पार्श्व प्रभो तव दर्शन से | Parshwa Prabho Tav Darshan Se | Br. Ravindraji

पार्श्व प्रभो तव दर्शन से, मम मिथ्यादृष्टि पलाई |

मेरा पार्श्व प्रभो अंतर में, देता मुझे दिखाई || टेक ||

तेरे जीवन की समता, आदर्श रहे नित मेरी |

तेरे सम निज में दृढ़ता ही, मेंटे भव-भव फेरी ||

संकट त्राता आनंद दाता, ज्ञायकदृष्टि सु पाई || 1 ||

बैर-क्षोभ वश होय कमठ, उपसर्ग किया भयकारी |

नहिं अंतर तक पहुँच सका, प्रभु अंतर गुप्ती धारी ||

ज्ञेयमात्र ही रहा कमठ, किंचित न शत्रुता आई || 2 ||

आ उपसर्ग धरणेन्द्र निवारा, पद्मा मंगल गाये |

धन्य-धन्य समवृत्तिधारी, किंचित नहिं हर्षाये ||

वीतराग प्रभु घातिकर्म तज, केवल-लक्ष्मी पाई || 3 ||

आत्मसाधना देख कमठ भी, प्रभु चरणों में नत था |

आत्मबोध पाकर वह भी तो, निज में हुआ विनत था ||

दूर हुए दुर्भाव विकारी, सम्यक्-निधि उपजाई || 4 ||

निज में ही एकत्व सत्य, शिव सुन्दर संकटहारी |

दिव्यतत्त्व दर्शाती प्रभुवर, मुद्रा दिव्य तुम्हारी ||

दर्पण से मुख त्यों तुमसे, निज निधि मैंने लख पाई || 5 ||

ज्ञानमात्र निज आत्मभाव में, शक्ति अनंत उछलती |

रागादिक मल बाहर भागें, शान्ति किलोलें करती ||

शान्ति सिन्धु में मग्न होय मैं, नमन करूँ सुखदाई || 6 ||

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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