पुण्य प्रकृति से अनुभाग बंध | Punya Prakriti Se Anubhag Bandh

1st Para का सरल शब्दों में क्या अर्थ है?

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जैसे श्रेणिक राजा ने यशोधर मुनिराज पर उपसर्ग किया तब कषाय तीव्र था तो पाप प्रकृति (इसमे देश घाती ,सर्वघाति दोनों की पाप प्रकृति लेना है) का अनुभाग भी बहुत था और पुण्य प्रकृति का अनुभाग बहुत कम था।
परंतु जब उनकी कषाय मंद हुई और मुनिराज से क्षमा मांगी तब पुण्य प्रकति का बंध बहुत हुआ पाप प्रकुति का बंध बहुत कम हुआ।

मेरी समझ शक्ति में कुछ कमी हो तो बता सकते है।
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जैसे कोई मिथ्यादृष्टि जीव ही वो तीर्व कसाय में पाप प्रकति बांध कर नरक जायगा और बही मिथ्यादृष्टि मंद कसाय में स्वर्ग जायगा

Shibir #1: 26 Gomatsaar Karmkand By Dr Ujwala Shah
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यह बात ध्यान करने योग्य है कि संसारी जीवो के प्रति समय आयु कर्म को छोड़कर शेष सभी कर्मो का प्रत्येक समय बन्ध होता है।

अनुभाग का अर्थ होता है कर्म की फल देने की शक्ति, अर्थात् कोनसा कर्म किस density में फल देगा- तीव्र या मंद। यहाँ पर पंडितजी बताते है कि कोनसा कर्म कितनी शक्ति से फल देगा यह जीव की कषायों पर आधारित है, अथार्थ अनुभाग बन्ध कषायों से होता है।

तो मानो किसी जीव ने कोई तीव्र पाप परिणाम किया तो वहां बन्ध तो पाप और पुण्य दोनों ही प्रकृतियों का होगा परंतु चूंकी पाप परिणाम का पलडा ज़्यादा है तो इसलिए आगे कर्म पाप फल ही देगा, पुण्य फल गौण हो जाएगा।
और यदि कोई जीव पुण्य परिणाम करता है तो वहां भी पुण्य और पाप दोनों ही कर्मो की प्रकृतियां बंधेगी परन्तु पुण्य का पलड़ा ज़्यादा है इसलिए फल भी पुण्य रूप ही आएगा, पाप गौड़ हो जाएगा।

इस तरह कषायों से कर्म की फल देने की शक्ति decide होती है।

In addition to above all points, तीव्रता-मंदता का ज्यादा संबंध अंतरंग अभिप्राय से हैं। मृत्यु पर्यन्त सुअर तीव्र हिंसामय परिणामों से शेर से लड़कर देव गति को प्राप्त हुआ, वहाँ प्राणपर्यन्त मुनिराज को बचाने के परिणाम की मंदता को बताते हैं।