पंडित भोलाराम शास्त्री
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समर्पण
समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट का 14वाँ पुष्प
श्री राम-नन्दिनी ग्रंथमाला का 8वाँ पुष्प
पण्डित भोलाराम शास्त्री
लेखक :
राजकुमार, द्रोणगिरि
प्रकाशक :
समर्पण
18, आदिनाथ कॉलोनी, केशवनगर, उदयपुर (राज.)
मो. 91 9414103492
प्रथम संस्करण
: 2000 प्रतियाँ ( 23 जून, 2016 )
द्वितीय संस्करण
: 2000 प्रतियाँ ( 9 अक्टूबर 2016 )
तृतीय संस्करण
: 3000 प्रतियाँ ( 5-12 मार्च 2017,
फाल्गुन माह की अष्टाह्निका पर्व के
अवसर पर)
प्राप्ति स्थान
: 18, आदिनाथ कॉलोनी, केशवनगर,
उदयपुर (राज.), मो. 91-9414103492
साहित्य प्रकाशन सहयोग राशि : 25/-
मुद्रक : देशना (दिनेश) कम्प्यूटर्स
मालवीया इण्डस्ट्रियल एरिया, जयपुर
मो. 9928517346
प्रकाशकीय
( तृतीय संस्करण )
‘समर्पण’ का नये लेखकों के विचारों को आप सब तक
पहुँचाना ही उद्देश्य है। अभी तक हमारे द्वारा 13 पुष्प प्रकाशित
किये जा चुके हैं, जिन्हें पाठकों ने हृदय से सराहा है। यह
प्रसन्नता का विषय है कि हमें पुस्तक प्रकाशन के पूर्व ही अर्थ
सहयोग प्राप्त हो जाता है। अतः बाद में हम ‘जो चाहो ले
जाओ, जो चाहो दे जाओ’ की भावना से पाठक को साहित्य
उपलब्ध कराते हैं, इसमें जो राशि आती है, उसे अन्य प्रकाशन
में आवश्यकतानुसार उपयोग करते हैं।
‘समर्पण’ का प्रस्तुत प्रकाशन राजकुमार, द्रोणगिरि द्वारा
लिखित पण्डित भोलाराम शास्त्री है। पुस्तक के प्रमुख
पात्र भोलारामजी अपने भोलेपन से अपनी संगति में आये
व्यक्तियों को स्वाध्याय की प्रेरणा ‘स्वाध्यायः परमं तपः’ या
‘ज्ञान ही सर्व समाधानकारक है, अज्ञान सर्व समस्याकारक/
दुःखदायक है’ मानकर देते हैं।
पुस्तक सर्व सामान्य द्वारा पठनीय ही नहीं, स्वाध्याय से
दूर रहने वाले सहृदय व्यक्तियों तक पहुँचाने योग्य भी है।
पुस्तक, प्रकाशन के पूर्व पंडित शांतिकुमारजी पाटील
जयपुर, पंडित अजितकुमारजी शास्त्री अलवर, पंडित
रतनचन्दजी शास्त्री कोटा, पंडित पीयूषकुमारजी शास्त्री
जयपुर, पंडित धर्मेन्द्रजी शास्त्री कोटा, डॉ. मनीष शास्त्री
मेरठ, श्री अजित जैन बड़ोदरा ने भलीभांति देखी है व उनके
द्वारा दिये गये सुझावों का उपयोग भी किया गया है। सभी को
उनके प्रयासों हेतु हार्दिक धन्यवाद।
प्रस्तुत संस्करण को शुद्ध व परिमार्जित करने हेतु पंडित
श्री देवेन्द्रजी जैन बिजौलिया एवं विषयनानुसार चित्रांकन
के लिए श्रीमती प्रिया-संजय सिद्धाथी इन्दौर का भी बहुत-
बहुत आभार।
पुस्तक के सुन्दर मुद्रण के लिए श्री दिनेश शास्त्री (देशना
कम्प्यूटर्स) जयपुर एवं अर्थ सहयोग हेतु श्रीराम-नंदनी
ग्रंथमाला के संचालकों व अन्य साधर्मियों का भी आभार।
लेखन/मुद्रण में किसी भी प्रकार की त्रुटि हो तो कृपया
हमें अवगत करावें, जिससे कि भविष्य में ध्यान रखा जा सके।
अब आपके हाथों में है - ‘पण्डित भोलाराम शास्त्री।’
निवेदक
समर्पण परिवार
मो. 9414103492
मन की बात
आज की व्यस्तता भरी जिन्दगी में यदि व्यक्ति कुछ छोड़
रहा है तो मंदिर, स्वाध्याय और धर्म। अन्य गतिविधियाँ निरन्तर
वृद्धिंगत हैं, खाना-पीना-घूमना-फिरना-रिश्तेदारी निभाना यह
पहले भी होता था, अब भी; पर मंदिर का समय नहीं कटता था,
अब आ गया फेसबुक/वाट्सएप का जमाना तो लोग पूर्व के सभी
कार्य करते हुये इनको सम्मान के साथ पूरा समय देने लगे, समय
नहीं है तो बस एक मंदिर के लिये। हजार बहाने हैं समय की
कमी, आधुनिकता, व्यस्तता, व्यवसाय…आदि।
पण्डित ‘भोलाराम शास्त्री’ ने अपनी ओर से इन बहानेबाजों
को समझाने की कोशिश की है। इसमें वे कितने सफल होते हैं,
पता नहीं। वह तो कहते ही हैं कि हम तो ‘गाँव के गंवार आदमी
हैं’ यह उनका हास्य/व्यंग्य भरा तकिया कलाम समझदारों को
सोचने को मजबूर करता है कि सच में गंवार कौन है ?
मेरे द्वारा जो भी लिखा जा रहा है, पता नहीं चाह कर भी
आध्यात्मिक विषय पर नहीं लिखा जा रहा है, जबकि कक्षा/
प्रवचन का मेरा प्रिय विषय अध्यात्म ही है। मुझे स्वयं इस
बात की प्रसन्नता हुआ करती है कि जिन विषयों पर सोचते कई
लोग हैं, पर लिखते कम हैं, उन विषयों पर लिखने को दिमाग
में आता है और जिस भी भाषा-शैली में लिखा जाता है, पाठकों
द्वारा सराहना भी मिल जाती है, अब सराहना स्नेह के कारण
मिलती है या नवजात लेखक-कवि है इसलिये प्रोत्साहन करने
के लिए या फिर नूतन विषय पढ़ने को मिलता है इसलिये; पर
आपका प्रोत्साहन पाकर और लिखने का मन करता है।
मेरा निवेदन है कि जो कुछ भी लिखा है, वह सर्व सामान्य
को लक्ष्य करके लिखा है, अतः यदि आप सर्व सामान्य तक
पुस्तिका को पहुँचाने में तन-मन-धन से सहभागी बनना चाहें तो
बन सकते हैं।
दो पुस्तिकायें ‘लक्ष्य’ जिसमें युवा वर्ग को देव-शास्त्र-गुरु
का स्वरूप व कुछ आवश्यक सिद्धान्त एक कथानक के माध्यम
से सिखाने का प्रयास किया है और दूसरी ‘पापा जब बच्चे थे’
जिसमें बालकों की कुछ चुलबुली घटनाओं के आधार से कुछ
सन्देश देने का प्रयास किया है, यह दोनों पुस्तकें लगभग आधी
हो चुकी हैं। ‘मध्यान्तर के बाद’ और ‘ऐसा क्यों होता है’ भी
मस्तिष्क में चल रही हैं, उसमें क्या-क्या विषय पिरोये जायें, उस
पर साथियों से चर्चा चल रही है। वह भी लगभग एक वर्ष में
आपके सम्मुख प्रस्तुत होंगी।
आपके सहयोग व सुझावों का सदैव इन्तजार रहेगा।
- राजकुमार, द्रोणगिरि
मो. 9414103492
समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट
एक परिचय
देव-धर्म-गुरु के चरणों में तन-धन-मन सब अर्पण।
आत्महित व तत्त्वज्ञान को, है सर्वस्व समर्पण।।
ट्रस्ट का नाम - समर्पण चेरिटेबल ट्रस्ट
स्थापना तिथि - 20 सितम्बर 2014
ट्रस्ट मण्डल -
संरक्षक - 1. श्री अजित जैन बड़ौदा, 2. श्री कन्हैयालाल दलावत, 3. श्री ताराचन्द जैन उदयपुर, 4. श्री प्रकाशचन्द छाबड़ा सूरत, 5. श्री ललितकुमार किकावत लूणदा, 6. श्रीमती स्वाति जैन उदयपुर।
अध्यक्ष - राजकुमार शास्त्री उदयपुर, उपाध्यक्ष - अजितकुमार शास्त्री अलवर, कोषाध्यक्ष - रमेशचन्द वालावत उदयपुर, मंत्री - डॉ. ममता जैन उदयपुर, सहमंत्री - पीयूष शास्त्री जयपुर, ट्रस्टी - पण्डित अशोककुमार लुहाड़िया तीर्थधाम मंगलायतन अलीगढ़, ऋषभकुमार शास्त्री छिन्दवाड़ा, डॉ. महेश जैन भोपाल, रतनचन्द शास्त्री कोटा।
ट्रस्ट की सामान्य रूपरेखा
उद्देश्य - 1. तत्त्वज्ञान, अहिंसा, शाकाहार, सदाचार का प्रचार करना। 2. सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध जागरूकता पैदा करना। 3. अनुपलब्ध, आवश्यक व नये लेखकों का श्रेष्ठ साहित्य प्रकाशित करना। 4. सर्वोपयोगी पत्रिका प्रकाशित करना। 5. चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त सहयोग को वितरित करना।
कार्य पद्धति - 1. सबसे सहयोग-सबको सहयोग की भावना
से साधर्मियों से प्राप्त सहयोग साहित्य/चिकित्सा/शिक्षा पर आवश्यकतानुसार वितरित करना। हमारा प्रयास होगा कि फण्ड बनाने की अपेक्षा प्रतिवर्ष प्राप्त सहयोग को उसी वर्ष वितरित कर दिया जाये। 2. व्यक्ति या संस्था के नाम के लिए नहीं, पर काम के लिए काम। 3. सर्वोपयोगी (अपनी समझ के अनुसार) योजना को सबके समक्ष रखना, यदि सहयोग प्राप्त हुआ हो तो उसे योजना/कार्य को करना, नहीं तो…। 3. अच्छी बातें-सच्ची बातें (अर्थात् शाश्वत सत्य) ज़्यादातर लोगों तक पहुँचे, ऐसा प्रयास करना।
गतिविधि - 1. साहित्य प्रकाशन, 2. संस्कार सुधा मासिक पत्रिका का प्रकाशन, 3. स्नातकों द्वारा स्नातकों के लिए शिक्षा चिकित्सा सहायता योजना, 4. साधर्मी वात्सल्य योजना - साधर्मियों से स्वैच्छिक सहयोग लेकर योग्य साधर्मियों को शिक्षा/चिकित्सा सहयोग पहुँचाना।
निवेदन - यह छोटी संस्था आपके सहयोग से समाज में कुछ कार्य करना चाहती है, यदि आप हमारे विचारों से सहमत हो, तो आप भी आर्थिक सहयोग प्रदान कर या अपनी सहमति देकर हमारा उत्साहवर्धन कर सकते हैं। यदि कोई भाई हमें अर्थ सहयोग न देकर, सीधे ही इच्छुक को देना चाहे तो भी हमें अपनी सहमति दे सकते हैं, आवश्यकतानुसार हम इच्छुक को आपसे संपर्क करने हेतु भी सूचित कर सकते हैं। साहित्य प्रकाशन सहयोगी बन सकते हैं।
हमारा उद्देश्य कुछ अलग ढंग से समाज में जागरूकता लाना व सहयोग करना है। आपके सुझाव व सहयोग सदैव अपेक्षित हैं। आप जब, जो, जैसे कर सकते हैं, आत्महित व समाजहित में ज़रूर कीजिए। बस यही अनुप्रेक्ष है।
निवेदक - समस्त ट्रस्ट मण्डल, समर्पण चेरीटेबल ट्रस्ट, उदयपुर (राजस्थान)
समर्पण
चिरंजीव अगम जैन (प्रिंस)
को
तत्त्वज्ञान व श्रावकाचार से सुरभित
जीवन जीते हुए
संघ लोक सेवा आयोग में
हमारे किसी भी प्रकार के सहयोग किये बिना
चयनित होने के अवसर पर
इस भावना के साथ कि -
जीवन में किसी के सहयोग
की अपेक्षा न रहे।
विषयानुक्रमणिका
क्र. विषय पृष्ठ
- शील ही श्रृंगार है… 11
- शांति से जीवन जीने की कला ही धर्म… 19
- टाटमपास… 30
- घड़ी घड़ी में घड़ी जा रही… 37
- डरे मृत्यु से यद्यपि टलत न… 44
- काल करे सो आज कर… 50
- धर्म कब ?.. 60
- पर की आस - अंधविश्वास… 69
- दान के लिए कमाओ मत… 79
- विरासत… 89
- संस्कार ही संपत्ति है… 97
- समझदारी… 104
- गुण ही आभूषण… 113
- सल्लेखना… 119
प्रस्तुत प्रकाशन में प्राप्त सहयोग
- श्री मुकेशकुमार जैन (बलाटी) 5000.00
- श्री अमित जैन (डीडीसी), दिल्ली 2000.00
- श्री नेमिचन्द्र चंपालाल भरावत चैरिटेबल 1100.00
ट्रस्ट, उदयपुर - श्री विद्या-सागर जैन, उदयपुर 1000.00
शील ही श्रृंगार है…
सिद्धपुर निवासी पण्डित भोलाराम शास्त्री अपने सुपुत्र सिद्धप्रकाश के पास रहने के लिए शिवपुरी आये हुये हैं। पण्डितजी यथा नाम तथा गुण। आज के युग में ऐसे बहुत लोग हैं, जो ऊपर से भोले हैं, पर अन्दर से भाले हैं, परन्तु भोलाराम शास्त्री छल-कपट व आधुनिकता की चकाचौंध से दूर अपने छोटे से गाँव में, बड़ा सा दिल लेकर रहते थे।
सिद्धपुर छोटा-सा गाँव जहाँ विकास के नाम पर विनाश अभी प्रारंभ ही हुआ था, पर पण्डितजी तो टी.वी., मोबाइल, नेट, कम्प्यूटर आदि की दुनिया से दूर रहते थे। उनका बेटा सिद्धप्रकाश शहर में आकर अच्छी नौकरी कर रहा था, उससे भी कभी वह फोन से बात नहीं करते थे, किसी से आते-जाते ही उसके समाचार पूछ लेते व अपने समाचार बता देते थे।
आजीविका हेतु उनकी एक छोटीसी किराने की दुकान थी। उसमें भी उनका नियम था कि दैनिक घर खर्च लायक
पण्डित भोलाराम शास्त्री
बिक्री हो जाती तो दुकान बन्द कर देते। उधारी तो उनकी दुकान पर चलती ही नहीं थी, यदि कोई परिचित कभी किसी कारण से उधार ले भी जाता तो उनके यहाँ पर खाता नहीं चलता था, उधार लेने वाला स्वयं ही पैसे दे जाये तो ठीक, न दे जावे तो वे कभी मांगते नहीं थे। उनका सदैव सिद्धान्त रहा कि ‘उतने पैर पसारिये, जितनी लम्बी सोर (चादर)’ इस मान्यता के कारण उन्हें जीवन में कभी कोई कमी ही नहीं लगी और शान्ति से जीवन बिताया। पूजन/पाठ/सामायिक/स्वाध्याय में ही उनका अधिकांश समय बीतता रहा।
श्रीमतीजी का स्वर्गवास हो जाने से अब वह अपने बेटे के पास रहने आ गये थे। बड़े शहर के दर्शन उन्होंने पहली बार किये थे। यहाँ उनका मन तो नहीं लग रहा था, पर सिद्धपुर में अकेले होने एवं बेटे-बहू के आग्रह व सेवाभाव के कारण शिवपुरी में ही रह रहे थे।
उनके बेटे के घर में एक लड़की स्वीटी का रोजाना आना-जाना होता। करीब 15 वर्ष की आयु होगी। वह उसे जब भी देखते, वह अपने कद के हिसाब से छोटे-छोटे कपड़े पहने हुए रहती और कभी तो वे जगह-जगह से फटे भी होते थे।
पण्डित भोलाराम को यह देखकर दयाभाव जागृत हुआ।
शील ही श्रृंगार है…
एक दिन जब वह लड़की उनके घर आई व वापिस जाने लगी, तब उन्होंने उससे कहा - बेटी! जरा रुको। वह उनके पास ही खड़ी हो गई। वह उस दिन भी जाँच तक का फटा सा हाफ पेन्ट व छोटे-छोटे बांह वाली शर्ट पहने हुई थी।
चित्र: एक लड़की, एक छोटी बच्ची और एक बूढ़ा आदमी बैठे हैं। लड़की और बच्ची के कपड़े फटे हुए हैं। बूढ़ा आदमी कुछ सोच रहा है।
पण्डित भोलाराम ने अपनी बहू समता को आवाज लगाई - ‘बहू, ओ बहू !’
‘जी बाबूजी’ कहते हुए उनकी बहू दौड़ते हुए आई।
‘बेटा! अपने घर में तुम्हारे या अपनी बेटी श्रद्धा के अच्छे से कपड़े हों तो इस बेचारी बेटी को दे दो न; इसके पास ढंग के कपड़े नहीं हैं; इन कपड़ों में यह अच्छी नहीं लगती है।’
समता और स्वीटी ने जब भोलारामजी की बात सुनी तो
दोनों ही पण्डितजी के भोलेपन पर हँसने लगे। उन्हें हँसते देखकर पण्डितजी बोले - ‘अरे भाई! क्या बात हो गई, तुम दोनों हँस क्यों रहे हो ? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या ?’
समता बोली - ‘बाबूजी ! हँसने वाली बात तो आप कर ही रहे हैं, यह स्वीटी सामने जो बड़ा बंगला दिख रहा है, उसके मालिक की छोटी बेटी है। और जो ये कपड़े आप फटे व छोटे कह रहे हो, वे बहुत कीमती हैं और यह तो आज का फैशन है, यह फटे हुए नहीं हैं।’
भोलारामजी बहू की बातें सुनकर बड़े दुखद आश्चर्य में पड़ गये, सोचने लगे, फटे कपड़े भी फटे नहीं हैं, छोटे व फटे कपड़े पहिन रही है, फिर भी गरीब नहीं है, यह कौनसा फैशन है ?
समता बोली - ‘अरे बाबूजी ! आप कहाँ खो गये ?’
भोलारामजी बोले - ‘कहीं नहीं बेटा। पर बेटी बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ ?’
स्वीटी बोली - ‘कहिये न दादाजी ! आपकी बात बुरी क्यों मानूँगी !’
'देखो बेटी! हमारे माता-पिता कहा करते थे कि कपड़े तन ढँकने के लिए पहने जाते हैं, जिससे कि अपना तन और
दूसरे का मन खराब न हो। बेटा! अपन तो सज्जन परिवारों के हैं, देश दुनिया के लोग टी.वी. देख-देखकर क्या-क्या करने लगे हैं, वह सब हमें शोभा नहीं देता। टी.व्ही. पर जो नाटक दिखाये जाते हैं, वे नाटक करनेवाले अभिनेता हमारे आदर्श नहीं हैं। वे सब तो पैसे के खातिर पिटते हैं, पीटते हैं, नाचते हैं, रोते/गाते हैं। वे सब पैसे के लिए कपड़े पहनते हैं और पैसे के लिए उतारते हैं। वे हमारे आदर्श कैसे हो सकते हैं ? हमारे आदर्श तो सीता, द्रौपदी हैं, जिन्होंने अपने शील की रक्षा के लिये सब कुछ दाँव पर लगा दिया।’
स्वीटी बोली - ‘पर दादाजी ! आजकल नया जमाना है, लड़के-लड़की सब बराबर हैं। हम जो कपड़े पहनते हैं, उन्हें देखकर लड़के अपना मन खराब क्यों करते हैं ? उन्हें तो अपनी मर्यादा में रहना चाहिये। वह क्या करते हैं, क्या पहनते हैं, हम तो कभी उन्हें नहीं टोकते।’
‘बेटी! तुम स्वयं तो मर्यादा में रहना नहीं चाहती और लड़कों को उनकी मर्यादा सिखा रही हो। वैसे बेटी आपको जो करना हो/पहिना हो सो करो, हम क्या कर सकते हैं। पर बेटा एक बात पूछना चाहता हूँ-’
‘हाँ दादाजी पूछो न !’
पंडित भोलाराम शास्त्री
'बेटा ! अगर घर में गुलाबजामुन बने तो उनमें मक्खियाँ न गिर जाएँ, इसके लिए क्या करोगी ?’
'दादाजी ! सीधीसी बात है गुलाबजामुन ढँककर रखेंगें और क्या ?’
'बेटा ! यदि हमने ढँक कर नहीं रखे और मक्खियाँ गिर गईं तो तुम्हारी माँ मक्खियों को क्या सजा देंगी ?’
वह हँसते हुए बोली ‘अरे दादाजी ! मक्खियों को नहीं, माँ तो हमें ही डंडे लगायेगी !’
'नहीं बेटा ! पुराने जमाने में ऐसी गलती होने पर माँ बच्चों को डंडे लगाती थी, अब तो नया जमाना है, क्यों न मक्खियों को सजा दी जाये ?’
'नहीं दादाजी ! ऐसा नहीं होता; हमें ही गुलाबजामुन की सुरक्षा करना चाहिए। यदि हमने रक्षा नहीं की तो इसमें उन मक्खियों का क्या दोष ?’
'बस बेटा ! यही मैं कहना चाह रहा हूँ कि अपने शरीर व शील की सुरक्षा स्वयं करो; यदि हम इन छोटे-छोटे कपड़ों में अपना शरीर दिखाते फिरेंगे, तब तो नये-नये लड़के मक्खियाँ बनकर मंडरायेंगें ही और फिर कोई दुर्घटना हो गई तब दोष
उनका नहीं, अपना ही होगा और नुकसान भी अपना ही होगा। इसलिए बेटा ! मेरा तो कहना यही है कि शालीन कपड़े पहनो, जिससे राह चलते लोगों को छेड़खानी का भाव ही नहीं आये !’
'दादाजी ! आप बात तो सही कह रहे हैं, पर…’
'सुनो बेटी ! एक बात और, तुम्हारे घर में पिताजी ने कीमती व सुन्दर हीरे की अँगूठी खरीदी होगी तो क्या उसे चौराहे पर रखेंगे या जहाँ चोरी/लुटेरों का खतरा होगा, वहाँ पहिन कर जायेंगें ?’
'नहीं दादाजी ! उसे तो अच्छी तरह संभाल कर रखेंगे, बड़े भाग्य से तो वह मिली है, उसे पिताजी ऐसे ही लूटने को कहीं भी नहीं रख देंगे और जहाँ चोरों का खतरा है, वहाँ पहन कर भी नहीं जावेंगे।’
'तो फिर तुम्हारा शरीर भी सुभग नामकर्म के उदय से बहुत सुन्दर है, कीमती है, इसे सबके सामने दिखाते फिरना अच्छा नहीं है, इसको संभाल / सम्मान / सुरक्षा / सदुपयोग करना अपना ही कर्तव्य है।
बेटा ! हम तो ठहरे गाँव के गँवार आदमी, ज्यादा कुछ जानते नहीं, यदि कुछ बुरा कह दिया हो तो माफ करना !’
पंडित भोलाराम शास्त्री
स्वीटी समझदार थी, उसे भोलारामजी की बातें समझ में आ रही थीं, वह बोली - 'नहीं, दादाजी ! आपने कोई बुरी बात नहीं की, आप तो हमारे ही हित की बात कर रहे हैं। फिर हँसते हुये बोली - आपको कल से ये फटे कपड़े पहने हुए मैं नहीं दिखूँगी, मैं भी अब आपकी पसंद के नये कपड़े पहनकर ही आऊँगी। दादाजी ! टी.वी के हीरो वही हीरो नहीं हैं, सच में तो मेरे हीरो आप हैं !’
'बेटा ! खुश रहो तुम्हारे जीवन में कभी बुरे दिन न आवें - यही आशीर्वाद है।’
जयजिनेन्द्र दादाजी ! कहकर स्वीटी प्रसन्नतापूर्वक पर चली गई।
सत्संगति…
सत् स्वभाव के संग में रहना, निश्चय से सत्संग कहा।
जो जन सत् का आश्रय लेते, उनका संग व्यवहार अहा।।
सत् स्वभाव की चर्चा करना, वालों के संग में रहना।
है सत्संग उपचरित भाई ! यथायोग्य संगति करना।।
सत् संगति से ही यश वैभव, अरु सुख शांति मिलती है।
सत्संगति करती है उपकृत, सब दोषों को हरती है।।
शांति से जीवन जीने की कला ही धर्म…
भोलाराम शास्त्री प्रतिदिन मन्दिर में स्वाध्याय करने लगे थे। रुचिचन्त लोग कम ही थे, फिर भी वह कभी भी संख्या की ओर नहीं देखते थे। उनका सहज-सरल-हँसमुख स्वभाव व प्रवचन शैली सबका मन मोह लेती। भोलाराम शास्त्री भोलेपन व अपनी मुस्कराहट के साथ सदैव प्रसन्न रहते।
शुगर/ब्लडप्रेशर जैसी सर्वत्र उपलब्ध बीमारियाँ भी उनके पास आने से भयभीत रहती थी, तब फिर अन्य बीमारियों का तो उनसे परिचय ही नहीं था क्योंकि अन्य बड़ी बीमारियों की माता स्वरूप बीमारी शुगर/ब्लडप्रेशर हैं और इनको जनक है चिन्ता/तनाव/टेन्शन। टेन्शन किस चिड़िया का नाम है, यह भोलाराम शास्त्री जानते ही नहीं थे।
उनका दृढ़ विश्वास था कि अनहोनी होती नहीं, होनी कभी टलती नहीं। तब फिर किस बात की चिन्ता। जो भी होता सहज स्वीकार्य। मन्दिर से जब घर पहुँचते यदि पँहुचते ही भोजन तैयार है तो ठीक और किसी कारण से कुछ देर हो
पण्डित भोलारामजी
गई तो भी कोई बात नहीं। उनकी सहजता/सरलता से उनकी बहुरानी भी कभी उनसे भयभीत नहीं रहती, न ही ऐसा लगता कि घर में ससुर रह रहे हैं।
बहू-बेटे के साथ सास-ससुर को कैसे रहना चाहिये, भोलाराम शास्त्री इसका एक सुन्दर उदाहरण थे।
पण्डित भोलारामजी अपने बरामदे में दोपहर में आराम कुर्सी पर बैठे हुये थे, तभी उनके नियमित श्रोता शान्तिलालजी अपनी पत्नी शान्तिबाई के साथ वही आये। शान्तिलालजी रिटायर्ड हो चुके थे, घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। उच्च शिक्षा प्राप्त बहू-बेटे सभी अपने कामकाज में मस्त। नौकर-चाकर सब कुछ पर; शान्तिलालजी को कोई कमी थी तो बस शान्ति की।
शांति से जीवन जीने की कला ही धर्म…
जयजिनेन्द्र करते हुये वे पण्डितजी के पास बैठ गये। पण्डितजी ने उनसे पूछा - शान्तिलालजी! आपका स्वाध्याय तो बहुत अच्छा चल रहा होगा क्योंकि आपको अब कोई काम तो है नहीं, दिमाग भी आपका तेज है, अतः स्वाध्याय में अच्छा मन लगता होगा।’
शान्तिलालजी लंबी सांस लेते हुये बोले - ‘अरे पण्डितजी! घर में और स्वाध्याय? मेरे घर में तो बहुत अशान्ति का माहौल चलता है। बेटे अपने ढंग से रहते हैं, खर्चा तो वह पानी की तरह करते हैं, यह देखकर मन बहुत अशान्त रहता है। हम तो आपके पास आये ही इसलिये है कि आप कोई शान्ति का मन्त्र बतायें।’
पण्डितजी बोले - ‘क्या आपके बेटे बेरोजगार हैं?’
‘नहीं पण्डितजी! मेरे दोनों बेटे संजय व अखिलेश तो अच्छी नौकरी कर ही रहे हैं, हमारी तो बहुयें भी नौकरी पर जाती हैं!’
‘अच्छा तो क्या उनको कोई गलत लत लगी हुई है?’
‘अरे नहीं, पण्डितजी! ऐसी कोई बात नहीं है, मेरे बेटे तो इस मामले बहुत ही सुशील हैं।’
पण्डित भोलाराम शास्त्री
22
‘फिर तो जो वह खर्च करते हैं, अपनी कमाई में से ही
करते होंगे न ?’
‘हाँ, पर मुझसे पूछे बिना ही कभी भी कपड़े खरीद लाते
हैं, कभी भी गाड़ी बदल लेते हैं, बहुओं को जब देखो गिफ्ट
लाते रहते हैं, बहुएँ भी अपनी मर्जी से हमारे मना करने पर
भी कभी हमें कुर्ता-पाजामा तो कभी इनके लिये साड़ी
खरीदती रहती हैं, इतना खर्च तो हमसे देखा नहीं जाता।’
‘पर शान्तिलालजी ! बेटे-बहू स्वयं कमाते हैं, पढ़े-
लिखे समझदार हैं, आपसे कुछ माँगते नहीं हैं। अब उनके
अपने शौक हैं। वह खर्चा अपने परिवार ही के खाने-पहनने
में तो करते हैं। अब आपसे नहीं पूछते तो इसमें क्या हो गया ?
उनको लगता होगा कि हर छोटी बात में पापा-मम्मी को क्यों
परेशान करें। आप तो इतनी खुशी मनाओ कि धन बढ़ने के
साथ उनको कोई गलत लत नहीं लगी।’
शान्ताबाई अभी तक चुप बैठी थीं, वह अचानक झुंझलाते
हुए बोलीं - 'पर पण्डितजी ! कुछ भी कहो लड़के तो
लड़के हैं, वे तो कुछ भी करेंगे, पर बहुओं को तो मर्यादा में
रहना ही चाहिये। हमारी बहुएँ तो कमाने क्या लगीं, अपने
आपकों घर की मालकिन ही समझने लगीं। मैं जो पहनने,
शान्ति से जीवन जीने की कला और धर्म…
23
खाने की बात करती हूँ, वह तो कभी मानती ही नहीं है। बड़ी
बहू ममता तो ठीक, पर अभी 2 माह पहले शादी होकर आई
छोटी बहू सपना भी उसके साथ रहकर बिगड़ गई है, घूँघट
डालने की बात तो दूर, दोनों आजकल साड़ियाँ छोड़कर
सलवार-सूट पहनने लगीं हैं, मोबाइल पर बातें करती हैं,
सुबह 8 बजे सोकर उठती हैं, मैं बैठी रहती हूँ और वे फराटे
से स्कूटर उठाकर मार्केट-मन्दिर चलती जाती हैं। पण्डितजी !
आप कुछ भी कहो पर मुझे तो यह सब अच्छा नहीं लगता।
आपकी समता बहू तो कितनी अच्छी है, पर मेरी ममता और
सपना तो पता नहीं, किस कर्म के उदय से मुझे मिल गई।’
शान्तिलालजी भी पत्नी की हाँ में हाँ मिला रहे थे।
पण्डितजी बोले ‘अरे ! शान्तिलालजी ! आप ऐसा क्यों
नहीं सोचते कि मेरी बहू भी किसी की बेटी है, वह बड़े ही
लाड़-प्यार से पाली-पोसी गई है। यहाँ हमारे घर बिल्कुल
अनजान लोगों के पास आई है, उसे सबको जानने-समझने
में समय तो लगेगा ही।’
‘सो तो है।’ शान्तिलालजी धीरे से बोले।
पण्डितजी समझाते हुये बोले कि 'बहू भी तो आखिर
बेटी ही है। जब हम अपनी बेटियों की भूलों को नजरअंदाज
24
कर उसे भला-बुरा नहीं कहते, प्रेम से समझाते ही हैं तो फिर
किसी की बेटी से ऐसी अपेक्षा क्यों रखना कि वह हमारे घर
सबकुछ सीखकर ही आई होगी। हमारी आज्ञा में ही चलेगी,
ऐसा कैसे हो सकता है ?’
‘पण्डितजी ! आप कुछ भी कहो, पर बहुओं को अपने
सास-ससुर की इच्छा का भी तो ध्यान रखना ही चाहिये। हम
तो कभी अपने सासू के सामने ऐसा नहीं करते थे।’ शान्ताबाई
ने कहा।
पण्डितजी बोले - 'देखो भाई ! मैं तो हमेशा से गाँव में
रहा, मोटा खाया, मोटा पहना उसी की आदत है, अब मेरे
बेटे-बहू उनकी पसन्द व इच्छा के अनुसार पहनने-
बोलने, आने-जाने का कहेंगे तो मैं तो वैसा नहीं कर सकता
और जबरदस्ती करेंगे तो बुरा लगेगा और झगड़ा ही होगा,
इसी तरह आज के बच्चों को हम अपने ढंग से ही खाने-
पीने-पहनने का आग्रह रखेंगे तो वे कैसे मानेंगे ? आग्रह
रखना तो अशान्ति का ही कारण होगा।
देखो, मैंने भी तो अपने पिताजी जैसी पगड़ी नहीं लगाई,
मैं पगड़ी छोड़कर टोपी पर आ गया तो बेटा धोती-कुर्ता-
टोपी छोड़कर पेन्ट-शर्ट पर आ गया और जब बेटे को
स्वतंत्रता है तो फिर बहू भी तो अपने ढंग से रह ही सकती है। उनकी अपनी सोच है, उनकी अपनी आवश्यकता है। हमें तो बस खुशी इस बात की है कि सब कुछ बदलने के बीच में कभी न बदलने वाले अहिंसा/अनेकान्त/स्याद्वाद/अकर्तृत्ववाद के सिद्धान्तों से भरपूर जैनदर्शन के प्रति इन सबकी रुचि है, अहिंसा, सदाचार, श्रावकाचारमय जीवन है, साधर्मियों के प्रति वात्सल्य है और हमें क्या चाहिये ? मेरे हिसाब से तो यही सोच सही है व शान्ति का मार्ग तो एकमात्र यही है।’
‘पण्डितजी ! आप तो भाग्यशाली हैं, जो आपको इतने अच्छे बेटे-बहू मिले, हमारी बहुएँ तो जब बिना सिर ढँके सूट पहन कर निकलती हैं तो मुझे तो बहुत शर्म आती है…।’
'देखो शान्तिलालजी ! पहले का जमाना और था, आज का जमाना और है, पहले सब महिलायें घर में ही रहती थीं, महिनों गाँव से बाहर नहीं निकलती थीं, बाजार नहीं जाती थीं, नौकरी नहीं करती थीं, गाँव भी छोटे-छोटे होते थे, इसलिये उस समय का रहना-खाना-पीना, सब अलग प्रकार का था, पर आज बहुएँ नौकरी कर रही हैं, गाड़ी चला रही हैं तो उन्हें सूट पहनना सुविधाजनक लगता है, साड़ी में वह सब
काम करने में उन्हें असुविधा लगती है, इसलिये उन्हें वह पसन्द है तो पहनने दो, आप क्यों परेशान होते हो ?’
‘वाह पण्डितजी ! आप धोती वाले होकर, भारतीय संस्कृति के प्रचारक बनकर भी ऐसी बातें करते हो, आपकी यह बात तो हमें जमी नहीं।’ शान्तिलालजी नाराजगी से बोले।
‘देखो भाई ! मुझे अपनी भारतीय संस्कृति ही पसन्द है, अपनी भाषा, अपना पहनावा ही पसन्द है, परन्तु यह सब भाषा और पहनावा तो बाहर की पैकिंग है, माल तो हमारे भाव, हमारा धर्म, हमारे विचार हैं। भाषा तो हमारे भावों को दूसरों तक पहुँचाने का साधन है, अब यदि बच्चों के विचार सदाचारमय हैं, वे विनम्र और धर्म के प्रति रुचिंवन्त हैं तो वे चाहे अंग्रेजी पढ़ें, चाहे संस्कृत, हम किसी भाषा के एजेण्ट तो हैं नहीं कि हम भाषा के प्रचार के लिए अपने भाव व भव बिगाड़ दें।’
‘पण्डितजी ! अंग्रेजी-संस्कृत भाषा की बात तो छोड़ो पर कपड़े तो अपने पुराने समय के ही सही थे, वही पहनना चाहिये ना ? यह तो आप भी मानते ही होंगे’ - शान्तिबाई बोली।
'अरे भाई ! रही कपड़ों की बात, तो कपड़े अपने शरीर को ढँक कर शील व सुरक्षा के लिये हैं, अब यदि ये दोनों
काम के पहने हुए कपड़े से होते तो उनकी पसन्द भी ठीक है, हमें कोई साड़ी की दुकान तो खोलना नहीं है कि वे साड़ी ही पहनें, इसी का आग्रह व प्रचार करते रहें।’
शान्तिबाई झुंझलाते हुए बोली - ‘ठीक है, जिसे जो पहनना है, सो पढ़े व जो पहनना सो पहने उनकी मर्जी, हम बीच में दखल देने वाले कौन होते हैं। पण्डितजी हमें तो कोई आश्रम हो तो बताओ, जहाँ जाकर हम शान्ति से रह सकें। हम तो ऐसे वातावरण में नहीं रह सकते।’
‘आपने कहा कि किसी आश्रम में चले जायें तो शान्तिबाईजी जरा शान्ति से विचार करो, सही समझ बिना, समता भाव नहीं आ सकता और समता आये बिना कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती। और यदि सही समझ है, समता व संतोष का भाव है तो फिर कहीं अशांति नहीं। हमारे गाँव में एक कहावत चलती है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ कहावत सुनाकर पण्डितजी अपनी उपयुक्त हँसी हँसने लगे।
शान्तिलालजी व शान्तिबाई को पण्डितजी की बातें सही लगने लगी थीं, पर उनका मान उन्हें यह मानने में अभी तक रोड़े अटका रहा था, पर अब धीरे-धीरे कषाय मन्द हो रही थी व सरलता आ रही थी।
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'शान्तिलालजी बोले - पण्डितजी ! आप जो कुछ कह रहे हैं, लग तो सही रहा है।’
'देखो, शान्तिलालजी ! हम तो ठहरे गाँव के गँवार आदमी, ज्यादा कुछ जानते नहीं, बस एक बात जानते हैं कि जिस तरह शान्ति से जीवन जिया जा सके, राग-द्वेष कषाय भाव न हो और मिथ्यात्व का पोषण न करना पड़े, वैसे जीना चाहिये। क्योंकि कहा है ‘शान्ति से जीवन जीने की कला का नाम धर्म है।’
अरे पण्डितजी साहब ! गँवार तो मैं निकला। अपने आप को पढ़ा-लिखा और उच्च पद से सेवानिवृत्त होने के कारण, उसके मद में जीवन जी रहा था, इसीलिये उस अहंकार के कारण ही अशान्त हो रहा था। आपने बिल्कुल सही कहा कि सब अपने अनुसार ही सोचते-करते व जीते हैं, उन्हें वैसा करने का अधिकार भी है।
आपने कुछ दिन पहले ही तो याद कराया था - ‘अनादि-निधन वस्तुयें भिन्न-भिन्न अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती हैं, कोई किसी के आधीन नहीं, कोई किसी के परिणमित कराने से परिणमित नहीं होती।’
हम सबने तो इन्हें दो लाइनें मानकर मात्र याद किया है,
शान्ति से जीवन जीने की कला ही धर्म… 29
पर पण्डितजी आप तो सुखी होने के उपाय रूपी इस मन्त्र के अनुसार ही जीवन जीते हो, इसलिये आपके जीवन में शान्ति, समता और मुस्कान है और हम अशान्त हैं, पर अब हम भी इस मंत्र को मात्र याद नहीं करेंगे, इस बात को पक्का करेंगे कि बेटे-बहू भी स्वतंत्र द्रव्य हैं, उनका परिणमन उनके लिये, उनके अनुसार है मेरे अनुसार नहीं; उन्हें अपने अनुसार परिणमित कराने का भाव ही अशान्ति का कारण है, बेटे-बहू का परिणमन मेरी अशान्ति का कारण नहीं है। पण्डितजी ! आपसे मिलकर आज मजा आ गया।’
शान्तिबाई अचानक घड़ी की ओर देखते हुये बोली ‘समझ में आ गया हो तो उठो, घर चलो मेरी बेटी रूपी बहुयें ऑफिस से आने वाली होंगी, थकी होंगी, मैं शाम के भोजन की तैयारी करती हूँ।’
'पण्डितजी हंसते हुये बोले - शान्तिलालजी ! शान्ति से जाओ, शान्ति से रहो, तो आपका घर ही शान्ति निकेतन बन जायेगा।’
जयजिनेन्द्र।
विषय-कषायी कार्यक्रम, वीतराग का नाम।
धर्म न होवे रंच भी, मात्र पाप का काम।।34।।
3
टाइमपास…
भोलारामजी सुबह-शाम अपना डण्डा लेकर नगर परिक्रमा पर निकलते तो उनके व्यक्तित्व को देखकर परिचित ही नहीं, अपरिचित भी जयजिनेन्द्र दादाजी, प्रणाम दादाजी कहकर उनका अभिवादन करते और वे भी मुस्कराते हुए शुभाशीष देते हुए आगे बढ़ते जाते।
एक दिन भोलारामजी एक घर के सामने से जा रहे थे कि उस घर को बहुरानी नेहा ने जयजिनेन्द्र कहकर उन्हें घर पर आने का आग्रह किया। भोलारामजी सहजता से उसके घर पहुँचे और कुर्सी पर विराजमान हो गये। जलपान करके उन्होंने पूछा ‘नेहा ! तुम स्वाध्याय सभा में तो आती नहीं हो, फिर मुझे कैसे पहचान लिया ?’
टाइमपास…
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नेहा ने कहा- ‘दादाजी ! आपके प्रवचनों के बारे में तो मैंने भी सुना है, पर सुबह बच्चों को स्कूल भेजने और इन्हें भोजन कराकर दुकान भेजने में ही देर हो जाती है और रात्रि में बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, इसलिये मैं चाहकर भी नहीं आ पाती, पर मन्दिर में आपको कई बार देखा एवं आपके पोते के साथ मेरा बेटा पढ़ता है, इसलिये आपको मैं तो जानती ही हूँ, पर मेरा बेटा भी आपको बात करता रहता है क्योंकि आपका पोता स्कूल में आपके बारे में अपने दोस्तों को बताता रहता है।’
भोलारामजी बोले - ‘कोई बात नहीं बेटी ! अगर तुम दो-चार बहुओं के साथ दोपहर में पढ़ना चाहो तो मैं दिन में भी तुम्हें पढ़ा सकता हूँ।’
नेहा बोली - ‘अरे दादाजी ! दिन में तो बिल्कुल टाइम ही नहीं मिलता !’
‘क्यों बेटा ! सुबह-शाम तो गृहस्थी के काम में व्यस्त हो पर दिन में क्या करती रहती हो, जो तुम्हें समय नहीं मिलता ?’
बड़े उत्साहपूर्वक नेहा बोली ‘दादाजी ! दिन में मैं ब्यूटी पार्लर चलाती हूँ ना ?’
भोलारामजी ने बड़े ही भोलेपन से पूछा ‘ब्यूटी पार्लर…! ये क्या होता है ? बेटा ! इसमें क्या बेचती हो ?’
32
पण्डित भोलाराम शास्त्री
नेहा नीची गर्दन करके मुस्कराते हुए बोली - ‘दादाजी ! इसमें बेचना कुछ नहीं पड़ता ! बहू-बेटियाँ आती हैं, उनका श्रृंगार करती हूँ, कभी-कभी उनके बाल कटिंग करती हूँ।’
यह सुनकर भोलारामजी सोच में पड़ गये। वह सोचने लगे कि यह कैसा शहर है और कितना तेजी से दौड़ रहा है, जो काम गाँव में नाई किया करते थे, वही काम यहाँ आजकल जैनों के घर में होने लगा है। हम जब भी कभी बाल कटवा कर घर में आते तो बचपन में माँ और जवानी में पत्नी पहले नहाकर आने को कहती, तब कहीं घर में कुछ छू पाते थे। पर यहाँ तो यह बहूरानी घर में ही कटिंग कर रही है, क्या शुद्धता रहती होगी ? और यह बताते हुए कि यह दूसरों का श्रृंगार करती है, बड़ा खुश भी हो रही है।
भोलारामजी को चुप देखकर नेहा बोली - ‘अरे दादाजी ! आप क्या सोचने लगे ?’
भोलारामजी बोले - ‘कुछ नहीं बेटा ! मैं यह सोच रहा था कि गाँव में दूल्हा-दुल्हन को उबटन लगाने, महावर आदि लगाकर श्रृंगार करने और ये बाल काटने का काम तो नाई-नाइन किया करते थे। शहर में आकर बड़ी तरक्की हो गई, जो अब यह काम हमारी समाज में भी होने लगे।’
33
‘अरे दादाजी ! यह कोई खराब काम थोड़े ही है, इसका तो पूरा कोर्स करना पड़ता है, तब कभी यह काम सीख पाते हैं। शादियों के समय तो मेरे यहाँ लाइन लगी रहती है। बड़े-बड़े घरों की बहू-बेटियाँ आती हैं, सीजन में अच्छी कमाई भी हो जाती है।’
भोलारामजी बड़े ही भोलेपन से यह सुन रहे थे, पर यह काम करने के पीछे का तर्क समझ में नहीं आ रहा था। वह बोले - ‘बेटा कमाई अच्छी होती होगी, पर तुम्हारी कोई मजबूरी होगी, तभी तो कमाई के लिए यह काम करना पड़ रहा होगा।’
वह हँसते हुये बोली - ‘अरे नहीं, दादाजी ! मैं तो दिन भर घर पर रहती हूँ। पप्पू के पापा की दुकान शिवपुरी में सबसे जोरदार चलती है, वे तो दिनभर घर पर आते ही नहीं हैं, तब फिर मैं दिन भर क्या करूँ ? इसलिये समय काटने के लिए ये काम करती हूँ।’
'अरे बेटा ! ये क्या कह रही हो, अपने (आत्मा के) श्रृंगार के लिए समय नहीं और दूसरों के व अपने शरीर को सजाने के लिए समय है, स्वाध्याय के लिए समय नहीं है और समय काटने के लिए बाल काट रही हो। अरे ! बड़े
34
भाग्य से तो हमें जैनकुल मिला, पुण्योदय से तुम्हें कमाऊ पति मिला, घर में और कोई दुविधा नहीं है, तब और क्या चाहिये ?’
‘दादाजी ! पर मेरी मेहनत बेकार नहीं जाती है, जो भी हमारे पास आती हैं, उनका रूप निखार देती हूँ। ऐसा श्रृंगार करती हूँ कि सास भी बहू जैसी लगने लग जाती है’ - नेहा हँसते हुए बोली।
‘बेटा ! यह मनुष्य भव मोह-राग-द्वेष की गंदगी को हटाकर, समता-सरलता-शील-क्षमा-मार्दव आदि गुणों से अपने आपको सजाने के लिए मिला है, शरीर का श्रृंगार करते तो अनंत भव बीत गये। अरे ! जो शरीर में नहीं हैं, जो मेरा नहीं है, उसका श्रृंगार करने से क्या लाभ है ?’
‘पर दादाजी ! आप कुछ भी कहो, शरीर ही सही, पर सुन्दर तो हो जाता है।’
'बेटा ! शरीर तो मल-मूत्र से ही बना और भरा हुआ है, उसको शुद्ध और सुन्दर कैसे बना सकते हो ? क्या कभी कोयले को साबुन से सफेद कर सकते हो ? नहीं, तो फिर मैल से बने शरीर को सुन्दर कैसे कर सकते हो ? चाहे अपना हो या पराया, इस शरीर के श्रृंगार में समय लगाना मूर्खता ही है। कहा भी है -
35
‘जिसके श्रृंगारों में मेरा यह महंगा जीवन धुल जाता।
अत्यन्त अशुचि जड़ काया से इस चेतन का कैसा नाता ?’
‘दादाजी ! मैं काम नहीं करूँगी तो दिन भर टाइमपास कैसे करूँगी, मेरा तो दिन ही नहीं कटेगा’ - नेहा मासूमियत से बोली।
‘अरे नेहा बेटा ! जो समय तुम्हें कर्म काटने की विधि सीखने को मिला, उसे तुम बाल काटने में गँवा रही हो ! यदि बाल ही काटती रही तो फिर लाखों वर्षों नरक-निगोद में कटना पड़ेगा। इस बचे हुये समय को स्वाध्याय में लगाओ, देखना कैसे तुम्हारा श्रृंगार होता है।’
‘दादाजी ! यह काम मैं नहीं करूँगी तो फिर कौन करेगा ? मैंने पैसे खर्च करके इसका कोर्स किया है।’
‘अरे बेटा ! यह सब काम करने के लिए पहले भी लोग थे, अभी भी सैकड़ों लोग दूसरों को सजाने वाले रहेंगे, पर अपने को सजाने का काम तो स्वयं को ही करना पड़ेगा, उसमें कोई सहयोग नहीं कर सकता, इसलिये मैं तो कहता हूँ - बेटा ! शान्ति से रहो, स्वाध्याय के लिए समय निकालो। जीवन के लिए धन है, धन के लिए जीवन नहीं, सोचना।’
पण्डित भोलाराम शास्त्री
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बेटा! मैं तो ठहरा गाँव का गँवार आदमी, जो मन में आया सो अपनी बेटी समझाकर कह दिया। बेटा ! कुछ बुरा कहा हो तो माफ करना।’
नेहा ने आँख में आँसू भरते हुए कहा कि- ‘अरे दादाजी ! गँवार तो मैं हूँ, आप तो समझदार हैं, जिसने समय की कीमत समझी है और मुझे समझाई है, अब मैं अपना समय निज आत्मा के श्रृंगार में लगाऊँगी, शरीर के सजाने में समय खराब नहीं करूँगी, अब मैं अपना जीवन कर्म काटने की कला सीखने में ही लगाऊँगी, ये बाल काटने और दूसरों के शरीर को सजाने का काम आज से ही बन्द !’
भोलारामजी हँसते हुये बोले - ‘खुश रहो बेटा। हम तुम्हारी कक्षा लेने के लिए तैयार हैं। अच्छा बेटा ! अब चलूँ, मन्दिर का समय हो रहा है।’
‘जयजिनेन्द्र बाबूजी !’
‘जयजिनेन्द्र बेटा !’
हँसते हुये भोलारामजी मन्दिर चल दिये।
नानाविवध श्रृंगार से, केवल तन चमकाय।
धूमिल होतो आत्मा, करते विषय-कषाय।।137।।
घड़ी घड़ी में घड़ी जा रही…
भोलायरामजी शिवपुरी में अपनी मस्ती में ही रहते। सुबह-शाम चिंतन करते हुये घूमने जाना, अभिषेक-पूजन स्वाध्याय में 2 घण्टे सुबह व रात्रि में सामायिक-स्वाध्याय में करीब 1.30 घण्टा मंदिर में समय व्यतीत होता। दोपहर में भी महिलाओं के लिये 1 घंटा की कक्षा लेने लगे थे, बाकी के समय स्वाध्याय या चिंतन में ही समय व्यतीत होता। घर के किसी भी काम में टोका-टाकी करना उनके स्वभाव में नहीं था। यहाँ तक कि बहू-बेटे किसी पारिवारिक विषय में कुछ पूछते भी तो कह देते – ‘बेटा! मैं इस संबंध में कुछ नहीं जानता, तुम्हें जो करना है वह करो, बस इतना ध्यान रखना जिसमें अन्याय होता हो, दूसरे को कष्ट पहुँचता हो, मिथ्यात्व का पोषण होता हो वह काम कभी नहीं करना। न हो ऐसी जगह अनुमोदना करने जाना।’
बेटा कहता ‘पिताजी! आपके संस्कारों से इतना तो मुझे पता है, हम कभी भी ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे आपके नाम को या धर्म को बदनाम होना पड़े।’
रविवार का दिन था, एक सज्जन घूमते हुये बगीचे में दिखे। जब वह बेन्च पर बैठे तो उन सज्जन ने उनसे जयजिनेन्द्र किया और पास में ही बैंच पर बैठ गये। पण्डितजी जयजिनेन्द्र करते ही समझ गये कि यह कोई जैन भाई ही है, और उन्हें पसीना-पसीना देखकर यह भी समझ गये कि बगीचे के चक्कर लगाकर आये हैं।
पण्डितजी बोले – ‘भैया, मैंने कभी आपको मंदिर में नहीं देखा, इसलिये मैंने आपको पहिचाना नहीं।’
सज्जन ने कहा – ‘पण्डितजी ! मेरा नाम महेश है, मैं नगरपालिका में अधिकारी हूँ। मैं करीब 8 बजे सो कर उठ
घड़ी घड़ी में घड़ी जा रही…
पाता हूँ, चाय पीता हूँ, मंजन करता हूँ, नहाता हूँ, तब तक ऑफिस जाने का समय हो जाता है और रात में ऑफिस से थककर देर से आता हूँ तो भोजन करके थोड़ा घूमकर सो जाता हूँ। इसलिये मैं मन्दिर आ ही नहीं पाता, तब फिर आप पहचान कैसे सकते हैं।’
पण्डितजी, महेशकुमार की दिनचर्या सुनकर बड़े विस्मित हुये कि यह कैसा जैन है जो 8 बजे सोकर उठता है, चाय पीकर मंजन करता है, जिसे मंदिर आने की फुर्सत नहीं है। रात्रि भोजन का त्याग नहीं है। इस शहर का नाम शिवपुरी किसने रखा होगा ?
महेशकुमार बोले – ‘पण्डितजी आप क्या सोचने लगे ? अरे ! यह जिंदगी कमाने, खाने-पीने और सोने ही को तो मिली है। मैंने सोच रखा है कि मैं भी जब आपकी उप का हो जाऊँगा, तब मंदिर आऊँगा और आपके साथ स्वाध्याय भी करूँगा। पर अभी तो मस्त रहने का समय है।’
‘पर बेटा ! एक बात समझ में नहीं आ रही कि जब रोजाना 8 बजे उठते हो तो आज 5 बजे उठकर घूमने कैसे आ गये और 4 किलोमीटर का चक्कर भी लगा लिया।’
‘अरे, क्या बताऊँ पण्डितजी ! कल ही डॉक्टर से चैकअप
करवाया तो डॉक्टर ने बताया कि तुम्हारी शुगर बहुत बड़ गई
है और ब्लडप्रेशर भी हाई हो रहा है। यदि कंट्रोल नहीं किया
तो किडनी पर इफेक्ट हो सकता है। कंट्रोल करने के लिये
सबसे बड़ा इलाज मोर्निंग वॉक ही बताया, इसलिये घूमने
आ गया। अभी तो 2 किलोमीटर दौड़ना भी है।’
पण्डितजी ‘क्यों बेटा ! डॉक्टर ने ही कहा होगा कि जब तुम 70
साल के हो जाओगे, तब तुम मंदिर जाना।’
बेटा ‘नहीं पण्डितजी ! वह कोई ज्योतिषी थोड़े ही हैं कि मेरी
उमर बतायेंगे। और उमर का तो क्या भरोसा, कब किसकी
पूरी हो जाये।’
पण्डितजी ‘तुम्हारी उमर तुमसे बिना पूछे थोड़ी पूरी हो सकती है ?’
सज्जन हंसते हुये बोले – ‘अरे पण्डितजी ! उम्र भी क्या
किसी से पूछकर पूरी होती है।’
पण्डितजी 'बेटा ! बात तो ऐसी ही है कि उम्र किसी से पूछकर पूरी
नहीं होती, पर तुमने कहा न कि जब मेरी उमर के हो जाओगे,
तब मंदिर आओगे । इसलिये मैंने सोचा कि उमर ने तुमसे
कुछ कहा होगा या तुम्हारी उससे दोस्ती होगी।
बेटा ! जब तुम्हें पता है कि उम्र पूछे बिना ही पूरी हो जायेगी;
पण्डित भोलाराम शास्त्री
बेटा ! जब तुम्हें पता है कि उम्र पूछे बिना ही पूरी हो जायेगी; घड़ी घड़ी में घड़ी जा रही…
कब पूरी होगी, पता नहीं तो फिर किस भरोसे कह रहे हो कि मेरी उमर में धर्म करोगे ? अगर मेरी जितनी उमर न मिली तो फिर क्या करोगे ? फिर तो खाली हाथ ही चले जाओगे ?’ महेशकुमार इस तर्क को सुनकर पण्डितजी की बात
ध्यान से सुनने लगे।
पण्डितजी ने बात बढ़ाते हुये कहा - ‘बेटा ! शरीर में रोग हुआ तो उसकी चिन्ता में तो तुम 5 बजे उठकर दौड़ने लगे और आत्मा को अनंत दुःख हो रहा है, मिथ्यात्व-अज्ञानता- असंयम की बीमारी हो रही है, राग-द्वेष-क्रोध-मानरूपी कषायों और विषयों में उलझकर पाप कमा रहे हो, चिंतामय जीवन जी रहे हो, जिसके कारण ढंग से नींद भी नहीं आती और इसी तनाव/चिन्ता में यह शरीर की बीमारियाँ भी हो गईं हैं; उस आत्मा की बीमारी मिटाने के लिये सुबह 7 बजे भी उठकर मंदिर नहीं आ सकते और शरीर की बीमारी मिटाने के लिए सुबह 5 बजे उठ सकते हो, दौड़ लगा सकते हो।’ ‘पण्डितजी ! घूमने-दौड़ने से ये बीमारी मिट जायेगी, इसलिए क्या करें सुबह उठना जरूरी हो गया।’
'बेटा ! शरीर की बीमारी मिट भी गई तो क्या हुआ, कुछ समय बाद तो यह शरीर ही मिट जायेगा, तब क्या करोगे ? पण्डित भोलाराम शास्त्री
अचानक आयु पूर्ण हो जायेगी, और पाप के फल में नरक के दुःख सहन करोगे, तब वहाँ कौन दुःख बांटने आयेगा ? वहाँ खाने-पीने को दाना नहीं मिलेगा, तब क्या यहाँ के बेटा-बेटी टिफिन लेकर वहाँ आयेंगे ? क्या कभी तुम अपने परदादा आदि की खबर लेने कहीं गये हो।’
‘पण्डितजी ! हमें क्या पता कि हमारे परदादा कहाँ गये हैं, जो हम खबर लेने जायें ?’
'यही तो हम कह रहे हैं कि कोई न साथ जायेगा और न ही वहाँ मिलने आयेगा। इसलिये बेटा ! समय निकालोगे तो मंदिर के लिये भी निकल आयेगा, जैसे कि घूमने के लिये निकल आया है। मंदिर और स्वाध्याय के लिये दिया गया समय ही अपना है, बाकी का समय तो दूसरों की सेवा में लगाया हुआ है।
बेटा ! बहुत भाग्य से जैनधर्म मिला है। यह लाखों लोगों में 1-2 को मिलता है। गंभीरता से सोचना। मैं तो ठहरा गाँव का गंवार आदमी; जो मन में आता है, सो कह देता हूँ, कुछ बुरा कहा हो तो माफ करना। जाओ बेटा ! दौड़ और लगा आओ।’
'पण्डितजी ! माफ तो आप करना। भूल तो मेरी ही है घड़ी घड़ी में घड़ी जा रही…
जो मैं इतना महान जैनधर्म और आप जैसे धर्म समझाने वाले पाकर भी अभी तक लाभ नहीं ले सका।
पण्डितजी ! मैं फटाफट दौड़ लगाकर आता हूँ। मैं आपको आज से ही मंदिर में मिलूँगा। लोग कहते हैं सुबह- सुबह किसी अच्छे आदमी का मुँह देख लो तो दिन सुधर जाता है, पर पण्डितजी ! मैं तो आज ही सुबह उठा और आपका मुँह देखा तो मेरा दिन तो क्या जीवन ही सुधर गया।’ ‘अरे ! अब ज्यादा बात मत कर, जल्दी से दौड़ लगा, नहीं तो मैं डॉक्टर से कह दूँगा।’ यह कहते हुए पण्डितजी हंसकर डण्डा घुमाते हुये घर की ओर चल दिये।
नरतन को देने वाली जननी, लोरी गाकर हमें सुलाती है। पर देखो यह जिनवाणी माता, तो थपकी देकर हमें जगाती है।। मोह नींद में सोते-सोते, काल अनंत बिताया है। अब तो जागो चेतनराजा, क्यों दुःखदायी नींद सुहाती है।।
मतलबी है सब ही संसार, किसी को नहीं किसी से प्यार। मत करो कषायों का व्यापार, न देखो अपनी जीत व हार।। डरे मृत्यु से तदपि टलत न…
पण्डित भोलाराम शास्त्री सदा अपनी मस्ती में मस्त रहते, बाल सुलभ मुस्कान उनका सौन्दर्य था। अड़ोस-पड़ोस में रहनेवाले बच्चे हों या वृद्ध, जैन हों या अजैन, स्त्री हों या पुरुष जो भी मिल जाता, उसी से वे प्रसन्नता के साथ मिलते, उसका हाल-चाल पूछते और समय हो तो दो चार बातें धर्म की कर लेते। कोई भी व्यक्ति उन्हें देखकर न तो भयभीत होता, न ही संकोच करता। उनका व्यवहार ही ऐसा था कि जो भी मिलता, उसे ऐसा लगता मानो वह अपने मित्र से ही बात कर रहा हो।
उनका सभी को सन्देश रहता - यह मनुष्य पर्याय बहुत ही दुर्लभ पर्याय प्राप्त हुई है। इसमें ऐसा कोई कार्य मत करो कि रात में शांति से नींद न आये या किसी से क्षमा मांगने का प्रसंग बने। और यदि गलती हो जाये तो कभी उस गलती को देर तक मत पड़े रहने दो, जितना जल्दी हो, क्षमा मांगकर या दूसरों को क्षमा करके उसकी सफाई कर लो, नहीं तो वह डरे मृत्यु से तदपि टलत न…
हृदय में पड़े-पड़े बदबू फैलायेगी, जिससे हमारा ही दम घुटने लगेगा।
एक बार सुबह-सुबह बगीचे में घूमते हुये पण्डितजी गुनगुनाते जा रहे थे –
‘अंजुली जल सम जवानी क्षीण होती जा रही। प्रत्येक पल जर्जर जरा नजदीक आती जा रही ।। काल की काली घटा प्रत्येक क्षण मंडरा रही। किन्तु पल-पल विषय तृष्णा, तरुण होती जा रही ।।’ तभी एक 70 वर्ष के दादाजी हीरालालजी मिले, जय जिनेन्द्र हुई। बगीचे में बेंच
पर बैठते हुये पण्डितजी
बोले भइयाजी ! आप से
एक बात पूहूँ ?’
उन्होंने कहा 'हाँ
पण्डितजी ! पूछो न।’
पण्डितजी बोले
'आपने कभी यह सोचा
आपकी मृत्यु कब होगी ?
कहाँ होगी ? कैसे होगी ?’
पण्डित भोलाराम शास्त्री
यह सुनते ही उन्हें गुस्सा आ गया। ‘अरे पण्डितजी ! आप सुबह-सुबह यह क्या बात करने लगे। मरें तो मेरे दुश्मन। अभी मेरी उम्र ही क्या है? अभी तो मेरे पोते की शादी होने वाली है, पड़पोते को गोद में खिलाऊँगा। थोड़े बाल सफेद क्या हो गये कि आप ऐसी बातें करने लगे। पण्डितजी ! आपने सुबह-सुबह मृत्यु की चर्चा करके अच्छा नहीं किया। अब आप से क्या कहूँ, यह सब अपशकुन की चर्चा है।’
पण्डितजी बोले- 'अरे बाप रे ! यह अपशकुन की चर्चा है मुझे माफ करना। मैं ज्योतिष विद्या नहीं जानता। मैं तो ठहरा गाँव का गंवार आदमी, जो दिमाग में आया, सो कह देता हूँ।
पर एक बात बताओ हीरालालजी, कि जो काम हो भी
सकता है और नहीं भी; और जो काम हम चाहें या न चाहें, होगा ही। इन दोनों में से हमें किसके बारे में योजना बनानी चाहिये ?’
'पण्डितजी ! सीधी सी बात है, जो काम होना ही है, उसके बारे में ही हमें सोचना चाहिये, जिससे कि वह काम अच्छी तरह से हो, हमें आकुलता न हो। जिसके होने की डरे मृत्यु से तदपि टलत न…
संभावना कम है, उसके पीछे सोच-सोचकर योजना बना- बनाकर समय गँवाने से क्या फायदा।’
'बहुत बढ़िया भईया, आपने सही कहा। अब एक बात
और। जो काम होना ही है, आपके हिसाब से उसके बारे में अच्छी तरह सोचना-विचारना, उसकी चर्चा करना क्या बुरी बात है ?’
‘अरे ! वह बात बुरी क्यों होगी, हमें सावधान रहकर जितना जल्दी हो सके, उसके बारे में योजना बनानी ही चाहिये।’ 'वाह भइया ! सही कह रहे हो आप। अब आप ही
सोचो, इस बची जिंदगी में आप पोते की बारात में जाओगे ही, पड़पोते को गोद में खिलाओगे ही, तब तक आप जीवित या स्वस्थ रहोगे ही, इसकी कोई गारन्टी है ? क्या बीच में ही स्वास्थ्य खराब नहीं हो सकता ? आप चलने-फिरने लायक ही न रहें क्या ऐसा नहीं हो सकता ? क्या हमें बिना बताये ही आयु पूर्ण नहीं हो सकती ? इनका जबाब ईमानदारी से दो।’ वह सज्जन शांति से सोचते हुये बोले - ‘पण्डितजी ! सही तो यही बात है कि कब तक जीवित रहूँ, कब अस्वस्थ हो जाऊँ, इसका कुछ पता नहीं है। मैं कुछ भी सोचूँ पर इसमें मेरे सोचे अनुसार कुछ नहीं चलेगा।’
पण्डित भोलाराम शास्त्री
‘तो भइया ! यह बताओ कि शादी होना, बेटा-बेटी, पोता-पोती होना, उनकी नौकरी लगना, बारात में जाना, पड़पोते को खिलाना, स्वस्थ रहना और मृत्यु का होना, इन कार्यों में कौनसा कार्य है जो होगा ही ?’
वह सोचते हुये बोले -’ इन सबमें तो एक मृत्यु ही निश्चित है। कभी हो, पर होगी अवश्य।’
'तो भइया ! इसीलिये तो मैंने पूछा कि जब मृत्यु आयेगी ही तो आपकी क्या तैयारी है ? यह चर्चा बुरी या अपशकुन वाली कहाँ हुई ?
जैसे हमें शिखरजी जाना ही है पर यात्रासंघ की बस कब आयेगी, हमें पक्का पता नहीं है, आज भी आ सकती है और दो दिन बाद का भी कार्यक्रम बन सकता है। ऐसी स्थिति में जिसने अपना सामान बांधकर रखा है, तैयारी पूरी करली है, उसे तो अभी बस आ जाये तो कोई दिक्कत नहीं और दो दिन बाद आये तो भी कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि उसकी तो पूरी तैयारी है।
इसी तरह जिसने तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर मैं कौन हूँ ? मेरा क्या स्वरूप है ? इसका निर्णय कर लिया है, उसे चाहे आज मुत्यु आये या कल, उसे कोई दिक्कत है ही नहीं, वह मस्ती में गाता है -
डरे मृत्यु से तदपि टलत न…
‘लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे।’ क्योंकि उसकी पूरी तैयारी है।’
‘पण्डितजी ! आप कह तो सही रहे हो।’
‘तो भइया स्वाध्याय में आओ और मैं कौन हूँ ? मेरा काम क्या है ? मैं यहाँ क्यों आया हूँ ? क्या करने से शांति मिलेगी ? इसका निर्णय करलो । मृत्यु को मृत्यु महोत्सव बनाने की योजना बना लो। बस यही कहना है। देखो भइया ! मैं तो ठहरा गांव का… ।’
'बस-बस, पण्डितजी ! यह मत कहना कि आप गँवार
हैं, गँवार तो मैं हूँ, जो सत्य को असत्य समझ रहा था, मैंने अभी तक ये बाल धूप में ही सफेद किये हैं, अनुभव कुछ भी नहीं है। मेरी समझ में सब आ गया है कि अब शांतिमय जीवन जीने व शान्ति से मरने के लिये मुझे क्या करना है।’
‘जयजिनेन्द्र पण्डितजी ।’
‘जयजिनेन्द्र भइया।’
बगीचे से दोनों चल दिये क्योंकि दोनों का ही मंदिर पहुँचने का समय हो रहा था।
काल करे सो आज कर…
पण्डित भोलारामजी मन्दिर से आकर बाहर बरामदे में खुली हवा में बैठे हुये थे। घर में उनका पोता चैतन्य जो कि कॉलेज में पढ़ता था, के मित्र सनत, समकित, अमोल आये हुये थे, उन्होंने चैतन्य से कहा - यार ! अपने दादाजी से मिलवा दो ना। चैतन्य के मित्र सभी जैन ही थे पर मन्दिर नहीं आते थे, इसलिये उसने मित्रों से कहा कि अगर आप दादाजी से मिलोगे तो वह मन्दिर आने व कक्षा में आने के लिये कहेंगे। मित्र बोले - अरे ! हम मंदिर-वंदिर के चक्कर में नहीं पड़ने वाले, इसमें तो हम किसी की बात नहीं मानते, चलो देखते हैं तेरे दादाजी क्या कहते हैं ? जो भी कहेंगे, हम अपनी अकल लगाकर कोई न कोई उत्तर दे ही देंगे, और जैसे आज तक बचते रहे, वैसे ही देखना आज भी बच निकलेंगे।
चैतन्य मन ही मन प्रसन्न हो रहा था कि आज मेरे मित्र दादाजी से मिलकर निश्चित ही मंदिर तो आने लगेंगे ही। मित्र कितनी भी अकल लगायें पर दादाजी के आगे किसी काल करे सो आज कर…
की अकल काम नहीं करती, आखिर दादाजी किसके हैं ! यह सोचकर उसे हंसी आ गई।
चैतन्य को हंसता देख सनत बोला 'हंस क्यों रहे हो ? क्या हमारी अकल पर भरोसा नहीं है ?
चैतन्य ने कहा- ‘अरे यार ! ऐसी कोई बात नहीं है, ऐसे ही हंसी आ गई थी। चलो दादाजी के पास चलते हैं।’ चैतन्य अपने मित्रों के साथ वहाँ आया। वह दादाजी से बहुत खुलकर बात करता था और दादाजी भी हंसी-मजाक के साथ चैतन्य से मिलते और समयानुकूल धर्मचर्चा भी करते थे।
पण्डित भोलाराम शास्त्री
चैतन्य और उसके मित्रों ने आते ही दादाजी के चरण स्पर्श करते हुये जयजिनेन्द्र की।
सभी को प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देते हुये भोलारामजी बोले – ‘बेटा ! ये सब कौन हैं ? इन पहलवानों का परिचय तो कराओ।’
‘दादाजी ! यह मेरे मित्र सनत, समकित और अमोल हैं। ये आपसे मिलने के लिये आये हैं। दादाजी ! आप यहाँ अकेले चुपचाप क्यों बैठे हो ?’
भोलारामजी हंसते हुये बोले ‘अरे बेटा ! अकेला कहाँ हूँ। मैं तो अपने आचार्यों से फोन पर बात कर रहा हूँ।’ चैतन्य के मित्र आश्चर्य से देखते हुये बोले कि ‘दादाजी फोन या मोबाइल तो आपके हाथ में है ही नहीं; फिर फोन पर कैसे बात कर रहे थे ?’
दादाजी बोले ‘बेटा ! जब तुम इस माचिस की डिब्बी जैसे मोबाइल से बात करते हो, तब तुम्हारे फोन का तार दिखता है क्या ? नहीं ना। क्योंकि वह बिना तार का मोबाइल फोन है और मेरे फोन का तार तो क्या फोन ही बिना दिखने वाला है। मैं अपने आचार्यों द्वारा बताये गये सिद्धान्तों को समझ रहा था। इस में किसी बाहर के फोन की आवश्यकता ही नहीं है।’ काल करे सो आज कर…
यह बात सुनकर सभी मित्र हंसने लगे।
पण्डितजी ने चैतन्य से कहा- ‘बेटा ! तुम्हारे ये मित्र तुम्हारे साथ रविवारीय कक्षा में तो आज तक कभी दिखे नहीं, ये लोग कक्षा में क्यों नहीं आते ?’
यह सुनते ही सब समझ गये कि अब पण्डितजी मंदिर आने के लिए ही बात कर रहे हैं। सब सजग हो गये कि कुछ भी हो जाये अपने को इनकी बातों में नहीं आना है। चैतन्य जवाब दे, उससे पहले ही अमोल बोला- ‘दादाजी ! हम तो इसलिये मन्दिर नहीं आते क्योंकि मन्दिर में लोग बात-बात पर झगड़ते हैं। कभी अध्यक्ष-मंत्री झगड़ते हैं तो कभी पूजन करने वाले, कई स्थानों पर तो प्रवचनकार पण्डित ही झगड़ते हैं कि प्रवचन कौन करेगा ? मानो मंदिर धर्म के स्थान न होकर अपनी इज्जत बढ़ाने के स्थान बन रहे हैं, इसलिये हम मन्दिर नहीं आते।’
अमोल की तार्किक बात सुनकर सब मित्र मन ही मन उसकी अकल पर प्रसन्न हो रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो पहली ही बॉल पर छक्का लगा दिया हो।
पण्डितजी गंभीरता से बोले- 'हाँ बेटा ! यह बात तो तुम सही कह रहे हो, मंदिर जो कि धर्मस्थान हैं, उसे कुछ लोग पण्डित भोलाराम शास्त्री
युद्धस्थान बना देते हैं। धर्म की चर्चा न करके धन के लिये उलझने लगते हैं, अपनी मान बढ़ाई के लिए ही बहुत से लोग काम करते हैं। ऐसे कार्य करना बहुत गलत बात है। ऐसे वातावरण में मन्दिर में मन नहीं लग सकता। तुम्हारी शिकायत बहुत हद तक सही है। मैं भी इसे अच्छा नहीं समझता, पर सारी समाज को कौन बदल सकता है ?
आचार्यों ने भी कहा है-
‘अन्य स्थाने कृतं पापं, धर्म स्थाने विनश्यति । धर्मस्थाने कृतं पापं, वज्रलेपो भविष्यति ।।’ अर्थात् अन्य स्थान घर-दुकान आदि में किये गये पाप तो मन्दिर में आकर मिटा सकते हैं परन्तु जो मन्दिरों, तीर्थों पर ही पाप करते हैं, वह तो वज्रलेप जैसे हो जायेंगे, उनका मिटाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। इसलिये बेटा ! मन्दिरों को तो धर्मस्थान ही बने रहने देना चाहिये।’
अचानक उन्होंने विषय बदलते हुये कहा - ‘चलो छोड़ो मंदिर और कक्षा की बात। बेटा! ये तो बताओ कि तुम्हारे कॉलेज में पढ़ाई तो अच्छी चल रही है?’
(सभी मन ही मन प्रसन्न होने लगे कि अमोल ने मन्दिर नहीं आने का तर्क देकर दादाजी को चुप कर दिया और काल करे सो आज कर…
मुस्कराते हुये चैतन्य की ओर देखा। जिसका भाव था कि देख, हमने तेरे भोले दादाजी को बहका दिया न !) ‘जी दादाजी ! हमारी पढ़ाई तो बहुत अच्छी चल रही है, अब तो परीक्षायें आनेवाली हैं।’
‘बहुत अच्छा, बेटा! खूब मन लगाकर पढ़ो। बेटा ! मैंने सुना था अभी कुछ दिन पहले तुम्हारे कॉलेज में लड़के झगड़ पड़े थे और चुनाव के चक्कर में गोली तक चल गई थी ?’
समकित बोला ‘अरे, हाँ दादाजी ! कॉलेज में कुछ लड़के तो केवल राजनीति व मस्ती करने ही आते हैं, विद्या के स्थान को ये लड़के अपनी गंदी सोच से राजनीति व झगड़े का अड्डा बना देते हैं।’
‘और कुछ दिन पहले तुम्हारे प्रोफेसर भी झगड़ पड़े थे। मुझे तो इस चैतन्य ने ही बताया था।’
‘दादाजी ! उन लड़कों को भड़कानेवाले यह प्रोफेसर ही तो होते हैं जो अपनी पार्टी की राजनीति इन लड़कों के माध्यम से चलाते हैं, इसलिये वे भी बांह चढ़ाये घूमते रहते हैं। आजकल महाविद्यालयों का वातावरण बहुत बिगड़ गया है।’ सनत ने कहा।
पण्डित भोलाराम शास्त्री
भोलारामजी बहुत ही भोलेपन से बोले ‘यह बात तो है। जमाना बहुत खराब हो रहा है पर हम उसमें क्या कर सकते हैं। क्यों बेटा ! तुम्हारे पापा तो दुकान करते हैं न ?’ ‘हाँ दादाजी ! कपड़े की बड़ी दुकान है।’ समकित बोला।
पण्डितजी कुछ याद करते हुये बोले- ‘अरे हाँ ! कपड़ा बाजार में भी तो अभी कुछ दिन पहले कोई गुण्डागर्दी हो गई थी न ! क्या हुआ था ? चाकू-वाकू चल गई थी, बाजार भी बन्द रहा।’
‘हाँ दादाजी ! क्या करें ? पुलिस सब बदमाशों से मिली रहती है, उनका ही राज चलता है। दो दिन बाजार बन्द रखा, तब वे बदमाश पकड़े गये।’
(समकित अमोल, सनत समझ रहे थे कि वे पण्डितजी
के चंगुल से बच गये पर चैतन्य को विश्वास था कि दादाजी का एक सूत्री कार्यक्रम है, जो मिले उसे किसी भी तरह स्वाध्याय से जोड़ना। आज तक तो वह अपने मिशन में असफल हुये नहीं पर वह देख रहा था कि आज के इन जवानों को दादाजी किस तरह पराजित करते हैं।)
'क्यों बेटा ! जब तुम्हारे कॉलेज में छात्रों के इतने झगड़े काल करे सो आज कर…
होते हैं, प्रोफेसर भी आपस में लड़ते हैं, तब तो तुमने कॉलेज जाना बन्द कर दिया होगा ?’
‘नहीं, दादाजी ! हमें तो पढ़ने से मतलब, हमें उन लड़कों और उन प्रोफेसरों से क्या लेना देना, उनका फल वे भोंगेगे। हमें तो अपने काम से मतलब । अगर कॉलेज नहीं जायेंगे तो उनका तो कुछ बिगड़ना नहीं है, हमारा ही भविष्य खराब हो जायेगा।’ अमोल बोला।
'शाबास बेटा ! तुम्हारी यह सोच बिल्कुल सही है।
हमेशा ऐसा ही पॉजेटिव सोचना चाहिये ।
बेटा समकित ! बाजार में झगड़ा हुआ था तो अब तो
तुम्हारे पिताजी ने तो दुकान वहाँ से बन्द कर दी होगी ?’ ‘अरे दादाजी ! आप भी बच्चों जैसी बातें कर रहे हो ! ऐसे दुकानें बन्द करने लगें तो किसी भी बाजार में दुकान ही नहीं कर पायेंगे। बाजार में तो क्या, ऐसे झगड़े घर तो में भी हो जाते हैं, तो कोई घर तो नहीं छोड़ देता, यह सब तो चलता ही रहता है।’ समकित ने समझदार बनते हुये कहा।
‘बेटा ! कुछ भी कहो, तुम हो तो बहुत होशियार ।’ फिर हंसते हुये कहा- 'तूने शहर का पानी पिया है, मैं तो ठहरा गाँव का गँवार आदमी; इसलिये मैंने इतनी अकल नहीं लगाई। पण्डित भोलाराम शास्त्री
तूने बिल्कुल सही कहा - छोटे-मोटे झगड़ों से कॉलेज, बाजार, घर थोड़े ही छोड़े जाते हैं।’ समकित अपनी प्रशंसा सुनकर मन ही मन प्रसन्न हो रहा था।
इतने में पण्डितजी बोले 'पर बेटा ! एक बात समझ में नहीं आई कि कॉलेज में लड़के व प्रोफेसर झगड़ते हैं, फिर भी तुमने कॉलेज नहीं छोड़ा ‘अपने काम से काम’ को मानकर पढ़ाई पर ध्यान दिया। बाजार में झगड़े हुये पर तुम्हारे पिताजी ने दुकान बन्द नहीं की, सावधानी रखते हुये दुबारा चालू कर दी। तुमने कहा - घर पर भी झगड़े होते हैं तो घर नहीं छोड़ते, तो फिर बेटा ! मन्दिर में कभी झगड़े हो भी गये हों तो इस कारण से तुमने मन्दिर आना क्यों छोड़ दिया ? यहाँ क्यों नहीं सोचा कि उस झगड़े का फल उनको ही मिलेगा, हम क्यों मंदिर/स्वाध्याय छोड़ें। इसमें तो अपना ही बुरा होगा, हमें तो अपने दर्शन/पूजन/स्वाध्याय करने से मतलब; जो न समझें तो न समझें। कुछ नासमझों के चक्कर में तुम्हारे जैसे समझदारों ने मन्दिर आना क्यों छोड़ दिया ?
बेटा ! तुम सब समझदार हो, घर जाकर सोचना कि
तुमने सही किया या गलत ?’
सारे लड़के जो भोलारामजी को भोला समझ रहे थे,
काल करे सो आज कर…
वे उनकी तर्क शक्ति के सम्मुख एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
सनत भावुक होते हुये बोल पड़ा – ‘अरे दादाजी ! घर जाकर क्या सोचना। हमारी समझ में आ गया है कि मन्दिर न जाने के संबंध में हमारी सोच गलत थी। हमें औरों से क्या लेना-देना हम तो मन्दिर आयेंगे, स्वाध्याय करेंगे; जिसे जो करना हो, उसकी वह जाने। क्यों दोस्तो ?’ सभी ने हाँ में गर्दन हिला दी।
‘शाबास बेटा। हमें खुशी है कि मेरे चैतन्य के तुम्हारे जैसे समझदार दोस्त हैं। बेटा ! तो रविवार को कक्षा में आओगे ना ?’ ‘दादाजी पक्का, हम तो आयेंगे ही। अपने अन्य मित्रों को भी लायेंगे।’ अमोल ने कहा।
पण्डितजी हंसते हुये बोले ‘ओखे । जयजिनेन्द्र ।’ चैतन्य को अपने भोले पर प्यारे व समझदार दादाजी पर गर्व हो रहा था। सब हंसते हुये खेलने चले गये। धर्म मार्ग जो ले चले, साधर्मी कहलाय ।
धर्म पत्नी अरु धर्म पति, चलें मार्ग सुखदाय ।।151 ।। धर्म कब ?..
भोलारामजी प्रतिदिन सुबह बगीचे में घूमने जाते थे। मस्ती के साथ डण्डा घुमाते हुये कभी बुजुर्गों के साथ धीरे-धीरे बात करते हुये चक्कर लगाते तो कभी बच्चे मिल जाते तो उनके साथ चहलकदमी करने लग जाते। आज सुबह जैसे ही घूमने के लिए बगीचे में प्रवेश किया तो कॉलेज के छात्र अमित, सुमित, अक्षय और दीपक मिल गये जो कि प्रतिदिन बगीचे में घूमने के कारण अब तक परिचित हो चुके थे। छात्रों ने आदर के साथ जयजिनेन्द्र किया। पण्डितजी ने जयजिनेन्द्र करते हुये स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने का शुभाशीष भी दिया। पण्डितजी हंसते हुये उन युवाओं से बोले - 'चलो
बच्चो ! आज मैं भी तुम्हारे साथ दौड़ लगाऊँगा, देखता हूँ कौन आगे निकलता है ? बच्चो ! यदि तुम पीछे रह गये तो तुम बुड्ढे और मैं जवान कहलाऊँगा। ओखे-रेड्डी।’ बच्चे समझ ही नहीं पाये कि क्या कहना चाहिये, क्या करना चाहिये।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 187.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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