उत्तम क्षमा धर्म (दसलक्षण Ratnakarand shravakachar) - जैन स्वाध्याय सामग्री | Uttam Kshama Dharm (Daslakshan Ratnakarand shravakachar)

उत्तम क्षमा धर्म (दसलक्षण Ratnakarand shravakachar)

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

अनुक्रमणिका

उत्तम क्षमा धर्म

जिसके उत्तमक्षमा होती है, उसका
नरक - तिर्यंच दोनों गतियों में
गमन नहीं होता है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम क्षमा धर्म

उत्तमक्षमा तीनलोक में सार है।
उत्तमक्षमा संसार समुद्र से तारनेवाली है,
रत्नत्रय को धारण करानेवाली है, दुर्गति
के दुःखों को हरनेवाली है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम मार्दव धर्म

मान कषाय तो संसार का बढ़ाने
वाला है, किन्तु मार्दव संसार
परिश्रमण का नाश करने वाला है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम मार्दव धर्म

आत्मा और मान कषाय के भेद को
अनुभव करके मान को छोड़ना
उसका नाम मार्दव गुण है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम आर्जव धर्म

आर्जव का अर्थ सरलता है। मन-
वचन-काय की कुटिलता का
अभाव वह आर्जव है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम आर्जव धर्म

कुटिलता छोड़कर कर्म का क्षय
करने वाला आर्जव धर्म धारण करो

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम शौच धर्म

यदि अपनी आत्मा की पवित्रता चाहते हो
तो अन्याय का धन मत ग्रहण करो, अभक्ष्य
भक्षण नहीं करो, परस्त्री की वांछा नहीं
करो। शौचधर्म तो परमात्मा के ध्यान से
होता है। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य
तथा अपरिग्रह से शौचधर्म होता है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम शौच धर्म

शौचधर्म तो आत्मा को उज्ज्वल करने से
होता है। आत्मा लोभ से, हिंसा से अत्यन्त
मलिन हो रहा है, अतः आत्मा के लोभमल
का अभाव होने से शुचिता होगी।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम सत्य धर्म

सत्य से सभी आपत्तियों का
नाश होता है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम सत्य धर्म

सत्य सहित ही अणुव्रत - महाव्रत
होते हैं। सत्य के बिना समस्त व्रत,
संयम नष्ट हो जाते हैं।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम संयम धर्म

संसार में दुःखी जीवों का संयम
बिना कोई अन्य शरण नहीं है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम संयम धर्म

संयम बिना हमारे मनुष्य भव की एक
घड़ी भी नहीं व्यतीत हो, संयम बिना
आयु निष्फल है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम तप धर्म

इच्छा का निरोध करना वह तप है।
तप चार आराधनाओं में प्रधान है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम तप धर्म

कर्मों का संवर तथा निर्जरा करने
का प्रधान कारण तप है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम त्याग धर्म

समस्त दुःख दूर करने में एक
त्यागधर्म ही समर्थ है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम त्याग धर्म

परिग्रह के बंधन में बंधे जीव परिग्रह के
त्यागने से ही छूटकर मुक्त होते हैं। अतः
त्यागधर्म धारण करना ही श्रेष्ठ है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम आकिंचन्य धर्म

अपने ज्ञानदर्शनमय स्वरूप के बिना
अन्य किंचिन्मात्र भी मेरा नहीं है, मैं
किसी अन्य द्रव्य का नहीं हूँ- ऐसे
अनुभव को आकिंचन्य धर्म कहते हैं।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम आकिंचन्य धर्म

समस्त धर्मों में प्रधान धर्म आकिंचन्य
ही मोक्ष का निकट समागम कराने
वाला है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

समस्त विषयों में अनुराग छोड़कर ब्रह्म
जो ज्ञायक स्वभाव आत्मा उसमें चर्या
अर्थात् प्रवृत्ति करना वह ब्रह्मचर्य है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)


उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

ब्रह्मचर्य बिना व्रत-तप समस्त निस्सार हैं
ब्रह्मचर्य बिना सकल कायक्लेश निष्फल है।

पं. सदासुख दास जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी की टीका)

अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3071.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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