प्रेम जब अनन्त हो गया | Prem jab anant ho gaya

प्रेम जब अनन्त हो गया, रोम रोम सन्त हो गया।
ज्ञान चेतना जग गई, जीव भगवन्त हो गया।
आतमा स्वभाव से महान, महान से महन्त हो गया।

मोह भाव से न भान था, कौन हूँ मेरा है क्या स्वरूप?
पाप - पुण्य ज्ञान के थे ज्ञेय, मैंने माना उनको आत्म रूप ॥
भेदज्ञान का गजब कमाल, आज मैं निहाल हो गया। (1)

साधना स्वभाव की जहाँ, साधुपन वहीं तो आयेगा।
शुद्ध स्वभाव का मनन जहाँ, मुनि बने तो शोभा पायेगा।
रत्नत्रय लहर बहे वहीं, रत्न का करंड मिल गया ॥(2)

शांति प्राप्ति के लिये किये, मैंने कोटि अब तलक उपाय।
छोड़ दी गृहस्थ जिंदगी, पाप-पुण्य छोड़ सुख विलास ।।
शांतिधाम था स्वयं प्रभु, देखते प्रसन्न हो गया ॥(3)

गिलवा सिकवा कुछ नहीं रहा, जो भी होता होने योग्य ही।
कोई भी न कर्ता धर्ता है, जीव ज्ञान मात्र है सदैव ॥
सब स्वतंत्रता से परिणमें, देख मेरा मोक्ष हो गया।(4)

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