समाधि आत्म साधना — 13 दृश्यों का सामाजिक-धार्मिक नाटक: एक संयुक्त परिवार में माँजी की बीमारी, संयम-नियम और समाधिपूर्वक मरण की ओर उनकी यात्रा; उत्तम क्षमा के संदेश के साथ। पूरा संवाद-पाठ नीचे, मूल PDF (23 पृष्ठ) संलग्न।
Samadhi Atma Sadhana — a 13-scene family drama on illness, self-restraint and a peaceful, samadhi-oriented end of life. Full script below; original 23-page PDF attached.
पात्र : धैर्या मिष्ठी बच्चे (सहज, ओम, अव्य, अर्विक, काव्य, अर्हम, शुभ, आरव, अयन बड़ा बेटा (अनेकांत) मजला बेटा (सम्यक्) छोटा बेटा (स्वानुभव) दादी साधर्मी
प्रथम दृश्य
धैर्या : ये बच्चे अभी तक नहीं आए न जाने कहाँ रह गए?
मिष्ठी : तुम परेशान क्यों होती हो? तुम अच्छे से जानती हो कि वे कितने शरारती हैं! रास्ते में होंगे या फिर आते ही होंगे।
धैर्या : हां भाभी! वह तो है, लेकिन आज ना इनको आने दो, आज तो जरूर डांट लगाऊंगी इनको ।
मिष्ठी : (हंसकर) तुम भले ही अभी इतना गुस्सा हो रही हो लेकिन जब वे लोग आएंगे तो यह तुम्हारा गुस्सा उन लोगों को देखते ही छूमंतर हो जाएगा।
धैर्या : नहीं भाभी, नहीं आज चाहे कुछ भी हो जाए आज मैं ना जरूर डांट लगाऊंगी। तभी बच्चे आ जाते हैं।
धैर्या : ये देखो आ गए सारे आज तो आने दो इन्हें, पहले तो यह बताओ कहाँ थे अभी तक? इतनी लेट कैसे हो गए?
पहला बच्चा : मम्मी, इससे मुझे लेट कराया।
दूसरा : नहीं, इसकी वजह से लेट हुए।
तीसरा : औ रे झूठी… तूने ही मुझे लेट बोल नहीं दी थी?
(इस तरह तीनों में आपस में बहस होने लगती है)
धैर्या : चुप, बिलकुल चुप! तुम सब बच्चे बहुत शरारती हो गए हो, देखो! यह कैसे लड़ रहे हो? यही सिखाया हमने तुम्हें?
सारे बच्चे : - सॉरी मम्मी अब हम लड़ नहीं रहे हम तो बस…
मिष्ठी : अच्छा देखो ना अब तो इन लोगों को अपनी गलती का एहसास भी हो गया अब तो माफ कर दो।
बच्चे : हां छोटी मां प्लीज ना माफ कर दो ना।
दूसरा : मां! प्लीज पक्का अब आगे से कभी लेट नहीं होंगे।
तीसरा : हां मां, अब तो माफ कर दो मेरे पेट में चूहे कूद रहे हैं, बहुत जोरों की भूख लग रही है मां।
धैर्या : क्या भूख लग रही है? चलो तुम सब का भोजन तैयार है। जल्दी हाथ धो लो, फिर भोजन करना।
बच्चे : हां मा, बस हम अभी आते हैं।
मिष्ठी : अच्छा सुनो, अपने पापा और बड़े पापा से बोल देना भोजन के लिए।
अव्य : जी मां।
धैर्या : भाभी जब तक मैं मां को भोजन के लिए बुला लाती हूं।
दृश्य 2
बड़ा बेटा अनेकांत : आज तो मजा आ गया भोजन में, बहुत स्वादिष्ट भोजन था।
मजला बेटा सम्यक् : बच्चों पता है,हमारे बचपन से ही यह फेवरेट रही है। बचपन में पिताजी को बहुत पसंद है तो मां रोज चूल्हे पर मक्की की रोटी बनाया करती थी।
सबसे छोटा बेटा स्वानुभव : और पता है फिर हम तीनों भाई और तुम्हारी बुआ भी मां के पास आकर खाने के लिए बैठ जाते थे।
बड़ा बेटा अनेकांत : - लेकिन जब तक हम नहा धोकर दिन मंदिर नहीं करते तब तक मां भोजन नहीं देती थी।
दादी : बेटा! बचपन में तुम्हारे पापा बहुत शरारती थे मैं उनका झूठ यूं पकड़ लेती थी। बेटा, तुम लोग तो अभी कम शरारती करते हो; बचपन में तुम लोगों के पापा इतने शरारती थे कि मंदिर का झूठा बहाना बना देते और आ के बोलते हम मंदिर से आ गए।
आव्य : लेकिन दादी फिर आपको कैसे पता चला कि वह मंदिर नहीं गए?
दादी : वह माली भैया से मैं पहले से ही कह कर रखती थी की इन लोगों को ध्यान से देखने आ रहे हैं या नहीं आ रहे हैं।
और फिर बस इनका झूठ पकड़ा जाता।
(सब हंसने लगते…)
दादी : बचपन से ही मैं बस यही चाहती थी कि मेरे सारे बच्चे जिन धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहे। वे कभी भी जिन मार्ग से विचलित ना हो। हां, इसके लिए मुझे थोड़ा कठोर बनना पड़ा लेकिन उसका फल मुझे आज मिला। मेरे सारे बच्चे, बहु, पोता-पोती अब सब पहले दर्शन करते हैं और फिर भोजन ग्रहण करते हैं।
और जीवन में चाहिए क्या? प्रभु की कृपा से इतना सुंदर परिवार है सब साथ में जुड़कर प्रत्येक कार्य करते हैं आज मन ये देखकर बहुत प्रसन्न होता है। बेटा-बहू ने अपनी जिम्मेदारी संभाल ली है, बस अब तो आराम ही आराम है।
बड़ा बेटा अनेकांत : मां यह सब आपकी कृपा है। अगर आप बचपन में हमें डांट ना लगती तो आज ये संस्कार हमें ना मिल पाए होते।
ओम : मैं यह कैसे करना है मुझे नहीं आ रहा है।
मिष्ठी : बेटा देखो यह ना इधर आएगा
दृश्य 3
बच्चे : मां, मां हम पाठशाला जा रहे हैं।
धैर्या : बहुत अच्छा बच्चों आराम से जाना। सहज, अपने भाइयों का ध्यान रखना।
सहज : हां मां, जय जिनेन्द्र
दादी : बेटा मैं जिन मंदिर जा रही हूँ प्रवचन सुनकर लौटूंगी।
(तभी उनकी तीनों बेटे दुकान से आ जाते हैं)
दादी : अरे बेटा तुम लोग आज जल्दी आ गए?
मजला बेटा सम्यक् : हां मां आज काम जल्दी हो गया था आप कहां जा रहे हो?
दादी : मैं जिन मंदिर जा रही हूं।
बड़ा बेटा अनेकांत : चलो मां मैं भी चलता हूं।
दादी : अरे बेटा थोड़ा आराम तो कर लो।
बड़ा बेटा अनेकांत : नहीं मन नहीं, आराम तो होता रहेगा।
दादी : अच्छा ठीक है, बेटा चलो।
मजला बेटा सम्यक् : अच्छा सुनो, मुझे पानी दे दो जल्दी से। फिर मुझे भी मंदिर जाना है।
छोटी बहू : हाँ, मैं लेकर आती हूँ।
दृश्य 4
प्रवचन
पंडित जी :
आज मैं रास्ते से जा रहा था। वहाँ मैंने देखा कि एक गाय का एक्सीडेंट हो गया था और उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था।
देखकर मन में एक विचार आया-हमारे जीवन का अंतिम समय कैसा होगा?
बहुत बार हम देखते हैं कि जब जीवन का अंतिम चरण आता है, तब न कोई णमोकार मंत्र सुनाने वाला होता है, न कोई समाधिपूर्वक मरण की साधना कराने वाला।
इसलिए हमें अभी से अपने जीवन को इतना सहज और सरल बनाना चाहिए कि किसी भी क्षण मृत्यु हमारे सामने आ जाए, तो हम घबराएँ नहीं।
हम अपनी जिम्मेदारियों के बोझ के नीचे दबे हुए न हों, बल्कि आधि, व्याधि और उपाधि को त्यागकर समाधिपूर्वक मरण की ओर बढ़ने की तैयारी रखें।
आशा है, आप सभी इस विषय पर अवश्य विचार करेंगे और अपने जीवन में समाधि साधना के महत्व को समझेंगे।
और आप सभी के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है। ![]()
जैसे आप सभी की भावना थी कि हमारे नगर में भी एक समाधि साधना शिविर लगे, तो आदरणीय भाईसाहब जी की प्रेरणा से अब हमारे नगर में समाधि साधना शिविर लगने जा रहा है।
तो जोर : शोर से तैयारी कर लीजिए! ![]()
क्योंकि इस शिविर में बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी को समाधि का पूरा स्वरूप, उसके महत्व और समाधिपूर्वक जीवन जीने की साधना को समझने का अवसर मिलेगा।
और सबसे विशेष बात-यह शिविर आदरणीय भाईसाहब जी की उपस्थिति और प्रेरणा में आयोजित होने जा रहा है।
अत : आप सभी से निवेदन है कि इस समाधि साधना शिविर में अवश्य पधारें और इस महत्वपूर्ण साधना का लाभ लें।
जय जिनेंद्र!
बड़ा बेटा अनेकांत : (पंडित जी से) भैया जी आदरणीय भाई साहब को चौका हमारे यहां रहेगा। हमारे परिवार की यही मंगल भावना है।
पंडित जी : -स्वास्थ्य उचित न होने के कारण वह अपना भोजन स्वयं ही बनाएंगे।
बड़ा बेटा अनेकांत : तो क्या हम टिफिन भी नहीं दे सकते ?
पंडित जी : मैं पूछ कर बता दूंगा।
बहु : भैया बाहर से भी लोग पधारेंगे क्या?
पंडित जी : हाँ, अभी बहुत सारे साधर्मी बाहर से आ रहे हैं
दादी : अच्छा भैया साधर्मी के भोजन की व्यवस्था हमारे घर पर रहेगी। यदि कोई प्रकार की समस्या ना हो तो क्या ये सौभाग्य हमें प्राप्त हो सकता है?
पंडित जी : अरे बहन जी, यह तो बहुत अच्छी बात है।
मजला बेटा सम्यक् : मां चले ?
दादी : हां बेटा चलो।
ओम : पापा पापा इस शिविर में हमारी क्या जिम्मेदारी होगी ?
आव्य : हां पापा हमें बताओ ना हमें क्या करना होगा
छोटा बेटा स्वानुभव : बच्चों आपकी जिम्मेदारी होगी कि सबसे पहले तो आपको अपनी माता को परेशान नहीं करना है, अपना काम स्वयं करना है। कोई भी प्रॉब्लम हो तो मां की बजाय हमसे आकर कहना होगा।
ओम : लेकिन बाबा यह कैसी हेल्प हुई ?
आव्य : हां दीदी ने पाठशाला में बताया था कि सामने वाला व्यक्ति का पूरा उपदेश न जान लो तब तक कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
छोटा बेटा स्वानुभव : अच्छा तो देख रहे हो भाई साहब हमारे यह छोटे-छोटे से बच्चे कितनी बड़ी-बड़ी बातें सीख रहे हैं?
आव्य : चाचू बताओ ना।
स्वानुभव चाचू : आप अपना काम खुद करोगे तो आपकी माता का समय बच जाएगा और वह अपना ध्यान वहां भोजन व्यवस्था में लगा सकते हैं।
ओम : अच्छा ऐसी बात है…
स्वानुभव चाचू : hmmm
दृश्य 5
मिष्ठी : मां जी आप मंदिर चली जाए, यहां सब हम देख लेंगे।
दादी : क्यों तुम लोग को नहीं चलना क्या?
मिस्टी : मां, वैसे तो सारा काम हो गया है बस थोड़ी सी खीर बनाना शेष रह गई है।
दादी : बेटा तो बाद में बनती रहेगी पहले धर्म लाभ लेना, चलो।
मिष्ठी : मां घर से ही बना कर जाएंगे तो धर्मलाभ भी आनंद से ले पाएंगे।
दादी : बहू बात तो सही कह रही है।
धैर्या : भाभी चले जाना मंदिर ।
मिस्टी : और वह खीर ?
धैर्या : भाभी टेंशन की कोई बात नहीं है, खीर बनके तैयार है।
दादी : अरे वाह! देखो कहते हैं ना कि एकता में शक्ति होती है? तुम दोनों ने मिलकर इतना सारा काम चुटकियों में कर लिया। मुझे तुम पर गर्व है बेटियों मेरे परिवार को किसी की नजर ना लगे।
दृश्य 6
अथर्व : जय जिनेन्द्र
आप कहां से पधारे हो?
दादी : नहीं बहन जी, हम कहीं से नहीं आए हम तो यहीं रहते हैं।
अथर्व : अच्छा? तो आप यही रहती हैं? तो क्या आप हमें बता सकती है कि यहां रहने की व्यवस्था कहां है?
दादी : रहने की व्यवस्था ? हूँ… अच्छा, तो अकेली है या कोई और भी है आपके साथ?
अथर्व : मैं और मेरी बहन है।
दादी : अच्छा, तो आप हमारे घर चलिए आप वही रुकना ।
साधर्मी : नहीं नहीं यह आप क्या कह रही हैं ? आपके घर नहीं, बहन जी आप तो हमें बस इतना बता दीजिए कि ठहरने की व्यवस्था कहां पर है।
दादी : बहन जी, आपको कोई भी अशुद्धि नहीं होगी मंदिर के पास ही हमारा चार कदम पर घर है ।
साधर्मी : लेकिन…
दादी : लेकिन लेकिन कुछ नहीं आप तो बस चले।
मिष्ठी : मां घर चले।
दादी : बेटा, यह विदिशा से पढ़ रही है, अब से हमारे घर ही रहेंगे।
बड़ा बेटा अनेकांत : जय जिनेंद्र आपका धर्म नगरी खनियाधाना में स्वागत है आपका सामान कहां है?
साधर्मी : बाहर कक्षा में रखा हुआ है।
बड़ा बेटा अनेकांत : चलिए।
छोटा बेटा स्वानुभव : आइए भाभी ।
बहू : देखो धैर्या कौन आया है ?
धैर्या : कौन आया है भाभी
गर्व : यह साधर्मी है कुछ दिन हमारे घर रखेंगे।
धैर्या : यह तो बड़ी खुशी की बात है कि हमारे घर में कोई साधर्मी रुकने वाला है।
मिष्ठी : आप लोग हाथ मुंह धो लीजिए भोजन तैयार है।
दादी : आज दुकान मत खोलना बच्चों आज तुम तीनों बहुत थक गए होंगे, थोड़ा विश्राम कर लो।
छोटा बेटा स्वानुभव : जी मां, जैसा आप कहे है।
बड़ा बेटा अनेकांत : मां, जब बच्चे बोलते हैं ना तो कितना अच्छा लगता है न?
मजला बेटा सम्यक् : हां भैया, बात तो सच कह रहे हो इतने बड़े होकर भी बच्चे जैसा लगता है।
उससे छोटा बेटा स्वानुभव चाचू : हम चाहे कितनी भी बड़े क्यों ना हो जाए, लेकिन माता-पिता के लिए तो बच्चे ही रहेंगे। चलो आप आराम कर लीजिए।
बड़ा बेटा अनेकांत : और तुम ?
स्वानुभव चाचू : मैं बच्चों को देखकर आता हूँ कहीं वह शैतानी तो नहीं कर रहे।
बड़ा बेटा अनेकांत : अच्छा ठीक है।
(सभी सेठानीऔर धार्मिक साधर्मी का प्रवेश होता है)
दादी : तो आप दोनों 8 साल से आदरणीय भाई साहब के सानिध्य में प्रत्येक शिविर का लाभ ले रहे हैं
साधर्मी : जी, हाँ
दादी : तो घर से बिल्कुल निराकुल होकर कैसे निकल जाते हैं आप लोग? आपके परिवार में कौन कौन है ?
साधर्मी : जी मैं और मेरे भाई ही है। मेरी शादी हुई थी, लेकिन मेरे पति का समाधिमरण हो चुका है। अब मैं अकेली ही इस मार्ग पर आगे बढ़ रही हूँ। मेरे जीवन की अंतिम इच्छा बस यही है कि अंतिम समय में कोई आधि, व्याधि या उपाधि न रहे और शांत, निर्मल भावों के साथ समाधिपूर्वक जीवन का अंत हो।”
दादी : मेरी भी यही भावना है क्या आप मुझे और बताएँ और कुछ बताएँगे ?
साधर्मी : बहन जी इसका अभ्यास में अभी से करना होगा, तब जाकर अंतिम समय में शांत परिणाम से देह वियोग हो पाएगा।
दादी : अच्छा बहन जी। तभी बहू का प्रवेश होता है
धैर्या : माँ आप लोग अभी तक सोए नहीं बहुत रात हो गई है।
आयु : बेटा तुम भी तो नहीं सोई ?
धैर्या : मैं देखने आई थी आपको किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं है
आयु : नहीं बेटा यह सब है।
दादी : हाँ बेटा जो बहुत रात हो गई है सो जाओ।
धैर्या : जी माँ, जय जिनेन्द्र ( चरण स्पर्श करती है)
साधर्मी : बहन जी आपकी पुण्य की बहुत-बहुत अनुमोदना कि आपको इतना सुंदर परिवार प्राप्त हुआ है।
दादी : हाँ बहन जी, इसमें तो कोई संदेह नहीं परिवार का प्रेम और धर्म के प्रति लगाव ही तो जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।”
साधर्मी : चलो बह,न अब सो जाओ सुबह शिविर का आनंद भी तो लेना है।
दादी : जय जिनेंद्र बहन । जय जिनेन्द्र
दृश्य 7
भैया : बच्चों सदर जय जिनेन्द्र
भैया : बच्चों यह बताओ अभी क्या चल रहा है?
ओम : समाधि साधना शिविर ।
भैया : अरे वाह! बहुत बढ़िया । बच्चों, अच्छा यह बताओ क्या इसका मतलब पता है आपको?
आर्विक : मुझे पता है
भैया : अच्छा तो बताओ क्या पता है
अर्विक : इसका मतलब होता है कुछ भी खाए-पिए बिना मर जाना ।
भैया : ऐसा कहां सुना आपने?
काव्य : समाधि मतलब तो मरना ही होता है वह ना मैंने ऐसा सुना था।
भैया : समाधि शांत मन से, अच्छे भावों के साथ और आत्मा को समझते हुए जीने की कला है। इसीलिए बच्चों, समाधि केवल जीवन का अंत नहीं, बल्कि जीवन को सही और शांत भावों से जीने की कला है।”
काव्या : भैया उसमें क्या है? तो फिर जब अंतिम समय आएगा तब समाधि कर लेंगे।
भैया : “बच्चों, सिर्फ अंतिम समय में णमोकार मंत्र बोल लेना ही समाधि नहीं है। समाधि कोई अचानक होने वाली क्रिया नहीं, बल्कि जीवनभर की साधना का परिणाम है। जैसे परीक्षा की तैयारी पूरे साल होती है, परीक्षा के दिन नहीं-वैसे ही समाधि की तैयारी भी पूरे जीवन करनी होती है।
अच्छे भाव, शांत मन और आत्मचिंतन की साधना ही आगे चलकर समाधि का आधार बनती है।” यदि कोई इंसान सोचे कि जब घर में आग लगेगी तो कुआं खोदकर पानी निकाल लूंगा, बताओ बच्चों! क्या वह सही सोच रहा है ?
एक बच्चा : भैया जब तक कुआ खुदेगा तब तक तो घर जलकर राख नहीं हो जाएगा।
भैया : उसी तरीके से कोई सोचे कि जब मौत आएगी तब भगवान् का नाम लूंगा और समाधि धारण करूंगा तो वह सफल नहीं हो पाएगा क्योंकि बच्चे लास्ट मोमेंट पर शरीर और मानसिक कष्ट हुआ तो भगवान् का नाम लेने का भी मौका नहीं देंगे तो बच्चों अब आप खुद बताओ कि आप हमें क्या करना होगा ?
काव्य : भैया हमें धीरे-धीरे ही सही लेकिन शुरुआत तो करनी होगी ।
भैया जी : क्यों भाई, आप तो अभी बहुत छोटे हो कैसे करोगे ?
काव्य : छोटे हैं तो क्या हुआ? हमें भी भगवान् आत्मा बनाना है।
भैया : तो फिर आप कैसे शुरुआत करोगे ?
अरहान : मैं ना रात्रि भोजन का त्याग कर दूंगा।
अव्य : मैं प्रतिदिन देव दर्शन का नियम लेता हूं।
ओम : मैं फास्ट फूड न खाने का नियम लेता हू।
भैया : बहुत बढ़िया बच्चों चलो आज समय हो चुका है आजकल क्लास यहीं समाप्त होती है बच्चों जय जिनेन्द्र ![]()
दृश्य 8
धैर्या : भाभी आज कितने अच्छे से भैया जी ने समाधि का स्वरूप समझाया ।
मिष्ठी : हां तुम सही कह रही हो अभी तक तो हमने केवल समाधि मरण का नाम सुना था लेकिन आज हमने उसे समझ भी लिया।
धैर्या : हां भाभी एक बात तो मुझे अच्छे समझ आ गई कि जब तक किसी भी चीज को पूर्ण रूप से समझ नहीं लेते तब तक उसको अपने आचरण में नहीं अपना सकते हैं।
मिष्ठी : हां बहन आज से मैं तो एक नियम ले लिया कि चाहे कुछ भी हो चाहे मैं प्रत्येक परिस्थिति में संयम रखूँगी ।
दादी : अरे वाह मेरे बच्चों मुझे तुम पर बहुत गर्व है वहां सभा में हजारों की संख्या में लोग बैठे थे सबने खूब सुना और समझा लेकिन मंदिर की बात घर तक आए और उसे पर पूरा परिवार चर्चा करें यह पता चला कि स्वाध्याय में जाना तुम्हारा सार्थक हुआ है। मुझे बहुत अच्छा लगा मेरी बच्चिया अब संयम के मार्ग पर चलने के लिए तैयार हो रही हैं।
दादी दादी दादी… कराते हुए तभी बच्चों का प्रवेश बच्चों ।
अर्हम : दादी, दादी
दादी : अरे बच्चों आज तो बहुत खुश लग रहे हो।
धैर्या : जरूर आज कोई अच्छी सी गिफ्ट मिली होगी।
बेटा : नहीं मां, आज हमें कोई गिफ्ट नहीं मिली बल्कि हमें तो उससे भी अच्छा कुछ मिला है।
अर्हम : अच्छा? तो हमें बताओ जरा उससे भी अच्छा क्या मिला है आपको ।
शुभ : मम्मी हमने आज से कुछ नियम लिए हैं।
अयन : मम्मी, मैं रात्रि भोजन त्याग करने का नियम लिया है
दादी : अरे वाह मेरे बच्चों तुम लोगों ने इतने बड़े नियम ले लिए
आर्विक : दादी दादी मेंने फास्ट फूड त्याग करने का नियम लिया है।
आयन : भैया भैया, चलो न खेलते हैं।
धारा : अरे बच्चे, सुनो… सुनो… सुनो तो सही ।
मिष्ठी : मां जी, मैं उनको देख कर आती हूं।
दादी :
“आज मेरा मन खुशी से भर गया है। मेरे परिवार के हर सदस्य ने अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कोई न कोई धार्मिक नियम लिया है। यहां तक कि बच्चों ने भी छोटे-छोटे नियम लेकर धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया है।
दृश्य 9
अपने पूरे परिवार को धर्म से जुड़ता देखकर मुझे लगता है कि मेरा जीवन सचमुच सार्थक हो गया। परिवार का यह धर्म और संस्कार ही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।”
यह शिविर अपनी एक अलग ही छाप छोड़ गया। अभी तक ये लोग अपने धर्म और संस्कारों को कहीं न कहीं भूल चुके थे, लेकिन अब अपने मूल धर्म की ओर लौट आए हैं। अब सभी को यह समझ आ गया है कि धर्म के माध्यम
से ही अपने जीवन को सार्थक और धन्य बनाया जा सकता है। आइए, अब हम आपको अगले दृश्य में ले चलते हैं।"
व्यक्ति : “आज शिविर का समापन हो गया। कितना आनंद आता था, तीनों समय धर्म का लाभ लेते हुए। सच में, इन दिनों में मन को बहुत शांति और प्रसन्नता मिली।”
भाई : “हाँ भाई! तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। अब तो लगता है कि हम पहले से भी बेहतर इंसान बन पाएँगे। इस शिविर के दौरान हमें अपने जीवन में कई अच्छे बदलाव देखने को मिले हैं।" अगर हम नियमित रूप से कक्षा में आएँगे, तो धर्म की बातें सीखने के साथ-साथ उन्हें अपने जीवन में भी उतार पाएँगे।"
दादी : “यही तो सबसे अच्छी बात होगी। बच्चों और बड़ों-सभी को धर्म से जुड़े रहने का अवसर मिलता रहेगा।”
भाई : तो फिर पक्का रहा कल से नीचे स्वाध्याय भवन में नियमित क्लास चलेगी सभी साधर्मी मिलकर धर्म लाभ लेने अवश्य पधारे।
दृश्य 10
बहू : “सुनो, माँ भी आपको बुला रही हैं।"
बड़ा बेटा अनेकांत : “अच्छा, चलता हूँ।”
मिष्ठी : “मम्मी, माँ जी का व्यवहार कुछ बदला-बदला लग रहा है।"
धैर्या : “हाँ, कुछ दिनों से वे बहुत शांत हैं और ज्यादा बात भी नहीं करतीं।”
मिष्ठी : “शायद मन में कुछ चल रहा है।"
बहू : “मुझे लगता है, माँ जी समाधि के मार्ग पर आगे बढ़ने का विचार कर रही हैं।”
धैर्या : “हाँ, हमें उनसे प्रेम से बात करनी चाहिए और उनकी भावना समझनी चाहिए।”
बड़ी बहू : मिष्ठी “जब मैं इस घर में आई थी, मुझे कुछ नहीं आता था। माँ जी ने मुझे घर-परिवार और धर्म, दोनों का मार्ग सिखाया। उन्होंने मुझे बेटी से बढ़कर प्यार दिया। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे उनसे इतना कुछ सीखने मिला।"
धैर्या : “सच में भाभी, आप बहुत लकी हैं। आपको इतना अच्छा मार्गदर्शन मिला। “अब मैं भी माँ जी से सीखकर उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतारना चाहती हूँ।
मिष्ठी : “हाँ, बिल्कुल! यह तो आपका अधिकार है।”
आरव : “मम्मी, दादी ने सबको बुलाया है।”
दादी : “अरे बहू, आ गई? बैठो।”
मिष्ठी : “दादी, क्या बात है? सबको क्यों बुलाया है?
धैर्या : “माँ जी, अपने बुलाया?
दादी : “बेटा, मैंने अब जिनधर्म के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया है। मैं चाहती हूँ कि तुम सब मेरी भावना समझो और मेरा साथ दो।"
दादी : “बेटा, मैंने इस परिवार को हमेशा साथ लेकर चलने की कोशिश की है। अब घर की छोटी-बड़ी सारी जिम्मेदारियाँ मैं तुम दोनों को सौंपती हूँ। मुझे विश्वास है, तुम दोनों इन्हें अच्छे से निभाओगी।”
बहू मिष्ठी : “माँ जी, इतनी बड़ी जिम्मेदारी हम कैसे निभाऊँगी?”
दादी : “बेटा, तुम बहुत समझदार हो। जब कभी कोई निर्णय समझ न आए, तो शांत मन से सोचना और फिर निर्णय लेना। धैर्या थोड़ा नादान है, उससे कोई गलती हो तो उसे प्यार से समझा देना।”
बहू मिष्ठी : “माँ जी, आप बिल्कुल चिंता न करें। मैं आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूँगी। लेकिन आप हमें छोड़कर कहाँ जा रही हैं?”
दादी : “मैं कहीं नहीं जा रही बेटा, बस अब अपने जीवन की दिशा बदलना चाहती हूँ। मैं आधि, व्याधि और उपाधि से मुक्त होकर शांत भावों से जीवन बिताना चाहती हूँ। इसलिए मन में आया कि अब परिवार की जिम्मेदारी तुम्हें सौंप दूँ और शेष जीवन धर्म और आत्मसाधना में लगाऊँ।”
दादी वहां से चली जाती है।
धैर्या : भाभी, माँ ऐसी बातें क्यों कर रही हैं?
मिष्ठी : पता नहीं… लेकिन अब हमें पहले से भी ज्यादा सावधान रहना होगा।
धैर्या : हमें मिल-जुलकर और साथ रहकर इस घर की जिम्मेदारी उठानी होगी।
मिष्ठी : , सब हाथ मिलाकर चलेंगे, तभी घर की एकता बनी रहेगी।
दृश्य 11
माँजी : बेटा… एक बात कहूँ? अगर कभी मेरा अंतिम समय आए, तो मुझे शांति और संयम से विदा करना।
मिष्ठी : माँजी, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? आप हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएँगी।
माँजी : बेटा, जीवन का कोई भरोसा नहीं… बस मेरी एक इच्छा है, उसे पूरा कर देना।
धैर्या : नहीं माँजी! आपकी हर इच्छा पूरी करेंगे, लेकिन आपको खोने की बात हम सोच भी नहीं सकते।
मिष्ठी : माँ, आप ही तो इस घर की ताकत हैं। आपके बिना ये घर… घर जैसा कैसे रहेगा?
माँजी : अरे पगलों… मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी, बस मेरा आशीर्वाद बनाए रखना।
धैर्या : माँजी, आज से ऐसी बातें बिल्कुल नहीं करेंगी। हमें अभी आपके साथ बहुत सारी यादें बनानी हैं।
माँजी : लेकिन बेटा, तुमसे मुझे एक वादा करना पड़ेगा… जब भी मेरा अंतिम समय आए, तुम मेरी इन बातों का ध्यान जरूर रखोगी।
ओम : दादी! आज का दिन बहुत मजेदार था। हमने चार गेम जीते!
अव्य : और दादी, मैंने तो चॉकलेट भी जीती!
दादी : अरे वाह मेरे बच्चों! बहुत खूब!
बच्चे : मां मां देखो…
मिष्ठी : अरे आराम से बच्चों
(दादी अचानक बेहोश हो जाती हैं।)
बहू : माँजी! मा जी …
पोता : पोती: दादी! दादी उठो ना!
धैर्या : मां जी क्या हो गया आपको मां जी उठो ना।
मिष्ठी : अरे कोई डॉक्टर को कॉल करो ना।
(डॉक्टर आते हैं।)
मजला बेटा : डॉक्टर साहब, मेरी माँ ठीक तो हैं ना?
बड़ा बेटा अनेकांत : डॉक्टर साहब, आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?
(डॉक्टर उन तीनों को साइड में लेकर आते हैं)
डॉक्टर : आप दोनों हिम्मत रखिए… आपकी माँ की हालत ठीक नहीं है।
मजला बेटा सम्यक् : लेकिन उन्हें हुआ क्या है?
डॉक्टर : उन्हें कैंसर है… और बीमारी लास्ट स्टेज में पहुँच चुकी है। उनके पास अब बहुत कम समय है।
बड़ा बेटा अनेकांत : क्या…? नहीं डॉक्टर साहब! ये सच नहीं हो सकता। मेरी माँ बिल्कुल ठीक हो जाएँगी।
मजला बेटा सम्यक् : हाँ भैया… डॉ डॉक्टर साहब मजाक कर रहे हैं हमारी माँ को कुछ नहीं हुआ।
डॉक्टर : होश में आओ तुम लोग तुम्हारी माँ को कैंसर है कैंसर। मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ। मैं तुम्हारी फैमिली डॉक्टर हूँ और मेरा फर्ज है कि तुम्हें सच बताऊँ। अभी तुम्हें टूटना नहीं, पूरे परिवार को संभालना है।
बड़ा बेटा अनेकांत : लेकिन डॉक्टर साहब… ये कैसे हो सकता है? माँ ने तो हमेशा अपना बहुत ध्यान रखा है।
(तभी छोटा बेटा स्वानुभव वहाँ आते हैं।)
स्वानुभव चाचू : भैया… आप दोनों इतने परेशान क्यों हैं? क्या हुआ भैया? आप दोनों इतने घबराए हुए क्यों हैं?
मजला बेटा सम्यक् : कुछ नहीं छोटे…
छोटा बेटा स्वानुभव : नहीं भैया, कुछ तो हुआ है। डॉक्टर साहब, आप मुझे सच बताइए।
(डॉक्टर चाचाजी को पूरी बात बताते हैं।)
छोटा बेटा स्वानुभव : क्या… माँ को कैंसर है?
डॉक्टर : हाँ, और हालत काफी गंभीर है।
छोटा बेटा स्वानुभव : भाइयों, ये समय रोने का नहीं है। हमें माँ का साथ देना है। भूल गए उनकी दी हुई सीख- मुश्किल समय में संयम रखना।
बड़ा बेटा अनेकांत : लेकिन छोटे… अब हम क्या करें?
छोटा बेटा स्वानुभव : जो होना है, वह होगा। अभी हमें माँ के अंतिम समय में उनके साथ रहना है और उन्हें हरसमय ध्यान रखना होगा।
मजला बेटा सम्यक् : आप सही कह रहे हैं भैया… हम मिलकर माँ और पूरे परिवार को संभालेंगे।
(दोनों भाई आँसू पोंछते हैं।)
(तभी वो इशारे से घर की बहुओं को बुलाते हैं)
धैर्या : क्या हुआ? आप सब इतने शांत क्यों हैं?
मिष्टी : अरे आप लोग बिल्कुल टेंशन मत लीजिए। माँ ने कुछ दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया था, शायद इसलिए कमजोरी और चक्कर आ गए होंगे। हम हैं ना, हम दोनों उनका अच्छे से ध्यान रखेंगे और उन्हें जल्दी पहले जैसा ठीक कर देंगे।
धैर्य : हाँ भाभी, हम मिलकर माँजी को बिल्कुल ठीक कर देंगे।
मिष्टी : लेकिन… आप लोगों की खामोशी कुछ और ही बता रही है। क्या हुआ? आप लोग इतने शांत क्यों हैं?
धैर्य : भैया, आप लोग कुछ बोल क्यों नहीं रहे? आखिर आखिर बात क्या है?
मिष्टी : प्लीज़… हमसे कुछ मत छिपाइए।
धैर्य : हाँ, कुछ तो बात है… आप लोग हमसे कुछ छिपा रहे हैं?
(दोनों भाई चुप रहते हैं।)
मिष्टी : भैया, सच बताइए… माँजी को क्या हुआ है?
(वे पूरी बात बता देते हैं।)
धैर्य : क्या…? माँजी को कैंसर है? नहीं… ये नहीं हो सकता!
मिष्टी : आप लोग होश में तो हैं? ऐसा कैसे हो सकता है?
(दोनों बहुएँ भावुक होकर रोने लगती हैं।)
छोटा बेटा : खुद को संभालो भाभी, अभी हमें माँ को संभालना है।
धैर्य : लेकिन उन्हें सच बताएँगे कैसे?
बड़ा बेटा अनेकांत : अभी हमें सबसे जरूरी है कि उन्हें डर या चिंता न हो। उनके साथ और भी प्यार से रहना होगा, उनका मन मजबूत रखना होगा और उनकी हर जरूरत का ध्यान रखना होगा।
मिष्टी : हाँ… अब हम सब मिलकर माँजी का साथ देंगे।
दृश्य 12
मिष्टी : अरे बच्चों, स्कूल से आ गए?
बच्चे : हां मां हम ने बैग रख दिए और कपड़े भी बदल लिए?
बच्चे : हाँ मम्मी, अब हम दादी के पास जा रहे हैं।
धैर्य : पहले खाना तो खा लो बेटा।
बच्चे : नहीं मम्मी, दादी के पास जाना है।
मिष्ठी : धैर्य, बच्चों को जाने दीजिए, बाद में खा लेंगे।
मिष्ठी : भाभी, आज डॉक्टर ने जो दवा बताई है, उसमें थोड़ा शोंट डालना है… लेकिन माँजी ने शोंट का त्याग कर रखा है। अब दवा कैसे देंगे?
धैर्य : हाँ, यही तो परेशानी है। माँजी का नियम भी नहीं टूटना चाहिए।
मिष्ठी : आप ऐसा कीजिए, दवा में शोंटमत डालिए। माँजी के नियम हमारे लिए सबसे ऊपर हैं। उनकी इच्छा के विरुद्ध हम कुछ नहीं करेंगे।
धैर्य : लेकिन दवा तो उन्हें देनी ही है।
मिष्ठी : हाँ, दवा देंगे… बस उनके नियमों का पूरा ध्यान रखते हुए। अभी यही हमारी समझदारी है।
(सभी माँजी के पास जाते हैं।)
मिष्ठी : माँजी, थोड़ा नमकीन खिचड़ी खा लीजिए।
(मिष्ठी भावुक होते हुए भी अपनी भावनाएँ छिपाती है और कटोरी धैर्य को दे देती है।)
बड़ा बेटा अनेकांत : माँ, आज आप मेरे हाथ से खा लीजिए।
(धैर्य माँजी को दलिया खिलाता है।)
माँजी : बेटा… बहू को क्या हुआ? आज कुछ परेशान लग रही है।
बड़ा बेटा अनेकांत : कुछ नहीं माँ, शायद थोड़ा काम आ गया है।
माँजी : बेटा… इसमें हल्दी क्यों नहीं है?
छोटा बेटा : माँ, आप भूल गईं?हल्दी का त्याग है।
माँजी : हाँ बेटा… अच्छा हुआ तुमने याद दिला दिया। नहीं तो मेरा नियम टूट जाता
छोटा बेटा स्वानुभव : भैया, आजकल माँजी को देखने के लिए लोगों का आना-जाना भी बढ़ गया है। घर का काम, बच्चों की जिम्मेदारी… भाभियाँ सब संभाल रही हैं, लेकिन मैं देख रहा हूँ, दोनों दिनभर थक जाती हैं।
बड़ा बेटा अनेकांत : हाँ छोटे, तुम सही कह रहे हो। क्यों न हम एक कामवाली रख लें? वह झाडू-पोंछा, बर्तन और बाकी घर का काम संभाल लेगी।
छोटा बेटा स्वानुभव : हाँ भैया, इससे बहुओं को माँजी की देखभाल के लिए ज्यादा समय मिल जाएगा।
बड़ा बेटा अनेकांत : ठीक है, तुम आज ही कामवाली से बात कर लो।
(शाम का दृश्य। पूरा परिवार माँजी के पास बैठकर णमोकार मंत्र का जाप करता है।)
माँजी : बेटा, आज घर में इतना अच्छा माहौल देखकर मन बहुत शांत हो गया है।
मिष्ठी : माँजी, आप बस आराम कीजिए। हम सब आपके साथ हैं।
माँजी : बहू, मुझसे एक वादा करोगी?
मिष्ठी : जी माँजी, बताइए।
माँजी : अगर कभी मेरे अंतिम समय में मेरे प्राण निकलें, तो तुम सब मेरे निर्यापक बनना… और मुझे समाधिपूर्वक मरण की ओर ले जाना।
मिष्ठी : माँजी… आप ऐसी बातें मत कीजिए। आप जल्दी ठीक हो जाएँगी।
बच्चा : हाँ दादी! हमारी पाठशाला की दीदी ने बताया है कि बीमार व्यक्ति के पास णमोकार मंत्र सुनाने से उसका मन शांत होता है। हम आपको रोज णमोकार मंत्र सुनाएँगे।
दूसरा बच्चा : और दादी, आप जल्दी ठीक हो जाना। फिर हम आपके साथ खूब सारी मस्ती करेंगे।
माँजी : हाँ मेरे बच्चों… तुम लोगों को देखकर तो मैं जरूर ठीक हो जाऊँगी।
(सभी मिलकर णमोकार मंत्र का जाप करते हैं।)
(तभी डॉक्टर माँजी का चेकअप करने आते हैं। कुछ देर बाद डॉक्टर परिवार के सदस्यों को एक तरफ बुलाते हैं।)
डॉक्टर : भाई साहब, मैंने पूरी जाँच कर ली है। अब माँजी के पास बहुत कम समय बचा है।
(सभी कुछ पल के लिए स्तब्ध रह जाते हैं।)
बड़ा बेटा अनेकांत : हमें आज से पहले से भी ज्यादा सचेत रहना होगा। माँ के पास हर समय परिवार में से कोई न कोई मौजूद रहेगा।
छोटा बेटा स्वानुभव : हाँ, लेकिन सबसे पहले हमें खुद को संभालना होगा।
बड़ा बेटा अनेकांत : बिल्कुल। माँ के सामने कोई भावुक नहीं होगा। हमें उनके सामने मजबूत रहना है और उनकी हर इच्छा और हर नियम का सम्मान करना है।
छोटा बेटा स्वानुभव : रात में मिष्ठी भाभी और धैर्या भाभी माँ के साथ रहेंगे।
बड़ा बेटा अनेकांत : सुबह मैं और सम्यक् माँ के पास रहेंगे।
छोटा बेटा स्वानुभव : और दोपहर में बाकी परिवार माँजी के साथ रहेगा। जरूरत पड़ने पर कोई भी तुरंत मदद के लिए आ जाएगा।
बड़ा बेटा अनेकांत : अब हमारा एक ही कर्तव्य है-माँ के हर पल को प्रेम, सम्मान और शांति से भर देना।
दृश्य 13
धैर्या : माँजी… क्या हुआ? बहुत दर्द हो रहा है। शरीर को दर्द हो सकता है… लेकिन आत्मा तो अजर-अमर है। मैं शरीर नहीं, एक शुद्ध आत्मा हूँ।
मिष्ठी : माँजी, आज से आप परिग्रह का त्याग कर दीजिए। जिन वस्तुओं की अभी आवश्यकता है, बस उन्हीं को रखिए और बाकी सबका त्याग कर दीजिए। भगवान् का स्मरण कीजिए।
बड़ा बेटा अनेकांत : माँ, अब संसार की किसी चिंता के बारे में मत सोचिए। बस अपनी आत्मा और भगवान् का चिंतन कीजिए।
मजला बेटा सम्यक् : हाँ माँ… आप हमसे पहले आत्मकल्याण की ओर बढ़ेंगी। हम भी आपके साथ यही भावना रखेंगे।
छोटा बेटा स्वानुभव : माँ, जाने-अनजाने में हमसे कभी कोई गलती हुई हो तो हमें क्षमा कर दीजिए।
सभी : उत्तम क्षमा, माँ! ![]()
बच्चा : दादी, आप णमोकार मंत्र का स्मरण कीजिए… हम सब आपके साथ हैं।
(दादी शांत भाव से णमोकार मंत्र का स्मरण करने लगती हैं। परिवार उनके आसपास बैठ जाता है।)
माँजी : बेटा… अब मन बहुत शांत लग रहा है।
(कुछ क्षणों बाद दादी शांत हो जाती हैं। घर में गहरा सन्नाटा छा जाता है।)
धैर्या : माँजी… उठिए ना… आप हमें छोड़कर नहीं जा सकतीं।
मिष्टी : धैर्य, खुद को संभालो। ये रोने का समय नहीं… माँजी ने जिस शांति और संयम की भावना से जीवन जिया, हमें उसी भावना से उन्हें विदा करना है।
बड़ा बेटा अनेकांत : आज घर में कोई नहीं रोएगा। हमारी माँ ने जिस शांत भाव से जीवन जिया, उसी शांत भाव से हमें उनके अंतिम समय को भी स्वीकार करना है।
मजला बेटा सम्यक् : हाँ भैया… आज हम भी यही भावना करते हैं कि हमें भी माँ की तरह सरल, संयमी और धर्ममय जीवन जीने की शक्ति मिले।
छोटा बेटा स्वानुभव : माँ ने हमें जीवनभर धर्म और संयम की शिक्षा दी। अब हमारा कर्तव्य है कि उनके बताए मार्ग पर चलें।
बड़ा बेटा अनेकांत : माँजी का जीवन हमारे लिए एक सीख था… और उनकी अंतिम अवस्था हमारे लिए सबसे बड़ी सीख बन गई।
(सभी शांत होकर णमोकार मंत्र का स्मरण करते हैं। दृश्य धीरे-धीरे शांत हो जाता है।)
अंतिम दृश्य :
कुछ समय बाद परिवार को माँजी की अलमारी से एक पत्र मिलता है…
छोटा बेटा स्वानुभव : भैया… माँ ने हमारे लिए कुछ लिखा है।
(सभी एक-दूसरे की ओर देखते हैं। दृश्य यहीं समाप्त होता है।)
माँजी का अंतिम पत्र
(बड़ा बेटा अनेकांत माँजी का पत्र खोलता है। सभी परिवारजन शांत बैठे हैं।)
बड़ा बेटा अनेकांत :
“मेरे प्यारे बच्चों…
शायद तुम सबको लगता रहा कि मुझे अपनी बीमारी के बारे में कुछ भी पता नहीं था।
और सच कहूँ तो… मुझे सच में नहीं पता था।
तुम सबने मुझसे मेरी बीमारी की बात छिपाई थी। तुम चाहते थे कि मुझे कैंसर के बारे में पता न चले और मैं अपने अंतिम दिनों को बिना किसी चिंता के जीती रहूँ।
लेकिन एक दिन… जब तुम लोग डॉक्टर से मेरी बीमारी के बारे में बात कर रहे थे, मैं पास ही थी। मैंने चुपके से तुम लोगों की पूरी बात सुन ली थी। उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि मुझे कैंसर है… और मेरे पास बहुत कम समय बचा है। उस पल मेरे मन में बहुत कुछ आया… लेकिन मैंने तुम लोगों के सामने कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा- जब मेरे बच्चे मेरे लिए इतना बड़ा दुख अपने दिल में छिपाकर मुझे मुस्कुराता हुआ देखना चाहते हैं, तो मैं भी उनके लिए मुस्कुराती रहूँगी। मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि मुझे सब पता चल चुका है। तुम सब मेरे सामने मजबूत बने रहे… और मैं तुम्हारे सामने। मेरे बेटों, तुमने मेरे लिए अपनी भावनाओं को रोककर रखा। मेरे सामने कभी अपने आँसू नहीं आने दिए। इसके लिए मैं तुम्हारी माँ होकर भी तुम्हारी ऋणी हूँ। मेरी प्यारी बहुओं… तुम दोनों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं बीमार हूँ। मेरी हर जरूरत का ध्यान रखा, मेरे नियमों और त्याग का सम्मान किया और हर पल मुझे माँ की तरह प्रेम दिया। तुम दोनों ने जिस तरह मेरी सेवा की, वह मेरे लिए कभी नहीं भूलने वाली बात है।
और मेरे प्यारे पोता : पोती… तुम्हारी मासूम बातें मेरे अंतिम दिनों की सबसे सुंदर यादें हैं। तुमने मेरी बीमारी नहीं देखी, तुमने सिर्फ अपनी दादी देखी। तुम्हारे साथ बैठकर णमोकार मंत्र सुनना मेरे लिए बहुत बड़ा सहारा था। मेरे परिवार… जिस दिन मैंने तुम्हारी बातें चुपके से सुनी थीं, उसी दिन मैंने मन में एक निर्णय लिया था- अब मैं अपने अंतिम समय को डर के साथ नहीं, धर्म और संयम के साथ जीऊँगी। मैंने जो भावना की थी, तुम सबने उसका सम्मान किया।
मेरे अंतिम समय में तुम सबने मुझे संभाला, मेरे नियमों का ध्यान रखा और मुझे शांत भावों के साथ समाधिपूर्वक मरण की ओर बढ़ने में सहयोग दिया। इसके लिए मैं तुम सबकी हृदय से कृतज्ञ हूँ। मुझे कैंसर होने की सच्चाई तुम लोगों ने मुझसे छिपाई थी… लेकिन जब मुझे वह सच्चाई पता चली, तब भी तुम लोगों के प्रेम ने मुझे टूटने नहीं दिया। मेरे बच्चों, मेरे जाने के
बाद एक : दूसरे का साथ कभी मत छोड़ना। धर्म के मार्ग पर चलते रहना। अपने आत्मकल्याण की भावना बनाए रखना। और मेरे लिए रोने के बजाय मेरे जीवन से कुछ सीखने की कोशिश करना। अगर मेरी कोई गलती हुई हो, तो मुझे क्षमा करना। उत्तम क्षमा। और जब कभी मेरी याद आए… बस एक बार णमोकार मंत्र का स्मरण कर लेना। तुम्हारी माँजी”
(पत्र पढ़ते-पढ़ते बड़ा बेटा अनेकांत भावुक हो जाता है। सभी एक-दूसरे की ओर देखते हैं।)
मजला बेटा सम्यक् : भैया… माँजी ने हमारी बात उस दिन सुन ली थी?
छोटा बेटा स्वानुभव : हाँ… और उन्होंने हमसे कुछ कहा भी नहीं। उन्होंने हमारे दुख को समझा और अपने अंतिम समय को धर्म और संयम में बिताया।
मिष्ठी : हमने सोचा था हम माँजी से उनकी बीमारी छिपा रहे हैं… लेकिन माँजी ने हमारे मन की हालत हमसे छिपा ली थी।
(सभी माँजी की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ते हैं।)
बड़ा बेटा अनेकांत : माँजी… आपने जाते-जाते भी हमें एक आखिरी सीख दे दी।
सूत्रधार : -------
जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, जैन धर्म हमें समता, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है। परिवार का सच्चा प्रेम वही है, जो कठिन समय में भी व्यक्ति के धर्म और भावनाओं का सम्मान करे।”
(सभी शांत होकर णमोकार मंत्र का स्मरण करते हैं।)
सच्चा प्रेम केवल किसी का जीवन आसान बनाने में नहीं, बल्कि कठिन समय में भी उसके धर्म, नियम, भावनाओं और आत्मकल्याण का सम्मान करने में है।
आइए, हम भी माँजी के जीवन से प्रेरणा लें और अपने जीवन में संयम, समता, क्षमा, धर्म और आत्मकल्याण को स्थान दें।
क्योंकि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत है।
उत्तम क्षमा
प्रूफरीडिंग बाकी है
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