समयसार गाथा 5 में आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने “एकत्व-विभक्त” भगवान् आत्मा को दिखाने का संकल्प किया है| गाथा 7, गुण-भेद व्यवहार से कहे है ऐसा कहकर “एकत्व” (अपने से अभिन्न) को पुष्ट करती है| क्या इसके अलावा और कोई गाथा है जो एकत्व को पुष्ट करती है? जहां तक हमारी जानकारी है, एकत्व की तुलना में विभक्तपना (अपने से भिन्न/ भेद-ज्ञान) पर अत्यन्त बल दिया गया है| हम असमंजस में हैं कि ऐसा क्यों किया गया है (विभक्तपना पर अत्यन्त बल दिया गया है, और एकत्व को इतने हलके में क्यों लिया है)?