दशलक्षण महापर्व (parv bhumika)
— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —
पर्व शब्द का अर्थ
पर्व शब्द पोर शब्द से बना है।
पोर शब्द का अर्थ है = जोड़ना
- लौकिक में जो प्रसंग हमें अपने परिजनों और पूर्वजों से जोड़ने का कार्य करें, वह पर्व है।
- धार्मिक परिप्रेक्ष्य में जो प्रसंग हमें अपने स्वभाव से जोड़ने का कार्य करें, वह पर्व है।
- जैनधर्म वीतरागमय धर्म होने से जैनधर्म के पर्व भी वीतरागता का पोषण करने वाले हैं।
पर्व के प्रकार
- तात्कालिक पर्व- जो पर्व किसी व्यक्ति या घटना विशेष के निमित्त से प्रवर्तित होते हैं, वे तात्कालिक पर्व हैं।
जैसे- अक्षय तृतीया, रक्षाबंधन, दीपावली, महावीर जयंती इत्यादि। - त्रैकालिक पर्व- जो अनादि से हैं और अनंतकाल तक रहने वाले हैं तथा जिनका किसी व्यक्ति या घटना विशेष से कोई संबंध नहीं है, उन्हें त्रैकालिक पर्व कहते हैं। जैसे- अष्टाहिका, दशलक्षण पर्व इत्यादि।
पर्व की सामान्य विशेषताएँ
- आत्मशुद्धि की प्रेरणा देने वाला होता है।
- सम्यक् आचरण की शिक्षा देता है।
- स्वभाव की ओर ले जाने वाला होता है।
- वीतरागता का पोषण करने वाला होता है।
- भेद-विज्ञान का उपदेश देता है।
हमारे पर्व
आत्मा शुद्धि की प्रेरणा देते - वही हमारे पर्व हैं।
सम्यक् आचरण जो सिखलाते - वही हमारे पर्व हैं।
भेद विज्ञान का पोषण करते - वही हमारे पर्व हैं।
वीतरागता प्राप्त कराते - वही हमारे पर्व हैं।
निज स्वभाव की ओर ले चलते - वही हमारे पर्व हैं।
मुक्तिपुरी में जो पहुँचाते - वही हमारे पर्व हैं।
- समकित शास्त्री
वस्तु के स्वरूप को यथार्थ समझ कर निराकुल सहज जीवन ही धर्म है।।
दशलक्षण धर्म
आत्मस्वरूप की प्रतीतिपूर्वक चारित्र (धर्म) की दश प्रकार से आराधना करना ही दशलक्षण धर्म है। आत्मा में दश प्रकार के सद्गुणों (गुणों) के विकास से संबंधित होने से ही इसे दशलक्षण महापर्व कहा जाता है।
क्षमादि दश गुणों को दशधर्म भी कहते हैं।
ये दशधर्म हैं- (१) उत्तमक्षमा (२) उत्तममार्दव (३) उत्तमआर्जव (४) उत्तमशौच (५) उत्तमसत्य (६) उत्तमसंयम (७) उत्तम तप (८) उत्तमत्याग (९) उत्तम आकिंचन्य (१०) उत्तमब्रह्मचर्य
ये दश धर्म नहीं, धर्म के दशलक्षण हैं, जिन्हें संक्षेप में दशधर्म शब्द से भी अभिहित कर दिया जाता है। आत्मा राधन के फलस्वरूप प्रकट होने वाले धर्म हैं, लक्षण हैं, चिह्न हैं।
कहानी
महाराज छत्रसाल भेष बदलकर रात्रि में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक वृद्ध किसान दिखा। उसके शरीर में झुर्रियाँ पड़ गई थी, बाल पक गए थे; लेकिन चुस्ती युवाओं जैसी थी। राजा उनके पास गए और पूछा- आपकी आयु कितनी होगी?
वृद्ध ने उत्तर दिया कुल चार वर्ष की।
राजा ने कहा- आपकी आयु 80 वर्ष से कम नहीं होगी, फिर भी आप चार वर्ष बताकर क्या मेरे साथ मजाक कर रहे हैं?
वृद्ध ने उत्तर दिया- श्रीमान् जी! चार वर्ष से ही मैंने ने धर्म का स्वरूप समझा है और धर्म सहित जीवन ही सच्चा जीवन है।
बाकी जीवन तो पशुवत् जीवन ही रहा है।
जय जिनेन्द्र
विशेष सहयोग - समकित शास्त्री
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3020.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है