राजा
अनुक्रमणिका
नाटक - स्वयंबर
पात्र
१. राजा मुक्तिप्रिया (स्वयंप्रभा) - माता
२. राजा की पुत्री मुक्ति - पुत्री - नायिका
३. मुक्ति की सखी - सखी
४. अ. ब. स. द. - सैनिक
५. देवपूजराज - देवपूजराज
६. बाहुबलराज - बाहुबलराज
७. तपराज - तपराज
८. दानराज - दानराज
९. क्षुल्लकराज - क्षुल्लकराज
१०. केवलराज - केवलराज
राजा - अहो कैसे कहूँ कि पुत्री मुक्ति विवाह योग्य हो गयी है, पर उसके लिए योग्य कोई योग्य पुरुष, राजकुमार दिखाई ही नहीं देता। क्या वसुंधरा पुरुष वीरों से खाली हो गयी है? १ कि जो मेरी पुत्री का वरण कर सके।
क्षुल्लकराज को छोड़कर बाकी सभी राजा गण एक साथ कहते हैं
राजा - राजन हम हैं वीर, हम वरणें आपकी पुत्री मुक्ति को
राजा - तो ठीक है, एक-एक करके आप अपनी-अपनी विशेषताओं को प्रकट करें, जो मुक्ति जिसको योग्य समझेगी उसकी ही गले में वरमाला डाल देगी। क्यों वही ठीक है न
मुक्ति - जी पिताजी जैसा आप योग्य समझो
देवपूजराज
देवपूजराज - महाराज मेरा नाम देवपूजराज है, मैं पिछले ५० वर्षों से देवपूज करता हूँ। अपनी आवाज में, पुर्तगीज के जबक में पूजा न करके मैं कुछ नहीं करता, मैंने पूजन के कई बड़े अनुष्ठान भी किये हैं, मैंने जैन में कई विधान और पंच कल्याणक किये हैं, यहाँ तक कि मैंने प्रत्येक वर्ष को पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन की ही शनिवार के मुक्तिसुखनाथ में से से देवालय का गुणायमान किया है। मुक्ति अब! मुक्ति मेरी ही पूजा कर चाहिए।
मुक्ति - राजकुमार अभी तो आपको सच्चे अर्थों में अपना परिचय ही नहीं आप अपनी ज्ञानरूपी तत्व है और आप आप कभी रूप सुरूप ही नहीं। परिचय देते हैं आप मेरे योग्य क्यों? दूसरे आपकी पूजन योग्य कहा या जिन कहा कुछ नहीं कहा। आप दिन विशेष से तीर्थंकरों में देवारा किया, आपके ज्ञान में है नहीं कि किसी तीर्थंकरों को किसी को अपने आप किसी को कहे में सभी तत्व का संयमता कभी धर्म का परिपाटी है। अब आप मुझमें करे
अध्ययनराज
अध्ययनराज - राजन मुक्ति मेरी ही योग्य है क्योंकि मैं अध्ययन शाला
अध्ययन करूंगा रहा मैंने ग्यारह अंग और नौ पूर्व पढ़ लिए हैं मैं किसी को कोई भी प्रश्न का जवाब दे सकता हूँ, आज कोई भी मेरी टक्कर में नहीं लगता, मेरा कायोपशम अद्भुत है, कोई भी मुझ से शास्त्रीय नहीं समझ, मैंने घटखंडागम पढ़ा है, राजन मैंने अपना टीकायें पढ़ी हैं मैं तत्त्वार्थसूत्र की टीकायें के दृष्टांत भी की है, राजन मुक्ति से कहो कि वह मुझे वरण करे
मुक्ति - अध्ययनराज बड़ी गर्व है आपको अपने कायोपशम पर जिन आगम ग्रंथों की टीकाएँ आपको याद है वह तो आपके कायोपशम से है और भविष्यकाल का फल कहते हैं वह कहते हैं कि वह हमें तो स्वयं के टीकाएँ पढ़ा है और कुछ नहीं और यदि जीव का विशेषण जाना है तो उपमान में डॉक्टर के आलोक से ही जाना है। अब विशेषण में अच्छे को नहीं और हम अपने कायोपशम पर ही मोहते हैं, वह कर्म की अपेक्षा रखता है और उपक्रम के लिए वह शास्त्रार्थ की आवश्यकता नहीं है। कृपया कर अभी आप चुप हो जाएँ, मैं आपको नहीं।
वीरराज - जैसा राज - मुक्ति सत्य कहा उन्होंने आपमें और पद पर करें के करे है मैं, मेरा जीवन मैंने में छहकाय के जीवों की किंचित विराधना नहीं करा, मैं पानी छानकर ही पीता हूँ, मर्यादित खान पान करता हूँ, मैंने इंद्रियों पर विजय पाली है मैं सर्दी या गर्मी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, मैंने भारी गर्मी में पहाड़ों पर खड़े रहकर साधना की है। इस कारण कि मुक्ति मुझे मिलेगी। आओ मुक्ति मुझसे मिल जाओ तुम।
खास - मैंने शरीर को कष्ट नहीं दिए।
मुक्ति - राजकुमार संजयराज आप भूत रहे हैं, आप पहाड़ों में भारी का आप कांत दिव्य पर्याय भी नहीं है, उसे होने वाले कार्य में मेरा कुछ भी नहीं है। एक नाम स्वयंप्रभा, पर आप तो शरीर के कार्य से ही अपनी महानता को रहे हैं। अब करें और नहीं।
तपराज
तपराज - राजन पूर्व राजकुमारों को अवश्य यह योग्य है, आप मेरी तरफ लक्ष्य दें। मैंने छह-छह माह के उपवास किये, मैंने बीस वर्ष से नमक नहीं खाया, मुक्ति मैंने विविध प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए भोजन लिया, भोजन में कोई कमी हुई तो फिर प्रायश्चित्त लिया और मैंने दुनिया को दिखा दिया कि मैं कितना बड़ा तपस्वी हूँ। मैंने अपने तप के प्रभाव से कई चमत्कार किये हैं, दुनिया में लोग मेरा लोहा मानते हैं। कई वर्षों से मैंने दोस्ती कर रखी है, आप कुछ भी भाषा पढ़ावें।
मुक्ति - राजन बड़े ही अज्ञानी हो, तुमने चमत्कार की खबर नहीं ली है दुनिया के जड़ चमत्कार के प्रसिद्धि पर तुम की बुद्धि बनी हुई है, मुक्ति जड़ चमत्कार से प्राप्त नहीं होती यह बात मैं सुनकर आप कभी मुक्ति को नहीं पा सकते। बड़े उपवास रखकर आपने काफी मान कमाया है और प्रशंसा प्राप्त की, उन उपवास के पुण्य से आपने सही जगह ले लिया अब आपके पास क्या बचा है जो मुक्ति को।
दानराज
दानराज - मुक्ति मेरी सुनो, राजन आप भी सुनो मैंने मुक्ति को पाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। मैंने बड़ी-बड़ी धर्मशालायें बनवायी मैंने औषधालय खुलवाये, मैंने स्कूल कॉलेज खुलवाये, लोग मानते हैं कि मैं क्या हूँ? और राजन आप कहें तो मैं अपनी धर्मशाळा के निमित्त में कुछ मदद करूँ। मैं पंच कल्याणक में २३ लाख रुपयों की बोली में सोधो के द बना था, सभी पर बैठकर मैं नगर में घूमता था, लोग वाह-वाह कर उठे, मुक्ति प्रसन्न होकर वरमाला मुझे डालो आपके लिए मुक्ति का समय आ गया है।
मुक्ति - रे पापी, हमी पर बैठकर अपनी मान प्रतिष्ठा कराकर तू क्या सोचता है धर्मात्मा है। मुझे अरे राजकुमार अभी बुद्धि विकसित कर सोचो कि एक पीढ़ी पैदा जब जो कि कुछ भी विचारों में हमारा उदय है, उपर्बल अपना बड़प्पन इसका नाम दान है। अब इसका मान का त्याग कर, मुझे प्राण का ही मान कर लिया। और मुक्ति को ले आओ।
संवाद
राजम - लगता है पृथ्वी पुरुषार्थी वीरों से रहित हो गयी है, बेटा मुक्ति तुम्हारे निर्णय से मैं सहमत हूँ, पर क्या तुम्हारा स्वर्यवर अवरुद्ध हो जायेगा। अरे राजकुमार आप तो शांत बैठे हैं आपने अपने बारे में कुछ नहीं बताया,। कहिये आप भी तो कुछ कहिये।
ध्रुवतबराज - राजन क्या कहूँ। जगत् में कुछ ऐसा लगता ही नहीं जिसमे चिन्त रंजायमान हो। पर द्रव्य में एकत्व या कर्ततत्व हीदु! का कारण है। अता ज्ञायक स्वभाव से हटने का परिणाम ही नहीं होता, जबसे तब निर्णय हुआ है, हेय, झ्थ, उपादेय रूप बुद्धि हुई है, तबसे है स्वभाव में ही रस आता है, हालांकि जब स्वभाव की स्थिरता टूटती तो देवपूजा, दान, संयम आदि का भी भाव आता है, पर कमजोर क्या करने लायक होती है? नहीं राजन अस्थिरता जेन्य पुरुषार्थ मे होने वाले कार्य शुभ वेध के कारण है जोकि संसार को ही बढ़ाते है उनसे मेनी शोभा कैसी? अता राजन मैं शांत हूँ। राजन क्या कहूँ देखो तत्व विचार की महिमा, तत्व बिचार रहित
मुझे मेरे, पर मिल गईने
मुक्ति - पिताजी मैं तो धुन तब्बराण मही वरण करूंगी
ध्रुवतवरण - पर मुक्ति मुझे तुम्हें वरण करने का भी राग नहीं है, मेरी हस्टितो ध्रुपस्वभाव पर ही है, पर्यास का मैं मुक्त स्वरूप ही अनुभवता हूँ। मेरी दृष्टि मुक्ति पर्याय पर भी नहीं है
मुक्ति - पर धुन मेरा, आश्रय तो त्रिकालीष्युपही है। मैं भी कहा अपने को पर्याय अनुभव करती है, मैं भी तो धुनहूँ. और ध्रुव में ही समा जाना चाहती हूँ, आओ ध्रुवहम एक हो जायें।
और दोनो गले लग जाते है
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2439.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है