अत्यन्ताभाव का ही सर्वत्र इस्तेमाल क्यों? Prvachansaar gatha 106

हमने आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कांजीस्वामी के समयसार पर कुछ प्रवचन सुने हैं| उन्हीं के द्वारा लिखित ज्ञान-गोष्टी किताब भी पढ़ी है और भी विद्वानों के प्रवचन सुने हैं| हर कोई भेदज्ञान के लिए अत्यन्ताभाव (प्रदेश-भिन्नता) का जोरदार इस्तेमाल करता हुआ दिखाई देता है| शुद्धात्मा पर हमारा श्रद्धा/ज्ञान केंद्रित हो ये प्रयोजन तो हमें ख़याल में आता है| हम असमंजस में है की अभेद वस्तु में भेद करने के लिए अतद्भाव (प्रवचनसार गाथा 106) को नजर अंदाज करते हुए अत्यन्ताभाव का ही सर्वत्र इस्तेमाल क्यों किया गया है?

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अगर आप उपदेश शैली देखेंगे तो श्री कानजी स्वामी का मुख्य उपदेश आत्मानुभव की ओर है। जिसके लिए शुद्धात्मा के अलावा हर चीज़/तत्त्व उनके लिए दृष्टि में से, तथा ध्यान में से, सर्वथा निकालने योग्य है।

सिद्धांत की ओर से अतद्भाव का उपयोग ही सही है। लेकिन आध्यात्म में अतद्भाव का उपयोग होगा तो विकल्प खड़ा होगा क्योंकि अपेक्षा आ जाएगी। लेकिन उद्देश्य निर्विकल्पता का है इसलिए बाक़ी सब को गौण करते हुए भाषा में सर्वथा अभाव कर दिया है.

ये केवल कानजी स्वामी का नहीं है लेकिन आचार्यों की शैली भी है — जैसे समयसार 181 गाथा, नियमसार 50 गाथा (मोक्षभाव भी पुद्गल है इत्यादि).

आध्यात्म शास्त्र की शैली और आगम शास्त्र (सिद्धांत शास्त्र) की शैली में बहुत अंतर है क्योंकि प्रयोजन अलग अलग है.