अत्यन्ताभाव का ही सर्वत्र इस्तेमाल क्यों? Prvachansaar gatha 106

हमने आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कांजीस्वामी के समयसार पर कुछ प्रवचन सुने हैं| उन्हीं के द्वारा लिखित ज्ञान-गोष्टी किताब भी पढ़ी है और भी विद्वानों के प्रवचन सुने हैं| हर कोई भेदज्ञान के लिए अत्यन्ताभाव (प्रदेश-भिन्नता) का जोरदार इस्तेमाल करता हुआ दिखाई देता है| शुद्धात्मा पर हमारा श्रद्धा/ज्ञान केंद्रित हो ये प्रयोजन तो हमें ख़याल में आता है| हम असमंजस में है की अभेद वस्तु में भेद करने के लिए अतद्भाव (प्रवचनसार गाथा 106) को नजर अंदाज करते हुए अत्यन्ताभाव का ही सर्वत्र इस्तेमाल क्यों किया गया है?

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