हम सुनते हैं कि केवली भगवान् के ज्ञान में सब पहले से झलकता है, और समवसरण में भामण्डल में जीव के भव भी दिखते हैं। तब मन में प्रश्न उठता है: जब सब तय ही है, तो मेहनत करने से बदलेगा क्या? मैं पढ़ाई करूँ या न करूँ, नौकरी लगनी है तो लगेगी ही। इस पोस्ट में इस भ्रम को ग्रन्थ के आधार पर सही ढंग से समझते हैं।
१. जानना, करना नहीं है
केवलज्ञान दर्पण की तरह है। दर्पण में चेहरा झलकता है, पर दर्पण चेहरा बनाता नहीं। भगवान् सब जानते हैं, पर किसी का भविष्य बनाते नहीं। उनका ज्ञान हमारे कार्य का कारण नहीं, केवल उसका ज्ञाता है।
२. तय चित्र में पुरुषार्थ भी शामिल है
सबसे बड़ी भूल यह मानना है कि नतीजा तय है और मेहनत अलग चीज़ है। ज्ञान में पूरा चित्र दिखता है: पढ़ाई भी, मेहनत भी, और नतीजा भी।
उदाहरण: जिस विद्यार्थी की नौकरी लगनी है, उसकी नौकरी उसकी पढ़ाई के साथ ही लगनी है, पढ़ाई छोड़कर नहीं। “मेहनत करके सफल होना” यही तय है, “बिना मेहनत सफल होना” नहीं।
३. ग्रन्थ क्या कहता है: एक कार्य में अनेक कारण
पंडित टोडरमल जी ने मोक्षमार्ग प्रकाशक में ठीक यही प्रश्न उठाया है:
यहाँ प्रश्न है कि मोक्षका उपाय काललब्धि आने पर भवितव्यानुसार बनता है, या मोहादिके उपशमादि होने पर बनता है, या अपने पुरुषार्थसे उद्यम करने पर बनता है सो कहो। यदि प्रथम दोनों कारण मिलने पर बनता है तो हमें उपदेश किसलिये देते हो?
और उत्तर दिया है:
एक कार्य होनेमें अनेक कारण मिलते हैं। सो मोक्षका उपाय बनता है वहाँ तो पूर्वोक्त तीनों ही कारण मिलते हैं और नहीं बनता वहाँ तीनों ही कारण नहीं मिलते। … काललब्धि व होनहार तो कोई वस्तु नहीं है; जिस कालमें कार्य बनता है वही काललब्धि और जो कार्य हुआ वही होनहार। तथा जो कर्मके उपशमादिक हैं वह पुद्गलकी शक्ति है उसका आत्मा कर्ताहर्ता नहीं है। तथा पुरुषार्थसे उद्यम करते हैं सो यह आत्माका कार्य है; इसलिए आत्माको पुरुषार्थसे उद्यम करनेका उपदेश देते हैं।
सार: काललब्धि और होनहार कोई अलग से बैठी शक्ति नहीं है जो हमें रोक दे। जो कार्य जिस समय हुआ, वही उसकी काललब्धि, और जो हुआ वही होनहार। कर्म की दशा पुद्गल की है। हमारे हाथ में, आत्मा के करने में, केवल पुरुषार्थ है। इसीलिए उपदेश पुरुषार्थ का दिया जाता है।
४. अपना होनहार किसे पता है?
हमें अपना होनहार पता नहीं। तो “सब तय है” कहकर बैठ जाना भी अपनी ही कल्पना है, ज्ञान नहीं। जिसका भला होना है, उसके भीतर से पुरुषार्थ अपने आप उठता है। इसलिए सच्चा पुरुषार्थ करना ही अपने अच्छे होनहार का संकेत है।
५. यह समझ बोझ नहीं, आराम देती है
नियति की सही समझ आलस नहीं देती, शांति देती है। मेहनत पूरी करो, पर फल की आकुलता छोड़ दो। सफल हुए तो “मैंने किया” का अहंकार नहीं, असफल हुए तो दुःख नहीं, क्योंकि हर कार्य अपनी व्यवस्था से हो रहा है। करो पूरा, और भीतर से शांत रहो।
निष्कर्ष
तो बदलता क्या है? मेहनत वही रहती है, पर चिंता से नहीं, शांति से होती है। कर्तापने का बोझ उतर जाता है, और ज्ञाता बनकर पुरुषार्थ होता है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १: अगर सब तय है, तो पढ़ाई छोड़ दूँ तो क्या फ़र्क पड़ेगा?
उत्तर: मोक्षमार्ग प्रकाशक के अनुसार जहाँ कार्य बनता है वहाँ सब कारण मिलते हैं, और जहाँ नहीं बनता वहाँ नहीं मिलते। पढ़ाई छोड़ने का भाव आना ही बताता है कि उस समय सफलता का कारण नहीं जुड़ रहा। इसलिए नियति पुरुषार्थ छोड़ने का बहाना नहीं बन सकती।
प्रश्न २: क्या भगवान् के जानने से हमारा भविष्य बँध गया?
उत्तर: नहीं। जानना और करना अलग हैं। भगवान् ज्ञाता हैं, कर्ता नहीं। जैसे दर्पण चेहरा नहीं बनाता।
प्रश्न ३: तो उपदेश पुरुषार्थ का ही क्यों दिया जाता है?
उत्तर: क्योंकि काललब्धि और होनहार अलग वस्तु नहीं हैं, और कर्म पुद्गल की शक्ति है। आत्मा का अपना कार्य केवल पुरुषार्थ है, इसलिए उपदेश उसी का दिया जाता है (मोक्षमार्ग प्रकाशक)।
प्रश्न ४: पुरुषार्थ का असली अर्थ क्या है?
उत्तर: पूरी लगन से अपना कर्तव्य करना, और फल में आकुल न होना। मोक्षमार्ग में सबसे बड़ा पुरुषार्थ अपने स्वरूप की ओर दृष्टि करना है।
प्रश्न ५: असफल होने पर मन कैसे सँभालें?
उत्तर: यह समझकर कि मैंने अपना पुरुषार्थ पूरा किया, बाकी कारण मेरे अधीन नहीं थे। यही समझ दुःख को शांति में बदलती है।
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