जैनस्टर्’S (Jainster’S)
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अंदर पढ़िए
| क्र. सं. | विषय | पेज नं |
|---|
- | अन्तर्दृष्टि व युग-वाणी | 5-10
- | स्टेप बाय स्टेप जानें जैन धर्म | 11-13
- | फंडा जैन धर्म का | 16-17
- | आयुबोध | 18
- | उलझे सवालों के सुलझे जवाब | 20
- | कर लो जिनवर का गुणगान | 22-24
- | सोचो, विचारों और करो… | 24-26
- | वाणी सर्वज्ञ की | 27
- | क्योंकि हृदय भी जरूरी है | 29
- | बिखरे मोती व जैन एस | 30-31
आशीर्वाद के हाथ
श्रीमती आशा-शान्तिप्रभा पाटील, जयपुर
सहयोग के हाथ
श्रीमती प्रीति जैन, विदिशा
श्रीपति प्रीति जैन, जयपुर**
सज्जा के हाथ
श्री संजय शास्त्री, जयपुर
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संपादकीय
पहला कदम, अपनी ओर…
लो स्वर्ण जयंती वर्ष आ गया ज्ञानतीर्थ भुसावल का।
जिसने जग में अलख जगाया वीतराग-विज्ञान का।।
हजारों-लाखों लोगों के हृदय में जगह बनाने के लिए 50 साल का समय शायद बहुत ज्यादा हो सकता है, लेकिन किसी धार्मिक संस्था को इन ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए 50 समय बहुत कम है। पर यह अद्भुत कार्य कर दिखाया है पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट ने, जिसने अपने 50 वर्ष पूरे होने पर अपना स्वर्ण जयंती वर्ष जिस उत्साह, उमंग, वैभव और बहुमान के साथ मनाया कि सब देखते रह गये। सही कहा गया है कि कोई भी संस्था ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि संस्था में कार्य करने वाले लोगों और उनसे जुड़े लोगों से ही बनती और सफल होती है। आज कौन होगा, जो अपने आप को इस संस्था से जुड़ा हुआ होने पर गौरवान्वित महसूस न करे।
मैं भी अपने आप को महान भाग्यशाली समझती हूँ कि यह ज्ञानतीर्थ अभी तक के मेरे छोटे-से जीवन काल का अभिन्न अंग रहा है। शायद ही कोई दुख-सा भाग्यशाली होगा, जिसका पूरा बचपन इस ज्ञानतीर्थ की भूमि पर हुआ हो और शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की हो। मानो यह इस ज्ञानतीर्थ का ही आशीर्वाद है, जिससे मुझे इस मैगजीन को आप सबके सामने लाने के लिए प्रेरणा, विश्वास और अनुभव मिला।
वीतराग-विज्ञान और वैराग्य के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के एकमात्र उद्देश्य को लेकर यह संस्था पिछले 50 वर्षों से आगे बढ़ रही है और यही एकमात्र उद्देश्य जैनस्टर्स का भी है।
जब हम पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट की बात करते हैं तो अपने आप ही पूज्य गुरुदेव कानजीस्वामी, स्व. श्री पूरणचन्द मोदीका, स्व. श्री अमीचंदजी पाटनी और डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल की छवि सामने आ ही जाती है। ये वे स्तंभ हैं जिनके बिना इस संस्था के निर्माण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पूज्य गुरुदेवश्री की प्रेरणा, मोदीकाजी का उत्साह और त्याग और
पाटनीजी व भारिल्लजी की लगन और समर्पण ने ही उस स्वप्न को साकार किया, जिसे आज हम खुली आँखों से देख और सराह रहे हैं।
यकीनन् इस संस्था ने इतिहास लिखा है, पर इस इतिहास को बनाना कहीं मुश्किलों ने है। कितना सही कहा जाता है, इस ज्ञानतीर्थ की महिमा में कि न केवल चर्चा (जयपुर) में पाषाण की अप्रतिम प्रतिमा बनाई जाती है, बल्कि इस चेतन का उन अप्रतिम प्रतिमा की अहमियत भी बनाई जाती है। यह चेतन प्रतिमा बनाई भी जाती है और चेतन प्रतिमा बनाने की कला भी सिखाई जाती है।
अद्भुत ओज है इस भूमि का कि यहाँ आकर इसकी अप्रतिम कृपा हुए बिना रहा ही नहीं जा सकता। अगर भावुकता में मैं इसे दुनिया का आठवाँ आश्चर्य कह दूँ, तब भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जिस ज्ञानतीर्थ ने मेरे जीवन में मेरे पालक, संरक्षक, शिक्षक, निर्देशक, मार्गदर्शक और भी न जाने कितनी भूमिकाएँ निभाई हैं। उसके 50 वर्ष पूरे होने पर जैनस्टर्स परिवार की ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ।
कहते हैं कि छोटे बच्चों को भेंट नहीं देते, फिर हमारी तरफ से एक कोशिश के रूप में जैनस्टर्स का प्रस्तुत अंक पंडित टोडरमल स्मारक को समर्पित! आशा करते हैं, यह संस्था उन बुलंदियों को भी छूले, जो अब तक अनछुए हैं!
अन्तर्दृष्टि
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट एक ऐसा स्थान है, जिसे आज किसी परिचय की जरूरत नहीं है। जिस तरह से यह जैनधर्म के प्रचार-प्रसार में सबसे आगे सुकर अपना योगदान दे रहा है, धार्मिक शिक्षण-शिविरों का आयोजन कर रहा है, जैन साहित्य का प्रकाशन कर रहा है, विद्वान बनाने की फैक्ट्री के संचालन का सुदृढ़ बागडोर जिसके हाथ में है; साथ ही उन विद्वानों के द्वारा सुविचारित तरीके से धर्म का प्रचार-प्रसार करा रहा है और जनसमाज के क्षेत्र में फल-फूल रहा है। इसे जीवन ज्ञानतीर्थ कहना, एक जीता-जागता व्यक्तित्व कहना गलत न होगा।
तो आइए, पिछले ही इस अंक में जीवन ज्ञानतीर्थ पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट से और जानते हैं उनकी अन्तर्दृष्टि मेरे दृष्टि से -
एक मुलाकात : जीवन ज्ञानतीर्थ के साथ
- प्रीति जैन पाटील, जयपुर
अभी तक के मेरे छोटे-से जीवन-काल का एक अभिन्न अंग रहा है ज्ञानतीर्थ पण्डित टोडरमल स्मारक। जिस तरह से यह जनसमाज के प्रचार के क्षेत्र में फल-फूल रहा है, इसे जीवन ज्ञानतीर्थ कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। शायद ही कोई भी ऐसा भाग्यशाली होगा, जिसने अपनी आँखें खोली हों और स्वयं को इस ज्ञानतीर्थ की गोद में पाया हो, जिसने अपने बचपन की हर कोठी-बड़ी, खुट्टी-मोटी यादों को इस ज्ञानतीर्थ के साथ साझा किया हो।
जो स्वयं हर पल अटल होकर साथ खड़ा रहा हो; जिसने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा इसी के द्वार के भीतर ही रहकर पाई हो और जिसने विद्यार्थियों को अध्ययन-अध्यापन कराने का अनुभव और विश्वास पाने का अवसर यहीं से प्राप्त किया हो।
मेरे जीवन में मेरे पालक, संरक्षक, शिक्षक, निर्देशक, मार्गदर्शक और भी न जाने कितनी भूमिकाएँ निभाई हैं और निभा रहा है यह जीवन ज्ञानतीर्थ।
इतना होने पर भी कुछ प्रश्न थे हृदय में, जो मैं पूछना चाहती थी; परन्तु कभी अवसर ही न मिला। आखिर बहुत व्यस्त भी तो थे वे अपने कार्यों को पूर्ण करने में। कभी धार्मिक शिक्षण-प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करा रहे होते तो कभी साहित्य-सृजन और प्रकाशन पर भी ध्यान देना होता था।
विद्वान बनने की फैक्ट्री के संचालन की भी मुख्य बागडोर इन्हीं के हाथों में है
जैनदर्शन
और उन विद्वानों द्वारा सुनियोजित तरीके से धर्म के प्रचार-प्रसार की भी। जैन धर्म की उन्नति के लिए ऐसा कौन-सा कार्य रहा, जो इन्होंने करना पसन्द हो। फिर भी एक दिन अवसर पाकर मैंने इन्हें पकड़ ही लिया और लगा डाली अपने प्रश्नों की झड़ी इनके सामने।
उन सामने को उन्मुख भी; परन्तु उनकी सौम्य, गंभीर, अविचलित और दृढ़ मुद्रा को देखती रह गई। 50 वर्ष के स्वर्णिम अनुभव उनके मुख पर अवश्य दिख रहे थे; परन्तु इसी सफलता के साथ निरन्तर आगे बढ़ते रहने के उत्साह की चमक भी आँखों में झिलमिला रही थी।
अभिवादन मैंने अपना पहला प्रश्न किया कि 50 वर्ष पूर्व लोक से टक्कर कुछ कर दिखाने की हिम्मत कैसे दिखलाई?
तो आत्मविश्वास के साथ उत्तर आया -
जो रह गया झिझक के, वह रह गया इधर।
जिसने लगाई धुन, वह खेदक के पार ।।
उनका आत्मविश्वास देखकर मैं समझ गई कि क्यों 50 वर्ष पूर्व पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी ने जैन धर्म का ध्वज और ‘हे भगवान्! तू, हम सबकी कर’ का दायित्व निश्चित होकर इनके हाथों में दे दिया था।
तत्काल मैंने अगला प्रश्न किया कि कभी अपने लक्ष्य को पाने में असफल होने का डर नहीं लगा?
प्रश्न सुना मानो उनकी आँखों ने जवाब दे दिया -
‘जब जब जब मैं छोड़ दी, तो पार क्या मझधार क्या?
जब पतवार मेरे हाथ में, तो दूर क्या दुश्वार क्या?’
उनका आत्मविश्वास देख समझ गई कि ‘जिसे यकीं है अपनी उड़ान पर दिल से, फलक को वही परिन्दा पार करता है’ और फिर पूछिन टोडरमल स्मारक ट्रस्ट ने 50 वर्षों की उड़ान में जिन ऊँचाइयों को छुआ है, वह किसी से छुपा नहीं है।
मैंने पुनः सवाल किया - कुछ कुंद साधियों के साथ मंजिल की ओर बढ़े थे, फिर इतना विस्तार कैसे हुआ?
जनवरी-मार्च 2017
उत्तर मिला -
चलते थे अकेले ही हम जाने मंजिल मगर।
लोग जुड़ते गये और कारवाँ बनता गया ।।
मैंने भी हँसते हुए कहा - बात तो सही है। आपका कारवाँ ही इतना बड़ा है कि मुझे तो इस में ‘छोटा भारत’ दिखाई देता है। भिन्न-भिन्न प्रकार की सोच-विचार वाले, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों और राज्यों वाले, भिन्न-भिन्न भाषा वाले - हर प्रकार के लोग आपके कारवाँ में दिखाई पड़ते हैं। ये दुनिया में जहाँ भी रहते हैं, तत्त्वज्ञान के प्रचार-प्रसार में अपनी-अपनी योग्यतानुसार सहयोग करते रहते हैं।
तब वे कहने लगे -
यह शाख पर रहे या कहीं और रहे।
इस चमन का फूल है, खुशबू ही बिखेरेगा ।।
फूल की बात सुन मैंने कहा कि आपकी राहों में तो शूल भी बहुत थे। आगे बढ़ने में कठिनाई नहीं हुई?
तब उनके 50 वर्षों का अनुभव कह उठा -
वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या, यदि राह में बिखरे शूल न हों।
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, यदि धाराएँ प्रतिकूल न हों ।।
मैंने पूछा - प्रतिकूल धाराओं में भी 50 वर्ष की उम्र तक चलते रहे। कभी थके नहीं?
तो उन्होंने हँसकर कहा -
वक्त के साथ उम्र का बढ़ना तो कुदरत का तकाजा है।
महापुरुष न हो तो भला बुढ़ापा कहाँ है?
सो ठीक कहे बात थी। 50 वर्ष की आयु के बावजूद जहाँ एक ओर अनुभवों से मिला होगा उनमें दिखाई दे रहा था, वहीं नई ऊँचाइयों को छूने के लिए दुगनाओं जैसा जोश भी उनमें प्रतिफलित हो रहा था।
मैंने कहा - आखिर मंजिल कहाँ है आपकी?
उनका स्वर्णिम सफर कहने लगा -
‘आज ही होगा मुसाफ़िर, आप ही मंजिल हूँ मैं’।
मैंने जब पूछा - ‘जिन मुसाफ़िरों ने रास्ता बदल डाला, उनका क्या?’
उत्तर मिला -
जैनदर्शन
मंजिल हर अलग-अलग है, ठिकाना तो एक है।
मंजिल हर शख्स की, पाना तो एक है ।।
मैंने जब पूछा - ‘अपनी 50वीं वर्षगाँठ पर क्या इच्छा करते हो?’
तो कहा -
अटल ही विश्वास साहस, उल्लास हो मन में लिये।
मुक्ति ज्योति जगमग, ज्ञान का संबल लिये ।।
आगे कुछ पूछती ही जा रही थी कि बंद आँखों का सपना टूट गया। जीवन्त ज्ञानतीर्थ से मुलाकात का अंत हुआ; परन्तु उन आँखें खुली तो सबके उनके ही अंचल में पाया। पर खुली आँखों में जो प्रश्न तैरते थे, बंद आँखों ने उन सबके उत्तर पा लिये थे।
युव-वाणी
क्या टोडरमल स्मारक की अहमियत कही जा सकती है?
- अंकुर जैन, दमोह
भली होनहार थी, सो लाख पर खबर की कोशिशों के बावजूद भी टोडरमल स्मारक में अपनी पाँच साल बिताने का सुअवसर प्राप्त लगा। ये पाँच साल, जिंदगी के अगले संभावित पचास सालों की आधारशिला रखने को तैयार थे। एक मजबूत आधार शिला, जहाँ सिर्फ संस्कारों का आधार ही नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान के पथ भी हमें मिलने जा रहे थे, जिनके सहारे हम इस भव और भवांतरों के भी संसार को पार करने का साहस रख सकते थे … आत्मविकास से संपन्न हो ये साहस कम भी रहे हैं। हाँ, कुछ विसंगतियाँ अभी भी होंगी जीवन में, किन्तु वे निश्चित ही उन संभावित विसंगतियों से कम होंगी, जो तब पैदा होती, जब हम टोडरमल स्मारक न गये होते।
पाँच साल तक एक ऐसे अबोध बालक का निर्माण, जो तमाम दुनियादारी या हित-अहित के विचार से परे एक बालक है; लेकिन जब वह यहाँ से निकलता है, तब स्वयं तो एक आधार-स्तम्भ बनता ही है; साथ ही वही वो भी खड़ा होता है, वहीं एक संस्था का काम करता है। अपने आस-पास स्थित समस्त परिसर को गुलजार करता है।
जनवरी-मार्च 2017
इस तरह देखें तो एक व्यक्ति का हित ही अंततोगत्वा समाज का हित बन जाता है। इससे मेरा पूरा सकारात्मक बदलाव का जो भी हम आकलन करते हैं, वह असल में बहुत कम ही होता है; क्योंकि एक स्नातक अपने गुणों की गंध सिर्फ अपने परिवार, जाति या वर्ग विशेष तक ही नहीं फैलाता; बल्कि वह धर्म और समाज के इतर भी लोगों में अपने संस्कार और ज्ञान की सौरभ फैलाता है।
बात यदि संस्था की कार्यप्रणाली की कहें तो कहना चाहूँगा कि कोई भी प्रणाली या व्यवस्थाएँ सरलता का आधार नहीं होती; बल्कि उद्देश्य ही सफलता के सुनिर्णयीकरण का आधार होते हैं। आपके उद्देश्य यदि महान हैं तो व्यवस्था की खामियों के बावजूद आप अपने लक्ष्य की उपलब्धि करने में सक्षम होते हैं, किन्तु यदि उद्देश्यों में ही छल है तो दुरुस्त व्यवस्थाएँ भी गंतव्य तक पहुँचाने में सक्षम नहीं है।
टोडरमल स्मारक का बीते पचास साल का इतिहास स्वयं इसकी प्रणाली की कहानी बयाँ करता है। करीब एक हजार विद्वानों की फौज, व्यापक तत्त्वप्रचार की सुदृढ़ परंपरा, जन-जन तक तत्त्वशिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करने में यकीनन् संस्था की कार्यप्रणाली का हाथ ही नहीं सकता; बल्कि उन उद्देश्यों का हाथ है, जिनको लेकर संस्था काम करती है। पचास साल की इस यशस्वी परंपरा का अगला पचास साल और कहें कि अगले पाँच सौ साल या इसके भी ले जाना है तो उन महान उद्देश्यों के साथ समझौता नहीं करना है, जिनका आधार पूज्य गुरुदेवश्री और आदरणीय छोटे दादा द्वारा रखा गया है। इन उद्देश्यों के सहारे चाहे किसी भी प्रणाली का विकास क्यों न हो, उसका सफल होना तय है।
टोडरमल स्मारक और जैन तत्त्वज्ञान के शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की बात करें तो आज समाज में पंचायती दंगलभर से ज्यादा संस्थाएँ टोडरमल स्मारक की सफलता की गवाह दे रही है। यदि इस क्षेत्र में टोडरमल स्मारक का योगदान नगण्य होता तो निश्चित ही खुद टोडरमल महाविद्यालय की बात के प्रवाह में यहाँ खो गया होता; लेकिन ये तो दोगुनी शक्ति से बढ़ रहा है, साथ ही कई अन्य को भी जैसा बनने के लिए प्रेरित कर रहा है। ये प्रतिस्पर्थी अच्छा है।
हम तो चाहेंगे सब टोडरमल स्मारक जैसा बनना चाहें, बल्कि इससे भी आगे निकलने का प्रयास करें; क्योंकि इन प्रयासों से अंततः जिनशासन को ही गति मिलेगी; लेकिन प्रतिस्पर्धा के बीच आलोचना के सुर तेज करना समझ से परे है। ये
जैनदर्शन
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहीं बाजारू न हो जाये, इसका ध्यान रखना जरूरी है; क्योंकि ये समझ लें कि भले ही कोई नई संस्था टोडरमल स्मारक से ज्यादा ऊँचाई हासिल कर ले; लेकिन टोडरमल स्मारक जितनी गहराई पा लेना आसान काम नहीं है। आज विरोधी संस्थाओं के बीच भी जो खुद को बेहतर बनाने की होड़ है, वह भी टोडरमल स्मारक की ही देन है।
इस तरह यदि मैं कहूँ कि तमाम क्रियाकांड के बीच शिक्षा के क्षेत्र में जितना भी जैन तत्त्वज्ञान विद्यमान है, वह सिर्फ टोडरमल स्मारक की वजह से है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इन सबके बावजूद बेशक हम खुद की बीते सालों की उपलब्धियों से नई ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त करें; किन्तु इन गुजरे वर्षों की सफलता के अनुयायी में अंधा हमें नहीं होना है। इस धारा को अक्षुण्ण रखना है तो गुजरे वक्त से ज्यादा अपने वर्तमान और भविष्य पर नजर रखना है। अपने उद्देश्यों में किसी भी भाँति कलुषता नहीं आने देना है। पद, प्रतिष्ठा और पैसे का वर्चस्व कम से कम हमारी इस मातृ-संस्था में तो न हो। परस्पर साम्यवादी वास्तव और सरलता से सहयोगी गुण बनाये रखें। राजनीति और पक्ष का प्रवेश यहाँ न होने पाये। इसके लिए समग्र प्रयासों की जरूरत है।
आलोचना और अपने निंदा को भी सुनें तथा उन अनर्गल से बचें भी। यदि आलोचना नहीं है तो उन गलतियों को सुधारें और यदि आलोचना निरर्थक है, तब भी आलोचना करने वाले पर द्वेष या वैमनस्य न बरतें। हमें सहिष्णु भी होना है और साहसी भी। प्रतिकार करें, प्रतिस्पर्थी भी करें; पर प्रतिद्वंद्वी किसी के भी न बनें। सफलता में प्रसन्न हों; किन्तु असफलता में खेद-खिन्न नहीं। थोड़ा ही सही पर अपने-अपने स्तर पर प्रयास जरूर करें; क्योंकि हम सब द्वारा थोड़े-थोड़े अंशों में सींचे गये जल से ही इस वाटिका का पल्लवन बरकरार रहेगा।
मेरा अपना हर शासी भाई से निवेदन है कि टोडरमल स्मारक के स्वर्णिम अतीत ने हमारा वर्तमान गढ़ा है। अब हमारे वर्तमान का यह कर्तव्य है कि हम इसका भविष्य यशस्वी और जीवन बनाये।
- आलेख संपादक एवं पूरब, दूरदर्शन केन्द्र भोपाल (म.प्र.)
जनवरी-मार्च 2017
Step by step जानने जैन धर्म
हमने अक्सर कई जैनमंदिरों में यह सूचना पढ़ी होगी, जिसमें यह लिखा होता है कि अमुक मंदिर में शुद्ध तेरहपंथ आम्नाय से पूजादि होती है। कभी आपने जानने की कोशिश की कि यह तेरहपंथ आम्नाय क्या है? कभी कोई आपसे पूछे कि आप कौन-सा पंथ मानते हैं और क्यों तो आप क्या उत्तर दे पाएँगे?
दिगंबर जैन शुद्ध तेरहपंथ के होने से यह तात्पर्य कतई नहीं है कि हम तेरहपंथ के स्वरूप को जानें। तो आइये जानते हैं, हम अपने पंथ तेरहपंथ को -
पंथ का अर्थ है मार्ग। जैनधर्म में विभिन्न प्रकार की सोच और समझ वाले व्यक्ति हुए हैं, जिसमें से कुछ ने जैनधर्म के वास्तविक स्वरूप को समझा, तो कुछ ने अपनी सुविधा के स्वार्थ के कारण, तो कुछ ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों जैनधर्म के मूलभूत सिद्धांतों को अपने अनुसार परिवर्तित कर अलग-अलग प्रकार से मुक्ति के मार्ग का प्रतिपादन किया। मुक्तिमार्ग के प्रतिपादन के इसी अंतर ने जैनधर्म को अलग-अलग पंथों में बाँट दिया। जैसे तेरहपंथ, बीसपंथ, तारनपंथ, गुमानपंथ आदि।
बात की जाये उन पंथ की, जिसके हम अनुयायी हैं, वह है मूलपंथ, शुद्धाम्नाय का तेरहपंथ या तेरहपंथी। तेरहपंथ का अर्थ है - भगवान! आपका/तुम्हारा/तेरा जो पंथ है, वही मेरा पंथ है।
यद्यपि देखा जाये तो तेरहपंथ तब से है, जब से जैनधर्म है अर्थात् अनादिकाल से है; क्योंकि वीतराग जिनेन्द्र के द्वारा कहा गया पंथ ही तेरहपंथ है। फिर भी तेरहपंथ का प्रचलन तब से हुआ, जब से जैनधर्म में बाहरी घुसपैठें बाद क्रियाओं में शिथिलाचार और विसंगतियाँ आने लगी और धर्म के सिद्धांतों से अनजान लोगों द्वारा उसे बढ़ावा भी मिलने लगा और धर्म का स्वरूप बिगड़ का कागार पर आ गया, तब सत्रहवीं सदी में पंडित बनारसीदासजी ने इन दो लोगों को असत्य धर्म की ओर बढ़ने के लिए शुद्धाम्नाय का जोरदार और सफल प्रचार किया, जिसे अध्यात्मपथ या तेरहपंथ नाम दिया। इसी क्रांति को आगे चलकर उन्नीसवीं शदी में पंडित टोडरमलजी ने प्रबल समर्थन दिया। इसीकारण अक्सर पंडित बनारसीदासजी के द्वारा ही तेरहपंथ का प्रारंभ मान लिया जाता है।
तेरहपंथी आम्नाय में श्रेष्ठ बातों को नहीं माना जाता है -
- दश दिगपालों को नहीं मानना, उन्हें अर्घ आदि न चढ़ाना -
बीसपंथी लोग दश दिशाओं के दश दिगपाल अर्थात् देवताओं को मानते हैं और पूजते हैं लेकिन ये देव असंयमी और राग सहित होने से पूज्य नहीं हैं; क्योंकि जैनधर्म में मात्र
जैन धर्म का
भीतरवर्ती सर्वज्ञ देव को ही पूज्य माना जाता है।
2. बीसपंथी मुनियों को गुरु मानकर उनकी चरण-वंदना न करना - साधु वीतराग मार्ग पर चलने वाले होते हैं, इसलिए मात्र निर्ग्रन्थ दशा को अपनाने वाले और वीतराग मार्ग का उपदेश करने वाले साधु ही हमारे लिए पूज्य हैं।
3. जिनप्रतिमा के चरणों पर केसर का प्रयोग न करना - जिनप्रतिमा पर केसर आदि लेप लगाना पर्याय और पाषाण का प्रतीक है और इससे भगवान सभी पोषाकों और शरीर के प्रति राग से रहित हैं, इसलिये जिनप्रतिमा पर केसर नहीं लगाना चाहिए।
4. जिनप्रतिमा पर फूलों से पूजा न करना - जब सामान्य जैन के लिये ही फूलों को तोड़ना या उनका प्रयोग करना पाप माना जाता है, तो फिर ऐसे फूलों को भगवान के सामने कैसे चढ़ा सकते हैं!
5. दीपक से पूजा या आरती न करना - दीपक से छोटे-छोटे जीवों की हिंसा होती है, कभी-कभी तो बड़े जीव भी क्योंकि लौ में आकर मर जाते हैं। साथ ही दीपक की लौ अग्निकायिक जीव है; इसलिये दीपक से पूजा या आरती नहीं करनी चाहिए।
6. आसिका मस्तक पर न लगाना - पूजन के अंत में टोमे या थाली के चावल से आशीर्वाद लेना अम्बिका कहलाता है, पर जब जिनेन्द्र भगवान शाश्वत् सामने विराजमान हों, ऐसे में टोमे या थाली के चावलों से आशीर्वाद लेना मूर्खता ही है।
7. जिनेन्द्र भगवान का पंचामृत अभिषेक न करना - दूध, घी, दही, इक्षु रस (गन्ने का रस) और सर्वोषधि (औषधियों का घोल) - इन पांच चीजों से अभिषेक करने का पंचामृत अभिषेक कहते हैं, ऐसा इससे अभिषेक करने पर एक ओर तो जीवों की हिंसा होती है, वहीं दूसरी ओर प्रतिमा पर जीवों की उत्पत्ति की संभावना भी बढ़ जाती है; इसलिये जिनेन्द्र भगवान का मात्र शुद्ध जल से ही अभिषेक किया जाता है।
8. महिलाओं द्वारा जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक न करना - जिनप्रतिमा अहर्हत्-सिद्ध पद का प्रतीक होती है, जब महिला मुनिसंघों से ही सात हाथ दूर रहती हैं; फिर वे अहर्हत्-सिद्ध पद की प्रतीक प्रतिमा को स्पर्श कैसे कर सकती हैं। इसलिये तेरहपंथ परम्परा में महिलाओं द्वारा अभिषेक नहीं किया जाता है।
9. रात में पूजन न करना - रात्रि में जीवों की उत्पत्ति और हिंसा अधिक होती है, अतः घर के कार्यों का भी निषेध किया जाता है; फिर मंदिर में पूजन कैसे की जा सकती है।
- शासन देव को न मानना - शासन देव भी असंयमी और सररागी होने से पूज्य नहीं है।
- पकाआ हुआ अन्न, दाल, चावल या रोटी आदि भगवान को न चढ़ाना - पके हुए अन्न में जीव हिंसा तो होती ही है साथ ही पहले से पके हुए अन्न की मर्यादा भी कम समय की होने से उससे त्रस जीवों का जन्म होने से वह भगवान को चढ़ाने के योग्य नहीं होता है।
- हरे फलों को न चढ़ाना - फूलों की तरह सचित्त फलों को भी भगवान के पूजन में अर्पित नहीं करना चाहिए।
- बैठकर पूजन न करना - बैठकर पूजन करना प्रमाद (आलस्य) का प्रतीक है, इसलिये बैठकर पूजन नहीं करते हैं।
इसके अलावा हम न करना, यक्ष देवी-देवताओं को न मानना आदि अन्य बातें भी इन नियमों में आ जाती हैं।
हम-आप सब भी तेरहपंथ शुद्धाम्नाय को मानने वाले हैं; अतः इन तेरह बातों को जानना और इनका पालन करना हमारा कर्तव्य भी है और हमारा धर्म भी है।
छोटी-सी बड़ी कहानी
आधुनिकता
पैद लगी पत्नी पहले भी एक डिब्बे में घर का देशी घी और पिता मजबूरी से बचाए हुए सौ रुपये लेकर शहर में पढ़ रहे बेटे से मिलने उसके हॉस्टल आ पहुँचे। कमरे पर ताला लगा था। दोनों बरामदे में बैठकर बेटे का इंतजार करने लगे।
अंधेरा होते ही बेटा फिल्मी गाना गाता हुआ कमरे का दरवाजा खोलने लगा। तभी उसकी नजर अपने माता-पिता पर पड़ी। उसने सीधे सवाल दागा - आप लोग यहाँ कैसे? उसका उलझा पूछना ही था कि उसके साथ आई उसकी दोस्त ने पूछा - Who are they?
बेटे ने जवाब दिया - They are my family servant from the village.
अंग्रेजी भाषा से अनजान माँ-बाप की आँखों में खुशी के आँसू थे कि अब हमारा बेटा अंग्रेजी बोलने लगा है।
सफलता का राज
एक बार एक सफल व्यक्ति से एक अन्य व्यक्ति ने पूछा कि आपकी सफलता का राज क्या है?
उसने जवाब दिया - सही निर्णय लेने की क्षमता।
तो उसने अगला सवाल किया कि आपके सही निर्णय लेने की क्षमता कहाँ से आयी?
उसने कहा अनुभव से। व्यक्ति ने फिर अपना अगला प्रश्न दागा कि आपको अनुभव कैसे प्राप्त हुआ?
सफल व्यक्ति का जवाब था - गलत निर्णयों से।
लहर
एक लहर ने दूसरी से पूछा - क्या हम एक दूसरे से टकरा जाएँगे?
दूसरी लहर ने जवाब दिया - नहीं, क्योंकि हम महज लहर नहीं, समुद्र का हिस्सा भी हैं।
Life Mantra
IS IT JUSTIFIED
We write more but learn less.
More effort but less success.
We spend more but earn less.
Plan more but accomplish less.
Fancier house but broken homes.
More convenience but less time.
We are busy more but enjoy it less.
More acquaintances but fewer friends.
Wider freeway but narrow view points.
We have higher incomes but lower morals.
We have bigger houses and smaller families.
We have more degrees but less judgements
We have taller buildings but shorter tempers
We have added years to live not live to years
We have learnt how to make a living but not a life.
We have multiplied our possessions but reduced our values
We have become long on quantity but short on quality
We have conquered outer space but lost inner space.
We have cleaned up the surrounding but polluted the soul.
THREE STAGES OF LIFE
Teens - They have all the time and energy but no money
Workers - They have the money and energy but no time.
Oldies - They all the time and money but no more energy
Lesson - You can have every thing all at once so be
happy with all the things you have at that moment.
If you want to shine like a sun, first burn
like a fire.
LIFE and TIME are the world’s best
teachers. LIFE teaches us to
make good use of
TIME and TIME teaches us
the value of LIFE.
Do not tell the problem is a
difficult one. If it was not
difficult, it would not be a
problem.
जैन धर्म का
कभी सोचा है कि अंदर से सुंदर होने का क्या मायने है? हम अक्सर टी.वी. देखते समय advertisements को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि कुछ पल के वे advertisements ही हमें जिंदगी भर की सीख दे सकते हैं। जैसे कि हम जानते हैं कि ज्यादातर advertisements महिलाओं पर केंद्रित होते हैं और उनमें भी भरमार होती है beauty products की, जो ये दावा करते हैं कि उनके प्रोडक्ट्स आपके चेहरे को सिर्फ बाहर से ही नहीं अंदर से भी साफ करेंगे।
ऐसा ही एक विज्ञापन मुझे याद आ रहा है जो कि एक जाने-माने brand के face wash का विज्ञापन था। वह कुछ यूँ था कि छोटी बहन एक फोटो फ्रेम को साफ करने की कोशिश कर रही है, पर वह साफ नहीं हो पा रहा है। तब बड़ी बहन आ कर उसे फोटो-फ्रेम ले कर उसके अंदर रखी फोटो को निकाल उस पर जमी धूल को साफ करती है और अपनी बहन को समझाती है कि जब तक अंदर से साफ नहीं करोगी, बाहर से साफ कैसे दिखेगा। बस इस विज्ञापन का आशय यह था कि जब तक हमारी स्किन अंदर से साफ नहीं होगी, तब तक बाहर से कितना भी साफ करने या क्रीम-पाउडर लगाने से भी साफ नहीं दिखेगी।
क्या हमारा जैन धर्म भी यही नहीं कहता कि जब तक हम अपने अंदर की बुराइयों को नहीं निकालेंगे और फिर चाहे कितना भी दान-दान या पूजा-पाठ आदि करते रहें, वह धर्म नहीं कहलाएगा।
ये so called beauty products हमारी स्किन के अंदर की गंदगी को साफ करने का दावा करके हमें अंदर से भी सुंदर बनाने का वादा करते हैं, पर वह सिर्फ हमारे शरीर तक ही सीमित रहता है। वे हमारे चेहरे को तो सुंदर बना सकते हैं, पर हमारे मन और सोच को नहीं और अगर चेहरे से सुंदर होना है तो पहले अंदर की सफाई करनी होगी और बाहर से हम अपने आप ही सुंदर हो जाएँगे; क्योंकि असल गंदगी तो हमारे अंदर है, उसे दूर ना कर हम बाहर कितना ही प्रयास क्यों न कर लें, कुछ होने वाला नहीं है।
आजकल है, तीन शताब्दियों पहले चीन में 1400 मील लंबी दीवार बनाई गई थी, ताकि बाहरी शत्रुओं से बचा जा सके। बहुत लंबा समय, बहुत सारा पैसा और बहुत सारे परिश्रम के बाद इसका निर्माण हो पाया था। इस दीवार के पीछे पर चीन अपने आपको सुरक्षित महसूस करता था।
इसके बावजूद कुछ सालों के अंदर ही शत्रु तीन बार चीन के अंदर आने में कामयाब हुए। जबकि न तो चीन की दीवार को कोई नुकसान पहुँचाया गया और न ही उसके दरवाजे को तोड़ने की जरूरत पड़ी। जानने पे, वे सब कैसे संभव हो पाया, क्योंकि हर बार शत्रुओं को ज्यादा कुछ न करना पड़ा, सिर्फ चीन की दीवार के दरवाजों पर नियुक्त चौकीदार को रिश्वत दी और बिना किसी परेशानी के अंदर आ गए।
हमारे सबसे बड़े शत्रु हमारे अंदर ही होते हैं; इसलिए अगर बुराइयों को दूर करना है तो हमारा ध्यान पहले बाहर की ओर नहीं, बल्कि अंदर की कमजोरियों, बुराइयों और गलतियों की तरफ जाना चाहिए; क्योंकि जैसे चेहरे के अंदर की साफ न रखने पर बाहर की बुराई कुछ समय के लिए तो हमारे चेहरे को सुंदर दिखा सकता है पर समय आने पर असलियत सामने आ ही जाती है।
उसीप्रकार हमारा व्यक्तित्व, हमारा आचरण या हमारी सोच को सुंदर बनाना है तो प्रयास हमें बाहर नहीं, बल्कि अपने अंदर ही करने होंगे। हम बाहर से चाहे कितना ही अच्छा बनने का प्रयत्न करें पर समय आने पर असलियत सामने आ ही जाती है।
एक वृद्ध महिला अपनी पोती को बार-बार एक ही टेबल की सफाई करवा रही थी। अच्छे से साफ करने के बावजूद वह महिला संतुष्ट नहीं हो पा रही थी। आखिर में पोती झुंझला कर बोलती है - दादी! टेबल साफ है, धूल आपके चश्मे पर जमी है। आप उसे साफ क्यों नहीं कर लेतीं।
यही हाल हमारा है, हम बाकी सब सुधारने और सुंदर बनाने में लगे हैं, पर खुद के ज्ञान पर लगी धूल पर ही हमारा ध्यान नहीं जाता और फिर सोचते हैं कि सुधारने और अच्छा बनने के प्रयास में आखिर कमी कहाँ है। कमी हमारे अंदर ही है। बस, उसे दूर करना है। शायद यही अंदर से सुंदर होने के मायने हैं।
जैन धर्म का - अंतरंग का सौंदर्य ही वास्तविक सौंदर्य है।
खुशी के पल…!
जैनस्टर्स परिवार नव युगलों को विवाहोत्सव की हार्दिक बधाई देते हुए भावना भाता है कि ये लौकिक मार्ग की उन्नति के साथ-साथ अलौकिक व आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हों।
पवित्र सल्लेखनधारी पारसिल्ला-श्रीमती कमला भारिल्ल के सुपुत्र एवं पंडित श्री शुद्धप्रकाशा भारिल्ल-श्रीमती संध्या भारिल्ल, जयपुर के सुपुत्र सर्वज्ञ भारिल्ल का मंगल परिणय कोलकाता निवासी श्री सुरेश पाटनी-श्रीमती रेणु पाटनी की सुपुत्री बैरी पाटनी के साथ 21 फरवरी 2017 को संपन्न हुआ।
लूणदा (उदयपुर) निवासी श्रीमती किरणदेवी-श्री ललितकुमारजी विकावत के सुपुत्र अखिल जैन का शुभ विवाह सुना निवासी भगवती मंगलदेवी जैन-श्री सुरेशकुमार सारस्वत की सुपुत्री मनुप्रिति जैन के साथ 28 जनवरी 2017 को संपन्न हुआ।
जसवंतनगर निवासी श्रीमती नीता जैन-श्री शिवकान्त जैन के सुपुत्र अन्नकूट जैन का शुभ विवाह आगरा निवासी श्रीमती रेणु जैन-श्री प्रमोदकुमार जैन की सुपुत्री श्वेता जैन के साथ 5 फरवरी 2017 को संपन्न हुआ।
मुंबई निवासी श्रीमती ज्योतिबेन साला-श्री किरणदेवी साला के सुपुत्र देवांग साला का शुभ विवाह कोटा निवासी श्रीमती संध्या जैन-श्री सुरेन्द्रकुमार जैन की सुपुत्री श्रेया के साथ 17 फरवरी 2017 को संपन्न हुआ।
हमारी अनन्य सहयोगी श्रीमती परिणति जैन धर्मपत्नी धर्मपत्नी डॉ. मोहित जैन, विदिशा को 18 जनवरी 2017 को पुत्री-रत्न की प्राप्ति हुई। वह धर्म मार्ग पर चलते हुए मुक्ति रूपी लक्ष्मी का वरण करे - इसी मंगल भावना से जैनस्टर्स परिवार की ओर से हार्दिक बधाई!
जैन संविधान
पुस्तक का नवीन प्रकाशन
- क्या आप जानना चाहते हैं कि आपकी विरासत क्या है?
- क्या आप जानना चाहते हैं कि जैन संस्कृति क्या है?
- क्या आप जानना चाहते हैं कि आपकी अमूल्य धरोहर क्या है?
- क्या आप जानना चाहते हैं कि जैनधर्म का मर्म क्या है?
- क्या आप जानना चाहते हैं कि भारतीय संविधान में जैनतत्वों का समावेश किस प्रकार किया गया है?
तो आइए और पढ़िए श्री प्र. शास्त्री डॉ. स्वर्णलता राकेश जैन, नागपुर द्वारा लिखित पुस्तक ‘जैन संविधान’।
उलझे सवालों के सुलझे जवाब
उलझे सवालों के सुलझे जवाब
प्रश्न - एक तरफ तो खबर में आ रहा है कि मनुष्यों की जनसंख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है और दूसरी ओर कहते हैं कि मानव-जीवन दुर्लभ है। ऐसा क्यों?
उत्तर - यह सही है कि सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जावे तो मनुष्यों की बढ़ती जनसंख्या भी हमारे देश-दुनिया के लिए एक ज्वलंत समस्या है, परंतु फिर भी मनुष्यों की अपेक्षा अन्य जीव-जंतु और कीड़े-मकोड़े अनंत गुणे हैं। इन सबमें जब अनंत बार जन्म होता है, तब कहीं जाकर मनुष्य भव मिलता है। उसमें भी निरोगी देह, लंबी आयु, उच्च कुल और सभी अनुकूलताओं के साथ धर्म रुचि वाले कितने मनुष्य हैं? इस अपेक्षा से मनुष्य भव को दुर्लभ बताया गया है।
प्रश्न - जैनधर्म में ॐ अक्षर का एक विशिष्ट स्थान है, लेकिन ॐ तो अन्य धर्मों में भी माना जाता है; फिर जैनधर्म के ॐ और अन्य धर्मों के ॐ में क्या अंतर है?
उत्तर - जैनधर्म में ॐ में पंच परमेष्ठी को गर्भित मानता है और इसे पूजनीय माना जाता है, जबकि कुछ धर्म में ॐ को ब्रह्मा-विष्णु-महेश का वाचक माना जाता है तो कुछ अन्य धर्म वाले इसे अपने-अपने ईश्वर का वाचक मानते हैं।
प्रश्न - निगोदिया जीव एक श्वास में अठारह बार जन्म-मरण करते हैं तो क्या अठारह बार ही नया शरीर भी धारण करते हैं?
उत्तर - निगोदिया जीव के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है कि वे हर बार ही नये शरीर में जन्म लें। वे पुनः पुराने शरीर में भी जन्म ले सकते हैं और नया शरीर भी धारण कर सकते हैं।
विनयकुमार पांढार
कोलकाता निवासी श्री विनयकुमार पांढार का आकस्मिक निधन 28 जनवरी को 58 वर्ष की आयु में हो गया। उनकी पुण्य स्मृति में धर्मप्रेमी श्रीमती साधना पांढार ने 1100/- की राशि पत्रिका हेतु प्रदान की।
कर लो जिनवर का गुणगान
बारह भावना
(पंडित भूधरादासजी कृत)
अनित्य भावना
राजा राणा छत्रपति, हाथीन के असवार।
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ।।1।।
शब्दार्थ : असवार-सवारी
भावार्थ : राजा, राणा, छत्रपति और हाथियों पर सवारी करने वाले सभी को एक दिन अपनी-अपनी बार मरना है अर्थात् यौवन, मकान, धन-दौलत, पशु, परिवारजन सभी क्षणभंगुर हैं। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु अटल है।
अशरण भावना
दल बल देवी देवता, मात-पिता परिवार।
मरती विरियाँ जीव को, कोई न राखनहार ।।2।।
शब्दार्थ : दल-बल-फौज, विरियाँ-समय, राखनहार-रक्षा करने वाला
भावार्थ : देवी, देवता, माता-पिता, परिवार, फौज आदि कोई भी जीव मरते समय जीव की रक्षा करने वाला नहीं अर्थात् बचाने वाला नहीं है।
संसार भावना
दाम बिना निर्धन दुःखी, तृष्णावश भगवान।
कहे न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान ।।3।।
शब्दार्थ : दाम-रुपया-पैसा, तृष्णावश-इच्छावश, कहे-कहीं भी
भावार्थ : इस संसार में कोई सुखी नहीं है, सब जीव दुःखी हैं, पूरा संसार अच्छी तरह देख लिया। पैसे के बिना गरीब दुःखी है और इच्छा के कारण धनवान व्यक्ति दुःखी है।
एकत्व भावना
आप अकेलो अवतरे, मरे अकेलो होय।
यूं कबहुँ इस जीव का, साथी सगा न कोय ।।4।।
शब्दार्थ : आप-स्वयं, कबहुँ-कभी, कोय-कोई, अवतरे-जन्म लेता है
भावार्थ : संसार में जीव अकेला ही जन्म लेता है और मरता ही अकेला ही है। इस जीव का कभी कोई साथी या सगा नहीं होता है।
अन्यत्व भावना
जहाँ देह अपनी नहीं, वहाँ न अपनो कोय।
घर संपत्ति पर प्रकट ये, पर हैं परिजन लोय ।।5।।
शब्दार्थ : देह-शरीर, पर-दूसरे, लोय-लोग
भावार्थ : इस संसार में कोई भी अपना नहीं है। यह शरीर भी अपना नहीं है। मकान-संपत्ति, परिवार जन आदि सब अपने नहीं हैं, अपितु पर (दूसरे) हैं।
अशुचि भावना
दीपे चाम चादर मढ़ी, हाड़ पींजर देह।
भीतर या सम जान में, और नहीं चित्त मेह ।।6।।
शब्दार्थ : दिप-चमकती है, चाम-चमड़ा, मढ़ी-बढ़ी हुई, गेह-ग्रह।
भावार्थ : हाड़-मांस के ऊपरूनी पींजरे (शरीर) पर चमड़े की चादर चढ़ी हुई है। अतः यह दमकता है, लेकिन इस देह के भीतर ऐसा पूरित पदार्थ है, जैसा संसार में अन्य नहीं है।
आस्रव भावना
मोह-नींद के जोर, जगवासी घूमें सदा।
कर्मचोर चहुँ ओर, सरबस लुटै नहीं ।।7।।
भावार्थ : जगवासी-संसारी जीव, सरबस-सब कुछ, सुख-खबर
भावार्थ : मोह रूपी नींद की अधिकता के कारण संसारी जीव सदा घूमते रहते हैं। कर्म रूपी चोर चारों ओर से सर्वस्व लूटते हैं, मगर जीव को इसकी खबर नहीं है।
संवर भावना
सतगुरु देव जगाय, मोह-नींद जब उपशमे।
तब कछु बने उपाय, कर्म-चोर आवत रुकै ।।8।।
भावार्थ : उपशमे-मंद हो, आवत-आना
भावार्थ : मोह रूपी नींद जब मन्द होती है, तब सद्गुरु के उपदेश से कुछ उपाय करने पर कर्मरूपी चोरों का आना रुक जाता है।
निर्जरा भावना
ज्ञान-दीप तब तेल भर, थोर शोधे भ्रम घोर।
या विधि विनशें निजर्सें, बैठे पूरब चोर ।।9।।
पंच महाव्रत संवरन, समिति पंच प्रकार।
प्रबल पंच इन्द्रिय-विजय, धार निर्जरा सार ।।9।।
शब्दार्थ : घोर-कठोर, पूरब-पूर्व, विनशें-निकलता, प्रकार-पूर्व, संवरण-पालन
भावार्थ : ज्ञान रूपी दीपक में तप रूपी तेल भरकर, सभी भ्रम को छोड़कर घर का शोधन करें, इस विधि के बिना पूर्व में बैठे चोर नहीं निकलेंगे।
पंच महाव्रत व पंच समिति के पालन से और पांच प्रबल इंद्रियों पर विजय से कर्मों का खिंचाव ही निर्जरा है अर्थात् ज्ञान और चारित्र को धारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है।
लोक
चौदह राजू उरग नभ, लोक पुरुष संठान।
भावना
तामें जीव अनादि तैं, भरमत है बिन ज्ञान।।10।।
शब्दार्थ
उरग-नीचा, संठान-संस्थाना, तामें-उसमें, भरमत-घूमता।
भावार्थ
यह लोक ऊँचा चौदह राजू पुरुष के आकार का है। इसमें जीव बिना ज्ञान के अनादिकाल से भटक रहे हैं।
बोधिलब्धि
धन कंचन राजसुख, सबहि सुलभकर जान।
भावना
दुर्लभ है संसार में, एक जथास्थ ज्ञान।।11।।
शब्दार्थ
कंचन-सोना, जथास्थ-सच्चा।
भावार्थ
संसार में धन, संपत्ति, सोना, राजसुख आदि सब सुलभ है; लेकिन सच्चा ज्ञान (आत्मज्ञान) संसार में मिलना दुर्लभ है।
धर्म
जांचे सुर नर रिच सुख, चिन्तित चिन्ता रैन।
भावना
जिन जांचे जिन चिन्त्ये, धर्म सकल सुख दैन।।12।।
शब्दार्थ
सुर-नर-कल्पवृक्ष, जांचे-मांगने, रैन-रात।
भावार्थ
कल्पवृक्ष मांगने पर वस्तु देता है। चिन्तामणि रत्न के चिंतन करने से सुख मिलता है; किंतु बिना मांगे और बिना चिंतन किये ही धर्म सब कुछ देता है।
सोचो, विचारो और करो…
जबसे whatsapp और facebook पर आई हूँ, एक बात मन को उद्वेलित करती है कि कहीं भी एसीसीडेंट होता है या कोई और हादसा होता है तो आज के पढ़े-लिखे और अपने आपको समझदार मानने वाले लोग उन घटनाओं को इस तरह whatsapp और facebook पर पेश करते हैं, जैसे ऐसा करके उन्हें कोई पदुरगी अवार्ड मिलने वाला हो।
एसीसीडेंट में मरे गये बद-नसीब लोगों की तस्वीरें खींच कर जल्द से जल्द दोस्तों को भेजते हैं। इस काम में इतनी होड़ लगी है कि कोई और इसमें पहले यह खबर न पोस्ट कर दे।
जैनियों!
पुरा जीवन तो मशीनी और नाटकीय बनाकर जी रहे हो, कम से कम मौत को तो मजाक मत बनाओ। जीवित को महाफलों की शान बनानी ही दिया, अब मुर्दे का तो मान रखो।
सभी देशों में दुर्घटनाएँ होती हैं, लेकिन कहीं भी उन्हें पेपर्सों…टी.वी. की शोभा नहीं बनाया जाता, सिर्फ भारत में ही ऐसी दुर्घटना और शर्मनाक घटनाओं को उछाला जाता है, इसलिए आज तक तरक्की नहीं कर पाया।
भारतीय संस्कृति में लाश पर रुदन डाला जाता है… लाश को whatsapp या facebook पर नहीं डाला जाता!
जानी-अनजानी बातें…
- दक्षिण भारत का गजलपेट्टूराम् विभाग भी इस बात को स्वीकार करता है कि तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक प्रदेश करीब दो हजार वर्ष पहले दिगम्बर जैनधर्म की संस्कृति, उनके अनुयायी और साहित्य के वैभव से भरे हुए थे।
- क्या आप जानते हैं की मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य तो जैनधर्म के अनुयायी थे ही, परंतु नंदवंश को पराजित करने में मौर्यवंश की सहायता करने वाले और राजनीति और अर्थशास्त्र के विद्वान चाणक्य भी जैन थे और उन्होंने भी चंद्रगुप्त के समान दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण की थी।
- तीर्थंकर भगवान का समवशरण कई धनुष ऊपर होता है, परंतु मुक्त होने और सिद्ध दशा प्राप्त करने के पूर्व समवशरण विरहित हो जाता है और तीर्थंकर भगवान पुनः जमीन अथवा पद्मादि पर जाकर योग निरोध (शेष कर्मों का क्षय) करते हैं और इस तरह से भूमि से ही मुक्त होते हैं न कि समवशरण से।
वाणी सर्वज्ञ की
- पुराणों होइ विहंगो विहवेण मओ मरणो मोह मोहो।
महु-माहव्व य पावं ता पुणो अणुअ मा होउ।।
पुण्य से जन्मादि वैभव का होता है, वैभव से अभिमान, अभिमान से बुद्धि भ्रम होता है, बुद्धि भ्रम के होने से पाप लगता है, इसलिये पाप करने वाला ऐसा पुण्य हमें होवे ही न।
- पम्मायकाहा, गाथा 60
- क्रिया सदैव सफलता यदा जानाति भवेत्।
वाणप्रणिधानरचनायां किमु लक्ष्यं चिन्यलो।।
ज्ञान सहित क्रिया ही सफल होती है। अंधे व्यक्ति द्वारा छोड़ा गया बाण क्या कभी लक्ष्य को भेद सकता है? - स्वभावो न हि वार्यते।
किसी भी द्रव्य का स्वभाव कभी बदला नहीं जा सकता।
- शत्रुघ्नमहावीर्य, अध्याय 10, श्लोक 51
- मेरी आयु बहुत लंबी है, हाथ-पैर वगैरह सब अंग खूब मजबूत हैं। यह लक्ष्मी भी मेरे घर में है तो फिर मैं व्यर्थ में व्याकुल किसलिये होऊँ? आगे जब मैं वृद्ध हो जाऊँगा, तब मैं निश्चिन्त होकर खूब धर्म करूँगा।
खेदा है कि इस बात का इस प्रकार का विचार करते-करते यह मूर्ख जीव काल का ग्रास बन जाता है।
- पद्मनन्दी पंचाशिका 1/170
- धन, परिजन, स्त्री, भाई और मित्र आदि में से जो इस जीव के साथ जाता है - ऐसा यहाँ एक भी कोई भी नहीं है। फिर भी जीव विवेक से रहित होकर उन सबके विषय में तो राग करता है, किन्तु उस धर्म को नहीं करते, जो कि जाने वाले के साथ जाता है।
- सुभाषित रत्नसंदोह-9
शब्द शक्ति
शब्द शक्ति
मंत्र - मन धातु में प्रत्यय द्वारा मंत्र शब्द की उत्पत्ति होती है।
मन्यते ज्ञायते आत्माऽनेन इति मंत्रः - अर्थात् जिसके द्वारा आत्मा का निजत्व जाना जाय, उसे मंत्र कहते हैं।
अथवा मन्यते विचार्यते आत्माऽनेन इति मंत्रः अर्थात् जिसके द्वारा आत्मा पर विचार किया जाये, उसे मंत्र कहते हैं।
अथवा मनने संचिन्तने परमपदे स्थिता आत्माः- वा यस्याऽनिशं ध्यान-येन इति मंत्रः अर्थात् जिसके द्वारा परम पद में स्थित आत्माओं का ध्यान किया जाये, उसे मंत्र कहते हैं।
जो गुप्त रूप से कहे जाये, उन्हें भी मंत्र कहते हैं।
आने और भी है…
आपकी इच्छा से…
यदि आपके हाथों में हुनर व कला का, तो आप अपने चित्रों को हमारे साझा कर सकते हैं और सर्वश्रेष्ठ चित्रों को पत्रिका में स्थान मिलेगा।
आपकी कला से…
इस पत्रिका में आपके लेखों, कविताओं और कहानियों के लिए भी स्थान है। भेजिएगा जरूर।
स्वागत आपके…
यदि आपके मन में कोई सवाल तो हमसे पूछिए और हम आपको समाधान दिलाएंगे इस विषय के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा।
आपकी गवाही…
आइए, अब हम जानते हैं जैन इतिहास के महापुरुषों/विद्वानों को, ताकि उनके जानकर हम उन पर तथा अपने जैन धर्म पर गर्व कर सकें।
जब मुझे मिली प्रेरणा…
आप हमें साझा कर सकते हैं अपने जीवन के उस अनुभव को, जो आपको प्रेरणा दे गया हो और बन गया हो जीवन का टर्निंग प्वाइंट।
अच्छी खबर…
हम आपको समय-समय पर निश्चित ही अपडेट करते रहेंगे कुछ अच्छी खबरों के द्वारा।
क्योंकि हेल्थ भी जरूरी है…
हमारे बहुत-से पाठकों का प्रश्नप्रकार का whatsapp मैसेज अक्सर आया होगा और हमने बिना इसकी प्रामाणिकता जाने बहुतों से इसे फॉरवर्ड भी किया होगा; पर इस मैसेज के पीछे का सच क्या है, आइये जानते हैं-
दरअसल टूथपेस्ट के पिछले सिरे पर पट्टी के रंग का टूथपेस्ट के अंदर की सामग्री में कोई लेना-देना नहीं है। जी, हाँ सही पढ़ा आपने! वास्तव में उन रंगी हुई पट्टियों को colour marks या eye-marks कहा जाता है जो कि सामग्री उत्पादन की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। मशीन के द्वारा गति से पैकेजिंग के दौरान लाइन बीम से दिखाई दे सकें; इसलिये टूथपेस्ट की निचली पट्टी के ये अलग-अलग रंग प्रदर्शित करते हैं कि अमुक सामग्री जिस पैकेट में है, उसकी पैकेजिंग कैसे की जाये, कट या फोल्ड करके अलग-अलग रंग के ये निशान यह सुनिश्चित करते हैं कि पैकेजिंग के दौरान प्रत्येक पैकेट को कैसे सील करना है। साथ ही इन रंगों के निशान मशीन को कितने भाग में यह भी बताना है कि पैकेट में लोगो वाला हिस्सा उस स्थान पर है और बाकी जानकारी वाला पीस की ओर। जरूरी नहीं है कि आपको टूथपेस्ट के पैक पर ये ही रंग के निशान मिलें, इनके अलावा अन्य रंग का प्रयोग भी हो सकता है और किसी भी रंग का निशान न मिले, ये भी हो सकता है। टूथपेस्ट के ये colour code सिर्फ पैकेजिंग में सहायक होते हैं और अलग-अलग प्रकार के रंग अलग-अलग प्रकार की पैकेजिंग का ज्ञान कराते हैं, न कि उनके अंदर प्रयोग की गई सामग्री का electric machine में पता लगाने के कारण इसे electric eye कहा जाता है।
यद्यपि टूथपेस्ट में प्रयोग की जाने वाली सामग्री के बारे में जानना भी जरूरी है, पर ये रंगी हुई पट्टियाँ इसमें कोई मदद नहीं कर सकती और उसकी जानकारी के लिए हमें इंग्रीडिएंट्स की लिस्ट पर ही निर्भर करना होगा।
बिखरे मोती
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति सः बान्धवः।।
उत्सव के समय में, संकट काल के समय में, अकाल हो चाहे राज्य में विपदा आवे, न्याय के लिये राजद्वार जाना हो या श्मशान जाना हो, हर परिस्थिति में जो हमारे साथ रहे; वही हमारा सच्चा भाई और मित्र है।
मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा चाहे।
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलजार होता है।।
दुख आने पर शोक नहीं, शोध करें कि वह आया कहाँ से है!
विचार करके काम करना बुद्धिमानी है, काम करके विचार करना मूर्खता।
अच्छे दिन आने वाले हैं -
अष्टानिका पर्व
5-12 मार्च, 2017: फाल्गुन शुक्ल अष्टमी-
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, वीर निर्वाण संवत् 2543
उपकार दिवस : पूज्य गुरुदेव श्री की 128वीं जन्म जयंती
तिथि - वैशाख शुक्ला द्वितीया, दिनांक 28 अप्रैल 2017
अध्यात्म क्रांति के सूत्रधार हे गुरुवर! हों शत-शत प्रणाम !
सत्य का अनुसंधान कर उसे अपने जीवन में उतारने वाले पूज्य गुरुदेव श्रीकानजी स्वामी की जन्म जयंती मनाने का शुभ अवसर आने वाला है। इस युग के महान व असाधारण व्यक्तित्व पूज्य गुरुदेव श्री का ही उपकार है, जिन्होंने धर्म के वास्तविक स्वरूप से हमारा परिचय कराया। पूज्य गुरुदेव श्री जन्म जयंती के उपलक्ष्य में हम उनके व्यक्तित्व से परिचित हों और जिस आध्यात्मिक क्रांति के वे सूत्रधार रहे, वही मार्ग हम भी अपनायें और उनके अद्भुत जीवन से प्रेरणा लें।
गुरुदेव श्री की अन्तर्दृष्टि जानने के लिए अवश्य पढ़ें अगला अंक।
जिंदगी की रेस में दौड़कर करना क्या है?
यही जीना है यारों, तो फिर मरना क्या है?
पहली बारिश में ट्रेन छूटने की फिक्र है
भूल गये भीगते हुए फिसलना क्या है?
सीरियल के सारे किरदारों के हाल तो हैं मालूम।
पर माँ का हाल पूछने का पल ही कहाँ है?
अब रेत पर नंगे पाँव टहलते क्यों नहीं?
टी.वी. पर इतने चैनल हैं फिर भी मन बहलते क्यों नहीं?
मोबाइल, लैंडलाइन सब की भरमार है।
पर जिगरी दोस्तों तक पहुँचे कहाँ ऐसे तार हैं?
जिंदगी की इस दौड़ में दौड़कर करना क्या है?
यही जीना है यारों, तो फिर मरना क्या है?
EVIL/GOOD
An old man told his grandson, "my son, there is a battle between two wolves inside us all the time,
One is EVIL,
It’s anger, jealousy, greed, resentment, lies and ego.
The other is GOOD.
It’s joy, peace, hope, humanity, kindness and truth.
The boy thought about it and asked: “Grand pa, which wolf wins?”
The old man quietly replied: “the one you FEED.”
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3036.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है