परणति सब जीवन की | Parnati Sab Jeevan Ki

परणति सब जीवन की, तीन भाँति वरनी।
एक पुण्य एक पाप, एक राग हरनी।।

तामें शुभ अशुभ बन्ध, दोय करें कर्म बन्ध।।
वीतराग परणति ही, भव समुद्र तरनी।।(1)

जावत शुद्धोपयोग पावत नाहीं मनोग।
तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी।।(2)

त्याग शुभ्र क्रियाकलाप, करो मत कदापि पाप।
शुभ में न मगन होय, शुद्धता विसरनी।।(3)

ऊँच-ऊँच दशा धारि, चित प्रमाद को विडारि।
ऊँचली दशा तै मति गिरो, अधो धरनी।।(4)

‘भागचन्द’ या प्रकार, जीव लहै सुख अपार।
याके निरधारि, स्याद्वाद की उचरनी।।(5)

Artist : श्री भागचंद जी

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