पुण्यप्रकाश अदालत में (प्रथम दृश्य)
वीतरागाय नमः
पुण्यप्रकाश अदालत में
(प्रथम दृश्य)
(प्रवचन मण्डप में पण्डितजी प्रवचन कर रहे हैं तथा सभी श्रोता
शान्ति से सुन रहे हैं।)
(मंगलाचरण)
मंगलमय मंगलकरण, वीतराग-दिज्ञान।
नमौं ताहि जातें भये, अरहंतादि महान् ॥१॥
करि मंगल करिहौं महा, ग्रंथकरन को काज।
जातें मिलै समाज सब, पाव निजपद राज ॥२॥
यह मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ है। आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी ने
इसके सातवें अध्याय में अपने मौलिक चिन्तन से जैनाभासी जीवों में पाई जाने
वाली सात तत्त्व सम्बन्धी भूलों का वर्णन किया है। यहाँ आस्रव तत्त्व सम्बन्धी
भूल बताते हुए वे शुभभाव में धर्म मानने का निषेध करते हुए कहते हैं कि “जहाँ
वीतराग होकर ज्ञातादृष्टारूप प्रवर्ते वहाँ निर्बन्ध है, सो उपादेय है सो ऐसी
दशा न हो तबतक प्रशस्त रागरूप प्रवर्तन करो; परन्तु श्रद्धान तो ऐसा रखो
कि यह भी बन्ध का कारण है, हेय है; श्रद्धान में इसे मोक्षमार्ग जानें तो
मिथ्यादृष्टि ही होता है।”
अरे भाई ! दया-दान-पूजा का भाव तो अनन्तबार किया; पर कभी
आत्मसन्मुखतारूप शुद्धभाव नहीं किया; जो कि निश्चय से धर्म है। हे भाई !
यह दुर्लभ नरभव पाकर भी आत्मा का रस नहीं चखा, शुभभाव और पुण्यबंध
के रस में ही पड़ा रहा, इससे तो संसार ही बढ़ेगा। हाँ, ये बात भी है कि
जिनागम में विशुद्धिलब्धिरूप शुभभाव को सम्यक्त्व का कारण कहा है;
लेकिन विशुद्धिलब्धिरूप शुभभावं तो अनन्तबार किया, फिर भी सम्यक्त्व
प्रकट नहीं हुआ, अपितु मिथ्यात्व अवस्था में देवादि पर्याय धारण करके और
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/६२
पुनः वहाँ से मरकर एकेन्द्रिय आदि में ही गया और संसार ही बढ़ाया। मैं यह
नहीं कहता कि दया-दान-पूजादि छोड़कर हिंसादि पापों में प्रवर्तन करो; इससे
तो साक्षात् नरक में ही जाना पड़ेगा; अतः जबतक शुद्धोपयोगरूप धर्म प्रगट
न हो तबतक शुभभाव करने में कोई हानि नहीं है, परन्तु उसमें धर्म नहीं मानना
चाहिये। धर्म मानने पर महा-मिथ्यात्त्र का दोष आता है। ज्ञानियों को भी गृह
शुभभाव सहज ही होते हैं, परन्तु वे उन्हें हेय जानते हैं यदि उपादेय जाने तो
सम्यक्त्वी न रहें। इसलिए सभी जीव पाप प्रवृत्ति को छोड़कर; दया-दान-पूजा
के शुभभावों को हेय जानकर; शुद्धभावरूप धर्म का आस्वादन करके मोक्षसुख्
की प्राप्ति करें – इसी मंगल भावना के साथ मैं विराम लेता हूँ। (जिनवाणी
स्तुति होती है)
(प्रवचन के पश्चात् दो मित्र मन्दिर से निकलते हुए कुछ चर्चा कर रहे हैं।)
धर्मचन्द - भाई पुण्यप्रकाश ! आज तो पण्डितजी ने आँखें खोल दीं, हमने
तो बचपन से ये ही पढ़ा था कि रोज दया-दान-पूजा करेंगे तो
बंधन कट जायेंगे; पर ये तो अनन्तबार किया पर धर्म तो हुआ
ही नहीं। अरे हम भी तो रोज कर रहे हैं। सुबह उठे, स्नान किया
और पूजा-पाठ करने मन्दिरजी चले गये और हो गया धर्म;
लेकिन सुख तो मिला ही नहीं। अरे ! मिलता भी कैसे ? सुख
तो आत्मानुभवरूप शुद्ध भाव में है। इसकी तरफ ध्यान ही
नहीं गया। छहढाला में पण्डितजी ने सही कहा है -
जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना।
तिन्ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके।।
इसलिये भाई पुण्यप्रकाश अब तो वीतरागता रूप…
पुण्यप्रकाश - (गुस्से में) ठीक है, ठीक है, बहुत हो गया। एक वो पण्डितजी
थे; जो घन्टे भर से दया-दान-पूजा को संसार बंधन का कारण
कह रहे थे। यदि इनसे कर्म नहीं कटते तो जिनवाणी में इन्हें मोक्ष
का कारण क्यों लिखा है ? और एक ये हैं जो इसे हेय और संसार
का कारण कहते हैं। खूब मनमानी मचा रखी है; अगर तुम
धर्म की कहानियाँ भाग-१४/६३
लोगों की बात मान ली जाये तो मन्दिर, पूजा सब ही बंद हो
जायें और तो और जैनधर्म का नाम लेने वाला भी दुनिया में न
बचे। समझते तो हैं नहीं तान छेड़ते हैं।
धर्मचन्द - नहीं भाई पुण्यप्रकाश ! पण्डितजी शुभभाव का निषेध थोड़े ही
कर रहे थे। वह तो ज्ञानियों को भी होता है, पर जिस तरह ज्ञानी
उसे हेय जानते हैं, धर्म नहीं मानते; उसीप्रकार हमें भी पुण्यभाव
में धर्म नहीं मानना चाहिये। अरे भाई ! वे पूजा, प्रक्षाल, मन्दिर
का निषेध नहीं करते इनमें धर्म मानने का निषेध करते हैं। अरे
स्वयं को ही देखो न ! हम पूजा-प्रक्षाल करते-करते वृद्ध हो गये
पर धर्म प्रगट नहीं हुआ। अरे धर्म तो आत्मानुभव से होता है
और वह शुभाशुभ भावों से एकदम भिन्न है।
पुण्यप्रकाश - तुम्हारी अक्ल तो घास चरने चली जाती है धर्मचन्द ! अरे
सोचो ! वैसे ही तो आजकल लोग मन्दिर में नहीं आते कोई
कभी-कभार आये भी तो उससे ये कह दो कि मन्दिर आने से
धर्म नहीं होता इससे संसार बढ़ता है, फिर तो हो गई छुट्टी, तुम
अकेले ही मन्दिर में बैठे राग अलापते रहना, तभी तुम्हें चैन
मिलेगा।
धर्मचन्द - देखो भाई पुण्यप्रकाश ! तीन काल में कभी भी शुभ भाव से धर्म
नहीं होगा। कोई भी आज तक दया-दान-भक्ति के भाव से
मोक्ष नहीं गया, सत्य तो यही है। इसलिए हर कथन की अपेक्षा
समझनी चाहिये।
पुण्यप्रकाश - मैं नहीं जानता तुम्हारी अपेक्षा-वपेक्षा। ये सब पण्डितों के
हथकण्डे हैं। कभी कहते हैं कि रोज मन्दिर जाओ, रात को मत
खाओ, आलू-प्याज मत खाओ और कभी कहते हैं मन्दिर जाने
से धर्म नहीं होता है और तू भी जब से इन जयपुर के पण्डितों के
चक्कर में पड़ा है, तब से इनका ही राग अलापने लगा है; लेकिन
अब ये ज्यादा दिन नहीं चलेगा; कुछ न कुछ इन्तजाम तो करना
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/५४
ही पड़ेगा। नहीं तो तुम लोग धर्म को भ्रष्ट कर दोगे। इन सब की
जड़ तो पण्डितों का मुखिया कानजीस्वामी है, उसी ने यह सारा
मायाजाल रचा है; मैं तुम सबको ठीक करके ही दम लूँगा। अरे
अदालत में खड़ा कर दूंगा; फिर देखना कौन सच्चा है और कौन
झूठा ?
पुण्यप्रकाश ! तुम्हारी इच्छा अदालत में जाने की है तो फैसला
वहीं हो जाये। वैसे भी सत्पुरुष कानजीस्वामी ने हमें दिगम्बर
आचार्यों के ग्रन्थ खोलकर दिखाये हैं कोई मन की बातें नहीं
कहीं।
पुण्यप्रकाश – अरे घबराता त्यों है, अदालत में तो चल; चल तो सही फैसला
वहीं होगा, अब जो भी कहना है अदालत में ही कहना।
धर्मचन्द – ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।
(द्वितीय दृश्य)
(नेपथ्य से – तो आपने देखा कि पुण्यप्रकाश ने अन्त में अदालत में जाने
की धमकी दे दी; लगता है कि अब इस बात का निर्णय अदालत ही करेगी कि
शुभभाव में धर्म है या शुद्ध भाव में ? तो चलिये; देर किस बात की। ये है स्याद्वाद
हाईकोर्ट जहाँ पर पहले भी निमित्त-उपादान जैसे जटिल सिद्धान्त का निष्पक्ष
निर्णय हुआ था। अरे यहाँ तो पुण्यप्रकाश पहले से ही अपने वकील के साथ डटे
हुए हैं और धर्मचन्दजी भी अपने वकील से सलाह मशविरा कर रहे हैं और
लीजिये जज साहब भी आ गये। तो आइये देखते हैं आज की बहस…)
जज – (अदालत का दृश्य, न्यायाधीश महोदय अदालत में आते हैं और
उनके सम्मान में सभी खड़े हो जाते हैं।)
अदालत की कार्यवाही प्रारम्भ की जाए।
पुण्य वकील – सम्माननीय जज साहब ! मैं पुण्यप्रकाश की ओर से आज के
मुकद्दमे की पैरवी करूँगा। आज से साठ वर्ष पहले की बात
है। जब दिगम्बर जैन समाज में कानजीस्वामी नामक व्यक्ति का
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/६५
आगमन नहीं हुआ था, तब सभी विद्वान् और सारी समाज
दया-दान-पूजा को ही धर्म मानती थी, मोक्ष का कारण मानती
थी। ये हेय हैं, मोक्ष के कारण नहीं हैं, ये तो किसी ने सोचा भी
नहीं था ! बालक से वृद्ध तक, मूर्ख से पण्डित तक सब दया-
दान पूजा के ही गीत गाते थे। लेकिन जब से समाज में
कानजीस्वामी नामक व्यक्ति का आगमन हुआ है तब से सारी
हवा ही बदल गई है, जो व्यक्ति पहले पूजा-व्रतादिक में ही धर्म
मानते थे, अब वे ही लोग उसे हेय कहते हैं और धर्म मानने से
इन्कार करते हैं।
और तो और जज साहब ! इन भावों का बंध का कारण बताकर
संसार का ही कारण कहते हैं। यदि यही हाल रहा तो लोगों को
दया-दान-पूजादिक से विश्वास ही उठ जायेगा, मन्दिर सूने पड़े
रहेंगे और धर्म नष्ट हो जायेगा। यही अभियोग अभियुक्त
धर्मचन्द पर लगाये गए हैं।
जज – धर्मचन्द आपका कोई वकील है क्या ?
धर्म वकील – जज साहब ! मैं धर्मचन्द की ओर से इस मुकद्दमे की पैरवी
करूँगा। भाई पुण्यप्रकाश के वकील कह रहे थे कि दया-दान-
पूजादि के भाव मोक्ष का कारण हैं, धर्म हैं, उपादेय हैं; और ये
मोक्ष में कारण नहीं हैं, हेय हैं - ऐसा वातावरण कानजीस्वामी
के आगमन से हुआ है। यह आरोप सरासर बेबुनियाद और
तर्कहीन है तथा लोगों में फैलाया गया झूठ है। कानजीस्वामी
ने तो हमें हमारे आचार्यों की ही बातें समझाई हैं; ये बात तो
आदिनाथ से लेकर महावीर, तक महावीर से कुन्दकुन्द तक
और कुन्दकुन्द से टोडरमलजी तक सभी ने कहीं हैं।
कानजीस्वामी ने तो हमें हमारी भाषा में समझाया है कि दया-
दान-पूजादि का भाव तो भूमिकानुसार आता है, लेकिन उसे
उपादेय मानना और मोक्ष का कारण मानना मिथ्यात्व है ।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/६६
इसलिये जज साहब ! सत्य-असत्य का निर्णय ठोस तथ्यों को
मद्दे नजर रखते हुए किया जाये; मैं इतना ही कहना चाहता हूँ।
पुण्य वकील- मीलॉर्ड आज की बहस का मुद्दा है कि पुण्य मोक्षमार्ग में हेय है
या उपादेय ? मेरे मुद्दई वकील का कहना है कि शुभभाव में धर्म
नहीं है और वह मोक्षमार्ग में हेय है; तो फिर मैं पूछता हूँ कि मेरे
काबिल दोस्त रोज सुबह छह बजे उठकर; नहा-धोकर मन्दिर
क्यों जाते हैं ? तथा पूजा और स्वाध्याय क्यों करते हैं ? यदि
ये हेय हैं तो इनमें अपना वक्त क्यों बरबाद कहते हैं ? जंगल में
जाकर ध्यान क्यों नहीं लगाते ? इसोलिये न, कि मेरे काबिल
दोस्त भी इसे धर्म मानते हैं। इसे मोक्षमार्ग में उपादेय मानते हैं।
क्या मेरे काबिल दोस्त इस बात से इंकार करते हैं ? देट्स आन ।
धर्म वकील- मीलॉर्ड ! शायद मेरे काबिल दोस्त ने इस बात पर विचार नहीं
किया कि रोज मन्दिर जाने वाले और भक्ति पूजन करने वाले
लोग भी भव-भ्रमण से नहीं छूट पाते। यदि इन सबसे धर्म होता
तो हम सब कब के मुक्त हो गये होते; लेकिन नहीं हुये, क्योंकि
ये मोक्षमार्ग नहीं बल्कि वे भाव हैं जो मोक्ष जाने के पूर्व छूट जाते
हैं, यदि न छूटें तो मुक्त न हों। हाँ, मैं यह बात मानता हूँ कि मैं
रोज मन्दिर जाता हूँ, रोज स्वाध्याय करता हूँ; लेकिन यह
करते-करते मोक्ष हो जायेगा यह मैं कदापि नहीं मानता। अगर
मैं इनमें धर्म मानकर सन्तुष्ट हो गया तो कभी मुक्त नहीं हो
पाऊँगा। इसलिये जज साहब मैं शुभ भावों का निषेध नहीं कर
रहा हूँ वे तो भूमिकानुसार होते ही हैं और होना भी चाहिये;
लेकिन मैं इन्हें धर्म मानने से इंकार करता हूँ। देट्स आल।
पुण्य वकील- ठीक है वकील साहब ! ऐसा मान भी लिया जाये कि दया-
दान-पूजादिक के भाव मोक्षमार्ग और धर्म नहीं हैं तो फिर मैं
आपसे पूछता हूँ कि आज-तक बिना देव-शास्त्र-गुरु को माने
और बिना स्वाध्याय किये कोई सम्यग्दृष्टि हुआ है। आजतक
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/६७
कोई बिना महाव्रतादिक पाले मुक्त हुआ है। मुझे तो लगता है
कि मेरे काबिल दोस्त बिना महाव्रतादिक पाले सीधे कोर्ट से ही
मोक्ष जाना चाहते हैं। क्यों पकील साहब क्या इरादा है?
धर्म वकील- जज साहब ! मैं अपने काबिल दोस्त के सवाल का जवान देने
ने पहले उनसे ही कुछ सवालात पूछने की इजाजत चाहूँग।। मेरा
पहला सवाल है कि – पाँच पाण्डदों में से किस-किस ने
मुनिदीक्षा ली थी ?
पुण्य वकील- मीलॉर्ड । मेरे काबिल दोस्त नाजायज सवाल पूछकर मुझे
गुमराह करना चाहते हैं और अदातल का कीमती वक्त जाया
कर रहे हैं, क्योंकि मेरे सवालों का इन बातों से कोई ताल्लुक
नहीं।
धर्मचन्द- ताल्लुक है जज साहब ताल्लुक है। मैं अदालत से दरखास्त
करूँगा कि मेरे चन्द सवालों का जवाब दिया जाए।
जज- वकील साहब के सवालों का जवाब दिया जाए।
धर्म वकील- हाँ तो मैं पूछ रहा था कि पाँच पाण्डवों में से किस-किस ने
मुनिदीक्षा ली थी ?
पुण्य वकील- पाँचों पाण्डवों ने ही मुनिदीक्षा ली थी।
धर्म वकील- क्या आप उनके नाम बता सकते हैं ?
पुण्य वकील- हाँ क्यों नहीं ? उनके नाम हैं – युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन; जो
शत्रुञ्जय से मुक्त हुए हैं और नकुल एवं सहदेव जो कि… खैर
मैंने नाम बता दिये हैं।
धर्म वकील- अरे रुक क्यों गये वकील साहब ? बोलिये न !
पुण्य वकील- हाँ ! नकुल और सहदेव सर्वार्थसिद्धि के देव बने ।
धर्म वकील- जज साहब ! मेरे काबिल दोस्त ने अभी अपने मुँह से कहा कि
पाँचों पाण्डवों ने महाव्रत धारण किये थे; फिर भी तीन मोक्ष गये
और दो स्वर्ग गयेः क्या नकुल सहदेव ने नहाव्रत पालन करन
जज
जैनधर्म को कहानियाँ भाग - १४/
में कोई कमी की थी ? जिसके कारण तैंतीस सागर तक संसार
में रहने की सजा हुई; जिसके कारण उन्हें पूर्ण निराकुल मोक्ष पद
से वंचित रहना पड़ा ? नहीं जज साहब ! नहीं; कमी तो मात्र
शुद्धापयोग की निरन्तरता में थी। जे शुद्धोपयोग से गिरकर
शुभभाव में आ गये, जिसके कारण उन्हें मुक्ति के स्थान पर
संसार हो मिला।
अगर महाव्रतादिक धारण करने से ही मोक्ष होता तो सभी
पाण्डव मुक्त हो गये होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ; क्योंकि जज
साहब महाव्रतादिक शुभभाव हैं इसलिये बंध के कारण हैं और
जो बंध का कारण हो वह मोक्ष दा कारण नहीं हो सकता।
इसलिये दया-दान-पूजादिक के भाव भी उपादेय नहीं हैं। मैं
इतना ही कहना चाहूँगा और अदालत से दरखास्त करूँगा कि
मेरे काबिल दोस्त को अदालत में ठोस तथ्य पेश करने की
हिदायत दी जाये। देट्स आल।
अदालत का वक्त बरबाद न किया जाये; अदालत में ठोस तथ्य
ही पेश किए जायें।
पुण्य वकील - मीलॉर्ड ! ठोस तथ्यों के रूप में मैं अदालत में कुछ प्रथमानुयोग
की घटनाओं को पेश करना चाहूँगा। मैं सबसे पहले इन्द्रभूति
गौतम की याद दिलाना चाहूँगा जो पूर्व में ब्राह्मण था और जैन
शासन का घोर विरोधी था जज साहब ! यदि उसका पुण्य का
उदय न होता तो समवशरण तक कैसे पहुँचता ? और तीर्थंकर
के दर्शन कर सम्यक्त्वी कैसे होता ? महाव्रत धारण करके
गणधर कैसे बनता ? ये सब पुण्य का ही प्रभाव है जज साहब;
जिसने मिथ्यादृष्टि को गणधर बना दिया। और दूसरे तथ्य के
रूप में मैं भगवान् महावीर के उस सिंह के भव को याद दिलाना
चाहूँगा, जब वे एक क्रूर शर की पर्याय में थे उस घनघोर जंगल
में जहाँ वह क्रूर शेर हिरण को मारकर खा रहा था तभी वहाँ दो
वर्म की कहानियाँ भाग-१४/६९
चारणऋद्धिधारी मुनियों का आगमन होता है। मैं पूछता हूँ जज
साहब ! क्या बिना पुण्य के उदय के इतना उत्कृष्ट समागम मिल
सकता था, मम्यक्त्व हो सकता था ? नहीं हो सकता था
इसीलिये मैं कह रहा हूँ जज साहब पुण्य मोक्षमार्ग में उपादेय है
और पुण्य के कारण शुभ भाव भी मोक्षमार्ग में उपादेय है। क्या
मेरे काबिल दोस्त इस अजीत को कैसे झुठला सकते हैं ?
धर्म वकील - हाँ जज साहब ! वकील साहब द्वारा दिये गये तमाम तथ्यों से
भी ये सिद्ध नहीं होता कि पुण्य मोक्षमार्ग में उपादेय ह बल्कि
ये सभी घटनायें आत्मानुभूति रूप शुद्धोपगोगरूप शुद्धभाद की
ही विजय को ही साबित करनेवाली हैं।
सबसे पहले मेरे काबिल दोस्त ने कहा कि इन्द्रभूति गौतम के
पुण्य का उदय था, इसलिये सम्यग्दर्शन-जान-चारित्र की प्राप्ति
हुई। अगर समवशरण आदि में जाने रूप पुण्योदय से मोक्षमार्ग
प्रगट होता है तो मंखिलगोशाल को क्यों नहीं हुआ ? वह तो
इन्द्रभूति गौतम से ६६ दिन पहले समवशरण गया था और ६६
दिन रुका भी था। क्या वह पुण्य के उदय से नहीं पहुँचा था ?
जज साहब ! पहुँचा था, पुण्योदय से ही पहुँचा था; क्योंकि बिना
पुण्योदय के प्रशस्त संयोग नहीं मिला करते। इन सबके बावजूद
वह मिथ्यादृष्टि रहा। क्या उसके पुण्य में कोई कमी थी, कमी
तो एक चीज में थी; जिसका नाम है निर्विकल्प आत्मानुभूति,
शुद्धभाव; जिसके होने पर नियम से मोक्षमार्ग होता है।
दूसरे प्रमाण के रूप में उन्होंने कहा कि शेर की पर्याय में महावीर
के जीव को पुण्य के कारण सम्यक्त्व हुआ, मैं अपने काबिल
दोस्त को थोड़ा और पीछे ले जाना चाहूँगा। जब महावीर का
ही जीव मारीचि की पर्याय में था तब साक्षात् तीर्थकर भगवान्
आदिनाथ का संयोग हुआ था और तीर्थकर का समागम उत्कृष्ट
पुण्य के बिना हो नहीं सकता। इतना पुण्य होने पर भी वहाँ
C
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७०
सम्यक्त्व क्यों नहीं हुआ ? सिंह की ही पर्याय में क्यों हुआ ?
बात साफ है जज साहब ! वहाँ पुण्य होने पर भी आत्मानुभूति
नहीं थी और यहाँ आत्मानुभूति थी इसलिये धर्म तो शुद्धात्मा
की अनुभूतिरूप शुद्धभाव से ही प्रगट होता है, पुण्य या शुभ
भाव से नहीं। हम भी अनन्तबार समवशरण में गये और इस भव
में भी बचपन से रोज मन्दिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, सत्
समागम करते हैं; क्या हमारा पुण्य का उदय नहीं है। पुण्य का
उदय है जज साहब और शुभभाव भी है, लेकिन आत्मानुभूति
नहीं है इसीलिये सम्यक्त्व भी नही है। इस बात का कोई जवाब
है वकील साहब ?
(पुण्य वकील रूमाल से पसीना पोंछता है और चुप रह जाता है)
धर्म वकील – आप देख रहे हैं जज साहब इनकी चुप्पी ही इनकी पराजय का
भान करा रही है।
पुण्य वकील – (थोड़े आत्मविश्वास के साथ) जज साहब ! लगता है मेरे
काबिल दोस्त ने अभी जैन लॉ की पढ़ाई पूरी नहीं की है या फिर
अन्तिम पेपर नकल से पास किया है; क्योंकि ये इतना भी नहीं
जानते है कि अदातल के अन्तिम निर्णय से पहले फैसला नहीं
होता और मैं अभी हारा नहीं हूँ। अभी तो मेरे पास और भी ऐसे
पक्के सबूत और गवाह मौजूद हैं; जो यह सिद्ध करके रहेंगे कि
पुण्य ही मोक्षमार्ग में उपादेय है उनमें से एक सबूत यह कैसेट है।
मैं इसे अदालत में दिखाना चाहता हूँ। जो केस को हाथ में रखे
आँवले की तरह साफ कर देगा।
जज – इजाजत है।
(कैसेट में एक व्यक्ति पूजन कर रहा है और उसे देखकर कुछ
लोग बातें कर रहे हैं।)
चरणदास – देखो भाई ! भगवानदास कितने धर्मात्मा जीव हैं सुबह पांच बजे
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७१
ज्ञानचन्द – से मन्दिर में आ जाते हैं और चार घंटे रोज पूजन करते हैं और
फिर जाकर अन्न-जल ग्रहण करते हैं – ऐसे धर्मात्मा इस पंचम
काल में देखने को ही कहाँ मिलते हैं !
हाँ ये पूजा-पाठ तो बहुत करते हैं, लेकिन भाई चरणदास ये
कभी स्वाध्याय चर्चा में दिखाई नहीं देने हैं।
करोड़ीमत – तो क्रण हुआ भगवान् के चरणों की सेवा तो करते हैं और जो
भगवान् के चरणों को सेवा करते हैं वे ही सबसे बड़े धर्मात्मा
हैं, वे ही सबसे पहले मोक्ष जाते हैं।
पुण्य वकील – बस ! देखा जज साहब ! पूजा-भक्ति करने वालों को ही जगन
के लोग धर्मात्मा कहते हैं, क्योंकि पूजा भक्ति आदि में धर्म है;
अतः शुभभाव धर्म होने से मोक्षमार्ग में उपादेय है इसके साथ
ही मैं कुछ तर्क और आगम प्रमाणों को भी अदालत में पेश
करने की इजाजत चाहता हूँ।
जज – इजाजत है।
पुण्य वकील – जज साहब इन तर्कों और आगम प्रमाणों से पुण्य की उपादेयता
सिद्ध हो जाती है।
सबूत नं. (१) मनुष्य भव से ही मोक्ष का मार्ग खुलता है और मनुष्य भव
पुण्य के बिना नहीं मिल सकता।
सबूत नं. (२) प्रथमानुयोग तथा चरणानुयोग मं पुण्य को पग-पग पर ही धर्म
कहा गया है।
सबूत नं. (३) २८ मूलगुण जिन्हें चारित्र कहा जाता है, शुभभाव हैं।
"चारित्र खतु धम्मो” यह अष्टपाहुड़ का प्रामाणिक वाक्य है।
सबूत नं. (४) छठवें गुणस्थान में शुभोपयोग होता है और इसमें रहने वाले मुनि
मोक्षमार्ग के अग्रणी पथिक हाते हैं।
सबूत नं. (५) और ये मेरा अन्तिम प्रमाण ! पुण्य को ही प्रत्यक्ष मोक्ष का कारण
कहा है। तीर्थकर प्रकृति का पुण्य जो कोई एकबार बांध ले तो
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७२
मोक्ष जाने की गारंटी मिल जाती है। और विनय पाठ में नो
गजब की ही बात आई है -
तुम पद पंकज पूजतैं विघ्न रोग टर जाय ।
शत्रु मित्रता को धरें विष निरविषता थाय ।।
चक्री खग सुर इन्द्र पद मिले आपतैं आप ।
अनुक्रम करि शिव पद लहैं मेंट सकल हनि पाप ।।
अर्थात् भगवान् के चरण कमल की सेवा करने से शिवपद
मिलता है तथा पण्डित द्यानतरायजी ने लिखा है -
तुम देवाधिदेव परमेश्वर, दीजै दान सवेरा ।
जो तुम मोक्ष देत नहीं हमको कहाँ किहि डेरा ।।
क्या इन ठोस सबूतों को ठुकराया जा सकता है। इनका
ठुकराना तो, अनन्त तीर्थंकरों को ठुकराना होगा, क्योंकि ये सभी उनकी वाणी
अर्थात् जिनवाणी में आये हुये तथ्यात्मक वाक्य हैं। क्या मेरे काबिल दोस्त के
पास अब भी कुछ कहने को शेष है ?
जज - क्या धर्मवकील अपनी सफाई में अब भी कुछ कहना चाहेंगे ?
धर्म वकील - (ताली बजाते हुए) जज साहब ! मेरे काबिल दोस्त ने बड़ी
मेहनत से ताश का महल खड़ा किया है, लेकिन अफसोस यह
महल मेरे एक सबूत के झोंके से ही ढह जायेगा। इस कड़ी में
मैं सबसे पहले भगवानदासजी को बुलाने की इजाजत चाहता
हूँ।
जज - इजाजत है।
बाबू - भगवान् के चरणों के दास, ईश्वर-भक्त भगवानदासजी अदालत
में हाजिर हो। (बाबू शपथ दिलवाता है)
बाबू - बोलिये ! मैं जो कुछ कहूँगा, सच कहूँगा, सच के सिवा कुछ
नहीं कहूँगा।
भगवानदास - (दोहराता है)
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७३
धर्म वकील - तो आपका नाम भगवानदासजी है ?
भगवानदास - मेरा नाम तो भगवानदास ही है, प्रभु की कृपा से।
धर्म वकील - तो आप रोज चार पाँच घंटे पूजा-पाठ करते हैं।
भगवानदास - हाँ जी ! ये तो साधारण बात है, प्रभु की कृपा से।
धर्म वकील - लेकिन आप रोज पूजन क्यों करते हैं ?
भगवानदास - लो ये भी कोई पूछने की बात है अरे रोज पूजन करने से अपने
ऊपर प्रभु की कृपा होगी, पुण्य बंधेगा, सब पाप कट जायेंगे
और हमें मोक्ष मिलेगा। अरे वो सुना नहीं है आपने -
प्रभु सुमरन तैं पाप कटत हैं।
धर्म वकील - भगवानदासजी यदि दया-दान-पूजा से ही मोक्ष जाते हैं, तो
जिन तीर्थंकरों को आप पूजते हैं वे सब दया-दान-पूजादिरूप
शुभ भाव को छोड़कर आत्मा में क्यों रम गये और आपने यह
भी पढ़ा ही होगा -
लीन भये व्यवहार में उक्ति न उपजै कोय।
दीन भये प्रभु पद जपै मुक्ति कहाँ तैं होय ।।
प्रभु सुमरो पूजो पढ़ो करो विविध व्यवहार।
मोक्षस्वरूपी आत्मा ज्ञान-गम्य निरधार ।।
क्यों भगवानदासजी बात समझ में आती है ? प्रभु की कृपा से।
भगवानदास - वकील साहब ! ये बात आज तक मेरी समझ में क्यों नहीं आई,
प्रभु की कृपा से।
धर्म वकील - अब तो आ गया समझ में। आप जा सकते हैं और जज साहब !
मेरे काबिल दोस्त द्वारा दिए गए तर्कों का उत्तर इस प्रकार है -
मनुष्य भव तो अनन्त बार अभव्य जीव भी प्राप्त कर लेता है
और मनुष्य भव ही क्या ! जैन कुल भी मिल जाता है, व्रतादि
भी धारण कर लेते हैं, पर आत्मानुभव न होने के कारण
सम्यक्त्व नहीं होता, मोक्षमार्ग नहीं खुलता।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७४
(२) प्रथमानुयोग और चरणानुयोग में व्रतादि, तीर्थयात्रादि को जो
धर्म कहा है; वह परम्परा की अपेक्षा कहा है, व्यवहार की
अपेक्षा कहा है; इस अनुयोग की शैली ही यही है कि पाप से
छुड़ाकर पुण्य मार्ग में प्रवर्तन कराते हैं; परन्तु वास्तविक रूप से
तो वीतराग भान में ही धर्म है।
(३) २८ मूलगुणरूप चारित्र निश्चय से चारित्र नहीं है। वीतरागरूप
शुद्धोपयोग रूप चारित्र ही निश्चय से चारित्र है। २८ मूलगुण
तो शुभ भाव होने के कारण चारित्र की कमजोरी हैं, यदि इनको
ही वास्तविक चारित्र मान लिया जाये तो आत्मानुभव का लोप
होने से आगे के गुणस्थानों का ही लोप हो जाये ।
(४) छठवें गुणस्थान में जो शुभरूप भाव हैं, वह मुनियों को ही होता
है जो मोक्षमार्ग के अग्रणी पथिक हैं। लेकिन जज साहब आगम
में यह भी आता है कि पुरुषार्थ की कमजोरी के कारण मुनियों
को शुभोपयोग में आना पड़ता है और वह शुभोनयोग भी उनके
सहज होता है; उनके लिये वह उपादेय नहीं है, यदि वे छठवें
गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त से ज्यादा ठहरे तो गुणस्थान गिर जाये,
उन्हें वहाँ ऐसा लगता है जैसे आग की भट्टी में गिर गये हों।
(५) और जहाँ तक तीर्थंकर प्रकृति की बात है, तो यह प्रकृति
क्षायिक सम्यग्दृष्टि आत्मानुभवी जीवों को ही बंधती है और इस
प्रकृति के बंधने से मोक्ष की गारंटी मिलती है - ऐसी बात नहीं
है, मोक्ष की गारंटी तो पहले ही मिल जाती है जब आत्मानुभव
होता है। अरे वकील साहब ये प्रकृति मोक्ष का कारण नहीं हैं,
मोक्ष का कारण तो शुद्धोपयोग रूप धर्म है; और तो और
जबतक इस प्रकृति का संयोग रहता है, तबतक जीव संसारी
ही रहता है। इसे नष्ट कर ही मोक्ष जा सकता है। और जहाँ तक
विनय पाठ की बात है तो मैं इसके लिए पण्डित स्वानुभव
शास्त्री को बुलाने की इजाजत चाहता हूँ; जिन्होंने विनयपाठ.
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७५
दर्शन पाठ स्तुतियों आदि का बहुत गहराई से अध्ययन किया
है और ये इनके ऊपर शोध प्रबंध भी लिख रहे हैं, उनको बुलाने
की इजाजत चाहता हूँ।
जज - इजाजत है।
बाबू - (बुलाता है। शपथ दिलाता है)
पण्डितजी - (दोहराते हैं।)
धर्म वकील – हाँ तो पण्डितजी ! क्या विनयपाठकार रागरूप शुभोपयोग को
मोक्ष का कारण मानते हैं ?
पण्डितजी - देखिये वकील साहब ! बात दरअसल ये है कि जितना भी भक्ति
और पूजन साहित्य है वह सब ही बहुमानपरक है। इसलिये
कहीं तो भगवान् को मोक्ष का दाता कह देते हैं, कहीं पूजन
भक्ति से कर्म कटते हैं ऐसा कह देते हैं, सो ये सभी कथन उपचार
जानना और विनयपाठकार ने स्वयं ही आगे कह दिया है कि –
राग सहित जग में रुल्यो मिले सरागी देव ।
वीतराग भेट्यो अबै, मेटो राग कुदेव ।।
देखिये, यहाँ तो राग को कुटेव कहकर मेटने को कहा है और
जहाँ तक द्यानतरायजी की वात है तो उन्होंने भी कई जगह
भजनों में रागादिक का निषेध किया है –
मगन रहो रे शुद्धातम में।
राग-दोष पर को उतपात, निहचै शुद्ध चेतना जात ।।
यहाँ राग में शुभ और अशुभ दोनों ही राग आ गये।
धर्म वकील - प्वाइंट नोट किया जाय जज साहब। पण्डितजी ने अदालत में
ये एकदम साफ कर दिया है कि भक्ति-पूजन साहित्य में कथन
उपचार से किये जाते हैं।
मर काबिल दास्त भी पूछना चाह तो पूछ ।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७६
पुण्य वकील - हाँ ! मैं पण्डितजी से पूछना चाहता हूँ कि यदि शुभभाव बंध का
कारण है तो सभी पूजनादि क्यों करते हैं और कवि लोग पूजनें
क्यों लिखते हैं ? क्या दे हमें संसार में फंसाना चाहते हैं ?
पण्डितजी - नहीं वकील साहब ! त्रात ये नहीं है, कवियों ने तो हमारा
उपयोग पाप में न लगे, ज्यादा से ज्यादा तत्त्व समझने में लगे
इसलिये पूजनें लिखी हैं और इसीलिये हमें पूजनादि कग्ना
चाहिये, न कि पूजनादि को सब कुछ मानकर इनमें सन्तुष्ट होना
चाहिये। चूंकि पूजनादि शुभ भाव हैं और शुभभाव पुण्यबंधका
कारण होता हे। बंध तो बंध है चाहे वह पुण्य का हो या पापका।
पुण्य वकील - ठीक है मैं इतना ही पूँछना चाहता था।
धर्म वकील – तो पण्डितजी आप पधारें ! जज साहब ! अब ये बान साबित
हो चुर्व। है कि पुण्य का बंध हो चाहे पाप का बंध ! दोनों ही
संसार में घुमाने वाले हैं; इसलिये दोनों एक ही हैं।
पुण्यप्रकाश - जज साहब ! यह झूट बोल रहा है अभी तक तो पुण्य को
मोक्षमार्ग ही नहीं मान रहा था; अब ऊपर से उसे पाप ही कह
रहा है; इसे अदालत से निकाल दीजिये जज साहब ! नहीं तो…
जज - आप को जो कुछ कहना है कटघरे में आकर कहिये।
पुण्यप्रकाश - अरे इनके लिये तो मेरा वकील ही काफी है।
जज - तो फिर आप चुप रहिये। धर्म वकील ! आप जो कह रहे थे,
कहिये।
धर्म वकील - हाँ तो जज साहब ! मैं कह रहा था कि पुण्य और पाप दोनों एक
ही हैं और शुद्ध भाव मोक्ष का कारण है; इसलिये अब फैसले
में बेवजह देर न की जाये, जज साहब!
पुण्य वकील - अरे थोड़ा ठहरिये दकील साहब ! इतनी जल्दी भी क्या है ?
आप तो यह कहना चाहते हैं कि मन्दिर में पूजन स्वाध्याय करें
या दुदान पर बैठकर धंधा करें दोनों ही समान हैं।
धर्म की कहानियाँ भाग-१४/७७
धर्म वकील - अरे वकील साहब ! जरा सुनिये; पूजन स्वाध्याय करने में मन्द
कषाय है तथा व्यापारादि में तीव्र कषाय है; इसलिये शुभ-
अशुभ परिणाम में व्यवहार से भेद है; किन्तु दोनों का लक्ष्य पर
की तरफ ही है, अतः बंध का कारण ही है। परमार्थ की अपेक्षा
से दोनों एक ही हैं।
पुण्य वकील - (झल्लाकर) मैं नहीं जानता अपेक्षा-वपेक्षा; मैं तो ये दानता
हूँ कि पाप संसार में रुलाने वाला है और पुण्य मुक्तिश्री दिलाने
वाला है, इसलिये दोनों अलग-अलग हैं, इसी बात की पुष्टि
के लिये मैं प्रतिष्ठित विधानाचार्य सुकृतकुमारजी को अदालत
में बुलाने की इजाजत चाहता हूँ।
जज - इजाजत है।
बाबू - सुकृतकुमारजी हाजिर हों।
(बावू शपथ दिलात। है तथा पण्डितजी दोहराते हैं।)
पुण्य वकील - सुकृतकुमारजी ! आप अदालत में ये बता दीजिये कि पुण्य-पा५
समान नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग हैं और साथ ही पुण्य
मोक्षमार्ग में उपादेय है।
सुकृतकुमार - कौन कहता है कि पुण्य मोक्ष का कारण नहीं है और पुण्य-पाप
समान हैं। जज साहब ! पुण्य और पाप कदापि एक नहीं हो
सकते, पुण्य मोक्ष का कारण है और पाप कुगति का कारण है !
पण्डित बनारसीदासजी ने एकदम साफ शब्दों में लिख दिया है-
कौऊ शिष्य कहै गुरु पांहीं, पाप-पुन्न दोऊ सम नाहीं।
कारण रस सुभाव फल न्यारे, एक अनिष्ट लगे एक प्यारे ।।
अर्थात् पाप का कारण संक्लेशरूप अशुभ भाव है, जबकि पुण्य का कारण भक्ति
पूजनादि शुभ भाव है। पाप का उदय होने से जीव को दुःख होता है और पुण्य
का उदय होने से जीव सुखी होता है। पाप का स्वभाव संक्लेशमय है, जबकि
पुण्य का स्वभाव विशुद्ध भावरूप है। पाप के कारण दुर्गति होती है और पुण्य
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७८
के कारण सुगति होती है। - इतने सारे भेद तो हमें सामने दिखाई देते हैं, फिर
इनको एक कैसे कहा जा सकता है - ये कोई मेरे घर की बात नहीं है। पण्डित
बनारसीदासजी ने स्वयं लिखा है कि -
संक्लेश परिनामनिसो पाप बंध होई,
विशुद्ध सौ पुत्र बंध हेतु भेद मानिए।
पाप के उदै असाता ताको है कटुक स्वाद,
पुन्न उदै साता मिष्ट रस भेद जानिए ।।
पाप संक्लेश रूप पुन्न है विशुद्ध रूप,
टुइँ को सुभाव भिन्न भेद यों बखानिये ।
पाए सौ कुगति होई, पुन्न सौं सुगति होई,
ऐसौं फल भेद परतच्छि परमानिए ।।
इसलिये पुण्य और पाप को एक मानना जिनवाणी का विरोध करना है
और जहाँ तक मोक्षमार्ग की बात है; वहाँ भी पुण्योदय के बिना मोक्षमार्ग मिलना
संभव नहीं है और शुभ भाव के बिना मोक्षमार्ग में आगे बढ़ना संभव नहीं है। और
दौलतरामजी ने तो यहाँ तक कहा है कि -
घड़ी-घड़ी, पल-पल, छिन-छिन निशदिन, प्रभुजी का सुमिरन कर ले रे;
प्रभु सुमरन तैं पाप कटत है, जनम-मरण दुःख हर ले रे ।।
अर्थात् प्रभु का सुमिरन करने से; प्रभु भक्ति से हमारे पाप कटते
हैं और जनम-मरण का दुःख दूर होता है।
पुण्य वकील - सभी प्वाइंट नोट किये जायें जज साहब पण्डित सुकृतकुमारजी
ने साबित कर दिया है कि पुण्य-पाप अलग-अलग हैं। क्या मेरे
काबिल दोस्त भी कुछ पूछना चाहेंगे ?
धर्म वकील - यस माई लार्ड ! पुण्य वकील के गवाह सुकृतकुमार ने अदालत
को गुमराह करने के लिये एकांगी और अधूरे बयान दिये हैं।
पुण्य वकील - आव्जेक्शन योर आनर।
जज - आव्जेक्शन सस्टेन्ट ।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/७९
पुण्य वकील- जज साहब मेरे गवाह पर झूठे इल्जाम लगाये जा रहे हैं। मेरी
अदालत से गुजारिश है कि मेरे गवाह को इस तरह अपमानित
न किया जाये।
जज - बिना बात गिद्ध किये कोई इल्जाम न लगाये जायें।
धर्म वकील – जैसा आपकी इच्छा जज साहब ! (सकृतकुमार से पूछते हुए)
तो आप पुण्य और पाप को अलग-अलग मानते हैं।
सुकृतकुमार – जो सही है वही मानता हूँ।
धर्म वकील - और आपने अपनी बात सिद्ध करने के लिए समयसार नाटक
का हवाला दिया।
सुकृतकुमार – जी हाँ ! वो भी ऐसा ही मानते हैं।
धर्म वकील - लगता है आपने बनारसीदास क समयसार नाटक के दो ही छन्द
पढ़े हैं और उन्हीं के आधार पर अदालत को गुमराह कर रहे हैं।
क्या आपने वे छन्द नही पढे ? जिसमें जनारसीदासजी ने कहा-
जैसे काहू चंडाली जुगल पुत्र जनैं तिनि,
एक दियो बांमन कै एक घर राख्यौ है।
बांमन कहायो तिनि मद्य मांस त्याग कीनों,
चाण्डाल कहायो तिनि मद्य मांस चाख्यो है।
तैसे एक वेदनी करम के जुगल पुत्र
एक पाप एक पुन्न भिन्न-भिन्न भाख्यौ है।
दुहूं माहिं दौर धूप दोऊ कर्म बंध रूप,
यातें ग्यानवंत नहिं काहू अभिलाख्यौ है।
और आपने पुण्य और पाप के कारणभेद, स्वरूपभेद, फलभेद, स्वादभेद
बताये हैं, उसका भी समाधान करते हुए पण्डितजी ने आगे लिखा कि -
पाप बंध पुन्न बंध दुहूं में मुकति नाहिं,
कटुक मधुर स्वाद पुग्गल को पेखिए।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८०
संक्लेश विशुद्ध सहज दोऊ कर्म चाल,
कुगति सुगति जग जाल में विशेखिये ।
कारणादि भेद तोहि सूझत मिथ्यात मांहि,
ऐसो द्वैतभाव ग्यानदृष्टि में न लेखिये ।
दोऊ महा अंधकूप दोऊ कर्मबंध रूप,
दुहूं कौ त्रिनाश मोख, मारग में देखिगे।
क्यों सुकृतकुमारजी क्या अब भी आप ये कहना चाहेंगे कि पुण्य
और पाप अलग-अलग हैं ?
सुकृतकुमार - चाहे जो भी हो भैया लेकिन पुण्य मोक्षमार्ग में तो उपादेय ही है;
इसीलिए इसका कारण शुभ भाव भी मोक्षमार्ग में उपादेय है।
बनारसीदासजी ने ये भी तो लिखा है -
मोख के सधैया ग्याता देसविरति मुनीश,
तिनकी अवस्था तो निरावलंब नाहीं है।
धर्म वकील – सुकृतकुमारजी आप फिर अदालत को बहलाने की कोशिश
कर रहे हैं, इसके आगे की लाइन में ही उसे दौर धूप कहते हुए
कहा है कि -
कहैं गुरु करम को नाश अनुभौ अभ्यास,
ऐसो अवलंब उन्हीं को उन पाहीं हैं।
निरुपाधि आतम समाधि सोई शिवरूप,
और दौर धूप पुद्गल परछाहीं हैं ।।
और आपने जो दौलतरामजी के बारे में कहा है; वह भी सरासर गलत तरीके से
प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने तो अनेकानेक भजनों में आत्मानुभव की ही महिमा
गाई है। और कहा है -
आपा नहिं जाना तूने कैसा ज्ञानधारी रे
देहाश्रित कर क्रिया आपको मानत शिवमगचारी रे
शिव चाहे तो द्विविध कर्म तैं कर निज परिणति न्यारी रे।
क्यों सुकृतकुमारजी अब भी कुछ गुंजाइश है।
धर्म की कहानियाँ भाग-१४/८१
सुकृतकुमार - लगता है आप एकदम ठीक कह रहे हैं। मैं तो अब पण्डित
दौलतरामजी और पण्डित बनारसीदासजी का गहराई से अध्ययन
करूँगा।
जन साहव - यह अदालत सुकृतकुमार को अधूरे व एकांगी बयान देने के जुर्म
में ये चेतावनी देती है कि आगे से कभी भी इस अदालत मे
इसप्रकार के बयान न दें। नहीं तो कानूनी कार्यवाही की
जायेगी। अब आप जा सकते हैं।
धर्म वकील - जज साहब अब भी कोई गुंजाइश हो तो मैं अदालत में एक ऐसे
पण्डितजी को बुलाना चाहता हूँ जिन्होंने पण्डित टोडरमलजी
के “मोक्षमार्ग प्रकाशक” का बहुत गहराई से अध्ययन किया
है तथा जिनकी गवाही इस बात को साफ कर देगी कि पुण्य
मोक्षमार्ग में हेय है या उपादेय ।
जज - इजाजत है।
बाबू - पण्डित स्वरूपचन्दजी शास्त्री अदालत में हाजिर हों।
(बाबू शपथ दिलवाता है पण्डितजी दोहराते हैं)
धर्म वकील – पण्डितजी साहब ! पण्डित टोडरमलजी के अनुसार पुण्य मोक्षमार्ग
में हेय है या उपादेय ?
पण्डितजी - इस संबंध में अपने विचार रखते हुए पण्डित टोडरमलजी ने
मोक्षमार्ग प्रकाशन में लिखा है कि निचली दशा में कितने ही
जीवों को शुभोपयोग और शुद्धोपयोग का युक्तपना पाया जाता
है; इसीलिये उपचार से व्रतादिक शुभोपयोग को मोक्षमार्ग कहा
है; वस्तु का विचार करने पर शुभोपयोग मोक्ष का घातक ही है,
क्योंकि बंध का कारण वही मोक्ष का घातक है - ऐसा श्रद्धान
करना !
इसप्रकार शुद्धोपयोग को ही उपादेय मानकर उसका उपाय
करना और शुभोपयोग-अशुभोपयोग को हेय जानकर उनके
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८२
त्याग का उपाय करना। जहाँ शुद्धोपयोग न हो सके यहाँ
अशुभोपयोग को छोड़कर शुभ में ही प्रवर्तन करना, क्योंकि
शुभोपयोग की अपेक्षा अशुभोपयोग में अशुद्धता की अधिकता
है।
धर्म वकील - प्वाइंट नोट किया जाये जज साहव ! क्या मेरे काबिल दोस्त भी
कुछ पूछना चाहेंगे ?
पुण्य वकील - यस मीलॉर्ड ! पण्डितजी साहब ! तो क्या शुभ भाव करने वाला
कोई मोक्ष नहीं जा सकता तथा शुभ भाव और पुण्य से मोक्ष
मान लिया जाये ता क्या परेशानी है ?
पण्डितजी - परेशानी अरे महापरेशानी खड़ी हो जायेगी; जो भी इन शुभ
भात्रों में मोक्षमार्ग मानकर संतुष्ट हो जायेगा, उसे कभी भी
सच्चा मोक्षमार्ग नहीं मिल सकेगा। वह अनन्तकाल तक संसार
में ही भटकता रहेगा।
पुण्य वकील - तो वया मोक्षमार्ग में शुभ भाव होते ही नहीं हैं ?
पण्डितजी
अरे वकील साहब मोक्षमार्ग में शुभ भाव नहीं होते; ऐसी बात
नहीं हैं वहाँ पर भूमिकानुसार शुभ विकल्प आये बिना रहते नहीं
हैं। हम गृहस्थों की क्या बात कहें मुनियों को भी २८ मूलगुण
पालन करने रूप शुभ भाव आये बिना रहता नहीं है; परन्तु वे
उसे उपादेय नहीं मानते हैं हेय ही मानते हैं और निरन्तर शुभ
भाव से निकलकर शुद्धभाव में जाने का ही पुरुषार्थ करते
रहते हैं।
पुण्य वकील- बस मैं इतना ही पूछना चाहता था।
धर्म वकील - ठीक है पण्डितजी आप पधारें। जज साहब ! अब निर्णय में
जरा-सी भी देर नही लगनी चाहिये, क्योंकि अब अदालत में
सारी बात शीशे की तरह साफ हो चुकी है।
पुण्य वकील - नहीं जज साहब ! अभी बात साबित नहीं हुई है, क्योंकि मेरे
जज
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८३
काबिल दोस्त ने जितने भी सबत और गवाह अदालत में पेश
किये हैं; उन सबने गृहस्थ पण्डितों के ही प्रमाण पेश किये हैं।
मैं चाहता हूँ कि कुछ प्रामाणिक आचार्यों के भी प्रमाण पेश
किये जायें।
(सभी लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई)
आर्डर ! आर्डर अदालत की गरिमा बनाये रखें ।
धर्म वकील - आव्जेक्शन मीलॉर्ड ! मेरे काबिल दोस्त सम्माननीय पण्डितों
को अप्रमाणिक कहकर तीर्थंकर और आचार्यों की वाणी को
ही अप्रमाणिक कहना चाहते हैं, क्योंकि यह सभी पण्डित
तीर्थंकर और आचार्यों की वाणी का ही प्रतिपादन करते हैं।
अदालत में सम्माननीय पण्डितों की गरिमा को ठेस न पहुँचाई
जाये। फिर भी धर्म वकील आचार्यों के प्रमाण भी पेश करें।
जज -
धर्म वकील - ठीक है जज साहब मैं अदालत में जैनों के सर्वमान्य आचार्य
उमास्वामी के जैन संविधान; अनुच्छेद तत्त्वार्थसूत्र के दसवें
अध्याय से यह सूत्र पेश करना चाहूँगा
कृत्स्नकर्मविप्रमोश्रो मोक्षः ।
क्या मेरे काबिल दोस्त इस सूत्र का अर्थ बता सकते हैं ?
पुण्य वकील - क्यों नहीं ! इसका अर्थ है सम्पूर्ण कर्मों के क्षय होने पर निराकुल
मोक्ष पर्याय प्रगट होती है।
धर्म वकील - और आस्रव अधिकार में आये हुये “शुभः पुण्यास्य अशुभः
पापस्य”; सूत्र का क्या अर्थ है ?
पुण्य वकील - शुभ भाव पुण्यास्रव और अशुभ भाव पापासव का कारण है।
धर्म वकील - प्वाइंट नोट किया जाये जज साहब ! मेरे काबिल दोस्त ने ये खुद
स्वीकार किया है कि सम्पूर्ण कर्मों के नष्ट हो जाने पर मोक्ष होता
है और शुभ भाव से पुण्यास्रव होता है और अशुभ भाव से पाप
का आस्रव होता है, मतलब साफ है जज साहब ! मोक्ष ब्ध
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जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८६
धर्म वकील – तो शास्त्रीजी ! स्वामीजी के अनुसार मोक्षमार्ग में पुण्य का क्या
स्थान है ?
पण्डितजी - स्वामीजी का कहना तो यह है कि भाई ! जिनेन्द्र भगवान् के
दर्शन-पूजन भी न करे और तू अपने को जैन कहलावे ये तेरा
जैनपना कैसा ? जिस घर में प्रतिदिन भक्तिपूर्वक देव-गुरु-
शास्त्र के दर्शन-पूजन होते हैं, मुनिवरों आदि धर्मात्माओं को
आदरपूर्वक दान दिया जाता हे वह घर धन्य है; इसके बिना तो
घर श्मशान तुल्य है। अरे अधिक क्या कहें ? ऐसे धर्मरहित
गृहस्थाश्रम को तो हे भाई ! समुद्र के गहरे पानी में तिजाञ्जलि
दे देना; नहीं तो यह तुझे डुबो देगा।
उनके इस कथन से सिद्ध है वि. वे मोक्षमार्ग में पुण्य का स्थान
तो मानते थे, परन्तु उस पुण्य में उपादेयबुद्धि - धर्मबुद्धि का
निषेध करते थे; क्योंकि यदि यह जीव उसी में सन्तुष्ट हो जायेगा
तो फिर कभी निर्विकल्प आत्मानुभूति शुद्धोपयोगरूप धर्म का
अंगीकार नहीं कर सकेगा, इसलिये कभी-कभी तो वे मोक्षमार्ग
में उस पुण्य को जहर तक भी कह देते थे।
धर्म वकील - प्वाइंट नोट किये जाएँ जज साहब ! क्या मेरे काबिल दोस्त भी
कुछ पूछना चाहते हैं ?
पुण्य वकील - हाँ मैं भी कुछ सवालात करना चाहता हूँ। (पण्डितजी से)
पण्डितजी साहब ! हमने तो सुना है कि स्वामीजी पुण्य को
छुड़ाते थे तथा पुण्य-पाप दोनों को जड़ बताते थे – ऐसा सुनकर
तो सभी शुभ भाव को छोड़ हीं देंगे।
पण्डितजी - कौन मूर्ख कहता है कि स्वामीजी शुभ भाव को छुड़ाते थे,
उन्होंने स्वयं भारतवर्ष के अनेक तीर्थों की वन्दना की है; पंचकल्याणक कराये
हैं; गुजरात में जहाँ दिगम्बर जैनधर्म का कोई अस्तित्व ही दिखाई नहीं देता था,
कोई दिगम्बर जिनमन्दिर दिखाई ही नहीं देते थे; आज वहाँ उनके प्रभाव और
सदुपदेश से अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ है और आज वहाँ भी दिगम्बर
जेनधर्म का अस्तित्व दिखाई देने लगा है। अतः इससे सिद्ध होता है कि गुरुदेव
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८७
शुभ भाव नहीं छुड़ाते थे, अपितु वे तो अनादिकाल से चली आ
रही शुभ भाव में हितबुद्धि को छुडाने का उपदेश देते थे; क्योंकि
पूर्ण शुद्धोपयोग दिना शुभ भाव छूटता नहीं है, शुभ भाव होता
है; किन्तु शुभ भावों में ज्ञानी को आत्मबुद्धि नहीं होती।
इसलिए वे शुभ भाव करते-करते आत्मकल्याण हो
जाएगा – ऐसी मान्यता को छोड़ने का उपदेश देते हैं।
और जहाँ तक पुण्य-पाप को जड़ कहने का सवाल है तो पुण्य -
पाप भावों में चेतनता नहीं है, इसलिए उसे जड़ कहते हैं। पुण्य -
पाप स्पर्श-रस-गंध-वर्णवाला जड़ नहीं है, अपितु उसमें ज्ञान
नही है; इसलिए सगयसार के जीवाजीवाधिकार में उसे अजीव
तथा कर्ताकर्म अधिकार में जड़ कहा है। अतः स्वामीजी भी
पुण्य-पाप भाव में जानपना नहीं होने के कारण जड़ कहते थे।
पुण्य वकील - ठीक है; मैं इतना ही पूछना चाहता था।
धर्म वकील - ठीक है; पण्डितजी आप जा सकते हैं। देखा जज साहब, पुण्य
प्रकाश द्वारा लगाया गया यह इल्जाम कि सत्पुरुष कानजीस्वामी
दया-दान-पूजादि रूप शुभ भाव को मानते ही नहीं, सरासर
गलत और बेबुनियाद है; क्योंकि स्वयं उन्होंने इस बात की पुष्टि
की है कि मोक्षमार्ग में शुभ भाव भूमिकानुसार देखने में आते
हैं, इसलिए उसे परम्परा से पोश्च का कारण कह दिया जाता है;
परन्तु वास्तव में वह मोक्षमार्ग में हेय है, मोक्ष का कारण नहीं
है। यदि मेरे काबिल दोस्त अपनी सफाई में अब भी कुछ कहना
चाहें तो कहें।
पुण्य वकील - (निराशा पूर्वक) नो सर, दैट्स ऑल।
जज - (कुछ लिखकर फैसला सुनाते हैं।) तमाम ठोस तथ्यों, अथाह
आगप प्रमाणों और प्रमाणिक गवाहों के बयानों को मद्देनजर
रखते हुए अदालत इस निर्णय पर पहुँची है कि पुण्यप्रकाश का
जेनधर्म की कहानियाँ भाग-१४/८
यह पक्ष कि “मोक्षमार्ग में पुण्य और शुभ भाव उपादेय है और
सत्पुरुष कानजीस्वामी ने इसके विपरीत प्रचार किया है” यह सरासर झूठ
और बेबुनियाद है।
तथा यह अदालत धर्मचन्द के पक्ष से सहमत है कि मोक्षमार्ग में शुभ
भाव और पुण्यभाव होते हैं, पर उपादेय नहीं; आत्मानुभव रूप वीतराग धर्म ही
उपादेय है। जिनागम में दया-दान-पूजा-व्रत के जितने भी उपदेश दिये जाते हैं
यानि उन्हें मोक्षमार्ग कहा जाता है, वे सब कथन व्यवहार नय से हैं, वे भाव अशुभ
में जाने की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं पर उनको ही मोक्षमार्ग मान लेने से सच्चे मोक्षमार्ग के
लोप का प्रसंग आएगा। अतः शुभ भाव भूमिकानुसार होवें तो कोई हानि नहीं
है, होने भी चाहिए, होते भी हैं; पर इनको ही मोक्ष का कारण मान लेना मिथ्यात्व
है। तथा कुछ तथाकथित स्वार्थी लोगों ने सत्य को गहराई से समझे बिना मात्र
विवाद का बिन्दु बनाकर समाज में उत्तेजना पैदा की है। यह अदालत उन तमाम
लोगों को चेतावनी देती है कि वे इसप्रकार किसी ज्ञानी पुरुष के उपर झूठे आक्षेप
न लगायें अन्यथा उन्हें चार गति चौरासी लाख योनियों रूपी जेल में अनन्तकाल
के लिए जाना पड़ सकता है।
यह अदालत पुण्यप्रकाश को हिदायत देती है कि वे समयसार का पुण्य-
पाप एकत्वाधिकार, नाटक समयसार का पुण्य-पाप एकत्वद्वार, योगसार, मोक्षमार्ग
प्रकाशक का सातवाँ अधिकार, सत्पुरुष श्री कानजीस्वामी के प्रवचन रत्नाकर
भाग-४, श्रावकधर्म प्रकाश, ज्ञानगोष्ठी; डॉ० हुकमचन्द भारिल्लकृत पुण्य-पाप
एकत्व अधिकार का अनुशीलन और पण्डित रतनचन्द भारिल्ल के जिनपूजन
रहस्य का स्वाध्याय कर अपनी भ्रमितबुद्धि को सुधारें अन्यथा अनन्तकाल के
लिए संसार रूपी जेल में बंद रहना पड़ेगा।
पवन जैन ‘सिद्धार्थ’
जय जिनेन्द्र !
मुम्बई
प्रस्तुति :- सर्वश्री सौनू शास्त्री पोरसा, अभय शास्त्री खैरागढ़,
अविरल शास्त्री विदिशा, सन्दीप शास्त्री गोहद, धर्मेन्द्र
शास्त्री जयपुर, ललित शास्त्री बण्डा, मनीश शास्त्री रहली।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 495.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है