प्रमाण एवं व्यवहार योजन | Praman Evan Vyavhar Yojan

प्रमाण योजन और व्यवहार योजन में क्या अंतर है ? शास्त्रों में जब योजन लिखा हो तो कौनसा योजन समझना चाहिए ?

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व्यवहार योजन/ मानव योजन/ सामान्य योजन -
1 योजन = 4 कोस
1 कोस = 2 मील
1 मील = 1.609344 km

इसका मतलब
1 कोस = 3.2km
4 कोस = 12.8 km

इसका मतलब
1 योजन = 12.8 km

प्रमाण योजन व्यवहार योजन से 500 गुना अधिक बड़ा होता है।


प्रमाण योजन =
1 प्रमाण योजन = 4 कोस✖️500 = 2000 कोस
अर्थात् 4000 मील का एक प्रमाण योजन
जो कि लगभग 6400 km होगा।


योजन का एक और विवेचन =
6 अंगुल = 1 पाद
2 पाद = 1 वितस्ति
2 वितस्ति = 1 हाथ
4 हाथ = 1 धनुष
2000 धनुष = 1 योजन


द्वीप, समुद्र, कूलाचल, वेदी, नदी, कुण्ड, सरोवर और भरत आदि क्षेत्रों का माप प्रमाण विधि से होता है।
माप की विधि समझने के लिए अंगुल का विषय समझना आवश्यक है, जो कुछ इस प्रकार है।

अंगुल 3 प्रकार का होता है-

  • उत्सेध अंगुल

  • प्रमाण अंगुल

  • आत्म अंगुल

उत्सेध अंगुल से चारों गति के जीवों के शरीर की ऊँचाई, देवों के निवास स्थान, नगरादि और अकृत्रिम जिनालय की प्रतिमाओं की ऊँचाई मापी जाती है।

प्रमाण अंगुल से द्वीप, समुद्र, कूलाचल, वेदी, नदी, कुण्ड, सरोवर और भरत आदि क्षेत्रों का माप होता है।

आत्म अंगुल से झारी, कलश, दर्पण, शय्या, गाड़ी, हल, सिंहासन, छत्र, मनुष्यों के निवास स्थान, नगर, उद्यान आदि का माप अपने अपने आत्म अंगुल से होता है।


ग्रंथ नाम - गोम्मटसार जीवकाण्ड रेखा चित्र

अनादिकालीन अकृतिम रचना सब प्रमाण योजन और अन्य सभी व्यवहार योजन।