आस्त्रव और शुद्धात्मा | ज्ञान-प्रधान कथन और श्रद्धा-प्रधान कथन | Samaysaar Gatha 181

  1. समयसार गाथा 181 की टीका में आचार्य अमृतचन्द्र ने आस्रव और शुद्धात्मा के प्रदेश भिन्न कहे हैं| इसकी अपेक्षा, शुद्धात्मा राग का करता नहीं ये तो हमें ख़याल में आता है| लेकिन क्या वाकई आस्रव और शुद्धात्मा के प्रदेश भिन्न माने या फिर पंडित टोडरमलजी का ये कथन माने: "तथा अभेद आत्मा में ज्ञान-दर्शनादि भेद किये, सो उन्हें भेदरूप ही नहीं मान लेना, क्यूंकि भेद तो समझानेके अर्थ किये हैं| निश्चय से आत्मा अभेद ही है; उसीको जीव वस्तु मानना| संज्ञा-संख्यादि भेद कहे सो कथन मात्र ही है; परमार्थ से भिन्न-भिन्न है नहीं - ऐसा श्रद्धान करना (पृष्ठ २५२)”, इसको लेकर हम असमंजस में हैं|

  2. प्रश्न 1 के ही सन्दर्भ में क्या ज्ञान-प्रधान कथन अपेक्षा अभेद माने और श्रद्धा-प्रधान कथन अपेक्षा भेद रूप माने? क्या यह अनेकांत है या उभयाभास है?

  3. प्रश्न 1 के ही सन्दर्भ में ही, अगर वास्तव में आस्रव और शुद्धात्मा के प्रदेश भिन्न हैं तो वो कबसे भिन्न हैं? अनादि से भिन्न हैं या बीच में भिन्न हुए? और अगर बीच में भिन्न हुए तो किस कारण भिन्न हुए? (जैसे मिथ्यादर्शन के मिटने के कारण सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ, वैसे ही किस कारण आस्रव और शुद्धात्मा के प्रदेश बीच में भिन्न हुए ?

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