समवसरण में बालक भी संख्यात योजन कैसे चल लेते हैं, और वहाँ रोग, भूख, प्यास क्यों नहीं होती? | Samavsaran Mein Balak Bhi Sankhyat Yojan Kaise Chal Lete Hain

शंका: समवसरण कई योजन का होता है। छोटे बालक, बूढ़े और रोगी उसमें प्रवेश करके इतनी दूर कैसे जाते और लौटते होंगे? और वहाँ इतने जीवों के बीच भूख, प्यास या रोग की पीड़ा कैसे नहीं होती?

कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। :folded_hands:

समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)


१. अन्तर्मुहूर्त में संख्यात योजन

संखेज्जजोयणाणि बालप्पहुदी पवेसणिग्गमणे।
अंतोमुहुत्तकाले जिणमाहप्पेण गच्छंति॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/931, पृष्ठ 266)

अर्थ: जिन भगवान् के माहात्म्य से बालक प्रभृति जीव प्रवेश करने अथवा निकलने में अन्तर्मुहूर्त काल के भीतर संख्यात योजन चले जाते हैं।


२. रोग, मरण, भूख, प्यास नहीं

आतंकरोगमरणुप्पत्तीओ वेरकामबाधाओ।
तण्हाछुहपीडाओ जिणमाहप्पेण ण हवंति॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/933, पृष्ठ 266)

अर्थ: वहाँ पर जिन भगवान् के माहात्म्य से आतंक, रोग, मरण, उत्पत्ति, वैर, कामबाधा तथा तृष्णा (प्यास) और क्षुधा (भूख) की पीड़ाएँ नहीं होती हैं।

दोनों गाथाओं में कारण एक ही कहा है: जिणमाहप्पेण, जिनेन्द्र भगवान् का माहात्म्य।


ग्रंथ: तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), महाधिकार 4, भाग 1, हिन्दी अनुवाद पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, 1956। पृष्ठ संख्या इसी संस्करण की है।