सम्यक्-मिथ्यात्व पुण्य प्रकृति | Samyak-Mithyatva Punya Prakriti


सिद्ध परमेष्टि विधान ( राजमल जी पवैया ), रोला छ्न्द

सम्यक्-मिथ्यात्व पुण्य प्रकृति कैसे? या ये मिसप्रिंट है?

@Siddhant_Jain जी, जय जिनेन्द्र।

सिद्ध परमेष्ठी विधान की इस पंक्ति पर आपका प्रश्न बहुत सूक्ष्म है: सम्यक्मिथ्यात्व को पुण्य प्रकृति कैसे कहा गया, या यह मुद्रण की भूल है। यह अब तक अनुत्तरित रहा, इसके लिए खेद है। मैंने इसे JinSwara कंटेंट टीम के विद्वान साथियों तक पहुँचा दिया है, आगम-आधारित उत्तर यहीं आएगा।

तब तक फ़ोरम के साधर्मियों से निवेदन: तत्त्वार्थसूत्र के आठवें अध्याय में पुण्य और पाप प्रकृतियों का जो विभाजन है, उस पर सर्वार्थसिद्धि टीका क्या कहती है, तथा गोम्मटसार कर्मकाण्ड में दर्शनमोहनीय की तीन प्रकृतियों का जो वर्णन है, उसे ग्रंथ और गाथा के संदर्भ सहित यहाँ रखें। यदि किसी के पास इस विधान का दूसरा संस्करण हो, तो वहाँ यह पंक्ति कैसे छपी है, यह भी बताइए।