समुद्घात — जैन स्वाध्याय सामग्री | Samudghaat

समुद्घात

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समुद्घात

  • डॉ. संजीवकुमार गोधा

समुद्घात

लेखक
डॉ. संजीवकुमार गोधा
एम.ए. द्वय (जैन विद्या तुलनात्मक धर्म दर्शन, इतिहास)
नेट, एम.फिल (जैन दर्शन), पी-एच.डी.
बी-54, जनता कॉलोनी, जयपुर

प्रकाशक
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर-302 015
फोन : 0141-2707458, 2705581
E-mail : [email protected]

समुद्घात : डॉ. संजीवकुमार गोधा
प्रथम संस्करण : 3 हजार
(1 मार्च, 2023)

मूल्य : स्वाध्याय

मुद्रक :
देशना कम्प्यूटर
जयपुर

विषय-सूची

  1. समुद्घात : भूमिका 1
  2. समुद्घात : परिभाषा व भेद 8
  3. वेदना समुद्घात 10
  4. कषाय समुद्घात 14
  5. वैक्रियिक समुद्घात/
    विक्रिया समुद्घात 15
  6. मारणान्तिक समुद्घात 20
  7. तैजस समुद्घात 25
  8. आहारक समुद्घात 32
  9. केवली समुद्घात 40

प्रकाशकीय

जिनागम के चारों ही अनुयोगों के मर्मज्ञ, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान डॉ. संजीवकुमार गोधा अब हमारे बीच नहीं रहे। भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की जैन समाज उनके प्रवचनों को बड़े आदर से सुनती थी, इतनी अल्पवय में वे सम्पूर्ण जैन समाज के हृदय के हार बन गये थे। आज उनकी रिक्तता की पूर्ति होना असम्भव सा लग रहा है परन्तु उनके द्वारा लिखित कृतियों के माध्यम से उनकी कमी की कुछ भरपाई करने का प्रयास कर रहे हैं। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति कालचक्र के पांच संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। अब यह नवीनतम कृति समुदायत आपके हाथों में है।

यह तो सर्वविदित ही है कि छह द्रव्यों का समूह विश्व कहलाता है। प्रत्येक द्रव्य में प्रदेशत्व नामक सामान्य गुण विद्यमान है। आत्मा भी एक द्रव्य है तथा उसमें भी प्रदेशत्व नामक गुण है जिससे उसका एक निश्चित आकार है। समुदायत की विषयवस्तु आत्मा के आकार को लेकर ही है जिसे आगम के परिप्रेक्ष्य में स्व. डॉ. संजीव गोधा जी ने सहज व सरल ढंग से इस कृति में समझाने का प्रयत्न किया है। कृति देखने में लघुकय अवश्य है पर देखने में छोटे लोग घाव करें गंभीर की लोकोक्ति को चरितार्थ कर रही है। आपने समुदायत की विषयवस्तु को गागर में सागर भरने का कार्य किया है। इसके लिए समाज आपका ऋणी रहेगा।

डॉ. संजीव जी ने तीन लोक विषय पर पी.एच.डी. की तथा 13 ग्रंथों का संपादन व अनेक शोध लेख लिखे हैं। कुछ पुस्तकों का प्रणयन भी आपके द्वारा किया गया है जिनका प्रकाशन यथाशीघ्र किया जाएगा।

इस कृति के प्रकाशन का दायित्व सदा की भांति विभाग के प्रभारी डॉ. अनिल बंसल ने बखूबी सम्हाला है, श्री अनिलजी खनियांधाना का सहयोग भी सराहनीय रहा है अतः दोनों का आभार। इस कृति के माध्यम से आत्मा के असंख्यात प्रदेशों का कब कहाँ और कैसे क्षेत्र से क्षेत्रांतर होता है इस सूक्ष्म विषय को बड़ी ही सरलता से समझाने का प्रयास किया है। सभी विद्वजन अपना आत्मकल्याण करें यही भावना है। कृति स्वाध्याय हेतु डॉ. संजीवकुमार गोधाजी की तेरहवीं पर सभी आत्मार्थियों को भेंट की जा रही है इसके लिए उनके पिता श्री महेन्द्रकुमार गोधा, माता श्रीमती मंजु गोधा, धर्मपत्नी श्रीमती संस्कृति गोधा एवं सुपुत्र चि. आर्जव गोधा का आभार।
विपिन जैन ‘शास्त्री’, मुम्बई
प्रकाशन मंत्री

अंतर्भावना

इस दुष्षम पंचम काल में जिनदेव का जब हो विरह।
तब मात सम उपकार करते शास्त्र ही आधार हैं।।

श्री संजीवकुमारजी गोधा सरल शैली में प्रवचन करने जन-जन के प्रिय विद्वान हैं।

बाल्यकाल से ही उनकी धर्म में रूचि रही है। विवाह उपरांत भी वे घर-गृहस्थी के विकल्पों में अधिक नहीं उलझे और निरंतर तत्व प्रचार ही करते रहे। जिसकी मैं साक्षी रही हूँ।

उनकी भावना जिनधर्म के प्रचार-प्रसार की ही रही है। जिस हेतु उन्होंने अनेक ग्रंथों पर प्रवचन तथा लेखन कार्य किया है।

जिनमें से यह प्रस्तुत कृति समुदायत आपके सम्मुख प्रस्तुत है।

सभी इसका लाभ लेते हुए मोक्षमार्ग में अग्रसर हों इसी मंगल भावना के साथ…

  • संस्कृति गोधा

प्रस्तुत कृति श्रीमती संस्कृति-संजीवकुमारजी गोधा की ओर से स्वाध्याय हेतु सप्रेम भेंट।

समुदायत : भूमिका

यह सम्पूर्ण विश्व छह द्रव्यों का समुदाय है, छह द्रव्यों के अतिरिक्त इस विश्व में अन्य कुछ भी नहीं है।

प्रत्येक द्रव्य का कोई न कोई आकार अवश्य होता है; क्योंकि प्रत्येक द्रव्य में प्रदेशत्व नाम का सामान्य गुण है। आत्मा भी एक वस्तु (द्रव्य) है, उसमें भी प्रदेशत्व नाम का गुण है; अतः उसका भी एक निश्चित आकार है। समुदायत की चर्चा एक प्रकार से आत्मा के आकार की ही चर्चा है।

प्रश्न : क्या आत्मा का भी आकार होता है? आत्मा तो निराकार है ना।

उत्तर : इन्द्रियों के द्वारा ज्ञात न होने के कारण तथा पौद्गलिक शरीर आदि आकारों से भिन्न बताने के लिये आत्मा को निराकार कहा जाता है। वस्तुतः ज्ञान नेत्रों द्वारा ज्ञात होने योग्य आत्मा का निश्चित आकार है, जो केवलज्ञानियों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से जाना जाता है। जगत में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका कोई आकार न हो। प्रत्येक द्रव्य/वस्तु में एक प्रदेशत्व नाम का गुण होता है। जिसके कारण द्रव्य अपने आकार सहित ही होता है। आत्मा भी एक द्रव्य है, अतः उसमें भी प्रदेशत्व नामक गुण होने से उसका भी निश्चित आकार है।

यथा - पुद्गल द्रव्य का आकार एक प्रदेश, संख्यात प्रदेश, असंख्यात प्रदेश तथा अनंतप्रदेश के आकार रूप होता है, धर्म द्रव्य का आकार लोकाकाश प्रमाण कहा गया है और धर्म द्रव्य के समान ही अधर्म द्रव्य का भी आकार लोकाकाश के बराबर असंख्यात प्रदेश वाला कहा है तथा आकाश द्रव्य अनंत प्रदेशों के आकार वाला है और अंत में काल द्रव्य का आकार एक प्रदेश बराबर है।

सम्प्रदाय

अब प्रश्न उठता है कि आत्मा का आकार कैसा है? यह तो सर्व विदित है कि संसार दशा में जीव शरीर सहित ही होता है, वह जिस शरीर में रहता है उस शरीर का आकार ही व्यवहार से आत्मा का आकार कहा गया है।

आचार्य योगिन्दु देव लिखते हैं-

गिच्छई लोय-परमाणु मुणि, व्यवहारे सुसरीरु।
एहउ अप्प-सहाउ मुणि, लहु पावहि भव-तीरु।।
व्यवहार देह प्रमाण अर परमार्थ लोक प्रमाण है।
जो जानते इस भांति वे निर्वाण पावें शीघ्र ही।।24।।

अर्थात् आत्मा का आकार व्यवहार से देह प्रमाण तथा निश्चय से लोक प्रमाण अर्थात् असंख्यात प्रदेशी है। जो आत्मा के आकार को इसप्रकार जानते हैं; वे शीघ्र ही निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

यहाँ व्यवहार से आत्मा को देह प्रमाण कहा गया है। पर वह कौन से देह प्रमाण है, इसकी चर्चा द्रव्यसंग्रह में नेमिचंद्राचार्य करते हैं-

अणुगुरु देहपमाणो, उवसंहारप्पसप्पदो चेदा।
असमुहदो ववहारा, णिच्छयणयदो असंखदेसो वा।।10।।

अर्थात् यह जीव समुदात्त के अतिरिक्त अवस्था में व्यवहार नय की अपेक्षा से संकोच-विस्तार के कारण अपने छोटे अथवा बड़े शरीर प्रमाण रहता है और निश्चयनय की अपेक्षा से असंख्यात प्रदेशी है।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिसका जैसा शरीर है, वह आत्मा उस शरीर जैसे आकार का है। चींटी का शरीर हो तो वैसे आकार का, हाथी का शरीर हो तो वैसे आकार का; जिसका जैसा शरीर है, उसका आत्मा भी उसी आकार का होता है। यदि आत्मा छोटे शरीर में हो तो छोटे तथा बड़े शरीर में हो तो बड़े आकार का होता है। इसप्रकार यह आत्मा समुदात्त के अलावा शेष सभी परिस्थितियों में शरीर नामकर्म के उदय से होने वाले

सम्प्रदाय: भूमिका

संकोच-विस्तार वाला है तथा समुदात्त के काल में यह आत्मा शरीर से बाहर फैलता है। इसे घड़े आदि विविध पात्रों में स्थित दीपक की तरह बताते हुए आचार्य उमास्वामी लिखते हैं-

प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत्। (तत्त्वार्थ सूत्र,5/16)

अर्थात् आत्मा के प्रदेशों का संकोच और विस्तार दीपक के प्रकाश के समान होता है।

जैसे शरीर जन्म से लेकर वर्तमान अवस्था तक निरन्तर वृद्धिंगत हुआ है, वैसे शरीर का आकार तो बड़ा ही है; पर साथ-साथ आत्मा का भी आकार बड़ा है, उसका भी फैलाव हुआ है; परन्तु ये सभी कथन व्यवहार से ही है।

निश्चय से तो आत्मा सदाकाल लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी ही है। अर्थात् जितने लोकाकाश के प्रदेश हैं, उतने ही आत्मा के प्रदेश है। इसका तात्पर्य यह है कि जब आत्मा सम्पूर्ण लोक में व्याप्त होता है, तब लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर आत्मा का एक-एक प्रदेश होता है; एक प्रदेश भी कम-ज्यादा नहीं होता। इसप्रकार यह आत्मा व्यवहार से शरीर प्रमाण और परमार्थ से लोक प्रमाण है।

दीपक का उदाहरण भी बड़ा ही सटीक है। जैसे यदि दीपक के ऊपर ग्लास रखा है तो उसका प्रकाश ग्लास के रूप हो जाएगा, यदि उससे बड़ा कोई बर्तन रखा है तो उसका प्रकाश उस बड़े बर्तन के आकार रूप हो जाएगा, यदि उस दीपक को बंद कमरे में रखा गया है तो उसका प्रकाश कमरे के आकार रूप हो जाएगा। इसी तरह संसार अवस्था में आत्मा का आकार छोटे-बड़े शरीर प्रमाण के रहता है। जैसे-जैसे देह परिवर्तित होती जाती है, वैसे-वैसे आत्मा के प्रदेशों का भी संकोच-विस्तार होता जाता है।

शंका : आप कह रहे हैं कि आत्मा के प्रदेश शरीर से बाहर तक

सम्प्रदाय

फैल जाते हैं। आत्मा कोई दूध, पानी की तरह वस्तु है क्या ? जो बाहर तक फैल जाता है। आत्मा के फैलने की बात समझ में नहीं आई।

समाधान : अरे भाई ! आत्मा कोई पौद्गलिक स्कंध रूप वस्तु नहीं है, जो बिखरकर फैल जाये। आत्मा एक अभेद/अखंड पदार्थ है, इसके टुकड़े नहीं होते। आत्मा के फैलने का अर्थ उसके प्रदेशों के विस्तार से है। आत्मा के प्रदेशों में संकोच-विस्तार की सामर्थ्य होती है। वे आत्मा के प्रदेश (समुद्दात्त को छोड़कर) शरीर के प्रमाण में रबड़ की तरह फैलते और सिकुड़ते रहते हैं।

शंका : जब यह आत्मा चींटी जैसे छोटे शरीर में रहता है, तब सिकुड़कर कम जगह में रहने से आत्मा को बहुत तकलीफ होती होगी?

समाधान : नहीं भाई! ऐसा नहीं है। आकार के छोटे-बड़े होने से सुख-दुख का संबंध नहीं है। दुःख का मूल कारण तो शरीर में अपनापन करना है। यदि आकार मात्र से सुख-दुख हो तो भगवान ऋषभदेव 500 धनुष (2000 हाथ) आकार वाले होने से ज्यादा सुखी एवं भगवान महावीर 7 हाथ वाले होने से कम सुखी हो जायेंगे; किन्तु ऐसा नहीं है, दोनों ही अनंत सुखी हैं। साढ़े तीन हाथ से लेकर सवा पाँच सौ धनुष के आकार वाले सभी सिद्ध परमात्मा एक समान ही सुखी होते हैं।

शंका : क्या आत्मा का आकार छोटा-बड़ा होता रहता है? आत्मा का कोई निश्चित आकार नहीं है क्या?

समाधान : प्रत्येक आत्मा असंख्यात प्रदेशी है, यही उसका निश्चित प्रमाण (आकार) है। प्रदेशों की संख्या की दृष्टि से आत्मा के प्रदेश लोकाकाश के प्रदेशों के बराबर हैं। आत्मा एवं लोकाकाश के प्रदेशों में परस्पर एक भी प्रदेश कम-ज्यादा नहीं है। योगसार ग्रन्थ में योगेन्दुदेव ने निश्चय से आत्मा का आकार लोकप्रमाण बताया है।

समुदाय : भूमिका

आत्मा का आकार निश्चय से लोकप्रमाण बताया जाने पर भी यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि कई जीव इस लोक में ऐसे भी हो सकते हैं, जिनका आत्मा अनादि से अनंत काल के मध्य कभी भी लोकप्रमाण विस्तार को प्राप्त न हुआ है और न ही होगा। आत्मा के लोकप्रमाण होने की स्थिति मात्र लोकपूर्ण नामक केवली समुदाय के समय ही बनती है।

शंका : तो फिर निश्चय से आत्मा को लोकप्रमाण कहने का क्या औचित्य है ? यह जीव जिस अवस्था को कभी भी प्राप्त न करे उसे निश्चय कैसे कहा जा सकता है ?

समाधान : यहाँ निश्चय से कहकर आचार्यदेव आत्मा के प्रदेश एवं लोकाकाश के प्रदेशों की संख्या की समानता बताना चाहते हैं। यह समानता लोकपूर्ण समुदाय के समय स्पष्ट ख्याल में आती है, क्योंकि उससमय जब आत्मा के प्रदेश सम्पूर्ण लोक में फैलते हैं, तब लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर आत्मा का एक-एक प्रदेश रहता है। यही आत्मा के प्रदेशों की निश्चित संख्या है। इस निश्चितता को बताने के लिये ही आचार्यों ने निश्चय शब्द का प्रयोग किया है। आत्मा के प्रदेशों की यह संख्या कभी भी घटती-बढ़ती नहीं है, चाहे वह संसार अवस्था में किसी भी शरीर में क्यों न रहे।

प्रश्न : यदि आत्मा का आकार संसार अवस्था में शरीर प्रमाण रहता है तो शरीर छूट जाने पर विग्रह गति में क्या होता होगा ? क्या विग्रह गति में आत्मा सम्पूर्ण लोक में फैल जाता है ?

उत्तर : नहीं! ऐसा नहीं होता; क्योंकि विग्रह गति में गत्यानुपूर्वी नाम कर्म प्रकृतियों का उदय रहता है। यह गत्यानुपूर्वी नाम कर्म चार प्रकार का है। मनुष्य गत्यानुपूर्वी, देव गत्यानुपूर्वी, नरक गत्यानुपूर्वी और तिर्यंच गत्यानुपूर्वी। ये चार प्रकार की गत्यानुपूर्वी प्रकृतियाँ क्षेत्र विपाकी

समुदाय

हैं। कर्मों की 148 प्रकृतियों में कुछ जीव विपाकी, कुछ क्षेत्र विपाकी, कुछ पुद्गल विपाकी और कुछ भव विपाकी हैं। सभी कर्म प्रकृतियों में क्षेत्र विपाकी प्रकृतियाँ मात्र 4 गत्यानुपूर्वी ही हैं।

ये कर्म प्रकृतियाँ आत्मा के क्षेत्र को इंगित करने वाली हैं। इस जीव को मरण के पश्चात् जिस गति में जाना है, उस गति के योग्य नामकर्म का उदय होता है। यदि नरक गति में जाना है तो नरक गत्यानुपूर्वी, यदि तिर्यंच में जाना है तो तिर्यंच गत्यानुपूर्वी। इसीप्रकार जिस गति में जाना है, उस गति के नाम के साथ गत्यानुपूर्वी शब्द जुड़ जाता है। इस गत्यानुपूर्वी नामकर्म के उदय के कारण ही विग्रह गति में यह आत्मा किसी निश्चित आकार में रहता है। ध्यान रहे! विग्रह गति में उस गत्यानुपूर्वी नाम कर्म का उदय होगा, जिस गति में जाना है; परंतु विग्रह गति में आत्म प्रदेशों का आकार वह होगा; जिस अवस्था में मरण हुआ है।

प्रश्न : मरणोपरांत यह जीव देह में से किस प्रकार बाहर निकलता है ? हमने सुना है किसी के प्राण आँख में से तो किसी के मुँह से निकलते हैं - इस बात में कितनी सत्यता है ?

उत्तर : मरण होने पर अर्थात् आयु कर्म समाप्त होने के पश्चात् जब यह जीव देह परिवर्तन के लिये गमन करता है, तब पूर्व देह की अंतिम अवस्था रूप में यह जीव सर्वांग से बाहर निकलता है।

इस दुनिया में बहुत से लोग मृत शरीर में आँखें अथवा मुँह खुला देखकर इसप्रकार की कल्पना करते हैं कि इनका जीव आँख, मुँह, नाक अथवा कान में से निकला होगा; किन्तु यह मान्यता यथार्थ नहीं है। अरे भाई! आत्मा कोई हवा की तरह भौतिक पदार्थ नहीं है, जिसे निकलने के लिए किसी मार्ग की जरूरत पड़े। वह पानी जैसा तरल पदार्थ भी नहीं है, जिसके लिए किसी छिद्र की आवश्यकता हो। वह तो चैतन्यमय अमूर्तिक-अस्पर्शी परम पदार्थ है, जो देह से सर्वांग निकलता है।

समुदाय : भूमिका

आयु कर्म को भोगते हुए जीवित अवस्था में भी यह आत्मा देह प्रमाण आकार वाला ही होता है और देह छोड़ने के बाद भी आत्मा का आकार छोड़े हुए शरीर की अंतिम अवस्था जैसा ही होता है। जैसे यदि किसी जीव का देहवियोग बैठे-बैठे हुआ हो, तो उसका आत्मा भी बैठी अवस्था के आकार में ही शरीर के सर्वांग से बाहर निकलकर विग्रहगति में गमन करता है। इसीप्रकार खड़े हुए, लेटे हुए अथवा अन्य किसी भी अवस्था में देहवियोग होने पर यह आत्मा शरीर से उसी आकार में बाहर निकलता है, जिस आकार में आयु पूर्ण हुई हो। किसी का मरण बम विस्फोट होने पर हुआ हो, जिसके कारण उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया हो- ऐसी स्थिति में भी आत्मा विस्फोट की तरह फैले हुए एक निश्चित विचित्र आकार से ही विग्रह गति में गमन करता है।

द्रव्य संग्रह में एक और बात का उल्लेख किया है कि भले ही आत्मा का आकार देह प्रमाण कहा हो पर कभी-कभी आत्मा के प्रदेश इस देह से बाहर भी निकलते हैं।

हे भव्य आत्माओ! जीव को अन्तर में जो सुख-दुःख की अनुभूति होती है, उन अनुभूतियों को जीव स्वयं अन्तर में स्वानुभव से स्पष्ट जानता है। विचार की उत्पत्ति शरीर में नहीं, जीव में होती है। जीव अरूपी है इसलिए उसके विचारों एवं अनुभूतियाँ भी अरूपी हैं; वे नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर न होने पर भी स्वसंवेदनरूप ज्ञान से जानी जा सकती है। इसप्रकार संवेदन करनेवाला तत्व ही जीव है। इसप्रकार अरूपी एवं ज्ञानमय जीव का अस्तित्व प्रत्येक को अपने स्वसंवेदनज्ञान से सिद्ध हो सकता है। ‘मैं हूँ’ ऐसी अपनी अस्ति का जो वेदन करता है, वही जीव है।

समुदाय : परिभाषा व भेद

मूल शरीर को छोड़े बिना आत्म प्रदेशों के शरीर से बाहर निकलने को समुदाय कहते हैं। यदि आत्मा के सभी प्रदेश अर्थात् पूरा आत्मा शरीर से बाहर निकल जाये, तो मरण हो जावे। समुदाय जीवित अवस्था में ही होता है। विशेष बात यह है कि इसमें आत्मा के कुछ प्रदेश शरीर के भीतर एवं कुछ प्रदेश शरीर के बाहर तक फैल जाते हैं, यही अवस्था समुदाय कहलाती है।

मरण होने पर तो आत्मा और शरीर भिन्न-भिन्न भासित होते ही हैं; किन्तु जीवित रहते हुये भी शरीर और आत्मा दोनों की सत्ता भिन्न-भिन्न प्रदर्शित करने वाला यह समुदाय वाला प्रकरण ही है।

गोम्मटसार जीवकाण्ड में आचार्य नेमिचन्द्र देव लिखते हैं-

मूलसरीरमछोडिय उत्तरदेहस्स जीवपिंडस्स।
णिग्गमणं देहादो होदि समुग्घायणामं तु।। (गो.जी. 668)

अर्थात् मूल शरीर को न छोड़कर तैजस, कार्मण रूप उत्तर देह के साथ-साथ जीव प्रदेशों के शरीर से बाहर निकलने को समुदाय कहते हैं।

(द्रव्यसंग्रह, टीका /10/31 में उद्धृत)

* तत्त्वार्थराजवार्तिक ग्रंथ में 1/20 पृष्ठ - 77/12 पर आचार्य अकलंकदेव लिखते हैं -

हन्तेर्मिक्रियात्वात् संभूयात्मप्रदेशानां च बहिरुदहननं समुद्घातः।

अर्थात् वेदना आदि निमित्तों से कुछ आत्मप्रदेशों का शरीर से बाहर निकलना समुदाय है। (गो.जी./जी. प्र. 543/939/3)

(केवली समुदाय के प्रकरण में ) घातने रूप धर्म को घात कहते हैं, जिसका प्रकृत में अर्थ कर्मों की स्थिति और अनुभाग का विनाश

समुद्घात : परिभाषा व भेद 9

होता है। उत्तरोत्तर होने वाले घात को उद्घात कहते हैं, और समीचीन उद्घात को समुद्घात कहते हैं। (ध.1/1,1.60/302/5)

जिन अवस्थाओं में यह जीव मूल शरीर को छोड़े बिना शरीर से बाहर निकलता है, उन जिनागम में समुद्घात नाम से पुकारा है। समुद्घात 7 प्रकार के हैं अर्थात् इस जीव के प्रदेश मूल शरीर को छोड़े बिना 7 अवस्थाओं में शरीर से बाहर निकल सकते हैं। सात प्रकार के समुद्घात इस प्रकार हैं -

वेयण कसाय वेउव्विओ मरणंतिओ समुग्घाओ। तेजाहारो छट्टो सत्तमो केवलीणं तु।

अर्थात् वेदना, कषाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तैजस, आहारक और केवली समुद्घात; ये सात प्रकार के समुद्घात होते हैं।

(रा. वा. 1/20/77/12/); (ध.4/1,3,2/26/5); (गो.जी./मू.667/ 1112) (बु.द्र.सं/10/30); (गो. जी./जी. प्र. गाथा 543)

1.वेदना समुद्घात
2.कषाय समुद्घात
3.वैक्रियिक समुद्घात
4.मारणान्तिक समुद्घात
5.तैजस समुद्घात
6.आहारक समुद्घात
7.केवली समुद्घात

अब आगे क्रमशः इनका विवेचन करेंगे।

संसार के चाहे जैसे पुण्य संयोग हों, वे जीव को तृप्ति नहीं दे सकते; जीव को तृप्ति दे ह ऐसा स्वभाव आत्मा में ही है। निज स्वभाव में सुख का जो भण्डार है, उसे देखते ही अपूर्व सुखानुभव और तृप्ति होती है। उस सुख के लिए किसी बाह्य सामग्री की अपेक्षा नहीं होती। राजवैभवादि चाहे जितने होने पर भी जीव मानसिक चिन्ताओं से दुःखी ही रहता है।

1. वेदना समुद्घात

तत्त्वार्थराजवार्तिक ग्रंथ में वेदना समुद्घात के बारे में आचार्य अकलंकदेव लिखते हैं -

वातिकादिरोगविषदिद्रव्यसंबन्धसंतापापादित वेदनाकृतो वेदनासमुद्घातः। (राजवार्तिक, 1/20/77)

अर्थात् वात-पित्तादि विकार जनित रोग या विषपान आदि की तीव्रवेदना से आत्मप्रदेशों का बाहर निकलना वेदना समुद्घात है।

तथ वेयण समुग्घाओ णाम अक्खि-सिरोवेयणादीहिं
जीवाणुक्कस्सेण सरीरत्तिगुणविष्फज्जणं। (ध. 4/1, 3,2/
26/7)(ध. 7/2,6,1/299/8); (ध. 11/4,2,5,9/18/7)

अर्थात् नेत्र वेदना, शिरोवेदना आदि के द्वारा जीवों के प्रदेशों का उत्कृष्टतः शरीर से तिगुणे प्रमाण विसर्पण का नाम वेदना समुद्घात है।

इसीतरह द्रव्यसंग्रह ग्रंथ की टीका (10/31/1) में ब्रह्मदेव सूरि लिखते हैं -

तीव्रवेदनानुभवात् मूलशरीरमत्यक्त्वा आत्मप्रदेशानां बहिर्निर्गमनमिति वेदना समुद्घातः।

अर्थात् तीव्र पीड़ा के अनुभव से मूल-शरीर को न छोड़ते हुए जो आत्मा के प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलना, सो वेदना समुद्घात है।

वेदना समुद्घात में प्रदेशों का विस्तार -

वेदना के वश से जीव प्रदेशों के विष्कम्भ और उत्सेध की अपेक्षा तिगुणे प्रमाण में फैलने का नाम वेदना समुद्घात है। (ध. 11 / 4,2,5,9/8/7) (ध. 7/2,6,1/299/8)

परन्तु सभी जीवों के प्रदेश वेदना के वश से तिगुणे ही फैलते हों ऐसा नियम नहीं है। किन्तु तरतम रूप से स्थित वेदना के वश से अपने

वेदना समुदाय

विषकम्र की अपेक्षा एक दो प्रदेशादिकों की भी वृद्धि होती है। (ध. 11/4,2,5,9/8/7) (गो. जी. / जी. प्र. /584)
प्रश्न: क्या वेदना समुदाय सभी जीवों को हो सकता है ?
उत्तर: नहीं, ऐसा नहीं है। निगोद अवस्था में उत्पन्न होने वाले जीव के अतिशय तीव्र वेदना का अभाव होने से विवक्षित शरीर से तिगुणा वेदना समुदाय सम्भव नहीं है। (ध. 11/ 4,2,5,12/21/2 )
प्रश्न: शरीर से सम्बद्ध आत्मप्रदेशों में कुछ आत्मप्रदेशों के खण्डित शरीर में रहने की अपेक्षा से आत्मा का खण्डन होता है अन्यथा तलवार आदि से कटे हुए शरीर के पृथग्भूत अवयवों में कम्पन न देखा जाता ?
उत्तर: खण्डित अवयवों में प्रविष्ट आत्मप्रदेशों में पृथक् आत्मा का प्रसंग भी नहीं आता है; क्योंकि वे फिर से पहले ही शरीर में लौट आते हैं।
प्रश्न: आत्मा के अवयव खण्डित हो जाने पर पीछे फिर एक कैसे हो जाते हैं ?
उत्तर: हम उनका सर्वथा विभाग नहीं मानते। कमलनाल के तंतुओं की तरह आत्मा के प्रदेशों का छेद स्वीकार करते हैं।
तीव्र शारीरिक वेदना के काल में आत्म प्रदेशों का उत्कृष्टतः तीन गुणा तक फैलना वेदना समुदाय कहलाता है। इसमें आत्मा के एक-दो प्रदेश भी शरीर से बाहर निकल सकते हैं। निगोदिया जीवों के भी वेदना समुदाय हो सकता है, किन्तु अतितीव्र वेदना का अभाव होने से उनके प्रदेश तीन गुणा नहीं फैलते।
अन्य स्थानों पर इसे औषध समुदाय भी कहा गया है। यदि कोई असाध्य रोग हो और तीव्र वेदना हो, यदि उसके उपचार का विकल्प है तब आत्मा के प्रदेश उस स्थान पर जाकर उस जड़ी-बूटी आदि का स्पर्श करके लौट आते है इससे रोग दूर हो जाता है, इसे ही औषध या वेदना समुदाय कहते हैं।

समुदाय

जगत में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं कि जिसमें डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि इन्हें ले जाओ ये अब जीवित नहीं रहेंगे और वे ठीक हो जाते हैं तथा वर्षों तक जीवित भी रहते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो जाता है? हो सकता है ऐसी घटनाओं के पीछे यह औषध समुदाय भी कारण हो।
हमें यह चमत्कार जैसा इसलिए लग रहा है; क्योंकि यह अनहोनी जैसी घटना घट गई। जैसे किसी को लास्ट स्टेज का कैंसर था और शरीर से कैंसर के सारे परमाणु ही गायब हो गए हो। हमें यह चमत्कार-सा दिखता है; किन्तु ऐसी परिस्थितियों में औषध समुदाय भी कारण हो सकता है। अतः यह कोई चमत्कार नहीं; इसमें बड़ी बात तो यह है कि आत्मा अभेद, अखंड रहता है, वह बीच में से टूटता नहीं है, खण्डित नहीं होता है - यही चमत्कार है।
छिपकली की पूँछ बहुत नाजुक होती है, जब उस पर कोई विपत्ति आती है या उसे कोई छूता है, तब वह अपनी पूँछ छोड़ देती है और वह आगे भाग जाती है, उसकी पूँछ तड़पती रहती है, उसे वेदना है उसके मूल शरीर से लेकर पूँछ तक आत्मप्रदेश फैले हुए हैं। ऐसा नहीं है कि उसके बीच के आत्मप्रदेशों का अभाव हो जाता हो। जब तक पूँछ तड़पती रहती है, तब तक उसमें आत्मप्रदेश मौजूद रहते हैं। पश्चात् आत्मप्रदेश मूल शरीर में मिल जाते हैं।
कभी इससे विपरीत परिस्थिति भी बनती है, वह समुदाय तो नहीं है; पर उसी जैसा है। जैसे - किसी के हाथ में पैरालिसिस का अटैक आया और पूरा हाथ सुन्न हो गया उस परिस्थिति में हाथ से आत्मप्रदेश सिकुड़ गए और वह पूरा हाथ आत्मप्रदेशों से शून्य हो गया। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि डॉक्टर इलाज आदि करते हैं तो वापस उस हाथ में आत्म प्रदेश लौट आते हैं।

वेदना समुदाय

हम टेलीविजन आदि पर देखते हैं कि किसी का सिर कट गया और कुछ सेकण्डों तक धड़ लड़ाई करता रहा, तलवार चलाता रहा। सिर तो तड़प रहा है और धड़ लड़ रहा है। यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक आत्मप्रदेश परलोक गमन नहीं कर जाते।
एक सच्ची घटना है कि हमारे घर पर एक अम्माजी किराये पर रहती थीं, वे फर्स्ट फ्लोर पर झूला झूल रही थीं। अचानक उनके झूले की रस्सी टूटी और वे फर्स्ट फ्लोर से नीचे गिर गईं, गिरने से उनका हाथ कट गया। उनका हाथ बहुत देर तक तड़पता रहा। डॉक्टर भी ऐसे कटे हुए अंगों को एक निश्चित समयावधि तक ऑपरेशन करके जोड़ने का दावा करते हैं और जोड़ भी देते हैं।
पर बात तो यहाँ यह है कि वेदना समुदाय में आत्मा में तीन गुणा आत्मप्रदेश बाहर निकलते हैं और यदि हम औषध समुदाय की बात करें तो जड़ी-बूटी के स्थान को स्पर्श करके पुनः लौट आते हैं।
जिस पाप क्रिया को रोक पाना संभव न हो, उस असमर्थता को अशक्यानुष्ठान कहते हैं। जैसे भोजन के चूहे में कुत्ता, बिल्ली, चूहा और मक्खी एक जैसे माँसाहारी और गंदगी पसन्द प्राणी, एक जैसी अशुद्धि फैलाते हैं, फिर भी कुत्ते की जाली का आधा फाटक लगाकर रोका जा सकता है, अतः उसके चौके में प्रवेश मात्र से चौके की अशुद्धि मानी जाती है और उस भोजन सामग्री को हटाकर पुनः बनाई जाती है। बिल्ली को फाटक से नहीं रोक सकते, वह खिड़की आदि के रास्ते से भी आ जाती है, वह दूध को जूठा करेगी तो दूध फेंकेंगे, सब सामग्री नहीं और चूहा मोरी आदि किसी रास्ते से, कहीं से भी आ सकता है अतः यदि वह आटे को जूठा करेगा तो आटे के उस हिस्से को नोंचकर फेंकेंगे, पूरा आटा नहीं। मक्खी के आटे पर बैठने पर आटा नोंचते भी नहीं, मात्र मक्खी को उड़ा देते हैं। घी के पीपे में मक्खी मर भी जाये तो घी से भरा पूरा पीपा नहीं, मात्र मक्खी ही निकाल कर फेंकी जाती है, बस इसी मजबूरी का नाम अशक्यानुष्ठान है। इसमें जिसप्रकार की अशुद्धि का त्याग गृहस्थ से संभव नहीं है, वह अशक्यानुष्ठान है।

२. कषाय समुद्घात

राजवार्तिक ग्रन्थ-१/२०/७७/१४ में आचार्य अकलंकदेव कषाय समुद्घात का स्वरूप स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-
द्वित्रितयप्रत्यप्रकर्षादितिक्रोधादिकषितः कषायसमुद्घातः।
अर्थात् बाह्य और अभ्यन्तर दोनों निमित्तों के प्रकर्ष से उत्पादित जो क्रोधादि कषायें, उनके द्वारा किया गया कषाय समुद्घात है।
क्रोध भय आदि के द्वारा जीवों के प्रदेशों का उत्कृष्टतः शरीर से तिगुणे प्रमाण विसर्पण का नाम कषाय समुद्घात है। (ध. ४/१,३,२/२६/४)
कषाय की तीव्रता से जीवप्रदेशों का अपने शरीर से तिगुणे प्रमाण फैलने को कषाय समुद्घात कहते हैं। (ध. ७/२, ६, १/२९९/४)
तीव्र कषाय के उदय से शरीर को न छोड़कर परस्पर में एक दूसरे का घात करने के लिए आत्मप्रदेशों के बाहर निकलने को कषाय समुद्घात कहते हैं। संग्राम में योद्धा क्रोध में आकर लाल-लाल आँखें करके अपने शत्रु को ताकते हैं, यह प्रत्यक्ष देखा जाता है - यही कषाय समुद्घात का रूप है। (कार्तिकेय अनुप्रेक्षा /टी./१७६/११५/१९ )
क्रोध आदि तीव्र कषायों के काल में आत्मा के प्रदेश एक चक्राकार रूप में शरीर से बाहर निकलते हैं, उसे ही कषाय समुद्घात कहते हैं। कभी-कभी तीव्र क्रोध में आँख, मुँह, कान लाल हो जाते हैं, उस तेज के साथ में आत्मा के प्रदेशों का बाहर निकलना कषाय समुद्घात है। आत्मा के प्रदेश जब भी इस शरीर से बाहर निकलते हैं तब औदारिक शरीर तो नहीं; किन्तु तैजस और कार्मण शरीर तो साथ में रहते ही हैं।
शंका : क्या कषाय और वेदना समुद्घात कषायों की तीव्रता में ही होते हैं? अथवा मंद कषाय या शुभ लेश्याओं के काल में भी ये समुद्घात सम्भव हैं?

समाधान : नहीं, ऐसा नहीं है। देव गति के जीवों में तीन शुभ लेश्यायें ही होती हैं। धवला पुस्तक - ७ में देवों के भी कषाय और वेदना समुद्घात का सद्भाव बताया है। अतः देवों के ये समुद्घात होने से शुभ लेश्या के काल में भी वेदना और कषाय समुद्घात मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

३. वैक्रियिक समुद्घात/विक्रिया समुद्घात

अपने शरीर को विकल्प पूर्वक एक-अनेक, छोटा-बड़ा आदि करने की सामर्थ्य विक्रिया कहलाती है। इस विक्रिया के काल में आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलना ही वैक्रियिक समुद्घात है। देवों और नारकियों का तो शरीर ही वैक्रियिक होता है, उनके द्वारा मूल शरीर के अतिरिक्त अन्य आकार आदि बनाने पर भी यह समुद्घात होता है।
मनुष्यों के यद्यपि औदारिक शरीर ही होता है, तथापि अनेक सामर्थ्यशाली जीवों में विक्रिया से अनेक शरीर आदि बनाने का विधान कहा गया है। तत्त्वार्थसूत्र में लब्धिप्रत्ययं च कहकर मनुष्यों के भी उपचार से ऋद्धि के निमित्त से वैक्रियिक शरीर कहा गया है। इस प्रकार की विक्रिया किसी-किसी तिर्यंच को भी हो सकती है। नारायण, प्रतिनारायण, चक्रवर्ती आदि महापुरुषों के अनेक शरीर बनाने की सामर्थ्य है, उन सभी पृथक् शरीरों में भी आत्मा के प्रदेश व्याप्त रहते हैं।
देव अपनी विक्रिया सामर्थ्य से अनेक शरीर बनाते हैं। देवों का मूल शरीर तो अपने स्थान पर ही रहता है और विक्रिया से बनाये गये अनेक शरीर दूसरे क्षेत्रों में भी चले जाते हैं। जब देव गति के जीव तीर्थंकरों के पंच कल्याणक आदि के प्रसंग में आते हैं अथवा नन्दीश्वर द्वीप आदि में जाते हैं, तब भी उनका मूल शरीर अपने स्थान पर ही रहता है और विक्रिया निर्मित शरीर ही अन्य स्थान पर गमन करता है। उनके आत्मा के प्रदेश मूल शरीर से विक्रिया निर्मित शरीर तक जुड़े रहते हैं। यह वैक्रियिक समुद्घात का ही काल है।
ध्यान रहे, कोई भी पृथक् विक्रिया अन्तर्मुहूर्त से ज्यादा नहीं रह पाती है, अतः वे देव प्रत्येक अन्तर्मुहूर्त में पुनः पुनः विक्रिया करते रहते हैं।
आचार्य अकलंकदेव वैक्रियिक समुद्घात का स्वरूप बताते हुए लिखते हैं -

एकत्वपृथक्त्वनानाविधविक्रियशरीरवाक्प्रहरणणादि-विक्रिया-प्रयोजनो वैक्रियिकसमुद्घातः। (राज. १/२०/१२/७७/१६)

१६ समुद्घात
अर्थात् एकत्व पृथक्त्व आदि नाना प्रकार की विक्रिया के निमित्त से शरीर और वचन के प्रचार, प्रहरण आदि की विक्रिया के अर्थ वैक्रियिक समुद्घात होता है।
वैक्रियिक शरीर के उदय वाले देव और नारकी जीवों का अपने स्वाभाविक आकार को छोड़कर अन्य आकार से रहने का नाम वैक्रियिक समुद्घात है। (ध. ४/१, ३,२/२६/४)
विविध ऋद्धियों के महात्म्य से संख्यात व असंख्यात योजनों को शरीर से व्याप्त करके जीव प्रदेशों के अवस्थान को वैक्रियिक समुद्घात कहते हैं। (ध. ७/२, ६,१/२९९/१०)
द्रव्यसंग्रह टीका /१०/२५/५ में ब्रह्मदेवसूरि लिखते हैं -
मूलशरीरमपरित्यज्य किमपि विकर्तुमात्मप्रदेशानां बहिर्गमनमिति विक्रिया समुद्घातः।
अर्थात् किसी प्रकार की विक्रिया उत्पन्न करने के लिए अर्थात् शरीर को छोटा-बड़ा या अन्य शरीर रूप करने के लिए मूल शरीर का त्याग न करके जो आत्मा के प्रदेशों का बाहर जाना है, उसको विक्रिया समुद्घात कहते हैं।
उक्त प्रमाणों के अनुसार वैक्रियिक शरीर वाले जीवों के द्वारा दूसरा शरीर भी बना लिया जाता है। यहाँ शरीर तो दो है; परन्तु दोनों में एक ही आत्मा विद्यमान है। मात्र दो ही नहीं, हजारों शरीरों में भी एक ही समय में एक ही आत्मा व्याप्त रहे, यह वैक्रियिक समुद्घात में सम्भव हो जाता है।
चक्रवर्ती एक ही समय में ९६००० रानियों के साथ रहता है। तब भी मूल शरीर से आत्मा के प्रदेश प्रत्येक दूसरे शरीर तक फैले रहते हैं। ऐसी ही सामर्थ्य नारायण, प्रतिनारायण आदि के भी पाई जाती है। रावण अपने अनेक शरीर बना लेता था, यह वैक्रियिक समुद्घात की बात है।
नारकियों और देव गति के जीवों की विक्रिया अलग-अलग प्रकार

वैक्रियिक समुदायत / विक्रिया समुदायत

की होती है। देवों की विक्रिया पृथक् विक्रिया भी होती है, वे मूल शरीर को छोड़कर भी अनेक शरीर बना सकते हैं। परंतु नारकियों के अपृथक् विक्रिया ही होती है, वे अपने मूल शरीर को ही अस्त्र-शस्त्र आदि रूप बना सकते हैं। नारकी अपने परिणामों के द्वारा विक्रिया से अस्त्र-शस्त्र की रचना करते हैं। उस अस्त्र-शस्त्र की रचना में भी उनकी आत्मा के प्रदेश व्याप्त रहते हैं। यह वैक्रियिक समुदायत है।

देवों का मूल शरीर हमेशा अपने निवास स्थान पर ही रहता है। वे देव स्वर्ग से मध्य लोक में आते हों या अधो लोक में जाते हों अथवा भवनत्रिक के देव भी आते-जाते हैं तो उनका भी मूल शरीर वहीं भोगों में ही रहता है और वे विक्रिया से बनाये गये दूसरे शरीर से गमन करते हैं; यही कारण है कि उनका वह वैक्रियिक शरीर आहार देने के योग्य नहीं होता है।

हमें देवों की महिमा आती है; जबकि देव अनेक बातों में मनुष्यों से अयोग्य सिद्ध होते हैं। जैसे - उन्हें पालकी उठाने का प्रथम अधिकार नहीं, आहार देने का अधिकार नहीं। मुनिराजों को यदि पता चले कि देव आहार दे रहे हैं तो वे आहार नहीं लेते हैं; क्योंकि उनका मूल शरीर भोगों में ही रहता है, इसलिए वे आहार देने के अयोग्य हैं।

14वीं सदी के अपभ्रंश महाकवि रइधू द्वारा लिखित ‘भद्रबाहु-चाणक्य-चन्द्रगुप्त कथानक एवं राजा कल्कि वर्णन’ नामक पुस्तक में एक कथा आती है कि देवों ने नगर बसाकर चन्द्रगुप्त मुनिराज को आहार दे दिया, वे मुनिराज आहार लेकर वापस लौट गए, मुनि संघ में से एक मुनिराज अपना कमंडल वहाँ पर भूल आये थे, जब वे वापस लौटे तो वहाँ उन्हें नगर ही नहीं मिला। उन्होंने यह सारी घटना आचार्यश्री को बताई। आचार्य समझ गये कि देवों ने आहार दिया है, पश्चात् उन्होंने प्रायश्चित्त देकर शुद्ध कराया।

समवशरण की रचना भी विक्रिया का ही एक प्रकार है। विक्रिया से निर्मित कोई भी रचना अंतर्मुहूर्त से ज्यादा नहीं टिकती है। समवशरण

समुदायत

का मूल स्वरूप अधिकांशतः विक्रिया से बनता है और उसके निर्माण की सामग्री कुबेर के खजाने से आती है तथा कुछ सामग्री विक्रिया की बनी होती है। जैसे - दो व्यक्तियों में से एक ने तो बना बनाया मकान खरीदा और दूसरे ने मकान बनवाया। नया मकान बनवाने में भी बहुत-सी सामग्री बाजार से बनी बनाई आती है; जिसे बाजार से खरीद कर मात्र सेट किया जाता है। वैसे ही कुबेर के खजाने में भी ऐसा बहुत सामान रखा रहता है, जिसे वह समवशरण में लाकर सजाता है। कुबेर द्वारा सौधर्मेन्द्र के निर्देशन में समवशरण बनाया जाता है।

शंका - तिर्यंच और मनुष्यों के वैक्रियिक शरीर का उदय क्यों नहीं होता है?

समाधान - नहीं, क्योंकि तिर्यंच गति और मनुष्यगति कर्मोदय के साथ वैक्रियिक नामकर्म के उदय का विरोध आता है, अथवा तिर्यंच और मनुष्यगति में वैक्रियिक नामकर्म का उदय नहीं होता है, यह स्वभाव ही है और स्वभाव दूसरे के प्रश्नों के योग्य नहीं होते हैं, अन्यथा, अतिप्रसंग दोष आ जायगा। इसलिये तिर्यंच और मनुष्यों के वैक्रियिक और वैक्रियिक मिश्रकाययोग नहीं होता है, यह सिद्ध हो जाता है।

शंका - तिर्यंच और मनुष्य भी वैक्रियिक शरीर वाले सुने जाते हैं, इसलिये यह बात कैसे घटित होगी?

समाधान - नहीं, क्योंकि, औदारिक शरीर दो प्रकार का है, विक्रियात्मक और अविक्रियात्मक। उनमें जो विक्रियात्मक औदारिक शरीर है, वह मनुष्य और तिर्यंचों के वैक्रियिकरूप से कहा जाता है। उसका यहाँ पर ग्रहण नहीं किया है, क्योंकि उसमें नाना गुण और ऋद्धियों का अभाव है। यहाँ पर नाना गुण और ऋद्धियुक्त वैक्रियिक शरीर का ही ग्रहण किया है और वह देव और नारकियों के ही होता है।

वैक्रियिक ऋद्धि, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक समुदायत के स्वरूप में किंचित् अंतर है।

वैक्रियिक समुदायत / विक्रिया समुदायत

वैक्रियिक ऋद्धि - विविहगुणइद्धिजुत्तं वेउव्वियमिदि। अर्थात् विशेष प्रकार की क्रिया को विक्रिया कहते हैं। (ध.4/1/9/76) इसमें शरीर को छोटा-बड़ा, हल्का-भारी आदि अनेक आकाररूप करने की विचित्ररूप क्रिया होती है। शरीर को अनेक आकार रूप से बदलने की क्रिया ही विक्रिया ऋद्धि है।

विक्रिया ऋद्धि के अनेक भेद हैं। यह श्रमणों को तप विशेष से प्राप्त होती है। (ति.प. - 4/1034) यह छहऋद्धि मुनिराजों के ही होती है; किन्तु विक्रिया कर्मभूमि के मनुष्य व तिर्यंच, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण, देव, नारकी, बादर अग्निकायिक, बादर वायुकायिक, बादर पर्याप्तिक जीवों के भी संभव है। इनमें कुछ के पृथक् विक्रिया और कुछ के अपृथक् विक्रिया होती है।

वैक्रियिक शरीर - यह शरीर मांस, मज्जा आदि सप्त धातुओं से रहित होता है। जिनका उत्पाद जन्म होता है, ऐसे देव और नारकियों के नियम से वैक्रियिक शरीर होता है। देवणारकाणुप्पदादः। (तत्त्वार्थसूत्र 2/34) औपादिकवैक्रियिकम्। (तत्त्वार्थसूत्र 2/46)

नारकियों के वैक्रियिक शरीर की अपेक्षा देवों के शरीर में यह विशेषता होती है कि देवों का शरीर अणिमा, महिमा आदि आठ गुणों से संयुक्त होता है। तत्त्वार्थसूत्र के दूसरे अध्याय में कहा है कि लाभाद्रिप्रत्ययं च। (तत्त्वार्थसूत्र 2/47) अर्थात् इस शरीर को मनुष्य गति के जीव विशेष तप करके प्राप्त कर सकते हैं।

विक्रिया ऋद्धि मनुष्य गति के जीवों में भी सिर्फ मुनिराजों के ही होती है। जबकि विक्रियक शरीर सिर्फ देवों और नारकियों के ही होता है। ‘विक्रिया’ चारों गतियों के जीवों द्वारा संभव है। वैक्रियिक समुदायत सर्व जीवों में जहाँ आत्मप्रदेश मूल शरीर को छोड़े बिना बाहर निकले वहाँ संभव है।

४. मारणान्तिक समुद्घात

मरण समय से एक अंतर्मुहूर्त पहले जिन जीवों को यह जानने की अत्यंत तीव्र उत्कण्ठा हो कि मरकर मेरा जन्म कहाँ होगा? – ऐसे जीवों को सहज उनकी योग्यता से मारणान्तिक समुद्घात होता है। इस समुद्घात के काल में मरण सन्मुख जीव के आत्मा के प्रदेश वर्तमान शरीर को न छोड़कर ऋजुगति अथवा विग्रह गति द्वारा जिस क्षेत्र में उत्पन्न होना है, उस क्षेत्र को जाकर स्पर्श करते हैं- यही मारणान्तिक समुद्घात है। इसका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। इस समुद्घात के पश्चात् नियम से अंतर्मुहूर्त काल में मरण हो जाता है।

मारणान्तिक समुद्घात – औपक्रमिकानुपक्रमायुः क्षयाविभूति-मरणान्नप्रयोजनो मारणान्तिक समुद्घातः।

अर्थात् उद्दीरणा या कालक्रम से होने वाले मरण के निमित्त से मारणान्तिक समुद्घात होता है।
(रा. वा. 1/20/77/15)

अपने वर्तमान शरीर को नहीं छोड़कर ऋजुगति द्वारा अथवा विग्रहगति द्वारा आगे जिसमें उत्पन्न होना है ऐसे क्षेत्र तक जाकर शरीर से तिगुणे विस्तार से अथवा अन्य प्रकार से अन्तर्मुहूर्त तक रहने का नाम मारणान्तिक समुद्घात है।
(ध. 4/1,3,2/26/10)

आयाम की अपेक्षा अपने-अपने रहने के प्रदेश के लेकर उत्पन्न होने के क्षेत्र तक तथा बाहल्य से एक प्रदेश से लेकर उत्कृष्ट शरीर से तिगुणे बाहल्यरूप (जीवप्रदेशों के) काण्ड, एक खम्भ स्थित तोरण, हल व गोमूत्र के आकार से अंतर्मुहूर्त तक रहने को मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं।
(ध. 7/2,6,1/299/11)

मारणान्तसमये मूलशरीरपरित्यज्य यत्र कुत्र चिदबुद्धुमायुत्तरप्रदेशां स्फुटितुमात्मप्रदेशानां बहिर्गमनमिति मारणान्तिक समुद्घातः।

अर्थात् मृत्यु के समय, मूल शरीर को छोड़े बिना जब इस आत्मा ने कहीं का आगामी

मारणान्तिक समुद्घात

आयुष्य बांधा हो उस प्रदेश को स्पर्श करने के लिए आत्मप्रदेशों का बाहर निकलना उसे मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं। (द्र. स. 1/31/6)

यह मारणान्तिक समुद्घात उन्हीं जीवों के सम्भव है, जिन्होंने आगामी भव संबंधी आयु का बंध कर लिया है।

जिस जीव को तीव्र विकल्प चलता हो कि मैं मरण के पश्चात् कहाँ जाऊँगा? जिस प्रकार निवास स्थान बदलने से पूर्व नए घर को पहले एक बार देखकर आते हैं, उसी प्रकार यह आत्मा नवीन पर्याय की उत्पत्ति के पूर्व मरकर जहाँ जन्म लेना है उस स्थान का स्पर्श करके आता है।

इस स्थिति में आत्मा के प्रदेश खिंच जाते हैं। जिस आकार का आत्मा है उसी आकार रूप आत्मा के प्रदेश विस्तृत हो जाते हैं और जिस स्थान पर जन्म लेना है उस स्थान तक आत्म प्रदेश पहुँचकर उस क्षेत्र को स्पर्श कर पुनः वापस लौटकर आ जाते हैं, इसके पश्चात् नियम से उस जीव का अन्तर्मुहूर्त में मरण हो जाता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का नाम ही मारणान्तिक समुद्घात है।

मारणान्तिक समुद्घात नियम से उसी क्षेत्र की दिशा के अभिमुख होता है, जहाँ उत्पन्न होना है, शेष समुद्घात सभी दिशाओं में प्रतिबद्ध होते हैं।

मारणान्तिक समुद्घात में आत्मप्रदेश उसी दिशा में निकलते हैं जहाँ मरकर जीव को उत्पन्न होना है। मारणान्तिक समुद्घात के समय आत्मा के प्रदेश आकाश की श्रेणी के अनुसार एक ही दिशा में गमन करते हैं तथा 90 डिग्री पर मोड़ भी ले सकते हैं। इसे और आहारक को छोड़कर शेष पाँच समुद्घात छहों दिशाओं में होते हैं; क्योंकि वेदना आदि के वश से बाहर निकले हुए आत्मप्रदेश श्रेणी के अनुसार ऊपर, नीचे, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण इन छहों दिशाओं में होते हैं।

समुद्घात

मारणान्तिक समुद्घात सभी जीवों के संभव नहीं।

चूँकि यह मरण के पूर्व की प्रक्रिया है, अतः जिनके मरण नहीं होता, उनके मारणान्तिक समुद्घात भी नहीं हो सकता। गुणस्थानों की अपेक्षा देखा जाये तो जिन गुणस्थानों में मरण नहीं है, वहाँ मारणान्तिक समुद्घात भी नहीं है। जैसे तीसरे, क्षपक श्रेणी के आठवें, नौवें, दशवें तथा बारहवें एवं उपशम श्रेणी के आठवें गुणस्थान में मरण नहीं होता, अतः वहाँ मारणान्तिक समुद्घात भी नियम से नहीं होता। जिनके मरण संभव है, वहाँ भी मारणान्तिक समुद्घात हो ही हो यह अनिवार्य नहीं है।

कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि मारणान्तिक समुद्घात तो कोई विशेष चीज है; इसलिए यह त्यागी, तपस्वी, धर्मात्माओं के होता होगा; पर ऐसा नहीं है। विकलत्रय तथा एकेन्द्रिय जीवों के भी मारणान्तिक समुद्घात संभव है। यह सभी के हो सकता है, यह बहुत सामान्य-सी बात है।

शंका : मारणान्तिक समुद्घात करने वाले जीव के आत्म प्रदेश कितने समय में पुनः मूल शरीर में लौटकर आ जाते हैं?

समाधान : मारणान्तिक समुद्घात का उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त अर्थात् असंख्यात समय बताया गया है; किन्तु यह अनिवार्य नहीं है कि इस समुद्घात के होने पर आत्मप्रदेश पुनः मूल शरीर में लौटें। उत्पत्ति स्थान को स्पर्श कर पुनः आत्मप्रदेशों के लौटने से पूर्व भी मरण हो सकता है। यदि आत्म प्रदेशों के मूल शरीर में वापस लौटने के पहले ही मरण हो जाये तो मूल शरीर में शेष बचे हुए प्रदेश भी उत्पत्ति स्थल पर पहुँच जाते हैं। इस समुद्घात प्रक्रिया के दौरान आत्म प्रदेश मूल शरीर से उत्पत्ति स्थान तक फैले हुए रहते हैं।

मारणान्तिक समुद्घात के समय आत्मा के प्रदेश आकाश की श्रेणी के अनुसार एक ही दिशा में गमन करते हैं तथा 90 डिग्री पर मोड़ भी ले सकते हैं।

मारणान्तिक समुदाय

शंका : जिस जीव के आत्मप्रदेश अगली पर्याय में जन्म के स्थान को स्पर्श करके आये हैं तो क्या वह जीव यह बता सकता है कि उसे अगले भव में कहाँ जाना है?

समाधान : शायद उसकी ऐसी परिस्थिति नहीं होती है कि वह बता सके कि मैं वहाँ उत्पन्न होने वाला हूँ; क्योंकि वह अंतर्मुहूर्त के भीतर ही मरण को प्राप्त करने वाला है और यदि कोई हीन पर्याय में जन्म लेने वाला हो तो वह क्यों बताएगा और ऐसा भी हो सकता है कि उसे ज्ञान तो हुआ, पर उसे समझ में ही नहीं आया हो कि कहाँ जाना है?

तत्समय की ऐसी ही योग्यता होती है कि वे आत्मप्रदेश निकलकर उस स्थान को छूकर वापस आ जाते हैं।

शंका : यह मारणान्तिक समुदाय किस कर्म प्रकृति के उदय से होता है?

समाधान : इसमें कोई विशिष्ट कर्म प्रकृति कार्य नहीं करती, यह तो सहज प्रक्रिया है। यदि गहराई से विचार करें तो आत्मा का क्षेत्र से क्षेत्रांतर गमन अपनी योग्यता से होता है और इसमें आत्मा की स्वयं की क्रियावती शक्ति कार्य करती है।

एक भव से दूसरे भव में गमन करने के लिए तो गत्यानुपूर्वी कर्म का उदय बताया गया है। परभव में गमन करते समय विग्रह गति में भी कार्मण काययोग होता है।

तत्त्वार्थ सूत्र के द्वितीय अध्याय में कहा है कि -
विग्रहगती कर्मयोगः ।।25।।

अर्थात् कार्मण कर्मयोग के निमित्त से ही जीव परभव में गमन करता है। यहाँ मारणान्तिक समुदाय में यह बात विशेष है कि जिस जगह पर जन्म लेना है आत्म प्रदेशों का गमन दिशा में होता है यह स्थिति अन्य समुदायों में नहीं बनती है।

समुदाय

प्रश्न : मरण के बाद यह जीव एक स्थान से दूसरे स्थान पर कैसे पहुँच जाता है ? क्या कोई यमराज ले जाता है ?

उत्तर : इस जीव को देह छूटने के उपरान्त एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का कार्य करने वाला कोई यमराज नहीं है। यह जीव स्वयं अपनी क्रियावती शक्ति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करता है। इसमें कार्मण काय योग निमित्त बनता है। ज्ञानावरणादि कर्मों के समूह को कार्मण काय कहते हैं। इस कार्मण शरीर के निमित्त से आत्मा के प्रदेशों में जो चलन-चलन अथवा कम्पन होता है, उसे कार्मण काय योग कहते हैं।

इसप्रकार एक गति से दूसरी गति में यह जीव कार्मण काय योग के निमित्त से स्वयं की क्रियावती शक्ति द्वारा पहुँच जाता है।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 1159.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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