समवशरण स्तुति | Samavsharan Stuti

शोभे समवशरण सुखकार, प्रभु का समवशरण सुखकार।।टेक।।

अन्तरीक्ष जिनराज विराजे, अपने ही आधार।
मानों कहते हैं हम सबसे, पर-आश्रय दु:खकार।।1।।
प्रभु-चरणों में इन्द्रादिक के, मुकुट झुके अविकार।
मानों दर्शावें हम सबको, जग का विभव असार।।2।।
ढुरते चौंसठ चमर कहत हैं, जिनपद ही है सार।
जो अपने प्रभुवर को झुकते, वे होते भवपार।।3।।
अनन्त-चतुष्टय-युत प्रभुवर की, महिमा अपरम्पार।
दर्शावें निज शुद्धातम की, ध्रुव प्रभुता अविकार।।4।।
शुद्धातम ही श्री जिनवर की, दिव्यध्वनि का सार।
अहो ! अनुभवें आनन्दित हों, सहज नमन अविकार।।5।।

Artist - ब्र.श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

Singer: @Deshna

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