प्रौढ़ बाल शिक्षा भाग-२ — जैन स्वाध्याय सामग्री | Praudh Bal Siksha Bhag-2

प्रौढ़ बाल शिक्षा भाग-२

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

श्री वीतरागाय नमः ॥

स्याद्वाद बाल-शिक्षा

दूसरा भाग

  • लेखिका *
    गणिनी आर्यिका श्री १०५ स्याद्वादमती माताजी

भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्

भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद् पुष्प संख्या - 138

आशीर्वाद : प.पू. आचार्य श्री 108 विमलसागरजी महाराज
म.पू. आचार्य श्री 108 भरतसागरजी महाराज

संयोजन : आर्यिका श्री 105 यशस्विनी माताजी

ग्रन्थ : स्याद्वाद बाल शिक्षा (भाग-2)

लेखिका : गणिनी आर्यिका श्री 105 स्याद्वादमती माताजी

संस्करण : तेईसवाँ

वीर निर्वाण सम्वत् 2041 सन् 2015

सर्वाधिकार सुरक्षित :

प्रकाशक : भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्

पुस्तक प्राप्ति स्थान : (1) गणिनी आर्यिका यशस्विनी माताजी संघ
(2) आचार्य विमल भरत साहित्य सदन
सम्वेदशिखरजी
(3) श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मन्दिर
डी-210, श्यामपार्क एक्सटेंशन
महावीर वाटिका, साहिबाबाद (उ.प्र.)

मूल्य : 12/- रुपये

मुद्रक : सुभाष ऑफसेट
मदनगंज-किशनगढ़ (राज.)
फोन : 01463-242121

अनुक्रमणिका

  1. प्रार्थना … 3
  2. नवदेवता स्तवन … 4
  3. दर्शन स्तुति … 6
  4. कर्त्तव्य … 9
  5. पंचपरमेष्ठी के मूलगुण … 11
  6. व्यसन … 21
  7. भावना … 31
  8. मेरी भावना … 35
  9. जिनवाणी स्तुति … 36
  10. दर्शन पाठ … 37
  11. जिनवाणी भक्ति … 39

प्रार्थना

हे वीतराग स्वामी, नित प्रार्थना हमारी।
अज्ञान को तजें हम, बन ज्ञान के पुजारीं ॥१॥

हिंसादि पाप तजकर
सत्पथ पे हम चलेंगे,
क्रोध कषाय तजकर।
समभाव हम करेंगे ॥१॥ हे वीतराग०

माता पिता की सेवा
भक्ति गुरुजनों की,
प्रातः सुखदी उठकर।
नित करेंगे ईश भक्ति ॥२॥ हे वीतराग०

दो नाथ हमको शक्ति
तुम सम बनेंगे हम भी,
दुःखियों की सेवा करके।
पायेंगे आत्म शक्ति ॥३॥ हे वीतराग०

नव देवता स्तवन

दोहा

परलोकी पाँचों नमुँ, जिनवाणी उरलाय।
जिन मार्ग को धारकर, जैय चैत्यालय ध्याय ॥
(तर्ज-अहो जगत् गुरु देव सुनियो ----------)

अरिहन्त प्रभु का नाम, है जग में सुखदाई।
पाति वन्तु क्षयकार, केवल ज्योति पाई।
वीतराग सर्वज्ञ, हित उपदेशी कहाये।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित भक्ति सुहाये ॥१॥

सिद्ध प्रभु गुणखान, सिद्धि के हो प्रदाता।
कर्म आठों सब काट, करते मुक्ति वासा ॥
शुद्ध बुद्ध अविकार, शिव सुखकारी भाता।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित माथे नावा ॥२॥

आचारज गुणकार, पञ्चाचार को पाले।
शिक्षा दीक्षा प्रधान, भविजन के दुख टाले ॥
अनुग्रह निग्रह काज, मुक्ति मार्ग चलावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो आचारज भजते ॥३॥

ज्ञान ध्यान लवलीन, जिनवाणी रस पीते।
अध्ययन शिक्षा प्रदान, संघ में जो नित करते ॥
रत्नत्रय गुणधाम, उपदेशामृत देते।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित उपाध्याय भजते ॥४॥

दर्शन ज्ञान चरित्र, मुक्ती मार्ग कहाये।
तिनप्रति साधन रूप, साधु दिगम्बर भाये ॥
विषयाशा को त्याग, निज आतम चित्त गावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित साधु ध्यावे ॥५॥

तत्व द्रव्य गुण सार, वीतराग मुख निकासी।
गणधर ने गुणधार, जिनमाता इक भूखी ॥
‘स्याद्वाद’ सिंह सार, वस्तु अनेकान्त गाई।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिनवाणी ध्याई ॥६॥

सम्यक् श्रद्धा सार, देव शास्त्र गुरु भाई।
सम्यक् तत्व विचार, सम्यक् ज्ञान कराई ॥
सम्यक् होय आचार, सम्यक् शान्ति गाई।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिन भारा ध्याई ॥७॥

वीतराग जिनबिम्ब, मूरत हो सुखदाई।
दर्पण सम जिनबिम्ब, दिखता जिसमें भाई ॥
कर्म कलंक नशाय, जो नित दर्शन पाते।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित चैत्य को ध्याते ॥८॥

वीतराग जिनबिम्ब, कृत्रिमकृत्रिम जितने।
शोभत है जिस देश, है चैत्यालय उतने ॥
उन सबकी जो सार, भक्ति महिमा गावे।
श्रद्धि-सिद्धि सब पाय, जो चैत्यालय ध्यावे ॥९॥

दोहा

नव देवता को नित भजे, कर्म कलंक नशाय।
भव सागर से पार हो, शिव सुख में रम जाय ॥
नोट-प्रतिदिन प्रातः पाठ करने से जीवन सुख, शान्ति और समृद्धि
को प्राप्त होता है।

३-कर्तव्य

२. ज्ञानानुति

अति पुण्य उदय मम आय, प्रभु तुमरा दर्शन पाया।
अब तक तुमको बिन जाने, दुःख पाये निज गुण हाने ॥
पाये अनंते दुःख अब तक, जात को निज जाकर।
सर्वज्ञ भाषित जात हितकर धर्म नहीं पहिचानकर ॥
भवबंध कारक सुखकारक, विषय में सुख मानकर।
निज पर विवेकज्ञान सुगम्य सुखबुधि सुधा नहीं पानकर ॥१॥

तब पर मम उर में आये, लखिमुनिगति विमोह पलये।
निज ज्ञान कला उर जागी, रुचिपूर्ण स्वहित में लागी ॥
रुचि लगी हित में आत्म के सत्संग में अब मन-लगा।
मन में हुई अब भावना, तब भक्ति में जाउं रंगा ॥
प्रिय वचन की हो टेव मुनि गुणगान में ही चित्तपगे।
शुभ शास्त्र का नित हो मनन, मन दोषवादनते भगे ॥२॥

कब समता उर में लाकर, द्वारा अनुप्रेक्षा भाकर।
ममता मय भूत भगाकर मुनिगत धर्मे बन जाकर ॥
भरकर दिगम्बर रूप कब, अवीचीगमुण पालन करूँ।
दोबिस परिषह सह सदा, शुभधर्म दश धारण करूँ ॥
तप गुरु द्वादशविधि सुखद शुभ नित बंध आस्रव परिहरूँ।
अष्ट रोकूं नूतन कर्मशक्ति, कर्मरिपु को निरदहूँ ॥३॥

कब धन्य सुअवसर पाऊँ, जब निज में ही समाऊँ।
कृतदिक भेद मिटाऊँ, रागदिक दूर भगाऊँ ॥
कर दूर रागदिक निरंतर, आत्म को निर्मत करूँ।
बल ज्ञान दर्शन सुख अनुत्तर, लहि रचित सात्विक आचरूँ ॥
आनंदकंद जिनेंद्र बन उपदेश को नित उच्चरूँ।
आवै ‘अमर’ कब सुखद दिन जब दुखद भवसागर तिरूँ ॥४॥

प्रश्न १- प्रतिदिन प्रातः उठकर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर- प्रतिदिन प्रातः जल्दी उठकर जो बार णमोकार मंत्र पढ़ना
चाहिए। फिर अपने दोनों हाथों को मिलाकर अंगुलियों
के २४ पर्वों पर २४ तीर्थंकर भगवान का नाम लेना
चाहिए। पंचपरमेष्ठी भगवान का ध्यान करना चाहिए।

प्रश्न २- प्रतिदिन हमारा क्या कर्तव्य है?
उत्तर- प्रतिदिन देव दर्शन करना हमारा कर्तव्य है। अपने से
बड़े पूज्य पुरुष माता-पिताई आदि को भी नमस्कार
करना चाहिए। बड़ों को नमस्कार करते समय जय-
जिनेन्द्र बोलना चाहिए।

प्रश्न ३- देवदर्शन कब करना चाहिए?
उत्तर- प्रतिदिन नित्य क्रिया (स्नानादि) से निवृत्त होकर सबसे
पहले मंदिर में जाकर देव दर्शन करना चाहिए।

प्रश्न ४- देवदर्शन क्यों करना चाहिए?
उत्तर- देवदर्शन करने से अपने आत्मस्वरूप का दर्शन होता है
और पाप कर्मों का क्षय होता है।

प्रश्न ५- मंदिर के लिये घर से कैसे निकलना चाहिए?
उत्तर- स्नानादि करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर, हाथों में अक्षत/
चावल आदि उत्तम द्रव्य लेकर मंदिरजी के लिए घर से
निकलना चाहिए। १ मीन पूर्वक, मार्ग में भी छोटे-छोटे
देखते हुए चलना चाहिए। रास्ते में भी मन में णमोकार
मंत्र का जाप करते रहना चाहिए।

प्रश्न ६- मंदिरजी में प्रवेश किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर- मंदिरजी में प्रवेश करने से पहले शुद्ध छने हुए प्रासुक
जल से पैरों को धोना चाहिए। फिर तीन बार निःसही
निःसही निःसही बोलते हुए मंदिरजी में प्रवेश करके
तीन बार ॐ जय जय जय बोलते हुए घंटा बजाना
चाहिए।

प्रश्न १९- मंदिरजी में जाकर सबसे पहले क्या करना चाहिए ?

उत्तर- मंदिरजी में जाकर सबसे पहले णमोकार मंत्र आदि पढ़ते हुए तीन परिक्रमा देनी चाहिये।

प्रश्न ८- तीन परिक्रमा क्यों देनी चाहिये ?

उत्तर- जन्म, जरा, मृत्यु को नाश करने की भावना से और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की प्राप्ति के लिए तीन परिक्रमा देनी चाहिये।

प्रश्न ९- दर्शन करते समय क्या बोलना चाहिये ?

उत्तर- भगवान के दर्शन करते समय दर्शन स्तुति बोलनी चाहिये।

प्रश्न १०- दर्शन स्तुति कौन सी है ?

उत्तर- दर्शन स्तुति अनेकों है उनमें से सरल सी एक यह है-

दर्शन स्तुति

प्रभु पतित पावन मैं अपावन, चरण आयो शरण जी।
यों विरद आप निहार स्वामि, मेटि जावन मरण जी ॥१॥
तुम ना पिछाणी आप मान्यो, देव विविध प्रकार जी।
यों बुद्ध सेती निज न जान्या, भ्रम गयो हितकार जी ॥२॥
भव विकट वन में कर्म वैरी, ज्ञान धन मेरो हरयो।
तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति फिरतो फिरयो ॥३॥
धन घड़ी यों भ्रम दिवस यों ही, धन जाम मेरे भयो।
अब भाग्य मेरे उदय आयो दशम प्रभु जी को लख्यो लयो ॥४॥
छवि वीतरागी नग्न मुद्रा, दृष्टि नासा पर धरै।
बंधु प्रतिहारी अनन्त गुण युग, कोटि रवि छवि को हरै ॥५॥
मिट्टे गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आगम भयो।
मो उर हरख ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो ॥६॥
मैं हाथ जोड़, नवाऊँ मस्तक, वीनऊँ तुम चरण जी।
संतोषिक त्रिकालपति जिन, सुनहुँ तारण-तरण जी ॥७॥
जाचूँ नहीं सुरवास पुनि, नर राज परिजन साथ जी।
वृष जाचूँ तुम भक्ति भव-भव, दीजिये शिवनाथ जी ॥८॥

प्रश्न ११- प्रथम छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- हे भगवान ! आप पवित्र हैं, मैं पापी हूँ, आपके शरण में आया हूँ। मेरी विनती सुनकर मेरे जन्म-मरण का नाश करो।

प्रश्न १२- दूसरे छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- मैंने अभी तक आपको नहीं पहचाना, रागी-द्वेषी देवी-देवताओं को पूजा की। इस बुद्धि से मैंने संसार में घूमना ही हितकारी समझा।

प्रश्न १३- तीसरे छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- इस संसाररूपी वन में कर्म शत्रुओं (चोरों) ने मेरे ज्ञान धन को चुरा लिया है, जिससे मैं इष्ट (सच्चे सुख) वस्तु को भूलकर खोटी चारों गतियों में घूम रहा हूँ।

प्रश्न १४- चौथे छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- धन्य है आज का यह समय, धन्य दिन है, मेरा जन्म आज सफल हो गया। मेरा भाग्यदायम हो गया जो आपके दर्शन मुझे मिल गये।

प्रश्न १५- पांचवें छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- हे भगवान् ! आप कैसे हैं ? आपकी वीतराग छवि है। नग्न शरीर है। नासा पर दृष्टि है, आप आठ प्रातिहार्य से युक्त हैं। अनंत गुणों से युक्त हैं। आपकी सुंदरता (तेज) करोड़ों सूर्यों के तेज से भी ज्यादा है।

प्रश्न १६- छठे छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- आपके दर्शन करने से ही मेरा मिथ्यात्व दूर हो गया। सम्यक्त्व सूर्य आत्मा में प्रकट हो गया। आपको देखकर आज इतना हर्ष हो रहा है मानो किसी गरीब को चिंतामणि रत्न मिल गया हो।

प्रश्न १७- सातवें छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- मैं हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर विनती करता हूँ कि हे प्रभु ! आप सब जगत में उत्तम हैं, तीन लोक के स्वामी हैं। स्वयं तिरकर दूसरों को भी तिरने वाले हैं।

प्रश्न १८- आठवें छंद का अर्थ क्या है ?

उत्तर- आपके दर्शन का फल मुझे स्वर्ग का सुख, मनुष्यों में राजा, माता-पिता, परिवार, धन आदि कुछ नहीं चाहिए। वृषजन कवि कहते हैं आपको भक्ति मुझे हमेशा प्राप्त हो।

प्रश्न १९- दर्शन स्तुति बोलने के बाद क्या करना चाहिए ?

उत्तर- दर्शन स्तुति बोलने के बाद जिनेन्द्र देव का अभिषेक और अष्टद्रव्य से पूजा करनी चाहिए। गुरु (मुनिराज) हो तो उनके दर्शन करके प्रवचनादि सुनना चाहिये, नहीं तो स्वाध्याय अवश्य करना चाहिये।

प्रश्न २०- पूजादि के बाद क्या करना चाहिये ?

उत्तर- पूजादि करने के बाद कुछ समय के लिए आत्मस्वरूप का चिंतन करना चाहिये एवं यह भी चिंतन करना चाहिये कि मुझमें और भगवान में राग और वैराग्य का अन्तर है। मैं भी भगवान् कब बनूँगा ऐसी भावना करना चाहिये।

प्रश्न २१- मंदिर से घर को जाते समय क्या बोलना चाहिये ?

उत्तर- मंदिर से निकलते समय पुनः दर्शन की भावना भाते हुए सभी सम्यग्दर्शनों की भक्ति की प्रशंसा करते हुए अःअःअः, अःसःअः, अःसःअः शब्द उच्चारण करते हुए घर आना चाहिये।

पंचपरमेष्ठी के मूलगुण

प्रश्न २२- अरहंत के ४६ मूलगुण कौन-से हैं ?

उत्तर- चौंतीसों अतिशय सहित, प्रतिहार्य युत आठ।
अनंत चतुष्टय गुण सहित, छियालीस ठाठ ॥
उत्तर- २४ अतिशय, ८ प्रातिहार्य और ४ अनंत चतुष्टय ये अरहंत के ४६ मूलगुण हैं।

प्रश्न २३- २४ अतिशय कौन से हैं ?

उत्तर- १० अतिशय जन्म के, १० केवलज्ञान के और १४ देवों के द्वारा किए हुए। इस प्रकार अरहंत के ३४ अतिशय होते हैं।

प्रश्न २४- जन्म के १० अतिशय कौनसे हैं ?

उत्तर- १. अतिशय रूप सुगन्ध तन, नहिं पसेव निहार।
२. प्रियवचन अनुपलब्ध, रुधिर श्वेत आकार ॥
३. लक्षण सहस्र आठ तन, समचतुष्क संहनन।
४. अनुपमज्ञानराजयुत, ये अनन्त दश जान ॥
उत्तर- १. अत्यन्त सुन्दर रूप। २. सुगंधित शरीर।
३. पसीना नहीं आना। ४. निहार रहित (मल-मूत्र नहीं होना)
५. हित-मित-प्रिय वचन। ६. अतुल्य बल।
७. दूध के समान सफेद खून।
८. समचतुरस्रसंस्थान। ९. वज्रवृषभनाराचसंहनन।
१०. शरीर में १००८ लक्षणों का होना।

प्रश्न २५- केवलज्ञान के १० अतिशय कौन से हैं ?

उत्तर- १. योजन शत इक में सुभिक्ष, गगन गमन मृदु चार।
२. नहिं अदया उपसर्ग नहिं, नहिं करालहार ॥
३. सब विद्या-ईश्वरूपन, नहिं बड़े नख केश।
४. अनिमिष दृग छाया रहित, दश केवल के वेश ॥
उत्तर- १. १००-१०० योजन में सुभिक्षा होना।
२. आकाश में गमन।
३. चतुर्मुख (एक ही मुँह चारों ओर से चारमुख रूप दिखाई देना।)
४. पूर्ण दया का होना।
५. उपसर्ग नहीं होना।
६. कवलाहार (ग्रासाहार) नहीं होना।
७. सब विद्याओं के ईश्वर होना।
८. नख, केश (बाल) नहीं बढ़ना।
९. आँख की पलकों का नहीं झपकना।
१०. शरीर की छाया नहीं पड़ना।

प्रश्न २६- देवों द्वारा किये जाने वाले १४ अतिशय कौन से हैं ?

उत्तर- १. देवकृत है चारदश, अष्टमांगधी भाष।
२. आपसमाहीं मित्रता, निर्मल दिश आकारा ॥
३. होत फल फूल ऋतु सबै, पृथ्वी कांच समान।
४. चरण कमल तल कमल है, जैजै जय जय जान ॥
५. मन्द सुगन्ध बयारि पुनि गन्धोदक की वृष्टि।
६. भूमिमिषै कपटक नहीं, हर्षमयी सब सृष्टि ॥
७. धर्मचक्र आगे रहे, पुनि वसु मंगल सार।
८. अतिशय श्री अरहन्त के, ये चौंतीस प्रकार ॥
उत्तर- १. अर्द्धमागधी भाषा।
२. परस्पर मित्रता।
३. दिशाओं का निर्मल होना।
४. आकाश का निर्मल होना।
५. छहों ऋतुओं के फल-फूल एक समय में फलना।
६. दर्पण के समान पृथ्वी का होना।
७. स्वर्णिमय कमलों की रचना (भगवान के चरणों के नीचे २२५ कमलों की रचना)
८. देवों द्वारा आकाश में जय-ध्वनि।
९. शीतल मंद सुगंध पवन चलना।
१०. सुगंधित जलवृष्टि होना।
११. भूमि कंटक रहित होना।
१२. समस्त जीवों का आनन्दमयी होना।
१३. धर्मचक्र आगे-आगे चलना।
१४. अष्ट मंगल द्रव्यों का होना।

प्रश्न २७- अष्ट मंगल द्रव्य कौन से हैं ?

उत्तर- १- छत्र
२- चमर
३- छोटा कलश
४- झारी
५- ध्वजा
६- पंखा
७- स्वस्तिक
८- दर्पण

प्रश्न २८- आठ प्रातिहार्य कौन से हैं ?

उत्तर- १- अशोक वृक्ष
२- सिंहासन
३- तीन छत्र
४- भामण्डल
५- दिव्यध्वनि
६- पुष्पवृष्टि
७- चमर
८- दुंदुभि बाजे

प्रश्न २९- चार अनन्त चतुष्टय कौन से हैं ?

उत्तर- ज्ञान अनन्त अनन्त सुख, दरस अनन्त प्रमाण।
बल अनन्त अरहंत सो, इष्टदेव पहिचान ॥
उत्तर- (१) अनन्त दर्शन (२) अनन्त ज्ञान (३) अनन्त सुख (४) अनन्त वीर्य

प्रश्न ३०- अरहंत परमेष्ठी के किस कर्म के क्षय से कौन-सा गुण प्रगट होता है ?

उत्तर- अरहंत परमेष्ठी को-
ज्ञानावरणी कर्म के क्षय से अनन्त ज्ञान।
दर्शनावरणी कर्म के क्षय से अनन्त दर्शन।
मोहनीय कर्म के क्षय से अनन्त सुख।
अन्तराय कर्म के क्षय से अनन्त वीर्य प्रगट होता है

प्रश्न ३१- अरहंत भगवान् और केवली भगवान् में क्या अन्तर है ?

उत्तर- अरहंत और केवली भगवान् में कोई अन्तर नहीं है। दोनों नाम पर्यायवाची हैं।

प्रश्न ३२- तीर्थंकर और अरहंत में क्या अन्तर है ?

उत्तर- तीर्थंकर के ४६ मूलगुण होते हैं, उनका शासन चलता है। तीर्थंकर के पूर्ण मूलगुण होते हैं। अरहंत अनेक

किन्तु तीर्थंकर तो २४ ही होते हैं। जो तीर्थंकर होते हैं वे अरहंत ही होते हैं। अरहंत हैं वे तीर्थंकर हों भी, नहीं भी हों।

प्रश्न ३३- दिव्यध्वनि किनकी खिरती है ?

उत्तर- अरहंत केवली की दिव्यध्वनि का नियम नहीं है किन्तु जो अरहंत तीर्थंकर हैं उनकी दिव्यध्वनि नियम से खिरती है।

प्रश्न ३४- अरहंत और तीर्थंकर अरहंत में और भी अन्तर है क्या ?

उत्तर- हाँ, और भी अन्तर है-
१. जब तीर्थंकर भगवान् गर्भ में आते हैं तब माता सोलह स्वप्न देखती है।
२. तीर्थंकर के ५,३,२, कल्याणक होते हैं, अरहंत के ऐसा नियम नहीं है।
३. तीर्थंकर के समवसरण की रचना होती है अरहंत के मात्र गंधकुटी की रचना होती है।

प्रश्न ३५- तीर्थंकर की माता के १६ स्वप्नों के नाम लिखिये ?

उत्तर- १. हाथी।
२. सिंह।
३. बैल।
४. कलश करती हुई लक्ष्मी।
५. दो मालाएँ।
६. उगता सूर्य।
७. चन्द्रमा।
८. मीन (मछली) का जोड़ा।
९. दो पूर्ण कलश।
१०. कमलपुष्प सरोवर।
११. सागर।
१२. सिंहासन।
१३. देव विमान।
१४. फणीन्द्र विमान।

प्रश्न ३६- रत्न राशि।

१५. धूम रहित अग्नि।

प्रश्न ३७- पाँच कल्याणकों के नाम कौन से हैं ?

उत्तर- १-गर्भ कल्याणक
२-जन्म कल्याणक
३-तप कल्याणक
४-ज्ञान कल्याणक
५-मोक्ष कल्याणक

प्रश्न ३७- अरहंत भगवान में कौन से १८ दोष नहीं होते हैं ?

जन्म जरा तिर्खा क्षुधा, विस्मय आरत खेद।
रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिन्ता स्वेद ॥
रागद्वेष अरु मरणजुत, ये अष्टादश दोष।
नाहि होत अरहन्त के, सो छवि लोक मोष ॥
उत्तर- अरहंत भगवान में निम्न १८ दोष नहीं होते हैं-
१-जन्म
२-बुढ़ापा
३-प्यास
४-भूख
५-आश्चर्य
६-आरत
७-दुःख
८-रोग
९-शोक
१०-मद (मान)
११-मोह
१२-भय
१३-निद्रा
१४-चिन्ता
१५-स्वेद
१६-राग
१७-द्वेष
१८-मरण

प्रश्न ३८- सिद्ध भगवान के ८ मूलगुण कौन से हैं ?

समकित दरसन ज्ञान, अरुगुरु लघु अवगाहन।
सूक्ष्म वीरजवान, निराबाध गुण सिद्ध के ॥
उत्तर- १-सम्यक्त्व
२-अनंत दर्शन
३-अनंत ज्ञान
४-अगुरु लघु
५-अवगाहन
६-सूक्ष्मत्व
७-अनंतवीर्य
८-अव्याबाध

प्रश्न ३९- किस कर्म के क्षय से कौनसा गुण सिद्धों में प्रकट होता है ?

उत्तर- १-ज्ञानावरणी कर्म के क्षय से अनंतज्ञान गुण।
२-दर्शनावरणी कर्म के क्षय से अनंतदर्शन-गुण।
३-वेदनीय कर्म के क्षय से अव्याबाध गुण।
४-मोहनीय कर्म के क्षय से सम्यक्त्व गुण।
५-आयु कर्म के क्षय से अवगाहन गुण।
६-नामकर्म के क्षय से सूक्ष्मत्व गुण।
७-गोत्र कर्म के क्षय से अगुरुलघु गुण।
८-अंतराय कर्म के क्षय से अनंत वीर्य गुण सिद्धों में प्रकट होते हैं।

प्रश्न ४०- आचार्य परमेष्ठी के ३६ मूलगुण कौन से हैं ?

द्वादश तप, दश धर्मयुत, पालै पंचाचार।
षट् आवशिगं इन्द्रियगुप्ति गुन, आचायज पद सार ॥
उत्तर- १२ तप, १० धर्म, ५ पंचाचार, ६ आवश्यक और ३ गुप्ति ये ३६ मूलगुण आचार्य परमेष्ठी के होते हैं।

प्रश्न ४१- बारह तप कौन से हैं ?

अनशन ऊनोदर करें, व्रतसंख्या रस छोर।
विविक्तशय्यासन करें, कायकलेश सुदोर ॥
प्रायश्चित्त पर विनययुत, वैयावृत स्वाध्याय।
पुनि उत्सर्ग विवासकै, धरे ध्यान मन लाय ॥
उत्तर- १-अनशन
२-ऊनोदर
३-व्रतपरिसंख्यान
४-रसपरित्याग
५-विविक्तशय्यासन
६-कायकलेश
७-विनय
८-वैयावृत
९-स्वाध्याय
१०-व्युत्सर्ग
११-ध्यान

प्रश्न ४२- दस धर्म कौन से हैं ?

उत्तर- खिमा मारदव आरजव सत्यवचन चिपणाग।
संयम तप त्यागी सरव आकिञ्चन’ तियत्याग ॥
१-उत्तम क्षमा
२-उत्तम मार्दव
३-उत्तम आर्जव
४-उत्तम शौच
५-उत्तम सत्य
६-उत्तम संयम
७-उत्तम तप
८-उत्तम त्याग
९-उत्तम आकिञ्चन
१०-उत्तम ब्रह्मचर्य

प्रश्न ४३- पंचाचार कौन से हैं ?

दर्शन ज्ञान चरित्र तप, वीज पंचाचार।
गोपे मन वच काय को, गिन छत्तीस गुण सार ॥
उत्तर- १-दर्शनाचार
२-ज्ञानाचार
३-तपाचार
४-चारित्राचार
५-वीर्याचार

प्रश्न ४४- आवश्यक कौन से हैं ?

समता धर वन्दन करें, नाना श्रुति बनाय।
प्रतिक्रमण स्वाध्याय जुत, कायोत्सर्ग लगाय ॥
उत्तर- १-समता
२-वंदना
३-स्तुति
४-प्रतिक्रमण
५-प्रत्याख्यान
६-कायोत्सर्ग

प्रश्न ४५- गुप्ति कौन सी हैं ?

उत्तर- १-मनोगुप्ति २-वचनगुप्ति ३-कायगुप्ति।

प्रश्न ४६- उपाध्याय परमेष्ठी के २५ मूलगुण कौन से हैं ?

प्रथमादि आचारंग गनि, दूजो सूत्रकृतांग।
ठाणांग तीजो सुगग, चोथो समवायांग ॥
व्याख्याप्रज्ञप्ति पाँचमी, सातकुथा षट् जान।
पुनि उपासकाध्ययन है, अंतःकृद्दश ठान ॥
अनुत्तरोपपाददश, सूत्रविपाक पिच्छान।
बहुरि प्रश्नव्याकरण जुत, त्यारह अंग प्रमान ॥
उत्तर- ग्यारह अंग और १४ पूर्व ये २५ मूलगुण उपाध्याय परमेष्ठी के हैं।

प्रश्न ४७- ११ अंग कौन से हैं ?

उत्तर- १-आचारांग
२-सूत्रकृतांग
३-स्थानांग
४-समवायांग
५-व्याख्याप्रज्ञप्ति
६-ज्ञातृधर्मकथांग
७-उपासकाध्ययनांग
८-अंतकृद्दशांग
९-अनुत्तरोपपादकदशांग
१०-प्रश्नव्याकरणांग
११-विपाक सूत्रांग

प्रश्न ४८- चौदह पूर्वों के नाम कौन से हैं ?

उत्पादपूर्व अग्रायणी, तीजो वीरजवाद।
अस्तिनास्ति प्रवाद पुनि, पंचम ज्ञान प्रवाद ॥
छठ्ठो कर्म प्रवाद है, सत्यप्रवाद पहिचान।
अष्टम आत्मप्रवाद पुनि, नवमो प्रत्याख्यान ॥
विद्यानुवाद पूर्व दशम, पूर्वकल्याण महन्त।
प्राणवाद क्रिया बहुल, लोकबिन्दु है अन्त ॥
उत्तर- १-उत्पाद पूर्व
२-अग्रायणी पूर्व
३-वीर्यानुवाद पूर्व
४-अस्तिनास्ति प्रवाद पूर्व
५-ज्ञानप्रवाद पूर्व
६-सत्यप्रवाद पूर्व
७-आत्मप्रवाद पूर्व
८-कर्मप्रवाद पूर्व
९-प्रत्याख्यानवाद पूर्व
१०-विद्यानुवाद पूर्व
११-कल्याणवाद पूर्व
१२-प्राणवाद पूर्व
१३-क्रियाविशाल पूर्व
१४-लोकबिन्दुसार पूर्व

प्रश्न ४९- साधु परमेष्ठी के २८ मूलगुण कौन से हैं ?

उत्तर- ५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इंद्रिय निरोध, ६ आवश्यक, ७ शेष गुण = २८ मूलगुण।

प्रश्न ५०- पाँच महाव्रत ५ समिति कौन से हैं ?

हिंसा अनृत तस्करी, अब्रह्म परिग्रह पाय।
मनवच तनतै त्यागरो, पंच महाव्रत थाय ॥
उत्तर- १-अहिंसा महाव्रत, २-सत्य महाव्रत, ३-अचौर्य महाव्रत, ४-ब्रह्मचर्य महाव्रत और ५-परिग्रहत्याग महाव्रत।
५-समिति
ईर्या भाषा एषणा, पुनि क्षेपण आदान।
प्रतिष्ठापनात् क्रिया, पांच समिति विधान ॥
१-ईर्या समिति २-भाषा समिति ३-एषणा समिति
४-आदाननिक्षेपण समिति ५-उत्सर्ग समिति।

प्रश्न ५१- पाँच इन्द्रिय निरोध किसे कहते हैं ?

उत्तर- स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण इन पाँचों इन्द्रियों को वश में करना इन्द्रिय निरोध है।

प्रश्न ५२- छह आवश्यक कौन से हैं ?

उत्तर- १-समता २-वन्दना ३-स्तुति ४-स्वाध्याय ५-प्रतिक्रमण ६-कायोत्सर्ग।

प्रश्न ५३- सात शेष गुण कौन से हैं ?

सपरस सरस नासिका, नयन श्रोन का रोध।
षटआवशिगं मंजन तजन, शयन भूमिका शोध ॥
वस्त्रत्याग करलुंचन अरु, लघु भोजन इक बार।
दाँतुन मुख में ना करें ठाड़े लेहि अहार ॥

प्रश्न ५४- सात शेष गुण कौन से हैं ?

उत्तर- १-करोशीच करना।
२-नग्न रहना।
३-स्नान नहीं करना।
४-भूमि पर सोना।
५-अदंत धावन (दाँतों को नहीं धोना)।
६-खड़े-खड़े हाथ में आहार लेना।
७-दिन में एक बार आहार लेना।

प्रश्न ५५- पंच परमेष्ठियों के कुल कितने मूलगुण हैं ?

उत्तर- पंच परमेष्ठियों के कुल १४३ मूलगुण हैं।

प्रश्न ५६- सिद्ध भगवान बड़े हैं फिर भी अरहंत को पहले नमस्कार क्यों किया है ?

उत्तर- संसारी जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं इसलिये हितकारी होने से पहले अरहंत भगवान को नमस्कार किया है।

प्रश्न ५७- अरहंत भगवान के ४६ मूलगुणों में आत्माश्रित गुण कितने हैं ?

उत्तर- अरहंत भगवान के ४६ मूलगुणों में से आत्माश्रित ४ गुण हैं।

प्रश्न ५८- आत्माश्रित गुण कौन-कौन से हैं ?

उत्तर- १-अनंत दर्शन २-अनंत ज्ञान ३-अनंत सुख ४-अनंत वीर्य ये ४ गुण आत्माश्रित हैं।

५-व्यसन

प्रश्न ५९- व्यसन किसे कहते हैं, वे कितने हैं ?

उत्तर- बुरी आदतों को व्यसन कहते हैं। व्यसन सात होते हैं-
१-जुआ खेलना, २-मांस खाना, ३-शराब पीना
४-शिकार करना, ५-वेश्या गमन करना, ६-चोरी करना
७-परस्त्री सेवन करना।

प्रश्न ६०- जुआ खेलने से क्या हानि है ? कहानी बताइये।

उत्तर- जुआ खेल सब अनर्थों की खानि है। एक समय युधिष्ठिर दुर्योधन के साथ जुआ खेलने लगे। खेल में सारी सम्पत्ति हार गये। अन्त में युधिष्ठिर ने द्रौपदी आदि को भी दाव पर रख दिया। दुर्योधन उन्हें भी जीत गये। इस हार से द्रौपदी, इतनी सबको अपमानित होना पड़ा। द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डवों को बारह वर्ष तक वनवास भी करना पड़ा। इस प्रकार जुआ बुरा व्यसन है। जो खेलता है उसका धन, सम्पत्ति, स्त्री आदि सब बिगड़ जाते हैं और चारों तरफ अपमानित होना पड़ता है। बुद्धिमानों को कभी भी जुआ नहीं खेलना चाहिए। जुआ खेलने से युधिष्ठिर प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न ६१- और भी कौन-कौन सी बुरी आदतें जुआ व्यसन के अन्तर्गत आती हैं ?

उत्तर- कई ऐसी अहित की आदतें हैं, जो जुआ व्यसन के ही अन्तर्गत आती हैं जैसे-सट्टा करना, हार-जीत लगाना, लाटरी के टिकट खरीदना, हँसी मजाक में शर्तदि लगाना, चौपड़, ताश के पत्ते, अंटी आदि खेलें जिनमें पैसे लगाकर हार-जीत लगाई जाती है, सब ही जुआ के अन्तर्गत हैं।

प्रश्न ६२- मांस खाने से क्या हानि है कहानी बताइये ?

उत्तर- मांस जीवों का वध करके तैयार किया जाता है, इस मांस में अनंतानंत जीव उत्पन्न हो जाते हैं जिसके खाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है, दुर्गति में जाना पड़ता है।
एक मांसलोभी की कहानी इस प्रकार है-
एक वन नाम का एक राजा मांसलोभी था, वह प्रति-दिन मांस खाता था। एक दिन रसोइया ने एक मासूम बालक का मांस पकाकर उसे दिया। राजा को वह बहुत अच्छा लगा। प्रतिदिन ऐसा ही मांस भोजन में मुझे मिलना चाहिये ऐसा उसने रसोइया से कहा। अब प्रतिदिन गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को मारकर रसोइया राजा को मांस खिलाने लगा। एक माँ का इकलौता पुत्र था अब उसकी बारी थी। वह हृदय फाड़-फाड़ कर करुण क्रंदन करती थी। भीम ने उसकी करुणापूर्ण आवाज सुनी और उसके संकट को दूर करने का संकल्प लिया।
भीम और ब्रक राजा का आपस में युद्ध हुआ। दुष्ट मांसभक्षी को भीम ने क्रोध में आकर उसकी पीठ पर एक लात मारी, पश्चात् उसका पेट पकड़ कर उसको पछाड़ कर जमीन पर गिराया। मर कर वह तैंतीस सागर की आयु वाले घोर नरक में गया।

प्रश्न ६३- क्या कोई और भी चीजें हैं जिनके खाने में मांस का दोष लगता है।

उत्तर- हाँ, बाजार के अभक्ष, जलेबी, चाट आदि जो रात-दिन खुले रहते हैं, कई दिन की बनी चतुर्दशी जिन पर मक्खियाँ बैठती हैं, मर जाते हैं, सब मांस जैसे पिंड बन जाते हैं। इसके अलावा बहुत दिनों के बड़े, पापड़, अचार, मुरब्बा भी खाने योग्य नहीं है। इसके अलावा बिस्कुट, डब्लूटी, ब्रेड आदि भी बुरी वस्तुएँ हैं इसे खाने से मस्तिष्क कमजोर होता है। तथा मांस खाने का दोष लगता है।

प्रश्न ६४- शराब पीने से हानि बताएँ हुए उसमें प्रसिद्ध आदमी की कथा बताइये ?

उत्तर- शायद अनंत जीवों के कलेवर से निकला जूस है इससे अनेकों हानियाँ हैं, एक कथा इस प्रकार है-
द्वारकापुरी के राजकुमारों ने नवजोवन को जाते हुए प्यास से पीड़ित होकर मद्य को पानी समझ कर पी लिया और उन्मत्त होकर नाचते-गाते हुए नगर को आ रहे थे कि मार्ग में द्विपायन मुनि को देखकर उन पर पत्थरों की और छोटे शब्दों से गालियों की वर्षा की। क्रोध के वश मुनि ने चारों ओर से द्वारिकापुरी को जला दिया और मरकर दुर्गति गमन किया। यह सब शराब का ही दुष्फल है। इस सुरापान में ‘यादव’ प्रसिद्ध हुए।
शराब पीने से कैंसर, फेफड़ों में खराबी एवं नाना प्रकार के रोग हो जाते हैं। पागल के समान घूमता हुआ व्यक्ति सत्य-असत्य को भी नहीं जान पाता है।

प्रश्न ६५- शिकार एवं उसका फल बताइये ?

उत्तर- अपने मनोरंजन के लिए बाग, गोली आदि से वन्य जीवों को मारना शिकार है, इसका फल अनंतकाल तक दुःख है।
कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है-
ब्रह्मदत्त नाम का राजा शिकार में प्रसिद्ध हुआ।
एक बार जंगल में एक श्यामी मुनिराज शितलतर पर ध्यान लगाये बैठे थे। ब्रह्मदत्त राजा शिकार के लिए वन को गया पर मुनिराज के प्रभाव से सफलता नहीं मिली। कई दिनों तक ऐसा होता रहा। मुनिराज पर उसे बहुत क्रोध हुआ। एक दिन मुनिराज आहार को गये तब उसने शिला को भरकर अग्नि से तप्तमान कर दिया। मुनिराज नियमनुसार जलती हुई उसी शिलातट पर ध्यान के लिए बैठ गये। ध्यान की विशुद्धता से मुनिराज को केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। राजा शिकार समय नरक में गया। इसीलिए शिकार कभी नहीं खेलना चाहिए।

प्रश्न ६६- वेश्या व्यसन और उसका फल बताइये ?

उत्तर- काममदत्त से पीड़ित होकर सार्वजनिक व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास जाना वेश्या व्यसन है।
एक व्यसनी की कथा इस प्रकार है-
एक धनाढ्य पुत्र चारुदत्त को कौन नहीं जानता जो भोला-भाला एवं धार्मिक संस्कारों से परिष्कृत था। परन्तु कुछ मित्रों की संगत वेश्या व्यसनी बन गया। पत्नी, माता-पिता, मित्रादि के समझाने पर भी वेश्या व्यसन को नहीं छोड़ सका। उसे यह लगने लगा कि सिर्फ वेश्या ही मुझे प्यार करती है बाकी सब झूठा प्रेम करते हैं। अब चारुदत्त का सारा पैसा वेश्या में अपने कब्जे में कर लिया तो धीरे-धीरे प्रीति कम करने लगी। एक दिन स्वयं का खराब समझकर उसे पाखाने में डलवा दिया। अतः बंधुओं, तन-मन-धन तीनों को नष्ट करने वाले वेश्यागमन से सदा दूर रहना चाहिए।

प्रश्न ६७- चोरी एवं उसका फल बताइये ?

उत्तर- किसी के यहाँ डाका डालकर, धोखा देकर उनकी वस्तुओं को हड़पना चोरी है। चोरी से अनेकों हानियाँ होती हैं
एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है-
एक शिवभूति नामक ब्राह्मण सत्यघोष नाम से प्रसिद्ध था। वह कहता था मैं असत्य कभी नहीं बोलूँगा। यदि बोलूँगा तो छुरी से जिह्वा काट लूँगा। एक दिन समुद्रदत्त सेठ उसकी सच्चाई से प्रसन्न होकर अपने कीमती चार रत्न उसके पास रखकर व्यापार के लिए चला गया। बारह वर्ष बाद बहुत-सा धन लेकर आ रहा था। उसको भूख हुई, सब धन वह हो गया। सेठ ने सत्यघोष के पास आकर अपने चार रत्न माँगे। पुरोहित ने गवाल कर कर घर से निकाल दिया। न्याय के लिए राजा के पास गया। राजा ने कुछ न सुना परन्तु रानी ने अपनी युक्ति से सत्यघोष को चोरी को पकड़ लिया और उसके घर से रत्न मँगवा लिये। राजा ने सत्यघोष के लिए प्रथम गोबर भक्षण कर या
दूसरा मुक्का (मुष्टिप्रहार) खाने का दण्ड दिया, तीसरा धन राजा को सौंप कर देश निकाला।
सत्यघोष तीनों ही दण्ड सहन नहीं कर पाया, मरकर राजा के भण्डार में सर्प हुआ। इसलिये कभी भी चोरी नहीं करना चाहिए।

प्रश्न ६८- परस्त्री सेवन एवं उसका फल बताइये ?

उत्तर- कामवासना से पीड़ित होकर विवाहित व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास आना-जाना परस्त्री सेवन है। इस परस्त्री सेवन में लंकाधिपति रावण प्रसिद्ध हुए। माता-पिता की आज्ञा को मानने वाले महापुरुष रामचन्द्रजी १४ वर्ष वनवास के लिए गये। साथ में पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण थे। परस्त्री के मोह में आकर होकर रावण सीता को छल से हर हर लंका ले आया। सीता को विषय भोग के लिए बहुत मनाया पर सीताजी दृढ़ थी। रामचन्द्र जी हनुमान से सीताजी का पता लगाकर लंका पहुँचे। रावण को बहुत समझाया पर वह नहीं माना। अंत में भाई विभीषण भी राम जी सेवा में जा मिला। राम और रावण का घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में रावण अनेक कुलदेवियों सहित मारा गया।
रावण को बुद्धि परस्त्री के मोह में नष्ट हो गई थी। इस कारण हित के वचन भी उसे नहीं सुहाते थे। उसका तन, धन, जन सब नष्ट हो गया। बुद्धिमानों को परस्त्री को दूर से ही त्याग देना चाहिये। माँ-बहन-बेटी के समान उनसे व्यवहार करना चाहिये।

प्रश्न ६९- किसी से ताश (पत्ते) खेलना, सट्टा, मटका आदि एवं लाटरी के टिकट खरीदना क्या इनको भी व्यसन कहते हैं ?

उत्तर- हाँ। जितनी भी खेल जुआ लगाकर खेले जाते हैं, जितना भी कार्य हार-जीत की बाजी लगाकर किया जाता है वह सब व्यसन कहलाता है क्योंकि पैसे से खेलने वाला व्यक्ति एक दिन पूरे धन को बर्बाद कर देता

जो दोनों को उन्नति नहीं होने देते हैं। इनसे शरीर रोगों हो
जाता है और बुद्धि नष्ट हो जाती है।
प्रश्न ७४- किसी को गाली देना, निंदा करना आदि भी व्यसन
है क्या ?
उत्तर- हाँ, किसी को गाली देने से दूसरे का दिल दुखता है,
दूसरे की निंदा करने से भी दूसरे का दिल दुखता है
इससे महा हिंसा होती है। यह बुरी आदतें भी व्यसन
हैं। हंसी-मजाक में खोटे शब्द बोलना, शरीर की
कुरूपेश आदि भी व्यसन हैं।
प्रश्न ७५- अन्य भी कौन-सी बुरी आदतें हैं जो व्यसन कहलाती
हैं बताइये ?
उत्तर-
(१) स्कूल में जाकर दूसरे की पेन, कॉपी, पेन्सिल बिना पूछे
ले लेना, चुरा लेना।
(२) परीक्षा में प्रश्न का उत्तर | हल याद नहीं होने पर चीट
करना, दूसरे की नकल करना भी एक बुरी आदत है,
इससे बुद्धि का विकास रुक जाता है।
(३) अधिक सिनेमा देखना, खोटे नृत्यादि देखना, खोटे
गीतगाते सुनना ये भी बुरी आदतें हैं।
(४) अंटी, चौपड़, शतरंज आदि खेलना, अभक्ष्य, भक्षण
करना, बिना प्रयोजन इधर-उधर घूमना, अधिक बोलना
सभी बुरी आदतें व्यसन कहलाती हैं। सभी बुरे कार्य
दुःख देने वाले हैं इनका सभी को त्याग करना चाहिये।
(५) गुस्सा करना, जिद करना, मान करना, बड़ों की आज्ञा
नहीं मानना ये सभी खोटी आदतों में शामिल हैं।
प्रश्न ७६- बुरी आदतों से (व्यसनों से) छूटने के उपाय बताइये ?
उत्तर- बुरी आदतों से छूटने के लिये अशुभ को छोड़कर शुभ कार्य
करने की आदत डालनी चाहिये। जैसे-देवदर्शन, पूजा
भक्ति आदि जिनसे पुण्य बंध होकर कर्म जा-२ गेता है।
स्वाध्याय बाल शिक्षा २७ भाग २

है। सभी उसे बुरी निगाह से देखते हैं। जुआरी व्यक्ति
में सभी खोटे व्यसन सहज में ही आ जाते हैं।
प्रश्न ७०- माँस खाना बुरा व्यसन क्यों है ? इससे क्या शरीर
में ताकत आती है ?
उत्तर- माँस खाने से शरीर में ताकत नहीं आती बल्कि बुद्धि
धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है। माँस खाने से शरीर में रोग
हो जाते हैं। मृतक या जिन्दे जीव का कलेवर खाने
वाला महाहिंसक क्रूर दुष्ट कहलाता है। माँस खाना
मनुष्यों का काम नहीं है वह तो राक्षसों का काम है।
प्रश्न ७१- माँस त्याग करने वाला अंडा खा सकता है या
नहीं ? क्या वह शाकाहारी होता है ?
उत्तर- नहीं, अंडा शाकाहारी नहीं होता। अण्डा नवजात शिशु
का कलेवर है। इसके खाने में माँस के बराबर ही पाप
लगता है। इसलिये अण्डे से बनी वस्तुएँ माँस त्यागी
को कभी भी नहीं खाना चाहिये।
प्रश्न ७२- शराब तो फलों के रसों से बनती है इसे बुरा क्यों
कहा गया है ?
उत्तर- शराब ताजे फलों के रस से नहीं बनती है। अनेक
फलादि पदार्थों को सड़ा-गलाकर यह तैयार की जाती
है। सड़े हुए फलों में जीव राशि उत्पन्न हो जाती है।
उन जीवों के कलेवर से शराब तैयार होती है। शराब
पीने से बुद्धि नष्ट हो जाती है शराबी व्यक्ति पागल की
तरह घूमता-फिरता है। शरीर की शक्ति खो देता है।
अधिक शराब पीने वाले व्यक्ति मर भी जाते हैं इसलिये
शराब एक बहुत खराब वस्तु है। इसको पीने का त्याग
करना चाहिये।
प्रश्न ७३- क्या सभी नशा उत्पन्न करने वाली वस्तुएँ व्यसन
हैं ?
उत्तर- हाँ, नशीली वस्तुएँ भंग, तम्बाकू, कोका-कोला, बीड़ी,
सिगरेट आदि सब बुरे व्यसन हैं। शरीर और आत्मा
स्वाध्याय बाल शिक्षा २६ भाग २

प्रश्न ५७- उन्मादादि पढ़ना, सिनेमा देखना आदि बुरी आदतों
को छोड़ने के क्या उपाय हैं ?
उत्तर- महापुरुषों के चरित्र, सती अंगना, चन्द्रनादि की कथाएँ
पढ़नी चाहिये। पद्मपुराण, श्रेणिकचरित्र, श्रीपाल, मैना
सुन्दरी आदि के सुन्दर कथानक पढ़ना चाहिये जिससे
खोटे उन्मादादि पढ़ने की आदत छूट सकती है।
तीर्थों के सुन्दर-सुन्दर चित्र देखिये, तीर्थों की
फिल्म हृदय में खींचकर सुबह-शाम ध्यान का बटन दबा
दीजिये। किसी सिनेमा हाल में जाने की जरूरत ही नहीं
पड़ेगी।
प्रश्न ८०- परीक्षा में नकल करने की बुरी आदत कैसे छूट
सकती है ?
उत्तर- दूसरे की नकल करने से अपना सही भी गलत हो
सकता है। और चिट करने से पकड़ने पर अपमान भी
सहना पड़ता है इसलिये अच्छी विद्यार्थी की प्रतिदिन
स्कूल में ध्यान से गुरुओं के मुख से पढ़ाया हुआ सुनना,
घर आकर पुनः पढ़ना चाहिये। रोजाना प्रातः उठकर
पढ़ाई करना चाहिये। बारह महीने अच्छी पढ़ाई करने
पर नकल अपने आप छूट जाती है।
प्रश्न ८१- शराब पीने की आदत कैसे छूट सकती है ?
उत्तर- जिनभक्तिरूपी शराब का नशा जिसे चढ़ जाता है वह
कभी भी शराब नहीं पीता है। जिनेन्द्रदेव की भक्ति,
स्तुति का नशा चढ़ते ही सारे नशे उतर जाते हैं।
इसलिये भक्तामर, सहस्रनामस्मरणी भक्ति का रस पीने से
शराब पीने की आदत छूट सकती है।
प्रश्न ८२- जुआ, हार-जीत से छूटने के उपाय बताइये ?
उत्तर- कभी से हार-जीत करिये, कर्मों से जुआ खेलिये। जैसे-
१- आज हम क्रोध नहीं करेंगे यदि किया तो नमक नहीं
खायेंगे।
२- रोज पन्द्रह मिनट स्वाध्याय करता हूँ तो हम एक घण्टे
स्वाध्याय करेंगे।
स्वाध्याय बाल शिक्षा २९ भाग २

प्रश्न ७७- ताश (पत्ते) खेलने की आदत छोड़ने के लिए क्या
उपाय है ?
उत्तर- पत्ते खेलते समय तत्त्वचिन्तन करते जाइये बुरी आदत
छूट जायेगी। पत्तों में १-९ पत्ता कीमती है हमें शिक्षा
देता है।
इक्का कहता है — आत्मा एक है।
दुक्की कहती है — संसारी और मुक्त के भेद से जीव के
दो भेद हैं।
तिक्की कहती है — रत्नत्रय मोक्ष का मार्ग है।
चौकी कहती है — ४ आराधनाएँ मुक्ति की कारण हैं।
पंजा कहती है — संसार में ५ परावर्ती हो दर-दरना है।
छक्की कहती है — छः द्रव्यों से विश्व बना है।
सत्ती कहती है — ७ तत्त्वों का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है।
अट्ठी कहती है — ८ सम्यग्दर्शन के अंग हैं।
नहला कहता है — ९ नव पदार्थों में जीव पदार्थ है।
दहला कहती है — दस धर्म ही मुक्ति के सोपान हैं।
गुलाम कहती है — शरीर आत्मा का गुलाम है।
बेगम कहती है — मैं शरीर का भोक्ता नहीं हूँ।
बादशाह कहती है — शरीर कर्म, द्रव्य कर्म, नोकर्म,
भावकर्मरूपी शत्रुओं का नाश करने
वाला मैं बादशाह हूँ।
जो ऐसी ताश खेलता है वह भेदविज्ञानी कर्म का
नाश कर मुक्ति प्राप्त करता है।
प्रश्न ७८- अधिक बोलना, अधिक घूमना इनसे छूटने के उपाय
बताइये ?
उत्तर- व्यर्थ अधिक बोलने की आदत छोड़ने के लिए बहुत
प्रकार से भगवान की स्तुतियाँ, भजन, पुण्यादि बोलना
चाहिये एवं अधिक घूमना है तो मन्दिर जाइये, तीर्थों की
वन्दना कीजिये, गुरुओं के पास जाइये जिससे पुण्यबंध
होकर मुक्ति का मार्ग मिल जायेगा।
स्वाध्याय बाल शिक्षा २८ भाग २

६-भावना
प्रश्न ८८- भावना किसे कहते हैं ? ये कितनी होती हैं ?
उत्तर- बार-बार चिन्तन करने का नाम भावना है, इनका दूसरा
नाम अनुप्रेक्षा भी है। यह १२ होती हैं।
प्रश्न ८९- भावनाओं के नाम किस प्रकार हैं ?
उत्तर- १-अनित्य भावना २-अशरण भावना ३-संसार भावना
४-एकत्व भावना ५-अन्यत्व भावना ६-अशुचि भावना
७-आस्रव भावना ८-संवर भावना ९-निर्जरा भावना
१०-लोक भावना ११-बोधदुर्लभ भावना १२-धर्म
भावना।
प्रश्न ९०- अनित्य भावना किसे कहते हैं ?
उत्तर- राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार।
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ॥
राजा, राणा, छत्रपति हाथियों पर बैठने वाले सब
एक दिन समाप्त हो जाने वाले हैं। कोई भी मृत्यु से
बचने वाला नहीं है। यह अनित्य भावना है।
प्रश्न ९१- अशरण भावना कौन-सी है ?
उत्तर- दलबल देवी देवता, मात-पिता परिवार।
मरती बिरिया जीव को, कोई न रखनहार ॥
इस संसार में जीव को कोई भी शरण नहीं है।
मरते समय माता-पिता, देवी-देवता कोई भी बचाने
वाला नहीं है। यह अशरण भावना है।
प्रश्न ९२- संसार भावना किसे कहते हैं ?
उत्तर- दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णावश धनवान।
कबहूँ न सुख संसार में, सब जग देखो छान ॥
संसार में सभी जीव दुखी हैं, कोई पैसे से दुखी
है, कोई इच्छा से दुखी है। कहीं भी सुख नहीं है।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ३१ भाग २

३- राजू दो घण्टे ध्यान करता है तो उसे हररोज़ ४ घंटे
ध्यान करेंगे। यह सच्ची हार-जीत कर्मों को काटकर
मुक्ति ले जायेगी।
४- राजू सौ रुपये का दान करता है तो मैं १००० रुपये का
दान करूँगा आदि जुआ से छूटने के उपाय हैं।
प्रश्न ८३- परस्त्री सेवन की आदत छोड़ने का उपाय क्या है।
उत्तर- परस्त्री को माँ-बहिन के समान समझना चाहिये। आत्मा
में रमण करना चाहिये। जिनवाणी माता के साथ रमण
करने वाला कभी भी परस्त्री सेवन नहीं कर सकता है।
स्वाध्याय बाल शिक्षा ३० भाग २

प्रश्न १७- एकत्व भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय।
जो कबहुँ इम जीव को, साथी समा न कोय ॥
इस संसार में जीव अकेला ही जन्म लेता है अकेला
ही मरता है कोई भी इसका साथी नहीं है।

प्रश्न १८- अन्यत्व भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- नहीं देह अपनी नहीं, नहीं न अपना कोय।
घर संपत्ति पर प्रगट ये, पर है परिजन लोय ॥
संसार में कोई भी अपना नहीं है। यह शरीर भी
अपना नहीं है, तो घर, धन आदि कैसे अपने हो
सकते हैं।

प्रश्न १९- अशुचि भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- दिये चाम-दादर मयी, हाड़ पींजरा देह।
भीतर या सम जगत में, अवर नहीं घिन-गेह ॥
यह शरीर हाड़-मांस से बना हुआ है। इसके
समान कोई घृणित पदार्थ संसार में नहीं है।

प्रश्न २०- आश्रव भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- मोह नींद के जोर, जगवासी भ्रमे सदा।
कर्म चोर चहुँ ओर, सरबस लूटे सुख नहीं ॥
मोह से युक्त होकर जीव संसार में घूमता है और
कर्म इसे लूट लेते हैं।

प्रश्न २१- संवर भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- सतगुरु देव जगाय, मोहनींद जब उपशमें।
तब कछु बनें उपाय, कर्म-चोर आवत रुकें ॥
मोह मन्द होता है तब गुरु के उपदेश से कुछ
उपाय करने पर कर्म चोरों का आना रुक जाता है।

प्रश्न २२- निर्जरा भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- ज्ञान-दीप-तप तेल घर, क्षय शीशे भ्रम घोर।
या विध बिन निकसें नहीं, पैठे पूरब चोर ॥
पञ्च महाव्रत संचरण, समिति पंच परकार।
प्रबल पंचे इन्द्री विजय, धार निर्जरा सार ॥

प्रश्न २३- लोक भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- चौदह राजू उतंग नभ, लोक पुरुष-संठान।
तामें जीव अनादिते, भरत है बिन ज्ञान ॥
१४ राजू ऊँचा लोक है इसमें जीव ज्ञान के बिना
अनादिकाल से भ्रमण कर रहा है।

प्रश्न २४- बोधिदुर्लभ भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- धन-कंचन राज सुख, सबहि सुलभकर जान।
दुर्लभ है संसार में, एक जयवंत ज्ञान ॥
संसार में धन, सम्पत्ति, स्त्री, राज्य सबका मिलना
सरल है पर आत्मज्ञान, सच्चा ज्ञान मिलना कठिन है।

प्रश्न २५- धर्म भावना किसे कहते हैं ?

उत्तर- जोचे सुर-तरु देव सुख, चिन्ता चिन्ता रैन।
बिन जाचे बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन ॥
कल्पवृक्ष तो माँगने पर चीज देता है पर धर्म बिना
माँगे ही सब सुख देता है।

प्रश्न २६- संसार से छूटने वाली कौन-कौन सी भावनाएँ हैं ?

उत्तर- संसार से छूटने वाली सोलह भावनाएँ हैं। और
मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ ये ४ भावनाएँ भी हैं।

प्रश्न २७- आत्मचिन्तन की भावना कैसे करना चाहिए, उसका

क्या लाभ है ?
उत्तर- मैं भी पंचपरमेष्ठी के समान हूँ। मुझ में और सिद्ध में
द्रव्य से भेद नहीं है, पर्याय का भेद है। यह भेद कब
मिटे और मैं भी शाश्वत् सिद्ध बन जाऊँ ऐसी भावना का
रोजाना चिन्तन करने वाला जीव स्वयं भी सिद्ध भगवान्
बन जाता है।

प्रश्न २८- सोलहकारण भावनाओं के नाम बताइये ?

उत्तर- १-दर्शन विशुद्धि २-विनय सम्पन्नता ३-शील
व्रतेष्वनतिचार ४-अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग ५-संवेग ६-शक्ति
त्याग ७-शक्तिस्त्याग ८-साधु समाधि ९-वैयावृत्ति
१०-अर्हद्भक्ति ११-आचार्य भक्ति १२-बहुश्रुत भक्ति
१३-प्रवचन भक्ति १४-आवश्यकपरिहाणि १५-मार्ग
प्रभावना १६-प्रवचन वात्सल्य ये १६ कारण भावनाएँ
हैं।

प्रश्न २९- सोलहकारण भावनाओं का फल बताइये ?

उत्तर-
दरश विशुद्धि करै जो कोई, ताको आगमज्ञान न होई।
विनय महा धरै जो प्राणी, शिव वनिता की सखी बखानी ॥१॥
शील सदा जू जो नर पालै, सो आस्रव को आपद टालै।
ज्ञानाभ्यास करै मनमाहीं, तोके मोह महातम नाहीं ॥२॥
जो संवेग भाव विस्तारै, सुग मुक्तिपद आप निहारै।
दान दय मन हरष विशेषे, इह भव जस परभव सुख देषे ॥३॥
जो तप तपें तपें अभिलाषा, छर करम शिखर गुरुवाषा।
साधुसमाधि सदा मनलाई, तिहुँ जग भोग भूमि शिव जाई ॥४॥
निशदिन वैयावृत्य करैया, सो निर्बंध भवांतर तिरैया।
जो अर्हत भगति मन आनै, सो जिन कल्प कषाय न जानै ॥५॥
जो आचारज भगति करै है, सो निस्सल आचार धरै है।
बहुश्रुतजन भगति जो करै, सो नर सगुण धरई ॥६॥
प्रवचन भगति करै जो ज्ञाता, लहै ज्ञान प्रमानंद दाता।
षट् आवश्यक काल जो साधै, सो ही रत्नत्रय आराधे ॥७॥
धरम प्रभाव करै जे ज्ञानी, तिनै शिवनाराय रीति पिछानी।
वत्सल अंग सदा जो ध्यावै, सो तीर्थंकर पदवी पावै ॥८॥
देव लोक, सोहना, सहित धरै व्रत जोय।
इंद्र नरखगपद धानत शिव पद होय ॥
जो सोलह भावनाओं को भाता है वह देव इन्द्रों के द्वारा
वंदनीय तीर्थंकर पद प्राप्त करके मुक्ति पाता है।

८- मेरी भावना

प्रश्न १०२-

उत्तर-
जिसने रागद्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया,
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया।
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो,
भक्ति भाव से प्रेरित हो यह, चित्त उसी में लीन रहो ॥१॥
विषयों की आशा नहीं जिसके, साम्यभाव धन रखते हैं,
निज पर के हित साधन में जो, निरन्तर तत्पर रहते हैं।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं,
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुःख समूह को हरते हैं ॥२॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे,
उन्हीं जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे।
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ,
परधन वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ ॥३॥
अहंकार का भाव न रखूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ,
देख दूसरों की बढ़ती पर, कभी न ईर्ष्या भाव धरूँ।
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ,
बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥४॥
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे,
दीन-दुःखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे।
दुर्जन-क्रूर कुमार्गवर्ती पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे,
साम्यभाव रखूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ॥५॥
गुणगोंजों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे,
बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे,
गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे ॥६॥

९- जिनवाणी स्तुति

ॐ ज्ञानानंदजी कृत

केवली कंत लाड़गय गंज, जगदवद्य अघानाशो हमारे।
सत्य स्वल्पे मंगलाष्टक मन मंदिर में तिष्ठो हमारे ॥टेका॥
जम्बुस्वामी गौतम गणधर, हुए सुधर्मा पुर तुम्हारे।
जायते स्वर्ग पार लहैं करके, दे उपदेश बहुत जन तारे ॥१॥
कुन्दकुन्द अकलंक देव अहो, विद्यानंदि आदि मुनि सारे।
तम कुमुद-कुमुद-चन्द्रमा ये शुभ, शिक्षागत दे स्वर्ग सिधारे ॥२॥
तुमने उत्तम प्रकारी, जग के भ्रम सब क्षय कर डारे।
तेरी जाति निरखी लखवाये, षट् षष्टि छिनते तिन विचारे ॥३॥
भवभय पीड़ित खित्त जन, जब जो आवें शरण तुम्हारे।
छिन में उनके तब तुमने, करुणा करि सब संकट टारे ॥४॥
जब तक विषय कषाय नहीं गहि, कर्मसुख नहीं जब निवारे।
तब तक ज्ञानानंद रहे नित, सब जीविन में समता धारे ॥५॥

१०- दशर्न पाठ

सकल ज्ञेय ज्ञायक, तदपि, निसानन्द रस लीन।
सो जिनेंद्र जयवंता नित, अरि रज रस विहीन ॥१॥
जय वीतराग विज्ञान पूर, जय मोह तिमिर को हरन सूर।
जय ज्ञान अनन्तानन्त धार, सुख वीर्य लच्छी मण्डित अपार ॥२॥
जय परम शांति मूरत संत, भवि जन को निज अनुभूति हेत।
भावि भागन वश जोये वशाय, तुम धुनि धुनि विक्रम वशाय ॥३॥
तुम गुण चिन्तत निज पर विवेक, प्रगटे विप्रट अनेक।
तुम अवभूषन दूषण विमुक्त, सब महिमा युक्त विकल मुक्त ॥४॥
अविच्छिन्न शुद्ध चेतन स्वरूप, परमात्म परम पावन अनूप।
शुभ-अशुभ विभावादि अमल क्षीण, स्वाभाविक परिणामय अखीण ॥५॥

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3051.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है