अर्थ
मनुष्य कामनाओं और अभिलाषाओंका दास है। उसकी भगवद्भक्ति भी निष्काम नहीं होती। उसमें भी एक न एक कामना रहती ही है। कोई भक्त भगवान्से पुत्र माँगता है, कोई पैसा माँगता है और कोई पूजा-प्रतिष्ठा आदि । गरज यह कि भगवान्की भक्तिके पीछे भी चाह और अभि-लाषा अवश्य रहती है। ऐसे भक्त बहुत विरले होते हैं जो निष्काम होकर भगवान्की भक्ति करते हैं। मालूम देता है जैसे निष्काम भक्तिका आधार इतना सूक्ष्म और लोक-दृष्टिसे नीरस है कि भक्त जन अधिकांशतः उस ओर प्रवृत्त ही नहीं होते। दूसरी ओर भव-भोगरत मानवकी भक्तिका आधार एकदम स्पष्ट और सरस होता है और लक्ष्य-प्राप्तिकी लालसामें वह बड़ी तन्मयताके साथ उसे पकड़े रहता है। परन्तु सकाम भक्तका इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं जाता है कि कामनाको लेकर की गई उसकी भगवद्भक्ति भगवद्भक्ति न रह कर कामना-भक्ति ही बनी रहती है; क्योंकि भगवद्भक्तिके कालमें उसकी मनोगति इप्ट कामनाकी ओर ही गतिशील रहती है, भगवान्के गुणोंमें तो उसे अनुराग हो नहीं पाता । फलतः कामना-पूर्तिके लिए आवश्यक साधना न होनेसे वह अपने ध्ययमें असफल रहता है, भगवद्भक्तिके प्रति अविश्वास करने लगता है और दुदैवको कोसने लगता है। निष्काम भक्तका ध्यान निरन्तर भगवान्के गुणोंकी ओर केन्द्रित रहता है। अतः उस कालमें वह न केवल शुभ कर्मों का आस्रव करता है, अपितु पूर्वबद्ध कर्मोंको निर्जीर्ण भी करता है और लक्ष्य-प्राप्तिमें सदैव सफल रहता है। कविवर भागचन्द्र भी ऐसे ही निष्काम भक्तोंमेंसे हैं। वह भगवान्
के अनन्य भक्त हैं, परन्तु इस अप्रतिम भक्तिवश वह भगवान्से किसी लौकिक एवं भौतिक विभूति प्राप्त करनेकी कामना प्रकट नहीं करते। उनकी केवल एक ही कामना है जो कामना होकर भी ऐसी कामना है जिसकी पूर्ति होनेपर भक्त एकदम निष्काम और परमानन्दमय हो जाता है- उसकी समस्त चाह-दाह क्षीण हो जाती है और उसकी आत्मा अपने ही शुद्ध-बुद्ध सागरमें सदाके लिए डूब जाती है। देखिए, भक्तप्रवर भागचन्द्र भगवान्से क्या वरदान माँग रहे हैं। वे कहते हैं:-
“प्रभु पै यह वरदान सुपाऊँ,
भगवन् ! मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे में पुनः संसारके कीचड़में न फसूं- मेरा अनादिकालीन संसार-परिभ्रमण समाप्त हो जाय ।
“जल-गंधाक्षत पुष्प सुमोदक, दीप-धूप-फल सुन्दर ल्याऊँ ।
वह भगवान्से वरदान चाहते हैं, एक कामना करते हैं; परन्तु जब इस वरदान और कामनाका सर्वात्मना विश्लेषण करते हैं तब यह वरदान न वरदान ठहरता है और न कामना कामना। उनके इच्छित वरदान की एक झाँकी देखिए:- भक्त-शिरोमणि भागचन्द्र भगवान्से एक अलौकिक वरदानकी याचना कर रहे हैं। वे कहते हैं- भगवन्! मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे में जल, सुगन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल इन अष्ट द्रव्यों को और इन द्रव्योंके मेलसे बनाये गये अर्थको एक परम रमणीय कनक-थाल में सुसज्जित करके आपके श्रीचरणोंमें अर्पित करूँ ।
भगवन् ! मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे में पुनः संसारके कीचड़ में न फसूं- मेरा अनादिकालीन संसार-परिभ्रमण समाप्त हो जाय ।
कविवर भागचन्द्रकी भक्ति एक वैज्ञानिक भक्ति है और उसका यह व्यावहारिक निरूपण है। उनकी भगवद्भक्तिका एक पहलू है ‘स्वाध्यायः परमं तपः’ और सत्संग । आगमके अभ्यास एवं स्वाध्यायको वह शुद्ध आत्मानुभूति-यथार्थ आत्म-दर्शनका साधन मानते हैं और सत्संगमें आत्मा-के परमादर्शकी झाँकी पाते हैं। उनके ही शब्दोंमें सुनिएः-
“आगमके अभ्यास मांहि पुनि, चित एकाग्र सदैव लगाऊँ ।
हे भगवन् ! मेरा मन निरन्तर आगमोंके परिशीलनमें लगा रहे, जिससे मुझे निरन्तर आत्म-स्वरूपके यथार्थ दर्शन होते रहें और में सदैव साधुओंके समागमका लाभ उठाता रहूँ, उन्हें एक क्षणके लिए भी छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाऊँ- मेरा मन प्रतिक्षण साधुओंके निविकार एवं लोकोत्तर आदर्शको जीवनमें मूर्तमन्त करनेकी ओर लगा रहे। भगवन् ! मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे में फिर संसारके कीचड़ में न फसूं- मेरा अनादिकालीन संसार-परिभ्रमण समाप्त हो जाय । भक्त-हृदयकी आकांक्षाएँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। भक्त हृदय अपने लोक-मङ्गलकारी स्वरूपको सर्वात्मना प्रकट किये बिना रुक नहीं सकता । देखिएः-
“दोष-वादम मौन रहूँ फिर, पुण्य पुरुष-गुन निशिदिन गाऊँ ।
भगवन् ! में दूसरोंकी निन्दा-बुराई करने में सदैव मौन रहूँ-पर-निन्दाका भाव तक मेरे मनमें न आवे। मैं प्रतिक्षण वीतराग महात्माओं के गुणोंका गान करता रहूँ। मैं सबसे ही मीठा और प्रिय संभाषण करूँ और अपने भावोंको भी निर्विकार वीतरागताकी ओर आकर्षित करता रहूँ ।
स्रोत: अध्यात्म पदावली।
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