सम्यक्दर्शन व उसके आठ अंग - जैन स्वाध्याय सामग्री | Samyakdarshan Va Uske Aath Ang

सम्यक्दर्शन व उसके आठ अंग

भव्य धार्मिक प्रतियोगिता

सम्यकदर्शन व उसके आठ अंग

संदीप जैन आत्माथी

सम्यकदर्शन एक पर्याय है।
पर्याय दृष्टि करने से सम्यकदर्शन
होता ही नहीं है।
इसीलिए सम्यकदर्शन की तरफ
देखने से सम्यकदर्शन नहीं होगा
बल्कि निज आत्मा का स्वरूप
पहचानकर उस ओर देखने से
सम्यकदर्शन होगा।

संदीप जैन आत्माथी

प्रतियोगिता विवरण

यह प्रतियोगिता भगवती आराधना नामक ग्रुप पर संदीप जैन आत्माथी के निर्देशन में आयोजित हुई।

इस ग्रुप में भगवती आराधना जी ग्रंथ पर स्वाध्याय आदरणीय अमित जी मलाह मुम्बई द्वारा कराया जाता है। इसके लिए उनका बहुत बहुत आभार प्रकट करते हैं।

इन प्रश्नों के निर्माण में आत्माथी स्वाति जैन गढ़ाकोटा वालों का पूरा सहयोग रहा इसके लिए हम उनका आभार प्रकट करते हैं।

इसमें प्रतियोगिता के साथ साथ जिनेन्द्र संदेशों व भेदज्ञान की विधियों के माध्यम से भी विषय को समझाने का सार्थक प्रयास किया गया।

इसमें सम्मिलित होने वाले सभी भव्य जीवों का भी बहुत बहुत आभार प्रकट करते हैं।
प्रतियोगिता में भाग लेने वाले भव्य जीव हैं-

मिठाली जैन कोल्हापुर, अंजू जैन, प्रभा मंगलाव इंदौर, निमेश जैन मुम्बई, अशोका जैन दिल्ली, नंदा जैन, स्वाति जैन गढ़ाकोटा, अमित शाह मुम्बई, समीक्षा जैन विदिशा, हर्षा जैन सिकन्दराबाद, अनुप्रेक्षा जैन ग्वालियर, बीना जैन बैंगलोर, प्रियंका जैन दाहोद, विजया जैन मुम्बई, प्रतिमा जैन बांसवाड़ा, दीपक जैन पीपरिया, मीनू जैन गाजियाबाद, नेहा जैन उज्जैन, राहुल जैन बैंगलोर, दीपा जैन बैंगलोर, कविता कासलीवाल मुम्बई, प्रभा जैन कोलारस, प्रतिमा जैन भिंड, नीलम जैन भिंड, आरती जैन ग्वालियर, मंजू जैन ग्वालियर, मीना जैन औरंगाबाद, मोनिका जैन आगरा इत्यादि बहुत से सदस्यों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया।

इस तरह के आयोजनों के माध्यम से हम सब सम्यकदर्शन का स्वरूप जानें व स्वपर का भेदज्ञान कर अतिशीघ्र मुक्तिवधू का वरण करें यही मंगल भावना के साथ में विराम लेता हूँ।

संदीप जैन आत्माथी

प्रश्नोत्तरी

  1. सम्यकदर्शन किसे कहते हैं?

  2. सत्यार्थ श्रद्धान को

  3. स्व पर के भेदज्ञान को

  4. 1 व 2 दोनों

  5. सही उत्तर है 3
    1 व 2 दोनों

  6. सम्यकत्व के कितने अतिचार बताए हैं?

  7. तीन

  8. चार

  9. पांच

  10. आठ

  11. सही उत्तर है 3
    पांच
    सम्यकत्व के पांच अतिचार 44 वीं गाथा में बताये गये हैं

  12. सम्यकत्व को मलिन करने वाले कुल कितने दोष बताये हैं?

  13. पांच

  14. बीस

  15. पच्चीस

  16. तीन

  17. सही उत्तर है 3
    पच्चीस
    सम्यकत्व को मलिन करने वाले पच्चीस दोष छहढाला जी की तीसरी ढाल में बताये गये हैं

प्रश्नोत्तरी

  1. सम्यग्दर्शन के कितने अंग है ?

  2. चार

  3. आठ

  4. पच्चीस

  5. बीस

  6. सही उत्तर है 2 आठ

सम्यक्त्व के आठ अंग छहढाला जी की तीसरी ढाल में व भगवती आराधना जी में बताये गये हैं

  1. भगवती आराधना जी में गाथा 41 में मिथ्यादृष्टि के लिए कौनसा उदाहरण लिया है ?

  2. सर्प को रस्सी मानने वाला

  3. ज्वर रोगी को मीठा रस बेकार लगने वाला

  4. विषयों में रत रहने वाला

  5. पापी में रत रहने वाला

  6. सही उत्तर है 2 ज्वर रोगी को मीठा रस बेकार लगने वाला

भगवती आराधना जी में 41 वी गाथा में यह कहा गया है कि जैसे ज्वर के रोगी को मधुर रस भी नहीं रुचता वैसे ही मिथ्यात्व के उदय का अनुभव करने वाले जीव को धर्म नहीं रुचता।

  1. सम्यग्दर्शन का पहला अंग है ?

  2. उपगूहन

  3. निःकांक्षित

  4. प्रभावना

  5. निःशंकित

  6. सही उत्तर है 4 निःशंकित

सम्यक्त्व के आठ अंग क्रम से हैं:

निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य व प्रभावना गुण।

  1. सम्यग्दर्शन का पांचवा अंग है ?

  2. उपगूहन

  3. निःकांक्षित

  4. प्रभावना

  5. निःशंकित

  6. सही उत्तर है 1 उपगूहन

सम्यक्त्व के आठ अंग क्रम से हैं:

निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य व प्रभावना गुण।

  1. निःशंकित अंग है ?

  2. विषयों की वांछा नहीं करना

  3. आप्त के स्वरूप में शंका नहीं करना

  4. हिंसा में धर्म है ऐसा मानना

  5. साधर्मी के दोषों को ढकना

  6. सही उत्तर है 2 आप्त के स्वरूप में शंका नहीं करना

  7. अनेकान्त स्वरूप आगम ही सच्चा है ऐसा मानना कौनसा अंग है ?

  8. उपगूहन

  9. निःकांक्षित

  10. प्रभावना

  11. निःशंकित

  12. सही उत्तर है 4 निःशंकित

  13. निःशंकित अंग का उदाहरण है ?

  14. नदी का पानी

  15. तलवार की धार का पानी

  16. समुद्र का पानी

  17. सही उत्तर है 2 तलवार की धार के पानी की तरह सन्मार्ग में संशय रहित रूचि होती है जैसे वह पानी हवा से चलायमान नहीं होता वैसे ही मिथ्यादृष्टियों के उपद्रव से ज्ञानी का श्रद्धान डगमगाता नहीं है

  18. निःशंकित अंग सहित जीव श्रद्धान करता है ?

  19. देव का

  20. कुदेव का

  21. सुदेव का

  22. सही उत्तर है 3 सुदेव का, सच्चे देव का, यथार्थ वस्तु स्वरूप का

  23. निःशंकित अंग से 47 शक्तियों में से किस शक्ति का श्रद्धान होता है ?

  24. दृशी शक्ति का

  25. अस्तित्व शक्ति का

  26. ज्ञातृ शक्ति का

प्रश्न 12.

उत्तर 2 अस्तित्व शक्ति …

स्व पर का श्रद्धान होने पर मैं कभी मिट नहीं सकता क्योंकि मैं शरीर रूप नहीं हूँ, मैं तो अनादि निधन चैतन्यमय वस्तु हूँ ऐसा निर्णय होता है

  1. निःशंकित अंग को उपमा दी है ?
  2. दाएँ पैर की
  3. आँख की
  4. पीठ की

प्रश्न 13.

उत्तर 1 दाएँ पैर की

क्योंकि हम सबसे पहले इसे ही आगे बढ़ाते है और निःशंकित से ही सम्यग्दर्शन का आरंभ होता है

  1. निःशंकित अंग में कौन प्रसिद्ध है ?
    1 40 चोर
    2 अंजन चोर
    3 राजा विक्रम

प्रश्न 14.

उत्तर 2 अंजन चोर

अंजन चोर की कथा सभी साधर्मी जरूर पढ़े कि किस तरह उसने शंका रहित होकर मंत्र का जाप किया व अपने परिणामों से तुलना करके देखें

  1. निःकांक्षित अंग दृष्टि हटाता है ?
    1 इन्द्रियजनित सुख से
    2 विषयों से
    3 1 व 2 दोनों से

प्रश्न 15.

उत्तर 3 1 व 2 दोनों

इनमें किसी भी तरह की कांक्षा या इच्छा उस जीव को नहीं होती है

  1. निःकांक्षित अंग 4 बुद्धियों में से कौनसी बुद्धि पर चोट डालता है ?
    1 कर्तृत्व बुद्धि पर
    2 भोक्तृत्व बुद्धि पर

3 ममत्व बुद्धि पर

प्रश्न 16.

उत्तर 2 भोक्तृत्व बुद्धि पर

  1. निःकांक्षित अंग से कौनसा दुख दूर होता है ?
    1 इच्छा जनित
    2 कषाय जनित
    3 1 व 2 दोनों

प्रश्न 17.

उत्तर 1 इच्छा जनित

इच्छा ही दुख का कारण है

सम्यग्दृष्टि जीव को भोगों की इच्छा ही नहीं होती उनसे वह विरक्त हो जाता है

  1. निःकांक्षित अंग को उपमा दी है ?
    1 दाएँ पैर की
    2 बाएँ पैर की
    3 आंख की

प्रश्न 18.

उत्तर 2 बाएँ पैर की

क्योंकि ये दाएँ पैर का अनुसरण करता है उसीप्रकार निःकांक्षित एवं निःशंकित अंग का अनुसरण करता है

  1. निःकांक्षित अंग में कौन प्रसिद्ध है ?
    1 सती अंजना
    2 अंजन चोर
    3 सती अनन्तमती

प्रश्न 19.

उत्तर 3 सती अनन्तमती

  1. क्या अवंती श्रावक (सम्यग्दृष्टि) को निःशंकित-निःकांक्षित अंग होते है ?
    1 हाँ
    2 नहीं
    3 इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 20.

उत्तर 1 हाँ

इसका गहन विचार करने के लिए रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी के पहले अधिकार में अवंती गृहस्थ के सम्यक्त्व के विषय में विचार जरूर पढ़े

  1. निर्विचिकित्सा अंग को उपमा दी है ?
    1 मस्तक की
    2 पीठ की
    3 बाएँ हाथ की

प्रश्न 21.

उत्तर 3 बाएँ हाथ क्योंकि ये ग्लानि रहित होकर शरीर की शुद्धि करता है

  1. निर्विचिकित्सा अंग सहित जीव को प्रीति होती है ?
    1 शरीर से
    2 गुणों से
    3 इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 22.

उत्तर

उत्तर 2 गुणों का

इसमें अशुचि भावना का भी विशेष चिन्तन होता है


  1. निर्विचिकित्सा अंग किस जैन सिद्धांत पर आधारित है ?
  2. स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ फल निश्चय ही वे देते
  3. अहिंसा
  4. वस्तु स्वातंत्र्य

प्रश्न 23.

उत्तर 1 स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ फल निश्चय ही वे देते


  1. निर्विचिकित्सा अंग की दृष्टि से स्वभाव से अशुचि शरीर भी पवित्र कैसे है ?
  2. स्नान करने से
  3. पूजन विधान करने से
  4. रत्नत्रय का स्वरूप प्रगट होने से

प्रश्न 24.

उत्तर 3 रत्नत्रय का स्वरूप प्रगट होने से


  1. निर्विचिकित्सा अंग में कौन प्रसिद्ध है ?
  2. श्रेणिक राजा
  3. उदयन राजा
  4. वसु राजा

प्रश्न 25.

उत्तर 2 उदयन राजा

प्रथमानुयोग से सभी साधर्मी यह कथा जरूर पढ़े

छहढाला चर्चा ग्रुप admin : सन्दीप जैन आत्माार्थी


  1. अमूढ़दृष्टि अंग मुख्यतः कौनसे मिथ्यात्व का नाश करता है ?
  2. गृहीत मिथ्यात्व का
  3. एकांत मिथ्यात्व का
  4. इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 26.

उत्तर 1 गृहीत मिथ्यात्व का


  1. अमूढ़दृष्टि अंग को उपमा दी है ?
  2. पीठ की
  3. दायें हाथ की
  4. पैर की

प्रश्न 27.

उत्तर 1 पीठ की

क्योंकि ये विमुख होने का प्रतीक है


  1. अमूढ़दृष्टि अंग सहित जीव कैसा श्रद्धान करता है ?
  2. चल मल दोष सहित
  3. विरोध रहित यथावत
  4. विपर्यय सहित

प्रश्न 28.

उत्तर 2 विरोध रहित यथावत


  1. अमूढ़दृष्टि अंग में कौन प्रसिद्ध है ?
  2. सती सीता
  3. राजुल सती

  1. रेवती रानी

प्रश्न 29.

उत्तर 3 रेवती रानी


  1. उपगूहन अंग को उपमा दी है ?
  2. हाथ की
  3. छाती की
  4. नितम्ब की

प्रश्न 30.

उत्तर 3 नितम्ब की

क्योंकि इसको हमेशा ढक कर रखना होता है


  1. उपगूहन अंग सहित जीव किसके दोष आच्छादित करता है ?
  2. किसी के नहीं
  3. धर्म में परनिमित्त से आये दोष
  4. 1 व 2 दोनों

प्रश्न 31.

उत्तर 2 धर्म में परनिमित्त से आये दोष


  1. उपगूहन अंग सहित जीव धर्मात्मा के दोषों को क्यों ढंकता है ?
  2. धर्म से प्रीति के कारण
  3. अपने यश के लिए
  4. धन प्राप्ति के लिए

प्रश्न 32.

उत्तर 1 धर्म से प्रीति के कारण

छहढाला चर्चा ग्रुप admin : सन्दीप जैन आत्माार्थी

  1. उपगूहन अंग के पालन से कौनसे कर्म के आस्रव का कारण दूर होता है?

  2. अंतराय कर्म

  3. ज्ञानावरण कर्म

  4. नीच गोत्र कर्म
    प्रश्न 33.
    उत्तर 3 नीच गोत्र कर्म

  5. उपगूहन अंग में कौन प्रसिद्ध है?

  6. सुदर्शन सेठ

  7. जिनेंद्रभक्त सेठ

  8. प्रियदत्त सेठ
    प्रश्न 34.
    उत्तर 2 जिनेंद्रभक्त सेठ

  9. स्थितिकरण अंग किसे कहते है?

  10. धर्म में पुनः स्थापित कराना

  11. धर्म से प्रीति होना

  12. साधर्मियों के प्रति अनुकंपा होना
    प्रश्न 35.
    उत्तर 1 धर्म में पुनः स्थापित कराना

  13. स्थितिकरण अंग सहित जीव धर्म से विचलित जीव को धर्म में पुनः कैसे स्थिर करता है?

  14. क्रोधित होकर

  15. मधुर उपदेश देकर

  16. दंड देकर

प्रश्न 36.
उत्तर 2 मधुर उपदेश देकर

  1. स्थितिकरण अंग को उपमा दी है?

  2. दाएं हाथ की

  3. आंख की

  4. पेट की
    प्रश्न 37.
    उत्तर 1 दाएं हाथ की

  5. क्या स्वयं आकुलता रूप हो जाये तो उसे अध्यात्म शास्त्रों का और आत्मस्वरूप का चिंतन बराबर स्थिर करना स्थितिकरण अंग है?

  6. नहीं

  7. हाँ

  8. पता नहीं
    प्रश्न 38.
    उत्तर 2 हाँ

  9. स्थितिकरण अंग में कौन प्रसिद्ध है?

  10. वारिषेण मुनि

  11. विष्णुकुमार मुनि

  12. वज्रकुमार मुनि
    प्रश्न 39.
    उत्तर 1 वारिषेण मुनि

  13. वात्सल्य अंग को उपमा दी है?

  14. मस्तक की

  15. पैर की

  16. छाती की
    प्रश्न 40.
    उत्तर 3 छाती की
    क्योंकि किसी से स्नेह हो तो उसे छाती से लगा लेते है

  17. वात्सल्य अंग सहित जीव किसमें अनुराग रखता है?

  18. शुद्ध ज्ञान दर्शन में

  19. धर्म तथा धर्म आयतनों में

  20. साधर्मियों में

  21. उक्त तीनों में
    प्रश्न 41.
    उत्तर 4 उक्त तीनों में

  22. वात्सल्य अंग सहित जीव किससे द्वेष करता है?

  23. मिथ्याधर्मियों से

  24. साधर्मियों से

  25. किसी से नहीं
    प्रश्न 42.
    उत्तर 3 किसी से नहीं

  26. वात्सल्य अंग सहित जीव किसी से बैर क्या विचारकर नहीं करता है?

  27. भवितव्य

2

स्वयं को हीन

3

दोनों

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 43.

उत्तर 1

भवितव्य

:red_exclamation_mark:

  1. वात्सल्य अंग में कौन प्रसिद्ध है ?

1

वारिषेण मुनि

2

विष्णुकुमार मुनि

3

वज्रकुमार मुनि

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 44.

उत्तर 2

विष्णुकुमार मुनि

:red_exclamation_mark:

  1. प्रभावना अंग को किसे कहते है ?

1

जिनशासन का माहात्म्य बतलाना-प्रकाश करना

2

जिनधर्म को आचरण में लाना

3

1 व 2 दोनों

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 45.

उत्तर 3

1 व 2 दोनों

:red_exclamation_mark:

  1. प्रभावना अंग को उपमा दी है ?

1

बाएं हाथ की

2

मस्तक की

3

पेट की

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 46.

उत्तर 2

मस्तक की
क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ अंग है और जीव इसी से प्रभावित होते है

:red_exclamation_mark:

  1. प्रभावना अंग सहित जीव का आचरण कैसा रहता है ?

1

जिससे धर्म की प्रशंसा, उच्चता, उज्ज्वलता प्रकट हो

2

अन्याय अनीति वाला

3

जिससे धर्म का, व्रत-शील का अपवाद निंदा न हो

4

1 व 3 दोनों

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 47.

उत्तर 4

1 व 3 दोनों

:red_exclamation_mark:

  1. प्रभावना अंग सहित जीव अज्ञान अंधकार को किसप्रकार दूर करता है ?

1

अपनी प्रशंसा करके

2

स्याद्वादरूप परमागम के प्रकाश से

3

वीतराग रूप धर्म के प्रकाश से

4

2 व 3 दोनों

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 48.

उत्तर 4

2 व 3 दोनों

:red_exclamation_mark:

  1. प्रभावना अंग में कौन प्रसिद्ध है ?

1

वारिषेण मुनि

2

विष्णुकुमार मुनि

3

वज्रकुमार मुनि

:red_exclamation_mark:

प्रश्न 49.

उत्तर 3

वज्रकुमार मुनि

:red_exclamation_mark:

  1. क्या ऐसी प्रतियोगिता आप आगे भी करवाना चाहते हैं ?

1

नहीं

2

हाँ

3

पता नहीं

प्रतियोगिता में भेजे गये जिनेंद्र सन्देश निम्न हैं :

जिनेंद्र सन्देश 1

जगत में करने योग्य यदि कुछ है तो वह सम्यग्दर्शन ही करने योग्य है इसीलिए मरकर भी इसे पाने का प्रयास करना

जिनेंद्र सन्देश 2

जगत में सबसे सरल कार्य है सम्यग्दर्शन करना। बस क्रमबद्ध की स्वीकृति व कर्तव्य बुद्धि का निराकरण यही सम्यग्दर्शन है। इसीलिए कर्तव्य को त्यागो

जिनेंद्र सन्देश 3

सम्यग्दर्शन भी एक पर्याय है और पर्याय दृष्टि करना हमें जैन धर्म नहीं सिखलाता इसीलिए निज में दृष्टि करो तो सम्यग्दर्शन दौड़ा दौड़ा आयेगा

जिनेंद्र सन्देश 4

अरे तुझमें केवलज्ञान पाने की शक्ति है और तू कर्मों से भयभीत हो रहा है। तुझे ये करना शोभा नहीं देता इसीलिए निज शक्ति को पहचान कर उसी में रमण कर

जिनेंद्र सन्देश 5

अरे तू भक्त नहीं भगवान बनने जन्मा है। तू भगवान के सामने नहीं उनके साथ बैठने जैसा है बस निज को पहचानने की जरूरत है वह काम जल्दी से कर ले

जिनेंद्र सन्देश 6

बाहर के रत्न तो पुद्गल है जो नाशवान है। तेरे अन्दर अनादि से रहने वाले रत्नत्रय की संदूक है बस स्वर के भेदान रूपी चाबी को खोलने की देर है उधर अपना उपयोग लगा

जिनेंद्र सन्देश 7

एक द्रव्य दूसरे द्रव्य में प्रवेश नहीं कर सकता फिर तुम शरीर को निज आत्मा में क्यों मिलाते हो। शोध भेदज्ञान करो यही करने योग्य है।

जिनेंद्र संदेश 8

इस भेदज्ञान की महिमा मुख से कही नहीं जा सकती, हाथों से लिखी नहीं जा सकती, शब्दों में वह समा नहीं सकती। ऐसा महिमान्वित, मुक्ति का द्वार, मोक्ष की पहली सीढ़ी, सिद्धियों का लघुनंदन बनाने वाला यह भेदज्ञान है जिसे पाने का हर मुमुक्षु को प्रयत्न करना चाहिए व इन दुर्लभ संयोगों को व्यर्थ ना गँवाकर करने योग्य एकमात्र कार्य यह भेदज्ञान अविलम्ब प्राप्त कर लेना चाहिए।

जिनेंद्र संदेश 9

ज्ञेयों से ज्ञान नहीं होता क्योंकि ज्ञेय पर रूप है। ज्ञेय झलकते हैं तो यह ज्ञेयों की नहीं ज्ञान की महिमा है। उस महिमा को तुम जानो, उसी में रम जाओ, जम जाओ।
यही करने योग्य है।

जिनेंद्र संदेश 10

जिनेंद्र भगवान एक समय में सबकुछ जानते हुए भी उनसे निर्लिप्त निज में ही रहते हैं फिर तू तो सिर्फ एक ही ज्ञेय को जानता है वह भी बहुत समयों को एक साथ मिलाकर, फिर तू क्यों पागलों की तरह उनमें रमता है। इसीलिए पर में रमना छोड़ दे और निज को देख।

जिनेंद्र संदेश 11

द्रव्य व गुणों से तो तू अभी भगवान है और पर्याय तो एक समय की है जो कि तेरे ज्ञान में भी नहीं आ पाती अभी।
इसीलिए चिन्ता से मुक्त हो जा और निज में रमने का पुरुषार्थ कर

जिनेंद्र संदेश 12

तू ज्ञाता दृष्टा था, है व हमेशा रहेगा। यह तेरा स्वभाव है फिर तू कर्ता रूप होकर क्यों भ्रम रहा है। विभाव रूप परिणमन क्यों कर रहा है।
स्वभाव को जान और उसी में रमण कर

जिनेंद्र संदेश 13

तू भगवान को जानना चाहता है यह अच्छी बात है लेकिन यह काम तूने बहुत बार किया है इसीलिए अब एक बार उसको जानने का प्रयास कर जिसे भगवान ने भी जाना था और वह वस्तु कुछ नहीं में स्वयं आनंद का घन भगवान आत्मा हूँ

जिनेंद्र संदेश 14

तेरा स्वभाव ज्ञाता दृष्टा है इसीलिए तुझे कुछ करना नहीं है बस होते हुए को सहज पन से जानना है।
इसी को निज में रमना कहते हैं यही करने योग्य है।

जिनेंद्र संदेश 15

तू करना बहुत कुछ चाहता है पर कुछ कर सकता नहीं क्योंकि करना तेरा स्वभाव नहीं है।
इसीलिए कर्तृत्व को छोड़कर निज में रह, यही करने योग्य है।

जिनेंद्र संदेश 16

एक बार तू निज को जान तो सही, निज में रमण कर तो सही।
फिर देख सामने मुक्तिवधू वरमाला लिए स्वागत करने को उत्सुक खड़ी।

प्रतियोगिता में भेजी गयी भेदज्ञान की विधि निम्न है:

भेदज्ञान की विधि 1

हमने बचपन में सामान्य गुणों में अगुरुलघुत्व नाम का एक गुण पढ़ा था जिसके अनुसार एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप नहीं होता, एक गुण दूसरे गुण रूप नहीं होते व द्रव्य के अनन्त गुण बिखर कर अलग अलग नहीं होते।
यह परिभाषा भेदज्ञान करने के लिए पर्याप्त है।
अरे यह भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म यह सब जीव द्रव्य से परे पुद्गल रूप हैं व मैं जीव रूप हूँ। जब अब एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप हो ही नहीं सकता मतलब यह पुद्गल भी जीव रूप हो नहीं सकता। पुद्गल के गुण जीव रूप हो ही नहीं सकते।
इससे स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि मैं आत्मा हूँ व भावकर्म, द्रव्यकर्म व नोकर्म से भिन्न वस्तु हूँ।
बस यही ज्ञान भेदज्ञान है। और यह एक परिभाषा का अभ्यास, चिन्तन उस भेदज्ञान को करने के लिए पर्याप्त है।
जीव जुदा, पुद्गल जुदा, यही तत्व को सार।
बाकी जो कुछ और है याही का विस्तार ।।

भेदज्ञान की विधि 2

मान लो एक कमरे में दस बल्ब जल रहे हैं व उन सबका प्रकाश आपस में मिला हुआ दिख रहा है। लेकिन यदि हम एक बल्ब को बन्द कर दें तो वह बल्ब अपना प्रकाश समेटकर बन्द हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि उस बल्ब का प्रकाश अलग ही था। सब बल्बों का प्रकाश मिला हुआ दिखाई देने पर भी सबका प्रकाश अलग अलग है, सब के प्रदेश अलग अलग हैं, सब भिन्न भिन्न द्रव्य हैं। यही ज्ञान भेदज्ञान है।
ऐसे ही हमें यह शरीरादि पुद्गल द्रव्य जीव के साथ मिले हुए दिख रहे हैं पर वास्तव में यह मिले हुए नहीं हैं। जैसे बल्बों का प्रकाश मिला हुआ दिखाई देने पर भी अलग अलग था वैसे ही यह पुद्गल रूप द्रव्यकर्म, नोकर्म आदि मिले हुए दिखाई देने पर भी भिन्न भिन्न हैं।

हमें ज्यादा कुछ नहीं करना बस जो भिन्न भिन्न जानना है और यही जानने
का नाम भेदज्ञान है।

भेदज्ञान की विधि 3

बल्बों के उदाहरण से ही हमने यह जाना कि सब बल्बों के प्रकाश का प्रदेश भिन्न भिन्न
था, सबका सत्ता भिन्न भिन्न थी क्योंकि यदि एक ही सत्ता होती तो एक बल्ब के बन्द होने
पर सारा प्रकाश बन्द हो जाना चाहिए था।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हर बल्ब का आधार आधेय संबंध दूसरे बल्ब से नहीं
था।एक बल्ब का प्रकाश दूसरे के आधार से नहीं था।
उसी प्रकार मेरा आधार आधेय संबंध मेरे स्वभाव से है वह पुद्गल के स्वभाव से हो नहीं
सकता क्योंकि पुद्गल व मेरी सत्ता भिन्न भिन्न है,मैं पुद्गल रूप कभी ना हुआ और ना हो
सकता हूँ।इसीलिए मेरे व पुद्गल के आधार आधेय संबंध किसी भी तरह नहीं बनता।इसीलिए
पुद्गल मुझसे भिन्न,पृथक है और यही ज्ञान भेदज्ञान है।

भेदज्ञान की विधि 4

मुझमें ज्ञान गुण है व ज्ञान का काम है जानना।मतलब जानने की क्रिया ज्ञान के आधार से
होती है इसीलिए ज्ञाननक्रिया व ज्ञान में आधार आधेय संबंध है।
क्रोध पुद्गल रूप है व क्रोध की क्रिया क्रोध के आधार से होती है इसीलिए क्रोधादिक्रिया व
क्रोध में आधार आधेय संबंध है।
अब मेरा आधार आधेय संबंध अलग,पुद्गल का आधार आधेय संबंध है।
इसीलिए क्रोध रूप मैं हो नहीं सकता,क्रोध मुझ रूप हो नहीं सकता।कर्म जो कि पुद्गल रूप
है वे मुझ रूप हो नहीं सकते।मैं उनरूप हो नहीं सकता।जब मैं मैं उनरूप नहीं हो सकता व
मुझरूप नहीं हो सकते तो हममें प्रत्यक्ष ही भिन्नता है और इसी भिन्नता का नाम भेदज्ञान
है।

भेदज्ञान की विधि 5

दूसरी विधि में वर्णित उदाहरण में जब बल्बों के प्रकाश पुद्गल रूप होते हुए भी अलग अलग
हैं,द्रव्य अपेक्षा समान होने पर भी भिन्न भिन्न है,साथ साथ रहते हुए भी कभी मिले
नहीं,मिल सकते नहीं तो मैं तो यहाँ जीव द्रव्य व ये शरीरादि पुद्गल द्रव्य हैं।यहाँ तो प्रत्यक्ष
ही द्रव्य की ही भिन्नता है तो यहाँ तो मैं प्रत्यक्ष ही पुद्गल से भिन्न सिद्ध हो गया।अरे
इससे ज्यादा और प्रमाण क्या दे जब प्रत्यक्ष ही भिन्नता दिखा दी।
और यही भिन्नता देखने जानने का नाम भेदज्ञान है।

भेदज्ञान की विधि 6

जिस प्रकार एक दर्पण के सामने जो भी पदार्थ आते है वे सब ज्यों की त्यों उसमें झलकते हैं
उसी प्रकार मेरी आत्मा ज्ञान दर्शन स्वभावी है इसीलिए ज्ञान गुण के कारण सभी ज्ञेय चाहे
वे मूर्तिक हो या अमूर्तिक,पास ही का हो या दूर,भूतकाल का हो या वर्तमान काल के इत्यादि सब
प्रत्यक्ष वर्तमान में दिखाई देते हैं।ऐसी मुझमें स्वच्छत्व शक्ति है।
जिस प्रकार दर्पण में चाहे आग दिखे,चाहे पानी,चाहे काला कपड़ा दिखे,चाहे सफेद कपड़ा
लेकिन वह कभी भी उन रूप नहीं होता।
उसी प्रकार चाहे गाली रूप ज्ञेय झलकें,चाहे स्तुति रूप ज्ञेय झलकें लेकिन मेरी आत्मा सभी
ज्ञान स्वभाव से बाहर उन रूप होती नहीं।
इसीलिए पर को जानने से,क्रोध को जानने से मेरी आत्मा मलिन हो जायेगी यह बात व्यर्थ है
क्योंकि मुझमें सदाकाल स्वच्छत्व शक्ति है।
इस शक्ति का ख्याल में आना ही भेदज्ञान है।

भेदज्ञान की विधि 7

पुण्य व पाप जो विकारी भाव हैं उनके प्रदेश व आत्मा के प्रदेश बिल्कुल भिन्न हैं।
पुण्य व पाप आस्रव रूप भावों के प्रदेशों से संवर स्वभावी आत्मा के प्रदेशों की भिन्नता है व
इसी भिन्नता का नाम भेदज्ञान है।

इसी प्रकार व्रत,तप,दया,दान आदि भी मुझसे भिन्न हैं इनके द्वारा आत्मा ज्ञात नहीं हो
सकता।
इसीलिए इन सबसे भिन्न मैं ज्ञायक स्वभावी भगवान आत्मा हूँ ऐसा ज्ञान वही
भेदज्ञान है।

भेदज्ञान की विधि 8

जैसे गंदगी व स्वच्छता दोनों एक साथ नहीं रह सकती,गंदगी में स्वच्छता नहीं हो
सकती,स्वच्छता में गंदगी नहीं हो सकती।गंदगी की सत्ता अलग व स्वच्छता की सत्ता
अलग,गंदगी व स्वच्छता दोनों के प्रदेश अलग।
उसी तरह यह आस्रव भाव(पुण्य व पाप दोनों) मलिनभाव हैं,अशुचि रूप हैं इनका
निर्मल,स्वच्छ व शुचिता पूर्ण आत्मा में कोई जगह ही नहीं है।
दोनों के प्रदेश भिन्न,सत्ता भिन्न ऐसी दोनों में प्रत्यक्ष भिन्नता है व इसी भिन्नता का नाम
भेदज्ञान है।

सन्दीप जैन आत्मार्थी

निज में रहना है तो पर को
छोड़ना पड़ेगा।
पर को छोड़ने के लिए पहले पर
को जानना होगा।
इसीलिए किसी भी कीमत पर
स्वपर का भेदज्ञान आवश्यक है
व यही करने योग्य है।

सन्दीप जैन आत्मार्थी

छहढाला चर्चा ग्रुप
admin : सन्दीप जैन आत्मार्थी


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 157.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है