुओं की मर्यादा
2, 4 तथा 8 प्रहर की मर्यादित वस्तु
पिसे हुए पदार्थों की मर्यादा
बूरा तथा विनोदे की मर्यादा
घोर, जलेबी, दिद्दल
दिद्दल में जड़सिसा
आयुर्वेद के अनुसार दिद्दल में दोष
दिद्दल सिद्धि में आचार्यों के प्रमाण
पृष्ठ
272
273
273
276
281
282
283
284
287
288
289
291
297
297
298-299
301
301
302
303
303
303
303
303-304
308
308
309
विषय
दिद्दल का अर्जन ग्रन्थों में निषेध
काष्ठ और अकाष्ठ दिद्दल
घी के साथ दिद्दल क्यों नहीं
राह और सरसों का सम्बन्ध
बर्तनों की शुद्धि
प्रमादचर्या
क्रियाकोष के अनुसार क्रियायें
शुद्ध सम्बन्धी विवेचन
शुद्धि की परिभाषा
शब्दों के भोजन
सकरा-नकरा विवेचन
भोजन के अन्तराय
उत्तरांश किरण की समाप्ति
दर्शनप्रतमाधिकार
मंगलाचरण
श्रावक शब्द की व्युत्पत्ति
धर्मात्मा का स्वरूप
श्रावकों के षट् कर्तव्य
धर्माचरण हीन व्यक्ति मूर्ख है
मानव जीवन की दुर्लभता और उसकी उपयोगिता
शरीर से ममत्व छोड़कर धार्मिक-कर्तव्य पालन का
उपदेश
धर्माचरण से सब दुःख मिलता है
षट् कर्म
देव पूजा का माहात्म्य
ईश्वर भक्ति का माहात्म्य
पूजन के प्रकार और भेद
पृष्ठ
311
311
312
314
315
316
316
319
319
321
322
322
322
324
324
324
324
325
325
326
326
327
331
332
332
334
337
(VI)
विषय
तीन लोकों में जिनमंदिर और प्रतिमाएँ
मूर्ति आत्मकल्याण के लिए है
जिनेंद्र ही पूज्य क्यों?
कृत्रिम प्रतिमाएँ
कृत्रिम प्रतिमाओं का प्रादुर्भाव
नवीन मंदिर निर्माण की अपेक्षा जीर्णोद्धार में विशेष
पुण्य
पूजा द्रव्य का वर्णन
पूजा करते से पूर्व स्नानशुद्धि
पूजक का लक्षण
पूजकाचार्य का लक्षण
पूजक और पूजकाचार्य के लक्षण स्वपूज्य शुद्ध में
घटित होते है या नहीं
अशुद्ध पूज्य पूजा कर सकता है या नहीं
तीर्थच भी पूजन करते है
मेंढक की कथा
पूजा खड़े होकर की जाये या बैठकर
स्तुति और पूजन में भेद नहीं है
पूजक किस दिशा की ओर मुख करे
प्रतिमा के सम्मुख पूजा करने का विधान
पूजनीय देव कैसा हो
देव-पूजा मुक्ति का कारण
पूजा करना आवश्यक है
पूजा का माहात्म्य
पूजा के भेद और उनका स्वरूप
नित्यमह पूजा के पाँच उपचार
स्थापना का स्वरूप और भेद
नित्यमह पूजा का विशेष स्वरूप
प्रतिमा का स्वरूप और केशार्चना
पृष्ठ
339
340
342
343
343
344
345
347
348
349
349
351
352
352
353
354
355
356
357
359
359
360
360
361
363
363
364
365
विषय
प्रतिमा पर केशर नहीं चढ़ाना - इसके लिए भिन्न-
भिन्न आचार्यों के प्रमाण
नित्य पूजन का स्वरूप
जल द्रव्य से पूजन
चन्दन एवं अक्षत द्रव्य से पूजन
पुष्प द्रव्य से पूजन
पुष्पों को भगवान के चरणों में चढ़ाना योग्य है या
नहीं
नैवेद्य द्रव्य से पूजन
आसमन का निषेध
दीप द्रव्य से पूजन
क्या आरती करना योग्य है
सामायिक का काल
धूप एवं फल द्रव्य से पूजन
रात्रि को द्रव्य पूजन का निषेध
श्राद्ध ऋतु व दीपमालिकोत्सव
पूजा के पश्चात् शान्ति पाठ का विधान कब से
मंदिर आदि में सभी वास के बालों का निषेध
जिनपूजन में चढ़ाये गये द्रव्य का विचार
निर्माल्या क्या है
निर्माल्या द्रव्य का क्या किया जाये
द्रव्य और भाव पूजा विशेष स्वरूप
पूजा का द्रव्य निर्माल्या क्यों
प्रतिमाजी का स्नानान्तर
अभिषेक कथन
जलाभिषेक ही योग्य है
अभिषेक पूजन से पूर्व होना चाहिए या पीछे
स्त्री एवं शूद्रों के लिए पूजा-अभिषेक सम्बन्धी
पृष्ठ
366
366
383
383
384
385
386
389
389
390
392
393
394-395
395
395
397
399
401
402
403
404
404
405
406
409
413
413
(VII)
विषय
स्त्री प्रक्षाल सम्बन्धी विचार
शूद्रों को पूजा का अधिकार है या नहीं
शूद्रोल्लक दीक्षा का पात्र
शूद्रों के लक्षण एवं भेद
स्थापना भेद
निर्दोष सन्नी
रात्रि पूजन का निषेध
जिनेंद्र पूजन की प्रचलित पद्धति
भगवान महावीर के पश्चात् आचार्य और उनका
समय
कुन्दकुन्द स्वामी का परिचय
आचार्य कुन्दकुन्द के पाँच नाम
आठ प्रकार के निमित्तज्ञान
अन्तर्मित श्रुतज्ञान
भीम निमित्त श्रुतज्ञान
अंग निमित्त श्रुतज्ञान
स्वर निमित्त श्रुतज्ञान
व्यंजन निमित्त श्रुतज्ञान
लक्षण निमित्त श्रुतज्ञान
भिन्न निमित्त श्रुतज्ञान
स्वप्न निमित्त श्रुतज्ञान
चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्न
बहुबाहु स्वामी की जीवनी
रामल्वाचार्य व स्थूलभद्राचार्य की जीवनी
अवन्तिदेश का अकाल व उसका प्रभाव
अर्धकाष्ठक मत की उत्पत्ति
पंचामृताभिषेक कब से चले
पंचामृताभिषेक दिगम्बर मान्यता नहीं
पृष्ठ
413
414
417
418
419
420
421
422
425
429
432
433
433
434
434
434
434
435
435
436
437
437
439
443
444
444
विषय
दिगम्बर मत की प्राचीनता
दूसरे कुन्दकुन्द मुनि का वर्णन
द्रविड़, यापनीय एवं काष्ठासंघ की उत्पत्ति
काष्ठा संघ में पंचामृताभिषेक
मूलसंघ आचार्य से विपरित कथन करने वाले ग्रन्थ
और उनके कर्ता
क्रियाकोष के अनुसार क्रियायें
षट् भट्टारक मार्ग की उत्पत्ति
चौरासी आसाधना
केशर तथा पुष्प चढ़ाने का प्रारम्भ
मूलसंघ के प्रचारक विद्वान
मूलसंघी आचार्यों की नामावली
भट्टारकों के शास्त्र विरुद्ध आचरण
स्वर्गों में देव-अभिषेक
काष्ठा संघी ग्रन्थों में जलाभिषेक का समर्थन
जलाभिषेक के सम्बन्ध में विभिन्न ग्रन्थों के प्रमाण
गुरुपास्ति
गुरु भक्ति आवश्यक कार्य है
गुरुओं के समीप त्याज्य क्रियायें
सच्चे गुरु का स्वरूप
गुरुओं का अवर्णवाद
सच्चा गुरु ही उपासनीय है
भक्ति का स्वरूप
आचार्य का लक्षण
उपाध्याय का लक्षण
यादव अंग और चौदह पूर्व
दश प्रकार के साधु और उनका स्वरूप
पृष्ठ
444
445
446
447
448
449
451
452
455
457
458
459
460
461
462
462
467
467
468
469
470
470
471
471
472
472
472
(VIII)
विषय सूची
| विषय
विषय सूची
औषधालय
ट्रस्ट द्वारा अद्यतन अप्रकाशित एवं वर्तमान में अनुलब्धप्राय दिगम्बर जैन ग्रन्थ प्रकाशित करके अल्प मूल्य में साधर्मियों को स्वाध्याय हेतु उपलब्ध कराये जाते हैं। इसके अन्तर्गत प्रस्तुत ग्रन्थ के अलावा, संयम प्रकाश सम्पूर्ण (तीन भाग), क्रियाकोश, धर्मपरीक्षा, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्रव्य संग्रह, बाईस परीषहजय विवेचन, शान्ति सुधा, श्री जिनेन्द्र पूजन तथा सर्वार्थसिद्धि प्रश्नदीप आदि भी प्रकाशित हो चुके हैं। इसी क्रम में चर्चा संग्रह प्रकाशनाधीन है।
शिविरों में सहयोग
आगामी योजनाएँ
अध्यक्ष
तन्मय बजाज
उपाध्यक्ष
ध्याता बजाज
मंत्री
प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोग देने वाले दातार
11000/- स्व. श्री स्वरूपचन्द जैन की स्मृति में राजेश जैन विवेक जैन करहल 5100/- श्री अरुणजी बज-श्रीमती सुनीता बज, संभव बज परिवार, कोटा
5100/- श्री अपूर्व जैन-श्रीमती दिव्या जैन बज, संभव बज परिवार, कोटा 5100/- श्रीमती तारा देवी ध.प. श्री प्रकाशजी, खटोड, कोटा
5000/- श्रीमती सरोज जैन, कोटा
5000/- श्री जितेन्द्र जैन-आभा जैन, कोटा
5000/- श्री रोहित जैन-सविता जैन, जयपुर
5000/- श्रीमती संतोष जैन-डॉ. मानमल जैन, कोटा
2100/- श्री सुमित जैन-रिंकू जैन, कोटा 2100/- श्रीमती बीना-भानुकुमार पाटनी, कोटा 2100/- श्रीमती त्रिशला जैन, कोटा
1100/- श्रीमती गीता जैन सतीशचन्द जैन, कोटा 1100/- श्रीमती बीना जैन सुशील जैन पाटोदी, कोटा 1100/- श्रीमती चन्द्रकला जैन, कोटा
500/- श्रीमती शोभा जैन, कोटा
श्री 108 आचार्य श्री सूर्यसागरजी महाराज का
जीवन-परिचय
गृहस्थाश्रम में आपका नाम हजारीमलजी था। हीरालालजी के सहोदर भाई श्री बलदेवजी के कोई संतान नहीं थी, अतः हजारीमलजी उनके दत्तक हो गये। बलदेवजी की धर्मपत्नी का नाम भूलाबाई था। बलदेवजी झालरापाटन में अफीम की दलाली करते थे। हजारीमलजी बाल्यावस्था में ही झालरापाटन आ गये और वहाँ ही उन्हें सामान्य शिक्षा प्राप्त हुई। दुर्भाग्यवश सं. 1952 में जबकि हजारीमलजी बारह वर्ष के ही थे, बलदेवजी की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद हजारीमलजी का पालन-पोषण झालरापाटन के प्रसिद्ध सज्जन नाथूरामजी जोरजी राव के द्वारा हुआ। ये बलदेवजी के परम मित्र थे। परिस्थितिवश हजारीमलजी को विशेष शिक्षा प्राप्त न हो सकी और छोटी अवस्था में ही शिवपुर जिले के मेवाड़ ग्राम में ओंकारमलजी पोरवाल की सुपुत्री मोताबाई के साथ विवाह भी हो गया। इसके कुछ दिनों बाद हजारीमलजी इन्दौर चले गये और वहाँ आपने राव राजा सर सेठ आदि अनेक पद विभूषित श्री हुकुमचन्दजी के यहाँ तथा बाद में स्वर्गीय सेठ कल्याणमलजी के यहाँ नौकरी की, किन्तु आपको नौकरी करना पसंद नहीं आया। स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना ही आपने अच्छा समझा और एक कपड़े की दुकान इन्दौर में ही कर ली। साथ में कपड़े की दलाली भी करते रहे। इससे आपकी आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक रही।
आपके कई संतानें हुईं। उनमें श्री शिवनारायणजी एवं समीरमलजी दो पुत्र अब भी मौजूद हैं, जो इन्दौर में ही कपड़े का व्यवसाय करते हैं।
संवत् 1981 का वर्ष था। एक दिन रात्रि के समय श्री हजारीमलजी को यह स्वप्न आया कि जलाशय में एक तख्ते पर बैठा हुआ कोई आदमी उनसे कह रहा है कि चलो आओ, देर न करो। पर उसके आग्रह करने पर भी उन्होंने जलाशय में प्रवेश नहीं किया। तब उस आदमी ने तख्ते को किनारे पर लगाया और उनको किसी तरह तख्ते पर चढ़ाकर थोड़ी दूर जल में ले जाकर एक स्थान पर रखे हुए पीछी-कमण्डल की ओर संकेत करके कहा - इन्हें उठा लो, पर उन्होंने इनकार कर दिया। उस व्यक्ति के दो-तीन बार कहने पर भी जब उन्होंने पीछी-कमण्डल नहीं उठाये और ‘नहीं उठाऊँगा’ यह कहते हुए ही बिस्तरों पर कुछ हटे तो पलंग पर से गिर पड़े।
यह सब स्वप्न था। कोई सच्ची घटना नहीं। फिर भी इस घटना ने हजारीमलजी के जीवन में पर्याप्त परिवर्तन कर दिया और उनका संसार छोड़ने का विचार और दृढ़ हो गया। संयोगवश उस वर्ष संवत् 1981 में श्री शान्तिसागरजी महाराज (छाणी) का चातुर्मास योग इन्दौर में ही था। हजारीमलजी को संसार से विरक्ति हो गई थी। फलस्वरूप आसोज शुक्ला षष्ठी, वि. सं. 1981 को श्री आचार्य शान्तिसागरजी महाराज (छाणी) के पाय आपने ऐलक दीक्षा ले ली। ऐलक हो जाने के बाद इन्हीं हजारीमलजी का नाम सूर्यसागरजी रखा गया था। इसके 51 दिन पश्चात् मंगसर कृष्णा एकादशी को हाटपीपल्या (मालवा) में उन्हीं आचार्य शान्तिसागरजी के पास सर्व परिग्रह को त्यागकर आपने निर्ग्रन्थ दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली।
मुनि-जीवन की दीक्षा के बाद स्वात्मोत्थान का विचार तो आपके सामने रहा ही, पर स्वेतर प्राणियों को किस तरह धर्म पर लगाना चाहिए, यह विचार भी आपके हृदय में सतत बना रहा और इसके अनुसार आपकी शुभ प्रवृत्तियाँ भी होती रहीं। आपके सदुपदेशों से अनेक स्थानों पर पाठशालाएँ, औषधालय आदि अनेक परोपकारी संस्थाएँ खुलीं। सैकड़ों स्थानों पर विनाशकारी संघर्ष मिटकर शान्ति स्थापित हुई। जो झगड़े न्यायालयों से न मिट सके थे, जो पचासों वर्षों से समाज की शक्ति को क्षीण कर रहे थे। जिनमें हजारों रुपये नष्ट हो चुके थे, जिनको लेकर बीसों बार मारपीट और सिर फुटौव्वल तक हो चुकी थी, परस्पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, स्त्री-पुरुष आदि में जिनके कारण खूब लड़ाइयाँ चल रही थीं, परस्पर कुटुम्बियों में जिनके वजह से आना-जाना और मुँह से बोलना तक बंद था। ऐसे एक नहीं सैकड़ों व्यक्तिगत, सामाजिक पंचायत परोपकारी सम्बन्धित चौमूँ, भिंड, जयपुर, टोंक, मुंगावली, दक्षुरई, चंदेरी, हाटपीपल्या, टीकमगढ़, नेणवाँ, उदयपुर, सेपवारी, भीलवाड़ा, नरसिंहपुरा, डबोक, साकरोदा, भादवा आदि सैकड़ों स्थानों में झगड़े आपके उपदेशामृत से शान्त हुए। इससे जैन समाज का बच्चा-बच्चा परिचित है। जिन-जिन नगरों व ग्रामों में आपका पदार्पण हुआ है, शान्ति की लहर दौड़ गई है। यही वर्तमान मुनि-समाज में आपका आदरणीय स्थान है और सभी नवीन तथा प्राचीन विचार वालों की आप में श्रद्धा है। जैन समाज में ही नहीं, जैनेतरों पर भी आपके उपदेशों का प्रभाव पड़ता है और फलस्वरूप वे प्रतिज्ञाएँ लेते हैं। मुनि दीक्षा के बाद अब तक निम्नलिखित स्थानों पर आपका चातुर्मास योग हुआ है – विक्रम संवत् 1982 में ललितपुर। सं. 83-84 में इन्दौर। सं. 85 में कोडरमा। सं. 86 में जबलपुर। सं. 87 में दमोह। सं. 88 में खुरई। सं. 89 में टीकमगढ़। सं. 90 में भिंड। सं.91 में आगरा। सं. 92 में लाडनूँ। सं. 94 में अजमेर। सं. 95 में उदयपुर (मेवाड़)। सं. 97 में भिंडर (मेवाड़)। सं. 98 में भीलवाड़ा (मेवाड़)। सं. 99 में लाडनूँ। सं. 2001 में जयपुर। इन सभी स्थानों पर आपकी पावन-कृपा से जनता को बहुत लाभ पहुँचा है।
छहढाला – विमल ग्रन्थमाला प्रकाशन, दिल्ली 2007
नाटक समयसार – पण्डित टोडरमल सर्वोदय ट्रस्ट, जयपुर 2009
नियमसार – पण्डित टोडरमल सर्वोदय ट्रस्ट जयपुर 2009
पुरुषार्थसिद्धि उपाय – पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
प्रवचनसार – श्री दिगम्बर जैन ट्रस्ट, बैंगलोर 1997
मूलाचार – भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 2000
मोक्षशास्त्र – शैलेष डाहाभाई कापड़िया, सूरत
समयसार – पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर 2010
हरिवंश पुराण – भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
ज्ञानार्णव – जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर 1998
विषय सूची
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
मंगलाचरण
सम्यक्त्व के भेद
ग्रन्थ का विषय श्रावकाचार 1
सच्चे देव का स्वरूप
18 दोषों के नाम व आप्त का स्वरूप सम्यग्दर्शनाधिकार
सच्चे शास्त्र का स्वरूप
देशसंयमी व मिथ्यात्वी का स्वरूप जैनेतर शास्त्रों में पूर्वापर विरोध मिथ्यात्वी द्वारा विपरीत श्रद्धान सच्चे गुरु का लक्षण
मिथ्यात्व के दो भेद
जैनेतर ग्रन्थों में सच्चे गुरु का स्वरूप किस जीव के कौन-सा मिथ्यात्व होता है 3 कुगुरु का स्वरूप
क्रियावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 180, अक्रिया- वादी के 84 विनयवादी के 32 एवं अज्ञानवादी सद्गुरु का स्वरूप
जैनेतर ग्रन्थों में राष्ट्रीय नेता श्री तिलक के विचार गृहीत मिथ्यादृष्टि के 67 भेद
पाखण्ड के 363 भेद
रत्नत्रय धर्म
मिथ्यादर्शन के पाँच भेद और उनका स्वरूप व्यवहार सम्यग्दर्शन
जीव तत्त्व एवं उसके प्राण
एकान्त मत, संशय मत, विपरीत मत, वैनयिक मत पर्याप्त-अपर्याप्त जीवों के प्राण एवं अज्ञान मत की उत्पत्ति
सिद्धों के प्राण
मिथ्यात्व के सात भेद
सिद्धों के क्षेत्रादि की अपेक्षा बारह भेद और उनका चार्वाक मत एवं सांख्य मत
स्वरूप
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति की योग्यता वाला जीव संसारी जीवों के दो भेद
स्थावर जीवों का स्वरूप और उनके भेद 31 सम्यक्त्व के भेद व उपशम सम्यक्त्व 13 त्रस जीवों के भेद
उपशम सम्यक्त्व के दो भेद
जीव का विशेष स्वरूप
प्रथमोपशम सम्यक्त्व किसके होता है 1 कर्ता 2 भोक्ता 3 अमूर्त 4 शरीर परिमाण 5 नित्य द्वितीयोपशम सम्यक्त्व किसके होता है 6 उपयोगवान
क्षायिक सम्यक्त्व
उपयोग के भेद, अजीव तत्त्व, पुद्गल द्रव्य एवं क्षायोपशमिक सम्यक्त्व
उसके दो भेद
अगाढ़तादि का स्वरूप
पुद्गल स्कन्धों की पर्यायें व उनका स्वरूप 36 (I)
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य एवं काल उपगूहन, स्थितिकरण एवं वात्सल्य अंग 67-70
द्रव्य का स्वरूप
सम्यग्दृष्टि की पहचान
द्रव्य में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य व्यवहार सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व में दोष परिणामों के दो भेद
सम्यक्त्व के पच्चीस दोष
क्रिया के दो भेद
आठ दोषों का स्वरूप
द्रव्य सामान्य का विषय
आठ मद का स्वरूप
द्रव्य के गुण एवं विशेष गुण 42-43
किस द्रव्य में कौन-से गुण रहते हैं षट् अनायतन का स्वरूप
द्रव्य की पर्याय
तीन मूढ़ताएँ एवं उनका स्वरूप 75-77
पंचास्तिकाय
क्षायिक सम्यक्त्वी निर्भय होता है षट् द्रव्यों की विशेषता
सम्यग्दर्शन के पाँच दूषण
आस्रव तत्त्व, भेद और कारण
सम्यक्त्व के पाँच भूषण
साम्परायिक आस्रव की कारणभूत पच्चीस क्रियायें सम्यक्त्व के पाँच अतिचार
और उनका स्वरूप
सम्यक्त्व की प्रशंसा
द्रव्यास्रव एवं बन्ध तत्त्व का स्वरूप मुक्ति के लिए रत्नत्रय की आवश्यकता संवर तत्त्व एवं उसके दो भेद सम्यग्दर्शन से सुगति प्राप्ति निर्जरा तत्त्व एवं दो भेद
सम्यक्त्वी कर्ता-भोक्ता नहीं मोक्ष तत्त्व
सम्यक्त्वी ज्ञाता-दृष्टा होता है मोक्ष की प्राप्ति का क्रम
सम्यग्दृष्टि परम वीतरागी है मुक्त के सुख कैसा है
व्यवहार व शुद्धनय की अपेक्षा सम्यक्त्वी के विचार नौ पदार्थ, पुण्य और पाप पदार्थ पुण्य और पाप रूप कर्म प्रकृतियाँ शुद्ध निश्चयनय से आत्मा का स्वरूप पुण्य मोक्ष में बाधक कैसे
सम्यक्त्व की उत्पत्ति पर अज्ञान का नाश और ज्ञान सम्यग्दृष्टि के 8 गुण व उनका स्वरूप की प्राप्ति
सम्यक्त्व के आठ अंग
सम्यक्त्वी के कर्म बन्ध नहीं होता निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सित, अमूढ़ दृष्टि, सम्यक्त्वी कार्यों में आसक्त नहीं होता (II)
विषय
पृष्ठ
सम्यक्त्वी की अनासक्ति के दृष्टान्त मिथ्यात्व और पाखण्ड त्याज्य हैं सम्यग्दृष्टि के प्रत्येक कार्य ज्ञान पूर्वक होते हैं सम्यक्त्वी आत्मा को बंधरहित मानता है सम्यग्दृष्टि के किसप्रकार निर्जरा होती है सम्यग्दृष्टि केवल ज्ञाता-दृष्टा है सम्यग्दृष्टि के विचार
असंख्यात गुणी कर्मनिर्जरा
अधिक निर्जरा के कारण
कर्मों की दश अवस्थाएँ
बन्ध के कारण
उत्कर्षण करण, संक्रमण करण, अपकर्षण करण, उदीरणा करण, सत्त्व करण, उदय करण, उपशम करण, निधत्ति करण, निकांचित करण 113-115 सम्यक्त्वी के सामान्य स्वरूप का उपसंहार 116 उत्तरार्ध की सम्यग्दर्शनाधिकार नामक प्रथम किरण की समाप्ति
पाक्षिकाचाराधिकार प्रारम्भ
मंगलाचरण
प्राणी क्या चाहता है
धर्म से सुख प्राप्ति
धर्म का स्वरूप
रत्नत्रय का स्वरूप
सम्यक्चारित्र के भेद
श्रावक का स्वरूप
विषय
पृष्ठ
धर्म के तीन भेद
पाक्षिक, नैष्ठिक एवं साधक श्रावक का स्वरूप 122-123
श्रावक के गृहस्थ धर्म के पालन की योग्यता न्यायोपात्त धनवाला ही सच्चा गृहस्थ है धन की सफलता
गुण और गुरु पूजा क्या है
सद्गीः - हित-मित-मधुर भाषी सद्गृहस्थ है तीन पुरुषार्थों को सेवन करनेवाला सद्गृहस्थ है सद्गृहिणी वाला सद्गृहस्थ है
स्त्री का कर्तव्य
सद्गृहस्थी का लज्जाशीलपना
युक्ताहार विहार
सत्संगति
बुद्धिमान सद्गृहस्थ
कृतज्ञ सद्गृहस्थ
जितेन्द्रिय सद्गृहस्थ
सद्धर्म को श्रवण करनेवाला सद्गृहस्थ दयालु सद्गृहस्थ
दया का लक्षण
पापभीरु
श्रावकों के मूल और अवान्तर भेद आठ मूलगुण
मद्यपान निषेध
विषय
पृष्ठ
फलादि में मांसभक्षण दोष नहीं
जैनेतर शास्त्रों द्वारा मांस निषेध मधु निषेध
जैनेतर शास्त्रों से मधु निषेध उदुम्बरादि पाँच फलों का त्याग पंचोदुम्बरों में भ्रम
श्रावक का शुद्ध सम्यग्दृष्टि नामक बारहवाँ भेद
श्रावक का चतुर्थ गुणस्थान
जन्मतः श्रावक का कर्तव्य
बालक के आठ मूलगुण
मूलगुण गृहस्थों के लिए आवश्यक आठ से अधिक मूलगुण
श्वेताम्बर सम्प्रदाय मूलगुण सम्बन्ध में भिन्नता पंचोदुम्बर त्याग के अतिचार
कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु एवं कुधर्म का स्वरूप 167-169
देव का स्वरूप
अठारह दोष
सच्चे शास्त्र का लक्षण
सच्चे पदार्थ का स्वरूप
विषय
पृष्ठ
सच्चे गुरु का लक्षण
देवदर्शन आवश्यक भक्ति
जैन प्रतिमाओं की प्राचीनता
श्वेताम्बर समाज में मूर्ति पूजा विरोध की उत्पत्ति दिगम्बर समाज में तारणपंथ की उत्पत्ति मूर्ति पूजा का सब मतों में अस्तित्व जड़ मूर्तियों - आकारों से लाभ जिन-मूर्ति से द्वेष
स्तुति, स्तोता, स्तुत्य और स्तुतिफल जिन-स्तुति भक्ति आदि के सम्बन्ध में विभिन्न प्रश्नोत्तरों द्वारा विवेचन
जल छानने का विधान
रात्रि भोजन त्याग छठा अणुव्रत है आचार्यों के उपदेशों में अन्तर होते हुए भी उद्देश्य एक
उक्त उपदेश भिन्नता का सामाजिक और छेदोपस्थापना के उदाहरण द्वारा वर्णन
विषय
पृष्ठ
रात्रिभोजन त्याग समर्थन जैनेतर ग्रंथों से 205 मध्यम पाक्षिक श्रावक के लिए वर्जनीय सत्रह दुर्गुण मध्यम पाक्षिक श्रावक की पात्रता श्रावक की 53 क्रियाएँ
सप्त व्यसन
मांसभक्षण व्यसन
मद्यपान व्यसन
वेश्यागमन व्यसन
आखेट (शिकार) व्यसन
शिकारी ब्रह्मदत्त नृप की कथा चोरी व्यसन
परस्त्री गमन व्यसन
द्यूत व्यसन के अतिचार
मांस त्याग के अतिचार
मदिरा त्याग के अतिचार
परस्त्री त्याग के अतिचार उत्तम पाक्षिक श्रावक का स्वरूप अभक्ष्य वर्णन
विषय
पृष्ठ
ऋतुमती स्त्री
मासिक धर्म के समय स्त्रियों का कर्तव्य 236 सौर-सूतक पातक विवेचन
सौर-सूतक के उदाहरण
सौर-सूतक पातक का समय
गर्भपात का सौर-सूतक
पशु उत्पत्ति का सौर-सूतक कुटुम्बी जनों का सौर-सूतक मरण सूतक
सूतक की विशेषता
पातक का वर्णन
भोजन के पदार्थों की मर्यादा दूध की मर्यादा
नमक की मर्यादा
नवनीत की अभक्ष्यता
दही में मेवा-मिष्टान्न मिलाने की मर्यादा 251 जल की मर्यादा
नातने (जल छानने का वस्त्र) का प्रमाण 253 छना जल सचित्त
व्रती श्रावक के पीने योग्य जल जल के चार भेद
मुनि कैसी भूमि में गमन करें वनस्पति काय का वर्णन
सचित्ताचित्त विचार
वनस्पति के भेद
सप्रतिष्ठितादि वनस्पति का विवेचन विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
पृथिव्यादि चार भेद
द्विदल का अजैन ग्रन्थों में निषेध पृथिव्यादि के तीन भेद भी काष्ट और अकाष्ट विदल
भिन्न-भिन्न आचार्यों द्वारा सचित्त स्वरूप घी के साथ द्विदल क्यों नहीं फलों में सजीवता पर शास्त्रीय प्रमाण राई और सरसों का सम्बन्ध
दृष्टान्त द्वारा सचित्त विचार बर्तनों की शुद्धि
अष्टम्यादि पर्व में हरित का त्याग प्रमादचर्या
अभक्ष्य वनस्पति
क्रियाकोष के अनुसार क्रियायें अष्टम्यादि पर्व का महत्त्व शूद्र सम्बन्धी विवेचन
पंचमकाल का कितना समय बीता शूद्र की परिभाषा
वीर निर्माण संवत्
शूद्रों के भोजन
विक्रम संवत् की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्नता सकरा-नकरा विवेचन
भोजन के अन्तराय
भगवान महावीर की आयु के सम्बन्ध में मतभेद उत्तरार्ध किरण की समाप्ति जिनप्रतिमा व मन्दिर निर्माण का दर्शनव्रत प्रतिमाधिकार
चौका सम्बन्धी विचार
मंगलाचरण
चौके में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव शुद्धि श्रावक शब्द की व्युत्पत्ति 298-299
धर्मात्मा का स्वरूप
दूँटी के जल का निषेध
श्रावकों के षट् कर्तव्य
कण्डे (उपले) का निषेध
धर्माचरण हीन व्यक्ति मूर्ख है सचित्त को प्रासुक करने की विधि मानव जीवन की दुर्लभता और उसकी उपयोगिता बनाई हुई वस्तुओं की मर्यादा 2, 4 तथा 8 प्रहर की मर्यादित वस्तु शरीर से ममत्व छोड़कर धार्मिक-कर्तव्य पालन का पिसे हुए पदार्थों की मर्यादा उपदेश
बूरा तथा गिनोडे की मर्यादा धर्माचरण से सब कुछ मिलता है घोर, जलेबी, द्विदल
षट् कर्म
द्विदल में त्रसहिंसा
देव पूजा का माहात्म्य
आयुर्वेद के अनुसार द्विदल में दोष ईश्वर भक्ति का माहात्म्य द्विदल सिद्धि में आचार्यों के प्रमाण पूजन के प्रकार और भेद
विषय
पृष्ठ
तीनों लोकों में जिनमन्दिर और प्रतिमाएँ 339 मूर्ति आत्मकल्याण के लिए है जिनेन्द्र ही पूज्य क्यों
कृत्रिम प्रतिमाएँ
कृत्रिम प्रतिमाओं का प्रादुर्भाव नवीन मन्दिर निर्माण की अपेक्षा जीर्णोद्धार में विशेष पुण्य
पूजा द्रव्य का वर्णन
पूजा करने से पूर्व स्नानशुद्धि पूजक का लक्षण
पूजकाचार्य का लक्षण
पूजक और पूजकाचार्य के लक्षण स्पृश्य शूद्र में घटित होते हैं या नहीं
अस्पृश्य शूद्र पूजा कर सकता है या नहीं 352 तिर्यंच भी पूजन करते हैं
मेंढक की कथा
देव-पूजा मुक्ति का कारण
पूजा करना आवश्यक है
पूजा का माहात्म्य
नित्यमह पूजा का विशेष स्वरूप प्रतिमा का स्वरूप और केशर चर्चना
विषय
पृष्ठ
नित्य पूजन का स्वरूप
जल द्रव्य से पूजन
नैवेद्य द्रव्य से पूजन
आचमन का निषेध
दीप द्रव्य से पूजन
क्या आरती करना योग्य है
सामायिक का काल
धूप एवं फल द्रव्य से पूजन
रात्रि को द्रव्य पूजन का निषेध शरद् ऋतु व दीपमालिकोत्सव
पूजा के पश्चात् शान्ति पाठ का विधान कब से मन्दिरादि में चमरी गाय के बालों का निषेध 399 जिनपूजन में चढ़ाये गये द्रव्य का विचार 401 निर्माल्य क्या है
निर्माल्य द्रव्य का क्या किया जाये द्रव्य और भाव पूजा विशेष स्वरूप पूजा का द्रव्य निर्माल्य क्यों प्रतिमाजी का स्नानान्तर
अभिषेक कथन
जलाभिषेक ही योग्य है
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
विधान
दिगम्बर मत की प्राचीनता
स्त्री प्रक्षाल सम्बन्धी विचार दूसरे कुन्दकुन्द मुनि का वर्णन शूद्रों को पूजा का अधिकार है या नहीं द्राविड, यापनीय एवं काष्ठासंघ की उत्पत्ति शूद्र क्षुल्लक दीक्षा का पात्र काष्ठा संघ में पंचामृताभिषेक शूद्रों के लक्षण एवं भेद
मूलसंघ आम्नाय से विपरीत कथन करने वाले ग्रन्थ स्थापना भेद
और उनके कर्ता
निर्दोष सप्तमी
पंचामृताभिषेक हिंसा मूलक है रात्रि पूजन का निषेध
भट्टारक मार्ग की उत्पत्ति जिनेन्द्र पूजन की प्रचलित पद्धति चौरासी आसातना
भगवान महावीर के पश्चात् आचार्य और उनका केशर तथा पुष्प चढ़ाने का प्रारम्भ समय
मूलसंघ के प्रचारक विद्वान कुन्दकुन्द स्वामी का परिचय मूलसंघी आचार्यों की नामावली आचार्य कुन्दकुन्द के पाँच नाम भट्टारकों के शास्त्र विरुद्ध आचरण आठ प्रकार के निमित्तज्ञान स्वर्गों में देव-अभिषेक
अन्तरिक्ष निमित्त श्रुतज्ञान काष्ठा संघी ग्रन्थों में जलाभिषेक का समर्थन भौम निमित्त श्रुतज्ञान
अंग निमित्त श्रुतज्ञान
जलाभिषेक के सम्बन्ध में विभिन्न ग्रन्थों के प्रमाण स्वर निमित्त श्रुतज्ञान
व्यंजन निमित्त श्रुतज्ञान गुरूपास्ति
लक्षण निमित्त श्रुतज्ञान
गुरु भक्ति आवश्यक कार्य है छिन्न निमित्त श्रुतज्ञान
गुरुओं के समीप त्याज्य क्रियायें स्वप्न निमित्त श्रुतज्ञान सच्चे गुरु का स्वरूप
चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्न गुरुओं का अवर्णवाद
भद्रबाहु स्वामी की जीवनी
सच्चा गुरु ही उपासनीय है
रामल्याचार्य व स्थूलभद्राचार्य की जीवनी भक्ति का स्वरूप
अवन्तिदेश का अकाल व उसका प्रभाव आचार्य का लक्षण
अर्धफालक मत की उत्पत्ति
उपाध्याय का लक्षण
पंचामृताभिषेकारि कब से चले ग्यारह अंग और चौदह पूर्व
पंचामृताभिषेक दिगम्बर मान्यता नहीं दश प्रकार के साधु और उनका स्वरूप (VIII)
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
कौन साधु प्रशंसनीय है
अकाल स्वाध्याय गृहस्थों के लिए पाप नहीं, केवल मुनियों के 23 सार्थक नाम
मुनियों के लिए अतीचार है
मूलसंघ के अतिरिक्त अन्य जैनसंघ शास्त्र परीक्षा विचार
उन्मार्गियों का कथन
शास्त्र के भेद
मूलसंघ के भेद
ज्ञान स्त्री एवं पुरुषों के लिए आवश्यक मत प्रवर्तक
विद्याओं के भेद और उनका स्वरूप श्वेताम्बर मत, द्राविड़ संघ मत, यापनीय संघ मत, बुद्धि के सद्गुण
काष्ठा संघ मत, माथुर संघ मत एवं भिल्लक संघ संयम का वर्णन
मत की उत्पत्ति
संयम का स्वरूप
दिगम्बर रूप में शिथिलाचारी साधु संयम के भेद
पार्श्वस्थ, कुशील, संसक्त, अवसन्न, मृगचारी तप का वर्णन
तप का लक्षण
स्वाध्याय
तप की आवश्यकता
स्वाध्याय का स्वरूप
तप के भेद और उनका स्वरूप
प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग दान का वर्णन
का लक्षण
दान का माहात्म्य और उसके भेद स्वाध्याय सम्बन्धी समय विचार धन की तीन व्यवस्था
स्वाध्याय कब वर्जित है
गृहस्थों के लिए दान के चार भेद स्वाध्याय का स्वरूप, महत्ता, समय, भेद और उनका पात्रदत्ति, समदत्ति, दयादत्ति एवं सर्वदत्ति का स्वरूप स्वरूप
अस्वाध्याय काल में किनका स्वाध्याय वर्जित है पात्रदत्ति का विशेष वर्णन दान का प्रभाव
मुनि और श्रावक के समान कर्तव्य दान रत्नत्रय की प्राप्ति का कारण श्रावक सूत्रों का पाठी हो सकता है दर्शन व्रत प्रतिमाधिकार की समाप्ति 524 अंग बाह्य श्रुत क्या है
अंग बाह्य श्रुत के भेद
सामायिकादि परिग्रहत्याग प्रतिमाधिकार कालिक और उत्कालिक ग्रन्थ
मंगलाचरण
भगवान की वाणी किस समय खिरती है नैष्ठिक श्रावक के तीन भेद भगवान कुन्दकुन्द वक्रग्रीव क्यों प्रतिमाओं का लक्षण
विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
देश संयम की ग्यारह प्रतिमाएँ परिग्रह परिमाण व्रत का स्वरूप प्रतिमाधारियों के तीन भेद परिग्रह परिमाण व्रत के पाँच अतिचार जघन्य नैष्ठिक श्रावक, मध्यम नैष्ठिक श्रावक एवं परिग्रह परिमाण व्रत के अन्य अतिचार उत्तम श्रावक (साधक) नैष्ठिक श्रावक के भेद परिग्रह परिमाण व्रत की पाँच भावनाएँ अतिचार और अनाचार में भेद (1) दर्शन प्रतिमा का स्वरूप रात्रिभोजन त्याग व्रत
जघन्य नैष्ठिक का स्वरूप
रात्रिभोजन त्याग व्रत के अतिचार हिंसा के भेद – संकल्पी, विरोधी, उद्योगी एवं (2) व्रत प्रतिमा का स्वरूप आरंभी हिंसा
दूसरी प्रतिमा में धारण करने योग्य व्रत जीव समास का स्वरूप
शील व्रत के भेद
जीव समास के कई भेद
दिग्व्रत का स्वरूप
जीव समास के 14 भेद
दिग्व्रत के पाँच अतिचार
जीव समास के 19 भेद
देशव्रत का स्वरूप
जीव समास के 57 भेद
देशव्रत के पाँच अतिचार
जीव समास के 98 भेद
अनर्थदण्डव्रत का स्वरूप
जीव समास के चार सौ छह भेद पापोपदेश अनर्थदण्ड
जघन्य नैष्ठिक श्रावक का स्वरूप हिंसादान अनर्थदण्ड
अहिंसाणुव्रत के अतिचार
अपध्यान अनर्थदण्ड
अहिंसाणुव्रत की पाँच भावनाएँ दुःश्रुति अनर्थदण्ड
सत्याणुव्रत का स्वरूप
प्रमादचर्या अनर्थदण्ड
सत्याणुव्रत के पाँच अतिचार और उनका स्वरूप अनर्थदण्ड व्रत के पाँच अतिचार शिक्षाव्रतों के भेद
सत्याणुव्रत की पाँच भावनाएँ सामायिक शिक्षाव्रत
अचौर्याणुव्रत का स्वरूप
सामायिक योग्य स्थान
अचौर्याणुव्रत के पाँच अतिचार सामायिक शिक्षा व्रत के पाँच अतिचार अचौर्याणुव्रत की पाँच भावनाएँ प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत का स्वरूप ब्रह्मचर्याणुव्रत का स्वरूप प्रोषधोपवास के दिन त्यागने योग्य कार्य ब्रह्मचर्याणुव्रत के पाँच अतिचार उपवास के दिन करने योग्य कार्य ब्रह्मचर्याणुव्रत की पाँच भावनाएँ प्रोषधोपवास के पाँच अतिचार (X)
विषय
पृष्ठ
भोगोपभोग परिमाण शिक्षाव्रत का स्वरूप 565 भोग, उपभोग यम तथा नियम का लक्षण 566 भोगोपभोग के अंतर्गत त्यागने योग्य पदार्थ 567 वनस्पतिकाय के भेद
सप्रतिष्ठित प्रत्येक अप्रतिष्ठित प्रत्येक का लक्षण भोगोपभोग परिमाणव्रती वस्तुओं का परिसंख्यान करे
भोगोपभोग परिमाणव्रत के अतिचार
श्वेताम्बर सम्प्रदाय के पन्द्रह खर कर्म अतिथिसंविभाग नामक शिक्षाव्रत का स्वरूप 574 श्रावकों के दो मुख्य कर्तव्य
देवमूढ़ता का स्वरूप
यक्षादि की पूजा फलदायक नहीं
शासन देवताओं की पूजा का निषेध
कर्मों की प्रधानता के उदाहरण
कर्मोदय साधु व तीर्थंकर को भी नहीं छोड़ता
सम्यग्दर्शन की महिमा
अष्ट ऋद्धियाँ
नवनिधि और चौदह रत्न
मिथ्यात्व के अभिवर्धक कारण
विभूतिधारी होने से देव नहीं होता
सम्यक्त्व और मिथ्यात्व की विशेषता शासनदेवता समर्थक ग्रन्थों की अप्रामाणिकता 585 सम्यग्दृष्टि शासन देवता की उपासना नहीं करता जैन मन्दिर में शासन देवताओं की मूर्तियाँ क्यों शासनदेवता की असमर्थता के उदाहरण 586 शासनदेवों को पूजना मिथ्यात्व है, इसके प्रमाण
विषय
पृष्ठ
कौन पूजनीय है और कौन नहीं है
मुनि विष्णुकुमार, यमपाल चाण्डाल, अभिनन्दन मुनि एवं ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती का उदाहरण 596-597 मिथ्यादृष्टि का संसर्ग त्याज्य
सब कुछ पुण्योदय से होता है
अतिथि शब्द का अर्थ
गृहस्थ के लिए आरंभिक हिंसा
मुनियों की वैयावृत्ति
मुनियों की रक्षा के लिए ध्यान
अतिथिसंविभाग के पाँच अतिचार
व्रतों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञातव्य उदासीन ब्रह्मचारी पैसा न रखे
व्रती अकेला विहारी न रहे
रस का त्याग करना चाहिए
गृहस्थ के टालने योग्य अन्तराय
ज्ञानाराधन ही व्रतियों का कर्तव्य है व्रती को कब मौन रखना चाहिए
व्रती के सामान्य कर्तव्य
तीर्थंकर महाव्रत ही लेते हैं
अणुव्रती राजादि पद प्राप्त कर सकता है 612 व्रती क्या करे, कहाँ नहीं जा सकता है, क्या सामान नहीं रखता आदि का वर्णन
गृहवासी व्रती के व्रत छह कोटि से और गृहत्यागी नौ कोटि से पलते हैं
अणुव्रतों को पालन कर छोड़ देने से हानि 616 पंचम काल में 123 जीव मुक्त होंगे 616 जीव संसार में कब तक रहता है - कितनी मानुष पर्याय प्राप्त होती हैं आदि
(3) सामायिक प्रतिमा का स्वरूप 617 विषय
पृष्ठ
विषय
पृष्ठ
सामायिक के भेद और उनका स्वरूप प्राणायाम में मण्डल
सामायिक के लिए योग्य स्थान
नासिका के स्वरों से शुभाशुभ का विवेचन 644 द्रव्य सामायिक करने की विधि
चार मण्डलों के पवन के ज्ञान की विधि 645 सामायिक के समय क्या विचार करे स्वरों द्वारा हैं मंत्र के ध्यान की विधि कमलाकार यन्त्र का वर्णन
शुक्ल ध्यान का स्वरूप व भेद
सामायिक के भेद और उनका स्वरूप शुक्ल ध्यान से कर्मों का नाश सामायिक के इतर प्रकार से भेद कौन केवली समुद्घात करते हैं
सामायिक के षट्कारक रूप
सामायिक के समय के आसन व कर्तव्य 648 ध्यान के भेद
सामायिक के बत्तीस दोष
ध्यानों के कार्य एवं स्वरूप
सामायिक के पाँच अतिचार
किस ध्यान से कौन-सी गति प्राप्त होती है 625 (4) प्रोषध प्रतिमा का स्वरूप आर्त, रौद्र एवं धर्म्य ध्यान के भेद 625-627
उपवास का लक्षण
आज्ञाविचय धर्म्य ध्यान का स्वरूप उपवास में दन्तधावन करने या नहीं अपायविचय धर्म्य ध्यान का स्वरूप उपवास के दिन पूजा सचित्त द्रव्य से करे या नहीं पिण्डस्थ ध्यान का विशेष स्वरूप अष्टमी चतुर्दशी पर्व क्यों हैं आग्नेयी धारणा, वायु धारणा एवं तत्रूपवती धारणा (5) सचित्त त्याग प्रतिमा का स्वरूप का स्वरूप
पदस्थ ध्यान का स्वरूप
अनन्त काय वनस्पति त्याज्य है वर्ण (अक्षरों) के ध्यान की विधि हरितकाय की रक्षा क्यों जरूरी है ईं बीजाक्षर का ध्यान
सचित्त त्याग की प्रशंसा
पंच परमेष्ठी के ध्यान की वर्णमाला एवं विधि नमक भी सचित्त है
(6) रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा का स्वरूप रूपस्थ ध्यान का स्वरूप
भगवान के सहस्र नामों में से कुछ नाम क्या इस प्रतिमा के पूर्व रात्रिभुक्ति का त्याग नहीं रूपातीत ध्यान का स्वरूप
होता
विपाक विचय धर्म्य ध्यान का स्वरूप रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमाधारी के कर्तव्य 661 संस्थान विचय धर्म्य ध्यान का स्वरूप (7) ब्रह्मचर्य प्रतिमा का स्वरूप ध्यान की आवश्यकता
ब्रह्मचर्य पालन की महिमा
प्राणायाम की विधि
ब्रह्मचर्याश्रम का वर्णन
विषय पृष्ठ
ब्रह्मचारियों के भेद 664
ब्रह्मचारी के त्यागने योग्य कर्म 665 शील के अठारह हजार भेदों का वर्णन 667 इस व्रत की महिमा 668
(8) आरम्भत्याग प्रतिमा का स्वरूप 670 आरम्भत्यागी के कर्तव्य 670
(9) परिग्रहत्याग प्रतिमा का स्वरूप 673 परिग्रह के दस भेद 674
चौदह प्रकार के अन्तरंग परिग्रह 675 परिग्रह त्याग की आवश्यकता और उसका वर्णन गृह त्याग की विधि 676
सामायिकदि परिग्रहत्याग प्रतिमाधिकार समाप्त उत्तम नैष्ठिक साधाधिकार
मंगलाचरण 678
साधक कौन है 678
साधक के तीन भेद 678
(10) दशम प्रतिमा का स्वरूप 678 (11) उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा का स्वरूप 680 एकादश प्रतिमाधारी के वस्त्र 680 उद्दिष्ट विरती श्रावक के भेद 680 क्षुल्लक के कर्तव्य 681
क्षुल्लक के दो भेद 682
दोनों क्षुल्लकों में भेद 682
क्षुल्लक की भोजन विधि 683
ऐलक का स्वरूप 685
ऐलक भोजन कैसे करे 686
ऐलक बैठकर भोजन करे 687
विषय पृष्ठ
ऐलक केशलोंच कब और कैसे करे 689 ऐलक भोजन में लालसा न करे 689
व्रती किनके यहाँ भोजन को न जावे 690 भोजन के समय न करने योग्य कार्य 691 कौन-सा साधु एकत्वविहारी हो सकता है 691 क्षुल्लिका के लिए विधान 692
व्रती का निवास वन में है 694
ऐलकादि के लिए विशेष विधान 694 किस प्रतिमा में कौन-कौन से व्रत निर्दोष होते हैं सल्लेखना 698
मरण के भेद 700
सल्लेखना घात नहीं है 701
सल्लेखना धारी के कर्तव्य 703
पाँच प्रकार का शुद्धि विवेक 704 समाधिमरण के अतिचार और उनका स्वरूप 705 देशव्रती और श्राविकाएँ मुनिवत् समाधिमरण कर सकती हैं 706
शव को कैसे ले जाया जाये 706
व्रतियों के मरण समय की क्रिया 707 अग्नि शुद्ध कैसे हो? दाह क्रिया के मंत्र 707 दाहक्रिया करनेवाले का कर्तव्य 708 नैष्ठिक साधाधिकार की समाप्ति 708 संयम-प्रकाश महाग्रन्थ की समाप्ति 708
ॐ
।। शास्त्र-स्वाध्याय का प्रारम्भिक मंगलाचरण ।। ॐ नमः सिद्धेभ्यः, ॐ जय जय जय, नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।।
ओकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ।।
अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकल भूतलमलकलंकाः । मुनिभिरुपासिततीर्था सरस्वती ! हरतु नो दुरितान् ।। अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। श्री परमगुरवे नमः, परम्पराचार्यगुरवे नमः
सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमनः- प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्रीसंयमप्रकाशनामधेयम् अस्य मूलग्रन्थकर्तारः श्रीसर्वज्ञदेवास्तदुत्तरग्रन्थकर्तारः श्रीगणधरदेवाः प्रतिगणधरदेवास्तेषां वचनानुसारमासाद्य आचार्यश्रीकुन्दकुन्दाम्नाये आचार्यसूर्यसागरेण विरचितम्। श्रोतारः सावधानतया शृण्वन्तु
मङ्गलं भगवान् वीरो मङ्गलं गौतमो गणी।
मङ्गलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम् ।। सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम् ।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम् ।।
श्रीमहावीरस्वामिने नमः
।। संयम-प्रकाश ।।
उत्तरार्ध
भावनाधिकार
मंगलाचरण
नत्वा श्रीवीरजिनं कलिमलहरणं विशुद्धचिद्रूपम् ।
संयमविकाशकेऽस्मिन् वक्ष्येऽहमुपासकाचारम्* ।।1।।
ग्रन्थ के आरम्भ में जो मुनि और श्रावकों के आचरण निरूपण करने की प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मुनियों के आचार का तो ग्रंथ के पूर्वार्ध में सविस्तार (पाँच किरणों में) वर्णन किया जा चुका है। अब उत्तरार्ध में श्रावकाचार का वर्णन किया जायेगा। इसके निम्नलिखित पाँच अधिकार नियत किये गये हैं -
(1) सम्यग्दर्शनाधिकार
(2) पाक्षिकाचाराधिकार
(3) दर्शन-व्रत-प्रतिमाधिकार
(4) सामायिकादि परिग्रहत्याग प्रतिमाधिकार
(5) उत्तम नैष्ठिक साधकाधिकार
इनमें से इस पहली किरण में क्रम प्राप्त सम्यग्दर्शन पर प्रकाश डाला जाता है। * द्वादशांगों में श्रावकधर्म निरूपक सातवें अंग का नाम उपासकाध्ययन है। श्री वसुनन्दी ने भी स्वरचित प्राकृत श्रावकाचार का नाम उपासकाध्ययन रखा है। अतः उपासक शब्द को महत्त्वशाली समझ कर इस संयम प्रकाश ग्रन्थ के उत्तरार्ध का दूसरा नाम उपासकाचार भी रखा जा सकता है। ।। अथ सम्यग्दर्शनाधिकार ।।
देशसंयमी व मिथ्यात्वी का स्वरूप
जो भव्यजीव मिथ्यात्व, सासादन और सम्यग्मिथ्यात्व नामक तीन गुणस्थानों का परित्याग कर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति पूर्वक अविरत सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थान का धारक हो जाता है, वही देशसंयत (विरताविरत) नामक पाँचवें गुणस्थान में पूर्णरूप से देशसंयम को पालन करने का अधिकारी होता है, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना कोई भी चारित्र मिथ्याचारित्र ही कहलाता है । स्मरण रखने की बात है कि अनादिकाल से जीव के साथ कर्मों का सम्बन्ध लगा हुआ है। यह पहले भी कहा जा चुका है। इन कर्मों में सबसे प्रबल मोहनीय कर्म है। इस मोहनीय कर्म के दो भेद हैं - दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । इनमें से दर्शन मोहनीय कर्म आत्मा का जैसा शत्रु है, वैसा चारित्र मोहनीय नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मदिरा से उन्मत्त हुआ मनुष्य स्व-पर को भूल जाता है; उसी प्रकार इस दर्शन मोहनीय के उदय से यह जीव जड़-चेतन के स्वरूप को भूल कर स्त्री-पुत्रादि और धन-गृहादि पर पदार्थों को अपनाने लगता है और आत्मस्वरूप से विमुख हो जाता है। इस प्रकार आत्मस्वरूप को भूल जाना, उसमें रुचि का न होना या उसमें संशय या विपरीतता उत्पन्न हो जाना ही मिथ्यादर्शन है। इसी मिथ्यादर्शन को मिथ्यात्व भी कहते हैं। जो मिथ्यादर्शन का धारक जीव है, वह मिथ्यादृष्टि या मिथ्यात्वी कहलाता है। कहा भी है -
मिथ्यात्वी द्वारा विपरीत श्रद्धान
मिच्छत्तरसपउत्तो जीवो विवरीयदंसणो होई।
ण मुणई हियं च अहियं पित्तज्जुरजुओ जहा पुरिसो ।।13।।
(भावसंग्रह, देवसेन सूरि)
अर्थ - जिस प्रकार पित्तज्वर वाला मधुर पदार्थ को भी अत्यन्त कटु अनुभव करता है, उसी प्रकार मिथ्यात्व का धारक जीव भी हित और अहित को न जान कर पदार्थों में विपरीत श्रद्धान करता है।
मिथ्यात्व के दो भेद
यह मिथ्यात्व अगृहीत और गृहीत (निसर्गज तथा अधिगमज) के भेद से दो प्रकार का है। कहा भी है -
उत्तरार्ध प्रथम किरण
किस जीव के कौन-सा मिथ्यात्व होता है -
एकेन्द्रियादिजीवानां घोराज्ञानविवर्तिनाम् ।
तीव्रसंतमसाकारं मिथ्यात्वमगृहीतकम् ।।
(अन. ध. टीका, अ. 2/10)
अर्थ - एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के द्रव्यमन के अभाव से परोपदेश ग्रहण करने की योग्यता नहीं है, अतः इनके हेयोपादेय का विशेष ज्ञान न होने से घोर अन्धकार के समान अगृहीत मिथ्यात्व ही कहा गया है। संज्ञी जीवों के गृहीत और अगृहीत दोनों तरह के मिथ्यात्व हो सकते हैं, उनमें भी बहुत से तो अगृहीत मिथ्यात्वी ही होते हैं; किन्तु जिनको परोपदेश आदि से वस्तु के यथार्थ स्वरूप में विपरीतता का दुराग्रह हो जाता है अर्थात् जो जीवादिक तत्त्वों के असली स्वरूप को न जान कर दूसरों के उपदेश से कुछ का कुछ स्वरूप जान लेते हैं, वे गृहीत मिथ्यादृष्टि कहलाते हैं। ये क्रिया-अक्रिया-विनय और अज्ञानवादी के भेद से चार प्रकार के होते हैं। क्रियावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 180 भेद
(1) क्रियावादी - आस्तिक होते हैं। इनमें क्रियावादियों के 180 भेद हैं, वे इस प्रकार हैं -
स्वभाववादी – स्वभाव ही सब कुछ करता है - ऐसा मानने वाले।
नियतिवादी – भवितव्यता से ही सब कुछ होता है - ऐसा मानने वाले ।
कालवादी - काल ही सब कुछ करने वाला है - ऐसा मानने वाले ।
ईश्वरवादी - ईश्वर ही सब कार्यों को करता है - ऐसा मानने वाले ।
आत्मवादी – सर्व व्यापी आत्मा ही सब कुछ करता है - ऐसा मानने वाले।
इनके प्रवर्तक कोक्षुल्ल, कंठेविद्ध, कौशिक, हरिश्मयश्रु, मांथविक, रोमश, हारीत, मुण्ड और आश्वलायन आदि अनेक हुए हैं।
क्रियावादी के स्वभावादि 5 पाँच भेदों को जीवादि नव पदार्थों से गुणित करने पर पैंतालीस भेद होते हैं और उन 45 भेदों को स्वतः आदि चार भेदों से गुणित करने पर 180 (एक सौ अस्सी) भेद हो जाते हैं। नीचे के कोष्ठक को देखने से यह स्पष्ट समझ में आ जायेगा।
संयम-प्रकाश
स्वभाववादी नियतिवादी कालवादी ईश्वरवादी आत्मवादी
जीव अजीव आस्रव बन्ध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य पाप
1 स्वतः 2 परतः 3 नित्य 4 अनित्य 180
अक्रियावादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 84 भेद
(2) अक्रियावादी के चौरासी भेद होते हैं। ये नास्तिक हैं। इसके प्रवर्तक मरीचि, कुमार, उलूक, कपिल, गार्ग्य, व्याघ्रभूति, वाग्वलि, माठर और मौङ्गिल्य आदि हैं। जो क्रियावादी के पाँच भेद पूर्व में बताये जा चुके हैं, वे अक्रियावादी के भी होते हैं। उनको सात तत्त्वों से गुणित करने पर पैंतीस भेद हो जाते हैं। उनको फिर स्वतः एवं परतः दोनों से गुणित करने पर सत्तर भेद होते हैं। नियति तथा काल – इन दो से सात तत्त्वों को गुणित करने पर 14 भेद होते हैं और इनको 70 में मिलाने पर चौरासी भेद अक्रियावादी के हो जाते हैं।
निम्नलिखित कोष्ठक पंक्तियों से यह अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है – स्वभाव नियति काल ईश्वर आत्म
जीव अजीव आस्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष
स्वतः 1 परतः 2 35
नियति काल
जीव अजीव आस्रव बन्ध संवर निर्जरा मोक्ष
उत्तरार्ध प्रथम किरण
प्रथम कोष्ठक में 70 भेद दिखाये हैं, वे स्वतः- परतः विकल्प की अपेक्षा दिखाये हैं। द्वितीय कोष्ठक में जो चौदह भेद दिखाये गये हैं, वे स्वतः- परतः विकल्प से रहित केवल नियति और काल की अपेक्षा से ही हैं; क्योंकि ऊपर के पाँच विकल्पों में से नियति और काल के ही दो विकल्प ऐसे हैं, जो कि स्वतः और परतः विकल्प से सहित और रहित भी हो सकते हैं। स्वभाव, ईश्वर और आत्मा - इन तीन विकल्पों में यह बात नहीं हो सकती । अतः इनको नहीं लिया है।
विनयवादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 32 भेद
(3) विनयवादी के 32 भेद होते हैं - ये लोग देव, नृप, यति, ज्ञाति (कुल-कुटुम्ब), वृद्ध, बालक, जननी और जनक - इन आठों का मन, वचन, काय और दान से विनय करने का आदेश करते हैं। इसके प्रवर्तक वशिष्ठ, पराशर, जतुकर्ण, वाल्मीक, रोमहर्षण और व्यास आदि हैं।
देवादिक आठ विकल्पों को मन आदिक चार भेदों से गुणित करने पर 32 बत्तीस भेद हो जाते हैं। इसका कोष्ठक नीचे देखिए -
देव 1 नृप 2 यति 3 ज्ञाति 4 वृद्ध 5 बालक 6 जननी 7 जनक 8 32 भेद
मन 1
वचन 2
काय 3
दान 4
अज्ञानवादी गृहीत मिथ्यादृष्टि के 67 भेद
(4) अज्ञानवादी के 67 भेद होते हैं - इस मत के प्रवर्तक साकल्प, वाष्कल, चारायण, कमठ, माध्यन्दिन, पिप्लाद और बादरायण आदि हैं।
अज्ञानवादी के सदादि सात विकल्पों को नव जीवादि पदार्थों से गुणित करने पर त्रेसठ और सद्भावोत्पत्ति आदि शुद्ध चार विकल्पों के मिलाने से 67 भेद होते हैं। नीचे के कोष्ठक को देखिए -
सत् असत् सदसत् अवाच्य सद्वाच्य असद्वाच्य सदसद्वाच्य
जीव अजीव आस्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य पाप 63 भेद
संयम-प्रकाश
शुद्ध चार भेद
सद्भावोत्पत्ति 1| असद्भावोत्पत्ति 2 सद्सद्भावोत्पत्ति 3 अवाच्य भावोत्पत्ति 4 67 भेद
363 प्रकार का पाखण्ड
क्रियावादी 180, अक्रियावादी के 84, विनयवादी 32 और अज्ञानवादी के 67 - इन सबको मिलाने पर 363 (तीन सौ त्रेसठ) मत होते हैं। यही तीन सौ त्रेसठ प्रकार के पाखण्ड भी कहलाते हैं। यह सब कथन पंच संग्रह के आधार से है। अन्य ग्रंथों में भी कहा है - असियसय किरियवाई अक्किरियाणं च होई चुलसीदी।
सत्तट्ठी अण्णाणी वेणईया होंति बत्तीसा ।।137।। (भावप्राभृत)
अर्थ - एक सौ अस्सी क्रियावादियों के, चौरासी अक्रियावादियों के, सड़सठ अज्ञानवादियों के और बत्तीस वैनयिकों के - इस प्रकार 363 मत हैं।
मिथ्यादर्शन के पाँच भेद और उनका स्वरूप
अब राजवार्तिकादि ग्रंथों के अनुसार मिथ्यादर्शन के पाँच 5 भेद बताते हैं - पंचविधं वा।
(अष्टमाध्याय, प्रथम सूत्र, वार्तिक 28)
एकान्त, विपरीत, संशय, वैनयिक और अज्ञान के भेद से मिथ्यात्व पाँच प्रकार का है। (1) यह ऐसा ही है, किसी भी तरह अन्य रूप नहीं है। जैसे यह सब ब्रह्म ही है, नित्य ही है, अनित्य ही है, एक ही है, अनेक ही है, भिन्न ही है, अभिन्न ही है। इस प्रकार मानना एकान्त मिथ्यात्व है।
(2) जो पदार्थ जैसा है, उससे उसे उल्टा मानना। जैसे परिग्रह सहित भी मुनि होता है तथा केवली भोजन करते हैं, स्त्री को भी मुक्ति हो सकती है - इत्यादि मानना विपरीत मिथ्यात्व है।
(3) यह ऐसा है या ऐसा अथवा यह है या नहीं। जैसे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के समुदाय रूप मोक्षमार्ग है या नहीं? इस प्रकार संशय करना संशय-मिथ्यात्व है। (4) सब देवताओं और सब मतों को किसी अपेक्षा के बिना ही समान रूप से सच्चा समझना वैनयिक-मिथ्यात्व है।
उत्तरार्ध प्रथम किरण
(5) अपने हिताहित को बिलकुल न समझना अज्ञान-मिथ्यात्व है।
एयंतं संसइयं विवरीयं विणयजं महामोहं ।
अण्णाणं मिच्छत्तं णिद्धिटुं सब्बदरसीहिं ।।5 ।। (दर्शनसार)
अब दर्शनसारादि के अनुसार इन पाँचों की उत्पत्ति आदि का वर्णन करते हैं - एकान्तमत की उत्पत्ति
सिरिपासणाह तित्थे सरयूतीरे पलासणयरत्थो ।*
पिहियासवस्ससिस्सो महासुदो बुड्डकित्तिमुणी ।।6।। (दर्शनसार)
अर्थ – श्री पार्श्वनाथ स्वामी के धर्मोपदेश के पश्चात् और श्री वर्धमान स्वामी के धर्मोपदेश होने के पहले 250 वर्ष का श्री पार्श्वनाथ स्वामी का जो तीर्थकाल है, इसमें सरयू नदी के किनारे पलाश नामक नगर में श्री पिहितास्रव मुनि का एक शिष्य बुद्धिकीर्ति नामक मुनि था। वह किसी कारण से मछलियों को खाने लगा और जिनदीक्षा से भ्रष्ट हो गया, फिर लाल वस्त्र धारण करके उसने यह उपदेश दिया कि मांस में जीव नहीं हैं। अतः जैसे फल, घी, दूध और दही आदि खाने में कोई दोष नहीं है, उसी प्रकार मांस-भक्षण करने में भी कोई दूषण नहीं है एवं मदिरा भी जलपान के समान निर्दोष है। जीव क्षण मात्र ही ठहरता है, फिर नष्ट हो जाता है। अतः पाप करने वाला दूसरा है और उसके फल को भोगने वाला दूसरा है - इत्यादि उपदेशों के द्वारा पाप कर्मों की प्रवृत्ति की एवं बौद्ध मत चलाया। संशय (श्वेताम्बर) मत की उत्पत्ति
छत्तीसेवरिससए विक्कमरायस्समरणपत्तस्स ।
सोरडेवलहीए उप्पण्णोसेवडोसंघो ।।11।। (दर्शनसार)
अर्थ – विक्रमादित्य राजा के मरण से 136 वर्ष पश्चात् सोरठ देश के वल्लभीपुर में अष्टांग निमित्त ज्ञानी श्री भद्रबाहु आचार्य के प्रशिष्य और शान्ति नामक आचार्य के शिष्य जिनचन्द्र ने श्वेताम्बर सम्प्रदाय चलाया।
- कोई तो यह कहते हैं कि यह बुद्धकीर्ति ही बुद्ध था। उसने जिन-दीक्षा से भ्रष्ट होकर बौद्ध मत चलाया था और अमितगति आचार्य लिखते हैं कि मौडिलायन मुनि ने बौद्ध मत चलाया और शुद्धौदन के पुत्र बुद्ध को अवतार बतलाकर पुजवाया।
संयम-प्रकाश
इस सम्प्रदाय में अनेक बातें सिद्धान्त से विरुद्ध चलाईं, जिनमें से कुछ बातें ये हैं - (1) स्त्री पर्याय से भी मुक्ति हो जाती है।
(2) केवली भगवान भी मनुष्यों के समान कवलाहार करते हैं।
(3) केवली भगवान के भी रोग हो जाता है।
(4) वस्त्र धारक मुनि व गृहस्थ भी मुक्त हो जाता है।
(5) महावीर स्वामी प्रथम ब्राह्मणी के गर्भ में आये थे, फिर देवों द्वारा क्षत्रियाणी के गर्भ में लाये गये।
(6) प्रासुक भोजन नीच शूद्र जाति वाले के घर से लेकर भी कर सकते हैं। भाव संग्रह में लिखा है कि शान्तिकाचार्य ने अपने शिष्य जिनचन्द्र को शिथिलाचार के प्रचार से रोका तो जिनचन्द्र ने उनको मार डाला। वे मरकर व्यन्तर देव हुए और उपद्रव करने लगे, तब जिनचन्द्र ने आठ अंगुल का एक लकड़ी का चौकोर पासा बनवाकर उसमें उनके नाम का संकल्प करके अष्ट द्रव्य से पूजन करना प्रारम्भ कर दिया। तब उस व्यन्तर ने उपद्रव करना बन्द कर दिया । श्वेताम्बर इसको पर्युपासन नाम का कुल देव मानते हैं। इस पासे के बीच श्वेत वस्त्र रख कर पूजा की गई थी। अतः इस मत का नाम श्वेताम्बर पड़ गया। श्वेताम्बर अब भी इसकी पूजा करते हैं।
विपरीत मत की उत्पत्ति
सुव्वयतित्थे उज्झो खीरकदंबुत्तिसुद्धसम्मत्तो ।
सीसो तस्स य दुट्ठो पुत्तो विय पव्वओ वक्को ।।16 ।। (दर्शनसार)
अर्थ - श्री मुनिसुव्रत स्वामी के तीर्थ में क्षीरकदम्बक आचार्य के शिष्य पर्वत ने अपने सहपाठी नारद से विवाद किया और अज शब्द का अर्थ बकरा बतलाया (जबकि उसका अर्थ तीन वर्ष का पुराना जौ है) तथा राजा वसु से भी इसी का समर्थन करवाया और इस प्रकार यज्ञ में पशु हिंसा का विधान सिद्ध कर धर्म विपरीत हिंसा मार्ग को चलाया।* भाव संग्रह में विपरीत मत के प्रवर्तक ब्राह्मण बतलाये हैं, उसका कथन निम्न प्रकार है -
- यह कथन विस्तारपूर्वक श्री पद्मपुराण आदि में मिलता है, वहाँ से देख लेना चाहिए। उत्तरार्ध प्रथम किरण
मण्णइ जलेण सुद्धिं तिथिं मंसेण पियखग्गस्स ।
पसुकयवहेणसग्गं धम्मं गोजोणि फासेण ।।17 ।।
अर्थ - ब्राह्मण जल से (गंगादि तीर्थों में स्नान से) आत्मा की शुद्धि, श्राद्ध में मांस भोजन कराने से पितरों की तृप्ति, यज्ञ में पशु हवन करने से स्वर्ग की प्राप्ति और गाय की योनि स्पर्श करने से धर्म मानते हैं।*
वैनयिक मत की उत्पत्ति
सव्वेसु य तित्थेसु य वेणइयाणं समुब्भवो अत्थि ।
सजडा मुंडियसीसा सिहिणोणंगाय कोई य ।।18 ।। (दर्शनसार)
अर्थ – सब ही तीर्थंकरों के तीर्थों में वैनयिकों का उद्भव होता रहा है। इनमें कोई जटाधारी, कोई मुण्डित, कोई शिखाधारी तथा कोई नग्न होते हैं।
दुढे गुणवंते वि य समया भत्तीय सव्व देवाणं ।
णमणं दंडुव्व जणे परिकलियं तेहि मूढेहिं ।।19 ।। (दर्शनसार)
अर्थ – वैनयिक मतवालों का कहना है कि चाहे दुष्ट हो या गुणवान हो, सभी देवों के प्रति समानरूप से नमस्कार-भक्ति आदि करना चाहिए।
अज्ञानमत की उत्पत्ति
सिरिवीरणहतित्थे बहुस्सुदो पास संघगणिसीसो ।
मक्कडि पूरणसाहू अण्णाणं भासए लोए ।।20 ।। (दर्शनसार)
अर्थ – महावीर स्वामी के तीर्थ समय में, श्री पार्श्वनाथ स्वामी के संघ का एक बहुश्रुत गणधर-शिष्य मस्करीपूर्ण नामक मुनि था। महावीर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति होने पर जब समवसरण की रचना हुई, तब वह उस समवसरण में जाकर बैठा। वह श्री वीर जिनेन्द्र का उपदेश सुनना चाहता था, परन्तु गौतम गणधर के बिना महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि नहीं खिरी। जब गौतम स्वामी ने दीक्षा लेकर गणधर पद प्राप्त किया, तब महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि खिरी। तब इस मस्करीपूर्ण के चित्त में यह स्पर्धा उत्पन्न हुई कि मैं भी तो ग्यारह अंग का पाठी हूँ, क्यों मेरे लिए वीर स्वामी की दिव्यध्वनि नहीं खिरी ? मुझको इन्होंने उपदेश क्यों नहीं दिया और क्यों अपने शिष्य गौतम के आते ही दिव्यध्वनि * इस प्रकार का कथन वैष्णव धर्मानुयायियों की मनुस्मृति नाम की पुस्तक के पाँचवें अध्याय में आया है। संयम-प्रकाश
खिरने लगी? इस कारण मस्करीपूर्ण को डाह पैदा हो गया और वह समवसरण के बाहर आकर महावीर स्वामी की निन्दा करने लगा कि यह सर्वज्ञ नहीं है और अज्ञान से ही मुक्ति होती है, इस प्रकार प्रचार करने लगा। भाव-संग्रह में अज्ञान मत की उत्पत्ति के विषय में लिखा है।
अण्णाणा ओ मोक्खं एवं लोयाण पयउ माणोहु ।
देवो ण अत्थि कोई सुण्णं झाएह एच्छाए ।।164 ।। (भावसंग्रह)
अर्थ - अज्ञान से ही मुक्ति होती है और कोई भी देव नहीं है, अतः अपनी इच्छानुसार शून्य का ही ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार वह जनता को उपदेश देने लगा। एवं पंच पयारं मिच्छत्तं सुरगईणिवारणयं ।
दुक्खसहस्सावासं परिहरियव्वं पयत्तेण ।।165 ।। (भावसंग्रह)
अर्थ - पूर्वोक्त पाँच प्रकार के मिथ्यात्वों को जानकर इनका परित्याग करना चाहिए, क्योंकि इनको धारण करने से दुर्गति में हजारों प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं। पाँच प्रकार तो मिथ्यात्व के बता चुके, अब मिथ्यात्व के दो प्रकार और बतलाते हैं। इनके मिलाने से मिथ्यात्व के सात भेद बताये हैं।
तं पुण सत्त पयारं विवरीयं एयत्तविणय संजुत्तं ।
संयमअण्णाणगयं चव्वक्कं तहेव संखं च ।। 1 ।। (भावसंग्रह, पृ. 5)
अर्थ - उक्त पाँच प्रकार के मिथ्यात्वों में चार्वाक और सांख्यमत को मिला कर सात भेद हो जाते हैं।
चार्वाक-मत
कउला परिओ अक्खई अत्थि ण जीवो हुकस्स तं पावं ।
पुण्णं वा कस्स भवे को गच्छई णरयसग्गं वा ।।172 ।। (भावसंग्रह)
अर्थ - इस मत का प्रवर्तक कोलाचार्य है, वह कहता है कि न कोई जीव है और न पुण्य तथा पाप है। जैसे गुड़ और धातकी (धवई के फूल) के योग से मदिरा तैयार हो जाती है; उसी प्रकार पृथ्वी, अग्नि, जल और वायु - इन चार भूतों के मिलने से शरीर में चेतना शक्ति उत्पन्न हो जाती है और जब इन चार भूतों का संयोग नष्ट होता है, तब चेतना भी नष्ट हो जाती है। न कोई परलोक से आकर जन्म लेता है और न मरकर किसी दूसरे शरीर को धारण करता है।
उत्तरार्ध प्रथम किरण
सांख्यमत
संखो पुणु मणइ इयं जोवो अत्थित्ति किरियपरिद्दीणो ।
देहम्मि णिवसमाणो ण लिप्पए पुण्णपावेहिं ।।177 ।। (भावसंग्रह)
अर्थ – सांख्य मत के प्रवर्तक कपिल मुनि का कहना है कि जीव तो क्रिया रहित है। देह में रहता हुआ भी पुण्य व पाप से लिप्त नहीं होता । प्रकृति ही कर्म करती है। इस प्रकार मिथ्यात्व के अनेक भेद हैं। यह सब भेद विवक्षा के कारण से है। यह मिथ्यात्व जीव का परम शत्रु है। हालाहल विष है। इसके समान और कोई रोग नहीं है। कहा भी है -
न मिथ्यात्वसमः शत्रुर्न मिथ्यात्वसमं विषम् ।
न मिथ्यात्वसमो रोगो न मिथ्यात्वसमं तमः ।।28 ।।
(अमितगति श्रावकाचार, अ. 2)
जब तक मिथ्यात्व नहीं हटता, तब तक ज्ञान और चारित्र में समीचीनता नहीं आती और मिथ्यात्वी को मोक्ष तो दूर रहा, संसार में भी कोई उत्तम पद नहीं मिलता। मिथ्यात्व जीव का सबसे बड़ा शत्रु है। यह असाधारण विष एवं असाधारण रोग है, क्योंकि - विष के भक्षण करने से तो एक ही भव में ही मृत्यु होती है और शरीर का भयंकर रोग भी अधिक से अधिक एक बार ही मृत्यु का कारण हो सकता है, किन्तु मिथ्यात्व रूपी विष भक्षण से अनन्त संसार में जन्म-मरण करने पड़ते हैं एवं मिथ्यात्व रोग से अनेक भवों में दुःख भोगने पड़ते हैं। इसलिये इस मिथ्यात्व के समान न कोई विष है और न कोई रोग है। मिथ्यात्व रूपी अन्धकार से ग्रसित पुरुष कभी भी निज शुद्धात्म स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता, अतः इसके बराबर कोई अन्धकार भी नहीं है। ऐसा विचार कर भव्य जीवों को सबसे प्रथम मिथ्यादर्शन और मिथ्यात्व की पोषक प्रवृत्तियों को हटाने के लिये सावधान रहना चाहिए, क्योंकि जब मिथ्यात्व हटेगा, तभी सम्यग्दर्शन और उसके साथ ही सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होगी। अब आगे सम्यग्दर्शन की योग्यता वाले का वर्णन करते हैं - सम्यग्दर्शन की प्राप्ति की योग्यता वाला जीव
चदुगदि मिच्छो सण्णी पुण्यो गब्भजविसुद्धसागारो ।
पढ मुव समं स गिण्हदि पंचमवरलद्धि चरिमाह्य ।।2।। (लब्धिसार)
संयम-प्रकाश
चउगदि भव्वो सण्णी सुविसुद्धो जग्गमाण पज्जत्तो ।
संसारतडे नियडो णाणी पावेइ सम्मत्तं ।। 307 ।।
(स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा)
अर्थ - उक्त दोनों गाथाओं का भाव यह है कि कर्मवश चतुर्गति रूप संसार में परिभ्रमण करते हुए अनादि-मिथ्यादृष्टि निकट भव्य जीव के जब संसार में रहने की स्थिति अधिक से अधिक अर्धपुद्गलपरावर्त्तन काल जितनी रह गई हो, तब प्रथम उपशम सम्यक्त्व को धारण करने की योग्यता होती है, यह पहली काललब्धि है। इस प्रथम काललब्धि की प्राप्ति होने के पश्चात् जब यह जीव पर्याप्त देव वा नारकी हो अथवा संज्ञी पर्याप्त गर्भज मनुष्य वा तिर्यंच हो एवं साकार ज्ञानोपयोग सहित हो तथा क्षयोपशम लब्धि के प्रथम समय से लेकर प्रति समय बढ़ती हुई परिणामों की अनन्त गुणी विशुद्धता से पाँचवीं करण लब्धि के उत्कृष्ट भागरूप अनिवृत्तिकरण परिणामों के अन्तिम समय में स्थित हो, भावों में पीत- पद्म वा शुक्ल लेश्या का धारक हो, जागृत अवस्था वाला हो और जिसके न तो उत्कृष्ट स्थिति वाले कर्मों का बंध हो और न जघन्य स्थिति वाले कर्मों का अर्थात् जो अन्तःकोटा- कोटी सागरोपम स्थिति वाले नवीन कर्मों का बन्ध करे और पहले बँधे हुए कर्मों की स्थिति को परिणामों की निर्मलता से संख्येय हजार सागरोपम कम अन्तःकोटा-कोटी सागर परिणाम रख ले। यह कर्म स्थिति नाम की दूसरी काललब्धि होती है।
इस द्वितीय काल लब्धि के होने पर नारकी* जीव के पर्याप्त होने के अन्तर्मुहूर्त पश्चात् पहले तीन नरकों में तो जाति स्मरण, धर्म श्रवण और वेदनानुभव रूप तीन कारणों से और नीचे के शेष चार नरकों में धर्म-श्रवण के बिना दो कारणों से सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव के पर्याप्त होने के बाद पृथक्त्व** दिन के पश्चात् जातिस्मरण, धर्म श्रवण और जिनबिम्ब दर्शन – इन तीन कारणों से सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। मनुष्यों के पर्याप्त होने के बाद आठ वर्ष की अवस्था के पश्चात् जातिस्मरण, धर्म-श्रवण और जिनबिम्ब दर्शन से सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। नव ग्रैवेयक तक के देवों के पर्याप्त होने के एक मुहूर्त बाद सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। इन देवों में बारहवें स्वर्ग पर्यन्त तो जातिस्मरण, धर्म श्रवण, जिनबिम्ब दर्शन और देवर्द्धि निरीक्षण (देवों की संपदा को देखना) – इन चार * यह वर्णन ‘सम्यक्त्वचारित्रे’ सूत्र पर राजवार्तिक की टीका के अनुसार लिखा है। ** तीन के ऊपर और नौ के भीतर की संख्या को पृथक्त्व कहते हैं।
उत्तरार्ध प्रथम किरण
कारणों से और आनतादि चार स्वर्गों में देवर्द्धि निरीक्षण बिना तीन कारणों से, ग्रैवेयकों में जाति स्मरण बिना दो कारणों से सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती है। ग्रैवेयकों के आगे नव अनुदिशादि में नियम से सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं। अनादि मिथ्यादृष्टि के मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ – इन पाँच प्रकृतियों के उपशम से यह सम्यक्त्व होता है।
सम्यक्त्व के भेद
सम्यक्त्व तीन प्रकार का है – उपशम, क्षायिक और क्षायोपशमिक । इनमें से पहले उपशम सम्यक्त्व का स्वरूप दिखलाते हैं।
उपशम सम्यक्त्व
उपशम सम्यक्त्व वह कहलाता है, जो पूर्वोक्त पाँच प्रकृतियों के उपशम से हो अर्थात् जैसे मैले जल में कतक (निर्मली के बीज) आदि डालने से उस पानी का कीचड़ बैठ जाता है और ऊपर का पानी बिलकुल स्वच्छ हो जाता है, इसी प्रकार मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ – ये पाँच प्रकृतियाँ सत्ता में विद्यमान रहने पर भी आत्मपरिणामों में कुछ भी मलिनता उत्पन्न नहीं करती; क्योंकि ये दबी रहती हैं। उपशम सम्यक्त्व के दो भेद
उपशम सम्यक्त्व के दो भेद हैं – एक प्रथमोपशम सम्यक्त्व और दूसरा द्वितीयोपशम सम्यक्त्व । यह प्रथमोपशम सम्यक्त्व अनादि मिथ्यादृष्टि के भी होता है और सादि मिथ्यादृष्टि के भी। अनादि मिथ्यादृष्टि वह कहलाता है, जिसके कभी भी पहले सम्यक्त्व नहीं हुआ हो। इस अनादि मिथ्यादृष्टि के मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ – इन पाँच प्रकृतियों का उदय रहता है। इसलिये वह ऊपर कहे हुए काल लब्धि आदि निमित्तों की प्राप्ति होने पर पाँचों प्रकृतियों का ही उपशम करके प्रथमोपशम सम्यक्त्व उत्पन्न करता है।
अनादि मिथ्यादृष्टि सम्यक्त्व की प्राप्ति होने पर सम्यक्त्व के प्रभाव से मिथ्यात्व के तीन भाग करता है अर्थात् मिथ्यात्व सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व। ये ही दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियाँ कहलाती हैं। ये तीनों तथा चारों अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ – ये सब मिलकर सात प्रकृतियाँ कहलाती हैं। सभी प्रकार के उपशम संयम-प्रकाश
सम्यक्त्वों की जघन्य व उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त मात्र है। इसके पश्चात् ये नियम से छूट जाते हैं। इसलिये जो सम्यक्त्वी इस सम्यक्त्व के काल में ही उक्त तीनों प्रकृतियों की उद्वेलना से तीनों को ही मिथ्यात्व रूप कर डालता है, उस उद्वेलना करने वाले जीव के तो पाँच प्रकृतियाँ ही सत्ता में रहती हैं और जो उद्वेलना नहीं करता, उसके सात प्रकृतियाँ सत्ता में बनी रहती हैं। अन्तर्मुहूर्त मात्र काल के पूर्ण होने पर यह सम्यक्त्वी फिर मिथ्यात्वी बन जाता है। इसी भाव को आचार्य अमितगति ने इस प्रकार दर्शाया है -
निशीथं वासरस्येव निर्मलस्य मलीमसम् ।
पश्चादायाति मिथ्यात्वं सम्यक्त्वस्यास्य निश्चितम् ।।42 ।।
(अमितगति श्रावकाचार, अध्याय 2)
अर्थ – जैसे दिन के पीछे रात्रि होती है, इसी तरह इस सम्यक्त्व के पीछे मिथ्यात्व आ जाता है अर्थात् अन्तर्मुहूर्त काल के पश्चात् यह प्रथमोपशम सम्यक्त्व का धारक जीव नियम से मिथ्यात्वी हो जाता है।
इस श्लोक के अनुसार नियम से मिथ्यात्वी बनकर चतुर्थ गुणस्थान से गिरकर प्रथम गुणस्थान में चला जाता है और सादि मिथ्यादृष्टि कहलाने लगता है। इसके पश्चात् फिर जब कभी सम्यक्त्व की उत्पत्ति के योग्य परिणामादि हो जाते हैं, तभी जो पाँच प्रकृतियों को सत्ता में रखकर मिथ्यात्वी हो जाता है, वह तो पाँच के उपशम से और जो सात प्रकृतियों की सत्ता से मिथ्यात्वी होता है, वह सात के उपशम से सम्यक्त्वी बनता रहता है। यह क्रम जब तक यह जीव उपशम श्रेणी न माँडे, तब तक चलता रहता है और प्रथमोपशम सम्यक्त्वी ही कहलाता है। एक जीव इस उपशम सम्यक्त्व को असंख्यात बार तक प्राप्त करके छोड़ता रहता है।
तस्य प्रपद्यते पश्चान्महात्मा कोऽपि वेदकम् ।
तस्यापि क्षायिकं कश्चिदासन्नी भूतनिर्वृत्तिः ।।43 ।।
(अमितगति श्रावकाचार, अध्याय 2)
अर्थ - इस प्रथमोपशम सम्यक्त्व के पश्चात् किसी भव्य जीव को वेदक सम्यक्त्व हो जाता है। इस वेदक सम्यक्त्व का धारक कोई निकट भव्य हो तो वह वेदक से क्षायिक सम्यक्त्वी हो जाता है और जो क्षायिक सम्यक्त्वी होता है, वह अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन कर सातवें गुणस्थान में सातिशय अप्रमत्त होकर या तो वह चारित्र मोहनीय की उत्तरार्ध प्रथम किरण
शेष इक्कीस प्रकृतियों का क्षय करने के लिये क्षपक श्रेणी माँडता है अथवा इतने तीव्र परिणाम न हों तो इक्कीस प्रकृतियों को उपशम करने के लिये उपशम श्रेणी माँडता है। जो क्षायिक सम्यक्त्वी न होकर वेदक सम्यक्त्व का धारक रहकर ही सातवें गुणस्थान में जाता है, वह अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन पूर्वक द्वितीयोपशम सम्यक्त्व का धारक होकर इक्कीस कषायों को उपशम करके उपशम श्रेणी माँडता है। इस द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के होने के पहले सब उपशम सम्यक्त्व प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहलाते हैं। वह द्वितीयोपशम सम्यक्त्व वाला जीव भी क्रम से अथवा अक्रम से पतन करता हुआ वापस मिथ्यात्व गुणस्थान में आ जा सकता है।
क्षायिक सम्यक्त्व
तत्कर्मसप्तके क्षिप्तं पंकवत् स्फटिकेऽम्बुवत् ।
शुद्धेऽति शुद्धं क्षेत्रज्ञे भान्ति क्षायिकमक्षयम् ।।55 ।।
(अनागार धर्मामृत, पृ. 126)
अर्थ – कर्मभूमिज मनुष्य के केवली वा श्रुतकेवली के निकट दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियों के क्षय और अनन्तानुबन्धी चारों कषायों का विसंयोजन होने पर क्षायिक सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। यह विशुद्ध उपशम सम्यक्त्व से भी अति विशुद्ध है। भावार्थ – उपशम सम्यक्त्व में भी शंकादिक दोष न होने से विशुद्धता है, परन्तु वह छूट भी जाता है और क्षायिक सम्यक्त्व छूटता नहीं मोक्ष तक बराबर बना रहता है और अचल है। कहा भी है -
रूपैर्भयंकरैर्वाक्यैर्हेतु-दृष्टान्त-दर्शिभिः ।
जातु क्षायिकसम्यक्त्वा न क्षुभ्यति विनिश्चलः ।।126 ।।
(अनागार धर्मामृत, टीका)
अर्थ – क्षायिक सम्यक्त्व निश्चल होता है अर्थात् वह अनेक प्रकार के हेतु और दृष्टान्त वाले वचनों के जाल में फँसकर अथवा भयंकर रूपों से भयभीत होकर कभी भी क्षोभ को प्राप्त नहीं होता। यह सम्यक्त्व सादि अनन्त है अर्थात् होने के पीछे कभी नहीं छूटता। इसकी उत्कृष्ट स्थिति संसारी जीव के एक अन्तर्मुहूर्त सहित आठ वर्ष कम दो कोटि पूर्व और तेंतीस सागर की है। यह सम्यक्त्व मुक्त जीव के भी रहता है और उसके इसकी स्थिति अनन्त काल की है।
क्षायोपशमिक सम्यक्त्व
संयम-प्रकाश
पाकाद्देशघ्नसम्यक्त्वप्रकृतेरुदयक्षये ।
शमे च वेदकं षण्णामगाढं मलिनं चलम् ।।56 ।।
(अनागार धर्मामृत, द्वि. अ.)
अर्थ - सम्यक्त्व की विरोधिनी जो सात प्रकृतियाँ हैं, उनमें से मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और चार अनन्तानुबन्धी कषाय - ये छह प्रकृतियाँ तो सर्वघाती हैं और एक सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व देशघाती है। वर्तमान सर्वघाती स्पर्द्धकों का (कार्माण पुद्गलों का) तो उदय में न आने रूप क्षय अर्थात् बिना फल दिये ही खिर जाना और आगामी काल में उदय आने योग्य स्पर्द्धकों का सत्ता रूप उपशम अर्थात् जहाँ के तहाँ ही ठहर जाना और देशघाती सम्यक् प्रकृति का उदय होना - इन तीनों बातों के होने पर क्षायोपशमिक सम्यक्त्व होता है। इसको वेदक सम्यक्त्व भी कहते हैं। यह चल, मलिन और अगाढ़ रूप होता है। अगाढ़तादि का स्वरूप
वृद्धयष्टिरिवात्यक्तस्थानाकरतले स्थिता।
स्थान एवं स्थितं कम्प्रमगाढं वेदकं यथा ।।57 ।।
(अनागार धर्मा., अ. 2)
स्वकारितऽर्हच्चैत्यादौ देवोऽयं मेन्यकारिते ।
अन्यस्यासाविति भ्राम्यन्मोहाच्छाद्धोऽपि चेष्टते ।।58 ।।
तदप्यलब्धमाहात्म्यं पाकात् सम्यक्त्वकर्मणः
मलिनं मलसङ्गेन शुद्धस्वर्णमिवोद्भवेत् ।।59 ।।
लसत्कल्लोलमालासु जलमेकमिवस्थितम्।
नानात्मीयविशेषेषु चलतीति चलं यथा ।।60 ।।
समेऽप्यनन्त शक्तित्वे सर्वेषामर्हतामयम् ।
देवोऽस्मै प्रभुरेषोऽस्मा इत्यास्था सुदृशामपि ।।61 ।।
(अनागार धर्मा., अ. 2)
तात्पर्य – जैसे वृद्ध पुरुष के हाथ की लकड़ी अपनी जगह से खिसकती तो नहीं है, परन्तु डगमगाती रहती है; उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि का अपने द्रव्य से बनवा कर प्रतिष्ठित कराये हुए जिनबिम्ब में यह समझना कि यह तो मेरा है और जो दूसरे के द्वारा प्रतिष्ठित हो, उसको कहना यह दूसरे का है, ऐसा समझना अगाढ़पना है। जैसे शुद्ध सुवर्ण भी चाँदी, ताँबा उत्तरार्ध प्रथम किरण
वगैरह के मेल से अशुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार यह सम्यक्त्व भी शंकादि दोषों से मलिन हो जाता है। यही इसमें मलिनता है। जैसे एक ही जल अपनी अनेक लहरों में बँट जाता है, उसी तरह सर्व तीर्थंकर अनन्त शक्ति के धारक हैं तो भी अमुक उपसर्ग के निवारण करने के लिये श्री शान्तिनाथ स्वामी की ही पूजा करनी चाहिए, श्री पार्श्वनाथ स्वामी ही विघ्न के हर्ता हैं - इत्यादि रूप जो वेदक सम्यग्दृष्टि के हृदय में विचार होता है, यही चलपना है। अथवा यह वेदक सम्यक्त्व कुछ काल रहकर अर्थात् एक अन्तर्मुहूर्त से लगाकर 66 सागर तक रहकर नियम से छूट जाता है, इसलिये भी चल है। इन तीनों सम्यक्त्वों में उपशम* सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थान से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। क्षयोपशम सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थान से लेकर सप्तम तक होता है। क्षायिक सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थान से सिद्धावस्था तक रहता है। यह क्षायिक सम्यक्त्व साध्य है और शेष दोनों सम्यक्त्व साधक हैं।
सम्यक्त्व का विशेष विवेचन
प्रथम नरक में तीनों सम्यक्त्व तथा शेष के छह नरकों में क्षायिक के बिना दोनों सम्यक्त्व होते हैं। शेष तीनों गतियों में तीनों सम्यक्त्व होते हैं। स्त्री पर्याय में तिर्यंचणी तथा देवियों के क्षायिक सम्यक्त्व नहीं होता है।
पण्डित दौलतरामजी ने ‘छहढाला’ में भी कहा है -
प्रथम नरक बिन षट् भू जोतिष वान भवन षंढ नारी ।
थावर विकलत्रय पशु में नहिं उपजे सम्यक् धारी ।।
अर्थ – सम्यग्दृष्टि जीव मर कर पहले नरक को छोड़कर शेष छह नरकों में,
भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषियों में - इन तीनों प्रकार के देव-निकायों में तथा सैनी पंचेन्द्रिय को छोड़कर अन्य बारह जीव समासों में उत्पन्न नहीं होता । स्त्रीवेद को तो चारों गतियों में ही धारण नहीं करता।
उक्त प्रकार से मिथ्यात्व के दोष और सम्यक्त्व के गुण जानकर मिथ्यात्व के सहायक जनक अन्य मत के देवों की प्रतिमा आदि रूप द्रव्य; संक्रान्ति व ग्रहणादि रूप काल; गया, प्रयाग, पुष्कर, गंगा, यमुनादि रूप क्षेत्र और श्री जिन कथित धर्म में शंका करना आदि भावों * यह उपशम सम्यक्त्व दो प्रकार का होता है - 1 प्रथमोपशम 2 द्वितीयोपशम । प्रथमोपशम सम्यक्त्व भी दो प्रकार का है - अनादि मिथ्यादृष्टि और सादि मिथ्यादृष्टि । द्वितीयोपशम सम्यक्त्व - क्षयोपशम सम्यक्त्व से कषाय की 21 प्रकृतियों का उपशम करता है और ग्यारहवें गुणस्थान तक जाता है, सो द्वितीयोपशम सम्यक्त्व कहलाता है।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3276.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है