समवसरण में स्थान से असंख्यात गुणे जीव कैसे समा जाते हैं? | Samavsaran Mein Sthan Se Asankhyat Gune Jeev Kaise Sama Jaate Hain

शंका: समवसरण तो सीमित योजन का होता है, फिर उसमें इतने सारे जीव कैसे बैठ जाते हैं? क्या भीड़ में वे एक दूसरे से टकराते नहीं?

कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। :folded_hands:

समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)


१. एक समवसरण में कितने जीव

जिणवंदणापयट्टा पल्लासंखेज्जभागपरिमाणा।
चेट्ठंति विविहजीवा एक्केक्के समवसरणेसुं॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/929, पृष्ठ 266)

अर्थ: एक एक समवसरण में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण विविध प्रकार के जीव जिनदेव की वन्दना में प्रवृत्त होते हुए स्थित रहते हैं।


२. स्थान से असंख्यात गुणे, फिर भी अस्पृष्ट

कोट्ठाणं खेत्तादो जीवक्खेत्तफलं असंखगुणं।
होदूण अपुट्ठ त्ति हु जिणमाहप्पेण ते सव्वे॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/930, पृष्ठ 266)

अर्थ: कोठों के क्षेत्र से यद्यपि जीवों का क्षेत्रफल असंख्यातगुणा है, तथापि वे सब जीव जिनदेव के माहात्म्य से एक दूसरे से अस्पृष्ट रहते हैं।

अर्थात् ग्रंथ स्वयं स्वीकार करता है कि जीवों का क्षेत्र कोठों से असंख्यात गुणा है, और इसका समाधान जिन माहात्म्य बताता है।

पाठ टिप्पणी: जैनकोष पर इस गाथा का अन्तिम चरण “जिणमाहप्पेण गच्छंति” छपा है, जो वस्तुतः अगली गाथा 931 का चरण है। मूल ग्रंथ में “जिणमाहप्पेण ते सव्वे” है।


ग्रंथ: तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), महाधिकार 4, भाग 1, हिन्दी अनुवाद पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, 1956। पृष्ठ संख्या इसी संस्करण की है।