प्राणी मात्र के कल्याण तथा सामाजिक सद्भाव एवं सामरस्य की दृष्टि से दशलक्षण धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Prani Matra Ke Kalyan Tatha Samajik Sadbhav Evan Samrasya Ki Drishti Se Dashlakshan Dharm

प्राणी मात्र के कल्याण तथा सामाजिक सद्भाव एवं सामरस्य की दृष्टि से दशलक्षण धर्म

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प्राणी मात्र के कल्याण तथा सामाजिक सद्भाव एवं सामरस्य की दृष्टि से दश लक्षण धर्म :

प्रो० महावीर सरन जैन

आत्मा का सहज स्वभाव ही उसका धर्म है। राग-द्वेष रहित आत्मा का सहज स्वभाव क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य है। धर्म के इन १० लक्षणों एवं अंगों की प्रासंगिकता भी है। ये सभी अहिंसा परम-धर्म के पोषक धर्म हैं। क्या अहिंसक व्यक्ति किसी पर क्रोध कर सकता है ? क्षमा उसका सहज स्वभाव हो जाता है। जिसके मन में सृष्टि के कण-कण के प्रति प्रेम एवं करुणा है क्या वह किसी पर क्रोध कर सकता है ? जो सभी जीवों पर मैत्रीभाव रखता है वह क्या किसी की हिंसा कर सकता है ? विश्लेषण पद्धति की दृष्टि से धर्म के सामान्य लक्षणों, अंगों, विधियों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है
धर्मभाव = सद्गुणों का वरण। अधर्मभाव = दुर्गुणों में आसक्ति

१ क्षमा क्रोध वैर द्वेष
२ मार्दव विनम्रताकरुणाणा एवं विनयशीलता अहंकार गर्व मान मद
३ आर्जव निष्कपटता हृदय की शुद्धता माया कपटता कुटिलता मिथ्यात्व
आत्मा संशोधन मन, वाणी एवं कर्म की
एकता समभाव एवं समरसता
४ सत्य सत्य-आचरण झूठ बोलना दुर्वचन मिथ्या व्यवहार
५ शौच आत्मशुद्धि पवित्रता लोभ बंधन मल भोगों में रत
रहना।
६ संयम अप्रमाद आत्म संयम इन्द्रिय लोलुपता प्रमाद
७ तप मननिग्रह अन्तःकरण की पवित्रता वासनाएँ कषाय कल्पनाएँ
८ त्याग दान करना परिग्रहों का त्याग संग्रह तृष्णा आसक्ति
९ अनासक्ति
आकिंचन्य अपरिग्रह वृत्ति वस्तुओं के प्रति आसक्ति ममत्व एवं
मन का अहंकार परिग्रह वृत्ति
१० ब्रह्मचर्य कामवासना पर विजय कामाचार विषय वासनाओं में लीन होना
कामभाव का संयमीकरण इंद्रियों की चंचलता

१. क्षमा

सामाजिक जीवन में राग के कारण लोभ एवं काम की तथा द्वेष के कारण क्रोध एवं वैर की वृत्तियों का संचार होता है। क्रोध के कारण संघर्ष एवं कलह का वातावरण बनता है। क्रोध में अहंकार एक उर्वरक का काम करता है। इस दृष्टि से क्रोध एवं अहंकार एक दूसरे के पूरक हैं। अहंकार से क्रोध उपजता है तथा क्रोध का अहंकार के कारण विकास होता है। क्रोधी मनुष्य जलते लोह पिंड के समान अंदर ही अंदर दहकता एवं जलता रहता है। उसकी मानसिक शांति नष्ट हो जाती है। विवेकपूर्ण कार्य करने की स्थिति समाप्त हो जाती है। क्रोध के कारण कोई व्यक्ति दूसरे का उतना अहित नहीं कर पाता जितना अहित वह स्वयं अपना कर लेता है।

अहंकार से पूरित होकर व्यक्ति अपने को सब कुछ समझने लगता है। यह यह समझता है कि उसके पास इतनी शक्ति है कि वह दूसरों को नष्ट कर सकता है। उसमें अपने आपको बड़ा मानने तथा दूसरों को अपने से छोटा समझने की चेतना विकसित होती है। वह सोचता है कि दूसरे व्यक्तियों का अस्तित्व और विकास उसकी इच्छा पर निर्भर है। वह स्वामी है, दूसरे सेवक हैं। वह टुकड़े बाँटता है, दूसरे उसके टुकड़ों पर पलते हैं। इसी अहंकार के कारण वह समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा करने लगता है कि सब उसके ही इशारों पर चलें, सब उसके स्वार्थ की सिद्धि में सहायक हों। जब कोई व्यक्ति स्वतन्त्र निर्णय लेकर अपनी मर्जी से चलना चाहता है अथवा उसके स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता तो वह आहत हो उठता है और उसका क्रोध जाग जाता है।

क्रोध में विनय तथा समता की भावना नष्ट हो जाती है। समता का भावना का विकास होने पर अहंकार उत्पन्न नहीं होता तथा क्रोध का पौधा मुरझाने लगता है। इसका कारण यह है कि आत्मतुल्यता की चेतना से सम्पन्न दूसरों के व्यवहार तथा आचरण से व्यक्तिगत धरातल पर अशांति का अनुभव नहीं करता।

यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या क्रोध सर्वथा त्याज्य है? क्या समाज की व्यवस्था तोड़ने वाले व्यक्ति पर क्रोध नहीं करना चाहिए? व्यवस्था बनाये रखने वाले अधिकारी को क्या क्रोध नहीं करना चाहिए?

अन्याय एवं अनाचार के प्रति आवेश करना एक बात है तथा अहंकार के कारण क्रोधित होना दूसरी बात है। समाज की व्यवस्था एवं नियम के विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति पर सामाजिक न्याय की भावना के कारण क्रोधित होने वाली मानसिकता, अहंकार की भावना से उत्पन्न क्रोध की मानसिकता से भिन्न होती है। अपने सामाजिक जीवन के दायित्व-बोध के आधार पर आचरण करने तथा क्रोध एवं

अहंकार के वशीभूत आचरण करने में अन्तर है। अहंकार से क्रोधित व्यक्ति जब किसी का विनाश करना चाहता है तब वह अपना विवेक खो देता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक भावना से प्रेरित होकर सामाजिक विकास में बाधक बनने वाले असामाजिक एवं दुष्ट व्यक्तियों का दमन करता है तो वह अपने विवेक को कायम रखता है। वह दुष्ट व्यक्तियों का दमन इसलिए करता है जिससे सामाजिक व्यवस्था कायम रह सके। उसके मन में दुष्ट व्यक्ति को सुधारने का संकल्प होता है, उसके अस्तित्व को मिटा देने का नहीं। वह प्रतिकार इसलिए नहीं करता क्योंकि किसी के द्वारा उसका अपमान हुआ है, अपितु उसके ही सुधार एवं कल्याण के लिए वह सामाजिक दृष्टि से अन्याय करने वाले व्यक्ति का प्रतिशोध करता है।

क्रोध के अभ्यास से व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है। क्रोध से अन्या व्यक्ति सत्य, शील एवं विनय का विनाश कर डालता है। किसी ने उसका अहित किया है या कोई उसका अहित करना चाहता है इसके अनुमान मात्र के आधार पर वह तत्क्षण क्रोधित हो जाता है। इस प्रकार सोच समझकर कार्य करने की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। इसके कारण द्वेष भाव का विकास एवं विस्तार होता है। सम्पूर्ण जगत को वह अपना शत्रु समझने लगता है। उसके जीवन दर्शन विध्वंसात्मक हो जाता है। संघर्ष, तोड़-फोड़, विनाश, हत्या आदि उसका जीवन की प्रवृत्तियाँ हो जाती हैं। इस प्रकार जब क्रोध का विकास होता है, विस्तार होता है तो व्यक्ति की सम्पूर्ण मानवीयता एवं सामाजिकता नष्ट हो जाती है। इस स्थिति पर यदि नियन्त्रण नहीं हो पाता तो उसके अपराधी बन जाने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

गीता में कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है तथा बुद्धि के नाश हो जाने से आदमी कहीं का कहीं नहीं रह जाता :
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं, अन्याय का प्रतिकार करने के लिए बार-बार कहते हैं किन्तु दूसरी तरफ युद्ध में क्रुद्ध जाने की प्रेरणा देनेवाले श्रीकृष्ण क्रोध से बचने के लिए सर्वत्र सावधान करते हैं। गहराई से विचार करने पर इस प्रतीतमान अंतर्विरोध का रहस्य इस तथ्य में निहित है कि लोक मंगल की साधना के लिए अन्याय का प्रतिकार करने तथा क्रोधित होकर दूसरे का नाश करने के लिए तत्पर होने में बहुत अन्तर है।

क्रोध का विरोधी भाव क्षमा है। क्षमा, ‘क्षम’ धातु से बना है। इसके दो मुख्य अर्थ हैं। एक अर्थ में क्षमा का अर्थ है धैर्य, सहनशीलता एवं विनम्रता। दूसरे अर्थ में क्षमा सामर्थ्यवाचक है- सहने योग्य होना अर्थात् पर्याप्त सक्षम होना।

क्षमाशील व्यक्ति धैर्यवान होता है, विनम्र होता है एवं अत्यन्त सहनशील होता है। क्षमा कायरता नहीं है। क्षमाशील व्यक्ति समर्थ एवं सक्षम होता है। दुःख पहचानने वाले व्यक्ति को वह प्रदर्शित कर सकता है, किन्तु अपनी क्षमाशीलता के कारण वह उस दुःख को सहन करता है, विनम्र रहता है। वह क्रोध को शान्ति के साथ जीतता है। "ऐसा व्यक्ति कभी रहित होकर श्रेयादि कषाय को नष्ट कर देता है - “विगिच्च कोहं अलिक्कमाणे”

सामाजिक जीवन में हम कभी-कभी अज्ञानवश यह समझ बैठते हैं कि अमुक व्यक्ति के कारण हमारा अहित हुआ है। यदि हम सोचे नहीं, धैर्यवान होवें तथा शान्ति के साथ विवेकपूर्वक स्थितियों का विश्लेषण करते हैं तो बहुत सारी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। हमारी असफलता का कारण अनेक बार हमारी अपनी ही कमजोरी होती है। यदि किसी व्यक्ति ने किसी कारणवश या अकारण ही हमारा अहित कर भी दिया है तो हमें पहले पूरी परिस्थितियों से परिचित होना चाहिए तथा हमको उस व्यक्ति के साथ धैर्यपूर्वक बातें करनी चाहिए। अपना पक्ष उसके सामने प्रस्तुत कर उसकेपक्ष एवं दृष्टि से अवगत होना चाहिए। ऐसा करने पर वह व्यक्ति या तो आत्मग्लानि का अनुभव करता है अथवा उन परिस्थितियों को स्पष्ट कर देता है जिसकेकारण उसने हमारा अहित किया।

क्षमा का पालन करने वाला व्यक्ति यदि कभी अन्याय का विरोध करता भी है तो भी उसका मार्ग क्रोध का मार्ग नहीं होता। अपने मन में इसी कारण वह किसी के प्रति कभी बैर नहीं बाँधता। इस प्रकार यदि उसे दुष्टता एवं अन्याय का प्रतिरोध करना पड़ता है तो भी उसके मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव उत्पन्न नहीं होता। यदि कभी कही शत्रुभाव उत्पन्न हो भी जाता है तो भी वह अपनी क्षमा वृत्ति के कारण उस भाव का शमन कर लेता है। इसी कारण गौतम बुद्ध ने कहा, "उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया, उसने मुझे लूटा, इस प्रकार की बातों को जो व्यक्ति गाँठ बाँधकर नहीं रखते उनका बैर शान्त हो जाता है-

अक्कोच्छि मं अवधि में अजिनि में अहासि मे।
ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति।।

इस प्रकार क्रोध मन की गाँठों को बाँधता है, प्रतिकार की भावना, कठोरता, दयाहीनता एवं हिंसा आदि प्रवृत्तियों को विकसित करता है। क्षमा मन की गाँठों को खोलती है तथा दया, सहानुभूति, सन्तोष, उदारता, प्रेम, मनुष्यता एवं वैराग्य की प्रवृत्तियों को विकसित करती है। सहनशीलता क्षमा की धुरी है। आधुनिक युग में भारत में अरविन्द ने इसका आख्यान किया तथा गांधीजी ने सामाजिक जीवन में इसका प्रयोग किया। अरविन्द ने सक्रिय-अवस्था-आन्दोलन के सन्दर्भ में कहा-“दमन की वेदनाओं को सहन करो।” अहिंसा की शक्ति का प्रतिपादन करते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि सच्ची

अहिंसा भय से नहीं, प्रेम से जन्म लेती है, निःसहायता से नहीं, सामर्थ्य से उत्पन्न होती है। जिस सहिष्णुता में क्रोध नहीं, द्वेष नहीं, निःसहायता का भाव नहीं, उसके समक्ष बड़ी से बड़ी शक्तियों को भी झुकना पड़ेगा।

क्षमा की कई कोटियाँ, अनेक रूप एवं प्रकार हैं। “उत्तम क्षमा” मन की सहज प्रवृत्ति है। जब हम व्यक्तिगत रागद्वेष की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं तथा संसार के सभी प्राणियों के प्रति मैत्री-भाव एवं आत्मतुल्यता की प्रतीति करने लगते हैं तो क्षमा का भाव हमारे जीवन का सहज अंग बन जाता है। मध्य कोटि की क्षमा वह होती है जहाँ हम आत्मतुल्यता की भावना से प्रेरित होकर नहीं अपितु उपेक्षा-भाव से प्रेरित होकर दूसरों को क्षमा करते हैं। जब हम मन की सहज भावना से नहीं अपितु किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर अथवा भय की भावना के कारण क्षमा का प्रदर्शन करते हैं अथवा भयभीत होते हैं तो इस प्रकार की क्षमा अधम कोटि की क्षमा है।

हमें यह प्रयास करना होगा जिससे क्षमा की वृत्ति हमारी मानसिकता का एक अभिन्न अंग बन सके। क्षमा वृत्ति के विकास में जैन दर्शन की प्रासंगिकता उल्लेखनीय है। जैन दर्शन यह स्वीकार करता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वतन्त्र है, उसकेगुण और पर्याय भी स्वतन्त्र हैं। विवक्षित किसी एक द्रव्य तथा उसके गुणों एवं पर्यायों का अन्य द्रव्य या उसके गुणों और पर्यायों के साथ कोई अभिन्न सम्बन्ध नहीं है। प्राणीमात्र आत्मतुल्य है। स्वरूप की दृष्टि से सभी आत्माएँ समान हैं। अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक आत्मा स्वतन्त्र है। प्रत्येक जीव अपने ही कारण से संसारी बना है और अपने ही कारण से मुक्त होगा। आत्मा अपने स्वयं के उपाजित कर्मों से बँधती है। आत्मा का दुःख स्वकृत है। व्यक्ति अपने ही प्रयास से उच्चतम विकास भी कर सकता है। आत्मा सर्व कर्मों का नाश कर सिद्ध पद प्राप्त करने की क्षमता रखती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने ही बल पर उच्चतम विकास कर सकता है। प्रत्येक आत्मा अपने बल पर परमात्मा बन सकती है। अपने विकास में ततवतः कोई दूसरा बाधक नहीं हो सकता। हमारे कर्म ही इसकेलिए उत्तरदायी हैं। इस प्रकार के क्रोध एवं ज्ञान के कारण हमारे मन में प्रत्येक प्राणी के प्रति क्षमा का भाव सहज ही विकसित हो जाता है।

सामाजिक जीवन के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है। क्रोध से द्वेष उपजता है। यह चक्र सामाजिक सापेक्षता की भावना को समाप्त कर देता है। सामाजिक सद्भाव एवं पारस्परिक बन्धुत्व की भावना के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है। इससे व्यक्ति धार्मिक बनता है, शान्त-चित्त एवं विवेकशील होकर विचार करने एवं कार्य करने में समर्थ होता है। क्षमा याचना के आधार पर वह समाज के अन्य सदस्यों के प्रति अपनी प्रेम-भावना का विकास करता है, उसकेजीवन में आस्था और विश्वास का संचार होता है, आत्मतुल्यता की दृष्टि का विस्तार होता है।

II. मार्दव

“क्षमा” के परिपाक एवं विकास के लिए ‘मार्दव’ का महत्व है। किसी पर क्रोध न करना ही पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यक्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि वह “अहंकार” का परित्याग कर, दूसरों के प्रति विनम्रता के साथ मृदुता का आचरण करे।

अहंकारहीन एवं मृदुव्यवहारवाले व्यक्ति में क्रोध भाव उत्पन्न होने की सम्भावनाएँ क्षीण होती होती हैं।

समाज के एक कार्यकारी सदस्य के रूप में व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह भद्र एवं सभ्य व्यक्ति के रूप में व्यवहार करे, अहंकार का त्याग कर मृदुता का व्यवहार करे जिससे दूसरों के मन को पीड़ा न पहुँचे।

व्यक्ति को समाजानिरपेक्ष स्थिति में व्यक्तिगत साधना के धरातल पर भी अपने अहंकार का विसर्जन करना होता है। हृदय की कठोरता एवं क्रूरता को छोड़े बिना व्यक्ति का चित्त धार्मिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि अध्यात्म-यात्रा की सबसे बड़ी रुकावट ‘मैं’ की है। भगवान महावीर ने कहा है कि जिसे तू मारना चाहता है वह तू ही है, जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है, जिसे तू परितोष देना चाहता है, वह तू ही है।

‘मार्दव’ की कई अर्थ छायाएँ एवं स्तर हैं। एक दृष्टि से मार्दव का अर्थ है- मृदु, शिष्ट एवं विनम्र व्यवहार। इसके आगे मार्दव का अर्थ होता है- कठोरता का पूर्ण विसर्जन। इसके भी आगे जाकर ‘मार्दव’ से व्यक्ति के अन्तःकरण के उस गुण का बोध होता है जिसमें वह किसी भी प्राणी के दुःख को देखकर सहजुक से करुणा से अभिभूत हो जाता है, प्रत्येक प्राणी को वह आत्मतुल्य एवं समभाव की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त हो जाता है, उसका मन करुणा से आपूरित रहता है।

व्यक्ति के मनोभाव की दृष्टि से मृदुता के दो प्रकार हैं :
(१) प्रतीयमान मृदुता
(२) यथार्थ मृदुता

‘प्रतीयमान मृदुता’ का पालने वाला व्यक्ति बाह्य दृष्टि से विनम्र एवं शिष्ट है, किन्तु उसका ‘अन्तर्मन’ मार्दव से अप्रभावित रहता है। बाह्य दृष्टि से आवश्यकता से अधिक विनम्र होने पर भी व्यक्ति अन्तर्मन की दमित वासनाओं का शिकार हो सकता है। उसकेअचेतन मन का अहंकार ही विनय के रूप में प्रदर्शित हो सकता है। जब समाज में इस प्रकार के व्यक्तियों की संख्या बढ़ जाती है तो

अनुराग एवं विश्वास द्योतक शब्दों के अर्थ बदलने लगते हैं। ऐसा सम्भव है कि बाह्य स्तर पर कोई हमसे मित्रता व्यक्त करे किन्तु अन्दर से अहंकार के वशीभूत अथवा स्वार्थसिद्धि हेतु हमारे विनाश की योजना बनाए इस प्रकार के व्यक्ति के आचरण का वास्तविक रहस्य जब खुल जाता है, तो उसके प्रति विश्वास समाप्त हो जाता है।
“यथार्थ मृदुता” का जो व्यक्ति अभ्यास करता है उसका अन्तर्मन मार्दव से भावित होता है। उसके जीवन में विनयशीलता, निरभिमानता एवं उदारता का क्रमशः विकास होता है। अन्ततः उसके चित्त में मैत्री का अजस्र स्रोत प्रवाहित होने लगता है।
मार्दव के विरोधी-भाव अहंकार, गर्व, मद, कठोरता हैं। मार्दव की विपरीत स्थिति मन, वचन, क्रिया की कठोरता है। “अहंकार” अधर्म का मार्ग है। इससे हम आत्म-चेतना से दूर होते जाते हैं। बाह्य पदार्थों में हमारी आसक्ति एवं अनुरक्ति बढ़ती जाती है। ‘गर्व’ के कारण मन में अपने अहंकार के प्रति “मान” होता है। ‘मान’ विनय का विनाश कर डालता है। ‘मद’ में हम विवेक खो देते हैं। सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। मन की सारी कोमलता नष्ट हो जाती है। हमारा वचन ही नहीं, मन एवं कर्म भी कुटिल हो जाते हैं।
लोक में आठ प्रकार के मद प्रसिद्ध हैं- (१) शरीर, (२) धन, (३) बल (४) कुल, (५) जाति, (६) ५ ज्ञान, (७) चारित्र्य (८) तप।
जो व्यक्ति इन आठों प्रकार का किंचित् भी ‘मद’ नहीं करता वही उत्तम मार्दव का पालन करता है। यही वह द्रष्टव्य है कि अपने चरित्र एवं तप का मद भी बहुत भयावह होता है। आधुनिक मनोविज्ञान इस बात को स्वीकार करता है। अहंकार होने पर “सुपरइगो” प्रकृत-प्रवृत्तियों का दमन करके आत्मवंचना का रू प ग्रहण कर लेता है और अवांछित प्रवृत्तियों का निराकरण नहीं हो पाता। फलस्वरूप प चेतन मन का संबंध अचेतन मन में होने लगता है। मानसिक शक्ति का उदात्तीकरण नहीं हो पाता। चेतन मन अचेतन मन के आवेगों का अनुभव नहीं कर पाता। मद एवं अहंकार के दूर होने पर ही हमीत मानसिक-शक्ति चेतना की सतह पर लायी जा सकती है तथा चेतन मन के धरातल पर आत्म-नियन्त्रण किया जा सकता है।
अहंकार एवं मान से कषायों का जन्म होता है। राग-द्वेष का संचार होता है। अहंकार को चोट लगने पर मन में ईर्ष्या, घृणा, क्रूरता उत्पन्न होते हैं। विनम्रता एवं मृदुता से कषायों का नाश होता है। जीवन में ऋजुता आती है। जब “अहंकार” विगलित होने लगता है तो मन की पाषाण जैसी कठोरता चूर-चूर होकर कोमल सिकता कणों में परिणत होने लगती है। विनम्रता एवं करुणा के शीतल जल-प्रवाह द्वारा मन का ताप मिट जाता है, मानवीय प्रवृत्तियों का विकास होता है। यदि कोई उसे दुःख पहुँचाता है
तो भी चित्त की विनम्रता एवं करुणा उसे क्षमा कर देती है। जब अहंकार की परतें हटने लगती हैं तो कषायों के बन्धन खुलने लगते हैं। इस प्रकार “मार्दव” जहाँ “क्षमा” के विकास एवं परिपाक में सहायक है वहीं ‘आर्जव’ के विकास एवं परिपाक में भी सहायक है।
जब तक अहंकार रहता है, व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का अपेक्षित विकास नहीं कर सकता। अहंकार के कारण उसके विकास की गति धीमी पड़ जाती है। वह गर्व में डूब जाता है। मद के कारण वह यह भूल जाता है कि उसकी मंजिल अभी दूर है।
तततवतः बन्ध और मोक्ष अपने ही भीतर है। आत्मस्वरूप को पहचानने के लिए “मैं” को गलाता पड़ता है। जिस प्रकार वृक्ष के मूल से स्कन्ध पैदा होता है, स्कन्ध से शाखाएँ और शाखाओं से प्रशाखाएँ निकलती हैं, प्रशाखाओं से पत्ते पैदा होते हैं और इसके पश्चात् क्रमशः फल-फूल और रस उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार धर्मरू पी वृक्ष का मूल “विनय” है और मोक्ष उसका फल है। अहंकार के आवरण को हटाये बिना अमृत-तत्व प्राप्त नहीं हो सकता। एक बार गौतम ने भगवान महावीर से पूछाः
भंते, मृदुता से क्या होता है?
भगवान ने कहा- “मृदुता” से अपने आपको दूसरों से अतिरिक्त, दूसरों से विशिष्ट मानने की भावना नष्ट हो जाती है।
इसी कारण समस्त जीवों पर मैत्री भाव रखने एवं समस्त संसार के जीवों को समभाव से देखने की दृष्टि “मृदुता” से विकसित होती है।
तप एवं त्याग के बावजूद यदि व्यक्ति के चित्त में अहंकार एवं मान शेष रह जाता है तो उसकी सारी साधना निष्फल हो जाती है।
मृदुता से उदारता, सहिष्णुता एवं दृष्टि की उन्मुक्तता का विकास होता है। सत्यानुसंधान के लिए यह बहुत आवश्यक है। अहंकार से आग्रह जन्म लेता है, उदारता से अनाग्रह। अनाग्रह की चेतना ही अनेकांतवादी जीवन-दृष्टि प्रदान करती है।
“अहंकार” के कारण पारिवारिक जीवन में अशान्ति उत्पन्न होती है, सामाजिक जीवन में संघर्ष उत्पन्न होता है एवं राजनैतिक जीवन में पराजय प्राप्त होती है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम भाव, दूसरों के अस्तित्व की स्वीकृति तथा एक सदस्य का अन्यों के प्रति करुणा एवं मैत्रीभाव का होना आवश्यक है। “मार्दव” से उपर्युक्त गुणों का विकास होता है। व्यक्ति के हृदय में दूसरों को आत्मतुल्य मानने का भाव उत्पन्न होता है। दूसरों के विचारों एवं कार्यों के प्रति उसे मन में अनाग्रह, सहिष्णुता एवं उदारता उत्पन्न होती है तथा अन्ततः सहन शक्ति का विकास होता है। यदि व्यक्ति अहंकार नहीं छोड़ता तो परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा का पात्र बन जाता है।
समाज उससे प्रति अरुचि, उपेक्षा एवं अन्ततः घृणा करने लगता है। मार्दव गुण सामाजिक प्राणी का सर्वप्रथम सकारात्मक गुण है। हमें यह प्रयास तो करना ही चाहिए कि हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा न हो। हमारे पास जो है-उसे किसी को दे सकने की स्थिति में न हों तो कम से कम इतना सामाजिक दायित्व बोध तो हममें होना ही चाहिए कि हम अपने व्यवहार से दूसरों पर चोट न करें। हमारा मृदु एवं निस् आचरण दूसरों को हमारी तरफ आकर्षित करता है। हमारा सामाजिक दायरा विस्तृत होता है। व्यक्ति समाज के अन्य सदस्यों से संघर्ष एवं कलह की स्थितियों को सर्वथा समाप्त नहीं कर सकता तो उन्हें कम अवश्य कर सकता है। संघर्ष के भावग्रह एवं वीभत्स वातावरण को नष्ट कर सकता है। अन्य सदस्यों से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित कर, परस्पर सौहार्द एवं प्रेम का वातावरण निर्मित कर, सामाजिक शान्ति की स्थापना में सहयोग प्रदान कर सकता है।
राजनैतिक जीवन में भी मार्दव गुण का बहुत महत्व है। लोकतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था में नेतृत्व के लिए यह आवश्यक है कि वह मार्दव गुण का पालन करे, सत्ताप्राप्ति के पश्चात् भी सत्ता के मद से दूर रहे। यदि जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं कर पाता तो उसके एवं जनता के बीच दूरी बढ़ जाती है। इस दृष्टि से महाकाव्य “कामायनी” में वर्णित सर्ग की कथा अत्यन्त प्रेरक है। “मनु” सारस्वत प्रदेश के राजा बनकर अपने बनाये हुए नियमों से शासन संचालित करते हैं, किन्तु स्वयं उन नियमों का पालन नहीं करना चाहते। वे स्वयं स्वेच्छन्द जीवन व्यतीत करने का प्रयास करते हैं। श्रद्धा उन्हें समझाती है कि नियामक को भी नियमों के अनुरूप आचरण करना चाहिए। संसार की ताल में, विश्व की लय में, समाज के बन्धन में सम होना चाहिए। इससे संगीत की लय नहीं बिगड़ती, जीवन की समरसता में विषमता उत्पन्न नहीं होती। अहंकारी मनु पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रजापति प्रजा को प्राप्त करने के लिए वे समस्त बन्धनों एवं नियन्त्रणों को तोड़ने का प्रयास करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रजाजन विद्रोह कर देते हैं। संघर्ष होता है। मनु क्रूरता से अपने सदृग से प्रजाजनों को कुचलकर आगे बढ़ता है। भीषण जन-संहार होता है। रक्तोन्मत्त मनु का हाथ रुक नहीं पाता। उधर प्रजा का साहस भी नहीं थमता। इसका समापन मनु की पराजय में होता है और वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं।
इस कथा से हमें ज्ञात होता है कि किस प्रकार अहंकार में व्यक्ति असंयमी एवं क्रोधी हो जाता है, जिससे वह सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से पराजित हो जाता है।
आधुनिक जीवन में मार्दव गुण के अभाव के कारण सामाजिक जीवन में परस्पर संघर्ष एवं तनाव का वातावरण पनप रहा है। अहंकार की भावना के कारण अपने को सर्वोच्च, शक्तिमान एवं श्रेष्ठ तथा दूसरों को अपने से निम्न, दुर्बल एवं हीन मानने के कारण साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, जातीय संघर्ष होते

III. आर्जव

मार्दव से आर्जव का परिपाक होता है। विनम्रता से सरलता आती है तथा सरलता से निष्कपटता की वृत्ति विकसित होती है। सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया एवं मद से मुक्त हो जाता है।

आर्जव के विरोधी भाव माया, छल, कपट एवं कुटिलता है। जिस व्यक्ति के हृदय में कपट एवं कुटिलता होती है उसकी दृष्टि आविष्ट, आविल एवं मलिन होती है। उसका जीवन कृत्रिम एवं असामाजिक बन जाता है।

माया के कारण यह यह नहीं समझ पाता कि ऋजु क्या है और कृत्रिम क्या है; कपट क्या है और निष्कपट क्या है? इस कारण माया से सद्गति का प्रतिघात होता है। छल एवं कपट से दुर्गुणों को प्रश्रय मिलता है। हमारा व्यक्तित्व कुण्ठाग्रस्त हो जाता है। छल एवं कपट का जिस व्यक्ति के जीवन में जितना प्राबल्य होगा उसकेचेतन एवं अचेतन मन की भावना का स्तर उतना ही अधिक होगा। ऐसे व्यक्ति की स्मरण-शक्ति, कल्पना, चिंता की एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति दुर्बल होती जाती है। मानसिक ग्रन्थियाँ दृढ़तर होती जाती है। उसमें न तो चरित्र बल रह जाता है और न व्यक्तित्व की पवित्रता। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता, अचेतन मन की खोज करकेप्रत्येक प्रकार के द्वन्द्व को चेतना की सतह पर नहीं ला पाता। उसके अचेतन मन में जो भाव विचार एकत्र होते हैं वे उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर देते हैं।

दुःखों की जड़ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हमारे ही मन में है। ग्रन्थियों के कारण हम अन्तर्मन की खोज नहीं कर पाते तथा दुःख का कारण सदा बाह्य वातावरण में खोजते रहते हैं। सत्य जानने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। अंधेरी कोठरी में बन्द व्यक्ति अपने से ही लड़ता रहता है। मानसिक संघर्ष के कारण बाहरी जगत में संघर्षशील स्थितियाँ उत्पन्न कर देता है। अहंकार मन के कपट को बढ़ा देता है। ऐसी स्थिति में मानसिक बेचैनी, अकारण चिन्ता, भय, कल्पित शारीरिक रोग आदि उत्पन्न हो जाते हैं।

इन मानसिक रोगों से बचने के लिए निष्कपट होना होता है। निष्कपटता से मनुष्य का आन्तरिक संघर्ष चेतना की सतह पर आ जाता है। जो वासना, स्मृति एवं विचार दमित अवस्था में अचेतन मन में रहते हैं, वे चेतन मन के धरातल पर आ जाते हैं। इस प्रकार प्रकाशन से अचेतन मन की ग्रंथियाँ ऋजु होकर शक्तिहीन हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चेतन मन के धरातल पर स्वतः के प्रयत्न द्वारा समाप्त आत्मनियन्त्रण कर सकता है।

अध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति कपट के कारण अपना प्रकृत स्वभाव भूल जाता है। राग-द्वेष तथा इन्द्रियों के वशीभूत होकर जीव मन, वचन एवं शरीर से कर्म संचय करता है। मिथ्यात्व, अविरति प्रमाद एवं कषायों केकारण कर्मों का आस्रव होता है।

कर्म या माया के कारण आत्मा का शुद्ध स्वभाव आच्छादित हो जाता है। इस तथ्य को प्रायः सभी दर्शन स्वीकार करते हैं। आत्मा (जीव) के साथ जैन दर्शन में पौद्गलिक कर्मों का, बौद्ध दर्शन में तृष्णा का, वेदान्त दर्शन में माया का, कपिल-पतंजलि के सांख्य-योग दर्शन में प्रकृति का संयोग माना गया है। कपट एवं कुटिलता के कारण बन्धन की ग्रंथियाँ जुड़ती जाती हैं। “आर्जव” का पालन करने पर इन ग्रंथियों की जकड़न दूर हो जाती है, गाँठे ऋजु हो जाती हैं। हृदय सरल, स्पष्ट, निष्कपट हो जाता है। इसी के पश्चात् हृदय शुद्ध होता है। आत्म-संशोधन होता है, जहाँ धर्म ठहर सकता है। इसी कारण भगवान महावीर से जब प्रश्न किया गया कि हृदय को पवित्र एवं शुद्ध किस प्रकार बनाया जा सकता है तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऋजुता से हृदय को पवित्र किया जा सकता है- “माया विजरणं अज्जवं जणयइ (माया को जीत लेने से ऋजुता प्राप्त होती है)।”

'गीता में भी आर्जव को साधना का एक प्रधान अंग माना गया है तथा इस शब्द का प्रयोग “मन वाणी की सरलता” के अर्थ में किया गया है। अर्जुन को ज्ञान के साधनों केबारे में बताते हुए भगवान कृष्ण ने श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा तथा क्षमा के बाद “आर्जव” को स्थान दिया है।

“अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिराजर्वम्”।

कपट का परिणाम करकेही व्यक्ति सत्य की साधना कर सकता है तथा अन्तःकरण की शुद्धि कर सकता है। इस कारण “सत्य” एवं “शोध” केपालन के लिए “आर्जव” भूमिका का निर्माण करता है।

स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन तथा आत्मानुसंधान के अतिरिक्त सामाजिक विश्वास का वातावरण बनाने की दृष्टि से भी आर्जव का महत्त्व है।

कुटिलता के कारण पारिवारिक जीवन में अविश्वास उत्पन्न होता है। सामाजिक जीवन में छल, छद्म एवं विश्वासघात की वृत्तियाँ पनपती हैं, राजनैतिक जीवन कुटिलता का पर्याय बन जाता है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए तथा परस्पर मैत्री भाव के लिए जिस प्रकार मार्दव गुण आवश्यक है, उसी प्रकार आर्जव गुण भी आवश्यक है। मार्दव गुण के कारण अहंकार समाप्त होता है तथा मन, वचन एवं क्रिया की दुष्टता दूर होती है। आर्जव गुण के कारण छल, कपट, कुटिलता दूर होती है तथा मन, वचन, एवं क्रिया की एकरूपता स्थापित होती है। मार्दव गुण के कारण व्यक्ति परिवार और समाज के अन्य सदस्यों के अस्तित्व की स्वीकृति प्रदान करता है। आर्जव गुण के कारण मैत्री भाव की आधारभूमि बनती है। मित्रता का आधार है- परस्पर निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी। मित्रों के बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं होता। माया के विषय में भगवान महावीर ने कहा है कि माया मित्रता को नष्ट कर देती है (माया मित्तार्णो नासेइ)। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परस्पर मैत्रीभाव उत्पन्न करने के लिए आर्जव गुण के सतत अभ्यास की आवश्यकता अरिह है। मार्दव के कारण हम दूसरों को अपनी विनम्रता से अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा आर्जव गुण के कारण सच्चे एवं सरल हृदय से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इसी कारण गौतम बुद्ध ने कहा कि जिस प्रकार कुशल बढ़ई लकड़ी को सीधा करके उससे सुन्दर खिलौने और विशाल भवन तैयार करता है, वैसे ही साधक अपने आपको सरल एवं सीधा बनाता है।

राजनीति के क्षेत्र में छल और कपट बढ़ रहा है। राजनीति को तात्कालिक स्वार्थसिद्धि एवं सत्ता प्राप्ति के कौशल के रूप में परिभाषित किया जा रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि राजनीतिज्ञों के जीवन में परस्पर अविश्वास, अपवित्रता एवं कुटिलता बढ़ती जा रही है। उनके प्रति आस्था की भावना घट रही है। राजनैतिक जीवन की सफलता एवं स्थायित्व के लिए जनता के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि जो कह रहा है वही करेगा। जो राजनीतिज्ञ जनता का विश्वास खो देता है, उसका राजनैतिक जीवन समाप्त हो जाता है। वह अपने त्याग एवं जनसेवा के संकल्प की लाख दुहाई दे, किन्तु फिर भी जनता का बहुमत उसके कथन का तो विश्वास नहीं करता अथवा उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को संशय और सन्देह की दृष्टि से देखता है। इसके विपरीत जो राजनीतिज्ञ अपनी निष्कपटता एवं ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं, वे यदि एक शब्द भी बोलते हैं तो उसका

नमनस पर प्रभाव पड़ता है। उनकी बात पर विश्वास किया जाता है। राजनैतिक जीवन में भी स्थायी
सफलता तथा लोक-विश्वास प्राप्त करने के लिए आर्जव गुण का महत्व है।
आधुनिक जीवन में आर्जव गुण की कमी के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुराव-छिपाव का
वातावरण पनप रहा है। परस्पर अविश्वास एवं अनास्था से जीवन में विषाक्तता, उद्वेग, उत्पीड़न
तथा भटकन बढ़ रही है। धनी-मनी में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है। जीवन में संत्रास और निराशा की
भावना बढ़ रही है। भौतिक साधनों की दृष्टि से हम आज अधिक सम्पन्न हैं। सुख के साधन प्रचुर हैं।
मन की कुटिलता के कारण ही अनावश्यक मानसिक तनाव तथा परस्पर अविश्वास से उत्पन्न
विषमताघात की भावना बढ़ रही है। व्यक्ति अपने ऊपर, अनेक प्रकार के मिथ्या आडम्बर लाद रहा है।
प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वह मानसिक विकारों का शिकार तथा उत्तरोत्तर ‘ऐबनॉर्मल’ बनता जा
रहा है। अपने मन की परतों को न खोल सकने के कारण वह मानसिक तनावों में जी रहा है। कपटता के
कारण परस्पर के मैत्री सम्बन्ध नष्ट होते जा रहे हैं। दूसरों को धोखा देने की, ठगने की, ऊपर से मित्र
एवं हितैषी बनकर अन्दर विरोध एवं घात करने की सामाजिक वृत्तियाँ के कारण हमारा जीवन भयावह हो
उठा है। इनके समाधान का जो रास्ता पाश्चात्य विचारकों ने निकाला है, वह व्यक्ति को और अधिक
भटका रहा है। साम्यवादी विचारधारा के कारण वर्ग संघर्ष की प्रेरणा तो मिली किन्तु मानव जाति में
परस्पर अनुराग की भावना का पोषण नहीं हुआ। इसी प्रकार अस्तित्ववादी-दर्शन चेतनमानों में पारस्परिक
सम्बन्धों की आधार-भूमि सामंजस्य को नहीं अपितु विरोध को मानता है। वह यह स्वीकार करता है कि
एक व्यक्ति के अस्तित्व वृत्ता तथा अन्य व्यक्तियों के अस्तित्व-वृत्तों के मध्य संघर्ष है।
बिना सामाजिक प्रेम, विश्वास एवं बन्धुत्व के व्यक्ति का जीवन सुखी नहीं बन सकता। इस
कारण समाज में परस्पर मैत्रीभाव का होना आवश्यक है।
भगववादी विचारधारा इन्द्रियों की तुष्टि में ही सुख मानती है। इन्द्रियों के सुख को ही जीवन का
लक्ष्य मानती है। जैन दर्शन इस मान्यता को स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि इच्छाओं का
कोई अन्त नहीं है। कामनाएँ तो आकाश के समान अनन्त है। मिथ्या आवरणों को हटाने पर ही प्रकृत
स्वभाव का दर्शन सम्भव है। इसलिए हमारा सारा प्रयास यह होना चाहिए कि हमारी चेतना के ऊपर
कपट, बेईमानी एवं मिथ्या आडम्बरों की जो अनेक तहें जम गयी हैं, उनको आर्जव के द्वारा हटा सकें।
ऐसा करने पर हमारा जीवन सरल बन सकेगा। हम तनावों से मुक्त हो सकेंगे।
आर्जव का अर्थ प्रज्ञा-सम्पन्न व्यक्ति के द्वारा आन्तरिक सद्गुणों का विकास करना है, अचेतन
मन की अनजानी दमित वासनाओं को चेतन मन के धरातल पर लाना है। “आर्जव” आत्म-संशोधन की
भूमिका का निर्माण करता है, व्यक्ति के चरित्र एवं व्यवहार को निष्कपट बनाता है, कषायों केबन्धनों को

ऋजु कर विवेक की भूमिका प्रदान करता है तथा मिथ्या माया का आवरण हटा आत्मानुसंधान के रहस्य-
द्वार के कपाट को थपथपाता है।

IV. सत्य

आर्जव से सत्याचरण के लिए प्रेरणा मिलती है। आर्जव की नींव पर सत्य का भवन बनाया जा
सकता है। निष्कपटता से मन, वचन और शरीर की क्रियाओं की एकरूपता स्थापित होती है। ऋजुता से
मिथ्यात्व का अन्त होता है, सत्याचरण की प्रवृत्ति विकसित होती है। जब व्यक्ति सत्याचरण करने लगता
है तब कपट कुटिलता के द्वार बन्द हो जाते हैं।
सत्य एवं ‘शौच’ का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। बिना चित्त की शुद्धि के व्यक्ति लोभ-तृष्णा
को दूर नहीं कर पाता। जब तक लोभ की भावना रहती है तब तक झूठ बोलने की भी सम्भावनाएँ बनी
रहती है। हम जिन कारणों से झूठ बोलते हैं उनमें लोभ बहुत बड़ा कारण होता है। ‘शौच’ से हम लोभ
पर विजय प्राप्त करते हैं। इस कारण से शौच गुण का सत्य से गहरा सम्बन्ध है।
सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण
सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है।
सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि
आत्माथी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित तथा किसी को भी
उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख बड़ी दो घड़ी का होता है। वह
काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से
नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है।
इसके साथ व्यक्ति की मानसिक जुडी हुई है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित
व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा
का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आकांक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म
है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण “अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन” सत्य नहीं माना जा
सकता।
सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। किसी सद्वस्तु के स्वरूप प,
स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना, ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के
द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप प को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना

जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य
है।
सत्य को सभी धर्मों ने स्वीकार किया है। वैदिक ऋषियों ने सत्य के स्वरूप प की सूक्ष्म व्याख्या की
है। "सब कुछ आत्माहित है। आत्मा सत्य है, अतः सब कुछ सत्यात्मक है। वही सत्य मैं (जीव) हूँ।
सत्य को ब्रह्म कहा गया है और आत्मा का रूप प बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत में परमात्मा को
सत्यव्रत, परमसत्य, त्रिसत्य, सत्यनिहित, सत्य का सत्य एवं सत्यात्मक कहकर उसकी वंदना की गयी
है। अद्वैतवादी शंकराचार्य सत्य की तीन श्रेणियाँ मानते हैं: (१) व्यावहारिक सत्य, (२) प्रातिभासिक सत्य,
(३) पारमार्थिक सत्य। उन्होंने पारमार्थिक सत्य को ही वास्तविक सत्य माना है। बौद्धआचार्यों ने सत्य के
दो रूप प माने हैं: (१) सांवृतिक सत्य, (२) पारमार्थिक सत्य। जैन दर्शन में निरूप पित निश्चयजन्य एवं
व्यवहारजन्य तत्वतः सत्य के प्रकार हैं। वेदान्ती केवल पारमार्थिक सत्य में विश्वास करते हैं। जैन दर्शन
निश्चयनय की अपेक्षा से व्यवहारनय को कम महत्व देता है। तांत्रिक सत्य के समस्त स्तरों में विश्वास
करते हैं।
प्रश्न उठता है कि सत्य क्या है? सत्य की प्रकृति क्या है? एक दृष्टि से यह कहा जा सकता है
कि जिस किसी भी वस्तु की सत्ता है, वह सत्य है। हमें पानी दिखाई पड़ता है, इसलिए पानी सत्य है।
इसी के साथ प्रश्न उपस्थित होता है कि जो दिखाई न पड़े या जिसका अनुभव न हो, क्या वह सत्य नहीं
है? किसी अंधेरे कमरे में पड़ी हुई सुई को यदि हम देख नहीं पाते, उसकी सत्ता का अनुभव नहीं कर
पाते, तो क्या उसकी सत्ता नहीं है?
हम किसी भौतिक वस्तु की सत्ता का ज्ञान सर्वथा आसानी से नहीं कर पाते। कभी उसके लिए
हमें उस वस्तु को स्वयं जाकर देखना होता है। कभी देखने के लिए प्रकाश की व्यवस्था करनी होती है।
कभी प्रकाश में भी अनेक बार खोजना पड़ता है, ध्यान लगाना पड़ता है, मन एकाग्र करना पड़ता है।
प्रश्न उपस्थित होता है कि अतीन्द्रिय एवं निरपेक्ष सत्य की सूक्ष्म एवं अमूर्त सत्ता का ज्ञान हम किस
प्रकार कर सकते सकते हैं?
जिस वस्तु की हम खोज कर रहे हैं उसके आधारों तथा खोज के कारणों के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न
दृष्टियाँ हैं। नैयायिक निम्न “प्रमाण” मानते हैं: (१) प्रत्यक्ष प्रमाण (२) अनुमान प्रमाण (३) उपमान प्रमाण
(४) शब्द प्रमाण। इनके अतिरिक्त वेदान्ती और मीमांसक- अनुपलब्धि और अर्थापत्ति- ये दो
अतिरिक्त प्रमाण मानते हैं। सांख्य केवल प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द को ही मानते हैं। यथार्थ ज्ञान के
सम्बन्ध में बहुत मतभेद है। कुछ विचारक यह मानते हैं कि जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षण हो रहा है वे सभी
सत्य हैं। दूसरे विचारक मानते हैं कि कुछ समय के लिए हमें भ्रान्ति भी हो सकती है, जैसे हम रस्सी को

सोच समझ सकते हैं। इस कारण प्रातिभासिक सत्य यथार्थ सत्य नहीं है। कभी-कभी सारे साधनों के बावजूद भी हम सत्य की तह तक पहुँचने में एकदम समर्थ नहीं हो पाते। प्रत्यक्ष में इंद्रिय दोष भी हो सकता है। हमारा मस्तिष्क किसी अन्य स्थान पर केन्द्रित हो सकता है। इसके कारण हमारी आँखें खुली रहने पर भी हम कुछ देख नहीं पाते। अपनी सीमित दृष्टि से देखने पर हमें वस्तु के एकांगी गुण तथा धर्म का ज्ञान होता है। विभिन्न स्थानों पर से देखने पर एक ही वस्तु हमें भिन्न प्रकार की लग सकती है, तथा एक ही स्थान पर एक ही वस्तु विभिन्न दृष्टाओं को विभिन्न प्रकार की प्रतीत हो सकती है। भारतवर्ष में जिस क्षण कोई व्यक्ति सूर्योदय देखता है, उसी क्षण संसार के किसी दूसरे स्थान में वहीं के व्यक्ति को सूर्यास्त के दर्शन होते हैं। एक ही व्यक्ति से विभिन्न व्यक्तियों के अलग-अलग प्रकार के सम्बन्ध होते हैं। एक ही व्यक्ति किसी के लिए कठोर प्रशासक हो सकता है, तो दूसरे के लिए कोमल प्रेमी।

इन्हीं कारणों से जैन तत्व-चिन्तन वस्तु के अनेकान्त स्वरूप प की मीमांसा करता है। स्याद्वाद कथन शैली है। सप्तकारका-वचन-विन्यास से वस्तु के अनन्त धर्मों के अभिव्यक्तिकरण की दिशा में तत्व चिन्तक को सही दिशा एवं सही माध्यम प्राप्त होता है। (दे० ३-३.१ व ३-३.२)
सत्य आचरण जीवन की तपश्चर्या है। इसके मार्ग में हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण योगी अरविंद ने कहा कि सत्य को जीतना बड़ा कठिन एवं दुष्कर है। इस जीत के लिए मनुष्य को सच्चा योद्धा बनना पड़ता है- ऐसा योद्धा जो किसी भी वस्तु या परिस्थिति से भय नहीं खाता।

सत्य का पालन किये बिना अपने स्वरूप प का ज्ञान ही नहीं पाता, साधना सफल नहीं हो पाती। आत्मा नहीं है, संयम पुण्य तीर्थ है, सत्य उसका पुण्य जल है एवं शील उसकी तरंग है। महाभारतकार ऐसी ही नदी में पांडु पुत्र को स्नान करने का परामर्श देते हैं तथा बताते हैं कि पानी की नदी में स्नान करने से आत्मा का शुद्धिकरण सम्भव नहीं है।
सत्य आध्यात्मिक साधना की नींव है। जब व्यक्ति भौतिक सुखों को ही चरम-सत्य मानकर बैठ जाता है तो वह वास्तविक आत्मिक शक्ति की प्राप्ति करने में असमर्थ रहता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सत्य से असत्य की ओर, ज्योति से अन्धकार की ओर एवं अमृत से मृत्यु की ओर गमन करता है। राग और द्वेष के कारण वास्तविक सत्य पीछे छूट जाता है तथा मिथ्यात्व ही सत्य प्रतीत होने लगता है। ऐसे व्यक्ति सत्य का तब तक साक्षात्कार नहीं कर पाते जब तक उनका अहंकार विगलित नहीं हो जाता तथा उनकी वृत्तियों में निष्कपटता नहीं आ जाती। अज्ञानी की अपेक्षा मिथ्याज्ञानी को सत्य का ज्ञान कराना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। जब अमृत-तत्व स्वर्ण के पात्र में बन्द हो जाता है, तब उसकी खोज का रास्ता

बड़ा कठिन हो जाता है। स्वर्ग की ऊँचाइयों में वह अपना लक्ष्य भूल जाता है। असत्य से सत्य की ओर, तम से ज्योति की ओर एवं मृत्यु से अमृत की ओर चलने का आह्वान करने वाले उपनिषद्कारों ने संशय रहित, द्विधाहीन मनःस्थिति में सोने के पात्र के स्वर्णिम आवरण को हटाने की बात कही। सन्त कबीर ने भी कहा कि अन्धविश्वास मत करो, विवेक के आधार पर वस्तु की परख करो। जो व्यक्ति खरे खोटे का विचार किये बिना ही मिथ्यात्व कर लेता है, वह उस मूर्ख महाजन की भाँति है जो मूल गँवाकर लाभ की आशा करता है :
खरा खोटा जिन नहीं परखाया।
चहत लाभ तिन मूल गँवाया।।
यही कारण है कि सत्य प्राप्ति के लिए चित्त की उन्मुक्तता एवं अनाग्रह तथा विवेक परम आवश्यक है। इस वृत्ति से जो विचार किया जाता है, वह सम्यग् ज्ञान होता है।
जब व्यक्ति विचारपूर्वक सत्य का साक्षात्कार करता है, तो दुःख दूर हो जाता है :
करु विचार जेहिं सब दुख जाही।
जो सत्य है, वह आत्मा है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। कषायों के बन्धन के कारण व्यक्ति “पर” को “अपना” मानता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्ति अपने अचेतन मन की भावना का विचार नहीं कर पाता। जो मनुष्य तप एवं साधना के द्वारा सत्य का साक्षात्कार कर लेता है, वही दार्शनिक दृष्टि से आत्म-साक्षात्कार करने में तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चेतन और अचेतन मन के द्वन्द्व को दूर करने में समर्थ होता है। उसे आनन्द की प्राप्ति होती है। इसी कारण सत्य, आनन्द, एवं ब्रह्म का प्रयोग समान अर्थों में होता है। तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली की कथा बहुत सार्थक है। भृगु ने अपने पिता वरुण से कहा कि भगवन् मैं ब्रह्मज्ञान पाना चाहता हूँ। पिता ने तप करने की आज्ञा दी। कठिन तपस्या से पुत्र ने आविष्कार किया कि अन्न ही ब्रह्म है। पिता ने फिर तप करने को कहा। पुत्र ने दोबारा तप करके पता लगाया कि प्राण ही ब्रह्म है। पिता ने पुनः लौटा दिया। पुत्र ने पुनः तप किया और आकर बतलाया कि ब्रह्म मन है। पिता ने कहा, तुम्हारी साधना और तप माँगती है। पुत्र ने तप करके आविष्कार किया कि विज्ञ न ही ब्रह्म है। पिता ने कहा कि तुम्हारी साधना पूर्णता की ओर बढ़ रही है, थोड़ा तप और करो। पुत्र ने साधना की गहनतम भूमिकाओं को पार कर उतार दिया कि आनन्द ही ब्रह्म है।
इस प्रकार अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द ये विभिन्न स्तर हैं। इनमें आनन्द रूपी आत्म तत्व का साक्षात्कार सबसे कठिन और अन्तिम है। दूसरे शब्दों में निरपेक्ष सत्य की प्रतीति एकदम सम्भव नहीं है।

सत्य विश्व तथा विश्व के समस्त अस्तित्वों का आधार है। सत्य का सम्यग् ज्ञान न होने तक ही अनस्तित्व एवं सत्यासत्य जीवित रहते हैं। जब सत्य का प्रकाश धूमिल हो जाता है तभी जैन दर्शन की दृष्टि से आत्मा की शुद्ध चेतना राग-द्वेष एवं मोह के कारण ‘पर’ को अपना समझने लगती है, शैव दर्शन की दृष्टि से माया अज्ञान की चादर उड़ाकर आत्मा से भिन्न-भेदपूर्ण दृष्टि उत्पन्न करती है तथा स्वतन्त्र पुरुष ध पर तीनों प्रकार के कर्मों का आवरण डालकर उसे लिप्त एवं परतन्त्र बना देती है तथा गीताकार की दृष्टि से कामरूप प वैरी मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान को आच्छादित कर, जीवात्मा को मोहित कर देता है।

V. शौच

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3106.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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