पुष्प का फल
सम्पादकीय
मानव का जीवन नदी की धारा की तरह है। कभी तेज गति कभी मन्द गति, कभी उतार कभी चढ़ाव। कभी सरल सीधी चाल कभी सर्प की तरह वक्र गति, सुख, दुख, पुण्य, पाप, हर्ष, विषाद का धूप छांही खेल ही जीवन का क्रम है।
जो इस खेल में खिलाड़ी की तरह स्वस्थ मन, स्वस्थ चित्त बना कर खेलता है उसका जीवन सफल हो जाता है। पुण्य पाप में व्यक्ति दुखी, सुखी होता है। आज का मानव धीरज खो बैठा है प्रतीक्षा नहीं करना चाहता वह तो तुरन्त फल चाहता है।
मानव को अच्छे कार्य करने चाहिए जिससे स्वयं सुख की अनुभूति कर सके तथा दूसरे की सुख की अनुभूति करेगा तो पुण्य को प्राप्त करेगा।
जैन चित्र कथाएँ
जैन चित्र कथा
आशीर्वाद
परम पूज्या गणिनी सुपार्श्वमती माता जी
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला
कृति : पुण्य का फल
© : सर्वाधिकार सुरक्षित
सम्पादक : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
शब्दांकन : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
पुष्प नं : 42
मूल्य : 20.00
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड़
जिला गाजियाबाद (उ.प्र.)
: 914-600074
: S.T.D. 0575-4600074
राजगृह में धनमित्र नाम का एक सेठ रहता था। उसकी पत्नी का नाम धारिणी था।
पुण्य का फल
चित्र-वनसिंह
सी.एम.राजदत्त
विजय, ओझाश्री
अक्षर शरद
उसके एक पुत्र था - दंत।
इसी प्रकार भूमिगृह नामक नगर में आनन्द नामक एक क्षुद्रश्र रहता था। उसकी पत्नी का नाम चित्रमती था।
इनकी कन्या का नाम-वीरमती था, जो अत्यन्त सुन्दर थी।
जैन चित्रकथा
धनमित्र के बेटे दत्त का विवाह वीरवती के साथ हुआ।
कुछ समय बाद दत्त रत्नद्वीप में व्यापार करने चला गया।
वीरवती अपने माता-पिता के घर रहती थी।
वहाँ मारक नामक एक चोर रहता था। वह अत्यन्त सुन्दर था।
पुण्य का फल
एक दिन उसने वीरवती को देखा। वीरवती की सुन्दरता पर वह मुग्ध हो गया।
वीरवती ने भी मारक को देखा। उसे भी मारक से प्रेम हो गया।
मारक और वीरवती अक्सर मिलने लगे।
कुछ समय बाद सेठ दत्त रत्नद्वीप से धन कमाकर लौटा।
वीरवती मेरी पत्नि वीरवती यहाँ नहीं कैसी है? क्यों न पहले ससुर सास से उसका कुशल हाल पूछूँ?
वीरवती तुम क्या करते हो, इससे मुझे क्या लेना देना। मैं तो तुमसे प्रेम करती हूँ।
उसके पास बहुत धन था।
जैन चित्रकथा
दत्त मैंने इतना धन कमाया है। इससे मैं सुख शान्ति से भी कुछ वर्ष अवश्य मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी।
सेठ दत्त का रास्ता में एक जंगल पड़ा।
इस जंगल में सहस्रभट नामक एक घोर रहता था।
सेठ दत्त उस जंगल से गुजरा तो सहस्रभट ने उसे देख लिया।
सहस्रभट ये कोई सेठ है। इसके पास अवश्य ही धन होगा। मुझे इसका पीछा करना चाहिए।
सहस्रभट चोर, सेठ दत्त के पीछे-पीछे छिपकर चलने लगा।
पुण्य का फल
सहस्रमेट पीछा करते-करते नगर में आ गया पर सेठ दत्त का लूटने का मौका न मिला।
इतने बड़े सेठ का मुँह नहीं छोड़ा। इस पर नजर रखनी होगी कभी न कभी तो मौका मिलेगा।
सेठ दत्त अपनी ससुराल पहुँचा। वहाँ उसका खूब स्वागत हुआ।
तो ये अपनी ससुराल आया है। चलो, कभी तो अपने घर अयोध्या-तब देखेंगे। किन्तु घर में भी तो मौका मिल सकता है। क्यों न इस पर यहीं से नजर रखूँ?
जैन चित्रकथा
सेठ दत्त से वीरमती भी बड़ी प्रसन्नता से मिली।
वीरमती क्या बात है वीरमती? तुम उदास क्यों हो नहीं? मेरे आने से प्रसन्न नहीं हुई?
वीरमती नहीं तो।
वीरमती मेरा दुख था, सो कल्पना पड़ा।
अचानक वीरमती का चेहरा उदास हो गया।
किन्तु वीरमती के मन में तो कोई और ही दुख था।
वीरमती अरे! इतने सुन्दर रत्न पाकर भी तुम प्रसन्न नहीं हुए?
वीरमती देखो! तुम्हारे लिए कितने बहुमूल्य रत्न लाया हूँ। इन्हें पहनने से तुम और सुन्दर लगोगी।
पुण्य का फल
वीरमती ने नकली मुस्कान दिखाकर सेठ दत्त को समझा दिया कि वह प्रसन्न है।
वीरमती के नकली व्यवहार से सेठ दत्त प्रसन्न हो गया। उसे क्या पता था कि वीरमती के मन में कौन सा दुख है।
वीरमती के दुख का कारण था- मारक चोर, जिससे वह प्रेम करती थी। मारक एक रात चोरी करते पकड़ा गया।
अगले दिन राजदरबार में-
महाराज महाराज की जय हो! हमने आज मारक चोर को पकड़ लिया है। ये बड़ा ही चतुर चोर है।
जैन चित्रकथा
इसने सैकड़ों चोरियाँ की हैं, महाराज! अब तक हमारी आँखों में धूल झोंककर भागता रहा।
किन्तु आज ये चंदन सेठ के घर में घुसा। हमने वस्त्रागार में छुपकर इसे देखा। आज भी हमारे सिपाही उधर ही निकले।
हमारे सिपाहियों ने इसे दबोच लिया। इसकी हठधर्मी दिनों दिन बढ़ती जा रही है। इसने सबको परेशान कर रखा है।
ठीक है। इसे प्राण दण्ड दिया जाता है। इसे सूली पर चढ़ा दो।
महाराज! ये बड़ा ही खतरनाक चोर है। इसे छोड़ा न जाय। इसे कठोर से कठोर दण्ड दिया जाय।
पुण्य का फल
उधर वीरवती के मारक के पकड़े जाने का दुःख था।
सुना! वीरवती राजा ने मारक को सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया है।
क्या? निर्दयी राजा को तरस न आया कि ऐसे ताकतवर, जवान आदमी को सूली पर चढ़ा रहे हैं!
पर कैसे सखि! राजा के सिपाही यूँही न मिलेंगे।
तुकबंदी, मैं इसकी मदद करूँगी।
तू किसी तरह उसकी मदद कर।
जैन चित्रकथा
लेकिन मैं जिसकी पत्नी हूँ, वो सेठ दत्त भी आज ही आ गया है। उसे भी आज ही जाना था।
मैं दत्त की परवाह नहीं करती हूँ। इसे तो तुम पहले ही वश में कर रखा है। इसकी तेरे बारे में सन्देह न करना।
वीरवती सारे दिन विचलित रही।
तुम कुछ परेशान हो क्या?
क्या हो गया है आपको? जैसे आप हैं, वहीं मुझे जा रहे हैं कि परेशान हो। मुझे कुछ भी नहीं पता है।
उधर रात होते ही मारक को सूली पर चढ़ा दिया गया।
हाँ! कैसे सब लोग सोए और मैं अपने प्रेमी के साथ से आकर लिपट आई।
नाराज न हो। ठीक है, जो हो सके, वही होगा।
पुण्य का फल
पुरुष अरे! मैं क्या देख रहा हूँ? अपने पति को छोड़कर तलवार लिए वह कहाँ जा रही है?
पुरुष मुझे इस रहस्य का पता लगाने के लिए इसके पीछे चलना होगा।
पुरुष आगे-आगे तुम्हारे वाली वीरवती को लगा कि कोई पीछा कर रहा है।
वीरवती वीरवती को लगा कि कोई पीछे आ रहा है।
वीरवती कौन है? पर यहां तो कोई नहीं है!
अचानक वीरवती ने पीछे की ओर करके तलवार चला दी, जिससे पीछे आ रहा यह सम्राट वीर की उँगलियाँ कट गयीं, पर उसने उफ़ तक नहीं की।
जैन चित्रकथा
वीरवती वीरवती को फिर संदेह हुआ कि कोई आ रहा है, किन्तु अँधेरे में कुछ भी देख सकी नहीं।
वीरवती वीरवती फिर अँधेरे में आगे बढ़ी तो सामने ही श्मशान था जहाँ गारक को सूली पर चढ़ाया गया था।
वीरवती वीरवती सूली पर चढ़े गारक के पास पहुँची तो देखा कि वह
वीरवती अरे! ये तो पलक कंपकंपा रहा है। ये तो ज़िंदा है। मुझे तुरन्त इसे बचाने का प्रयत्न करना चाहिए।
गारक नहीं प्रिये! मुझे बचाने का प्रयत्न व्यर्थ है। अब मैं श्मशान-घाट न करूँ। मैं कुछ ही पल का मेहमान हूँ। मेरी तुम्हें यह अंतिम भेंट है।
पुण्य का फल
एक पेड़ के पीछे छिपा सहस्रभट यह दृश्य देख रहा था।
गारक देर मत करो प्रिये! आओ, अपने मुख और कान मुझे दो और सूली बनाओ।
किन्तु गारक तो सूली पर, अमर था। यहाँ वीरवती कैसे पहुँचे? तब वीरवती ने वहाँ पड़े मुर्दों को उठाकर एक के ऊपर एक रखा।
अब वह मुर्दों पर चढ़कर गारक के मुख के पास पहुँच गयी। गारक ने उसके मुख का चुम्बन किया।
जैन चित्रकथा
अचानक एक मुर्दा लुढ़का और वीरवती गिर गयी किंतु उसके होंठ कट गए।
अपने कटे हुए होंठ वाले मुंह को कपड़े से छिपाकर वीरवती वहाँ से भागी।
सहस्रमट फिर उसका पीछा करने लगा।
वीरवती घर आयी और अपने पति के पास खड़ी होकर चिल्लाने लगी।
वीरवती ढोंड़ी-ढोंड़ी इस पापी ने मेरे होंठ काट लिए।
पुण्य का फल
वीरवती की चिल्लाहट सुनकर आस-पड़ोस के लोग आ गए और उन्होंने सेठ को बाँध लिया।
सवेरा होने पर सेठ दंत को राजा के सामने पेश किया गया।
महाराज इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के होंठ काट डाले हैं।
वीरवती हाँ, महाराज! यह बहुत दुष्ट है। इसने मेरे होंठ काटकर मेरी सुंदरता बिगाड़ दी है।
राजा तब तो ये बहुत बड़ा अपराधी है। ठीक है। ले जाओ इसे। सूली पर चढ़ा दो।
जैन चित्रकथा
सहस्रमट राजदरबार में सूखे कपड़े पहनकर उपस्थित था। उससे राजा का अन्याय न देखा गया।
सहस्रमट ठहरिए महाराज! इस व्यक्ति को मृत्युदंड देने से पहले मेरी बात सुनने की कृपा करें।
राजा कौन हो तुम? क्या कहना चाहते हो?
सहस्रमट मैं सहस्रमट चोर हूँ।
राजा यह सब क्या कर तुमने बहुत अच्छा किया सहस्रमट आज एक बेगुनाह व्यक्ति फाँसी पर चढ़ जाता।
राजा यह कौन है? अवश्य ही यह कोई भगवान का भेजा दूत है जो मुझे, मुख्य कर्म के फल बताने आया है। भला यहाँ मेरी बेगुनाही सुनने वाला कौन है!
और फिर सहस्रमट ने सारी कथा सच-सच सुना दी।
पुण्य का फल
सिपाही [राजा से]: सेठ कुल का छोड़ दो, और इस कुलटा को पकड़ लो। इसका सिर मुंडाकर, कालिख़ पुतवाओ और फिर कोड़ों से लटकवा दो।
राजा: धन्यवाद भाई! तुमने आज मुझे इस कुलटा के जाल से बचा लिया।
मंत्री: नहीं भाई! मैं चोर अवश्य हूँ, पर आज यह पुण्यकर्म करके मैं तो अपने पाप से मुक्त हो गया।
राजा: सच है, पुण्यकर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे हमारी रक्षा भी करते हैं और हमें उचित अवसर पर उनका फल भी मिलता है।
जैन चित्रकथा
मालवा में घटगाँव नामक एक समृद्ध नगर था।
और धर्मिल नामक एक बढ़ई रहता था।
यहाँ देवलि नामक एक कुम्हार रहता था।
एक दिन…
देवलि: भाई धर्मिल, मैंने मिट्टी के बर्तन बेच-बेचकर बहुत धन कमा लिया है। सोचता हूँ, उसे किसी अच्छे कार्य में लगाऊँ।
अभयदान की कथा
धर्मिल: देवलि भाई! तुमने तो मेरे मन की बात जान ली। मैं भी यही सोच रहा था कि क्या करूँ?
देवलि: हम जो भी करें, उससे मानव कल्याण होना चाहिए।
धर्मिल: हाँ मैं भी इस बात से सहमत हूँ।
देवलि: तो क्यों न हम दोनों मिलकर एक धर्मशाळा बनवा दें, जहाँ मुनिराजों को भी सुख मिले, और यहाँ ऐसी कोई धर्मशाळा है भी नहीं।
धर्मिल: अच्छा सुझाव है मित्र! तो कल से ही काम शुरू कर दो।
जैन चित्रकथा
देवलि और धर्मिल के प्रयत्नों से कुछ ही दिनों में वहाँ एक सुन्दर धर्मशाला आकार तैयार हो गयी।
एक
दिन…
आइये मुनिराज ! इस धर्मशाला में आप विश्राम करें और जब तक जी चाहे, यहाँ रहें।
मुनिराज धर्मशाला में रह कर पूजा-तप करने लगे।
फिर एक दिन धर्मिल, एक साधु को लेकर आया।
आइये साधु महाराज ! आप यहाँ मेरी बनवाई धर्म-शाला में विश्राम करें।
अभयदान की कथा
किन्तु जब धर्मिल ने वहाँ मुनिराज को देखा तो उसको बड़ा क्रोध आया !
मुनीम जी ! आपने किसकी अनुमति से इस वस्त्रहीन मुनि को ठहराया है ?
मैंने नहीं ! ये तो देवलि जैन धर्मशाला के यह ठहराया है। अरे, फिर तो आप जानते ही हैं धर्मशाला वैकालिक है। मैं उन्हें कैसे रोक सकता था ?
नहीं ! धर्मशाला में मेरी अनुमति के बिना कोई नहीं ठहर सकता। देवलि कौन होता है ?
इसके बाद गुस्से से भरा हुआ धर्मिल मुनिराज के पास गया।
मुनिराज ! आपको यहाँ ठहरने का कोई अधिकार नहीं है। आप कृपा कर यहाँ से इसी समय चले जाएँ।
किन्तु…
देवलि !
जैन चित्रकथा
देवलि की बात देवलि माने। मुझे यह कहना क्यों उपाय रचते चाहिए। आप स्वयं चले जाएँ। अच्छा है, वरना मैं आपको धक्के मारकर बाहर निकलवाऊँगा।
क्रोध न करें। मैंने जाने के लिए मना तो नहीं किया। मैं अभी चला जाता हूँ। पर तुम शांत रहो।
मुनिराज ने अपना कमंडल उठाया और बाहर एक पेड़ के नीचे आकर बैठ गए।
आइये साधु महाराज ! आप इस कक्ष में विश्राम कीजिए।
अभयदान की कथा
मुनिराज पेड़ के नीचे बैठे रहे। रात में उन्हें मच्छरों ने बहुत काटा, पर वह शांत भाव से सब सहन करते रहे।
अगले दिन धर्मशाला में आया तो मुनिराज को न देख कर परेशान हुआ।
धार्मिक मुनिराज कहाँ गए? कहीं वह नाराज होकर चले तो नहीं गए? पर ऐसा संभव नहीं लगता।
तभी मुनीमजी आए —
धार्मिक मुनीम जी! कल जो मुनिराज यहाँ ठहरे थे, वह अचानक कहाँ चले गए?
मुनीम स्वामी! क्या करूँ? मेरे लिए तो आप भी स्वामी हैं और धार्मिक भी। कल शाम धार्मिक जी एक साधु के साथ आए थे। वह मुनिराज को देखकर बहुत क्रोधित हुए!
धार्मिक लेकिन क्यों?
जैन चित्रकथा
यह तो वही अरे! किंतु क्षुद्र धार्मिक का बहुत अपमान किया। मुनिराज हीन भाव से मुझसे रोते रहे। धार्मिक तब उन्हें यहाँ से चले जाने को कहा।
धार्मिक पर मुनिराज कहाँ?
मुनीम वहाँ! आमले वृक्ष के नीचे वह बैठे हैं।
मुनिराज के अपमान और करुणा की बात सुनकर देवदत्त क्रोध से भर गया। तभी धार्मिक आ गया।
देवदत्त धार्मिक! मुनिराज के सवाल के लिए आखिर मुनिराज को धर्मशाला से तुमने निकाल दिया।
धार्मिक हाँ, क्योंकि यह धर्मशाला मुनियों के लिए नहीं है!
देवदत्त मत भूलो कि इस धर्मशाला पर आधा हक मेरा भी है।
अभयदान की कथा
धार्मिक उससे क्या होना है? यहो वही वही ठहरना, जिसे मैं चाहूँगा।
देवदत्त नहीं! जिसे मैं चाहूँगा, वही ठहरेगा।
धार्मिक यह नहीं होगा!
देवदत्त यहो होगा!
धार्मिक और देवदत्त का क्रोध बढ़ता गया। दोनों मारपीट करने लगे।
दोनों में इतनी जबरदस्त मारपीट हुई कि, दोनों ही मर गए।
जैन चित्रकथा
अपने कर्मों और क्रोध में एक-दूसरे की हत्या करने का पाप लेकर वे पशु योनि में आए। दिवाले में सूअर योनि में जन्म लिया।
और धर्मिल ने शेर की योनि में जन्म लिया।
ये दोनों एक ही जंगल में रहते थे।
एक दिन दो मुनिराज कहीं से आए और जंगल की गुफा में ठहरे।
अभयदान की कथा
उन्हें देखकर, सूअर को अपना पूर्व जन्म याद हो आया।
पूर्व जन्म में मैंने भी मुनि सेवा कर व्रत लिया था।
अगले दिन वह गुफा द्वार पर आकर बैठ गया। उस समय मुनिराज उपदेश दे रहे थे।
मुनिराज तो इसका अर्थ है कि धर्मिल, जो शेर का रूप है। उसे यहाँ मनुष्य होने की गंध हो रही।
मुनिराज के उपदेशों से मेरा कष्ट निवारण हो गया।
किंतु तभी उसे दूर से शेर की गंध आ रही।
जैन चित्रकथा
जो भी हो। मुझे इन मुनियों की रक्षा तो करनी ही है।
उधर मनुष्य की गंध पाकर दहाड़ता हुआ शेर चला आ रहा था।
सूअर, मुनियों की रक्षा करना चाहता था और शेर उन्हें खाना चाहता था।
दोनों मुनि शांतभाव से तप कर रहे थे।
अभयदान की कथा
शेर ने आते ही सुअर पर आक्रमण किया।
सुअर भी तैयार था। उसने अपने दांतों से शेर को दूर फेंक दिया।
किंतु शेर फिर झपटा और दोनों में युद्ध शुरू हो गया।
अंत में दोनों ने प्राण त्याग दिए।
दोनों मुनि बाहर आए-
मुनि १ ओह ! इन्होंने इस जन्म में भी आपस में लड़ कर प्राण दिए।
मुनि २ सुअर ने मुनि रक्षा का व्रत लिया हुआ था इस कारण उसको स्वर्ग मिला।
और शेर ने हत्या करने की इच्छा की इसलिए उसे नरक मिला।
आपके परिवार के लिए अति ही उपयोगी साहित्य
जैन चित्र कथा की प्रकाशित कृतियां
१. तीन दिन में १०
२. भाग्य की परीक्षा १०
३. त्याग और प्रतिज्ञा १०
४. आटे का मुर्गा १०
५. करें सो भरें १०
६. कवि रत्नाकर १०
७. चमत्कार १२
८. प्रद्युम्न हरण १२
९. सत्यघोष १२
१०. सात कोड़ियों में राज्य १२
११. टीले वाले बाबा १२
१२. चंदनबाला १२
१३. ताली एक हाथ से बजती रही १२
१४. सिकंदर और कल्याण मुनि १२
१५. रुचिरा चक्रवर्ती १२
१६. रूप जो बदला नहीं जा सकता १२
१७. राजुल १२
१८. स्वर्ग की सीढ़ी १२
१९. मुनिरक्षा १२
२०. मुक्ति की राही १२
२१. महादानी भामाशाह १२
२२. प्रतिज्ञा १२
२३. अभय कुमार १२
२४. चेतना की विजय १२
२५. पद्मावती देवी १२
२६. गाये जा गीत अपने के १२
२७. बाहुबली २०
२८. पारसनाथ २०
२९. भावना का फल २०
३०. भगवान राम २५
३१. आओ बच्चों गाये गीत २५
सुनो सुनाएं सत्य कथाएं
अनमोल कथाओं का प्रकाशन
१. भगवान मल्लिनाथ २०
२. महाबली बरांग भाग-एक २०
३. महाबली बरांग भाग-दो २०
४. तीर्थंकर विमल नाथ २०
५. जीवंधर का राज्य पद २०
६. कुमार जिनदत्त २०
७. पांच पाण्डव २०
८. पापड़वों का अज्ञात वास २०
९. बरांग २०
१०. बरांग की जीत २०
११. शाकाहार का माहात्म्य २०
१२. अहिंसा की जीत २०
१३. आदि ब्रह्मा भाग-१,२,३,४ २०
१४. भगवान पार्श्वनाथ २०
१५. भावना का फल २०
१६. भगवान राम २०
१७. बाहुबली २०
१८. सत्यत्व कथा २०
१९. दान का फल २०
२०. नन्हें मुन्नों के गीत २०
जैन चित्र कथा के आगामी प्रकाशन
१. आदिनाथ
२. अनोखा त्याग
३. चाउदत्त
४. मृगावती
५. नेमिनाथ
६. विश्वंभर की विजय
७. स्वर्ग तेरे आगन में
८. संयमन्त मुनि
९. तीर्थंकर ऋषभदेव
१०. आचार्य कुन्द कुन्द
११. नाग कुमार
१२. अकलंक स्वामी
१३. जीवन का रहस्य
१४. मृगसेन धीवर
१५. जीवंधर स्वामी
१६. रेवतीरानी और प्रतिकर मुनि
१७. बज्रसेन
१८. जम्बू कुमार
१९. देवी अंजना
२०. चारित्र ही मंदिर
२१. महाबली बजरंग भाग एक
२२. महाबली बजरंग भाग दो
२३. बेताल गुफा
२४. तीसमार नेत्र
२५. हरिषेण चक्रवर्ती
२६. नारद और पर्वत
२७. सम्राट विम्बासार
२८. केरल की राजकुमारी
२९. पुण्य का फल
३०. सोलह कारण भावना
३१. दशलक्षण पर्व
३२. क्षमा दान
३३. क्रोध का फल
३४. महासती नीली
३५. सुकौशल मुनि
३६. सुभौम चक्रवर्ती
३७. राजा सगर
३८. राजा का नगर प्रवेश
३९. एक चोर
४०. नारी की शक्ति
४१. सम्राट चन्द्रगुप्त
४२. अमृतफल
४३. अनोखा चोर
४४. आचार्य विद्यासागर
४५. आचार्य परम्परा
४६. आचार्य संभवभद्र स्वामी
४७. तीर्थराज सम्मेदशिखर
४८. बाड़ा के बाबा
४९. महाराज श्रेणिक
५०. दान का फल
५१. मनुष्य की कीमत
५२. आचार्य माघनन्दि
५३. झूले वा- (केशरयानाथ)
५४. अन्तर्शि पारसनाथ
५५. बर्तनों की बाबड़ी
५६. सोने का पर्वत
५७. राजकुमार मुनि
५८. कमल श्री
५९. साधना का फल
६०. धन का लोभी
६१. सोने की ईंटें
६२. एक रात में परिवर्तन
६३. सौमेश्वर स्वामी
६४. रोट का फल
६५. मुनि निन्दा का फल
६६. खापड़ी को ठोकर
६७. चमत्कार का फल-लालप मंदिर
६८. तिरमाल वाले बाबा
६९. मोतियों का दान
७०. पानी में मीन प्यासी
७१. सिंहद्वार
आप से कुछ कहूँ
जैन आगम साहित्य प्रथमानुयोग में, संसार की श्रेष्ठ कहानियों का अक्षय भंडार भरा है। चारित्रता, नीति, उपदेश, वैराग्य, बुद्धिचातुर्य, वीरता, साहस, विनयगुण, धैर्य, मैत्री, सरलता, क्षमाशीलता, व्रत उपवास तपस्या आदि विषयों पर लिखी गई हजारों सुन्दर शिक्षाप्रद रोचक कहानियों में से चुन चुन कर सरल भाषा शैली में भावपूर्ण रंगीन चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करने का सर्व प्रथम प्रयास हमने किया था जो काफी प्रगति पर है।
जैन चित्र कथाओं के माध्यम से आपका मनोरंजन तो होगा ही साथ ही इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और जीवन मूल्यों से आपका सीधा सम्पर्क होगा।
निवेदक
प्रकाशक आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थमाला
जैन चित्र कथा
आप पढ़े तथा दूसरों को पढ़ायें
मूल दस्तावेज़ (PDF): 183.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है